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अरब में वेद प्रचार – झलकियां !

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07 August

” दु:ख और बीमारी से तडफ-तडफ कर मरने से अच्छा है कि किसी उत्तम कार्य को करके मरना चाहिये। क्या तुम अरब में जाकर यह पता लगा सकते हो कि हम किस प्रकार वहाँ वैदिक धर्म का प्रचार कर सकते हैं ? ”

श्री स्वामी स्वतंत्रतानन्द जी ने दयानन्दोपदेशक विद्यालय , गुरुदत्त भवन , लाहौर , में पंडित रुचिराम आर्योपदेशक से कहा। दूसरे ही दिन 29 अप्रिल सन 1929 को पंडित जी लाहौर से अरब के लिये पैदल ही निकल पड़े। पूरे सात वर्षों तक समस्त अरब मुल्कों में विभिन्न जगहों के शेख सुल्तानो की अनुमति से उन्होंने मक्का मदीना से लेकर हर जगह ओम का झंडा गाड़ा। सुल्तान जलाला तल मलिक अब्दुल अजीज इब्न सऊद जो मक्का के हाकिम भी थे के व्यक्तिगत मेहमान भी रहे।इन्हीं सुल्तान ने मदीना की जन्नतलबाकी की सारी कब्रें जो मुहम्मद की बीबियों, बेटी फातिमा और सहाबाओं की थीं तुड़वाकर समतल करवा दीं और अब कोई यहां कब्रों की इबादत नहीं कर सकता है। मक्का में भी यही किया। इन्हीं के वंशज आज सऊदी अरेबिया के सुल्तान हैं। इब्न सऊद ने वेद की शिक्षाओं को सुनकर अनेक सुधार भी किये। खुद अपनी लम्बी दाढी भी कटवा दी ।
पंडित जी ने सात वर्ष बाद लौटकर अपने यात्रा संस्मरणों और अनुभवों पर एक पुस्तक भी लिखी । इसे पढकर यह पता चलता है कि अगर आज भी अरब मुल्कों में वेद प्रचार की छूट मिल जाये तो मुश्किल नहीं है वहाँ के निवासियों को इस्लाम की गिरफ्त से बाहर करना । शायद यही एक वजह है कि वहाँ इस्लाम को एक बंद कमरे में रख दिया गया है । हालांकि 1938 में अमेरिका द्वारा तेल की खोज के बाद अरब में सम्पन्नता बेतहाशा बढ गयी है और साथ ही लोग ज्यादा कट्टर भी हो गये हैं लेकिन फिर भी यह कार्य मुश्किल नहीं है। निम्न लेख में लेखक के कुछ चुनिंदा अनुभवों को देने का प्रयास किया गया है ताकि सही तस्वीर उभर कर सामने आये।
1- मस्कत से पैदल आगे बढने पर गांव में बद्दू (देहाती अरबी) मिले। पुरूषों ने पूछा , तुम कहां से आये हो और कहाँ जाओगे ?”
” भारतवर्ष से आया हुं और मक्का जाऊंगा।”
फिर एक बद्दू महिला ने पूछा , “क्या तुम्हारा निकाह हो गया है ?”
“हाँ मेरा निकाह हो गया है।”
“उसको तलाक दे दो”
“क्यों?”
“यह लडकी बहुत सुंदर है और तुम्हें चाहती है। हम वो लडकी तुम्हें दे देंगे।”
” मैं तो वैदिक धर्म का प्रचार कर रहा हूँ।ऐसा होना असम्भव है।”
” तो फिर तुम्हारी कमीज के बटन बहुत अच्छे हैं वो दे दो।”
मैंने कमीज के बटन तोडकर उन्हें दे दिये और साथ में कुछ बिस्कुट और एक गोल शीशा भी । जब एक बद्दू महिला ने शीशे में खुद को देखा तो हंस कर बोली खुदा की कसम इसमें तो लोग हैं।फिर छीना झपटी शुरु हो गयी।बद्दू शीशे में देखकर हंसी से लोटपोट हो रहे थे। बोले तुम तो जादूगर हो।कोई बोलता मेरी ऊंटनी के लिये ताबीज लिख दो वो दो दिन से कुछ नही खाती।कोई कहता हमारी बकरियों के लिये ताबीज लिख दो क्योंकि भेडिये आते हैं और इनको उठा ले जाते हैं।तो कोई ताबीज से जिन्न भूतों वश में करना चाहता था। मेरा ताबीजों में यकीन तो था नहीं फिर भी मैने कागज पर गायत्री मंत्र लिखकर ताबीजें दे दीं। सब बहुत खुश हुये।मुझे वली-ए-अल्लाह बोलने लगे। ऐसे ही लोगों को आसानी से मुहम्मद ने बेवकूफ बनाकर इस्लाम में शामिल कर लिया होगा।
बद्दुओं ने मुझे सदैव अपने पास रूकने को कहा कि हमारे साथ बकरियां और ऊंट चराइये , खाने को खजूर और पीने को उंटनी का दूध देंगे। साथ में दो शादियां भी करवा देंगे।परंतु यह सब कैसे हो सकता था।
