Connect with us

लेख

वे पन्द्रह दिन भाग 12/15

कश्मीर के महाराजा ने उनके प्रधानमंत्री रामचंद्र काक को बर्खास्त कर दिया है. प्रधानमंत्री के रूप में काक का केवल दो वर्षों का कार्यकाल अत्यधिक विवादित रहा है. उन्होंने काँग्रेस और जवाहरलाल नेहरू से खुली दुश्मनी मोल ले ली थी.

Published

on

आज मंगलवार, १२ अगस्त. आज परमा एकादशी है. चूंकि इस वर्ष पुरषोत्तम मास सावन महीने में आया है, इसलिए इस पुरषोत्तम मास में आने वाली एकादशी को परमा एकादशी कहते हैं.

कलकत्ता के नजदीक स्थित सोडेपुर आश्रम में गांधीजी के साथ ठहरे हुए लोगों में से दो-तीन लोगों का परमा एकादशी का व्रत हैं. उनके लिए विशेष फलाहार की व्यवस्था की गई. लेकिन गांधीजी के दिमाग में कल रात को सुहरावर्दी के साथ हुई भेंट घूम रही हैं.

शहीद सुहरावर्दी.

इस नाम में ‘शहीद’ शब्द का बलिदान से कतई कोई सम्बन्ध नहीं है. यदि हुआ भी तो वह ‘दूसरों की हत्या करने वाला’ जैसा ही सम्बन्ध है. १९४६ के ‘डायरेक्ट एक्शन’ का खलनायक सुहरावर्दी, उस घटना के एक वर्ष बाद गांधीजी से भेंट करने आया हैं. ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ वाले दिन अत्यंत क्रूरता और बर्बरता से पांच हजार हिंदुओं की हत्या का पाप अपने माथे पर लिए शान से घूम रहा है. अत्यंत धूर्त, स्त्री-लम्पट, व्यसनी और क्रूर सुहरावर्दी देखने में एकदम पढ़ा-लिखा और सभ्य व्यक्ति लगता हैं. बड़े ही आधुनिक कपड़े पहनता हैं. कट्टर मुसलमान होने के बावजूद इस मामले में वह अंग्रेजीदां ही है.

आज गांधीजी की प्रार्थना में काफी भीड़ है. कुछ पत्रकार भी सामने बैठे दिखाई दे रहे हैं. भजन और सूत कातने के बाद गांधीजी बोलना आरम्भ करते हैं, “अब केवल दो दिन बाद ही, आने वाला पन्द्रह अगस्त, भारत के इतिहास में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण दिवस सिद्ध होने जा रहा है. मैंने सुना है कि कलकत्ता के कुछ मुसलमान इस दिवस को ‘शोक दिवस’ के रूप में मनाने जा रहे हैं. मैं आशा करता हूं कि यह समाचार गलत होगा. ज़ाहिर है कि यह महत्त्वपूर्ण दिवस कैसे मनाना चाहिए इस बारे में प्रत्येक व्यक्ति का दृष्टिकोण अलग होगा. और वैसे भी हम किसी पर भी, यह दिन विशिष्ट पद्धति से मनाने के लिए जबरदस्ती नहीं करेंगे. अब प्रश्न यह है कि पाकिस्तान के हिंदुओं को क्या करना चाहिए..? तो मेरा जवाब यही है कि उन्हें पाकिस्तान के राष्ट्रध्वज को प्रणाम करना चाहिए.”

“मैंने यह भी सुना है कि भारत में पुर्तगाल और फ्रांस शासित राज्यों (अर्थात गोवा, दमण, दीव, पांडिचेरी आदि) में रहने वाले भारतीय भी पन्द्रह अगस्त के दिन स्वतंत्रता की घोषणा करने वाले हैं. यह पूरी तरह से मूर्खता है. इसका अर्थ यही निकाला जाएगा कि हम भारतीयों में घमण्ड आ गया है. अभी ब्रिटिश भारत छोड़कर जा रहे हैं, फ्रेंच अथवा पुर्तगाली नहीं. मेरा यह मानना है कि इन राज्यों में रहने वाले भारतीय भी, आज नहीं तो कल, स्वतंत्र हो ही जाएंगे. परन्तु उन्हें आज क़ानून अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए.”

“कल रात को शहीद साहब सुहरावर्दी मुझसे भेंट करने आए थे. उन्होंने मुझसे कहा है कि ऐसी अशांत परिस्थिति में मुझे कलकत्ता छोड़कर नहीं जाना चाहिए. उन्होंने मुझसे अनुरोध किया है कि मैं कलकत्ता में अपना मुकाम कुछ दिन और बढ़ाऊं और जब तक पूर्ण शान्ति स्थापित नहीं हो जाती, तब तक मैं यहीं रहूं.”

“उनका यह अनुरोध स्वीकार करने के लिए मैंने सुहरावर्दी साहब के सामने एक शर्त रखी है. और वह शर्त है कि कलकत्ता के किसी अशांत स्थान पर सुहरावर्दी साहब मेरे साथ एक छत के नीचे रहें और उस स्थान पर पुलिस अथवा सेना की कोई सुरक्षा नहीं हो. अगले एक-दो दिनों में सीमा आयोग का निर्णय घोषित होगा और विभाजन की निश्चित रेखा स्पष्ट हो जाएगी. ऐसे कठिन समय पर हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों को ही उस आयोग के निर्णय का सम्मान करना आवश्यक है.”

____ ____ ____ ____

श्रीनगर.

 

कुछ कश्मीर के महाराजा ने उनके प्रधानमंत्री रामचंद्र काक को बर्खास्त कर दिया है. प्रधानमंत्री के रूप में काक का केवल दो वर्षों का कार्यकाल अत्यधिक विवादित रहा है. उन्होंने काँग्रेस और जवाहरलाल नेहरू से खुली दुश्मनी मोल ले ली थी.

माह पूर्व, जब १९ से २३ जून के बीच लॉर्ड माउंटबेटन काश्मीर में प्रवास पर आए थे, तब उन्होंने महाराज से निवेदन किया था कि कश्मीर का विलीनीकरण पाकिस्तान में कर दिया जाए. उस समय महाराज ने यह सलाह सिरे से ठुकरा दी थी. लेकिन इसके बाद काक महाशय ने यह पैंतरा चला था कि कश्मीर का विलीनीकरण यदि पाकिस्तान में नहीं हो रहा हो, तो वह भारत में भी नहीं होना चाहिए. काक ने महाराज को सलाह दी कि कश्मीर को स्वतंत्र ही रखें.

