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मूर्तिपूजा, वैदिक धर्म और आर्यसमाज

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27 JULY

मूर्तिपूजा, वैदिक धर्म और आर्यसमाज

लेखक – शास्त्रार्थ महारथी पं० मनसारामजी
          पाठक महाशयगण ! आज हम आपके सम्मुख यह बतलाना चाहते हैं कि मूर्तिपूजा का अर्थ क्या है और आर्यसमाज मूर्तिपूजा को कहाँ तक स्वीकार करता है तथा सनातनधर्म एवं आर्यसमाज के इस विषय में कहाँ तक मतभेद हैं । इस मूर्तिपूजा का ईश्वर – पूजा के साथ क्या सम्बन्ध है ? इस लेख में हम इन्हीं बातों पर सविस्तर चर्चा करेंगे ।
          सर्वप्रथम यह जान लेना आवश्यक है कि मूर्तिपूजा का क्या अर्थ है ? मूर्तिपूजा शब्द दो शब्दों मूर्ति व पूजा से मिलकर बना है । मूर्ति शब्द का अर्थ यह है कि जिस वस्तु में लम्बाई , चौड़ाई , मोटाई , रंग – रूप व भार हो उसे मूर्ति कहते हैं । पूजा शब्द के अर्थ हैं किसी वस्तु का उचित मान , किसी वस्तु की समुचित सुरक्षा तथा किसी वस्तु का उचित उपयोग । वे लोग भूल करते हैं जो यह समझते हैं कि पूजा शब्द के अर्थ धूप , दीप व आरती उतारने के हैं । हम इस सम्बन्ध में कुछ प्रमाण देकर यह सिद्ध करना चाहते हैं कि पूजा के वही अर्थ ठीक हैं जो हमने किये हैं ।
          मनुस्मृति ( 🔥 पितृभिभ्रतृिभिश्चैता : पतिभिर्देवरैस्तथा । पूज्या भूषयतिव्याश्च बहुकल्याणमीप्सुभि : ॥ – मनु० ३ / ५५ )  में लिखा है कि — ‘ पति आदि घर के लोगों को चाहिए कि वे भोजन , भूषण व वस्रों से त्रियों की पूजा करें । फिर आगे चलकर मनु ( 🔥यन्त्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता । – मनु० ३ / ५६  ) लिखते हैं कि — ‘ जिस गृह में स्त्रियों की पूजा होती है , वह घर फूलता – फलता है । इससे सिद्ध है कि उपर्युक्त प्रमाण में पूजा का अर्थ भोजन , भूषण व वस्रों से स्त्रियों का समुचित सत्कार करना है न कि स्त्रियों को धूप , दीप देकर उनकी आरती उतारना है । संस्कृत साहित्य में पूजा व नमः — ये दोनों शब्द प्रायः समानार्थक हैं । यजुर्वेद के १६वें अध्याय में कुत्तों , चोरों व डाकुओं के लिए नमः शब्द का प्रयोग आता है । शिवपुराण में आता है कि जिस समय पार्वती स्रान कर रहीं थी और गणेशजी पहरा दे रहे थे उस समय शिवजी ने बलपूर्वक घर में प्रविष्ट होना चाहा तो गणेश ने डण्डे से शिवजी की पूजा की । इन प्रमाणों से स्पष्ट सिद्ध हो गया कि पूजा व नमः के अर्थ किसी का समुचित सम्मान , समुचित सुरक्षा तथा समुचित प्रयोग ही है न कि धूप , दीप देकर उनकी आरती उतारना ।
          इस प्रकार मूर्तिपूजा के अर्थ ये हुए कि किसी लम्बाई , चौड़ाई , मोटाई , रंग , रूप व भार रखनेवाली वस्तु का उचित सत्कार करना , उचित सुरक्षा करना व उचित प्रयोग करना ही मूर्तिपूजा है । यदि इस प्रकार से मापा जाए तो आर्यसमाज को इस मूर्तिपूजा के साथ कोई मतभेद नहीं है । प्रत्युत इस दृष्टि से आर्यसमाज प्रत्येक वस्तु की पूजा को उचित मानता है । उदाहरण के लिए आप पाँव के जूते को ले लीजिए । इसकी यही पूजा है कि इसका सुरक्षा के साथ प्रयोग किया जावे तथा तेल ( बूट की पालिश ) आदि लगाकर इसकी सदा मरम्मत आदि होती रहे , बस यही जूते की पूजा है । एक पुस्तक की यही पूजा है कि उसकी जिल्द बाँधकर उसे सुरक्षित कर लिया जाए तथा चूहे आदि जन्तुओं से उसकी रक्षा की जाए । सुरुचि से उसका स्वाध्याय किया जावे । इसी प्रकार से प्रत्येक वस्तु के बारे में समझ लेना चाहिए । इस दृष्टि से आर्यसमाज सबकी पूजा करता है तथा इस प्रकार की पूजा पर उसे कोई आपत्ति नहीं है ।
◼ दो प्रकार की मूर्तियाँ — मूर्ति के दो प्रकार होते हैं । एक जड़ मूर्ति जोकि निर्जीव हैं जैसे भूमि , पत्थर , ईट , डण्डा , जूता , उस्तरा , लोहा , चाँदी , सोना , लकड़ी , जल आदि – आदि – संसार के समस्त निर्जीव पदार्थ । दूसरी चेतन मूर्तियाँ जिनमें सब जीवधारी सम्मिलित हैं — जैसे वृक्ष , पशु , पक्षी , मक्खी , मच्छर , मनुष्य आदि संसार के सब जीवधारी । इनकी पूजा भी यही है कि इनका समुचित सत्कार किया जावे । निर्जीवों के बारे में हम उपर उदाहरण दे चुके हैं । जीवधारियों में से जो उपकारक पशु हैं । उनका पालन – पोषण करना व हानिकारक जन्तुओं को उचित दण्ड देना यही उनकी पूजा है । वृक्षों को ले – लीजिए , छोटे वृक्ष जिनको जल की आवश्यकता है उन्हें जल देना , बड़े वृक्षों में से जो लाभदायक हैं उनकी रक्षा आदि करना जो हानिकारक हैं उनको उचित दण्ड देना , उन्हें काट देना ही उनकी पूजा है ।
          मनुष्यों में जो मनु के कथन के अनुसार साक्षात् मूर्तियाँ माता , पिता , गुरु , आचार्य , भाई , साधु , संन्यासी , महात्मा , पण्डित , विद्वान् , सन्त , राजा , आदि धर्मात्मा लोग हैं उन्हें खिलाना , पिलाना , नहलाना , धुलाना , वस्त्र पहनाना , उनकी सेवा करना और जो दुष्ट , पापी , चोर , डाकू , धूर्त आदि हैं उन्हें उचित दण्ड देना ही पूजा कहलाता है । यदि इस प्रकार से मूर्तिपूजा को स्वीकार किया जाए तो आर्यसमाज को इसके साथ तनिक भी मतभेद नहीं है । इस प्रकार की मूर्तिपूजा को आर्यसमाज वेदानुसार धर्म मानता है ।
