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प्रसंगवश/आर.के. सिन्हा …. कब सीखेंगे हम सेफ्टी का रास्ता

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26 अप्रैल का दिन बड़ा ही मनहूस साबित हुआ। सुबह- सुबह ही खबर आई कि गौतम बुद्ध की तपस्थली कुशीनगर में 13 स्कूली बच्चे घोर लापरवाही की वजह से अपनी जान गंवा बैठे। रेल ट्रैक पर स्कूल जा रहे बच्चों की लाशें देख कलेजा कांप उठा। पत्थर-दिल इंसान भी उस भयावह मंजर को देखकर अपने आंसू रोक नहीं पाया होगा। कैसे वो बच्चे सुबह उठे होंगे स्कूल जाने के लिए। उन्हें क्या पता होगा कि आज ही उनकी जीवन यात्रा समाप्त हो जाएगी। कुशीनगर रेलवे क्रासिंग पर अगर गेटमैन होता तो शायद हादसा न होता। गेट खुला था तो बच्चों को टाटा मैजिक में स्कूल लेकर जा रहा ड्राइवर बेधड़क ट्रैक को पार करने लगा। उस ड्राइवर की भयानक चूक के कारण पैसेंजर ट्रेन ने टाटा मैजिक के परखच्चे उड़ा दिए। यदि ट्रैक पार करते वक्त ड्राइवर ने “ रुको, देखो, फिर जाओ” जैसे सामान्य ड्राइविंग के सिद्धान्त का पालन करते हुए ट्रैक पर दोनों दिशाओं में देख लिया होता तो यह हादसा न होता। प्रत्यक्षदर्शियों की मानें तो बेचारे बच्चों ने तो ट्रेन को आता देख चीखना तक शुरू कर दिया था, पर ड्राइवर तो दोनों कानों में इअर-फोन लगाकर मनपसंद गाना सुनते हुए गाड़ी हांक रहा था।

