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ऐसे मारा गया था कुख्यात श्रीप्रकाश शुक्ला ,यूपी का सबसे बड़ा एनकाउंटर,

23 मई यूपी..
यूपी एनकाउंटर यानी मुठभेड़ शब्द का इस्तेमाल हिंदुस्तान और पाकिस्तान में बीसवीं सदी में शुरू हुआ. एनकाउंटर का सीधा सीधा मतलब होता है, बदमाशों के साथ पुलिस की मुठभेड़. हालांकि बहुत से लोग एनकाउंटर को सरकारी कत्ल भी कहते हैं. हिंदुस्तान में पहला एनकाउंटर 11 जनवरी 1982 को मुंबई के वडाला कॉलेज में हुआ था, जब मुंबई पुलिस की एक स्पेशल टीम ने गैंगस्टर मान्या सुरवे को छह गोलियां मारी थीं. आजाद हिंदुस्तान का ये पहला एनकाउंटर ही विवादों में घिर गया था. मगर इस देश में जो एनकाउंटर सबसे ज्यादा चर्चित हुआ वो उसी यूपी में हुआ था जहां आजकल मुठभेड़ की झड़ी लगी हुई है.

आतंक का दूसरा नाम था श्रीप्रकाश शुक्ला

साल भर में 1800 से ज्यादा मुठभेड़. 50 अपराधियों की मौत. 500 से ज़्यादा अपराधी घायल. ये तो है यूपी में मुठभेड़ की ताज़ातरीन तस्वीरें. मगर यूपी पुलिस 90 के दशक के उस एनकाउंटर को आज भी नहीं भूल पाई है जो बिना शक यूपी पुलिस के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा एनकाउंटर था. एनकाउंटर कुख्यात गैंगस्टर श्रीप्रकाश शुक्ला का. जो 90 के दशक में यूपी में आतंक का सबसे बड़ा नाम था और जिसके लिए यूपी पुलिस को खास तौर पर स्पेशल टास्क फ़ोर्स तक बनानी पड़ी थी. श्रीप्रकाश शुक्ला का शूटआउट 23 सितंबर 1998 को दिल्ली के करीब गाज़ियाबाद में हुआ था.

 

11 जनवरी 1997, अमीनाबाद, लखनऊ

अपने ऑफिस में लाटरी का थोक व्यापारी पंकज श्रीवास्तव काम कर रहा है. तभी तीन बदमाश अंदर दाखिल होते हैं और उसे गोली मार देते हैं.

12 मई 1997, लखनऊ

बिल्डर मूल चंद अरोड़ा की किडनैपिंग कर ली जाती है. करने वाला वही श्री प्रकाश शुक्ला. उसे मुक्त करने की एवज में वो एक करोड़ की फिरौती वसूलता है. और फिर उसे रिहा करता है.

अगस्त 1997, दिलीप होटल, लखनऊ

होटल का कमरा नंबर 206. कमरे में चार लोग ठहाके लगा रहे थे. चाय नाश्ता कर रहे थे. होटल के नीचे दो लोग कार से उतरते हैं. उनके हाथ में एके47 थी. ये दोनों धड़धड़ाते हुए होटल की सीढियां चढने लगते हैं. एक शख्स कमरे के दरवाजे पर लात मारता है और दरवाजा खुलते ही अंधाधुंध गोलियां चलाना शुरु कर देता है. कमरे में बैठे चार लोगों में से तीन बेड के नीचे छुप जाते हैं जबकि एक की मौत हो जाती है. जाते-जाते गोली मारने वाला शख्स बोलता है. जान बचानी है तो भाग ले. जो भी मेरे और टेंडर के बीच में आएगा, वो गया काम से. दरअसल, वो श्रीप्रकाश शुक्ला था, जिसने होटल में घुसकर गोरखपुर के 4 ठेकेदारों को गोली मार दी थी. जिसमें एक की मौत हो जाती है, तीन घायल हो जाते हैं. ये सब टेंडर के लिए होता था.

अक्टूबर 1997, गोखले मार्ग, लखनऊ

दवा व्यापारी के.के. रस्तोगी कार में बैठते हैं. मार्निंग वॉक के लिए निकलते हैं. उनका लड़का ड्राइव कर रहा था. तभी पीछे से रस्तोगी की कार को एक दूसरी कार टक्कर मारती है. व्यापारी का लड़का कुनाल रस्तोगी गुस्से में कार से उतरता है. कुनाल टक्कर मारने वाले पर बरसता है और इतना कहते ही बदमाश कुनाल को दबोचकर कार में बैठा लेते हैं. बेटे को अगवा होता देख के.के. रस्तोगी कार का पीछा करते हैं. रस्तोगी बदमाशों की कार में टक्कर मारते हैं और बदमाश कार रोक देते हैं. श्रीप्रकाश कार से उतरता है और पिस्तौल निकालकर केके रस्तोगी को गोली मार देता है. लड़के को किडनैप करके ले जाता है. उसके लिए एक करोड़ की फिरौती मांगी जाती है.

तारीख 18 जनवरी 1998, शिवनारायण पेट्रोल पंप, लखनऊ

यूपी कोऑपरेटिव के चेयरमैन उपेंद्र विक्रम सिंह अपने ऑफिस से कार की तरफ बढ़े ही थे कि उनके सामने एक कार आकर रुकती है. कार से एके-47 से लैस बदमाश उतरते हैं. और उपेंद्र पर हमला बोल देते हैं. सैकड़ों राउंड फायरिंग होती है. इस वारदात में उपेंद्र मारे जाते हैं. बदमाश अपनी कार छोड़ कर फरार हो जाते हैं. इस वारदात को अंजाम देता है श्रीप्रकाश शुक्ला. जो एक साथ 4 लोगों का कत्ल करता है. वो भी रेलवे के ठेके को लेकर.