◼ अब रह गई चित्रों की चर्चा — वे चाहे लकड़ी , धातु या पाषाण के बने हुए हों और चाहे वे कागजों पर बनाये गये हों उनकी पूजा के बारे में हमारा यह विचार है कि संस्कृत में मन्दिर नाम भवन का है । किसी विशेष आकृति के बनाये हुए भवन का ही नाम मन्दिर नहीं है । प्रत्युत प्रत्येक भवन का नाम मन्दिर है । हमारा विचार है कि प्राचीनकाल में जिन भवनों में बालकों को शिक्षा दी जाती थी उन भवनों में अच्छे – अच्छे विद्वानों अच्छे – अच्छे ऋषियों – मुनियों और वीरों के चित्र रक्खे जाते थे । अध्यापक लोग बालकों को उनका इतिहास पढ़ाते हुए ( भूगोल पढ़ाते हुए जैसे मानचित्र दिखाया जाता है ) उन चित्रों की ओर संकेत करके बतलाया करते थे कि देखो बेटा ! यह रामचन्द्रजी की मूर्ति है । उन्होंने अपने माता – पिता की आज्ञा का पालन करने हेतु राज्य – सिंहासन तजकर चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार किया था । उन्होंने राक्षसों को मारकर अपने देश , अपनी जाति और अपने धर्म का उद्धार किया था । बेटा ! तुम्हें भी श्री रामचन्द्रजी की भाँति ही माता – पिता की आज्ञा का पालन करना चाहिए और अपने देश – धर्म व जाति के लिए उपकार के कार्य करने चाहिएँ और बेटा ! देखो , यह कृष्णजी महाराज का चित्र है । उनके जीवन का उद्देश्य ही यह था कि भले पुरुषों की रक्षा करना और दुष्टों को दण्ड देना तथा धर्म की स्थापना करना उन्होंने अपना समस्त जीवन इन्हीं कार्यों में व्यय कर दिया । बेटा ! तुम्हें भी श्री कृष्णजी की भाँति दीन – दुखी की रक्षा करनी चाहिए , आतताईयों का नाश करना चाहिए और धर्म की रक्षा करनी चाहिए । देखो बेटा ! यह हनुमान्जी की मूर्ति है । ये बड़े स्वामीभक्त तथा बड़े शूरवीर योद्धा थे उन्होंने अपना समस्त जीवन श्री रामचन्द्रजी की सेवा में व्यय कर दिया और उनकी रक्षा के लिए बड़े – बड़े राक्षसों को युद्ध में मारा । बेटा ! तुम्हें भी उन जैसा वीर बनकर अपने स्वामी की सेवा और राक्षसों का नाश करना चाहिए । बेटा ! ये ब्रह्मा , विष्णु व शिव के चित्र हैं । ये बड़े महात्मा व ऋषि लोग थे । उन्होंने अपना सारा जीवन वैदिक धर्म के प्रचार में लगा दिया । बेटा ! तुम्हें भी वैसा ही विद्वान् व महात्मा बनकर संसार में वैदिक धर्म का प्रचार करना चाहिए । इस प्रकार अध्यापक लोग बच्चों को शिक्षा देते हुए ऋषि , मुनि , विद्वान् व शूरवीरों के चित्र दिखाकर उनके जीवन की उपलब्धियाँ बतलाकर बालकों को उपदेश देते थे कि बेटा ! तुम्हें ऐसा ही बनना चाहिए । इसका परिणाम यह होता था कि बच्चे इस प्रकार की शिक्षा से प्रभावित होकर उनके गुणों को ग्रहण करते थे तथा विद्वान् , धर्मात्मा व शूरवीर योद्धा बनते थे । यदि अब भी अपने घरों की सजावट के लिए इस प्रकार के चित्र लगाये जावें व बालकों को इस प्रकार की शिक्षा दी जावे तो आर्यसमाज को तनिक भी आपत्ति नहीं । इस प्रकार की मूर्तियों की यही पूजा है कि इन्हें सुरक्षित रक्खा जावे । यदि इनपर धूलि पड़ जावे तो इन्हें साफ कर दिया जावे तथा इनके द्वारा उन महापुरुषों का इतिहास बताकर बालकों को शिक्षित किया जावे ।
          यदि इस प्रकार मूर्तिपूजा की जावे तो आर्यसमाज का इसके साथ तनिक भी कोई मतभेद नहीं है , प्रत्युत आर्यसमाज इसे देशोद्धार के लिए आवश्यक समझता है । यह है वास्तविक मूर्तिपूजा जिसकी देश को आवश्यकता है , परन्तु दुर्भाग्य से पौराणिक दल ने इस मूर्तिपूजा का स्वरूप ही बदलकर इसे देश के लिए लाभप्रद बनाने के बजाए हानिकारक बना दिया है । आज यह मूर्तिपूजा देश के लिए विनाश का कारण बन रही है ।
          इसे किस प्रकार हानिकारक बना रक्खा है , हम इसके सम्बन्ध में आपके सम्मुख सविस्तर तथ्य प्रस्तुत करना चाहते हैं । आप तनिक इनपर विचार
▪ १ . विद्वानों , शूरवीरों , क्षत्रियों व ऋषियों के चित्रों को विकृत कर दिया है , जिससे देखनेवालों पर बजाए इसके कि अच्छा प्रभाव पड़े विपरीत प्रभाव पड़ता है । जिस हनुमान् को वाल्मीकि रामायण में चारों वेदों का पण्डित तथा व्याकरण का विद्वान् व शूरवीर लिखा गया है उसके मुख को विकृत कर व उसके पीछे पूंछ लगाकर उसे बन्दर बनाकर लोगों के सम्मुख प्रस्तुत कर दिया है तथा जिस गणेश को महाभारत में व्यासजी ने चतुर लेखक बताया है उसके धड़ पर हाथी का सिर लगाकर उपहास का विषय बना दिया है । ब्रह्मा जो चारों वेदों का विद्वान् था उसके धड़ पर चार मुख लगाकर उसके अस्तित्व को ही कल्पित बना दिया गया है ! एक दो नहीं इस प्रकार के बीसियों चित्र हैं जिनकी आकृति को विकृत करके दूषित ढंग से प्रस्तुत किया जाता है जिनसे उपदेश मिलना तो दूर रहा बुद्धिमान् बालक उन्हें अपना पूर्वज मानने में भी लज्जा अनुभव करते हैं । वर्तमान मूर्तिपूजा में यह प्रथम दोष है ।
