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लेख

वे पन्द्रह दिन भाग15/15

सुधा, सुख चैन की बरखा बरसे
भारत भाग हैं जागाI
पंजाब, अवध, गुजरात, मराठा 
द्रविड़, उत्कल, बंग
चंचल सागर, विन्ध्य हिमाला 
नीला जमुना गंगा
तेरे नित गुण गाये
तुझसे जीवन पायें
सब तन पाये आशा 
सूरज बनकर जग पर चमके 
भारत भाग हैं जागा II
जय हो, जय हो, जय हो, जय जयजयजय हो..

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15अगस्त,आज की रात तो भारत मानो सोया ही नहीं है. दिल्ली, मुम्बई, कलकत्ता, मद्रास, बंगलौर, लखनऊ, इंदौर, पटना, बड़ौदा, नागपुर… कितने नाम लिए जाएं. कल रात से ही देश के कोने-कोने में उत्साह का वातावरण है. इसीलिए इस पृष्ठभूमि को देखते हुए कल के और आज के पाकिस्तान का निरुत्साहित वातावरण और भी स्पष्ट दिखाई देता है.

रात भर शहर में घूम-घूमकर, स्वतंत्रता का आनंद लेने के पश्चात सभी लोग अपने-अपने घरों में पहुंच चुके हैं और उन्हें इंतज़ार है, आज सुबह के समाचारपत्रों का. भारत के इस स्वतंत्रता समारोह का वर्णन इन अखबारों ने कैसा किया होगा? लेकिन आज के अखबार कुछ देर से ही आए. क्योंकि सभी अखबारों को संविधान सभा के मध्यरात्रि वाले समाचार प्रकाशित करने थे. प्रत्येक अखबार ने आज आठ कॉलम का शीर्षक छापा है.

दिल्ली के ‘हिन्दुस्तान टाईम्स’ ने शीर्षक दिया है – India Independent : British Rule Ends.
कलकत्ता के ‘स्टेट्समैन’ का शीर्षक है – Two Dominions are Borne.
दिल्ली के ‘हिन्दुस्तान’ ने बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा है – ‘शताब्दियों की दासता के बाद, भारत में स्वतंत्रता की मंगल प्रभात’.
मुम्बई का ‘टाईम्स ऑफ इण्डिया’ लिखता है – Birth of India’s Freedom.
कराची से प्रकाशित होने वाले ‘डॉन’ का शीर्षक हैं – Birth of Pakistan – an Event in History.

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कलकत्ता शहर भी रात भर जाग रहा था. जनता को देश की स्वतंत्रता के स्वाद का अनुभव पूरी तरह से लेना था. आज कलकत्ता के वातावरण में एक चमत्कारिक बदलाव दिखाई दे रहा हैं. कहीं से भी हिन्दू-मुस्लिम तनाव की कोई खबर नहीं हैं. मात्र दो-तीन दिनों पहले जो हिन्दू और मुसलमान एक दूसरे के खून के प्यासे हो रहे थे, आज वही आपस में गले मिल रहे हैं. पूरे शहर में हिन्दू-मुस्लिम एकता के नारे लगाए जा रहे हैं. और निश्चित ही इस जादुई चमत्कार का पूरा श्रेय, बेलियाघाट की हैदरी मंज़िल जैसे साधारण हवेली में बैठे गांधीजी को ही जाता है.

हैदरी मंज़िल इन दिनों कलकत्ता वासियों के लिए एक तीर्थक्षेत्र बना हुआ है. कल से ही लोगों के जत्थे के जत्थे, भले ही दूर से ही, लेकिन गांधीजी के दर्शनों के लिए लगातार चले आ रहे हैं. आज का दिन भी ऐसा ही रहेगा, ऐसी संभावना लग रही है.

लेकिन गांधीजी के लिए आज का दिन हमेशा की तरह सामान्य ही हैं. प्रतिदिन के नियमानुसार आज भी वे तड़के तीन बजे जाग गए थे. आज उन्होंने अपने कामों की सूची में शौचालय की सफाई का कार्य जोड़ा था. यह सारे कार्य सम्पन्न करके गांधीजी रोज की तरह प्रातः भ्रमण के लिए निकले. आज दिन भर वे उपवास रखने वाले थे और अधिकांश समय सूत कताई में बिताने वाले थे.

