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लेख

वे पन्द्रह दिन भाग 13/15

कल कराची में कायदे आज़म जिन्ना, पाकिस्तान के राष्ट्र प्रमुख की शपथ लेने वाले हैं. वहां पर कल चारों तरफ स्वतंत्रता दिवस के समारोह मनाए जा रहे होंगे

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मुंबई… जुहू हवाई अड्डा

टाटा एयर सर्विसेज के काउंटर पर आठ-दस महिलाएं खडी है. सभी अनुशासित हैं और उनके चेहरों पर जबरदस्त आत्मविश्वास दिखाई दे रहा है. यह सभी ‘राष्ट्र सेविका समिति’ की सेविकाएं हैं.

इनकी प्रमुख संचालिका यानी लक्ष्मीबाई केलकर, अर्थात ‘मौसीजी’, कराची जाने वाली हैं. कराची में जारी अराजकता एवं अव्यवस्था के माहौल में हैदराबाद (सिंध) की एक सेविका ने उनको एक पत्र भेजा है. उस सेविका का नाम है जेठी देवानी. देवानी परिवार सिंध का एक साधारण परिवार है, जो संघ से जुड़ा हुआ है.

जेठी देवानी का पत्र आने के बाद मौसीजी से रहा नहीं गया. सिंध क्षेत्र की सेविकाओं की मदद के लिए तत्काल वहां जाने का निश्चय उन्होंने किया. राष्ट्र सेविका समिति का गठन हुए केवल ग्यारह वर्ष ही हुए हैं. परन्तु समिति का काम तेजी से आगे बढ़ रहा हैं. यहां तक कि सिंध, पंजाब और बंगाल जैसे सीमावर्ती प्रान्तों में भी राष्ट्रसेविका समिति का नाम और काम पहुंच चुका हैं.

कल कराची में कायदे आज़म जिन्ना, पाकिस्तान के राष्ट्र प्रमुख की शपथ लेने वाले हैं. वहां पर कल चारों तरफ स्वतंत्रता दिवस के समारोह मनाए जा रहे होंगे. परन्तु फिर भी वहां जाना आवश्यक है. इसीलिए मौसीजी, अपनी एक अन्य सहयोगी वेणुताई कलमकर के साथ कराची जाने के लिए हवाई अड्डे पर उपस्थित हैं.

चालीस-पचास यात्रियों की क्षमता वाले उस छोटे से विमान में नौ गज वाली महाराष्ट्रीयन साड़ी पहने हुए केवल यही दोनों महिलाएं हैं. यात्रियों में हिन्दू अधिक नहीं हैं. काँग्रेस में समाजवादी विचारधारा जीवित रखने वाले जयप्रकाश नारायण भी इस विमान में हैं. पूना के एक सज्जन हैं, जिनका उपनाम देव है और उन्हें मौसीजी ने पहचान लिया. परन्तु ये दोनों ही लोग अहमदाबाद में उतर गए. यहां से चढ़ने वाले भी अधिकांशतः मुसलमान ही हैं और ऐसे यात्रियों के बीच में केवल ये दोनों महिलाएं..!

विमान में कुछ उत्साही यात्री, ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ का नारा लगा रहे हैं. एक-दो यात्रियों ने ‘लड़ के लिया है पाकिस्तान, हँस के लेंगे हिन्दुस्तान’ जैसे नारे भी लगाए. परन्तु मौसी जी का आत्मविश्वास स्थिर बना रहा, उनका निर्णय पक्का था. उनके चेहरे पर एक कठोरता बनी हुई थी. यह देखकर धीरे-धीरे पाकिस्तान के नारे लगाने वाले चुपचाप बैठ गए…!

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मुल्तान – लाहौर रेल ट्रैक. नॉर्थ-वेस्टर्न स्टेट रेलवे.

लाहौर से पहले का स्टेशन है रियाज़ाबाद. सुबह के ग्यारह बजे हैं. बारिश बिलकुल नहीं है, आकाश एकदम साफ़ है. स्टेशन पर लगभग सौ-दो सौ मुसलमान हाथों में तलवार और चाकू लेकर खड़े हैं.

अमृतसर और आगे अम्बाला जाने वाली यह ट्रेन धीरे-धीरे स्टेशन में प्रवेश कर रही है. पूरे प्लेटफार्म पर इन हथियारबंद मुसलमानों के अलावा एक भी आदमी नहीं है. स्टेशन मास्टर अपने केबिन का दरवाजा बन्द करके अंदर छिपा हुआ है. उसका असिस्टेंट, रेलवे के सिस्टम पर मोर्स कोड का उपयोग करते हुए अपने मुख्यालय में यह समाचार भेजने का प्रयास कर रहा है. परन्तु उसके भी हाथ कांप रहे हैं. इसी कारण कड़-कट, कड़-कट की आवाज़ के साथ ‘डिड-डैश’ की भाषा में भेजा जाने वाला टेलीग्राफिक सन्देश बार-बार गलत हो रहा है.

गाड़ी प्लेटफार्म पर आने तक भयानक शान्ति छाई हुई है. ट्रेन धीरे-धीरे अंदर आती है. एक जोरदार सीटी बजती है और एक ही क्षण में, ‘दीन-दीन, अल्ला-हू-अकबर’ के गगनभेदी नारों के साथ, …‘मारो-काटो-सालों को’ ऐसी आवाजें सुनाई देने लगती हैं. इस ट्रेन से शरणार्थी के रूप में मुल्तान और पश्चिम पंजाब के गांवों से अपना सब कुछ गंवाकर आए हुए हिंदुओं और सिखों को डिब्बों से बाहर खींचकर निकाला जाता है. धारदार तलवारों से वहीं के वही उनकी गर्दन उड़ा दी जाती है.

अपने ऑफिस की खिड़की के दरारों से झांकता हुआ भयभीत स्टेशन मास्टर यह सब देख रहा है, लेकिन कुछ कर नहीं सकता. जाने-अनजाने वह लाशें गिनने लगता है. अभी तक मुसलमानों ने पहले ही झटके में २१ सिखों और हिंदुओं को मार डाला है. आक्रोश व्यक्त करती हुई उनकी महिलाओं और लड़कियों को मुस्लिम गुण्डे अपने कन्धों पर उठाकर भागते हुए विजयी उल्लास व्यक्त कर रहे हैं. पता नहीं और कितने हिन्दू-सिखों को मारा गया होगा. वह अपने असिस्टेंट से कहता है कि ‘यह सारी जानकारी टेलीग्राफ के माध्यम से मुख्यालय भेजो.’