कौन था श्रीप्रकाश शुक्ला

श्रीप्रकाश शुक्ला का जन्म गोरखपुर के ममखोर गांव में हुआ था. उसके पिता एक स्कूल में शिक्षक थे. वह अपने गांव का मशहूर पहलवान हुआ करता था. साल 1993 में श्रीप्रकाश शुक्ला ने उसकी बहन को देखकर सीटी बजाने वाले राकेश तिवारी नामक एक व्यक्ति की हत्या कर दी थी. 20 साल के युवक श्रीप्रकाश के जीवन का यह पहला जुर्म था. इसके बाद उसने पलट कर नहीं देखा और वो जरायम की दुनिया में आगे बढ़ता चला गया.

बैंकॉक भाग गया था शुक्ला

अपने गांव में राकेश की हत्या करने के बाद पुलिस शुक्ला की तलाश कर रही थी. मामले की गंभीरता को समझते हुए श्रीप्रकाश ने देश छोड़ना ही बेहतर समझा. और वह किसी तरह से भाग कर बैंकॉक चला गया. वह काफी दिनों तक वहां रहा लेकिन जब वह लौट कर आया तो उसने अपराध की दुनिया में ही ठिकाना बनाने का मन बना लिया था.

सूरजभान गैंग में शामिल हुआ था श्रीप्रकाश

श्रीप्रकाश शुक्ला हत्या के मामले में वांछित था. पुलिस यहां उसकी तलाश कर रही थी और वह बैंकॉक में खुले आम घूम रहा था. लेकिन पैसे की तंगी के चलते वह ज्यादा दिन वहां नहीं रह सका. और वह भारत लौट आया. आने के बाद उसने मोकामा, बिहार का रुख किया और सूबे के सूरजभान गैंग में शामिल हो गया.

शाही की हत्या से उछला नाम

बाहुबली बनकर श्रीप्रकाश शुक्ला अब जुर्म की दुनिया में नाम कमा रहा था. इसी दौरान उसने 1997 में राजनेता और कुख्यात अपराधी वीरेन्द्र शाही की लखनऊ में हत्या कर दी. माना जाता है कि शाही के विरोधी हरि शंकर तिवारी करे इशारे पर यह सब हुआ था. वह चिल्लुपार विधानसभा सीट से चुनाव लड़ना चाहता था. इसके बाद एक एक करके न जाने कितने ही हत्या, अपहरण, अवैध वसूली और धमकी के मामले श्रीप्रकाश शुक्ला के नाम लिखे गए.

रेलवे ठेकों पर था एक-छत्र राज

श्रीप्रकाश शुक्ला पुलिस की पहुंच से बाहर था. उसका नाम उससे भी बड़ा बनता जा रहा था. यूपी पुलिस हैरान-परेशान थी. नाम पता था लेकिन उसकी कोई तस्‍वीर पुलिस के पास नहीं थी. कारोबारियों से उगाही, किडनैपिंग, कत्ल, डकैती, पूरब से लेकर पश्चिम तक रेलवे के ठेके पर एकछत्र राज. बस यही उसका पेशा था. और इसके बीच जो भी आया उसने उसे मारने में जरा भी देरी नहीं की. लिहाजा लोग तो लोग पुलिस तक उससे डरती थी.

शुक्ला को पकड़ने के लिए बनी थी एसटीएफ

श्रीप्रकाश के ताबड़तोड़ अपराध सरकार और पुलिस के लिए सिरदर्द बन चुके थे. सरकार ने उसके खात्मे का मन बना लिया था. लखनऊ सचिवालय में यूपी के मुख्‍यमंत्री, गृहमंत्री और डीजीपी की एक बैठक हुई. इसमें अपराधियों से निपटने के लिए स्‍पेशल फोर्स बनाने की योजना तैयार हुई. 4 मई 1998 को यूपी पुलिस के तत्‍कालीन एडीजी अजयराज शर्मा ने राज्य पुलिस के बेहतरीन 50 जवानों को छांट कर स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) बनाई. इस फोर्स का पहला टास्क था- श्रीप्रकाश शुक्ला, जिंदा या मुर्दा.

पुलिस के साथ पहली मुठभेड़

श्रीप्रकाश के साथ पुलिस का पहला एनकाउंटर 9 सितंबर 1997 को हुआ. पुलिस को खबर मिली कि श्रीप्रकाश अपने तीन साथियों के साथ सैलून में बाल कटवाने लखनऊ के जनपथ मार्केट में आने वाला था. पुलिस ने चारों तरफ घेराबंदी कर दी. लेकिन यह ऑपरेशन ना सिर्फ फेल हो गया बल्कि पुलिस का एक जवान भी शहीद हो गया. इस एनकाउंटर के बाद श्रीप्रकाश शुक्ला की दहशत पूरे यूपी में और ज्यादा बढ़ गई.

मुश्किल से पुलिस को मिली थी तस्वीर

सादी वर्दी में तैनात एके 47 से लैस एसटीएफ के जवानों ने लखनऊ से गाजियाबाद, गाजियाबाद से बिहार, कलकत्ता, जयपुर तक छापेमारी तब जाकर श्रीप्रकाश शुक्‍ला की तस्‍वीर पुलिस के हाथ लगी. इधर, एसटीएफ श्रीप्रकाश की खाक छान रही थी और उधर श्रीप्रकाश शुक्ला अपने करियर की सबसे बड़ी वारदात को अंजाम देने यूपी से निकल कर पटना पहुंच चुका था.