2- यहाँ से पांच दिन का पैदल सफर तय कर रियाज पहुंचा।सुल्तान इब्न ए सऊद मोटर पर बैठ सैर को जा रहे थे।मुझे अपरिचित देख रूक गये।मैंने नमस्ते की तो उन्होंने भी नमस्ते कहकर उत्तर दिया।फिर गुलाम के साथ शाही महल भेजा और अगले दिन दरबार बुलाया। दूसरे दिन मैं दरबार पहुंचा तो सुल्तान ने हाथ उठाया और सारी सभा खडी हो गयी। जबतक मैं नहीं बैठा सब खड़े रहे। यही नियम अरब की सभी सभाओं में पालन किया जाता है। सबके बैठने पर मैंने वेदमंत्र सुनाये। वहां सभा में मिश्र का एक डाक्टर सिगरेट पी रहा था। मैंने सभा में उसे रोककर इसके अवगुण बताये। सुल्तान ने भी कहा कि उसके वहाबी मत में यह मना है लेकिन दूसरे मत वाले पीते हैं। सुल्तान ने तभी आदेश निकालकर सबके लिये यह अगले दिन से निषेध कर दिया। सभा में एक तलाक का विषय आया तो सुल्तान मेंरी राय पूछी। मैने इस मुद्दे पर वैदिक राय रखी तो सुल्तान को बहुत पसंद आयी और बोले , हमें दु:ख है कि ऐसी बुरी प्रथा चल पड़ी है और अकारण तलाक हो रहे हैं। कुछ दिनों के मेरे प्रचार का यह असर पड़ा कि सुल्तान ने अपनी दाढी पर उस्तरा फिरवा दिया और ठोड़ी पर बस थोड़े से ही बाल रहने दिये। यथा राजा तथा प्रजा। बहुत भारतीय मुसलमानों ने भी अपनी दाढी मुड़वाकर अरबी सूरत बना दी। आज मैंने एक विवाह और गुलामों को आजाद करने की भी पैरवी की तो फिर एक दिन सुल्तान ने गुलामों को आजाद करने का आदेश दे दिया। फिर सुल्तान ने मुझे नजद ओ हजाज , मक्का और मदीना में भी प्रचार करने की आज्ञा दे दी और पंद्रह दिन बाद अपने साथ मोटर से चलने का आग्रह भी किया। लेकिन चूंकि मुझे पैदल ही जाना था तो मैंने सुल्तान से विदा मांगी और मक्का चल पड़ा।
3- मेरा एक उपदेश नजदो हज्जाज में बद्दू लोगों के अन्याय के खिलाफ था। जबसे इस्लाम चला है हज करने मुसलमान अरब जाते हैं। हाजियों को लूटना और गोली मारना बद्दुओ का पेशा था।जद्दा और तायफ के आसपास की सारी भूमि हाजियों के खून से रंगी पड़ी है। सुल्तान से पहले मक्का पर तुर्कों का शासन था और बद्दुओं को मुहम्मद के ननिहाल वाला समझकर कुछ नहीं बोला जाता था। मेरे कहने पर सुल्तान ने बद्दुओं की इस हरकत को फौज लगाकर हरदम के लिये शांत कर दिया।
4-मक्का के रास्ते में बीस दिन बाद फिर दवादमी में सुल्तान से भेंट हुयी और उनके साथ मै मोटर से शायेरा होते हुये सेल पहुंचा।यहां से मक्का समीप है। रात भर यहीं रुककर सुबह उठकर सबके साथ मैंने भी एहराम बांधा क्योंकि मक्का की सीमा यहीं से शुरू होती है और बिना एहराम बांधे जाना धर्मसंगत नहीं है।जो भारतीय मुसलमान जहाज से मक्का पहुंचते हैं उन्हें जहाज में बैठे ही यमन मे लिमलिम पहाड़ी पर ऐहराम बांधना पड़ता है।एहराम दो सफेद धोतियों का नाम है जो बिना सिले कपड़े की होती है। एक बांध ली जाती है और दूसरी ओढ़ ली जाती है। सर नंगा रहता है। इब्राहीम के मुकाम होता हुआ मैं खाना ए काबा भी पहुंच गया।
5- मक्का से तीन मील दूर तायफ है जहां गायें मिलती हैं और महंगी होती हैं। कोई अरबी इन्हें कुरबानी के लिये नहीं बेचना चाहता क्योंकि वह इस बात को अच्छी तरह जानता है कि गाय का दूध मक्का में नहीं मिलता।इसलिये वह इसे बचाना और पालना अपना धर्म समझता है। यहाँ से साठ मील दूर दूर तक घास नहीं है इसलिये गायें भी कम मिलती हैं।
6-हज के दिनों में जहाँ कुरबानी होती है वहाँ भेड़ बकरियां ही दिखाई देती हैं। चूंकि मक्का में केवल जुलाब लगाने वाला सनाय का पौधा ही होता है बकरियां यही खाती हैं। इन कुरबान की हुयी बकरियों का गोश्त खाने से हाजियों के पेट चल जाते हैं और वो बहिश्त पहुंच जाते हैं। इस वजह से सिर्फ मीना में अस्सी हाजी रोज मरते हैं जिन्हें दफन करने के लिये कब्र भी नहीं मिलती । मैने सुल्तान से इस समस्या के बारे में कहा तो उसने कुरबानी का गोश्त खाने पर लिखित प्रतिबंध लगा दिया और कुरबानी के मांस को वहीं जमीन में गाड़ने का हुक्म दे दिया। किसी गैर अरबी मुसलमान ने चूं चपड़ तक नहीं की । अरबी जनता खुश हुयी पर गैर अरबी डर के मारे चुप रहे ।