▪ २ . ऋषि – मुनि व शूरवीरों के जीवन – चरित्रों को इतना कलंकित कर दिया है कि यदि पुराणों को पढ़ा जावे तो कोई ऋषि – मुनि , कोई महात्मा , देवता ऐसा नहीं छोड़ा गया जिसपर कलंक न लगाया गया हो । श्री रामचन्द्र पर मांसाहार का , श्री कृष्णजी पर सुरापान व स्त्रीयों से व्यभिचार करने का , ब्रह्मा पर पुत्री – गमन का , विष्णु पर मातृ – गमन का तथा शिव पर भगिनि – गमन का . . . . . . . . . इस प्रकार प्रत्येक ऋषि व मुनि पर इस प्रकार का दोष लगाया गया है कि उनके चित्रों को दिखाकर उनके जीवन सुनाने से बालकों पर स्वस्थ प्रभाव तो क्या पड़ना था उनके चरित्र भ्रष्ट होने का भय लगा रहता
▪ ३ . इस प्रकार की मूर्तियाँ मन्दिरों में रक्खी हुई व दीवारों पर खुदी हुई हैं कि जिनसे दर्शकों को चरित्र – हीनता की शिक्षा के अतिरिक्त और कुछ भी प्राप्त नहीं हो सकता । उदाहरण के लिए पार्वती की . . . . . . . में जो शिव – लिंग की मूर्ति स्थापित की हुई शिवालों में विद्यमान है उससे दर्शन करनेवाले को चरित्रहीनता के सिवा और क्या शिक्षा मिल सकती है ? जो स्त्रीयाँ शिवालों में पूजा के लिए जाती हैं क्या उनके हृदय के भीतर यह प्रश्न नहीं उठता है कि यह किसकी मूर्ति है । यदि वे पुजारी से पूछे तो पुजारी के पास इसका क्या उत्तर है । यदि हम यह कह दें कि यह मूर्ति व्यभिचार को आरम्भ करने का साधन है तो यह ग़लत न होगा । इसके अतिरिक्त जगन्नाथजी के मन्दिर की दीवारों पर बहुत अधिक संख्या में अश्लील चित्र खुदे हुए हैं जिनमें नग्न स्त्री व पुरुष के समागम की विभिन्न प्रकार की क्रीड़ाएँ दिखाई गई हैं । वर्तमान मन्दिरों में इस प्रकार की सैकड़ों मूर्तियाँ मिलती हैं जो चरित्रहीनता के अतिरिक्त और कोई शिक्षा नहीं दे सकतीं ।
▪ ४ . जड़ मूर्तियों के साथ चेतन का – सा व्यवहार किया जाता है जैसे खिलाना – पिलाना , वस्त्र पहनाना , पंखा करना , फूल चढ़ाना , सुलाना , जगाना , नहलाना , प्रणाम करना आदि – आदि । जो व्यवहार कि चेतन मूर्तियों के साथ करना उचित होता है वह इन जड़ मूर्तियों के साथ किया जाता है जिसका कि कोई लाभ नहीं है । इस बात को प्रत्येक बुद्धिमान् पुरुष स्वीकार करता है कि जड़ मूर्तियों में खाने – पीने आदि की शक्ति नहीं है । इसलिए इनके साथ इस प्रकार का व्यवहार करना समय को व्यर्थ खोना है । धरती तल पर आपको एक भी प्राणी ऐसा नहीं मिलेगा जो खाता तो हो परन्त मल – विसर्जन न करता हो , परन्तु कितने आश्चर्य की बात है कि शिवालों में इस प्रकार के जन्तु मिल जाते हैं जो ठाकुरजी को भोजन तो प्रतिदिन करवाते हैं , परन्तु शौच एक दिन भी नहीं करवाते , इससे सिद्ध होता है कि वे खाते ही नहीं । फिर भोग भी उल्टा ही लगाते हैं । यह बुद्धि की बात है कि यदि किसी को आँखों द्वारा प्रसन्न करना हो तो सुन्दर वस्तुएँ दिखाओ । मुख द्वारा प्रसन्न करना हो तो राग सुनाओ । भला किसी को लिंग द्वारा प्रसन्न करना हो तो वहाँ लड्डू अथवा फूल क्या काम दे सकते हैं वहाँ तो तदनुकूल पदार्थ की ही आवश्यकता है । कितने शोक की बात है कि भारत में चार करोड़ ऐसे व्यक्ति हैं जो एक समय भोजन करते हैं ( यह १९३५ की बात है जब यहाँ अंग्रेजों का शासन था ।), दूसरे समय का भोजन उन्हें प्राप्त नहीं होता । भारत के लाखों अनाथ बच्चे भूख के कारण प्राण त्याग रहे हैं । भारत की लाखों विधवाएँ पापी पेट के कारण अपना सतीत्व व धर्म तजने को विवश हो रही हैं । उनका पालन – पोषण और उनको अन्न , वस्त्र उपलब्ध करवाने की कतई चिन्ता नहीं है , परन्तु सनातनधर्म है कि इन पाषाण – मूर्तियों को भोजन करवाने के लिए एक – एक मन्दिर में सैकड़ों रुपये का भोग लगाते हैं । ठाकुरजी ने तो क्या खाना है । ठाकुरजी के बहाने भोग के पदार्थ को दुकानों में रखकर दो आने पत्तल के भाव से विक्रय करके पुजारी धन बटोरते हैं । यदि इसी पदार्थ को भारत के अनाथ बच्चों के लिए व्यय किया जावे तो भारत का कल्याण हो जावे।
▪ ५ . अपनी जय व पराजय को व अपनी रक्षा को भी इन्होंने मूर्तियों के भरोसे पर मानकर भारत को दासता की ऐसी कड़ियों में जकड़ दिया कि आज तक भी अभागा भारत स्वराज्य के लिए तड़प रहा है ( यह लेख पराधीन भारत में लिखा गया था ।)  ।महमूद गजनवी ने सोमनाथ पर चढ़ाई की । राजपूत हथियार बाँधे लड़ने के लिए तैयार थे , परन्तु पुजारियों ने कहा कि तुम्हें शत्रु के साथ लड़ने की आवश्यकता नहीं , सोमनाथजी स्वयं राक्षसों का विध्वंस करेंगे । परिणाम यह निकला कि राजपूत खड़े मुँह देखते रह गये और मुसलमानों ने मन्दिर को भूमि पर बिछा दिया । मूर्तियों को तोड़ दिया और करोड़ों रुपये के जवाहरात लूट ले | लूट का सारा माल व पुजारियों के बच्चे व बच्चियाँ बन्दी बनाकर गजनी ले जाए गये और भारत के बच्चे व बच्चियाँ दो – दो रुपये में वहाँ बेचे गये । जब औरंगजेब ने काशी के विश्वनाथ के मन्दिर को तोड़ा तो महादेवजी भागकर कूप में कूद गये और आज भी वह कुआँ ज्ञानवापी कूप के नाम से प्रसिद्ध है । भला विचारने की बात है कि यदि महादेवजी कूप में कूदने की बजाए तोप के गोले के समान औरंगजेब की सेना की ओर जाते तो सैकड़ों मुसलमान आक्रमणकारियों को ले मरते परन्तु जाते कैसे ? उनमें तो जड़ होने के कारण जाने की शक्ति ही नहीं है । कूप में गिराना भी पुजारियों की कृपा ही होगी । रक्षा करना तो चेतन का कार्य होता है न कि जड़ मूर्तियों का । आप एक कुत्ते को पालें और उसे दोनों समय भोजन करवाएँ , वह आपका स्वामीभक्त सेवक बनेगा । रात्रि को यदि चोर आवेगा तो भौंककर आपको जगा देगा , परन्तु इन मूर्तियों को लोग जड़ से उखाड़कर ले जाते हैं , ये अपनी ही रक्षा नहीं कर सकतीं औरों की क्या करेंगी ।