परन्तु पंजाब में सेंसरशिप लागू होने के कारण ऐसी न जाने कितनी ख़बरों को दबा दिया गया है…!

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कराची

कल पाकिस्तान के स्वतंत्र होने से पहले भारत, पाकिस्तान और ब्रिटिश अधिकारियों की एक गंभीर बैठक चल रही है.

भारत और पाकिस्तान के प्रशासन में सत्ता का विभाजन सरलता से हो सके, इस हेतु यह बैठक बुलाई गई है. व्यापार, संचार, इन्फ्रास्ट्रक्चर, रेलवे, कस्टम इत्यादि अनेक मुद्दों पर इस बैठक में चर्चा हो रही है. अंत में यह निश्चय किया गया कि फिलहाल संयुक्त भारत (यानी वर्तमान अखंड भारत) की जो नीतियां हैं, वही नीतियां और नियम मार्च १९४८ तक दोनों देशों में लागू रहेंगे. मार्च के बाद दोनों देश अपनी-अपनी नीतियां और अपना प्रशासन लागू करेंगे. पोस्ट और टेलीग्राफ का नेटवर्क भी मार्च तक दोनों देशों का एक ही रहेगा. दोनों ही देशों के नागरिक एक दूसरे के देश में बिना किसी अड़चन के आ-जा सकेंगे.

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दिल्ली.

नेहरू सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है, भारत छोड़कर जाने वाले ब्रिटिश अधिकारियों के स्थान पर भारतीय अधिकारियों की नियुक्ति करना. अखंड भारत के मुख्य न्यायाधीश, सर विलियम पेट्रिक स्पेंज कल सेवानिवृत्त हो जाएंगे. अपना पद छोड़ देंगे. इनके स्थान पर सर्वाधिक उपयुक्त व्यक्ति कौन होगा…? कुछ नाम सामने आए हैं. परन्तु सारे नामों के बीच अंतत सूरत, गुजरात, के सर हरिलाल जयकिशनदास कानिया के नाम पर मुहर लगाई गई.

सर कानिया, सूरत के मध्यमवर्गीय परिवार से आए हुए वकील हैं. वे मुम्बई उच्च न्यायालय में १९३० से न्यायाधीश हैं. ५७ वर्षीय सर कानिया आजकल सर्वोच्च न्यायालय के सहयोगी न्यायाधीश हैं. अभी जो मुख्य न्यायाधीश हैं, यानी सर विलियम पेट्रिक स्पेंज़, इन्हें भारत-पाकिस्तान आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल का चेयरमैन नियुक्त किया गया है.

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पेरिस…

आज़ाद हिन्द सेना की ओर से लड़ने वाले अनेक भारतीय, फिलहाल जर्मनी के ब्रिटिश और फ्रेंच इलाकों में एकत्रित हैं. परन्तु अब ये सभी सैनिक और अधिकारी, भारतीय पासपोर्ट के लिए आवेदन कर सकते हैं और मुक्त रूप से कहीं भी आ-जा सकते हैं. पेरिस में स्थित ‘इन्डियन मिलिट्री मिशन’ ने आज यह घोषणा की. इन कैदियों में डॉक्टर हरबंस लाल भी शामिल हैं. लाल साहब, नेताजी की ‘आज़ाद हिन्द सेना’ में लेफ्टिनेंट रहे. अन्य कैदियों के साथ ही डॉक्टर लाल भी भारत वापस आने वाले हैं.

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१५१, बेलियाघाट, कलकत्ता….

हैदरी मंज़िल… दोपहर के तीन बजे हैं.

सोडेपुर आश्रम से गांधीजी, पुरानी सी शेवरलेट गाड़ी से हैदरी मंज़िल पहुंचे. उनके साथ मनु, महादेव भाई और दो अन्य कार्यकर्ता हैं. उन्हीं के पीछे वाली कार से ऐसे ही चार-पांच कार्यकर्ता आए हैं. हाल ही में बारिश हुई है. चारों तरफ कीचड़ फैला हुआ है. हैदरी मंज़िल के सामने बहुत से लोग खड़े हैं. उनमें से अधिकांश हिन्दू ही हैं.

गांधीजी की कार के रुकते ही, गांधीजी का नाम लेकर जबरदस्त नारेबाजी शुरू हो गई. परन्तु इस बार यह नारेबाजी उनके स्वागत के लिए नहीं, वरन उन्हें दी जाने वाली गालियां और श्राप हैं. गाड़ी से उतरने के बाद ऐसी नारेबाजी सुनते ही गांधीजी की मुद्रा कुछ त्रस्त हो गई, हालांकि उन्होंने अपना चेहरा निर्विकार रखने का सफल प्रयास किया.

नारेबाजी जारी है, – ‘गांधीजी चले जाओ’, ‘नोआखाली में जाकर हिंदुओं की रक्षा करो’, ‘पहले हिंदुओं को जीवनदान, फिर मुसलमानों को स्थान’, ‘हिंदुओं के गद्दार गांधी, चले जाओ…’ और इन नारों के साथ ही पत्थरों और बोतलों की बारिश भी हो रही है. गांधीजी एक क्षण ठहरते हैं. शान्ति के साथ पीछे घूमते हैं. हाथ में स्थित शाल ठीक करते हुए वे भीड़ को, हाथ से, शांत रहने का निवेदन करते हैं. भीड़ थोड़ी शांत भी हो जाती है.

गांधीजी धीमे स्वरों में बोलने लगते हैं, “मैं यहां हिंदुओं और मुसलमानों की एक समान सेवा करने आया हूं. मैं यहां पर आपके संरक्षण में ही रहूंगा. यदि आपकी इच्छा हो तो आप सीधे मुझ पर हमला कर सकते हैं. आपके साथ यहीं रहते हुए, इस बेलियाघाट में रहकर, मैं नोआखाली के हिंदुओं के प्राण भी बचा रहा हूं. मुसलमान नेताओं ने मेरे सामने ऐसी शपथ ली है. अब आप सभी हिंदुओं से बिनती है कि आप लोग भी कलकत्ता के मुस्लिम बंधुओं का बाल भी बांका नहीं होने दें.”

उस अवाक खड़ी भीड़ को वैसा ही छोड़कर गांधीजी शान्ति से हैदरी मंज़िल में प्रवेश करते हैं…!