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सिंगापुर.

इधर भारत में सुबह के साढ़े आठ बज रहे हैं, तो उधर सिंगापुर में सुबह के ग्यारह.. आर्चर रोड, वाटरलू स्ट्रीट, सेरंगून रोड जैसे इलाकों में भारतीय समुदाय ने भारत की स्वतंत्रता के उपलक्ष्य में ध्वजारोहण के बड़े-बड़े कार्यक्रम आयोजित किए हुए हैं.

इस कार्यक्रम के लिए राष्ट्रगीत कौन सा रखना चाहिए इस बारे में भ्रम की स्थिति है. इसलिए सिंगापुर के भारतीयों ने इस गीत को भारत के राष्ट्रगीत के रूप में गाना शुरू किया है –

सुधा, सुख चैन की बरखा बरसे
भारत भाग हैं जागाI
पंजाब, अवध, गुजरात, मराठा
द्रविड़, उत्कल, बंग
चंचल सागर, विन्ध्य हिमाला
नीला जमुना गंगा
तेरे नित गुण गाये
तुझसे जीवन पायें
सब तन पाये आशा
सूरज बनकर जग पर चमके
भारत भाग हैं जागा II
जय हो, जय हो, जय हो, जय जयजयजय हो…!

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कलकत्ता. बेलियाघाट.

सुबह के नौ बजे हैं. भारत सरकार के ‘सूचना और प्रसारण मंत्रालय’ के अधिकारी, अपने सारे उपकरण लेकर गांधीजी की प्रतिक्रिया लेने के लिए आए हुए हैं. परन्तु गांधीजी का उत्तर एकदम सपाट स्वर में है कि, “मेरे पास बताने के लिए कुछ नहीं है”, परन्तु उन्हें फिर से आग्रह किया गया कि ‘यदि आज के दिन आप कोई सन्देश नहीं देंगे तो वह ठीक नहीं लगेगा’, इसके बावजूद गांधीजी का सीधा-सपाट सा उत्तर है कि, “मेरे पास कोई सन्देश नहीं है. यदि यह ठीक नहीं दीखता, तो ऐसा ही सही.”

कुछ देर के बाद बी.बी.सी. के प्रतिनिधि भी आए. इनका प्रसारण समूची दुनिया में होने वाला हैं. लेकिन गांधीजी ने उन्हें भी ठीक यही उत्तर दिया.

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दिल्ली. वॉईस रीगल पैलेस…

भूतपूर्व वॉईसरॉय लोगों का निवास स्थान. अर्थात राजप्रासाद. अब यह ‘गवर्नमेंट हाउस’ हो गया है. और भारत के पहले गवर्नर जनरल, लॉर्ड माउंटबेटन आज यहीं पर शपथ ग्रहण करने वाले हैं. इस गवर्नमेंट हाउस का विशाल दरबार हॉल, आज के इस अवसर हेतु काफी सजाया गया है. सुबह का समय होने के बावजूद हॉल में स्थित बड़े-बड़े लाईट और झूमर प्रकाशमान किए गए हैं.

ठीक नौ बजे औपचारिक कार्यक्रम शुरू हुआ. चांदी की तुरही बजाकर कार्यक्रम का आरम्भ किया गया. इसके पश्चात शंखध्वनि की गई. इस वाइसरॉय हाउस की दीवारों ने अपने जीवन में पहली ही बार तुरही और शंख की आवाज़ सुनी है.

भारत के पहले मुख्य न्यायाधीश, सर हरिलाल जयकिशन दास कानिया के सामने कड़क पोशाक में लॉर्ड माउंटबेटन खड़े हुए. उन्होंने बाईबल का चुम्बन लिया और अपनी शपथ का उच्चारण किया. पूरा दरबार हॉल, मंत्री, संविधान सभा के सदस्यों और अधिकारियों से भर गया है. लेकिन ऐसे अवसरों पर नियमित रूप से उपस्थित रहने वाले राजे-रजवाड़े आज अनुपस्थित हैं.