सवाल है कि ऐसे अनावश्यक हादसे और लापरवाहियां कब थमेंगी? रेलवे और बाकी संबंधित विभाग तो सुधरेंगे का नाम ही नहीं ले रहे। तो क्या यह मान लिया जाये कि हमारे यहां मासूम ऐसी लापरवाही के शिकार होते रहेंगे। घटना के बाद मुआवजा देने की घोषणाएं भी होने लगीं। घटना को ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ बताये जाने वाले ट्वीट सामने आने लगे। लेकिन, अपना देश तो गलतियों से सीख लेकर अपने को सुधारने वाला दिख नहीं रहा है। यहां पर मौत सबसे सस्ती हो गई है। इस हादसे में अनेकों बच्‍चे गंभीर रूप से घायल भी हुए हैं। स्‍कूल वैन में कुल 18 बच्‍चे सवार थे। ये सभी अभागे बच्चे कुशीनगर के डिवाइन मिशन स्‍कूल के थे। क्या कोई पूछेगा कि टाटा मैजिक जिसकी क्षमता मात्र सात सवारियों की है, तीन गुना सवारियों को लेकर कैसे जा रहा था। जब यह रोज ही हो रहा था तो पुलिस और परिवहन विभाग के अधिकारी या तो अंधे थे या रिश्वत लेकर इस अनियमितता की इजाजत दे रखी थी। स्कूल का प्रबंधन भी हर रोज बच्चों को इस मौत के कुंए में क्यों डाल रहा था। क्या ये सभी आपराधिक षड्यंत्र के दोषी नहीं हैं?
नहीं सीख लेंगे गलतियों से
जैसा कि मैंने पहले कहा कि हम गलतियों से सबक लेना ही नहीं जानते। उत्तर प्रदेश में इससे पहले भी इस तरह के हादसे होते रहे हैं। सन 2016 में भी भदोही के पास बच्चों से भरी स्‍कूल वैन ट्रेन की चपेट में आ गई थी। उस हादसे में 10 बच्चों की मौत हो गई थी और कई गंभीर रूप से घायल हो गए थे। उस वैन में भी करीब 19 बच्‍चे सवार थे। उस वक्‍त हादसे की वजह स्‍कूल वैन के ड्राइवर की लापरवाही को बताया गया था। तब भी मृतकों और घायलों को सरकार और रेलवे ने मुआवजा देकर इतिश्री कर ली थी। नेताओं ने मृतकों के परिवारों के प्रति संवदेना व्यक्त कर दी थी। पर हमने कुछ सीखा नहीं। क्या भदोही हादसे के लिए रेलवे के किसी अफसर को नौकरी से बर्खास्त किया गया ? क्या स्कूल प्रबंधन और ट्रॉसपोर्टर को जेल भेजा गया? नहीं। तो क्या कुशीनगर हादसे के बाद अब लापरवाह अफसरों पर गाज गिरेगी? शायद अभी भी नहीं। कबतक बर्दाश्त होंगीं ऐसी जानलेवा लापरवाहियां।
पटरियों पर खून के धब्बे
एक बार फिर से रेल की काली पटरियों पर लाल खून के धब्बे पड़ गए हैं। हमेशा की तरह से हादसे के बाद हादसे के कारण खोजे जा रहे हैं। खोज निरंतर जारी है। पर नतीजा कुछ भी नहीं। खोज के नाम पर सिर्फ लीपापोती हो रही है। इसबार अपराधियों को बचाने के लिए ऐड़ी-चोटी का प्रयास कर दो- चार दिनों के बाद सब कुछ पूर्ववत हो जाएगा। सब कुछ भूला दिया जाएगा। अगले हादसे के बाद फिर मुआवाजा दिया जाएगा, संवेदनाएं व्यक्त की जाएंगी और हादसे के कारणों का पता लगाने के लिए जांच समिति गठित हो जाएगी। वो अपनी रिपोर्ट कब और किसको देगी, ये किसी को पता नहीं चलेगा। उसकी सिफारिशों के बारे में कोई कार्रवाई की तो सोचेगा भी नहीं।
यह मान लीजिए कि तगड़े और अति सख्त कदम उठाए बिना कुशीनगर जैसे हादसे नहीं रुकेंगे।आखिर कब तक कभी किसी ड्राइवर, कभी आतंकवाद और कभी मौसम को जिम्मेदार ठहराया जाता रहेगा, जबकि असली वजह बदइंतजामी और लापरवाही ही है। माना कि दुर्घटना कहीं भी हो सकती है। लेकिन यहां तो हादसा होना सामान्य सी बात मान ली गई है। ज्यादातर हादसे इंसानी लापरवाही, उपकरण संबंधी समस्याओं, बिना निगरानी वाले क्रॉसिंग, आधुनिक सुरक्षा तंत्रों के अभाव और थके-हारे तथा अनपढ़ , अकुशल और संवेदनहीन ड्राइवरों की वजह से ही होते हैं। लापरवाही भी किसी एक स्तर पर नहीं होती।नीचे से ऊपर तक यह क्रम चलता ही रहता है।