परन्तु भीड़ की यह शान्ति अगले कुछ ही मिनट रही. क्योंकि शहीद सुहरावर्दी का आगमन होते ही वहां इकठ्ठा भीड़ पुनः क्रोधित हो गई. उनके गुस्से का विस्फोट ही हो गया. पांच हजार हिंदुओं की हत्या का खलनायक, सुहरावर्दी, सामने से जाते हुए देखकर कोई भी हिन्दू भला शांत कैसे रह सकता है…? भीड़ ने इमारत को चारों तरफ से घेर लिया है और अब उनमें से कुछ युवा लगातार हैदरी मंज़िल पर पथराव जारी रखे हुए हैं.

अखंड हिन्दुस्तान में आदर का पात्र बन चुके महात्मा गांधी की ऐसी क्रूर हंसी उड़ाने वाला और इस प्रकार की अपमानास्पद भर्त्सना होने वाला, यह पहला ही अवसर है…!

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सुबह साढ़े दस बजे मुम्बई के जुहू हवाई अड्डे से निकला हुआ मौसीजी का विमान, अहमदाबाद में रुकते हुए लगभग साढ़े चार घंटे की यात्रा के बाद कराची के द्रीघ रोड स्थित हवाई अड्डे पर दोपहर तीन बजे पहुंचा.

हवाई अड्डे पर मौसीजी के जमाई, चोलकर स्वयं आए हुए हैं. चोलकर याने मौसीजी की बेटी वत्सला के पति. वत्सला को पढ़ने का शौक था, इसलिए मौसीजी ने घर पर ही शिक्षक बुलाकर उसकी पढ़ाई पूर्ण की. वत्सला ने भी राष्ट्र सेविका समिति के कामों में काफी हाथ बंटाया. कराची की शाखा का विस्तार करने में वत्सला का बड़ा योगदान हैं.

हवाई अड्डे पर पन्द्रह-बीस सेविकाएं भी मौसीजी को लेने आई हुई हैं. सुरक्षा की दृष्टि से संघ के कुछ स्वयंसेवक भी साथ में उपस्थित हैं. एक सेविका की कार में बैठकर यह काफिला मौसीजी के साथ ही बाहर निकला….!

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जिस समय ‘राष्ट्र सेविका समिति’ की प्रमुख, लक्ष्मीबाई केलकर का विमान कराची के द्रीघ रोड स्थित हवाई अड्डे पर उतर रहा था, लगभग उसी समय अखंड भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन को लेकर उनका खास डकोटा विमान कराची के मौरीपुर स्थित रॉयल एयरफोर्स के हवाईअड्डे पर उतर रहा था.

विमान से लॉर्ड माउंटबेटन और उनकी पत्नी लेडी एडविना माउंटबेटन बाहर निकले. यहां पर उनके स्वागत हेतु नए बनने वाले पाकिस्तान के सर्वोच्च अधिकारी मौजूद थे. हवाईअड्डे पर जिन्ना नहीं थे. माउंटबेटन दम्पति को बताया गया कि ‘कायदे आज़म जिन्ना और उनकी बहन फातिमा, उनके सरकारी निवासस्थान पर आपका इंतज़ार कर रहे हैं’.

जिन्ना का कराची स्थित सरकारी निवास स्थान, अर्थात सिंध के गवर्नर का बंगला. विक्टोरियन शैली में निर्मित इस विशाल बंगले के बडे से दीवानखाने में आज जबर्दस्त सजावट की गई है. पूरा बंगला हॉलीवुड की फिल्मों के सेट जैसा ही प्रतीत हो रहा है. ऐसे शाही अंदाज में सजाए गए हॉल में कायदे आज़म जिन्ना और फातिमा ने माउंटबेटन दम्पति का वैसे ही ‘शाही’ अंदाज़ में स्वागत किया…!

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लाहौर.

दोपहर चार बजे.

टेम्पल रोड पर रहने वाला मुजाहिद ताजदीन. यह रोड पर नान और कुलचे बेचने का काम करने वाला, एक सीधा-सादा और गरीब व्यक्ति है. परन्तु आज सुबह से ही उसके दिमाग में पता नहीं क्या घुसा हुआ है. ताजदीन के लगभग सभी दोस्त ‘मुस्लिम नेशनल गार्ड’ के कार्यकर्ता हैं. उन सभी ने, और खासकर पुलिस थाना के मुस्लिम हवलदार ने भी, आज सुबह उसे बताया कि ‘टेम्पल रोड पर सिखों का जो सबसे बड़ा गुरुद्वारा है, उस पर हमला करके उसे नेस्तानाबूद करना है… यह अपने धर्म का ही काम है.’

ताजदीन को नान और कुलचे के अलावा कुछ पता नहीं था, परन्तु उसके दिमाग में इन बातों ने गहरा असर किया. उसने दोपहर को ही अपनी दुकान बन्द कर दी और गुरूद्वारे पर हमला करने के लिए वह अपने मित्रों के साथ जा खड़ा हुआ.

लाहौर के टेम्पल रोड स्थित मोझंग का गुरुद्वारा ‘छेवीन पातशाही’, सिखों के लिए अत्यधिक पवित्र गुरुद्वारा है. स्वयं महाराजा रणजीत सिंह ने इस गुरूद्वारे का निर्माण किया है. सन १६१९ में गुरु हरगोविंद सिंह जी, दीवान चंदू के साथ लाहौर आए थे. उस समय उन्होंने जिस स्थान पर निवास किया था, उसी स्थान पर इस गुरूद्वारे का निर्माण किया गया है.

गुरूद्वारे में प्रतिदिन की नियमित अरदास, लंगर वगैरा व्यवस्थित रूप से जारी हैं. गुरूद्वारे की रक्षा के लिए निहंग संत अपनी तलवारें लिए हुए चौकस हैं. परन्तु उनकी कुल संख्या केवल चार है. अधिकांश सिख, व्यवसायी हैं, और सुबह का यह समय व्यवसाय के लिए महत्त्वपूर्ण है. इसलिए लगभग सारे सिख रात को ही यहां इकठ्ठा होंगे. अभी तो गुरूद्वारे में बहुत ही कम लोग मौजूद हैं.

ठीक चार बजे, मुस्लिम नेशनल गार्ड ने इस गुरूद्वारे पर हमला किया. ताजदीन सबसे आगे था. सबसे पहला पेट्रोल बम उसी ने फेंका. पचास-साठ मुस्लिम गुण्डों का, जो कि तलवारों से लैस हैं, सामना भला केवल चार निहंग संत कितनी देर तक कर पाते..? परन्तु फिर भी उन्होंने असामान्य वीरता दिखाते हुए तीन-चार मुसलमानों को काट डाला, सात-आठ को ज़ख़्मी भी किया. परन्तु अंततः चारों निहंग अपने ही खून के तालाब में गिर पड़े.