नौ-दस दिन पहले, यदि गांधीजी ने अपनी श्रीनगर यात्रा में स्पष्ट रूप से अपना मत रखा होता कि ‘कश्मीर का विलय भारत में ही होना चाहिए’, तो संभवतः कई बातें बेहद सरल हो जातीं. लेकिन गांधीजी के लिए भारत और पाकिस्तान दोनों ही उनकी अपनी संतानें लगती थीं, इसलिए उन्होंने कश्मीर के विलीनीकरण के बारे में कुछ भी नहीं कहा. नेहरू के आग्रह पर गांधीजी ने ‘रामचंद्र काक को निकाल दीजिए’, इतना ही सुझाव महाराज को दिया.

गांधीजी की इस सलाह का सम्मान करते हुए महाराजा हरिसिंह ने उसे अमल में लाया और मूलतः हिमाचल प्रदेश के परन्तु महाराज के रिश्तेदार, ‘जनक सिंह’ को कश्मीर का नया प्रधानमंत्री घोषित किया. रामचंद्र काक ने भागने का प्रयास किया, परन्तु वे सफल नहीं हुए. महाराजा हरिसिंह ने उन्हें घर में ही नजरबन्द रखने का आदेश दिया.

अब कश्मीर की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू हो चुका है.

____ ____ ____ ____

दिल्ली.

भारत सरकार के कार्मिक मंत्रालय का एक आदेश निकला है, जिसमें डॉक्टर जीवराज मेहता को ‘डायरेक्टर जनरल ऑफ मेडिकल सर्विसेस’ के रूप में नियुक्ति प्रदान की गई है. ब्रिटिश शासन की दृष्टि से यह एक ऐतिहासिक घटना है. क्योंकि ऐसा पहली ही बार हुआ है कि ‘इण्डियन मेडिकल सर्विस’ से बाहर के किसी चिकित्सक की इस सर्वोच्च पद पर नियुक्ति हुई है.

डॉक्टर जीवराज मेहता, गांधीजी के निजी चिकित्सक हैं और पिछले बीस वर्षों से वे ही गांधीजी के स्वास्थ्य का ध्यान रखते आए हैं.

____ ____ ____ ____

पांडिचेरी.

भारत की फ्रेंच सरकार ने आज की अपनी बैठक में सभाओं और रैलियों पर लगाया हुआ प्रतिबन्ध समाप्त कर दिया. ‘इस मामले में गिरफ्तार किए गए लोगों को जल्दी ही छोड़ दिया जाएगा’ यह घोषणा भी की गई है
.
भारत में फ्रेंच गवर्नर और अन्य फ्रेंच अधिकारियों ने पेरिस से वापस आते ही कलकत्ता में गांधीजी से भेंट की और इसके बाद ही यह घोषणा की गई है. यह घोषणा पांडिचेरी के साथ ही माहे और चंदननगर में भी लागू मानी जाएगी.

____ ____ ____ ____

लाहौर.

कल रात से ही लाहौर में भड़के भीषण दंगों ने अब रौद्र रूप धारण कर लिया है. कल किसी ने यह अफवाह उड़ा दी थी कि रेडक्लिफ के सीमा आयोग ने लाहौर को भारत में शामिल करने का निश्चय कर लिया है.

बस फिर क्या था..! मुस्लिम नेशनल गार्ड के लोग तो इसी अवसर की प्रतीक्षा में थे. उनकी तरफ से तो हिंसा की पूरी तैयारी थी. इस अफवाह के कारण सामान्य मुसलमान भी आक्रोशित हो उठा. कल रात से ही आगजनी की घटनाएं शुरू हो गई थीं. लाहौर के कुछ इलाकों में संघ के स्वयंसेवकों ने अदभुत एवं अतुलनीय शौर्य का प्रदर्शन करते हुए, कई हिन्दू-सिखों के प्राण बचाए. संघ कार्यालय हिन्दू मोहल्ले में होने के बावजूद ‘मुस्लिम नेशनल गार्ड’ इस पर हमला करेंगे ऐसी सूचना मिलने के कारण बहुतसे स्वयंसेवक, संघ कार्यालय की रक्षा के लिए वहां रात भर मजबूती से डटे रहे.

आज सुबह दस बजे से ही मुस्लिम गुण्डों के आक्रमण और भी तीव्र होते चले गए. साथ ही, चूंकि सिख अपने पहनावे के कारण जल्दी पहचान में आ जाते हैं, इसलिए सिखों पर ही सबसे ज्यादा हमले हुए. डिप्टीगंज नामक हिन्दू-सिख बहुल इलाके में सुबह ग्यारह बजे एक प्रौढ़ सिख व्यक्ति को मुस्लिम गुण्डों ने सरेराह और दिनदहाड़े क़त्ल कर दिया. उसकी अंतडियां बाहर निकाल लीं. वह सिख रास्ते के बीचोंबीच तडपता रहा और मात्र पांच मिनट में ही उसने दम तोड़ दिया.

लाहौर की सड़कों पर अत्यंत भयानक और पाशविक अत्याचार जारी थे. दोपहर तीन बजे तक अधिकृत रूप से मृतकों की संख्या पचास पार कर चुकी थी. इन मृतकों में अधिकांश हिन्दू और सिख ही थे. ऐसे थोड़े बहुत भाग्यशाली लोग थे जो अस्पताल पहुंच सके. उनके ज़ख्म इतने विचित्र, भयानक और गहरे थे कि डॉक्टर और नर्सें भी एक-एक घायल के साथ अक्षरशः मृत्यु से युद्ध कर रहे थे. दोपहर आते-आते लाहौर के दंगों की आग गुरुदासपुर और लायलपुर तक पहुंच चुकी थी.

अंततः दोपहर चार बजे गवर्नर जेनकिंस ने लॉर्ड माउंटबेटन को टेलीग्राम भेजा कि लाहौर और अमृतसर की पुलिस पर भरोसा नहीं किया जा सकता. ‘मुस्लिम नेशनल गार्ड’ के कार्यकर्ता पुलिस की वर्दी में दंगे कर रहे हैं. परिस्थिति नियंत्रण से बाहर हो चुकी है.