पटना में किया था मंत्री का मर्डर

श्रीप्रकाश शुक्‍ला ने 13 जून 1998 को पटना स्थित इंदिरा गांधी हॉस्पिटल के बाहर बिहार सरकार के तत्‍कालीन मंत्री बृज बिहारी प्रसाद की गोली मारकर हत्‍या कर दी. मंत्री की हत्‍या उस वक्‍त की गई जब उनके साथ सिक्‍योरिटी गार्ड मौजूद थे. वो अपनी लाल बत्ती की कार से उतरे ही थे कि एके 47 से लैस 4 बदमाशों ने उनपर फायरिंग शुरु कर दी और वहां से फरार हो गए.

ले ली थी मुख्यमंत्री की सुपारी

इस कत्ल के साथ ही श्रीप्रकाश ने साफ कर दिया था कि अब पूरब से पश्चिम तक रेलवे के ठेकों पर उसी का एक छत्र राज है. बिहार के मंत्री के कत्ल का मामला अभी ठंडा भी नहीं हुआ था कि तभी यूपी पुलिस को एक ऐसी खबर मिली जिससे पुलिस के हाथ-पांव फूल गए. श्रीप्रकाश शुक्ला ने यूपी के तत्‍कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की सुपारी ले ली थी. 6 करोड़ रुपये में सीएम की सुपारी लेने की खबर एसटीएफ के लिए बम गिरने जैसी थी.

मोबाइल सर्विलांस का इस्तेमाल

एसटीएफ हरकत में आई और उसने तय भी कर लिया कि अब किसी भी हालत में श्रीप्रकाश शुक्‍ला का पकड़ा जाना जरूरी है. एसटीएफ को पता चला कि श्रीप्रकाश दिल्‍ली में अपनी किसी गर्लफ्रेंड से मोबाइल पर बातें करता है. एसटीएफ ने उसके मोबाइल को सर्विलांस पर ले लिया. लेकिन श्रीप्रकाश को शक हो गया. उसने मोबाइल की जगह पीसीओ से बात करना शुरू कर दिया. लेकिन उसे यह नहीं पता था कि पुलिस ने उसकी गर्लफ्रेंड के नंबर को भी सर्विलांस पर रखा है. सर्विलांस से पता चला कि जिस पीसीओ से श्रीप्रकाश कॉल कर रहा है, वो गाजियाबाद के इंदिरापुरम इलाके में है. खबर मिलते ही यूपी एसटीएफ की टीम फौरन लोकेशन की तरफ रवाना हो जाती है.

ऐसे मारा गया था श्रीप्रकाश शुक्ला

23 सितंबर 1998 को एसटीएफ के प्रभारी अरुण कुमार को खबर मिलती है कि श्रीप्रकाश शुक्‍ला दिल्‍ली से गाजियाबाद की तरफ आ रहा है. श्रीप्रकाश शुक्‍ला की कार जैसे ही वसुंधरा इन्क्लेव पार करती है, अरुण कुमार सहित एसटीएफ की टीम उसका पीछा शुरू कर देती है. उस वक्‍त श्रीप्रकाश शुक्ला को जरा भी शक नहीं हुआ था कि एसटीएफ उसका पीछा कर रही है. उसकी कार जैसे ही इंदिरापुरम के सुनसान इलाके में दाखिल हुई, मौका मिलते ही एसटीएफ की टीम ने अचानक श्रीप्रकाश की कार को ओवरटेक कर उसका रास्ता रोक दिया. पुलिस ने पहले श्रीप्रकाश को सरेंडर करने को कहा लेकिन वो नहीं माना और फायरिंग शुरू कर दी. पुलिस की जवाबी फायरिंग में श्रीप्रकाश शुक्ला मारा गया. और इस तरह से यूपी के सबसे बड़े डॉन की कहानी खत्म हुई.

कई नेताओं और पुलिसवालों से थी दोस्ती

श्रीप्रकाश शुक्ला की मौत के बाद एसटीएफ को जांच में पता चला कि कई नेताओं और पुलिस के आला अधिकारियों से उसके शुक्ला की दोस्ती थी. कई पुलिस वाले उसके लिए खबरी का काम करते थे. जिसकी एवज में उन्हें श्रीप्रकाश से पैसा मिलता था. कई नेता और मंत्री भी उसके सहयोगी थे. यूपी के एक मंत्री का नाम तो उसके साथ कई बार जोड़ा गया था. वह तत्कालीन मंत्री अब जेल में बंद है. इस मामले में कई अधिकारियों और नेताओं की खुफिया जांच पड़ताल भी की गई थी.

पुलिस ने खर्चे किए थे एक करोड़

माफिया डॉन श्रीप्रकाश शुक्ला अपने पास हर वक्त एके47 राइफल रखता था. पुलिस रिकार्ड के मुताबिक श्रीप्रकाश के खात्मे के लिए पुलिस ने जो अभियान चलाया. उस पर लगभग एक करोड़ रुपये खर्च हुए थे. यह अपने आप में इस तरह का पहला मामला था, जब पुलिस ने किसी अपराधी को पकड़ने के लिए इतनी बड़ी रकम खर्च की थी. उस वक्त सर्विलांस का इस्तेमाल किया जाना भी काफी महंगा था. इसे अभी तक का सबसे खर्चीला पुलिस मिशन कहा जा सकता है

चौथा खंभा न्यूज़ .com / नसीब सैनी/अभिषेक मेहरा

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ऑपरेशन ब्लू स्टार: विनाशकारी प्रभाव के साथ एक गैर-कल्पना ऑपरेशन

– (जयबंस सिंह एक भू-रणनीतिक विश्लेषक, स्तंभकार और लेखक हैं)

– (जयबंस सिंह एक भू-रणनीतिक विश्लेषक, स्तंभकार और लेखक हैं)

भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा ऑपरेशन ब्लू स्टार नामक एक सैन्य हमले को पवित्रतम सिख मंदिर, हरमंदिर साहिब पर सात दिनों से अधिक, 1 जून से 7 जून, 1984 तक किया गया। इसे सिखों द्वारा तीज के रूप में संदर्भित किया जाता है। घल्लूघरा (सिखों का तीसरा नरसंहार / प्रलय), पहले दो क्रमशः 1746 और 1762 में हुए, जब अफगानों ने सिखों को महिलाओं और बच्चों सहित घेर लिया, और फिर बिना पछतावे के नरसंहार किया।
कथित तौर पर, धार्मिक नेता संत जरनैल सिंह भिंडरावाले के नेतृत्व में सिख आतंकवादियों के मंदिर को खाली कराने के लिए हमला किया गया था, जिन्होंने वहां शरण ली थी। यह कहा गया कि उनकी गिरफ्तारी की मांग को लेकर संसद के दोनों सदनों के सदस्यों के साथ राजनीतिक दबाव को देखते हुए यह हमला लाजमी था
अब यह तर्क दिया जा रहा है कि किसी भी अदालत में संत भिंडरावाले के खिलाफ कोई मामला नहीं था और न ही उनके खिलाफ कोई चार्जशीट दायर की गई थी, इसलिए, इस तरह की कठोर कार्रवाई और उन्हें गिरफ्तार करने के लिए अभूतपूर्व हिंसा अतिरिक्त-संवैधानिक, गैरकानूनी और गैर-कानूनी थी।
दुर्भाग्यपूर्ण हमले में दो अतिरिक्त कारक बाहर खड़े हैं। पहला, भारतीय सेना का यह गलत विश्वास कि यह संत भिंडरावाले और उनके अनुयायियों को थोड़े समय के भीतर नगण्य हताहतों के साथ निकालने में सक्षम होगा। दूसरा, संत भिंडरावाले की यह धारणा कि भारत सरकार पवित्र हरमंदिर साहिब पर हमले का आदेश देने की हिम्मत नहीं करेगी। दोनों दल अपने आकलन में भयानक गलत थे और परिणाम एकदम विनाश और तबाही था
संत भिंडरावाले और उनके अनुयायियों को मंदिर के अंदर मार दिया गया था, क्योंकि कई निर्दोष नागरिक थे जो मंदिर में पूजा करने के लिए गए थे और कार्रवाई शुरू होने पर वहां फंस गए।
पवित्र प्रवृत्ति के निकट विनाश और कई हताहतों ने सिखों के मानस पर गहरा नकारात्मक प्रभाव छोड़ा, जिन्होंने पहले से ही सरकार के खिलाफ महान अविश्वास और संदेह का सामना किया।
समस्या को हल करने के बजाय, हमले ने एक बड़ा मुद्दा बनाया। पांच महीने के भीतर, 31 अक्टूबर, 1984 को, उनके सिख अंगरक्षकों, सतवंत सिंह और बेअंत सिंह द्वारा और उसके बाद हुए देश भर में हुए सिख विरोधी दंगों के द्वारा प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की भीषण हत्या हुई। पंजाब में मिलिटेंसी कई सालों तक जारी रही और हजारों युवा सिख लड़कों, सुरक्षा बल के जवानों और निर्दोष नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया।
यह बिना कारण नहीं है कि हमले को सिखों द्वारा एक प्रलय के रूप में संदर्भित किया जाता है, घटना के 36 साल बाद भी कुल मिलाप उन्हें बाहर निकालना जारी रखता है।
हरमंदिर साहिब पर हमला, खालिस्तान आंदोलन, सिख राष्ट्रवादी पहल का एक उप-उत्पाद था जो सिख लोगों के लिए एक स्वतंत्र राज्य बनाने की आकांक्षा रखता था। ऑपरेशन से कुछ साल पहले, खालिस्तान आंदोलन के एक हिस्से के रूप में उग्रवाद ने पंजाब में मजबूत जड़ें जमा ली थीं और संत भिंडरावाले इसका सबसे प्रमुख चेहरा थे, जिसका मुख्य कारण उनके विनीत बयानों और अतिवादी विचारों के कारण था। प्रारंभ में, उन्होंने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पारित करने का एक एजेंडा तय किया, लेकिन, यहां उन्होंने एक सड़क ब्लॉक के साथ मुलाकात की, क्योंकि इंदिरा गांधी सरकार ने इसे एक अलगाववादी दस्तावेज माना था। राजनीतिक मिशन में असफल होने के बाद, संत भिंडरावाले ने सभी सिखों की प्राथमिक आकांक्षा के रूप में आवश्यक होने पर बल के उपयोग से खालिस्तान के निर्माण की घोषणा की।