महाराजा रंजीत सिंह द्वारा निर्माण किया हुआ यह ‘छेवीन पातशाही’ गुरुद्वारा, निर्दोष सिखों के रक्त से भर गया था.

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पेशावर.

‘नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस’ (NWFP) की राजधानी. इस पेशावर में अपनी गढी के विशाल मकान में, सत्तावन वर्ष के ‘खान अब्दुल गफ्फार खान’ अन्यमनस्क अवस्था में बैठे हैं…अकेले और विषण्ण…!

खान अब्दुल गफ्फार खान. एक भारीभरकम नाम और ठीक वैसा ही भारीभरकम उनका व्यक्तित्व भी है. समूचे नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस के सर्वमान्य नेता. खान साहब गांधीजी के परम अनुयायी हैं. इसीलिए इन्हें ‘सरहदी गांधी’ की उपाधि भी मिली हुई है. परन्तु वे अपने पठानों में ‘बादशाह खान’ के नाम से अधिक प्रसिद्ध हैं. इस पहाड़ी इलाके के सभी अनपढ़ आदिवासियों को गफ्फार खान ने कांग्रेस के झण्डे तले इकठ्ठा किया था.

इसीलिए १९४५ के प्रांतीय चुनावों में, मुस्लिम बहुल होने के बावजूद, इस प्रांत में कांग्रेस को सत्ता मिली. मुस्लिम लीग को कोई खास सीटें नहीं मिलीं. अब जबकि यह स्पष्ट हो गया कि भारत का विभाजन होने वाला है, तब पठानों के सामने सवाल खड़ा हुआ कि, वे किस तरफ जाएं? पठानों का और पाकिस्तान के पंजाबियों का आपस में बैर बहुत पुराना है. इस कारण इस प्रांत के सभी पठानों की इच्छा थी कि वे भारत में विलीन हों. प्रांतीय असेम्बली में बहुमत भी इसी पक्ष में था. केवल भौगोलिक निकटता का ही सवाल था, परन्तु तर्क यह दिया गया कि पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के बीच भी तो हजारों मील की दूरी है. दूसरी बात यह भी थी कि यदि कश्मीर की रियासत भारत के साथ मिल जाती है, तो ये प्रश्न भी हल हो जाएगा, क्योंकि गिलगिट के दक्षिण वाला इलाका, नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर से सटा हुआ ही है.

परन्तु इस सबके बीच नेहरू ने अडंगा लगा दिया. उनका कहना था कि ‘हमें वहां सार्वमत (रेफरेंडम) से फैसला करना चाहिए’. कांग्रेस की कार्यकारिणी में भी यह मुद्दा गरमाया और सरदार पटेल ने इस कथित सार्वमत का जमकर विरोध किया. सरदार पटेल का कहना था कि ‘प्रान्तीय विधानसभाएं यह तय करेंगी कि उन्हें किस देश में शामिल होना है. देश के अन्य भागों में भी हमने यही किया है. इसीलिए जहां-जहां मुस्लिम लीग का बहुमत है, वे सभी प्रांत पाकिस्तान में शामिल होने जा रहे हैं. इसी न्याय के आधार पर नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर राज्य को भारत में विलीन होना ही चाहिए, क्योंकि वहां कांग्रेस का बहुमत हैं’. परन्तु नेहरू अपनी बात पर अड़े रहे. नेहरू ने कहा कि मैं लोकतंत्रवादी हूं. इसलिए वहां के निवासियों को जो लगता है, उन्हें वैसा निर्णय लेने की छूट मिलनी चाहिए’.

बादशाह खान को अखबारों के माध्यम से ही यह पता चला कि उनके प्रान्त में सार्वमत का निर्णय किया गया है. जिस व्यक्ति ने इस बेहद कठिन माहौल और मुस्लिम बहुल इलाका होने के बावजूद, पूरा प्रदेश कांग्रेसी बना डाला था, उन्हें नेहरू ने ऐसे अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रश्न पर चर्चा करने लायक भी नहीं समझा. इसीलिए यह समाचार मिलते ही खान अब्दुल गफ्फार खान ने दुखी स्वरों में कहा कि, “कांग्रेस ने यह प्रांत थाली में सजाकर मुस्लिम लीग को दे दिया है…!”

इस प्रांत में जनमत (सर्वमत – रेफेरेंडम) की प्रक्रिया २० जुलाई १९४७ से आरम्भ हुई, जो लगभग दस दिनों तक चली. सार्वमत से पहले और सार्वमत जारी रहने के दौरान, मुस्लिम लीग ने बड़े पैमाने पर धार्मिक भावनाओं को भड़काया. यह देखकर कांग्रेस ने इस सार्वमत का बहिष्कार कर दिया. खुदाई-खिदमतगार यानी बादशाह खान इस बात की चिंता कर रहे थे कि ‘नेहरू की गलतियों की हमें कितनी और कैसी सजा भुगतनी पड़ेगी’.

यह मतदान केवल और केवल एक धोखा भर था. जिन छह आदिवासी जमातों पर खान अब्दुल गफ्फार खान का गहरा प्रभाव था, उन्हें मतदान में भाग लेने से रोक दिया गया. पैंतीस लाख जनता में से केवल पांच लाख बहत्तर हजार लोगों को ही मतदान करने लायक समझा गया. सवत, दीर, अम्ब और चित्राल इन तहसीलों में मतदान हुआ ही नहीं.

जितने पात्र मतदाता थे, उनमें से केवल ५१% मतदान हुआ. पाकिस्तान में विलीन होने का समर्थन करने वालों के लिए हरे डिब्बे रखे गए थे, जबकि भारत में विलीन होने वालों को मतदान हेतु लाल डिब्बे थे. पाकिस्तान की मतपेटी में २,८९,२४४ वोट पड़े और कांग्रेस के बहिष्कार के बावजूद भारत में विलीनीकरण के पक्ष में २,८७४ वोट पड़े. अर्थात, पैंतीस लाख लोगों में से केवल तीन लाख के आसपास वोट पाकिस्तान के पक्ष में पड़े थे.

बादशाह खान के मन में इसी बात को लेकर नाराजी थी. ‘नेहरू और गांधीजी ने हम लोगों को लावारिस छोड़ दिया. और वह भी इन पाकिस्तानी भेड़ियों के सामने…’ ऐसी भावना लगातार उनके मन में घर कर रही थी.