          आपने नहीं देखा कि मालाबार में मन्दिरों की मूर्तियाँ तोड़ी गई तथा हिन्दुओं का वध किया गया और मुसलमान बनाया गया । मुलतान , कोहाट , काश्मीर में यही कुछ हुआ । सैकड़ों मूर्तियाँ तोड़ी गई , सैकड़ों हिन्दुओं का वध किया गया तथा कितने ही जीवित जला दिये गये , परन्तु वे मूर्तियाँ उनकी रक्षा न कर सकीं । सच पूछो तो इस भ्रामक विचार ने हिन्दुओं को नपुंसक बना दिया । यदि हिन्दू इन मूर्तियों का आश्रय न लेकर शूरवीर योद्धाओं की शरण लेते और उन्हें ही खिलाते – पिलाते और उनकी सेवा करते तो वे समय पर कुछ कर दिखाते और हिन्दुओं की रक्षा करते , परन्तु खेद है कि हिन्दुओं ने वीरपूजा न की जिससे दिन – प्रतिदिन विनाश की ओर जा रहे हैं ।
          इस बात को अनुभव करके ऋषि दयानन्द को कितना दुख हुआ । तनिक उनके शब्द पढ़िए । ऋषि दयानन्दजी सत्यार्थप्रकाश में लिखते हैं —
          “ हाय ! क्यों पत्थर की पूजा कर सत्यानाश को प्राप्त हुए ? क्यों परमेश्वर की भक्ति न की ? जो म्लेच्छों के दाँत तोड़ डालते और अपना विजय करते । देखो ! जितनी मूर्तियाँ पूजी हैं , उतनी शूरवीरों की पूजा करते तो भी कितनी रक्षा होती । पुजारियों ने इन पाषाणों की इतनी भक्ति की परन्तु एक भी मूर्ति उन शत्रुओं के सिर पर उड़के न लगी । जो किसी एक शूरवीर पुरुष की मूर्ति के सदृश्य सेवा करते , तो वह अपने सेवकों को यथाशक्ति बचाता , और उन शत्रुओं को मारता । ”
▪ ६ . जिन मन्दिरों को पाठशालाओं के रूप में प्रयोग करके लोगों में विद्या तथा धर्म का प्रचार करना अभिप्रेत था उन मन्दिरों में भंग व सुल्फा पीना सिखाकर हमारी सन्तान का विनाश किया जा रहा है ।
          अब तक हमने यह सिद्ध किया है कि मूर्तिपूजा का क्या अर्थ है तथा आर्यसमाज मूर्तिपूजा को कहाँ तक मानता है तथा इसका सनातनधर्म के साथ मूर्तिपूजा – विषय में क्या मतभेद है अर्थात् मूर्तिपूजा में क्या – क्या दोष हैं । अब इसके आगे हम यह बताना चाहते हैं कि किसी भी प्रकार की मूर्तिपूजा का ईशोपासना के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है । ईश्वर की पूजा आत्मा के द्वारा योगाभ्यास से ही की जा सकती है । मूर्तियों की पूजा से ईश्वर की प्राप्ति असम्भव है । जो लोग मूर्तिपूजा को ईश्वर की प्राप्ति का साधन मानते हैं , वे भूल करते हैं । हम आगे इसे कुछ और स्पष्ट करना चाहते हैं ।
▪ १ . क्या मूर्ति को ही परमेश्वर मानकर परमेश्वर के स्थान पर उसकी पूजा की जा सकती है ? यह बात कतई नहीं मानी जा सकती । कारण ? हमारे सनातनधर्मी भाई भी अब मूर्ती को परमेश्वर मानना छोड़ चुके हैं । यजुर्वेद के ४०वें अध्याय में लिखा है कि जो व्यक्ति परमेश्वर के स्थान पर प्रकृति की पूजा करता है , वह नरक में जाता है और जो परमेश्वर के स्थान पर प्रकृति की बनी हुई वस्तुओं की पूजा करता है वह महानरक में जाता है । इसलिए यह तो नहीं माना जा सकता है कि मूर्ति परमेश्वर है अथवा उसके स्थान पर मूर्ति की पूजा की जाती है ।
▪ २ . क्या मूर्ति परमेश्वर की है ? यह बात भी नहीं मानी जा सकती , क्योंकि मूर्ति उस वस्तु की बनाई जा सकती है जिसका रंग हो । जिस वस्तु का रंग न हो उसकी मूर्ति नहीं बनाई जा सकती । उदाहरण के लिए आकाश व वायु का रंग नहीं है आज तक किसी भी विद्वान् ने वायु व आकाश की मूर्ति बनाने में सफलता प्राप्त नहीं की फिर ईश्वर की मूर्ति तो बन ही कैसे सकती है ? परमेश्वर तो इनसे भी अधिक सूक्ष्म है । इसीलिए तो यजुर्वेद के बत्तीसवें अध्याय में लिखा है कि उस परमेश्वर की मूर्ति नहीं बन सकती । यदि कोई यह कहे कि परमेश्वर साकार है , इसलिए उसकी मूर्ति बन सकती है तो यह बात मिथ्या है , क्योंकि साकार वस्तु व्यापक नहीं को सकती । वह सीमित होगी और जो वस्तु सीमित होगी उसके गुण – कर्म – स्वभाव भी सीमित होंगे । इसलिए वह सृष्टि – रचना में समर्थ न हो सकेगी । यजुर्वेद के अनेक मन्त्रों में परमात्मा को निराकार व शरीर – रहित ही बताया गया है । यदि कहो कि परमेश्वर संसार में जन्म धारण करता है और जिस शरीर को परमात्मा धारण करता है उसकी मूर्तियाँ हैं तो भी असत्य है , क्योंकि परमेश्वर के जन्म लेने का कोई कारण नहीं बताया जा सकता ।
          यदि कहो कि भक्तों की रक्षा के लिए , तो यह कारण नहीं हो सकता । परमेश्वर बिना जन्म लिए ही भक्तों की रक्षा कर सकता है और अब भी करता है । यह बात बुद्धिगम्य नहीं है कि एक हाथी को मगरमच्छ नदी म