त्रासद कथा रेलवे की
भारतीय रेल की त्रासद कथा बदस्तूर जारी है, तो दूसरी तरफ उन तकनीकों का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है, जिससे इस तरह के हादसों को खत्म किया जा सके। इससे बड़ा अफसोस क्या हो सकता है कि दुनिया के विभिन्न देश ‘ न हादसा- न पटरियों पर मौत’ के लक्ष्य को पाने की कोशिश कर रहे हैं, तब हमारे यहां हादसे थमने का नाम ही नहीं ले रहे हैं।
रेल विभाग की काहिली का सबसे शर्मनाक उदाहरण देश ने पिछले कुंभ मेले के समय देखा था। इलाहाबाद में आयोजित महाकुंभ में मौनी अमावस्या के दिन होने वाले शाही स्नान में शरीक होने के लिए भारी संख्या में भक्तजन इलाहाबाद पहुंचे थे। इतने अहम मौके पर भी रेल विभाग अपने को इस तरह से तैयार नहीं कर पाया ताकि हादसे को टाला जा सके।
काहिली सेप्टी विभाग की
रेल मंत्रालय में एक भारी भरकम सेफ्टी विभाग भी है। वह क्या कर रहा है, इसकी भी पड़ताल होनी चाहिए। क्या ये सेफ्टी सेमिनार करने के अलावा भी कुछ करता है? लगता तो नहीं है। इस विभाग के बारे में रेलवे में काम करने वाले सभी लोग जानते हैं, पर कहना कोई नहीं चाहता, क्योंकि सबको अपनी नौकरी बचानी होती है। क्या कुशीनगर की घटना के बाद रेलवे सेफ्टी विभाग के आला अफसरों को डिसमिस नहीं किया जाना चाहिए? कुछ साल पहले उत्‍तर प्रदेश के कांशीराम नगर जिले में देर रात मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग पर बस और रेलगाड़ी के बीच हुई भयंकर भिड़ंत में 38 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई थी। उस दिल दहला देने वाले हादसे में लगभग 50 से ज्‍यादा लोग गंभीर रूप से जख्‍मी हो गये थे। यह कोई पहली ऐसी वारदात नहीं थी, जब मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग ने जिदंगियों को निगला। उत्तर प्रदेश में तो बार-बार मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग पर मौत का खेल होते ही रहता है। राज्य के रेलवे ट्रैक सैकड़ों लोगों की कब्रगाह बन चुके हैं। राज्य में मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग पर दर्जनों ऐसी वारदाते हो चुकी हैं, जिसमें सैकड़ों लोगों की मौत और लगभग इतने ही लोग घायल हो चुके हैं। ये तो वो आंकड़े हैं, जिनमें एक बार में दर्जन से ज्‍यादा मौतें हुईं। रोजाना एक-दो इंसान मानवरहित क्रॉसिंग की बलि चढ़ते ही हैं, जिनके आंकड़े महज रेलवे और पुलिस की फाइलों में दफ्न हो जाते हैं।
इन तमाम हादसों से बेखबर रेल प्रशासन मरने वालों को ज्‍यादा और घायलों को कम मुआवजा देकर अपना पल्‍ला झाड़ लेता है। मगर मानवरहित क्रॉसिंग पर उसका ध्‍यान नहीं जाता। अब सोचने वाली बात यह है कि अगर रेलवे प्रशासन समय रहते मानवरहित क्रॉसिंग पर अपना ध्‍यान केन्द्रित कर लेता तो शायद कुशीनगर में स्कूल जा रहे नौनिहाल मारे ना जाते। दरअसल रेल क्रासिंग पर चौबीसों घंटा सुरक्षा व्यवस्था की आवश्यकता है। रेलवे क्रासिंग वाले स्थान पर छोटे फ्लाईओवर या अंडरपास निर्माण उपयोगी हो सकता है। दुर्घटना संभावित स्थानों पर युद्ध स्तर पर शीघ्र कार्य करने की आवश्यकता है । ड्राइविंग लाइसेंस के नियमों को भी सख़्त करने की वश्यकता है। नहीं तो मानवता इसी तरह हर दिन घायल होती ही रहेगी। क्या अब भी देश जागने के लिए तैयार है?

चौथा खंभा न्यूज़ .com / नसीब सैनी/अभिषेक मेहरा

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कल से शुरू होगा गांव बाबा लदाना में 3 दिवसीय मेला, मेले को लेकर डेरे की तैयारियां पूरी

कल से शुरू होगा गांव बाबा लदाना में 3 दिवसीय मेला, मेले को लेकर डेरे की तैयारियां पूरी

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ब्यूरो चौथा खंभा न्यूज़ कैथल। गांव बाबा लदाना स्थित डेरा बाबा राजपुरी पर 3 दिवसीय मेला शुक्रवार से लगेगा। रावण दहन के बाद मेले में श्रद्धालु पहुंचना शुरू हो जाएंगे। दो साल बाद बाबा राजपुरी पर लगने वाले मेले की तैयारियां जोरों पर हैं। कोरोना संक्रमण के कारण बीते वर्ष इतिहास में पहली बार बाबा राजपुरी पर मेला नहीं लग पाया था। इस बार भी कोरोना संक्रमण के कारण मेले की कोई अधिकारिक घोषणा नहीं है, लेकिन डेरे के प्रति लाखों श्रद्धालुओं की आस्था के कारण यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचने की उम्मीद है। इसी को देखते हुए तैयारियां भी शुरू हो गई है। मंदिर को लाइटों से सजाया गया है। मेले के लिए झूले लग चुके हैं। इस बार डेरे की ओर से ही भंडारा लगाया जाएगा। भंडारे के लिए देसी घी के लड्डू तैयार किए जा रहे हैं।