इसीलिए पेशावर, कोहट, बानू, स्वात इलाकों से उनके कार्यकर्ता उनसे पूछ रहे थे कि ‘क्या हमें भारत में विस्थापित हो जाना चाहिए’? तब सीमान्त गांधी के पास इन प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं था. वे क्या जवाब दें यह समझ नहीं पा रहे थे…!

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कराची.

कायदे आज़म जिन्ना का निवास स्थान… रात के नौ बजे हैं.

लॉर्ड माउंटबेटन के स्वागत हेतु, पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर, जिन्ना ने ‘शाही भोजन’ का आयोजन रखा है. कुछ देशों के राजदूत और राजनयिक भी स्वयं वहां उपस्थित हैं. पानी की तरह, महंगी शराब बहाई जा रही है. लेकिन इस पार्टी में, पार्टी के मेज़बान, यानी खुद कायदे आज़म जिन्ना, सभी लोगों से थोड़े दूर-दूर हैं, अलिप्त हैं.

औपचारिक भोज आरम्भ होने से पहले मेज़बान के संक्षिप्त भाषण की बारी आई. जिन्ना ने अपनी एक आंख वाला चश्मा नाक पर ठीक किया और वे पढ़ने लगे. ‘योर एक्सीलेंसी, योर हायनेस, हिज़ मैजेस्टी सम्राट के दीर्घ एवं स्वस्थ जीवन के लिए आपके समक्ष यह जाम पेश करते हुए मुझे बेहद खुशी हो रही है. योर एक्सीलेंसी, लॉर्ड माउंटबैटन, तीन जून की बैठक में निहित सभी सैद्धांतिक एवं नीतिगत बातों को आपने जिस सम्पूर्णता और कुशलता से लागू किया है, हम उसकी तारीफ़ करते हैं. पाकिस्तान और हिन्दुस्तान आपके योगदान को कभी भुला नहीं सकेंगे…’

क्या विडंबना है कि… इस्लाम के लिए, इस्लामिक सिद्धांतों के लिए, जो राष्ट्र कल जन्म लेने जा रहा है, उस राष्ट्र का निर्माण शराब की नदियां बहाकर किया जा रहा है..!

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ऑल इंडिया रेडियो, लाहौर केंद्र. रात के ११ बजकर ५० मिनट हुए हैं. रेडियो पर उदघोषणा की जाती है – “यह ऑल इंडिया रेडियो का लाहौर केन्द्र है. आप चंद मिनट हमारे अगले ऐलान का इंतज़ार कीजिए.” फिर अगले दस मिनट कुछ वाद्यवृन्द बजता हैं.

ठीक १२ बजकर १ मिनट पर –

“अस्सलाम आलेकुम. पाकिस्तान की ब्रॉडकास्टिंग सर्विस में आपका स्वागत है. हम लाहौर से बोल रहे हैं. कुबुल-ए-सुबह-ए-आज़ादी…!!”

और इस प्रकार, पाकिस्तान के जन्म की अधिकृत घोषणा हो गई..!

लेख

जेएनयू में फीस वृद्धि के नाम पर राजनीति

—यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं

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सुरेश हिन्दुस्थानी

देश के उच्च शिक्षा केन्द्र जब राजनीति के अड्डे बनने की ओर कदम बढ़ाने लगें, तब वहां की शिक्षा की दिशा-दशा क्या होगी, यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। फीस बढ़ोतरी के खिलाफ किया जाने वाला दिल्ली का छात्र आंदोलन कुछ इसी प्रकार का भाव प्रदर्शित कर रहा है, जहां केवल और केवल राजनीति ही की जा रही है। किसी भी आंदोलन की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके पीछे जनहित का कितना भाव है। दिल्ली का यह आंदोलन जनसरोकार से कोसों दूर दिखाई दे रहा है।

हालांकि इसके पीछे बहुत से अन्य कारण भी होंगे। सबसे बड़ा कारण तो यही है कि आज जेएनयू की जो छवि जनता के बीच बनी है, वह जनता को खुद ही दूर कर रही है। जिस विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारों की ध्वनि गूंजित होती है, वह कभी जन आंदोलन का हिस्सा नहीं बन सकते हैं।दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के जिन छात्रों ने कभी भारत के टुकड़े करने के नारे लगाए थे, आज वे ही छात्र फीस बढ़ोतरी के छोटे से मामले को राजनीतिक रुप देने का प्रयास करते दिखाई दे रहे हैं। इस छात्र आंदोलन का राजनीतिक स्वरुप इसलिए भी दिखाई दे रहा है, क्योंकि इसमें राष्ट्रीय मानबिन्दुओं और केन्द्र सरकार को सीधे निशाने पर लिया जा रहा है। जेएनयू वामपंथी विचारधारा का एक बड़ा केन्द्र रहा है।

वामपंथी धारा के कार्यकर्ता देश के महानायकों के बारे में क्या सोच रखते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। पिछले घटनाक्रमों को देखें तो पाएंगे कि जेएनयू में देश के विरोध में वातावरण बनाने का काम किया जाता रहा है। वहां आतंकवादी बुरहान वानी के समर्थन में कार्यक्रम किए जाते हैं। सवाल यह कि जेएनयू में शिक्षा के नाम पर आखिर क्या हो रहा है। जहां तक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में फीस बढ़ोतरी की बात है तो यह कहना तर्कसंगत ही होगा कि विगत 19 वर्ष से विश्वविद्यालय के छात्रावास के कमरों और भोजन का शुल्क नहीं बढ़ाया गया, जबकि पिछले 19 सालों में महंगाई का ग्राफ बहुत ऊपर गया है। इस सबका भार पूरी तरह से विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के कंधों पर ही आया। देश के अन्य विश्वविद्यालयों में भी शिक्षा महंगी हो रही है, जो जेएनयू के मुकाबले बहुत अधिक है। ऐसे में विश्वविद्यालय द्वारा कुछ हद तक फीस बढ़ाना न्यायोचित कदम ही है। जिसे वहां के कई छात्र भी सही मानते हैं। लेकिन यह आंदोलन इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि इसमें परदे के पीछे राजनीतिक कार्यकर्ता भूमिका निभा रहे हैं। यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं।

खैर… यह जांच का विषय हो सकता है।देश के प्रसिद्ध अधिवक्ता सांसद डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने इस छात्र आंदोलन के बारे में बहुत ही गहरी बात कही है। उनका मानना है कि जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय को कुछ समय के लिए बंद कर दिया जाए। उनके इस कथन के गहरे निहितार्थ निकल रहे हैं। स्वामी के संकेत को विस्तार से समझना हो तो एक बार जेएनयू की गतिविधियों का अध्ययन करना चाहिए। फिर वह सब सामने आ जाएगा जो वहां होता है। कहा जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जमकर राजनीति की जाती रही है। देश के जो शिक्षा केन्द्र राजनीति के केन्द्र बनते जा रहे हैं, उन पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है।