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कलकत्ता. बेलियाघाट

सुबह के आठ बजे गांधीजी ने सूत कताई करते-करते अपनी ब्रिटिश मित्र मिस अगाथा हैरिसन के लिए एक पत्र डिक्टेट करवाया. इसमें उन्होंने मजाक-मजाक में लिखा, ‘तुमने राजाजी के मार्फ़त भेजा हुआ पत्र मुझे मिला. ज़ाहिर है कि राजाजी स्वयं तो यहां आकर यह पत्र दे नहीं सकते थे. क्योंकि कल रात से ही उनके गवर्नर हाउस में, ‘अंग्रेजों का घर देखने के लिए’ ढेरों सर्वसामान्य जनता इकठ्ठा हुई है…!’

इसके बाद गांधीजी ने पश्चिम बंगाल के नवनियुक्त मंत्रियों के लिए एक पत्र डिक्टेट किया. इस पत्र में प्रमुखता से उन्होंने अपने पसंदीदा तत्वों, अर्थात ‘सत्य, अहिंसा और नम्रता’ का पालन करने का आग्रह किया. ‘सत्ता’ की बुराईयों के बारे में आगाह करते हुए उन्होंने लिखा, ‘ध्यान रहे कि सत्ता भ्रष्ट बनाती है… यह बात न भूलें कि आप लोग यहां गरीबों की सेवा करने आए हैं.’

थोड़ी देर बाद, अर्थात लगभग सुबह दस बजे, पश्चिम बंगाल के नवनियुक्त गवर्नर, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी गांधीजी से भेंट करने आए. यह भेंट बहुत ही ह्रदयस्पर्शी थी. स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाले दो तपस्वियों की थी यह भेंट…!

राजगोपालाचारी ने मिलते ही गांधीजी से कहा कि, “बापू, आपका अभिनन्दन करता हूं.. आपने तो कलकत्ता में बिलकुल जादू ही कर दिया है..!” परन्तु गांधीजी का उत्तर कुछ अलग ही था. वे बोले, “परन्तु मैं अभी कलकत्ता की स्थिति से संतुष्ट नहीं हूं… जब तक दंगों की आग में झुलसे हुए सभी लोग अपने-अपने घरों को वापस नहीं लौटते, तब तक कोई खास काम हुआ है, ऐसा मुझे नहीं लगता.”

राजाजी ने कल रात को सम्पन्न हुए कार्यक्रम के किस्से सुनाए. गांधीजी का आज उपवास था, इस कारण कुछ खाने का सवाल ही नहीं उठता था. लगभग एक घंटे की भेंट के बाद राजाजी वापस निकले.

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मुंबई. दादर. सावरकर सदन.

सुबह से ही तात्याराव (यानी विनायक सावरकर) कुछ खिन्न से दिखाई दे रहे हैं. उन्होंने कुछ भी खाया-पिया नहीं हैं. खंडित भारत की कल्पना उनके सीने में गहराई तक चुभ गयी हैं. उन्हें यह बात स्पष्ट रूप से महसूस हो रही हैं कि ‘हम अपना देश अत्यंत दुर्बल लोगों के हाथों में सौंप रहे हैं.’

फिर भी स्वतंत्रता का आनंद तो है ही. वह स्वतंत्रता, जिसके लिए दो-दो कालेपानी की सजा भुगती. पन्द्रह वर्षों की नजरबंदी सही. समुद्र के उस अथाह पानी में छलांग भी लगाई. अंडमान की काल कोठरी का कष्ट सहन किया. कोल्हू में बैल की तरह लगकर तेल निकाला…

खंडित क्यूं न हों, स्वतंत्रता आज हासिल तो हुई है.

दस बजने को हैं. हिन्दू महासभा के अनेक कार्यकर्ता तात्याराव से भेंट करने आए हैं. उन सभी की उपस्थिति में क्रांतिवीर विनायक दामोदर सावरकर ने दो ध्वज फहराएं. पहला – भगवा ध्वज, जो कि अखंड हिन्दुस्तान का प्रतीक है और दूसरा, भारत का राष्ट्रध्वज यानी तिरंगा. दोनों ही ध्वजों को उन्होंने पुष्प अर्पित किए, और कुछ देर स्तब्ध खड़े रहे.

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दिल्ली. काउंसिल हाउस का गोलाकार भवन.