रावण दहन के बाद शुरू होता है मेला

डेरा बाबा राजपुरी पर 3 दिवसीय मेले की शुरुआत दशहरे से होती है। रावण दहन के बाद श्रद्धालु मेले में पहुंचना शुरू होते हैं। विजयदशमी, एकादशी व द्वादशी पर डेरे में मेला लगता है। यहां प्रदेशभर के अलावा पंजाब, राजस्थान, यूपी, गुजरात, छत्तीसगढ़ व केरल से भी श्रद्धालु पूजा पाठ के लिए पहुंचते हैं। डेरे में पशुओं की सुख समृद्धि के लिए पूजा की जाती है। श्रद्धालु दूध व घी का दान करते हैं और काफी श्रद्धालु मनोकामना पूरी होने पर पशुओं को भी दान स्वरूप देकर जाते हैं।

तालाब की सफाई करते सफाईकर्मी

3 दिवसीय मेले पर इस बार बाबा राजपुरी डेरे की ओर से ही भंडारा लगाया जा रहा है। जोकि तीन दिन तक चलेगा। इससे पहले श्रद्धालुओं की ओर से ही भंडारा लगाया जाता था संक्रमण को देखते हुए सेनिटाइज की व्यवस्था मंदिर की ओर से की जाएगी।

डेरे में लगी स्वामी विवेकानंद के गुरु रामकृष्ण परमहंस की तस्वीर

स्वामी विवेकानंद से जुड़ा है इतिहास

डेरा बाबा राजपुरी का इतिहास काफी गौरवमयी है। विश्व में प्रसिद्धि हासिल करने वाले आध्यात्मिक गुरु रामकृष्ण परमहंस के गुरु तोतापुरी इसी डेरे के 7वें महंत थे। रामकृष्ण परमहंस ही स्वामी विवेकानंद के गुरु हैं। वर्तमान में बाबा दूजपुरी डेरा के महंत हैं। महंत दूजपुरी ने बताया कि बाबा राजपुरी के देशभर में 365 धुणे हैं। गांव लदाना में बाबा राजपुरी का जन्म 1690 में हुआ था। जिन्होंने करीब 8 वर्ष की उम्र में ही गांव बात्ता जाकर चोला धारण कर लिया और संत सरस्वती पुरी को अपना गुरु बनाया। बाबा राजपुरी 52 शक्तिपीठ में शामिल माता हिंगलाज को काफी मानते थे। इसके बाद गांव बाबा लदाना में डेरा की स्थापना हुई। आज भी ऐसी मान्यता है कि माता हिंगलाज अष्टमी की रात को डेरे में बने मंदिर में आती है और सैकड़ों साल पुराने जाल के पेड़ पर धागा बांधकर जाती है।

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कोल्डड्रिंक की मामूली उधारी को लेकर चायवाले का मर्डर

Chaiwala murdered over meager borrowing of cold drink

कैथल । कैथल के तलाई बाजार में मामूली उधारी के लिए एक मर्डर हो गया। जानकारी के अनुसार रितेश नामक व्यक्ति तलाई बाजार में चाय की दुकान चलाता था और अपने परिवार का पेट पालता था।

जब उधारी मांगने गया चायवाला रितेश तो टेलर राजू  ने किया झगड़ा व पेट मे मारी कैंची, इलाज के दौरान मौत

पास में ही एक राजू नामक टेलर की दुकान है। जब चायवाला रितेश सोमवार शाम को टेलर राजू से कोल्डड्रिंक के रुपये मांगने गया तो उनकी रुपये को लेकर कुछ आपस मे कहा सुनी हो गई जिसके बाद राजू ने रितेश के पेट मे कपड़ा काटने वाली कैंची मार दी। गंभीर रूप से घायल रितेश को अस्पताल में भर्ती करवाया गया जिसकी इलाज के दौरान कुछ देर बाद मौत हो गई।

