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किसान महासम्मेलन 10 जून को, मुख्यमंत्री किसानों को बांटेंगे प्रोत्साहन राशि

भोपाल/जबलपुर, 04 जून।  

किसान महासम्मेलन

जबलपुर में 10 जून को किसान महासम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल होंगे। कृषक समृद्धि योजनांतर्गत किसान महा-सम्मेलन में रबी विपणन वर्ष 2018-19 के गेहूं, चना, मसूर और सरसों उत्पादक किसानों के बैंक खातों में आरटीजीएस/एनएफटी से प्रोत्साहन राशि सीधे ट्रांसफर करेंगे।
इसी दिन प्रदेश के विकासखण्ड मुख्यालयों पर भी किसान सम्मेलन आयोजित होंगे। सम्मेलन में प्रात: 11 बजे से दोपहर एक बजे तक कृषक संगोष्ठियां भी आयोजित की जाएंगी। संगोष्ठियों में कृषि वैज्ञानिक किसानों को कृषि की आधुनिक तकनीकों से अवगत कराएंगे।
जबलपुर में हो रहे किसान महा-सम्मेलन का प्रदेश में न्यूज चैनल्स के माध्यम से सीधा प्रसारण किया जाएगा। विकाखण्ड स्तर पर होने वाले सम्मेलनों में किसान एलईडी टीवी के माध्यम से मुख्यमंत्री का संदेश सुन सकेंगे।
सम्मेलन में किसानों को स्वाइल हेल्थ कार्ड, फसल-चक्र में परिवर्तन, नवीन उन्नत बीज, अंतवर्ती फसल, उद्यानिकी फसलों को बढ़ावा, खेतों की मेड़ों पर पौधरोपण, जैविक खेती के साथ ही प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, कस्टम हायरिंग और कस्टम प्रोसेसिंग, पशुपालन, मछली पालन को बढ़ावा देने की योजना के साथ मुख्यमंत्री कृषक युवा उद्यमी योजना की विस्तृत जानकारी भी दी जाएगी। सम्मेलन स्थल पर कृषि उपलब्धि और कृषि की आधुनिक तकनीकों पर केंद्रित प्रदर्शनी लगाई जाएगी।

चौथा खंभा न्यूज़ .com / नसीब सैनी/अभिषेक मेहरा

 

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हरियाणा के MBA पास युवक ने नौकरी छोड़कर शुरू किया ये बिजनेस, आज कमाई लाखों में…

प्रदीप ने साल 2019 में उन्होंने अपना आउटलेट शुरू किया ही था की 2020 की शुरुआत में लॉकडाउन लग गया. वह कहते हैं कि उस समय उनके साथ सात कर्मचारी जुड़े हुए थे. उनका आउटलेट भले ही बंद था लेकिन उन्होंने सभी कर्मचारियों के रहने-खाने की व्यवस्था की और सभी को उनकी 75% सैलरी भी दी. इसके बाद, जिन किसानों से वह दूध ले रहे थे, उनसे उन्होंने कहा कि वे इस दूध का घी बनाकर रखें ताकि लॉकडाउन खुलने पर इसे काम में लिया जा सके.

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रोहतक. आज हम आपको एक ऐसे ही शख्स की कहानी सुनाने जा रहे हैं, जिनका नाम प्रदीप है. प्रदीप ने नौकरी छोड़ने के बाद स्टार्टअप के तहत दूध का कारोबार शुरू किया और इससे वे महीने में लाखों रुपए की कमाई कर रहे हैं. प्रदीप श्योराण हरियाणा के रहने वाले है. प्रदीप ने 2018 में अपनी अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर बागड़ी मिल्क पार्लर की शुरुआत की.

हालांकि पहले यह सिर्फ एक स्टॉल हुआ करता था, लेकिन आज रोहतक में उनका अच्छा-खासा आउटलेट भी है. जो कारोबार कभी सिर्फ दूध से शुरू हुआ था आज वो लगभग 20 तरह के अलग-अलग प्रोडक्ट्स तक पहुंच चुका है.

आज न केवल हरियाणा में बल्कि दिल्ली, पंजाब, राजस्थान से भी लोग प्रदीप के ‘बागड़ी मिल्क पार्लर’ पर आते हैं. उनके उत्पादों का आनंद लेते हैं. इस बारे में प्रदीप का कहना है कि छोटे-बड़े शहरों के पढ़े-लिखे और किसान परिवारों के युवा इस तरह से अपना खुद का काम करके अपने परिवार को आगे बढ़ा सकते हैं.