इधर लाहौर जल रहा हैं… लाहौर के साथ ही पूरा पंजाब भी जलने की कगार पर हैं. लेकिन दिल्ली में बैठे सत्ताधीशों को इससे कोई खास फर्क पड़ता नहीं दिख रहा.

____ ____ ____ ____

कलकत्ता… दोपहर के दो बजे हैं.

कलकत्ता बंदरगाह के ढाई लाख मुसलमान खलासियों की तरफ से एक पैम्फलेट प्रकाशित किया गया है. इस पैम्फलेट में मुस्लिम खलासियों के संगठन ने धमकी दी है कि ‘यदि कलकत्ता को पाकिस्तान में शामिल नहीं किया गया, तो वे अनिश्चितकालीन हड़ताल करेंगे’. इसमें आगे कहा गया है कि सन १६९० से, जब से कलकत्ता बंदरगाह का निर्माण हुआ है, तभी से यह मुस्लिमों के नियंत्रण में है. इस कारण हिन्दू बहुल पश्चिम बंगाल को इसे देना किसी भी अर्थ में उचित नहीं कहा जा सकता…’

____ ____ ____ ____

कलकत्ता… सोडेपुर आश्रम, दोपहर दो बजे.

आश्रम में गांधीजी झपकी ले रहे हैं. इस कारण अखंड बंगाल के ‘प्रधानमंत्री’, हुसैन शहीद सुहरावर्दी की ओर से आए हुए, कलकत्ता के पूर्व महापौर उस्मान के सामने इंतज़ार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.

तीन बजे उस्मान की गांधीजी से भेंट हुई. उस्मान अपने साथ शहीद सुहरावर्दी का एक पत्र लेकर आए हैं. इस पत्र में सुहरावर्दी ने गांधीजी के साथ एक ही छत के नीचे रहने वाला प्रस्ताव मान्य कर लिया है. यह पत्र पढ़ते समय गांधीजी के चश्मे के अंदर से चमकने वाली उनकी आंखें स्पष्ट दिखाई दे रही हैं. अनेक लोगों ने गांधीजी से कहा था कि ‘सुहरावर्दी पर विश्वास नहीं करना चाहिए. यह एक अहले दर्जे का बदमाश व्यक्ति है’. परन्तु किसी व्यक्ति के बारे में ऐसी कोई भी राय कायम करना गांधीजी को मंजूर नहीं था. इसीलिए उन्होंने इस व्यक्ति के साथ एक छत के नीचे रहने का प्रयोग करके देखना निश्चित किया.

____ ____ ____ ____

कराची, दोपहर के दो बजे.

अब कुछ ही दिनों के लिए शेष रह गए कराची के कांग्रेस कार्यालय से एक प्रेसनोट तमाम अखबारों को भिजवाने के लिए तैयार हो चुकी है. यह प्रेस नोट कांग्रेस के अखिल भारतीय अध्यक्ष आचार्य जे. बी. कृपलानी की है. आचार्य कृपलानी स्वयं कराची में उपस्थित हैं, परन्तु कांग्रेस कार्यालय में जो भी बचे-खुचे कार्यकर्ता हैं, उनमें कृपलानी से भेंट करने का कतई कोई उत्साह दिखाई नहीं दे रहा.

इस प्रेसनोट में, कृपलानी ने कल लियाकत अली खान द्वारा उन पर एवं कांग्रेस पार्टी पर जो आरोप लगाए हैं, उनका खंडन किया है. “कल लियाकत अली खान ने मुझ पर आरोप लगाया है कि मैं सिंध के हिंदुओं को भड़का रहा हूं और उन्हें सरकार के खिलाफ विद्रोह के लिए उकसा रहा हूं…’. मैं इस आरोप का पूरी तरह से खंडन करता हूं. अपनी कुछ सभाओं में मैंने जिस नारे का उल्लेख किया है, उसमें कहा गया है कि ‘हँस के लिए है पाकिस्तान, लड़ के लेंगे हिन्दुस्तान’. इस सन्दर्भ में मैंने हिन्दू और मुसलमान, दोनों से ही इस प्रकार की भडकाऊ नारेबाजी बन्द करने का आग्रह किया है. ऐसे नारे लगाने वालों से मैंने कहा है कि यदि भारतीय सेना पाकिस्तान की सीमा पर आएगी, तो पाकिस्तान के हिंदुओं को बहुत ही बुरी परिस्थिति का सामना करना पड़ेगा. इसी प्रकार यदि पाकिस्तानी सैनिक भारतीय सीमा पर पहुंचेंगे तो भारत के मुसलमानों की परिस्थिति बहुत की विकट हो जाएगी.”

कृपलानी ने आगे कहा कि “कांग्रेस ने अभी भी अखंड भारत की आशा छोड़ी नहीं है. परन्तु यह अखंड भारत शांतिपूर्ण मार्ग से प्राप्त किया जाना चाहिए, ऐसा हमारा प्रयास रहेगा.”

____ ____ ____ ____

दिल्ली का गवर्नर हाउस…

लॉर्ड माउंटबेटन का कार्यालय. लॉर्ड साहब अपनी खास आरामकुर्सी पर पीठ टिकाए, आंखें बन्द करके विचारमग्न बैठे हैं. उनकी आंखों के सामने भारत में अंग्रेजी साम्राज्य का विस्तीर्ण इतिहास एक चलचित्र की तरह आ रहा है. ठीक आज के ही दिन… हां आज के ही दिन, तत्कालीन अखंड भारत में अंग्रेजों का राजनैतिक प्रतिनिधित्व आरम्भ हुआ था. एकदम सटीक रूप से कहा जाए तो १२ अगस्त १७६५ के दिन ही ‘इलाहाबाद समझौता’ हुआ था. वैसे तो ईस्ट इण्डिया कम्पनी भारत में सन १६०० से काम कर रही थी. इसने भारत में अनेक समझौते भी किये. इलाहाबाद समझौते से पहले मुगलों से, विजापुरकर सल्तनत से, मराठों से, निज़ाम से… अनेकों से हुए. परन्तु यह सारे समझौते ‘व्यापारिक’ किस्म के थे. सबसे पहले, बक्सर के युद्ध के बाद, अंग्रेजों ने पहली बार राजनैतिक स्वरूप का समझौता जिसके साथ किया, वह मुग़ल बादशाह शाह आलम (द्वितीय) के साथ किया… यानी आज से ठीक १८२ वर्ष पहले.