7- ओम का झंडा मक्का की गली गली कूंचे कूंचे और हर बादशाह के दरबार में मेरे साथ लहराता था । सफा मरवाह में मैंने अन्य हाजियों की तरह सात दौड़ें लगाई । उस समय भी यह झंडा मेरे साथ था। यह ओम का झंडा जबल अरफात में जहाँ हज होता है वहाँ भी गाड़ा गया। ऐसे ही मुजदिलफा , मीना , बेतुल्लाह यानी खुदा का घर या खाना-ए-काबा में भी यह मेरे साथ था और इसके चारों ओर सात तवाफ अर्थात परिक्रमा में भी यही साथ लहराया। मक्का के जन्नतमाले ओर मदीना की जन्नतल बाकी में भी यह लहराया। इसलिये यह व्यवस्था इस्लाम की अर्थहीन है कि काबा में काफिर न जाये। कौन जाये कौन ना जाये यह एक व्यक्ति की व्यवस्था हो सकती है ईश्वर की नही।
8- सारे मक्का में सूडानी औरतें रात दिन सर पर पानी के घड़े रखे हुये आवाज लगाती हैं ‘हाजी मोया अरबा कुरोश’ यानी ऐ हाजी लोगों , मोया यानी पानी का एक टिन चार आने में ले लो। हाजी मोया सुनकर हिंदुस्तानी मुसलमान पूछते हैं “कौन मरा है?” औरते यह समझकर कि पूछ रहे हैं कि क्या भाव दिया है जवाब में चार उंगलियां दिखाकर कहती हैं , “अरबाकुरोश” जिसका मतलब है ‘चार आने में’। इधर मुसलमान समझते हैं कि चार हाजी मर गये हैं और पूछते हैं कि “कौन कौन मरा है?” आज भी यही हाल है सभी भारतीय मुसलमानों का। वो अरबी नहीं जानते लेकिन जिद फिर भी है कि कुरान अरबी में ही रटो।
9- तायफ एक माह वैदिक धर्म का प्रचार करने के बाद सुल्तान से विदा ली और पैदल चलता बाईस दिनों में यमन की सीमा के नजदीक पहुंचा।यहां के देहाती अरबियों के बीच प्रथा देखी कि अपने रसोईघर को ये गोबर से लीपते हैं और अपने सर पर गाय के खुर के बराबर शिखा भी रखते हैं। पूछने पर पता चला कि ये सब अरब में किसी समय हिंदू आर्य ही थे और फिर धर्मच्युत हो गये। इधर भारत से भी अनेक शताब्दियों तक कोई धर्म उपदेशक उनके बीच धर्म प्रचार को नहीं गया क्योंकि यहां यह वेद विरुध्द व्यवस्था दे दी गयी थी कि समुद्र पार करने से व्यक्ति धर्म से पतित हो जाता है। ऐसी ही दशा यमन में भी दिखाई दी।बस हिदुस्तानी मुसलमान अरबियों की शिखा देखकर आपस में भुनभुनाते रहते हैं पर हिम्मत नहीं की उन अरबियों को टोकें।
10- ओम का झंडा लिये मैं लाल सागर तट के बंदरगाह यमबा पहुंचा। संयोग से बाजार में बनारस के अट्ठारह जुलाहे बाजार में मिल गये। जब उन्होने एक अरबी बालक को शिखा रखे देखा तो पूछा क्या यह हिंदू है। मैंने कहा यहां के बद्दुओं का यही रिवाज है वो सर पर चोटी रखते हैं। सुनते ही वो तौबा तौबा कहने लगे और सोचा मैने ही अरबियों में चोटी का प्रचार किया है । चोटी के खिलाफ वो लगातार उर्दू में बोलते रहे लेकिन अरबी इन्हें घास नहीं डालते ।
11- अरब के बद्दुओं को तो जमजम कूयें का भी कुछ पता नही है और जो मक्का के आस पास रहते हैं वो हज भी नहीं करते। एक बार मैने एक अरब निवासी से अरबी में पूछा , “क्या जमजम अच्छा है?” उसने जवाब दिया , ” जमजम आदमी तो अच्छा है।” मैंने कहा भाई जमजम कोई आदमी नहीं है बल्कि यह तो मक्का का अच्छा खासा पवित्र कूआं है , उसने हैरान होकर उत्तर दिया , ” जमजम उस समय तो आदमी था अब कूआं हो गया नहीं पता।” इसपर हम सब खूब हंसे।
12- मिश्र मे प्रचार के दौरान मैंने दाढी के खिलाफ कुछ लिखा , तो बस फिर ऐसी हवा चली कि वहाँ के बड़े बड़े लोगो ने भी दाढी के खिलाफ लिखा ।इसका फल यह हुआ कि अब वहाँ दाढी कोई नहीं रखता।इस मामले में मिश्र तुर्की की बहन बन गयी है।यदि कोई भी दाढी वाला बाजार से गुजरता है तो उसपर लोग चिल्लाते हैं और बच्चे ताली पीट पीट कर पीछे पड़कर चिढ़ाते हैं कि ” सुनया मुनया या इहलक…सुनया मुनया या इहलक।” अर्थात दाढ़ी कटवा दो दाढ़ी कटवा दो। और फिर गालियों से खबर ली जाती है। हिंदुस्तानी मुसलमानों का तो गजब तमाशा बन जाता है बाजार में और अनेक फौरन दाढ़ी कटवा भी देते हैं।