सुबह के साढ़े दस बज रहे हैं. आज यहां पर आधिकारिक रूप से भारत के राष्ट्रध्वज के रूप में ‘अशोक चक्र से अंकित तिरंगा’ फहराने का शासकीय कार्यक्रम है. वॉईस रीगल पैलेस से शपथ ग्रहण किए हुए सभी मंत्री, वरिष्ठ अधिकारी और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, धीरे-धीरे काउंसिल हाउस की तरफ आने लगे हैं. यह कार्यक्रम छोटा और सादा सा ही है. थोड़ी ही देर में नेहरू यहां पर राष्ट्रध्वज फहराने आने वाले हैं.

छोटी पहाड़ी पर स्थित इस गोलाकार भवन, ‘काउंसिल हाउस’ के चारों तरफ भारी भीड़ एकत्रित हो चुकी है. ये सभी स्वतन्त्र भारत के नागरिक हैं. अंग्रेजों के शासन में सामान्य भारतीय के लिए इस स्थान पर प्रवेश प्रतिबंधित था, परन्तु आज ऐसा नहीं है. इसीलिए कौतूहल, आनंद, उत्साह इन सभी भावनाओं से मिश्रित ये सैकड़ों लोग ‘वंदेमातरम’ के नारे लगा रहे हैं. गांधी और नेहरू की जयजयकार कर रहे हैं. आनंद और खुशी के मारे इन्हें समझ ही नहीं आ रहा कि क्या करें, क्या नहीं करें.

नेहरू कार्यक्रम स्थल पर आते हैं. उनके मंत्रिमंडल के सहयोगी भी उनके साथ ही हैं. एडविन लुटियन और हरबर्ट बेकर द्वारा पहाड़ी पर निर्मित इस ‘काउंसिल हॉल’ में पहली बार ही तिरंगा फहराया जाने वाला है. चूंकि अभी राष्ट्रगीत कौन सा होगा, यह निश्चित नहीं है, इसलिए सभी लोगों ने ‘वंदेमातरम’ नारे का जयजयकार करते हुए आसमान गुंजा दिया हैं…

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लाहौर. डी. ए. वी. कॉलेज. दोपहर के दो बज रहे हैं.

कॉलेज के परिसर और होस्टल में, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा संचालित ‘पंजाब सहायता समिति’ का शरणार्थी शिविर है. लाहौर मेडिकल कॉलेज के स्वयंसेवक चिकित्सक, विद्यार्थी, कुछ महिला डॉक्टर और नर्सों ने आपस में मिलकर बीस खटिया वाला एक छोटा सा अस्पताल चलाना शुरू किया है. समूचे पश्चिम पंजाब से हिन्दू और सिख अपनी घर-गृहस्थी, खेती-बाड़ी, दुकान-कारखाने लावारिस अवस्था में छोड़कर, सभी कुछ गंवाकर बेहद दयनीय अवस्था में इस शिविर में आते जा रहे हैं.

कल रात से ही जहां उधर पूरा हिन्दुस्थान स्वतंत्रता समारोह उत्साह से मना रहा था, इधर परिस्थिति बहुत ही भयानक हो चली थी. हिंदुओं-सिखों के जत्थे के जत्थे अपने प्राण बचाकर इस शिविर में पहुंच रहे हैं. उन सभी पर हुए अत्याचारों की कहानियां अक्षरशः दिमाग सुन्न करने वाली हैं, भीषण क्रोध उत्पन्न करने वाली हैं. अनेक सिखों की बहनों, पत्नियों को मुस्लिम गुण्डे उठा ले गए हैं, जबकि कुछ औरतों-लड़कियों ने कुओं में छलांग लगाकर आत्महत्या कर ली है.

रोज़ाना दोपहर को ठीक डेढ़ बजे, सरदार कुलवंत सिंह नामक एक संघ स्वयंसेवक इस शिविर में भर्ती घायलों के लिए भोजन लेकर आता है. यह भोजन लाहौर के ‘भाटी गेट’ नामक हिन्दू मोहल्ले में संघ के स्वयंसेवक ही तैयार करते हैं. हालांकि पिछले तीन-चार दिनों से यह भी कठिन होता जा रहा है.