तब से लेकर आज तक गंगा नदी में काफी पानी बह चुका है. इस बीच १८५७ का विद्रोह भी हो गया. लेकिन अब यह साम्राज्य केवल दो दिनों के बाद हम इन भारतीयों को सौंपने जा रहे हैं.

एक झटके से लॉर्ड साहब की आंख खुली. फ़िलहाल भूतकाल में झांकने का कोई फायदा नहीं. अभी तो वर्तमान की तरफ ध्यान देना जरूरी है. लॉर्ड साहब एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण विषय को पूरा करने जा रहे हैं. और यह विषय है अखंड हिन्दुस्तान की सेना का विभाजन. इसके द्वारा एयरफोर्स की दस स्क्वाड्रन में से दो पाकिस्तान को और आठ भारत को मिलेंगी. इसी प्रकार आर्मी और नेवी के विभाजन में भी दो यूनिट भारत को और एक पाकिस्तान को दी जाएगी, ऐसा विभाजन किया जा रहा है.

अलबत्ता, अप्रैल १९४८ तक फील्ड मार्शल सर क्लाउड अचिंलेक ही दोनों देशों की सेनाओं के सुप्रीम कमाण्डर रहेंगे. इसी प्रकार लॉर्ड माउंटबेटन भी जॉइंट डिफेन्स कौंसिल के चेयरमैन बने रहेंगे. स्वयं माउंटबेटन ने यह घोषणा की.

____ ____ ____ ____

लन्दन…

अंग्रेजों की राजधानी में रहने वाले भारतीय, स्वतंत्रता दिवस समारोह मनाने के लिए बहुत उत्साहित और उत्तेजित हैं. इण्डिया हाउस पर १५ अगस्त के दिन भव्य तरीके से तिरंगा फहराया जाने वाला है. इस कार्यक्रम के लिए ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली और उनके मंत्रिमंडल के सहयोगियों को आमंत्रित किया गया है. इस कार्यक्रम की अध्यक्षता करेंगे ब्रिटेन में भारतीय हाईकमिश्नर कृष्ण मेनन. यह कार्यक्रम १५ अगस्त को सुबह ग्यारह बजे होगा.

इसी के साथ लन्दन में अनेक सार्वजनिक स्थानों पर, छोटे-छोटे समूहों में भी स्वतंत्रता दिवस मनाया जाएगा. सभी भारतीय रेस्तरांओं को पन्द्रह अगस्त के दिन तिरंगे रंग से सजाया जाने वाला है. लन्दन के वेस्ट-एंड इलाके में भारतीय विद्यार्थियों ने यह आयोजन ‘स्वराज हाउस’ में मनाने का निश्चय किया है. इन्डियन वर्कर्स एसोसिएशन के भव्य समारोह में प्रमुख वक्ता रहेंगे भारत के समाजवादी आंदोलन के प्रमुख नेता अच्युतराव पटवर्धन.

भारत का स्वतंत्रता दिवस मनाने के लिए १४ अगस्त की रात को सवा ग्यारह बजे, सिंगापुर के नॉर्थ रिज रोड स्थित ‘रॉयल टॉकीज़’ में ‘धरती’ नामक हिन्दी फिल्म का खास शो दिखाया जाने वाला है. इस फिल्म में त्रिलोक कपूर और मुमताज़ शान्ति प्रमुख भूमिकाओं में हैं और यह फिल्म अन्य सभी स्थानों पर पहले ही काफी हिट हो चुकी है.

____ ____ ____ ____

कलकत्ता के बेलियाघाट की हैदरी मंज़िल…!

शहीद सुहरावर्दी के साथ एक छत के नीचे रहने के लिए गांधीजी ने यह स्थान चुना हैं. मूलतः यह इमारत एक अंग्रेज व्यापारी की थी. परन्तु १९२३ में पश्चिम भारत के शिया मुसलमानों में से एक, दाऊदी बोहरा समाज के कुछ लोगों ने कुछ प्रॉपर्टी कलकत्ता में खरीद ली थी. उन्हीं में से एक है, ‘हैदरी मंजिल’. शेख आदम नामक बोहरा व्यापारी ने यह इमारत खरीदी थी. अपनी मृत्यु से पहले शेख आदम ने यह स्थान अपनी बेटी हुसैनी बाई बंगाली के नाम कर दिया हैं. परन्तु फिलहाल इस स्थान पर सुहरावर्दी का कब्ज़ा है.

बेलियाघाट एक बेहद गंदा और मलिन परिसर है. हिन्दू-मुस्लिमों की मिश्रित जनसंख्या वाला, परन्तु फिर भी मुस्लिम बहुल इलाका. इस परिसर की यह इमारत वीरान पड़ी थी. यहां पर कोई भी नहीं रहता था. बड़े-बड़े चूहों का इमारत में साम्राज्य था.

परन्तु कल से गांधीजी और सुहरावर्दी यहां निवास करने वाले हैं, इसलिए इस इमारत का थोड़ा रंगरोगन और साफसफाई की जा रही है. बड़ी संख्या में कर्मचारी और कारीगर, शाम से ही इस स्थान को थोड़ा ठीकठाक स्वरूप में लाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

____ ____ ____ ____

मुंबई.

दादर स्थित ‘राष्ट्र सेविका समिति’ की एक कार्यकर्ता का मकान. रात के साढ़े नौ बजे हैं, परन्तु उस विशाल मकान में लगभग पैंतीस से चालीस सेविकाओं की बैठक चल रही है. राष्ट्र सेविका समिती की प्रमुख संचालिका, यानी लक्ष्मीबाई केळकर अर्थात ‘मौसीजी’, कल सुबह की फ्लाईट से कराची जाने वाली हैं. इसी सन्दर्भ में यह बैठक है. लगभग आठ दस दिन पहले हैदराबाद, सिंध की जेठी देवानी नामक सेविका का एक पत्र ‘मौसीजी’ को प्राप्त हुआ था. इस पत्र में उनके परिवार पर आई विपत्तियों और कठिन परिस्थिति का वर्णन था. वह पत्र पढ़कर ही लक्ष्मीबाई केलकर ने यह निर्णय लिया कि सिंध प्रांत में, विशेषकर कराची में, जाकर सेविकाओं की सारी व्यवस्थाएं ठीक करनी ही होंगी.