24 अप्रैल, 1980 को निरंकारी संप्रदाय के प्रमुख बाबा गुरबचन सिंह की हत्या कर दी गई थी। उनका संप्रदाय, लंबे समय से, संत भिंडरावाले की अध्यक्षता वाली दमदमी टकसाल के साथ लॉगरहेड्स में था। 9 सितंबर 1981 को, अखबार केसरी के संस्थापक संपादक लाला जगत नारायण की हत्या कर दी गई थी। उन्हें निरंकारी संप्रदाय के समर्थक के रूप में देखा गया था और उन्होंने कई संपादकीय लिखे थे, जिन्होंने भिंडरावाले के कृत्यों की निंदा की थी।
जबकि संत भिंडरावाले हरमंदिर साहिब के भीतर थे, पंजाब में हिंसक गतिविधियां बेरोकटोक जारी थीं। 23 अप्रैल, अप्रैल, 1983 को, पंजाब पुलिस के उप महानिरीक्षक ए.एस. अटवाल की भिंडरावाले समूह के एक बंदूकधारी ने गोली मारकर हत्या कर दी थी क्योंकि उन्होंने हरमंदिर साहिब कंपाउंड छोड़ दिया था। 12 मई, 1984 को, लाला जगत नारायण के बेटे रमेश चंदर और हिंद समचार मीडिया समूह के संपादक, भिंडरावाले के आतंकवादियों ने हत्या कर दी थी
सरकार संत भिंडरावाले को गिरफ्तार करने और आवश्यक आदेशों को देखने के लिए उत्सुक थी, जिनकी पवित्रता पर सवाल उठाए जाते हैं, 19 जुलाई, 1982 को पारित किए गए। भाई अमरीक सिंह, दमदम टकसाल से ऑल इंडिया सिख स्टूडेंट्स फेडरेशन के अध्यक्ष और एक और सहयोगी थे उसके साथ गिरफ्तार भी किया जाए। इन आदेशों के कारण, उपायुक्त, अमृतसर के निवास के बाहर कई सिखों ने एक धरना (विरोध) किया।
हरचंद सिंह लोंगोवाल जैसे अकाली नेताओं की गिरफ्तारी से बचने के लिए, संत भिंडरावाले ने हरमंदिर साहिब परिसर में आकर अपने लगभग 200 सशस्त्र अनुयायियों के साथ गुरु नानक निवास में निवास किया। हर दिन 51 सिखों का एक समूह सरकारी कार्यालयों और अदालत में गिरफ्तारी के लिए जाता है। 4 अगस्त, 1982 तक, अकाली दल भी इस आंदोलन में शामिल हो गया था और इसे "धार्मिक युद्ध" का रूप मिला। समूह ने 19, जुलाई, 1982 से 01, जून, 1984 तक कई पहलुओं को बदल दिया
जब पवित्र मंदिर पर हमला हुआ। हरचंद सिंह लोंगोवाल जैसे कुछ सिख नेताओं ने संत भिंडरावाले की गिरफ्तारी के लिए बातचीत करने का प्रयास किया, लेकिन दोनों पक्षों द्वारा लिए गए अनम्य पदों के कारण वे सफल नहीं हुए।
सरकार ने मंदिर परिसर से संत भिंडरावाले का अपहरण करने और एक वरिष्ठ राजनेता, पीवी नरसिम्हा राव को संत की गिरफ्तारी के लिए वार्ताकार के रूप में भेजने के लिए एक संभावित गुप्त अभियान सहित कई विकल्पों को देखा। प्रयासों का कोई फल नहीं हुआ। 26 मई, 1984 को, वरिष्ठ अकाली नेता गुरुचरण सिंह टोहरा ने सरकार को सूचित किया कि वह शांतिपूर्ण समाधान के लिए भिंडरावाले को सहमत करने में विफल रहे हैं।
सरकार के इस तरह के कठोर निर्णय लेने का एक और बड़ा कारण यह था कि पाकिस्तान लगातार सैन्य और मनोवैज्ञानिक क्षेत्र में राज्य में अपनी भागीदारी बढ़ा रहा था। खुफिया रिपोर्टों ने सुझाव दिया कि पाकिस्तान न केवल हथियारों और गोला-बारूद के प्रावधान में मदद करने के लिए तैयार था, बल्कि स्वतंत्रता सेनानियों की आड़ में तस्करी भी करता था।
यह व्यापक रूप से माना जाता है कि उक्त कारक संचयी रूप से संत भिंडरावाले और उनके अनुयायियों को बाहर निकालने के लिए मंदिर पर हमला करने की योजना का ट्रिगर बन गए। बेशक, थोड़े से समय के साथ थोड़े समय के अंतराल में "दगाबाज़" को बाहर निकालने की सेना द्वारा दिए गए विश्वास ने प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी को हरी झंडी दिखाने में एक प्रमुख भूमिका निभाई।