चौथा खंभा न्यूज़ .com /डॉ विवेक आर्य/ नसीब सैनी

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जेएनयू में फीस वृद्धि के नाम पर राजनीति

—यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं

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सुरेश हिन्दुस्थानी

देश के उच्च शिक्षा केन्द्र जब राजनीति के अड्डे बनने की ओर कदम बढ़ाने लगें, तब वहां की शिक्षा की दिशा-दशा क्या होगी, यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। फीस बढ़ोतरी के खिलाफ किया जाने वाला दिल्ली का छात्र आंदोलन कुछ इसी प्रकार का भाव प्रदर्शित कर रहा है, जहां केवल और केवल राजनीति ही की जा रही है। किसी भी आंदोलन की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके पीछे जनहित का कितना भाव है। दिल्ली का यह आंदोलन जनसरोकार से कोसों दूर दिखाई दे रहा है।

हालांकि इसके पीछे बहुत से अन्य कारण भी होंगे। सबसे बड़ा कारण तो यही है कि आज जेएनयू की जो छवि जनता के बीच बनी है, वह जनता को खुद ही दूर कर रही है। जिस विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारों की ध्वनि गूंजित होती है, वह कभी जन आंदोलन का हिस्सा नहीं बन सकते हैं।दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के जिन छात्रों ने कभी भारत के टुकड़े करने के नारे लगाए थे, आज वे ही छात्र फीस बढ़ोतरी के छोटे से मामले को राजनीतिक रुप देने का प्रयास करते दिखाई दे रहे हैं। इस छात्र आंदोलन का राजनीतिक स्वरुप इसलिए भी दिखाई दे रहा है, क्योंकि इसमें राष्ट्रीय मानबिन्दुओं और केन्द्र सरकार को सीधे निशाने पर लिया जा रहा है। जेएनयू वामपंथी विचारधारा का एक बड़ा केन्द्र रहा है।

वामपंथी धारा के कार्यकर्ता देश के महानायकों के बारे में क्या सोच रखते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। पिछले घटनाक्रमों को देखें तो पाएंगे कि जेएनयू में देश के विरोध में वातावरण बनाने का काम किया जाता रहा है। वहां आतंकवादी बुरहान वानी के समर्थन में कार्यक्रम किए जाते हैं। सवाल यह कि जेएनयू में शिक्षा के नाम पर आखिर क्या हो रहा है। जहां तक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में फीस बढ़ोतरी की बात है तो यह कहना तर्कसंगत ही होगा कि विगत 19 वर्ष से विश्वविद्यालय के छात्रावास के कमरों और भोजन का शुल्क नहीं बढ़ाया गया, जबकि पिछले 19 सालों में महंगाई का ग्राफ बहुत ऊपर गया है। इस सबका भार पूरी तरह से विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के कंधों पर ही आया। देश के अन्य विश्वविद्यालयों में भी शिक्षा महंगी हो रही है, जो जेएनयू के मुकाबले बहुत अधिक है। ऐसे में विश्वविद्यालय द्वारा कुछ हद तक फीस बढ़ाना न्यायोचित कदम ही है। जिसे वहां के कई छात्र भी सही मानते हैं। लेकिन यह आंदोलन इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि इसमें परदे के पीछे राजनीतिक कार्यकर्ता भूमिका निभा रहे हैं। यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं।

खैर… यह जांच का विषय हो सकता है।देश के प्रसिद्ध अधिवक्ता सांसद डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने इस छात्र आंदोलन के बारे में बहुत ही गहरी बात कही है। उनका मानना है कि जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय को कुछ समय के लिए बंद कर दिया जाए। उनके इस कथन के गहरे निहितार्थ निकल रहे हैं। स्वामी के संकेत को विस्तार से समझना हो तो एक बार जेएनयू की गतिविधियों का अध्ययन करना चाहिए। फिर वह सब सामने आ जाएगा जो वहां होता है। कहा जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जमकर राजनीति की जाती रही है। देश के जो शिक्षा केन्द्र राजनीति के केन्द्र बनते जा रहे हैं, उन पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है।