13- अदन , यमन , से मोकल्ला बंदरगाह नाव से पहुंचा और आगे पैदल ही बढा । रेगिस्तान में कई दिन बाद बद्दुओं के गांव दिखे । वो मुझे अपने गांव ले गये जहाँ मैंने उन्हें वेद की शिक्षा दी जो उन्होंने चाव से सुनी। तभी वहां एक मौलवी आया ऊंट पर सवार होकर और उनसे कहा कल से रमजान शुरू होने वाला है , दिन में कुछ ना खाना।फिर “लाहौलबिला” बोल कर चल दिया।
बाद में बद्दुओं ने मुझसे पूछा कि –
“कल क्या बला आने वाली है जो हमें दिन के समय खाने ना देगी और किस दिशा से आयेगी ?”
ये तो मैं जानता ही था कि इन्हें नमाज, रोजा और कुरान का कुछ नही पता इसलिये कह दिया कि –
“वह बला कल शाम को पश्चिम की ओर से आयेगी।”
दूसरे दिन बद्दू सुबह बकरी चराने निकले और शाम को उन्हें एक ऊंटनी और उसका बच्चा पश्चिम से आते दिखाई दिये।उन्होंने समझा यही बला है जिसका जिक्र मौलवी ने किया था तो उन्होंने उस ऊंटनी को मार डाला।जब “रमजान” मर गयी तो “लाहौल” की तलाश हुई।उन्होंने ऊंटनी के बच्चे को “लाहौल” समझकर मार डाला और खुशी खुशी घर लौट आये।
शाम जब हम फिर साथ बैठे थे तो वो ही मौलवी फिर आये और कहा कि-
” आज रात भर पेट खा लो , कल सुबह तुम्हें खाने को कुछ नही मिलेगा।आज चांद दिखाई दे गया है और कल से रमजान है।”
सुनकर बद्दू बोले कि-
“हमने रमजान को मार दिया है।”
मौलवी झट से बोला ,”लाहौलबिला।”
“हमने लाहौलबिला को भी मार दिया”,बद्दुओं ने खुशी खुशी जवाब दिया।
मौलवी साहेब सकपकाते हुये खिसक लिये और मैं हंसता रहा।
14- फिलिस्तीन में भी मुझे वैदिक धर्म के प्रचार की अनुमति मिल गयी। लैलातलमेराज के दिन बैतुलमुकद्दस में कौनफेरेंस थी। मौलाना शौकत अली और इकबाल भी आये थे और अरबिक में एक पंक्ति भी ना बोल पाने के कारण वो दोनों श्रोताओं के हो हल्ले के चलते बैठा दिये गये।अरबी अखबार भी मजाक उड़ाते हुये यही लिखते थे अलहिन्दी आये हैं जिससे सर इकबाल तो इतना अपमानित महसूस किये कि यहीं से लौटने के बाद उन्होंने दु:खी होकर ” सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा” नज्म बनाई । ये बात अलग है कि वो पाकिस्तान चले गये और नज्म ही बदल डाली। इन्हीं मौलाना और उनके साथियों से एक बार अरब के लोगों ने कहा – ‘यल्लाह’ , यानी चलिये। मौलाना ने झट कहा “अल्लाह” यानी ‘हे ईश्वर’। पंद्रह मिनट तक यही चलता रहा और मौलाना कुछ समझ ना पाये।
15 – मिश्र में भी मुझे प्रचार की छूट मिल गयी। यहां की विश्वप्रसिध्द ‘ जामिया अल जहर ‘ यूनिवर्सिटी में देवबन्द से छात्र अरबिक पढने आते हैं। उस समय ऐसे बाइस छात्र थे। ये अरबिक भी नहीं बोल पाते थे। सबसे अलग थलग अपने समूह में ही रहते थे। इन्हें लोग ‘ अलहनूद’ और ‘अलहिंद’ कहकर चिढाते। मन मसोस कर रह जाने के अलावा ये और कुछ कर भी नही सकते और ऐसे में इन्हें भारत याद आता है।
16- मसकट से अदन की ओर नाव से जाते समय समुद्र के किनारे एक पहाड़ी पर एक भारी मूर्ति नाव में बैठे अरबियो ने मुझे दिखाई। वो इसे ‘ सनम-अल-बनयान यानी हिंदुओं की मूर्ति कहते हैं। कुछ समय बाद इस रास्ते से गुजरते हुये मैं इस मूर्ति के पास ठहरा था जो कम से कम एक हजार साल पुरानी है।इस्लाम के प्रचार के पूर्व यहां हिंदू बसे हुये थे।महाभारत के युध्द के बाद विद्वानों और योगियों के मारे जाने से वेदों का प्रचार विदेशों में रुक गया और इसलिये लोग अपना मूल धर्म भूलकर मुसलमान हो गये।
15 फरवरी सन 1936 को पंडित जी वापस हिंदुस्तान लौट आये और 17 मार्च सन 1937 को पहाड़तली , चिटगांव , बांगलादेश , में यह पुस्तक लिखकर समाप्त की।