कोल्डड्रिंक की मामूली उधारी को लेकर चायवाले का मर्डर

पुलिस ने पहले 307 का पर्चा दर्ज किया था लेकिन रितेश की मौत के बाद 302 का मामला दर्ज कर लिया है और जांच शुरू कर दी है।
बता दें कि रितेश के परिवार में उनकी पत्नी व एक बच्चा है जिनका अकेला सहारा मृतक  रितेश ही था।

पहले धारा 307 के तहत मामला दर्ज हुआ था आम मौत के बाद 302 का मामला दर्ज : सुरेंद्र कुमार, एसएचओ सिटी थाना
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इमरान खान की बंदूक और खूनखराबे की भाषा बर्दाश्त नहीं की जा सकतीःसंयुक्त राष्ट्र में भारतीय प्रतिनिधि विदिशा मैत्रा

—भारतीय प्रतिनिधि ने कहा कि इमरान खान की परमाणु तबाही की धमकी राजनेता की भाषा नहीं बल्कि असंतुलित मानसिकता वाले व्यक्ति की भाषा है

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न्यूयॉर्क,(नसीब सैनी)।

संयुक्त राष्ट्र में भारत की राजनयिक विदिशा मैत्रा ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के इस विश्व मंच पर दिए गए भाषण का मुंहतोड़ उत्तर देते हुए कहा कि इमरान घृणा से भरी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं जो 21 वीं सदी नहीं बल्कि मध्ययुग की मानसिकता को दर्शाता है। संयुक्त राष्ट्र में भारतीय मिशन में प्रथम सचिव विदिशा मैत्रा ने उत्तर देने के अधिकार का प्रयोग करते हुए कहा कि शुक्रवार को इमरान खान का घृणा से भरा भाषण विश्व संस्था का दुरुपयोग है । कूटनीति में एक-एक शब्द का अर्थ होता है। इमरान की भाषा इससे एकदम परे रही।

उन्होंने कहा कि  इमरान ने नरसंहार, खूनखराबा, नस्ली दंभ, हथियार उठाने और मरते दम तक लड़ने जैसे शब्दों का  प्रयोग किया जो कबायली कस्बे दर्रा आदम खेल में प्रचलित  बंदूक की भाषा है। ऐसा इस विश्व संस्था  में शायद ही पहले कभी  हुआ हो। भारतीय राजनयिक ने कहा कि एक व्यक्ति जो कभी सज्जनों  का खेल कहे जाने वाले क्रिकेट से जुड़ा रहा हो वह भोंडी भाषा का इस्तेमाल कर रहा है। 

भारतीय प्रतिनिधि ने कहा कि इमरान खान की परमाणु तबाही की धमकी राजनेता की भाषा नहीं बल्कि असंतुलित मानसिकता वाले व्यक्ति की भाषा है। पाकिस्तान में आतंकवाद का पूरा उद्योग फल फूल रहा है और इस पर उसका एकाधिकार जैसा है। इमरान खान पूरी निर्लज्जता से इसकी वकालत कर रहे हैं। 

मैत्रा  ने कहा कि इमरान खान की पूरी भाषा विभाजन पैदा करने वाली है। वह अमीर बनाम गरीब, उत्तर बनाम दक्षिण, विकसित बनाम विकासशील और मुस्लिम बनाम अन्य धर्मावलंबी की विभाजनकारी भाषा का इस्तेमाल विश्व संस्था में कर रहे हैं। यह घृणा फैलाने वाला भाषण (हेट स्पीच) है। 

मैत्रा ने कश्मीरियों की हिमायत में बोलने के पाकिस्तान के दावे को खारिज करते हुए कहा कि भारतीय नागरिकों को किसी वकील की जरूरत नहीं है। खास ऐसे लोग उनकी ओर से नहीं बोल सकते जो आतंकवाद का उद्योग चला रहे हैं और घृणा की विचारधारा में विश्वास रखते हैं। 