वर्तमान में जिस प्रकार से जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय का आंदोलन चल रहा है, उसे छात्र आंदोलन कहना न्याय संगत नहीं होगा। क्योंकि, यह विशुद्ध राजनीतिक आंदोलन है। फीस बढ़ोतरी का विरोध तो मात्र बहाना है। इस आंदोलन के समर्थन में देश की संसद में कांग्रेस और वामपंथी दलों की ओर से आवाज उठाई गई। इससे यही संदेश जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जो देश विरोधी नारे लगाए गए, उनके प्रति इन राजनीतिक दलों के समर्थन का ही भाव रहा होगा। इतना ही नहीं, जब भारत तेरे टुकड़े होंगे और हमें चाहिए आजादी जैसे नारे लगाए गए थे, तब भी कांग्रेस और वाम दलों ने खुलेआम समर्थन किया था। ऐसे में सवाल यह उठता है कि कहीं यही दोनों दल छात्रों को आंदोलन करने के लिए तो नहीं उकसा रहे? अगर यह सही है तो फिर केन्द्र सरकार को दोष देना सही नहीं कहा जा सकता।

जब से देश में राजनीतिक सत्ता का परिवर्तन हुआ है, तब से ही देश में उन संस्थानों की सक्रियता दिखाई देने लगी है, जो भारत के बारे में भ्रम का वातावरण बनाने में सहायक हो सकते हैं। चाहे वह शहरी नक्सलवाद को प्रायोजित करने वाले कथित बुद्धिजीवियों की संस्था हो या फिर उनके विचार को अंगीकार करने वाली ही संस्थाएं क्यों न हों। सभी केन्द्र सरकार का विरोध करने के लिए आगे आ रहे हैं। इस विश्वविद्यालय में पढ़ाई करने वाले छात्र कभी भारतीय सेना द्वारा की जाने वाली आतंकियों के विरोध में कार्यवाही पर सवाल उठाते दिखाई देते हैं तो कभी अनुच्छेद 370 को हटाने का विरोध करते हैं। चार वर्ष पूर्व जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में छात्र संघ की उपाध्यक्ष रहीं शेहला राशिद ने भारतीय सेना के विरोध में जमकर भड़ास निकाली थी, जबकि सेना की ओर से स्पष्ट कहा गया था कि ऐसा कुछ भी नहीं है। इससे समझ में आ सकता है कि इस विश्वविद्यालय में कौन-सा पाठ पढ़ाया जाता है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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देश की युवा पीढ़ी में विदेशों के प्रति रुचि बढ़ी

—गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है

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मनोज ज्वाला

एक मीडिया संस्थान के सर्वेक्षण के अनुसार हमारे देश के पढ़े-लिखे और शहरी नौजवानों में से आधे से अधिक ऐसे हैं, जो अपने देश को पसंद नहीं करते। वे विदेशों में जाकर बस जाना चाहते हैं। लगभग दो साल पहले के उक्त सर्वेक्षण के मुताबिक उनमें से 75 फीसदी युवाओं का कहना था कि वे बे-मन और मजबूरीवश भारत में रह रहे हैं। 62.08 फीसदी युवतियों और 66.01 फीसदी युवाओं का मानना था कि भारत  में उनका भविष्य सुरक्षित नहीं है। क्योंकि, यहां अच्छे दिन आने की संभावना कम है। उनमें से 50 फीसदी का मानना था कि भारत में किसी महापुरुष का अवतरण होगा, तभी हालात सुधर सकते हैं, अन्यथा नहीं।

40 फीसदी युवाओं का मानना था कि उन्हें अगर इस देश का प्रधानमंत्री बना दिया जाए, तो वे पांच साल में इस देश का कायापलट कर देंगे।अखबार का वह सर्वेक्षण आज भी बिल्कुल सही लगता है। अगर व्यापक स्तर पर सर्वेक्षण किया जाता, तो देश छोड़ने को तैयार युवाओं का प्रतिशत और अधिक दिखता। वह सर्वेक्षण तो सिर्फ शहरों तक सीमित था। अपने देश में गांवों पर भी तेजी से शहर छाते जा रहे हैं। गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है। गौर कीजिए कि देश छोड़ने को तैयार वे युवा पढ़े-लिखे हैं और शहरों में पले-बढ़े हैं। वे किस पद्धति से किस तरह के विद्यालयों में क्या पढ़े-लिखे हैं और किस रीति-रिवाज से कैसे परिवारों में किस तरह से पले-बढ़े हैं, यह ज्यादा गौरतलब है।

विद्यालय सरकारी हों या गैर सरकारी, सभी में शिक्षा की पद्धति एक है और वह है मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा पद्धति। भारतीयता विरोधी इसी शिक्षा पद्धति को सरकारी मान्यता प्राप्त है। सरकार का पूरा तंत्र इसी तरह की शिक्षा के विस्तार में लगा हुआ है। वैसे अंग्रेजी माध्यम वाले विद्यालय सबसे अच्छे माने जाते हैं और गैर-सरकारी निजी क्षेत्र के अधिकतर विद्यालय अंग्रेजी माध्यम के ही हैं। शहरों में ऐसे ही विद्यालयों की भरमार है और जिन युवाओं के बीच उक्त मीडिया संस्थान ने उपरोक्त सर्वेक्षण किया उनमें से सर्वाधिक युवा ऐसे ही तथाकथित ‘उत्कृष्ट’ विद्यालयों से पढ़े-लिखे हुए हैं। अब रही बात यह कि इन विद्यालयों में आखिर शिक्षा क्या और कैसी दी जाती है, तो यह इन युवाओं की उपरोक्त सोच से ही स्पष्ट है।