आज तो सवा दो / ढाई बजने वाले हैं, फिर भी कुलवंत सिंह आया क्यों नहीं, यह देखने के लिए दीनदयाल यह स्वयंसेवक लाहौर शहर में निकला. दीनदयाल संघ के एक भाग का कार्यवाह है. बीच रास्ते में ही उसे भीड़ दिखाई दी. उसने नजदीक जाकर देखा, तो बीच रास्ते में कुलवंत सिंह खून के तालाब में डूबा पड़ा था. पास में ही उसकी मोटरसाइकिल भी गिरी पड़ी थी. मोटरसाइकिल से कैरियर से बंधे हुए भोजन के डिब्बों में से सब्जी का रस रिस-रिसकर उसके फैले हुए खून में जाकर मिल रहा था.

जिस समय दिल्ली के दरबार हॉल में मंत्रियों द्वारा शपथ लेने का कार्यक्रम चल रहा है, जिस समय बेलियाघाट में गांधीजी बंगाल के मंत्रिमंडल को पत्र लिख रहे हैं कि, ‘मुसलमानों को सुरक्षित रहने दो’…, उसी समय इधर लाहौर में मुस्लिम गुंडों द्वारा जख्मी हिंदुओं-सिखों के लिए भोजन पहुंचाने वाले संघ स्वयंसेवक कुलवंत सिंह की दिनदहाड़े, बीच रास्ते में चाकू घोंपकर हत्या कर दी है…!

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दिल्ली. इंडिया गेट स्थित मैदान.

यहां भी सार्वजनिक रूप से तिरंगा फहराने का एक भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया है. हजारों लोगों की उपस्थिति से मैदान पूरी तरह भर गया है. बारिश के कारण कहीं-कहीं कीचड़ है, परन्तु लोगों को इसकी परवाह नहीं है. उनका उत्साह और आनंद चरम पर है.

ठीक साढ़े चार बजे नेहरू यहां पर तिरंगा फहराते हैं. अभी-अभी बारिश हुई है, इसलिए आकाश में, ऊपर की तरफ जाते हुए तिरंगे के ठीक पीछे एक सुन्दर सा इन्द्रधनुष दिखाई देने लगता है. एक मंत्रमुग्ध करने वाला यह दृश्य है…! लॉर्ड माउंटबेटन एकटक यह अलौकिक दृश्य देखते ही रह जाते हैं…!

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कलकत्ता. बेलियाघाट… शाम के साढ़े पांच बजने वाले हैं.

गांधीजी की आज की सायं प्रार्थना बेलियाघाट के ‘राश बागान’ मैदान में आयोजित की गई है. चूंकि स्वतन्त्र भारत में गांधीजी की यह पहली सायं प्रार्थना है, इस कारण ऐसा अनुमान है कि आज इसमें भारी भीड़ रहेगी.

गांधीजी की जिद है कि वे पैदल ही उस मैदान तक जाएंगे. वैसे तो मैदान पास ही है. सामान्य दिनों में यहां पांच मिनट में ही पहुंचा जा सकता है. परन्तु आज मैदान में बड़ी मात्रा में लोग एकत्रित हैं. तीस हजार लोगों की क्षमता वाला मैदान पूरी तरह भर चुका है. इसलिए आज गांधीजी को मैदान में बने मंच तक पहुंचने में बीस मिनट लग गए.

प्रार्थना और सूत कताई के पश्चात गांधीजी शांत और धीमे स्वरों में बोलने लगे, “कल जो मैंने कहा था, वही मैं आज भी दोहरा रहा हूं. कलकत्ता के सभी हिंदू-मुसलमानों का मैं अभिनन्दन करता हूं. आप लोगों ने एक असंभव कार्य को संभव बना दिया है. अब आप मुसलमानों को मंदिरों में प्रवेश दें और मुस्लिम बंधु हिंदुओं को मस्जिदों में… ऐसा करने से हिन्दू-मुस्लिम एकता और भी मजबूत होगी….!”

“कहीं-कहीं पर मुझे अभी भी मुसलमानों को सताने के समाचार मिल रहे हैं. परन्तु यह ध्यान रहे कि कलकत्ता और हावड़ा इन इलाकों में एक भी मुसलमान को, किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं होना चाहिए.”