____ ____ ____ ____

खंडित स्वतंत्रता के लिए अब केवल ३ रातें ही बची हैं. सीमाओं पर दंगों की आग भडकी हुई है. पंजाब जैसे राज्य में तो मानो प्रशासन नाम की कोई चीज़ बाकी नहीं बची है. मुर्गियों, भेड़-बकरियों की तरह हिन्दू मारे जा रहे हैं. और इधर तीन जून को भारत का विभाजन स्वीकार करने वाले कांग्रेस के नेता, दिल्ली के राजनैतिक वातावरण में चौदह अगस्त की रात्रि वाले स्वतंत्रता समारोह की तैयारियों में लगे हुए हैं….!

लेख

जेएनयू में फीस वृद्धि के नाम पर राजनीति

—यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं

Published

सुरेश हिन्दुस्थानी

देश के उच्च शिक्षा केन्द्र जब राजनीति के अड्डे बनने की ओर कदम बढ़ाने लगें, तब वहां की शिक्षा की दिशा-दशा क्या होगी, यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। फीस बढ़ोतरी के खिलाफ किया जाने वाला दिल्ली का छात्र आंदोलन कुछ इसी प्रकार का भाव प्रदर्शित कर रहा है, जहां केवल और केवल राजनीति ही की जा रही है। किसी भी आंदोलन की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके पीछे जनहित का कितना भाव है। दिल्ली का यह आंदोलन जनसरोकार से कोसों दूर दिखाई दे रहा है।

हालांकि इसके पीछे बहुत से अन्य कारण भी होंगे। सबसे बड़ा कारण तो यही है कि आज जेएनयू की जो छवि जनता के बीच बनी है, वह जनता को खुद ही दूर कर रही है। जिस विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारों की ध्वनि गूंजित होती है, वह कभी जन आंदोलन का हिस्सा नहीं बन सकते हैं।दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के जिन छात्रों ने कभी भारत के टुकड़े करने के नारे लगाए थे, आज वे ही छात्र फीस बढ़ोतरी के छोटे से मामले को राजनीतिक रुप देने का प्रयास करते दिखाई दे रहे हैं। इस छात्र आंदोलन का राजनीतिक स्वरुप इसलिए भी दिखाई दे रहा है, क्योंकि इसमें राष्ट्रीय मानबिन्दुओं और केन्द्र सरकार को सीधे निशाने पर लिया जा रहा है। जेएनयू वामपंथी विचारधारा का एक बड़ा केन्द्र रहा है।

वामपंथी धारा के कार्यकर्ता देश के महानायकों के बारे में क्या सोच रखते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। पिछले घटनाक्रमों को देखें तो पाएंगे कि जेएनयू में देश के विरोध में वातावरण बनाने का काम किया जाता रहा है। वहां आतंकवादी बुरहान वानी के समर्थन में कार्यक्रम किए जाते हैं। सवाल यह कि जेएनयू में शिक्षा के नाम पर आखिर क्या हो रहा है। जहां तक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में फीस बढ़ोतरी की बात है तो यह कहना तर्कसंगत ही होगा कि विगत 19 वर्ष से विश्वविद्यालय के छात्रावास के कमरों और भोजन का शुल्क नहीं बढ़ाया गया, जबकि पिछले 19 सालों में महंगाई का ग्राफ बहुत ऊपर गया है। इस सबका भार पूरी तरह से विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के कंधों पर ही आया। देश के अन्य विश्वविद्यालयों में भी शिक्षा महंगी हो रही है, जो जेएनयू के मुकाबले बहुत अधिक है। ऐसे में विश्वविद्यालय द्वारा कुछ हद तक फीस बढ़ाना न्यायोचित कदम ही है। जिसे वहां के कई छात्र भी सही मानते हैं। लेकिन यह आंदोलन इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि इसमें परदे के पीछे राजनीतिक कार्यकर्ता भूमिका निभा रहे हैं। यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं।

खैर… यह जांच का विषय हो सकता है।देश के प्रसिद्ध अधिवक्ता सांसद डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने इस छात्र आंदोलन के बारे में बहुत ही गहरी बात कही है। उनका मानना है कि जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय को कुछ समय के लिए बंद कर दिया जाए। उनके इस कथन के गहरे निहितार्थ निकल रहे हैं। स्वामी के संकेत को विस्तार से समझना हो तो एक बार जेएनयू की गतिविधियों का अध्ययन करना चाहिए। फिर वह सब सामने आ जाएगा जो वहां होता है। कहा जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जमकर राजनीति की जाती रही है। देश के जो शिक्षा केन्द्र राजनीति के केन्द्र बनते जा रहे हैं, उन पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है।

वर्तमान में जिस प्रकार से जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय का आंदोलन चल रहा है, उसे छात्र आंदोलन कहना न्याय संगत नहीं होगा। क्योंकि, यह विशुद्ध राजनीतिक आंदोलन है। फीस बढ़ोतरी का विरोध तो मात्र बहाना है। इस आंदोलन के समर्थन में देश की संसद में कांग्रेस और वामपंथी दलों की ओर से आवाज उठाई गई। इससे यही संदेश जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जो देश विरोधी नारे लगाए गए, उनके प्रति इन राजनीतिक दलों के समर्थन का ही भाव रहा होगा। इतना ही नहीं, जब भारत तेरे टुकड़े होंगे और हमें चाहिए आजादी जैसे नारे लगाए गए थे, तब भी कांग्रेस और वाम दलों ने खुलेआम समर्थन किया था। ऐसे में सवाल यह उठता है कि कहीं यही दोनों दल छात्रों को आंदोलन करने के लिए तो नहीं उकसा रहे? अगर यह सही है तो फिर केन्द्र सरकार को दोष देना सही नहीं कहा जा सकता।

जब से देश में राजनीतिक सत्ता का परिवर्तन हुआ है, तब से ही देश में उन संस्थानों की सक्रियता दिखाई देने लगी है, जो भारत के बारे में भ्रम का वातावरण बनाने में सहायक हो सकते हैं। चाहे वह शहरी नक्सलवाद को प्रायोजित करने वाले कथित बुद्धिजीवियों की संस्था हो या फिर उनके विचार को अंगीकार करने वाली ही संस्थाएं क्यों न हों। सभी केन्द्र सरकार का विरोध करने के लिए आगे आ रहे हैं। इस विश्वविद्यालय में पढ़ाई करने वाले छात्र कभी भारतीय सेना द्वारा की जाने वाली आतंकियों के विरोध में कार्यवाही पर सवाल उठाते दिखाई देते हैं तो कभी अनुच्छेद 370 को हटाने का विरोध करते हैं। चार वर्ष पूर्व जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में छात्र संघ की उपाध्यक्ष रहीं शेहला राशिद ने भारतीय सेना के विरोध में जमकर भड़ास निकाली थी, जबकि सेना की ओर से स्पष्ट कहा गया था कि ऐसा कुछ भी नहीं है। इससे समझ में आ सकता है कि इस विश्वविद्यालय में कौन-सा पाठ पढ़ाया जाता है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Continue Reading