चौथा खंभा न्यूज़ .com / डॉ विवेक आर्य /नसीब सैनी

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जेएनयू में फीस वृद्धि के नाम पर राजनीति

—यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं

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सुरेश हिन्दुस्थानी

देश के उच्च शिक्षा केन्द्र जब राजनीति के अड्डे बनने की ओर कदम बढ़ाने लगें, तब वहां की शिक्षा की दिशा-दशा क्या होगी, यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। फीस बढ़ोतरी के खिलाफ किया जाने वाला दिल्ली का छात्र आंदोलन कुछ इसी प्रकार का भाव प्रदर्शित कर रहा है, जहां केवल और केवल राजनीति ही की जा रही है। किसी भी आंदोलन की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके पीछे जनहित का कितना भाव है। दिल्ली का यह आंदोलन जनसरोकार से कोसों दूर दिखाई दे रहा है।

हालांकि इसके पीछे बहुत से अन्य कारण भी होंगे। सबसे बड़ा कारण तो यही है कि आज जेएनयू की जो छवि जनता के बीच बनी है, वह जनता को खुद ही दूर कर रही है। जिस विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारों की ध्वनि गूंजित होती है, वह कभी जन आंदोलन का हिस्सा नहीं बन सकते हैं।दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के जिन छात्रों ने कभी भारत के टुकड़े करने के नारे लगाए थे, आज वे ही छात्र फीस बढ़ोतरी के छोटे से मामले को राजनीतिक रुप देने का प्रयास करते दिखाई दे रहे हैं। इस छात्र आंदोलन का राजनीतिक स्वरुप इसलिए भी दिखाई दे रहा है, क्योंकि इसमें राष्ट्रीय मानबिन्दुओं और केन्द्र सरकार को सीधे निशाने पर लिया जा रहा है। जेएनयू वामपंथी विचारधारा का एक बड़ा केन्द्र रहा है।

वामपंथी धारा के कार्यकर्ता देश के महानायकों के बारे में क्या सोच रखते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। पिछले घटनाक्रमों को देखें तो पाएंगे कि जेएनयू में देश के विरोध में वातावरण बनाने का काम किया जाता रहा है। वहां आतंकवादी बुरहान वानी के समर्थन में कार्यक्रम किए जाते हैं। सवाल यह कि जेएनयू में शिक्षा के नाम पर आखिर क्या हो रहा है। जहां तक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में फीस बढ़ोतरी की बात है तो यह कहना तर्कसंगत ही होगा कि विगत 19 वर्ष से विश्वविद्यालय के छात्रावास के कमरों और भोजन का शुल्क नहीं बढ़ाया गया, जबकि पिछले 19 सालों में महंगाई का ग्राफ बहुत ऊपर गया है। इस सबका भार पूरी तरह से विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के कंधों पर ही आया। देश के अन्य विश्वविद्यालयों में भी शिक्षा महंगी हो रही है, जो जेएनयू के मुकाबले बहुत अधिक है। ऐसे में विश्वविद्यालय द्वारा कुछ हद तक फीस बढ़ाना न्यायोचित कदम ही है। जिसे वहां के कई छात्र भी सही मानते हैं। लेकिन यह आंदोलन इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि इसमें परदे के पीछे राजनीतिक कार्यकर्ता भूमिका निभा रहे हैं। यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं।

खैर… यह जांच का विषय हो सकता है।देश के प्रसिद्ध अधिवक्ता सांसद डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने इस छात्र आंदोलन के बारे में बहुत ही गहरी बात कही है। उनका मानना है कि जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय को कुछ समय के लिए बंद कर दिया जाए। उनके इस कथन के गहरे निहितार्थ निकल रहे हैं। स्वामी के संकेत को विस्तार से समझना हो तो एक बार जेएनयू की गतिविधियों का अध्ययन करना चाहिए। फिर वह सब सामने आ जाएगा जो वहां होता है। कहा जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जमकर राजनीति की जाती रही है। देश के जो शिक्षा केन्द्र राजनीति के केन्द्र बनते जा रहे हैं, उन पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है।

वर्तमान में जिस प्रकार से जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय का आंदोलन चल रहा है, उसे छात्र आंदोलन कहना न्याय संगत नहीं होगा। क्योंकि, यह विशुद्ध राजनीतिक आंदोलन है। फीस बढ़ोतरी का विरोध तो मात्र बहाना है। इस आंदोलन के समर्थन में देश की संसद में कांग्रेस और वामपंथी दलों की ओर से आवाज उठाई गई। इससे यही संदेश जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जो देश विरोधी नारे लगाए गए, उनके प्रति इन राजनीतिक दलों के समर्थन का ही भाव रहा होगा। इतना ही नहीं, जब भारत तेरे टुकड़े होंगे और हमें चाहिए आजादी जैसे नारे लगाए गए थे, तब भी कांग्रेस और वाम दलों ने खुलेआम समर्थन किया था। ऐसे में सवाल यह उठता है कि कहीं यही दोनों दल छात्रों को आंदोलन करने के लिए तो नहीं उकसा रहे? अगर यह सही है तो फिर केन्द्र सरकार को दोष देना सही नहीं कहा जा सकता।

जब से देश में राजनीतिक सत्ता का परिवर्तन हुआ है, तब से ही देश में उन संस्थानों की सक्रियता दिखाई देने लगी है, जो भारत के बारे में भ्रम का वातावरण बनाने में सहायक हो सकते हैं। चाहे वह शहरी नक्सलवाद को प्रायोजित करने वाले कथित बुद्धिजीवियों की संस्था हो या फिर उनके विचार को अंगीकार करने वाली ही संस्थाएं क्यों न हों। सभी केन्द्र सरकार का विरोध करने के लिए आगे आ रहे हैं। इस विश्वविद्यालय में पढ़ाई करने वाले छात्र कभी भारतीय सेना द्वारा की जाने वाली आतंकियों के विरोध में कार्यवाही पर सवाल उठाते दिखाई देते हैं तो कभी अनुच्छेद 370 को हटाने का विरोध करते हैं। चार वर्ष पूर्व जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में छात्र संघ की उपाध्यक्ष रहीं शेहला राशिद ने भारतीय सेना के विरोध में जमकर भड़ास निकाली थी, जबकि सेना की ओर से स्पष्ट कहा गया था कि ऐसा कुछ भी नहीं है। इससे समझ में आ सकता है कि इस विश्वविद्यालय में कौन-सा पाठ पढ़ाया जाता है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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देश की युवा पीढ़ी में विदेशों के प्रति रुचि बढ़ी

—गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है

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मनोज ज्वाला

एक मीडिया संस्थान के सर्वेक्षण के अनुसार हमारे देश के पढ़े-लिखे और शहरी नौजवानों में से आधे से अधिक ऐसे हैं, जो अपने देश को पसंद नहीं करते। वे विदेशों में जाकर बस जाना चाहते हैं। लगभग दो साल पहले के उक्त सर्वेक्षण के मुताबिक उनमें से 75 फीसदी युवाओं का कहना था कि वे बे-मन और मजबूरीवश भारत में रह रहे हैं। 62.08 फीसदी युवतियों और 66.01 फीसदी युवाओं का मानना था कि भारत  में उनका भविष्य सुरक्षित नहीं है। क्योंकि, यहां अच्छे दिन आने की संभावना कम है। उनमें से 50 फीसदी का मानना था कि भारत में किसी महापुरुष का अवतरण होगा, तभी हालात सुधर सकते हैं, अन्यथा नहीं।

40 फीसदी युवाओं का मानना था कि उन्हें अगर इस देश का प्रधानमंत्री बना दिया जाए, तो वे पांच साल में इस देश का कायापलट कर देंगे।अखबार का वह सर्वेक्षण आज भी बिल्कुल सही लगता है। अगर व्यापक स्तर पर सर्वेक्षण किया जाता, तो देश छोड़ने को तैयार युवाओं का प्रतिशत और अधिक दिखता। वह सर्वेक्षण तो सिर्फ शहरों तक सीमित था। अपने देश में गांवों पर भी तेजी से शहर छाते जा रहे हैं। गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है। गौर कीजिए कि देश छोड़ने को तैयार वे युवा पढ़े-लिखे हैं और शहरों में पले-बढ़े हैं। वे किस पद्धति से किस तरह के विद्यालयों में क्या पढ़े-लिखे हैं और किस रीति-रिवाज से कैसे परिवारों में किस तरह से पले-बढ़े हैं, यह ज्यादा गौरतलब है।

विद्यालय सरकारी हों या गैर सरकारी, सभी में शिक्षा की पद्धति एक है और वह है मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा पद्धति। भारतीयता विरोधी इसी शिक्षा पद्धति को सरकारी मान्यता प्राप्त है। सरकार का पूरा तंत्र इसी तरह की शिक्षा के विस्तार में लगा हुआ है। वैसे अंग्रेजी माध्यम वाले विद्यालय सबसे अच्छे माने जाते हैं और गैर-सरकारी निजी क्षेत्र के अधिकतर विद्यालय अंग्रेजी माध्यम के ही हैं। शहरों में ऐसे ही विद्यालयों की भरमार है और जिन युवाओं के बीच उक्त मीडिया संस्थान ने उपरोक्त सर्वेक्षण किया उनमें से सर्वाधिक युवा ऐसे ही तथाकथित ‘उत्कृष्ट’ विद्यालयों से पढ़े-लिखे हुए हैं। अब रही बात यह कि इन विद्यालयों में आखिर शिक्षा क्या और कैसी दी जाती है, तो यह इन युवाओं की उपरोक्त सोच से ही स्पष्ट है।

जाहिर है, उन्हें शिक्षा के नाम पर ऐसी-ऐसी डिग्रियां दी जाती हैं, जिनके कारण वे महात्वाकांक्षी, स्वार्थी बनकर असंतोष, अहंकार, खीझ, पलायन एवं हीनता-बोध से ग्रसित हो जाते हैं और कमाने-खाने भर थोड़े-बहुत हुनर हासिल कर स्वभाषा व स्वदेश के प्रति ‘नकार’ भाव से पीड़ित होकर विदेश चले जाते हैं।थॉमस विलिंग्टन मैकाले कोई शिक्षा-शास्त्री नहीं था। वह एक षड्यंत्रकारी था, जिसने भारत पर ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जड़ें जमाने की नीयत से भारतीय शिक्षा-पद्धति की जड़ें उखाड़कर मौजूदा शिक्षा-पद्धति को प्रक्षेपित किया था। जो आज भी उसी रूप में कायम है। 20 अक्टूबर 1931 को लंदन के रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ फौरन अफेयर्स के मंच से महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘अंग्रेजी शासन से पहले भारत की शिक्षा-व्यवस्था इंग्लैण्ड से भी अच्छी थी।’ उस पूरी व्यवस्था को सुनियोजित तरीके से समूल नष्ट कर देने के पश्चात ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जरूरतों के मुताबिक उसके रणनीतिकारों ने लम्बे समय तक बहस-विमर्श कर के मैकाले की योजनानुसार यह शिक्षा-पद्धति लागू की थी।

मैकाले ने ब्रिटिश पार्लियामेंट की शिक्षा समिति के समक्ष कहा था ‘हमें भारत में ऐसा शिक्षित वर्ग तैयार करना चाहिए, जो हमारे और उन करोड़ों भारतवासियों के बीच जिन पर हम शासन करते हैं, उन्हें समझाने-बुझाने का काम कर सके। जो केवल खून और रंग की दृष्टि से भारतीय हों, किन्तु रुचि, भाषा व भावों की दृष्टि से अंग्रेज हों।’ विदेशों में बस जाने को उतावले भारतीय युवाओं ने पूरी मेहनत व तबीयत से मैकाले शिक्षा-पद्धति को आत्मसात किया है, ऐसा समझा जा सकता है। यहां प्रसंगवश मैकाले के बहनोई चार्ल्स ट्रेवेलियन द्वारा ब्रिटिश पार्लियामेंट की एक समिति के समक्ष ‘भारत में भिन्न-भिन्न शिक्षा-पद्धतियों के भिन्न-भिन्न परिणाम’ शीर्षक से प्रस्तुत किये गए एक लेख का यह अंश भी उल्लेखनीय है कि ‘मैकाले शिक्षा-पद्धति का प्रभाव अंग्रेजी राज के लिए हितकर हुए बिना नहीं रह सकता। हमारे पास उपाय केवल यही है कि हम भारतवासियों को यूरोपियन ढंग की उन्नति में लगा दें। इससे हमारे लिए भारत पर अपना साम्राज्य कायम रखना बहुत आसान और असंदिग्ध हो जाएगा।’ ऐसा ही हुआ। बल्कि, मैकाले की योजना तो लक्ष्य से ज्यादा ही सफल रही।