इसके बाद गांधीजी ने कल मध्यरात्रि को, राजभवन में घटित, भीड़ द्वारा लूटपाट का उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि, “लोग यह सोच रहे हैं कि हमें स्वतंत्रता मिल गई, तो हम पर लगे हुए सारे प्रतिबन्ध समाप्त हो गए. हम चाहे जैसा आचरण कर सकते हैं. परन्तु यह ठीक नहीं है. कल रात को राजभवन में भीड़ ने जो भी किया, वह दुर्भाग्यपूर्ण था. हमें अपनी स्वतंत्रता का सही उपयोग करना चाहिए. जो भी यूरोपीय बंधु भारत में ही रहना चाहते हैं, हमें उनके साथ भी वैसा ही व्यवहार करना चाहिए, जो कि हमें उनके द्वारा अपेक्षित हैं.

शाम की इस प्रार्थना के बाद गांधीजी ने अपना चौबीस घंटे का उपवास, नींबू का शरबत ग्रहण करके समाप्त किया.

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अनेक वर्षों का अन्धकार समाप्त हुआ है और देश पुनः एक बार स्वतंत्र हुआ है. पिछली अनेक पीढ़ियों की गुलामी के कारण भारतीयों की दुर्बल हो चुकी मानसिकता को बदलना एक सबसे बड़ी चुनौती है.

हालांकि विभाजन तो हो चुका है, परन्तु नवनिर्मित पाकिस्तान से अधिक मुस्लिम जनसंख्या, हिंदुस्तान में अभी भी मौजूद है. डॉक्टर बाबासाहब आंबेडकर ने जनसंख्या की पूर्ण अदलाबदली की योजना का जो आग्रह किया था, उसे कांग्रेस ने ठुकरा दिया था. अभी देश के अनेक भागों में धार्मिक विद्वेष की आग लगी हुई है, और यह आगे और फैलेगी, इसकी पूरी संभावना है. विस्थापितों का प्रश्न अभी मुंह बाए खड़ा हैं.

कश्मीर का सवाल अभी भी हल नहीं हुआ है. देश के बीचोंबीच स्थित निज़ाम की रियासत आज भी हिन्दुस्तान में शामिल नहीं है और हिन्दुओं को लगातार कष्ट दे रही है. गोवा अभी भी पुर्तगाल के कब्जे में है. पांडिचेरी, चन्दनगर भी अभी हिन्दुस्तान में वापस नहीं आए हैं. उधर नेहरू की जिद के कारण खान अब्दुल गफ्फार खान के नेतृत्व वाला वाला नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस भी भारत ने गंवा दिया है.

आज के दिन स्वतत्रंता का स्वागत करते समय जब भारत का यह चित्र देखते हैं, तो हमारी छाती फटती है. ये सभी भूभाग शामिल नहीं होने से, रक्षात्मक दृष्टि से, सामरिक दृष्टि से भारत बेहद कमजोर दिखाई दे रहा है. हमारे नेतृत्व की कमज़ोरी और दूरदृष्टि नहीं होने के कारण देश के भविष्य के सामने एक बड़ा सा प्रश्नचिन्ह लगा हुआ है.

स्वतंत्र होकर यह देश जब एक नए युग में प्रवेश कर रहा है, तो इन सभी कठिन प्रश्नों की एक लंबी सूची हमारे सामने नृत्य कर रही है. एक मजबूत, दमदार और दूरदृष्टि वाले नेतृत्व के हाथों में यह देश सौंपा जाए, तभी इस देश का भविष्य उज्जवल होगा….!
– प्रशांत पोळ
(कल दिनांक १६ अगस्त को इस लेखमाला का अंतिम आलेख, ‘पंधरा अगस्त के बाद…’, सन्दर्भ सूची के साथ, प्रकाशित होगा)

लेख

जेएनयू में फीस वृद्धि के नाम पर राजनीति

—यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं

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सुरेश हिन्दुस्थानी

देश के उच्च शिक्षा केन्द्र जब राजनीति के अड्डे बनने की ओर कदम बढ़ाने लगें, तब वहां की शिक्षा की दिशा-दशा क्या होगी, यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। फीस बढ़ोतरी के खिलाफ किया जाने वाला दिल्ली का छात्र आंदोलन कुछ इसी प्रकार का भाव प्रदर्शित कर रहा है, जहां केवल और केवल राजनीति ही की जा रही है। किसी भी आंदोलन की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके पीछे जनहित का कितना भाव है। दिल्ली का यह आंदोलन जनसरोकार से कोसों दूर दिखाई दे रहा है।