उन्होंने कहा कि अब जब कि इमरान खान ने उग्रवादी संगठनों की उनके देश में गैरमौजूदगी की जांच के लिए संयुक्त राष्ट्र पर्यवेक्षक भेजने की पेशकश की है, अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को यह दवाब बनाना चाहिए कि वह अपनी बात पर कायम रहें। 

भारतीय प्रतिनिधि ने पाकिस्तान की पेशकश के संदर्भ में  उसके नेताओं से अनेक सवाल पूछे। उन्होंने पूछा,  क्या यह सही नहीं है कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित 130 आतंकवादी और 25 आतंकवादी संगठन पाकिस्तान में पनाह लिए हुए हैं। क्या पाकिस्तान यह स्वीकार करेगा कि वह दुनिया में एकलौता ऐसा देश है जो आतंकवादी संगठनों अल कायदा और इस्लामिक स्टेट से जुड़े आतंकवादी  को पेंशन देता है। क्या पाकिस्तान इस बात पर सफाई देगा  कि न्यूयॉर्क स्थित पाकिस्तान के हबीब बैंक पर इसलिए ताला  पड़ गया था कि वह आतंकवादियों को धन मुहैया करता था और  उस पर भारी  जुर्माना हुआ था। क्या पाकिस्तान इस बात से इंकार कर सकता है कि आतंकवादियों को धन मुहैया कराये जाने से रोकने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था ने 27 में से 20 मानकों में पाकिस्तान को उल्लंघन करने वाला देश माना है। क्या इमरान खान इस बात से इंकार करेंगे कि वह ओसामा बिन लादेन की खुलकर हिमायत करते रहे हैं। 

भारतीय प्रधिनिधि मैत्रा ने कहा कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने आतंकवाद और घृणा से भरे भाषण को मुख्यधारा बना दिया है और वह मानवाधिकारों का झूठा कार्ड खेल रहे हैं। पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की दुर्दशा का ब्योरा देते हुए मैत्रा  ने कहा कि विभाजन  के समय पाकिस्तान में अल्पसंख्यों की आबादी 23 प्रतिशत थी जो अब घट कर तीन प्रतिशत हो गई है। ईसाइयों, सिखों, अहमदिया लोगों, शियाओं, पश्तूनों, सिंधियों और बलूचियों के खिलाफ ईशनिंदा कानून  के तहत जुल्म किया जा रहा है तथा योजनाबद्ध उत्पीड़न और जबरन धर्म परिवर्तन का सिलसिला जारी है।

विदिशा मैत्रा ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री का पूरा नाम  ‘इमरान खान नियाजी’ लेते हुए उन्हें बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में पाकिस्तान के  जुल्मी सैन्य अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल एए खान नियाजी के कारनामों की याद दिलाई।  उन्होंने कहा कि संगठित नरसंहार किसी जीवंत लोकतंत्र में नहीं होते। अपनी याद्दाश्त ताजा करिये और वर्ष 1971 में पूर्व पाकिस्तान में जनरल नियाजी द्वारा किये गए नृशंस नरसंहार को मत भूलिए। 

भारतीय प्रतिनिधि ने इस संदर्भ में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के संयुक्त राष्ट्र महासभा में दिए गए संबोधन की चर्चा की। जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के संबंध में पाकिस्तान की जहरीली प्रतिक्रिया  को खारिज करते हुए मैत्रा  ने कहा कि यह एक कालबाह्य और अस्थाई प्रावधान  था जो राज्य के विकास और शेष भारत के साथ उसके एकीकरण में बाधक था। इस अनुच्छेद को हटाए जाने का विरोध इसलिए किया जा रहा है क्योंकि संघर्ष पर फलने-फूलने वाले लोग शांति की किरण को कभी  बर्दाश्त नहीं करते। 

उन्होंने कहा कि पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद फैलाने और घृणा का वातावरण पैदा  करने का मंसूबा बना रहा है जबकि भारत वहां विकास की गंगा बहाना चाहता है। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को भारत की जीवंत और समृद्ध लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा बनाया जा रहा है।  यह लोकतंत्र विविधता, सहिष्णुता और बहुलवाद की सदियों पुरानी विरासत पर आधारित है। 

नसीब सैनी

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