हमारे देश के मैकालेवादी राजनेताओं ने अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासन की समाप्ति के बाद भी उनकी अंग्रेजी-मैकाले शिक्षा-पद्धति को न केवल यथावत कायम रखा, बल्कि उसे और ज्यादा अभारतीय रंग-ढंग में ढाल दिया। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष लक्षित प्राचीन भारतीय शिक्षा-पद्धति को अतीत के गर्त में डालकर शिक्षा को उत्पादन-विपणन-मुनाफा-उपभोग-केन्द्रित बना देने और उसे नैतिक सांस्कृतिक मूल्यों से विहीन कर देने तथा राष्ट्रीयता के प्रति उदासीन बना देने का ही परिणाम है कि हमारी यह युवा पीढ़ी महज निजी सुख-स्वार्थ के लिए अपने देश से विमुख हो जाना पसंद कर रही है। उसे विदेशों में ही अपना भविष्य दीख रहा है।

माना कि हमारे देश में तरह-तरह की समस्याएं हैं, किन्तु इनसे जूझने और इन्हें दूर करने की बजाय पलायन कर जाने अथवा कोरा लफ्फाजी करने कि हमें प्रधानमंत्री बना दिया जाए तो हम देश को सुंदर बना देंगे, अति महात्वाकांक्षा-युक्त मानसिक असंतुलन का ही द्योत्तक है। लेकिन आधे से अधिक ये शहरी युवा मानसिक रुप से असंतुलित नहीं हैं, बल्कि असल में वे पश्चिम के प्रति आकर्षित हैं। इसके लिए हमारे देश की चालू शिक्षा-पद्धति का पोषण करने वाले हमारे राजनेता ही जिम्मेवार हैं। यह ‘यूरोपियन ढंग की उन्नति’ के प्रति बढ़ते अनावश्यक आकर्षण का परिणाम है। इस मानसिक पलायन को रोकने के लिए जरूरी है कि हम अपने बच्चों को हमारे राष्ट्र की जड़ों से जोड़ने वाली और संतुलित समग्र मानसिक विकास करने वालीप्राचीन भारतीय पद्धति से भारतीय भाषाओं में समस्त ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा देने की सम्पूर्ण व्यवस्था कायम करें।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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भाई-बहन में प्रेम भाव बढ़ाता है भैया दूज

–बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था

Published

योगेश कुमार गोयल

(भैया दूज, 29 अक्टूबर पर विशेष)

भाई-बहन के दिलों में पावन संबंधों की मजबूती और प्रेमभाव स्थापित करने वाला पर्व है भैया दूज। इस दिन बहनें अपने भाईयों को तिलक लगाकर ईश्वर से उनकी दीर्घायु की कामना करती हैं। कहा जाता है कि इससे भाई यमराज के प्रकोप से बचे रहते हैं। दीपावली के दो दिन बाद अर्थात कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाए जाने वाले इस पर्व को ‘यम द्वितीया’ व ‘भ्रातृ द्वितीया’ के नाम से भी जाना जाता है। बहुत से भाई-बहन सौभाग्य तथा आयुष्य की प्राप्ति के लिए इस दिन यमुना अथवा अन्य पवित्र नदियों में साथ-साथ स्नान भी करते हैं। भैया दूज मनाने के संबंध में कई किवंदतियां प्रचलित हैं। एक कथा यमराज और उनकी बहन यमुना देवी से संबंधित है। बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था। यमुना अपने भाई यमराज से बहुत स्नेह करती थीं और अक्सर उनसे अनुरोध करती रहती थीं कि वे अपने इष्ट-मित्रों सहित उसके घर भोजन के लिए पधारें लेकिन यमराज हर बार उसके निमंत्रण को किसी न किसी बहाने से टाल जाते। कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमुना ने यमराज को एक बार फिर भोजन के लिए आमंत्रित किया।

उस समय यमराज ने विचार किया कि मैं तो अपने कर्त्तव्य से बंधा सदैव प्राणियों के प्राण ही हरता हूं। इसलिए इस चराचर जगत में कोई भी मुझे अपने घर नहीं बुलाना चाहता। लेकिन बहन यमुना तो मुझे बार-बार अपने घर आमंत्रित कर रही है। इसलिए अब तो उसका निमंत्रण स्वीकार करना ही चाहिए।यमराज को अपने घर आया देख यमुना की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने भाई का खूब आदर-सत्कार करते हुए उनके समक्ष नाना प्रकार के व्यंजन परोसे। बहन के आतिथ्य से यमराज बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे कोई वर मांगने को कहा। इस पर यमुना ने उनसे अनुरोध किया कि आप प्रतिवर्ष इसी दिन मेरे घर आकर भोजन करें और मेरी तरह जो भी बहन इस दिन अपने भाई का आदर-सत्कार करे, उसे तुम्हारा भय न रहे। यमराज ने बहन यमुना को उसका इच्छित वरदान दे दिया। ऐसी मान्यता है कि उसी दिन से ‘भैया दूज’ का पर्व मनाया जाने लगा। भैया दूज के संबंध में और भी कई कथाएं प्रचलित हैं। ऐसी ही एक कथा के अनुसार, एक ब्राह्मण की दो संतानें थी।