जिस तरह से वातावरण विकसित हो रहा था, उससे मंदिर परिसर में छिपे उग्रवादियों के लिए यह स्पष्ट हो गया था कि उन्हें कम से कम उस समय तक अपनी रक्षा करने की आवश्यकता होगी, जब तक कि देश भर के सिख विद्रोह में नहीं उठते हैं और एक समझौता वार्ता की जा सकती है। । इसलिए मंदिर परिसर को एक आधुनिक आधुनिक किले में बदल दिया गया। नौकरी मुख्य रूप से भारतीय सेना के एक सिख जनरल मेजर जनरल शबेग सिंह द्वारा की गई थी, जिन्हें सेवा से कैश किया गया था। उन्हें बांग्लादेशी क्रांतिकारियों (मुक्ति बाहिनी) के प्रशिक्षण के पीछे सैन्य मास्टरमाइंड के रूप में जाना जाता था। जिन वरिष्ठ सैन्य कमांडरों ने हमले की योजना बनाई थी, उन्हें बहुत महत्वपूर्ण कारक को ध्यान में रखना चाहिए, दुख की बात है कि उन्होंने नहीं किया। टैंक-विरोधी हथियार सहित आवश्यक हथियार, पाकिस्तान से खरीदे गए और समय के साथ जटिल रूप से तस्करी किए गए। संत और उनके अनुयायी, जैसे, भारतीय सेना उन पर क्या फेंकती है, इसके लिए बिल्कुल तैयार थे।घटनाओं के अनुक्रम के कई संस्करण हैं जो ऑपरेशन ब्लू स्टार के लॉन्च के बाद हुए। ओपन मीडिया डोमेन में एक संस्करण यहां दिया गया है। यह पूरी तरह से प्रामाणिक हो सकता है या नहीं भी लेकिन काफी स्वीकार्य है।
समग्र ऑपरेशन को तीन भागों में विभाजित किया गया था: -
• ऑपरेशन मेटल: स्वर्ण मंदिर परिसर से भिंडरावाले सहित आतंकवादियों को बाहर निकालना।
• ऑपरेशन शॉप: पूरे पंजाब राज्य में चरमपंथी ठिकाने पर छापा मारने और देश में शेष बचे आतंकवादियों को मोप करने के लिए।
• ऑपरेशन वुड्रोस: पाकिस्तान के साथ सीमा को सील करने और उग्रवादी तत्वों के पंजाब में अन्य गुरुद्वारा को खाली करने के लिए।
प्रारंभिक चरण में, सेना के लगभग सात विभाग पंजाब में ही ऑपरेशन में शामिल थे। इनमें सीमा पर पहले से ही रक्षात्मक मुद्रा में सैनिक शामिल थे और आतंकवादियों के समर्थन में एक पाकिस्तानी दुस्साहसियों के खिलाफ सीलिंग के लिए आवश्यक वृद्धि। LOC के साथ ही सीलिंग भी की गई और पाकिस्तान के साथ सीमा भी
मेजर जनरल केएस बरार (जिसे बुलबुल बरार के नाम से जाना जाता है) की कमान में मेरठ स्थित 9 डिवीजन को वास्तविक हमले (ऑपरेशन मेटल) के लिए शाब्दिक रूप से चलाया गया था। लेफ्टिनेंट जनरल के सुंदरजी आर्मी कमांडर पश्चिमी कमान और ऑपरेशन ब्लू स्टार के समग्र कमांड में थे। थल सेनाध्यक्ष जनरल वैद्य थे।
ऑपरेशन पूर्ण मीडिया ब्लैकआउट, स्थानीय कर्फ्यू और स्थानीय परिवहन के निलंबन के तहत किया गया था। पंजाब में रेल, सड़क और हवाई सेवा निलंबित कर दी गई। विदेशियों और अनिवासी भारतीयों को प्रवेश से वंचित कर दिया गया। पिछले कुछ दिनों में बिजली और पानी भी कट गए।
गोल्डन टेंपल के अंदर Das गुरु राम दास लंगर ’इमारत पर हमले के साथ जून 1, 1984 में ऑपरेशन शुरू हुआ। हैरानी की बात है कि हमले के लिए तैयार होने के बावजूद, पांचवें सिख गुरु, गुरु अर्जन देव जी के शहादत दिवस को मनाने के लिए नागरिकों को जून, 3 को मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति दी गई थी। शाम को उन्हें छोड़ने के लिए कहा गया था। यह व्यापक रूप से माना जाता है कि अवकाश आदेश दिए जाने पर सभी नागरिक मंदिर परिसर को नहीं छोड़ सकते थे; संभवतः उन्हें आतंकवादियों द्वारा मानव ढाल के रूप में बाद में इस्तेमाल करने के लिए हिरासत में लिया गया था। इसके बजाय जो छोड़ गए वे सिख अपराधी और कम्युनिस्ट थे, जो पहले नष्ट हो गए थे, लेकिन तब लड़ाई के लिए पेट नहीं था।
अंतिम हमला दो दिनों से जून, 5 से 7 जून तक हुआ, जब परिसर को आतंकवादियों से मुक्त घोषित किया गया और संत जरनैल सिंह भिंडरावाले की हत्या की घोषणा की गई
"रब्बल" के खिलाफ पेशेवर इन्फैंट्री सैनिकों द्वारा हमला किया जाना चाहिए था, अंततः टैंक, आर्टिलरी और कमांडो को भी तैनात किया गया था। आतंकवादियों में होली से वापसी की आग एंटी-टैंक रॉकेट से ग्रेनेड को लेकर आई थी। अकाल तख्त जहां संत भिंडरावाले स्थित था, को सचमुच टैंक की आग से जमीन तक उठाया गया था। टेंक मंदिर परिसर के द्वार पर बंद रेंज में था।
दुर्भावनापूर्ण हमले में 493 मारे गए और 236 घायल हो गए। सेना को 83 मारे गए (4 अधिकारी और 79 सैनिक) मारे गए। यह व्यापक रूप से महसूस किया जाता है कि मरने वालों की संख्या घोषित की गई तुलना में बहुत अधिक थी। इतना ही नहीं, एक बार जब मंदिर परिसर को आतंकवादियों से मुक्त घोषित किया गया था, राष्ट्रपति ज़ैल सिंह एक यात्रा के लिए आए थे और परिसर के भीतर छिपे एक आतंकवादी द्वारा गोली मार दी गई थी। गोली चली और सेना कर्नल जो उसके साथ था।
ऑपरेशन ने कई देशों द्वारा निंदा की। दुनिया भर में आलोचना और मानवाधिकार संगठनों द्वारा कई शिकायतें। दुनिया भर में सिख तबाह हो गए। यह ऑपरेशन बहुत ही मार्मिक काल के दौरान किया गया था, जब सिख अपने पांचवें गुरु की शहादत की याद कर रहे थे, उनके लिए और भी अधिक वीरता थी। कई सिख सैनिकों ने अपनी इकाइयाँ और प्रख्यात सिख हस्तियों को पुरस्कार लौटा दिए, जो उन्हें राज्य से मिले थे।
पांच साल बाद, मंदिर परिसर को एक बार फिर आतंकवादियों द्वारा "नाकाबंदी दृष्टिकोण" के रूप में मंजूरी दे दी गई, जैसा कि पंजाब पुलिस के तत्कालीन महानिदेशक केपीएस गिल ने कल्पना की थी। ऑपरेशन की सफलता, ऑपरेशन ब्लैक थंडर नाम के कोड ने साबित किया कि सेना द्वारा किए गए एकमुश्त हमले के विकल्प थे। ऑपरेशन पर कई किताबें और वृत्तचित्र बनाए गए हैं। एक महत्वपूर्ण सबक हमारे अपने लोगों के खिलाफ बल का उपयोग करने से पहले सभी संभावित विकल्पों की कोशिश करना है और, जब आवश्यक हो, इसे न्यूनतम सीमा तक सीमित करें। स्नातक की प्रतिक्रिया पर काम करते समय धैर्य के साथ बेहतर राजनीतिक और सैन्य निर्णय हमेशा बेहतर लाभांश का भुगतान करेगा। उन्मत्त निर्णय लेने से जटिल बल का एक वृद्धिशील उपयोग एक महान और परिपक्व राष्ट्र का संकेत नहीं है
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मोदी सरकार पिता के साए जैसी : ‘विजय भवभारत’