जाहिर है, उन्हें शिक्षा के नाम पर ऐसी-ऐसी डिग्रियां दी जाती हैं, जिनके कारण वे महात्वाकांक्षी, स्वार्थी बनकर असंतोष, अहंकार, खीझ, पलायन एवं हीनता-बोध से ग्रसित हो जाते हैं और कमाने-खाने भर थोड़े-बहुत हुनर हासिल कर स्वभाषा व स्वदेश के प्रति ‘नकार’ भाव से पीड़ित होकर विदेश चले जाते हैं।थॉमस विलिंग्टन मैकाले कोई शिक्षा-शास्त्री नहीं था। वह एक षड्यंत्रकारी था, जिसने भारत पर ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जड़ें जमाने की नीयत से भारतीय शिक्षा-पद्धति की जड़ें उखाड़कर मौजूदा शिक्षा-पद्धति को प्रक्षेपित किया था। जो आज भी उसी रूप में कायम है। 20 अक्टूबर 1931 को लंदन के रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ फौरन अफेयर्स के मंच से महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘अंग्रेजी शासन से पहले भारत की शिक्षा-व्यवस्था इंग्लैण्ड से भी अच्छी थी।’ उस पूरी व्यवस्था को सुनियोजित तरीके से समूल नष्ट कर देने के पश्चात ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जरूरतों के मुताबिक उसके रणनीतिकारों ने लम्बे समय तक बहस-विमर्श कर के मैकाले की योजनानुसार यह शिक्षा-पद्धति लागू की थी।

मैकाले ने ब्रिटिश पार्लियामेंट की शिक्षा समिति के समक्ष कहा था ‘हमें भारत में ऐसा शिक्षित वर्ग तैयार करना चाहिए, जो हमारे और उन करोड़ों भारतवासियों के बीच जिन पर हम शासन करते हैं, उन्हें समझाने-बुझाने का काम कर सके। जो केवल खून और रंग की दृष्टि से भारतीय हों, किन्तु रुचि, भाषा व भावों की दृष्टि से अंग्रेज हों।’ विदेशों में बस जाने को उतावले भारतीय युवाओं ने पूरी मेहनत व तबीयत से मैकाले शिक्षा-पद्धति को आत्मसात किया है, ऐसा समझा जा सकता है। यहां प्रसंगवश मैकाले के बहनोई चार्ल्स ट्रेवेलियन द्वारा ब्रिटिश पार्लियामेंट की एक समिति के समक्ष ‘भारत में भिन्न-भिन्न शिक्षा-पद्धतियों के भिन्न-भिन्न परिणाम’ शीर्षक से प्रस्तुत किये गए एक लेख का यह अंश भी उल्लेखनीय है कि ‘मैकाले शिक्षा-पद्धति का प्रभाव अंग्रेजी राज के लिए हितकर हुए बिना नहीं रह सकता। हमारे पास उपाय केवल यही है कि हम भारतवासियों को यूरोपियन ढंग की उन्नति में लगा दें। इससे हमारे लिए भारत पर अपना साम्राज्य कायम रखना बहुत आसान और असंदिग्ध हो जाएगा।’ ऐसा ही हुआ। बल्कि, मैकाले की योजना तो लक्ष्य से ज्यादा ही सफल रही।

हमारे देश के मैकालेवादी राजनेताओं ने अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासन की समाप्ति के बाद भी उनकी अंग्रेजी-मैकाले शिक्षा-पद्धति को न केवल यथावत कायम रखा, बल्कि उसे और ज्यादा अभारतीय रंग-ढंग में ढाल दिया। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष लक्षित प्राचीन भारतीय शिक्षा-पद्धति को अतीत के गर्त में डालकर शिक्षा को उत्पादन-विपणन-मुनाफा-उपभोग-केन्द्रित बना देने और उसे नैतिक सांस्कृतिक मूल्यों से विहीन कर देने तथा राष्ट्रीयता के प्रति उदासीन बना देने का ही परिणाम है कि हमारी यह युवा पीढ़ी महज निजी सुख-स्वार्थ के लिए अपने देश से विमुख हो जाना पसंद कर रही है। उसे विदेशों में ही अपना भविष्य दीख रहा है।

माना कि हमारे देश में तरह-तरह की समस्याएं हैं, किन्तु इनसे जूझने और इन्हें दूर करने की बजाय पलायन कर जाने अथवा कोरा लफ्फाजी करने कि हमें प्रधानमंत्री बना दिया जाए तो हम देश को सुंदर बना देंगे, अति महात्वाकांक्षा-युक्त मानसिक असंतुलन का ही द्योत्तक है। लेकिन आधे से अधिक ये शहरी युवा मानसिक रुप से असंतुलित नहीं हैं, बल्कि असल में वे पश्चिम के प्रति आकर्षित हैं। इसके लिए हमारे देश की चालू शिक्षा-पद्धति का पोषण करने वाले हमारे राजनेता ही जिम्मेवार हैं। यह ‘यूरोपियन ढंग की उन्नति’ के प्रति बढ़ते अनावश्यक आकर्षण का परिणाम है। इस मानसिक पलायन को रोकने के लिए जरूरी है कि हम अपने बच्चों को हमारे राष्ट्र की जड़ों से जोड़ने वाली और संतुलित समग्र मानसिक विकास करने वालीप्राचीन भारतीय पद्धति से भारतीय भाषाओं में समस्त ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा देने की सम्पूर्ण व्यवस्था कायम करें।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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भाई-बहन में प्रेम भाव बढ़ाता है भैया दूज

–बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था

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योगेश कुमार गोयल

(भैया दूज, 29 अक्टूबर पर विशेष)

भाई-बहन के दिलों में पावन संबंधों की मजबूती और प्रेमभाव स्थापित करने वाला पर्व है भैया दूज। इस दिन बहनें अपने भाईयों को तिलक लगाकर ईश्वर से उनकी दीर्घायु की कामना करती हैं। कहा जाता है कि इससे भाई यमराज के प्रकोप से बचे रहते हैं। दीपावली के दो दिन बाद अर्थात कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाए जाने वाले इस पर्व को ‘यम द्वितीया’ व ‘भ्रातृ द्वितीया’ के नाम से भी जाना जाता है। बहुत से भाई-बहन सौभाग्य तथा आयुष्य की प्राप्ति के लिए इस दिन यमुना अथवा अन्य पवित्र नदियों में साथ-साथ स्नान भी करते हैं। भैया दूज मनाने के संबंध में कई किवंदतियां प्रचलित हैं। एक कथा यमराज और उनकी बहन यमुना देवी से संबंधित है। बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था। यमुना अपने भाई यमराज से बहुत स्नेह करती थीं और अक्सर उनसे अनुरोध करती रहती थीं कि वे अपने इष्ट-मित्रों सहित उसके घर भोजन के लिए पधारें लेकिन यमराज हर बार उसके निमंत्रण को किसी न किसी बहाने से टाल जाते। कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमुना ने यमराज को एक बार फिर भोजन के लिए आमंत्रित किया।