वर्तमान में जिस प्रकार से जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय का आंदोलन चल रहा है, उसे छात्र आंदोलन कहना न्याय संगत नहीं होगा। क्योंकि, यह विशुद्ध राजनीतिक आंदोलन है। फीस बढ़ोतरी का विरोध तो मात्र बहाना है। इस आंदोलन के समर्थन में देश की संसद में कांग्रेस और वामपंथी दलों की ओर से आवाज उठाई गई। इससे यही संदेश जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जो देश विरोधी नारे लगाए गए, उनके प्रति इन राजनीतिक दलों के समर्थन का ही भाव रहा होगा। इतना ही नहीं, जब भारत तेरे टुकड़े होंगे और हमें चाहिए आजादी जैसे नारे लगाए गए थे, तब भी कांग्रेस और वाम दलों ने खुलेआम समर्थन किया था। ऐसे में सवाल यह उठता है कि कहीं यही दोनों दल छात्रों को आंदोलन करने के लिए तो नहीं उकसा रहे? अगर यह सही है तो फिर केन्द्र सरकार को दोष देना सही नहीं कहा जा सकता।

जब से देश में राजनीतिक सत्ता का परिवर्तन हुआ है, तब से ही देश में उन संस्थानों की सक्रियता दिखाई देने लगी है, जो भारत के बारे में भ्रम का वातावरण बनाने में सहायक हो सकते हैं। चाहे वह शहरी नक्सलवाद को प्रायोजित करने वाले कथित बुद्धिजीवियों की संस्था हो या फिर उनके विचार को अंगीकार करने वाली ही संस्थाएं क्यों न हों। सभी केन्द्र सरकार का विरोध करने के लिए आगे आ रहे हैं। इस विश्वविद्यालय में पढ़ाई करने वाले छात्र कभी भारतीय सेना द्वारा की जाने वाली आतंकियों के विरोध में कार्यवाही पर सवाल उठाते दिखाई देते हैं तो कभी अनुच्छेद 370 को हटाने का विरोध करते हैं। चार वर्ष पूर्व जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में छात्र संघ की उपाध्यक्ष रहीं शेहला राशिद ने भारतीय सेना के विरोध में जमकर भड़ास निकाली थी, जबकि सेना की ओर से स्पष्ट कहा गया था कि ऐसा कुछ भी नहीं है। इससे समझ में आ सकता है कि इस विश्वविद्यालय में कौन-सा पाठ पढ़ाया जाता है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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—गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है

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मनोज ज्वाला

एक मीडिया संस्थान के सर्वेक्षण के अनुसार हमारे देश के पढ़े-लिखे और शहरी नौजवानों में से आधे से अधिक ऐसे हैं, जो अपने देश को पसंद नहीं करते। वे विदेशों में जाकर बस जाना चाहते हैं। लगभग दो साल पहले के उक्त सर्वेक्षण के मुताबिक उनमें से 75 फीसदी युवाओं का कहना था कि वे बे-मन और मजबूरीवश भारत में रह रहे हैं। 62.08 फीसदी युवतियों और 66.01 फीसदी युवाओं का मानना था कि भारत  में उनका भविष्य सुरक्षित नहीं है। क्योंकि, यहां अच्छे दिन आने की संभावना कम है। उनमें से 50 फीसदी का मानना था कि भारत में किसी महापुरुष का अवतरण होगा, तभी हालात सुधर सकते हैं, अन्यथा नहीं।

40 फीसदी युवाओं का मानना था कि उन्हें अगर इस देश का प्रधानमंत्री बना दिया जाए, तो वे पांच साल में इस देश का कायापलट कर देंगे।अखबार का वह सर्वेक्षण आज भी बिल्कुल सही लगता है। अगर व्यापक स्तर पर सर्वेक्षण किया जाता, तो देश छोड़ने को तैयार युवाओं का प्रतिशत और अधिक दिखता। वह सर्वेक्षण तो सिर्फ शहरों तक सीमित था। अपने देश में गांवों पर भी तेजी से शहर छाते जा रहे हैं। गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है। गौर कीजिए कि देश छोड़ने को तैयार वे युवा पढ़े-लिखे हैं और शहरों में पले-बढ़े हैं। वे किस पद्धति से किस तरह के विद्यालयों में क्या पढ़े-लिखे हैं और किस रीति-रिवाज से कैसे परिवारों में किस तरह से पले-बढ़े हैं, यह ज्यादा गौरतलब है।

विद्यालय सरकारी हों या गैर सरकारी, सभी में शिक्षा की पद्धति एक है और वह है मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा पद्धति। भारतीयता विरोधी इसी शिक्षा पद्धति को सरकारी मान्यता प्राप्त है। सरकार का पूरा तंत्र इसी तरह की शिक्षा के विस्तार में लगा हुआ है। वैसे अंग्रेजी माध्यम वाले विद्यालय सबसे अच्छे माने जाते हैं और गैर-सरकारी निजी क्षेत्र के अधिकतर विद्यालय अंग्रेजी माध्यम के ही हैं। शहरों में ऐसे ही विद्यालयों की भरमार है और जिन युवाओं के बीच उक्त मीडिया संस्थान ने उपरोक्त सर्वेक्षण किया उनमें से सर्वाधिक युवा ऐसे ही तथाकथित ‘उत्कृष्ट’ विद्यालयों से पढ़े-लिखे हुए हैं। अब रही बात यह कि इन विद्यालयों में आखिर शिक्षा क्या और कैसी दी जाती है, तो यह इन युवाओं की उपरोक्त सोच से ही स्पष्ट है।

जाहिर है, उन्हें शिक्षा के नाम पर ऐसी-ऐसी डिग्रियां दी जाती हैं, जिनके कारण वे महात्वाकांक्षी, स्वार्थी बनकर असंतोष, अहंकार, खीझ, पलायन एवं हीनता-बोध से ग्रसित हो जाते हैं और कमाने-खाने भर थोड़े-बहुत हुनर हासिल कर स्वभाषा व स्वदेश के प्रति ‘नकार’ भाव से पीड़ित होकर विदेश चले जाते हैं।थॉमस विलिंग्टन मैकाले कोई शिक्षा-शास्त्री नहीं था। वह एक षड्यंत्रकारी था, जिसने भारत पर ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जड़ें जमाने की नीयत से भारतीय शिक्षा-पद्धति की जड़ें उखाड़कर मौजूदा शिक्षा-पद्धति को प्रक्षेपित किया था। जो आज भी उसी रूप में कायम है। 20 अक्टूबर 1931 को लंदन के रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ फौरन अफेयर्स के मंच से महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘अंग्रेजी शासन से पहले भारत की शिक्षा-व्यवस्था इंग्लैण्ड से भी अच्छी थी।’ उस पूरी व्यवस्था को सुनियोजित तरीके से समूल नष्ट कर देने के पश्चात ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जरूरतों के मुताबिक उसके रणनीतिकारों ने लम्बे समय तक बहस-विमर्श कर के मैकाले की योजनानुसार यह शिक्षा-पद्धति लागू की थी।