भवभारत’ विदेश से लाए युवक ने कहा है कि ऐसी व्यवस्था तो उसने जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों में भी नहीं देखी है। शख्स बता रहा है कि सरकार ने करीब 70 किलोमीटर दूर सभी पैसेंजर को कोरोन्टाइन किया है

विदेश से लाए युवक ने कहा है कि ऐसी व्यवस्था तो उसने जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों में भी नहीं देखी है। शख्स बता रहा है कि सरकार ने करीब 70 किलोमीटर दूर सभी पैसेंजर को कोरोन्टाइन किया है । बिल्डिंग को लगातार सैनेटाइज किया जा रहाहै। उन्हें 24 घंटे की देख रेख में रखा है, जहॉं बेहतरीन सुविधाएँ हैं। भवभारत’ विदेश से लाए युवक ने कहा है कि ऐसी व्यवस्था तो उसने जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों में भी नहीं देखी है। शख्स बता रहा है कि सरकार ने करीब 70 किलोमीटर दूर सभी पैसेंजर को कोरोन्टाइन किया है। बिल्डिंग को लगातार सैनेटाइज किया जा रहा है। उन्हें 24 घंटे की देख रेख में रखा है , जहॉं बेहतरीन सुविधाएँ हैं ।

विजय भव भारत का फेसबुक पेज, 24,000 से अधिक फौलोवेर्स.

जहाँ एक और पूरी दुनिया कोरोना (महामारी) से लडर ही है, हर देश इसकी रोकथाम में लगा हुआ है अपने नागरिकों के बचाव में हर कोशिश कर रहा है, वहीं भारत की कोशिशों की विश्वपटल सरहाना हो रही है। कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी भले इस वैश्विक महामारी को मोदी सरकार पर हमले के मौके की तरह तलाश कर रहे हैं, लेकिन सोशल मीडिया में सरकार की तारीफ करते हुए कुछ लोगों ने जो आपबीती शेयर की है जो बेहद मार्मिक है। हालफिलाहल इटली से लाई गई एक युवती के पिता ने अपनी भावना साझा कि, वो सालों से सरकार की आलोचना कर रहे थे। लेकिन, अब उन्हें एहसास हो रहा है कि मोदी सरकार पिता के साए (fatherly figure) जैसी है। विदेश से लाए गए एक युवक ने कहा है कि ऐसी व्यवस्था तो उसने जर्मनी जैसे यूरोपीय मुल्कों में भी नहीं देखी है।टाइम्स ऑफ इंडिया के पत्रकार रोहन दुआ ने इटली से लौटी युवती के पिता का पत्र शेयर किया है। इस पत्र में उन्होंने इंडियन एंबेसी, भारत सरकार और विशेषत: नरेंद्र मोदी को धन्यवाद दिया है। पिता के मुताबिक उनकी बेटी मास्टर की पढ़ाई करने इटली के मिलान गई थी। वहॉं हालात बिगड़ने पर उसे वापस लौटने को कहा। जब वह लौटने लगी तो उससे भारत वापस जाने का सर्टिफिकेट माँगा गया। न्होंने खुद इंडियन एंबेसी को संपर्क करने की कोशिश की। मगर मिलान में एंबेसी का कार्यालय बंद होने के कारण ऐसा नहीं हो पाया। उन्होंने इंडियन एंबेसी के अन्य लोगों को मेल के जरिए संपर्क किया और रात के 10:30 बजे उनकी बेटी ने फोन पर बताया कि उसकी बात दूतावास में हो गई है और वह अगली फ्लाइट से भारत लौट रही है।

पिता के मुताबिक, वे सालों से भारतीय सरकार को कोस रहे थे। लेकिन मोदी सरकार में पिता का चेहरा है। उन्होंने बताया कि उनकी बेटी 15 मार्च को भारत आई और आईटीबीपी अस्पताल में उसकी स्वास्थ्य संबंधी, खान-पान संबंधी सभी जरूरतों का ख्याल रखा गया। गौरतलब है कि इटली उन देशों में शामिल है जो कोरोना संक्रमण से सर्वाधिक प्रभावित हैं।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार कोरोना वायरस के संक्रमण से निबटने के लिए सरकार ने 400 बेड का कोरोन्टाइन वार्ड तैयार करवाया है। यहाँ विदेश से लौटने वालों को सीधे दिल्ली एयरपोर्ट से लेकर जाया जाएगा। यहाँ इन सभी लोगों की 14 तक की निगरानी होगी और अगर इनमें कोरोना के लक्षण मिलते हैं तो इन्हें आइसोलेट कर छोड़ा जाएगा। ये कोरोन्टाइन वार्ड नोयडा के सेक्टर 39 में स्थित जिला अस्पताल की नई बिल्डिंग में बना है। यहाँ पर्याप्त संख्या में पैरामेडिकल स्टॉफ तैनात हैं।

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इन टीमों के जरिये समझिये समाज की सच्चाई को: ‘विजय भवभारत’

समाज की सच्चाई को दिखाने का बीड़ा उठाने वालों में से एक नाम ‘विजय भव भारत’ का भी है

21वीं सदी के दो दशक बीतते तक मीडिया को किस तरह से टुकड़े टुकड़े गैंग ने बर्बाद कर दिया और मीडिया ने किस तरह से समाज को बर्बाद किया, यह हम सभी जानते हैं और टुकड़े टुकड़े गैंग व् मीडिया में बैठे उनके नेटवर्क को भी हम समझ चुके हैं. उस नेटवर्क को तोड़ने और मीडिया में जमे इस कचरे की सफाई का जिम्मा जिनसोशल मीडिया के पोर्टलों ने ली है, उनकी श्रृंखला में एक और नाम की चर्चा इस लेख में हम करेंगे. इस बार चर्चा है फेसबुक कैलेंडर पेज –‘विजय भव भारत’ की

विजय भव भारत का फेसबुक पेज, 24,000 से अधिक फौलोवेर्स.