उस समय यमराज ने विचार किया कि मैं तो अपने कर्त्तव्य से बंधा सदैव प्राणियों के प्राण ही हरता हूं। इसलिए इस चराचर जगत में कोई भी मुझे अपने घर नहीं बुलाना चाहता। लेकिन बहन यमुना तो मुझे बार-बार अपने घर आमंत्रित कर रही है। इसलिए अब तो उसका निमंत्रण स्वीकार करना ही चाहिए।यमराज को अपने घर आया देख यमुना की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने भाई का खूब आदर-सत्कार करते हुए उनके समक्ष नाना प्रकार के व्यंजन परोसे। बहन के आतिथ्य से यमराज बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे कोई वर मांगने को कहा। इस पर यमुना ने उनसे अनुरोध किया कि आप प्रतिवर्ष इसी दिन मेरे घर आकर भोजन करें और मेरी तरह जो भी बहन इस दिन अपने भाई का आदर-सत्कार करे, उसे तुम्हारा भय न रहे। यमराज ने बहन यमुना को उसका इच्छित वरदान दे दिया। ऐसी मान्यता है कि उसी दिन से ‘भैया दूज’ का पर्व मनाया जाने लगा। भैया दूज के संबंध में और भी कई कथाएं प्रचलित हैं। ऐसी ही एक कथा के अनुसार, एक ब्राह्मण की दो संतानें थी।

एक पुत्र एवं एक पुत्री। पुत्री बहुत समझदार एवं गुणवती थी। वह अपने भाई से जी-जान से प्यार करती थी। एक दिन उसका भाई उससे मिलने उसकी ससुराल पहुंचा। उस समय वह सूत कातने में व्यस्त थी। अतः उसे भाई के आने का पता ही न चल सका। भाई भी बिना कुछ बोले चुपचाप एक ओर बैठा रहा। जब थोड़ी देर बाद बहन की नजर उस पर पड़ी तो भाई को अपने घर आया देख उसे बेहद खुशी हुई। उसने भाई का भरपूर आदर-सत्कार किया। अगले दिन भाई को वापस लौटना था। अतः रास्ते के लिए वह आटे के पकवान बनाने के उद्देश्य से चक्की में आटा पीसने लगी। अनजाने में चक्की में बैठा सांप भी आटे के साथ पिस गया। उसी आटे के पकवान एक पोटली में बांधकर उसने भाई को रास्ते में खाने के लिए देकर विदा किया। भाई के घर से जाने के बाद जब उसे यह मालूम हुआ कि आटे में सांप पिस गया है तो अपने पुत्र को पालने में ही सोता छोड़कर वह अपने भाई के प्राणों की रक्षा के लिए दौड़ी। कुछ दूर जाने पर उसे एक पेड़ की छांव में अपना भाई सोता दिखाई दिया। तब तक उसने पोटली में से कुछ भी नहीं खाया था। उसने भगवान का शुक्रिया अदा किया और पोटली उठाकर दूर फेंक दी तथा भाई के साथ मायके की ओर चल दी।

रास्ते में उसने देखा कि भारी-भारी शिलाएं आकाश में उड़ रही हैं। उसने एक राहगीर से इस रहस्य के बारे में जानना चाहा तो उसने बताया कि जो बहन अपने भाई पर कभी नाराज न होती हो और उसे दिलो-जान से चाहती हो, उस भाई की शादी के समय ये शिलाएं उसकी छाती पर रखी जाएंगी। थोड़ी दूर चलने पर उसे नाग-नागिन दिखाई दिए। नाग ने बताया कि ये शिलाएं जिस व्यक्ति की छाती पर रखी जाएंगी, हम उसे डंस लेंगे। जब बहन ने इस विपत्ति से बचने का उपाय पूछा तो नाग-नागिन ने बताया कि अगर भाई के विवाह के समय उसके सभी कार्य बहन स्वयं करे, तभी भाई की जान बच सकती है।जब उसके भाई के विवाह के लग्न का शुभ मुहूर्त आया तो वह भाई को पीछे धकेलती हुई स्वयं ही लग्न चढ़वाने के लिए आगे हो गई और घोड़ी पर भी स्वयं चढ़ गई। परिवारजन और संबंधी उसके इस विचित्र व्यवहार से हैरान तथा क्रोधित थे। उसके घोड़ी पर चढ़ते ही शिलाएं उड़ती-उड़ती आई लेकिन घोड़ी पर किसी पुरूष की जगह एक महिला को बैठी देख वापस मुड़ गई। जब सुहागरात का समय आया तो वह भाई को पीछे कर खुद भाभी के साथ सोने उसके कमरे में चली गई।

परिवार के सभी सदस्य तथा सभी रिश्तेदार उसके इस अजीबोगरीब व्यवहार से बेहद आश्चर्यचकित और खफा थे। उन्हें उस पर गुस्सा तो बहुत आ रहा था लेकिन उसके जिद के समक्ष सभी विवश थे। सुहागरात पर नियत समय पर नाग-नागिन उसके भाई को डंसने कमरे में पहुंच गए लेकिन उसने नाग-नागिन को मारने की सारी तैयारी पहले ही कर रखी थी। आखिरकार उसने नाग-नागिन का काम तमाम कर दिया। उसके बाद वह निश्चिंत होकर सो गई। सुबह होने पर सभी मेहमानों को विदा करने के बाद परिवार वालों ने सोचा कि अब इस बला को भी कुछ बचा-खुचा देकर यहां से चलता कर दिया जाए लेकिन नींद से जागने पर जब उसने पूरी घटना के बारे में सब को विस्तार से बताया कि किस प्रकार वह अपने बच्चे को पालने में ही सोता छोड़कर दौड़ी-दौड़ी भाई के प्राण बचाने के लिए उसके पीछे चली आई और सभी को नाग-नागिन के मृत शरीर दिखाए तो सभी की आंखों में आंसू आ गए।

भाई के प्रति उसका असीम प्यार तथा समर्पण भाव देखकर उसके प्रति सभी का हृदय श्रद्धा से भर गया।भाई-भाभी तथा माता-पिता ने उसे ढेर सारे उपहारों से लादकर बड़े मान-सम्मान के साथ खुशी-खुशी ससुराल से विदा किया। भाई-बहन के बीच इसी प्रकार के पावन संबंध, प्रेमभाव तथा उनके दिलों में आपसी संबंधों को मजबूत बनाने के लिए ही ‘भैया दूज’ पर्व मनाया जाता है।

(लेखक स्तंभकार हैं।)

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