प्रदीप, मूल रूप से हरियाणा के चरखी दादरी जिला स्थित मांढी पिरानु गांव के निवासी हैं. वह एक किसान परिवार से ताल्लुक रखते है और उनके पिता स्कूल में नौकरी करते थे. प्रदीप ने बताया कि उन्होंने ग्रैजुएशन पूरी की और सिविल परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी लेकिन इसमें सफलता नहीं मिली तब उन्होंने एमबीए में दाखिला ले लिया. एमबीए की डिग्री भी अच्छे नंबरों से पास की. लेकिन शुरुआत में वैसी नौकरी नहीं मिल पाई, जितनी एक युवा को पढ़ाई के दौरान उम्मीद होती है.

कुछ समय बाद उन्हें ह्वेल्स इलेक्ट्रिक में अच्छी नौकरी मिल गयी और 2018 तक वो उस कंपनी से जुड़े भी रहे. नौकरी में उनका कई बार प्रमोशन हुआ और सैलरी भी अच्छी खासी थी. लेकिन उन्हें इस काम से संतुष्टि नहीं मिल पा रही थी.कुछ समय बाद उन्हें ह्वेल्स इलेक्ट्रिक में अच्छी नौकरी मिल गयी और 2018 तक वो उस कंपनी से जुड़े भी रहे. नौकरी में उनका कई बार प्रमोशन हुआ और सैलरी भी अच्छी खासी थी. लेकिन उन्हें इस काम से संतुष्टि नहीं मिल पा रही थी.

प्रदीप ने तय कर लिया कि नौकरी छोड़कर किसी बिज़नेस की शुरुआत करेंगे. उनके पास अपनी कुछ सेविंग्स थी और कुछ घरवालों का सपोर्ट भी मिल गया. 2018 में नौकरी छोड़ कर उन्होंने लगभग 24 राज्यों में अलग-अलग किसानों, व्यवसायियों के यहां दौरा किया. क्योंकि बिज़नेस तो करना था, लेकिन कुछ ऐसा बिज़नेस जिसकी मार्किट में मांग हो और जो चलने वाला हो.प्रदीप ने तय कर लिया कि नौकरी छोड़कर किसी बिज़नेस की शुरुआत करेंगे. उनके पास अपनी कुछ सेविंग्स थी और कुछ घरवालों का सपोर्ट भी मिल गया. 2018 में नौकरी छोड़ कर उन्होंने लगभग 24 राज्यों में अलग-अलग किसानों, व्यवसायियों के यहां दौरा किया. क्योंकि बिज़नेस तो करना था, लेकिन कुछ ऐसा बिज़नेस जिसकी मार्किट में मांग हो और जो चलने वाला हो.

प्रदीप ने बताया कि अपने सभी दौरों से उन्हें एक ही बात समझ में आई कि किसान तीन तरह के बिज़नेस कर सकते हैं- पहला अनाज, दलहन आदि से, दूसरा दूध से और तीसरा अंडे आदि का. तो हमने दूध में आगे बढ़ने के बारे में सोचा.

रोहतक में दो बड़े पार्क हैं, जहां सुबह-शाम काफी भीड़ रहती है. इन्हीं पार्कों के बाहर अपना ‘बागड़ी मिल्क पार्लर’ लगाना शुरू किया. दिसंबर 2018 में हमने शुरुआत की तो सर्दियों के मौसम में गर्म दूध मिट्टी के कुल्हड़ में देते थे. उन्होंने सोचा कि लोग चाय तो पीते ही हैं तो हो सकता है हमारा दूध भी पी लें और देखते ही देखते सचमुच हमारा आईडिया काम कर गया.

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गुरुग्राम की सड़कों का हाल बदहाल , इतना बड़ा गड्ढा कि गिर गया सांड, निकालने के लिए बुलानी पड़ी JCB

विभाग ने इन गड्ढों को खोदकर इन्हें ढकना मुनासिब नहीं समझा. विभाग की इस लापरवाही का खामियाजा अब आम लोगों के साथ-साथ बेजुबान जानवरों को भी उठाना पड़ रहा है

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लोगों ने गड्ढा खोदने वाली कंपनी के खिलाफ सोहना थाने में दी शिकायत.

गुरुग्राम के सोहना में एक सांड गड्ढों में फंस गया. सांड के फंसे जानें की खबर फैलते ही लोगों की भीड़ वहां पर पहुंच गई. लोगों ने पुलिस को भी मामले की सूचना दी. सांड को निकालने के लिए जेसीबी मंगवाई गई. जेसीबी की मदद से सांड को एक घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद बाहर निकाला गया. लोगों का कहना है कि विभाग की इलापरवाही का खामियाजा अब आम लोगों के साथ-साथ बेजुबान जानवरों को भी उठाना पड़ रहा है.