यूँ तो साहित्य समाज का दर्पण कहा जाता था और बाद में मीडिया ने इसकी जगह ले ली, मगर समाज की सच्चाई को समाज का यह दर्पण दिखा नहीं पाया और ख़बरों को व् समाज की सच्चाई को तोड़ मरोड़ कर पेश करने का आरोप मीडिया पर लगने लगा. ऐसे में समाज की सच्चाई को दिखाने का बीड़ा उठाने वालों में से एक नाम ‘विजय भव भारत’ का भी है.

विजय भव भारत

‘विजय भव भारत’ पेज का संचालन फेसबुक पर होता है, जहाँइसे फॉलो करने वाले 24,000 से भी अधिक लोग हैं. यह पेज जाना जाता है समाज में चलने वाले सकारात्मक कामों के प्रचार प्रसार के लिए, जो आम मीडिया कीनज़रों से दूर हैं. इसके साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों पर भी यह पेज नज़र रखता है, और उनसे जुडी तकरीबन हर जानकारी अपने दर्शकों तक पहुँचाता है. विजय भव भारत पेज का एक और काम 365दिनों के विशेष घटनाओं को अपने पेज से जनता तक पहुँचाना भी है. इसका एक नाम ‘कैलेंडर विशेष’ भी है. इनके अतिरिक्त समसामयिक घटनाओं पर पोस्ट व् विडियो डालना भी इस पेज का काम है.

सकारात्मक कामों का प्रचार प्रसार:

विजय भव भारत जिस काम में लगा है, शायद वह काम मीडिया का कोई भी तंत्र नहीं कर पायेगा क्योंकि इस काम में मीडिया को मसाला नहीं मिलेगा बल्कि मेहनत करनी पड़ेगी. मीडिया का एक तंत्र जहाँ केवल टीआरपी बढाने और ख़बर बेचने में लगा है, वहीँ सोशल मीडिया पर विजय भव भारत- दुनिया व् भारत की कुछ बेहतरीन सकारात्मक ख़बरें खोज कर ला रहा है और अपने पेज के माध्यम से साझा कर रहा है. सोशल मीडिया से नकारात्मकता हटाने का यह कदम सराहनीय है. समाज की यह सच्चाई जो छिपी हुई है, उसे खोज निकलने का यह काम विजय भव भारत कर रहा है.

कोरोना से बचाव के लिए दुनिया ने अपनाई भारतीय संस्कृति

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों पर नज़र:                            दुनिया का सबसे बड़ा गैर सरकारी संगठन है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और समाज निर्माण के काम में इसके योगदान को नकारना मुर्खता होगी. महात्मा गाँधी जी से लेकर अन्य कई महापुरुष संघ के बारे में सकारात्मक विचार रख चुके हैं, ऐसे में इस संगठन के कामकाज पर भी नज़र रखे हुए है. इससे पहले कि मीडिया संघ के कामकाज को तोड़ मरोड़ का या अपने अनुरूप पेश करे, विजय भव भारत संघ के विशिष्ट स्त्रोतों से संघसे जुडी प्रमाणिक ख़बरें लेकर आता है और समाज से उसका क्या लेना देना है, यह भी स्पष्ट करता है.

विश्व के सबसे बड़े गैर सरकारी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों पर नज़र.

कैलेंडरविशेष दिन:

विजय भव भारत जिन महत्वपूर्ण सकारात्मक कामों में लगा हुआ है, उनमे से एक कैलेंडर विशेष दिन भी है. साल में 365 दिन होते हैं, और तकरीबन हर दिन महत्वपूर्ण होता है. उन सभी दिनों की विशेषता और महत्त्व बताने का काम भी विजय भव भारत करता है. चाहे किसी महापुरुष का जन्मदिन या पुण्यतिथि हो या कोई स्मरणीय घटना की बात हो, उनके महत्त्व को समझाने का काम भी विजय भव भारत करता है.

16 सितम्बर 1947, गाँधीजी द्वारा छूआछूत की समाप्ति पर राष्ट्रीयस्वयंसेवक संघ के काम पर चर्चा.

समसामयिक घटनाओं पर नज़र:

जब समाज में सकारात्मकता भरने का काम और समाज से नकारात्मकता हटाने का काम विजय भव भारत कर रहा है तो यह तो असंभव है कि ऐसे में समकालीन घटनाओं को न जोड़ा जाये. वर्तमान में घटने वाली हर घटना पर समाज की प्रतिक्रिया, सही ख़बर, तथ्य परक, और प्रमाणिक ख़बरें विडियो और पोस्टर के माध्यम से अपने फौलोवर्स तक विजय भव भारत पहुँचाता है.

राम मंदिर पर शिया वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिज़वी का स्पष्ट बयान. 10 लाख से ज्यादा लोगों द्वारा देखा गया, 50 हज़ार से ज्यादा लोगों द्वारा साझा किया गया.

अपने इस प्रयास के माध्यम से विजय भव भारत ने सोशल मीडिया पर एक ऐसा विमर्श खडा किया है जो सकारात्मक है, प्रमाणिक है और नकारात्मकता को तोड़ने वाला है. जिन ख़बरों में मीडिया की दिलचस्पी नहीं होती मगर समाज के लिए आवश्यक है – उन्हें खोज कर लाने का काम यह पेज कर रहा है.

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