मैकाले ने ब्रिटिश पार्लियामेंट की शिक्षा समिति के समक्ष कहा था ‘हमें भारत में ऐसा शिक्षित वर्ग तैयार करना चाहिए, जो हमारे और उन करोड़ों भारतवासियों के बीच जिन पर हम शासन करते हैं, उन्हें समझाने-बुझाने का काम कर सके। जो केवल खून और रंग की दृष्टि से भारतीय हों, किन्तु रुचि, भाषा व भावों की दृष्टि से अंग्रेज हों।’ विदेशों में बस जाने को उतावले भारतीय युवाओं ने पूरी मेहनत व तबीयत से मैकाले शिक्षा-पद्धति को आत्मसात किया है, ऐसा समझा जा सकता है। यहां प्रसंगवश मैकाले के बहनोई चार्ल्स ट्रेवेलियन द्वारा ब्रिटिश पार्लियामेंट की एक समिति के समक्ष ‘भारत में भिन्न-भिन्न शिक्षा-पद्धतियों के भिन्न-भिन्न परिणाम’ शीर्षक से प्रस्तुत किये गए एक लेख का यह अंश भी उल्लेखनीय है कि ‘मैकाले शिक्षा-पद्धति का प्रभाव अंग्रेजी राज के लिए हितकर हुए बिना नहीं रह सकता। हमारे पास उपाय केवल यही है कि हम भारतवासियों को यूरोपियन ढंग की उन्नति में लगा दें। इससे हमारे लिए भारत पर अपना साम्राज्य कायम रखना बहुत आसान और असंदिग्ध हो जाएगा।’ ऐसा ही हुआ। बल्कि, मैकाले की योजना तो लक्ष्य से ज्यादा ही सफल रही।

हमारे देश के मैकालेवादी राजनेताओं ने अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासन की समाप्ति के बाद भी उनकी अंग्रेजी-मैकाले शिक्षा-पद्धति को न केवल यथावत कायम रखा, बल्कि उसे और ज्यादा अभारतीय रंग-ढंग में ढाल दिया। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष लक्षित प्राचीन भारतीय शिक्षा-पद्धति को अतीत के गर्त में डालकर शिक्षा को उत्पादन-विपणन-मुनाफा-उपभोग-केन्द्रित बना देने और उसे नैतिक सांस्कृतिक मूल्यों से विहीन कर देने तथा राष्ट्रीयता के प्रति उदासीन बना देने का ही परिणाम है कि हमारी यह युवा पीढ़ी महज निजी सुख-स्वार्थ के लिए अपने देश से विमुख हो जाना पसंद कर रही है। उसे विदेशों में ही अपना भविष्य दीख रहा है।

माना कि हमारे देश में तरह-तरह की समस्याएं हैं, किन्तु इनसे जूझने और इन्हें दूर करने की बजाय पलायन कर जाने अथवा कोरा लफ्फाजी करने कि हमें प्रधानमंत्री बना दिया जाए तो हम देश को सुंदर बना देंगे, अति महात्वाकांक्षा-युक्त मानसिक असंतुलन का ही द्योत्तक है। लेकिन आधे से अधिक ये शहरी युवा मानसिक रुप से असंतुलित नहीं हैं, बल्कि असल में वे पश्चिम के प्रति आकर्षित हैं। इसके लिए हमारे देश की चालू शिक्षा-पद्धति का पोषण करने वाले हमारे राजनेता ही जिम्मेवार हैं। यह ‘यूरोपियन ढंग की उन्नति’ के प्रति बढ़ते अनावश्यक आकर्षण का परिणाम है। इस मानसिक पलायन को रोकने के लिए जरूरी है कि हम अपने बच्चों को हमारे राष्ट्र की जड़ों से जोड़ने वाली और संतुलित समग्र मानसिक विकास करने वालीप्राचीन भारतीय पद्धति से भारतीय भाषाओं में समस्त ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा देने की सम्पूर्ण व्यवस्था कायम करें।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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भाई-बहन में प्रेम भाव बढ़ाता है भैया दूज

–बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था

Published

योगेश कुमार गोयल

(भैया दूज, 29 अक्टूबर पर विशेष)

भाई-बहन के दिलों में पावन संबंधों की मजबूती और प्रेमभाव स्थापित करने वाला पर्व है भैया दूज। इस दिन बहनें अपने भाईयों को तिलक लगाकर ईश्वर से उनकी दीर्घायु की कामना करती हैं। कहा जाता है कि इससे भाई यमराज के प्रकोप से बचे रहते हैं। दीपावली के दो दिन बाद अर्थात कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाए जाने वाले इस पर्व को ‘यम द्वितीया’ व ‘भ्रातृ द्वितीया’ के नाम से भी जाना जाता है। बहुत से भाई-बहन सौभाग्य तथा आयुष्य की प्राप्ति के लिए इस दिन यमुना अथवा अन्य पवित्र नदियों में साथ-साथ स्नान भी करते हैं। भैया दूज मनाने के संबंध में कई किवंदतियां प्रचलित हैं। एक कथा यमराज और उनकी बहन यमुना देवी से संबंधित है। बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था। यमुना अपने भाई यमराज से बहुत स्नेह करती थीं और अक्सर उनसे अनुरोध करती रहती थीं कि वे अपने इष्ट-मित्रों सहित उसके घर भोजन के लिए पधारें लेकिन यमराज हर बार उसके निमंत्रण को किसी न किसी बहाने से टाल जाते। कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमुना ने यमराज को एक बार फिर भोजन के लिए आमंत्रित किया।