एक पुत्र एवं एक पुत्री। पुत्री बहुत समझदार एवं गुणवती थी। वह अपने भाई से जी-जान से प्यार करती थी। एक दिन उसका भाई उससे मिलने उसकी ससुराल पहुंचा। उस समय वह सूत कातने में व्यस्त थी। अतः उसे भाई के आने का पता ही न चल सका। भाई भी बिना कुछ बोले चुपचाप एक ओर बैठा रहा। जब थोड़ी देर बाद बहन की नजर उस पर पड़ी तो भाई को अपने घर आया देख उसे बेहद खुशी हुई। उसने भाई का भरपूर आदर-सत्कार किया। अगले दिन भाई को वापस लौटना था। अतः रास्ते के लिए वह आटे के पकवान बनाने के उद्देश्य से चक्की में आटा पीसने लगी। अनजाने में चक्की में बैठा सांप भी आटे के साथ पिस गया। उसी आटे के पकवान एक पोटली में बांधकर उसने भाई को रास्ते में खाने के लिए देकर विदा किया। भाई के घर से जाने के बाद जब उसे यह मालूम हुआ कि आटे में सांप पिस गया है तो अपने पुत्र को पालने में ही सोता छोड़कर वह अपने भाई के प्राणों की रक्षा के लिए दौड़ी। कुछ दूर जाने पर उसे एक पेड़ की छांव में अपना भाई सोता दिखाई दिया। तब तक उसने पोटली में से कुछ भी नहीं खाया था। उसने भगवान का शुक्रिया अदा किया और पोटली उठाकर दूर फेंक दी तथा भाई के साथ मायके की ओर चल दी।

रास्ते में उसने देखा कि भारी-भारी शिलाएं आकाश में उड़ रही हैं। उसने एक राहगीर से इस रहस्य के बारे में जानना चाहा तो उसने बताया कि जो बहन अपने भाई पर कभी नाराज न होती हो और उसे दिलो-जान से चाहती हो, उस भाई की शादी के समय ये शिलाएं उसकी छाती पर रखी जाएंगी। थोड़ी दूर चलने पर उसे नाग-नागिन दिखाई दिए। नाग ने बताया कि ये शिलाएं जिस व्यक्ति की छाती पर रखी जाएंगी, हम उसे डंस लेंगे। जब बहन ने इस विपत्ति से बचने का उपाय पूछा तो नाग-नागिन ने बताया कि अगर भाई के विवाह के समय उसके सभी कार्य बहन स्वयं करे, तभी भाई की जान बच सकती है।जब उसके भाई के विवाह के लग्न का शुभ मुहूर्त आया तो वह भाई को पीछे धकेलती हुई स्वयं ही लग्न चढ़वाने के लिए आगे हो गई और घोड़ी पर भी स्वयं चढ़ गई। परिवारजन और संबंधी उसके इस विचित्र व्यवहार से हैरान तथा क्रोधित थे। उसके घोड़ी पर चढ़ते ही शिलाएं उड़ती-उड़ती आई लेकिन घोड़ी पर किसी पुरूष की जगह एक महिला को बैठी देख वापस मुड़ गई। जब सुहागरात का समय आया तो वह भाई को पीछे कर खुद भाभी के साथ सोने उसके कमरे में चली गई।

परिवार के सभी सदस्य तथा सभी रिश्तेदार उसके इस अजीबोगरीब व्यवहार से बेहद आश्चर्यचकित और खफा थे। उन्हें उस पर गुस्सा तो बहुत आ रहा था लेकिन उसके जिद के समक्ष सभी विवश थे। सुहागरात पर नियत समय पर नाग-नागिन उसके भाई को डंसने कमरे में पहुंच गए लेकिन उसने नाग-नागिन को मारने की सारी तैयारी पहले ही कर रखी थी। आखिरकार उसने नाग-नागिन का काम तमाम कर दिया। उसके बाद वह निश्चिंत होकर सो गई। सुबह होने पर सभी मेहमानों को विदा करने के बाद परिवार वालों ने सोचा कि अब इस बला को भी कुछ बचा-खुचा देकर यहां से चलता कर दिया जाए लेकिन नींद से जागने पर जब उसने पूरी घटना के बारे में सब को विस्तार से बताया कि किस प्रकार वह अपने बच्चे को पालने में ही सोता छोड़कर दौड़ी-दौड़ी भाई के प्राण बचाने के लिए उसके पीछे चली आई और सभी को नाग-नागिन के मृत शरीर दिखाए तो सभी की आंखों में आंसू आ गए।

भाई के प्रति उसका असीम प्यार तथा समर्पण भाव देखकर उसके प्रति सभी का हृदय श्रद्धा से भर गया।भाई-भाभी तथा माता-पिता ने उसे ढेर सारे उपहारों से लादकर बड़े मान-सम्मान के साथ खुशी-खुशी ससुराल से विदा किया। भाई-बहन के बीच इसी प्रकार के पावन संबंध, प्रेमभाव तथा उनके दिलों में आपसी संबंधों को मजबूत बनाने के लिए ही ‘भैया दूज’ पर्व मनाया जाता है।

(लेखक स्तंभकार हैं।)

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