इस मामले में लोगों ने कंपनी के खिलाफ एक शिकायत सोहना थाने में दी है. काफी समय से लोग इन गड्ढों की शिकायत कर रहे थे. इससे पहले भी कई हादसे इन गड्ढों के कारण में हो चुके हैं. लोगों का कहना है कि एक निजी कंपनी ने एक नई लाइन दमदमा रोड से जीएलएस तक डाली है. जिसके लिए विभाग ने जगह-जगह पर गहरे गहरे गड्ढे खोदे हुए हैं.

मौके पर पुलिस को भी सूचना दी गई. पुलिस ने भी मौके पर आकर इस सांड को बाहर निकलवाया. लोगों ने बताया कि इससे पहले भी इन गड्ढों में एक बाइक सवार बुरी तरह घायल हो गया था. शिकायतों के बाद भी विभाग इन गड्ढों को नहीं भर रहा जो कि लोगों के लिए एक हादसे का कारण बन रही है. इसको लेकर कई बार शिकायत दी जा चुकी है. इससे पहले भी कई हादसे इन गड्ढों के कारण हो चुके हैं.

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जानिए क्यों की जाती है विश्वकर्मा डे पर औजारों की पूजा…..

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हिन्दू धर्म में विश्वकर्मा को निर्माण एवं सृजन का देवता माना जाता है। मान्यता है कि सोने की लंका का निर्माण उन्होंने ही किया था। इस दिन भगवान विश्वकर्मा के साथ ही कारखानों और फैक्ट्रियों में औजारों की पूजा की जाती है। ऐसी मान्यता है कि विश्वकर्मा पूजा के दिन कारखानों में पूजा करने से कारोबार बढ़ता है.

पौराणिक कथा के अनुसार, सृष्टि को संवारने की जिम्मेदारी ब्रह्मा जी ने भगवान विश्वकर्मा को सौंपी। ब्रह्मा जी को अपने वंशज और भगवान विश्वकर्मा की कला पर पूर्ण विश्वास था। जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण किया तो वह एक विशालकाय अंडे के आकार की थी। उस अंडे से ही सृष्टि की उत्पत्ति हुई। कहते हैं कि बाद में ब्रह्माजी ने इसे शेषनाग की जीभ पर रख दिया। शेषनाग के हिलने से सृष्टि को नुकसान होता था। इस बात से परेशान होकर ब्रह्माजी ने भगवान विश्वकर्मा से इसका उपाय पूछा तो भगवान विश्वकर्मा ने मेरू पर्वत को जल में रखवा कर सृष्टि को स्थिर कर दिया। भगवान विश्वकर्मा की निर्माण क्षमता और शिल्पकला से ब्रह्माजी बेहद प्रभावित हुए। तभी से भगवान विश्वकर्मा को दुनिया का पहला इंजीनियर और वास्तुकार मनाते हैं। भगवान विश्वकर्मा की छोटी से छोटी दुकानों में भी पूजा की जाती है।

विश्वकर्मा जी ब्रह्मा जी के पुत्र वास्तु की संतान थे. चार युगों में विश्वकर्मा ने कई नगर और भवनों का निर्माण किया। सबसे पहले सत्ययुग में उन्होंने स्वर्गलोक का निर्माण किया, त्रेता युग में लंका का, द्वापर में द्वारका का और कलियुग के आरम्भ के 50 वर्ष पूर्व हस्तिनापुर और इन्द्रप्रस्थ का निर्माण किया। विश्वकर्मा ने ही जगन्नाथ पुरी के जगन्नाथ मन्दिर में स्थित विशाल मूर्तियों (कृष्ण, सुभद्रा और बलराम) का निर्माण किया।

विश्वकर्मा एक भारतीय उपनाम है जो मूलतः शिल्पी (क्राफ्ट्समैंन) लोगों द्वारा प्रयोग में लाया जाता है। विश्वकर्मा ब्राह्मण जाति से भी संपर्क रखते है विश्वकर्मा पुराण के मुताबिक विश्वकर्मा जन्मों ब्राह्मण: मतलब ये जन्म से ही ब्राह्मण होते है । इसे कई जातियों के लोग प्रयोग में लाते हैं जैसे कि पांचाल ब्राह्मण, धीमान, लोहार, शिल्पकार, करमकार इत्यादि और इन जातियों के लोग विश्वकर्मा को अपना इष्टदेवता मानते हैं। विश्वकर्मा एक हिन्दू देवता हैं और उन्हीं के नाम पर विभिन्न प्रकार के शिल्प कार्य करने वाली जातियाँ अपने को ‘विश्वकर्म’ कहतीं हैं।

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