Top News

देश की युवा पीढ़ी में विदेशों के प्रति रुचि बढ़ी

—गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है

Published

मनोज ज्वाला

एक मीडिया संस्थान के सर्वेक्षण के अनुसार हमारे देश के पढ़े-लिखे और शहरी नौजवानों में से आधे से अधिक ऐसे हैं, जो अपने देश को पसंद नहीं करते। वे विदेशों में जाकर बस जाना चाहते हैं। लगभग दो साल पहले के उक्त सर्वेक्षण के मुताबिक उनमें से 75 फीसदी युवाओं का कहना था कि वे बे-मन और मजबूरीवश भारत में रह रहे हैं। 62.08 फीसदी युवतियों और 66.01 फीसदी युवाओं का मानना था कि भारत  में उनका भविष्य सुरक्षित नहीं है। क्योंकि, यहां अच्छे दिन आने की संभावना कम है। उनमें से 50 फीसदी का मानना था कि भारत में किसी महापुरुष का अवतरण होगा, तभी हालात सुधर सकते हैं, अन्यथा नहीं।

40 फीसदी युवाओं का मानना था कि उन्हें अगर इस देश का प्रधानमंत्री बना दिया जाए, तो वे पांच साल में इस देश का कायापलट कर देंगे।अखबार का वह सर्वेक्षण आज भी बिल्कुल सही लगता है। अगर व्यापक स्तर पर सर्वेक्षण किया जाता, तो देश छोड़ने को तैयार युवाओं का प्रतिशत और अधिक दिखता। वह सर्वेक्षण तो सिर्फ शहरों तक सीमित था। अपने देश में गांवों पर भी तेजी से शहर छाते जा रहे हैं। गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है। गौर कीजिए कि देश छोड़ने को तैयार वे युवा पढ़े-लिखे हैं और शहरों में पले-बढ़े हैं। वे किस पद्धति से किस तरह के विद्यालयों में क्या पढ़े-लिखे हैं और किस रीति-रिवाज से कैसे परिवारों में किस तरह से पले-बढ़े हैं, यह ज्यादा गौरतलब है।

विद्यालय सरकारी हों या गैर सरकारी, सभी में शिक्षा की पद्धति एक है और वह है मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा पद्धति। भारतीयता विरोधी इसी शिक्षा पद्धति को सरकारी मान्यता प्राप्त है। सरकार का पूरा तंत्र इसी तरह की शिक्षा के विस्तार में लगा हुआ है। वैसे अंग्रेजी माध्यम वाले विद्यालय सबसे अच्छे माने जाते हैं और गैर-सरकारी निजी क्षेत्र के अधिकतर विद्यालय अंग्रेजी माध्यम के ही हैं। शहरों में ऐसे ही विद्यालयों की भरमार है और जिन युवाओं के बीच उक्त मीडिया संस्थान ने उपरोक्त सर्वेक्षण किया उनमें से सर्वाधिक युवा ऐसे ही तथाकथित ‘उत्कृष्ट’ विद्यालयों से पढ़े-लिखे हुए हैं। अब रही बात यह कि इन विद्यालयों में आखिर शिक्षा क्या और कैसी दी जाती है, तो यह इन युवाओं की उपरोक्त सोच से ही स्पष्ट है।

जाहिर है, उन्हें शिक्षा के नाम पर ऐसी-ऐसी डिग्रियां दी जाती हैं, जिनके कारण वे महात्वाकांक्षी, स्वार्थी बनकर असंतोष, अहंकार, खीझ, पलायन एवं हीनता-बोध से ग्रसित हो जाते हैं और कमाने-खाने भर थोड़े-बहुत हुनर हासिल कर स्वभाषा व स्वदेश के प्रति ‘नकार’ भाव से पीड़ित होकर विदेश चले जाते हैं।थॉमस विलिंग्टन मैकाले कोई शिक्षा-शास्त्री नहीं था। वह एक षड्यंत्रकारी था, जिसने भारत पर ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जड़ें जमाने की नीयत से भारतीय शिक्षा-पद्धति की जड़ें उखाड़कर मौजूदा शिक्षा-पद्धति को प्रक्षेपित किया था। जो आज भी उसी रूप में कायम है। 20 अक्टूबर 1931 को लंदन के रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ फौरन अफेयर्स के मंच से महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘अंग्रेजी शासन से पहले भारत की शिक्षा-व्यवस्था इंग्लैण्ड से भी अच्छी थी।’ उस पूरी व्यवस्था को सुनियोजित तरीके से समूल नष्ट कर देने के पश्चात ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जरूरतों के मुताबिक उसके रणनीतिकारों ने लम्बे समय तक बहस-विमर्श कर के मैकाले की योजनानुसार यह शिक्षा-पद्धति लागू की थी।

मैकाले ने ब्रिटिश पार्लियामेंट की शिक्षा समिति के समक्ष कहा था ‘हमें भारत में ऐसा शिक्षित वर्ग तैयार करना चाहिए, जो हमारे और उन करोड़ों भारतवासियों के बीच जिन पर हम शासन करते हैं, उन्हें समझाने-बुझाने का काम कर सके। जो केवल खून और रंग की दृष्टि से भारतीय हों, किन्तु रुचि, भाषा व भावों की दृष्टि से अंग्रेज हों।’ विदेशों में बस जाने को उतावले भारतीय युवाओं ने पूरी मेहनत व तबीयत से मैकाले शिक्षा-पद्धति को आत्मसात किया है, ऐसा समझा जा सकता है। यहां प्रसंगवश मैकाले के बहनोई चार्ल्स ट्रेवेलियन द्वारा ब्रिटिश पार्लियामेंट की एक समिति के समक्ष ‘भारत में भिन्न-भिन्न शिक्षा-पद्धतियों के भिन्न-भिन्न परिणाम’ शीर्षक से प्रस्तुत किये गए एक लेख का यह अंश भी उल्लेखनीय है कि ‘मैकाले शिक्षा-पद्धति का प्रभाव अंग्रेजी राज के लिए हितकर हुए बिना नहीं रह सकता। हमारे पास उपाय केवल यही है कि हम भारतवासियों को यूरोपियन ढंग की उन्नति में लगा दें। इससे हमारे लिए भारत पर अपना साम्राज्य कायम रखना बहुत आसान और असंदिग्ध हो जाएगा।’ ऐसा ही हुआ। बल्कि, मैकाले की योजना तो लक्ष्य से ज्यादा ही सफल रही।