उस समय यमराज ने विचार किया कि मैं तो अपने कर्त्तव्य से बंधा सदैव प्राणियों के प्राण ही हरता हूं। इसलिए इस चराचर जगत में कोई भी मुझे अपने घर नहीं बुलाना चाहता। लेकिन बहन यमुना तो मुझे बार-बार अपने घर आमंत्रित कर रही है। इसलिए अब तो उसका निमंत्रण स्वीकार करना ही चाहिए।यमराज को अपने घर आया देख यमुना की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने भाई का खूब आदर-सत्कार करते हुए उनके समक्ष नाना प्रकार के व्यंजन परोसे। बहन के आतिथ्य से यमराज बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे कोई वर मांगने को कहा। इस पर यमुना ने उनसे अनुरोध किया कि आप प्रतिवर्ष इसी दिन मेरे घर आकर भोजन करें और मेरी तरह जो भी बहन इस दिन अपने भाई का आदर-सत्कार करे, उसे तुम्हारा भय न रहे। यमराज ने बहन यमुना को उसका इच्छित वरदान दे दिया। ऐसी मान्यता है कि उसी दिन से ‘भैया दूज’ का पर्व मनाया जाने लगा। भैया दूज के संबंध में और भी कई कथाएं प्रचलित हैं। ऐसी ही एक कथा के अनुसार, एक ब्राह्मण की दो संतानें थी।

एक पुत्र एवं एक पुत्री। पुत्री बहुत समझदार एवं गुणवती थी। वह अपने भाई से जी-जान से प्यार करती थी। एक दिन उसका भाई उससे मिलने उसकी ससुराल पहुंचा। उस समय वह सूत कातने में व्यस्त थी। अतः उसे भाई के आने का पता ही न चल सका। भाई भी बिना कुछ बोले चुपचाप एक ओर बैठा रहा। जब थोड़ी देर बाद बहन की नजर उस पर पड़ी तो भाई को अपने घर आया देख उसे बेहद खुशी हुई। उसने भाई का भरपूर आदर-सत्कार किया। अगले दिन भाई को वापस लौटना था। अतः रास्ते के लिए वह आटे के पकवान बनाने के उद्देश्य से चक्की में आटा पीसने लगी। अनजाने में चक्की में बैठा सांप भी आटे के साथ पिस गया। उसी आटे के पकवान एक पोटली में बांधकर उसने भाई को रास्ते में खाने के लिए देकर विदा किया। भाई के घर से जाने के बाद जब उसे यह मालूम हुआ कि आटे में सांप पिस गया है तो अपने पुत्र को पालने में ही सोता छोड़कर वह अपने भाई के प्राणों की रक्षा के लिए दौड़ी। कुछ दूर जाने पर उसे एक पेड़ की छांव में अपना भाई सोता दिखाई दिया। तब तक उसने पोटली में से कुछ भी नहीं खाया था। उसने भगवान का शुक्रिया अदा किया और पोटली उठाकर दूर फेंक दी तथा भाई के साथ मायके की ओर चल दी।

रास्ते में उसने देखा कि भारी-भारी शिलाएं आकाश में उड़ रही हैं। उसने एक राहगीर से इस रहस्य के बारे में जानना चाहा तो उसने बताया कि जो बहन अपने भाई पर कभी नाराज न होती हो और उसे दिलो-जान से चाहती हो, उस भाई की शादी के समय ये शिलाएं उसकी छाती पर रखी जाएंगी। थोड़ी दूर चलने पर उसे नाग-नागिन दिखाई दिए। नाग ने बताया कि ये शिलाएं जिस व्यक्ति की छाती पर रखी जाएंगी, हम उसे डंस लेंगे। जब बहन ने इस विपत्ति से बचने का उपाय पूछा तो नाग-नागिन ने बताया कि अगर भाई के विवाह के समय उसके सभी कार्य बहन स्वयं करे, तभी भाई की जान बच सकती है।जब उसके भाई के विवाह के लग्न का शुभ मुहूर्त आया तो वह भाई को पीछे धकेलती हुई स्वयं ही लग्न चढ़वाने के लिए आगे हो गई और घोड़ी पर भी स्वयं चढ़ गई। परिवारजन और संबंधी उसके इस विचित्र व्यवहार से हैरान तथा क्रोधित थे। उसके घोड़ी पर चढ़ते ही शिलाएं उड़ती-उड़ती आई लेकिन घोड़ी पर किसी पुरूष की जगह एक महिला को बैठी देख वापस मुड़ गई। जब सुहागरात का समय आया तो वह भाई को पीछे कर खुद भाभी के साथ सोने उसके कमरे में चली गई।

परिवार के सभी सदस्य तथा सभी रिश्तेदार उसके इस अजीबोगरीब व्यवहार से बेहद आश्चर्यचकित और खफा थे। उन्हें उस पर गुस्सा तो बहुत आ रहा था लेकिन उसके जिद के समक्ष सभी विवश थे। सुहागरात पर नियत समय पर नाग-नागिन उसके भाई को डंसने कमरे में पहुंच गए लेकिन उसने नाग-नागिन को मारने की सारी तैयारी पहले ही कर रखी थी। आखिरकार उसने नाग-नागिन का काम तमाम कर दिया। उसके बाद वह निश्चिंत होकर सो गई। सुबह होने पर सभी मेहमानों को विदा करने के बाद परिवार वालों ने सोचा कि अब इस बला को भी कुछ बचा-खुचा देकर यहां से चलता कर दिया जाए लेकिन नींद से जागने पर जब उसने पूरी घटना के बारे में सब को विस्तार से बताया कि किस प्रकार वह अपने बच्चे को पालने में ही सोता छोड़कर दौड़ी-दौड़ी भाई के प्राण बचाने के लिए उसके पीछे चली आई और सभी को नाग-नागिन के मृत शरीर दिखाए तो सभी की आंखों में आंसू आ गए।

भाई के प्रति उसका असीम प्यार तथा समर्पण भाव देखकर उसके प्रति सभी का हृदय श्रद्धा से भर गया।भाई-भाभी तथा माता-पिता ने उसे ढेर सारे उपहारों से लादकर बड़े मान-सम्मान के साथ खुशी-खुशी ससुराल से विदा किया। भाई-बहन के बीच इसी प्रकार के पावन संबंध, प्रेमभाव तथा उनके दिलों में आपसी संबंधों को मजबूत बनाने के लिए ही ‘भैया दूज’ पर्व मनाया जाता है।

(लेखक स्तंभकार हैं।)

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