हमारे देश के मैकालेवादी राजनेताओं ने अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासन की समाप्ति के बाद भी उनकी अंग्रेजी-मैकाले शिक्षा-पद्धति को न केवल यथावत कायम रखा, बल्कि उसे और ज्यादा अभारतीय रंग-ढंग में ढाल दिया। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष लक्षित प्राचीन भारतीय शिक्षा-पद्धति को अतीत के गर्त में डालकर शिक्षा को उत्पादन-विपणन-मुनाफा-उपभोग-केन्द्रित बना देने और उसे नैतिक सांस्कृतिक मूल्यों से विहीन कर देने तथा राष्ट्रीयता के प्रति उदासीन बना देने का ही परिणाम है कि हमारी यह युवा पीढ़ी महज निजी सुख-स्वार्थ के लिए अपने देश से विमुख हो जाना पसंद कर रही है। उसे विदेशों में ही अपना भविष्य दीख रहा है।

माना कि हमारे देश में तरह-तरह की समस्याएं हैं, किन्तु इनसे जूझने और इन्हें दूर करने की बजाय पलायन कर जाने अथवा कोरा लफ्फाजी करने कि हमें प्रधानमंत्री बना दिया जाए तो हम देश को सुंदर बना देंगे, अति महात्वाकांक्षा-युक्त मानसिक असंतुलन का ही द्योत्तक है। लेकिन आधे से अधिक ये शहरी युवा मानसिक रुप से असंतुलित नहीं हैं, बल्कि असल में वे पश्चिम के प्रति आकर्षित हैं। इसके लिए हमारे देश की चालू शिक्षा-पद्धति का पोषण करने वाले हमारे राजनेता ही जिम्मेवार हैं। यह ‘यूरोपियन ढंग की उन्नति’ के प्रति बढ़ते अनावश्यक आकर्षण का परिणाम है। इस मानसिक पलायन को रोकने के लिए जरूरी है कि हम अपने बच्चों को हमारे राष्ट्र की जड़ों से जोड़ने वाली और संतुलित समग्र मानसिक विकास करने वालीप्राचीन भारतीय पद्धति से भारतीय भाषाओं में समस्त ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा देने की सम्पूर्ण व्यवस्था कायम करें।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Continue Reading

Top News

भाई-बहन में प्रेम भाव बढ़ाता है भैया दूज

–बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था

Published

योगेश कुमार गोयल

(भैया दूज, 29 अक्टूबर पर विशेष)

भाई-बहन के दिलों में पावन संबंधों की मजबूती और प्रेमभाव स्थापित करने वाला पर्व है भैया दूज। इस दिन बहनें अपने भाईयों को तिलक लगाकर ईश्वर से उनकी दीर्घायु की कामना करती हैं। कहा जाता है कि इससे भाई यमराज के प्रकोप से बचे रहते हैं। दीपावली के दो दिन बाद अर्थात कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाए जाने वाले इस पर्व को ‘यम द्वितीया’ व ‘भ्रातृ द्वितीया’ के नाम से भी जाना जाता है। बहुत से भाई-बहन सौभाग्य तथा आयुष्य की प्राप्ति के लिए इस दिन यमुना अथवा अन्य पवित्र नदियों में साथ-साथ स्नान भी करते हैं। भैया दूज मनाने के संबंध में कई किवंदतियां प्रचलित हैं। एक कथा यमराज और उनकी बहन यमुना देवी से संबंधित है। बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था। यमुना अपने भाई यमराज से बहुत स्नेह करती थीं और अक्सर उनसे अनुरोध करती रहती थीं कि वे अपने इष्ट-मित्रों सहित उसके घर भोजन के लिए पधारें लेकिन यमराज हर बार उसके निमंत्रण को किसी न किसी बहाने से टाल जाते। कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमुना ने यमराज को एक बार फिर भोजन के लिए आमंत्रित किया।

उस समय यमराज ने विचार किया कि मैं तो अपने कर्त्तव्य से बंधा सदैव प्राणियों के प्राण ही हरता हूं। इसलिए इस चराचर जगत में कोई भी मुझे अपने घर नहीं बुलाना चाहता। लेकिन बहन यमुना तो मुझे बार-बार अपने घर आमंत्रित कर रही है। इसलिए अब तो उसका निमंत्रण स्वीकार करना ही चाहिए।यमराज को अपने घर आया देख यमुना की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने भाई का खूब आदर-सत्कार करते हुए उनके समक्ष नाना प्रकार के व्यंजन परोसे। बहन के आतिथ्य से यमराज बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे कोई वर मांगने को कहा। इस पर यमुना ने उनसे अनुरोध किया कि आप प्रतिवर्ष इसी दिन मेरे घर आकर भोजन करें और मेरी तरह जो भी बहन इस दिन अपने भाई का आदर-सत्कार करे, उसे तुम्हारा भय न रहे। यमराज ने बहन यमुना को उसका इच्छित वरदान दे दिया। ऐसी मान्यता है कि उसी दिन से ‘भैया दूज’ का पर्व मनाया जाने लगा। भैया दूज के संबंध में और भी कई कथाएं प्रचलित हैं। ऐसी ही एक कथा के अनुसार, एक ब्राह्मण की दो संतानें थी।

एक पुत्र एवं एक पुत्री। पुत्री बहुत समझदार एवं गुणवती थी। वह अपने भाई से जी-जान से प्यार करती थी। एक दिन उसका भाई उससे मिलने उसकी ससुराल पहुंचा। उस समय वह सूत कातने में व्यस्त थी। अतः उसे भाई के आने का पता ही न चल सका। भाई भी बिना कुछ बोले चुपचाप एक ओर बैठा रहा। जब थोड़ी देर बाद बहन की नजर उस पर पड़ी तो भाई को अपने घर आया देख उसे बेहद खुशी हुई। उसने भाई का भरपूर आदर-सत्कार किया। अगले दिन भाई को वापस लौटना था। अतः रास्ते के लिए वह आटे के पकवान बनाने के उद्देश्य से चक्की में आटा पीसने लगी। अनजाने में चक्की में बैठा सांप भी आटे के साथ पिस गया। उसी आटे के पकवान एक पोटली में बांधकर उसने भाई को रास्ते में खाने के लिए देकर विदा किया। भाई के घर से जाने के बाद जब उसे यह मालूम हुआ कि आटे में सांप पिस गया है तो अपने पुत्र को पालने में ही सोता छोड़कर वह अपने भाई के प्राणों की रक्षा के लिए दौड़ी। कुछ दूर जाने पर उसे एक पेड़ की छांव में अपना भाई सोता दिखाई दिया। तब तक उसने पोटली में से कुछ भी नहीं खाया था। उसने भगवान का शुक्रिया अदा किया और पोटली उठाकर दूर फेंक दी तथा भाई के साथ मायके की ओर चल दी।

रास्ते में उसने देखा कि भारी-भारी शिलाएं आकाश में उड़ रही हैं। उसने एक राहगीर से इस रहस्य के बारे में जानना चाहा तो उसने बताया कि जो बहन अपने भाई पर कभी नाराज न होती हो और उसे दिलो-जान से चाहती हो, उस भाई की शादी के समय ये शिलाएं उसकी छाती पर रखी जाएंगी। थोड़ी दूर चलने पर उसे नाग-नागिन दिखाई दिए। नाग ने बताया कि ये शिलाएं जिस व्यक्ति की छाती पर रखी जाएंगी, हम उसे डंस लेंगे। जब बहन ने इस विपत्ति से बचने का उपाय पूछा तो नाग-नागिन ने बताया कि अगर भाई के विवाह के समय उसके सभी कार्य बहन स्वयं करे, तभी भाई की जान बच सकती है।जब उसके भाई के विवाह के लग्न का शुभ मुहूर्त आया तो वह भाई को पीछे धकेलती हुई स्वयं ही लग्न चढ़वाने के लिए आगे हो गई और घोड़ी पर भी स्वयं चढ़ गई। परिवारजन और संबंधी उसके इस विचित्र व्यवहार से हैरान तथा क्रोधित थे। उसके घोड़ी पर चढ़ते ही शिलाएं उड़ती-उड़ती आई लेकिन घोड़ी पर किसी पुरूष की जगह एक महिला को बैठी देख वापस मुड़ गई। जब सुहागरात का समय आया तो वह भाई को पीछे कर खुद भाभी के साथ सोने उसके कमरे में चली गई।

परिवार के सभी सदस्य तथा सभी रिश्तेदार उसके इस अजीबोगरीब व्यवहार से बेहद आश्चर्यचकित और खफा थे। उन्हें उस पर गुस्सा तो बहुत आ रहा था लेकिन उसके जिद के समक्ष सभी विवश थे। सुहागरात पर नियत समय पर नाग-नागिन उसके भाई को डंसने कमरे में पहुंच गए लेकिन उसने नाग-नागिन को मारने की सारी तैयारी पहले ही कर रखी थी। आखिरकार उसने नाग-नागिन का काम तमाम कर दिया। उसके बाद वह निश्चिंत होकर सो गई। सुबह होने पर सभी मेहमानों को विदा करने के बाद परिवार वालों ने सोचा कि अब इस बला को भी कुछ बचा-खुचा देकर यहां से चलता कर दिया जाए लेकिन नींद से जागने पर जब उसने पूरी घटना के बारे में सब को विस्तार से बताया कि किस प्रकार वह अपने बच्चे को पालने में ही सोता छोड़कर दौड़ी-दौड़ी भाई के प्राण बचाने के लिए उसके पीछे चली आई और सभी को नाग-नागिन के मृत शरीर दिखाए तो सभी की आंखों में आंसू आ गए।

भाई के प्रति उसका असीम प्यार तथा समर्पण भाव देखकर उसके प्रति सभी का हृदय श्रद्धा से भर गया।भाई-भाभी तथा माता-पिता ने उसे ढेर सारे उपहारों से लादकर बड़े मान-सम्मान के साथ खुशी-खुशी ससुराल से विदा किया। भाई-बहन के बीच इसी प्रकार के पावन संबंध, प्रेमभाव तथा उनके दिलों में आपसी संबंधों को मजबूत बनाने के लिए ही ‘भैया दूज’ पर्व मनाया जाता है।

(लेखक स्तंभकार हैं।)

Continue Reading

Featured Post

Top News1 वर्ष पूर्व

रॉबर्ट वाड्रा की गिरफ्तारी पर 5 फरवरी तक जारी रहेगी रोक

---हाईकोर्ट जस्टिस मनोज कुमार गर्ग की कोर्ट ने अधिवक्ता भंवरसिंह मेड़तिया के निधन के बाद कोर्ट में 3.45 बजे रेफरेंस...

Top News1 वर्ष पूर्व

बिजनौर कोर्ट शूटकांड : हाईकोर्ट ने डीजीपी और अपर मुख्य सचिव (गृह) को किया तलब

---दरअसल, बिजनौर में 28 मई को नजीबाबाद में हुई बसपा नेता हाजी अहसान व उनके भांजे शादाब की हत्या के...

Top News1 वर्ष पूर्व

निर्भया केस: दोषी अक्षय की पुनर्विचार याचिका खारिज, फांसी की सजा बरकरार

---सुप्रीम कोर्ट ने कहा-पुनर्विचार याचिका में कोई नए तथ्य नहीं, इसलिए ख़ारिज होने योग्य

Top News1 वर्ष पूर्व

कतर टी-10 लीग पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की आईसीसी ने शुरु की जांच

--उल्लेखनीय है कि कतर टी-10 लीग का आयोजन सात से 16 दिसम्बर तक कतर क्रिकेट संघ ने किया था

Top News1 वर्ष पूर्व

बिजनौर कोर्ट रूम में हुई हत्या मामले में चौकी प्रभारी समेत 18 पुलिसकर्मी सस्पेंड

---एसपी ने बताया कि कोर्ट में दिनदहाड़े कुख्यात बदमाश शाहनवाज की हत्या के बाद जजी परिसर में सुरक्षा की पोल...

Recent Post

Trending

Copyright © 2018 Chautha Khambha News.

Web Design BangladeshBangladesh online Market