हालांकि इसके पीछे बहुत से अन्य कारण भी होंगे। सबसे बड़ा कारण तो यही है कि आज जेएनयू की जो छवि जनता के बीच बनी है, वह जनता को खुद ही दूर कर रही है। जिस विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारों की ध्वनि गूंजित होती है, वह कभी जन आंदोलन का हिस्सा नहीं बन सकते हैं।दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के जिन छात्रों ने कभी भारत के टुकड़े करने के नारे लगाए थे, आज वे ही छात्र फीस बढ़ोतरी के छोटे से मामले को राजनीतिक रुप देने का प्रयास करते दिखाई दे रहे हैं। इस छात्र आंदोलन का राजनीतिक स्वरुप इसलिए भी दिखाई दे रहा है, क्योंकि इसमें राष्ट्रीय मानबिन्दुओं और केन्द्र सरकार को सीधे निशाने पर लिया जा रहा है। जेएनयू वामपंथी विचारधारा का एक बड़ा केन्द्र रहा है।

वामपंथी धारा के कार्यकर्ता देश के महानायकों के बारे में क्या सोच रखते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। पिछले घटनाक्रमों को देखें तो पाएंगे कि जेएनयू में देश के विरोध में वातावरण बनाने का काम किया जाता रहा है। वहां आतंकवादी बुरहान वानी के समर्थन में कार्यक्रम किए जाते हैं। सवाल यह कि जेएनयू में शिक्षा के नाम पर आखिर क्या हो रहा है। जहां तक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में फीस बढ़ोतरी की बात है तो यह कहना तर्कसंगत ही होगा कि विगत 19 वर्ष से विश्वविद्यालय के छात्रावास के कमरों और भोजन का शुल्क नहीं बढ़ाया गया, जबकि पिछले 19 सालों में महंगाई का ग्राफ बहुत ऊपर गया है। इस सबका भार पूरी तरह से विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के कंधों पर ही आया। देश के अन्य विश्वविद्यालयों में भी शिक्षा महंगी हो रही है, जो जेएनयू के मुकाबले बहुत अधिक है। ऐसे में विश्वविद्यालय द्वारा कुछ हद तक फीस बढ़ाना न्यायोचित कदम ही है। जिसे वहां के कई छात्र भी सही मानते हैं। लेकिन यह आंदोलन इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि इसमें परदे के पीछे राजनीतिक कार्यकर्ता भूमिका निभा रहे हैं। यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं।

खैर… यह जांच का विषय हो सकता है।देश के प्रसिद्ध अधिवक्ता सांसद डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने इस छात्र आंदोलन के बारे में बहुत ही गहरी बात कही है। उनका मानना है कि जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय को कुछ समय के लिए बंद कर दिया जाए। उनके इस कथन के गहरे निहितार्थ निकल रहे हैं। स्वामी के संकेत को विस्तार से समझना हो तो एक बार जेएनयू की गतिविधियों का अध्ययन करना चाहिए। फिर वह सब सामने आ जाएगा जो वहां होता है। कहा जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जमकर राजनीति की जाती रही है। देश के जो शिक्षा केन्द्र राजनीति के केन्द्र बनते जा रहे हैं, उन पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है।

वर्तमान में जिस प्रकार से जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय का आंदोलन चल रहा है, उसे छात्र आंदोलन कहना न्याय संगत नहीं होगा। क्योंकि, यह विशुद्ध राजनीतिक आंदोलन है। फीस बढ़ोतरी का विरोध तो मात्र बहाना है। इस आंदोलन के समर्थन में देश की संसद में कांग्रेस और वामपंथी दलों की ओर से आवाज उठाई गई। इससे यही संदेश जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जो देश विरोधी नारे लगाए गए, उनके प्रति इन राजनीतिक दलों के समर्थन का ही भाव रहा होगा। इतना ही नहीं, जब भारत तेरे टुकड़े होंगे और हमें चाहिए आजादी जैसे नारे लगाए गए थे, तब भी कांग्रेस और वाम दलों ने खुलेआम समर्थन किया था। ऐसे में सवाल यह उठता है कि कहीं यही दोनों दल छात्रों को आंदोलन करने के लिए तो नहीं उकसा रहे? अगर यह सही है तो फिर केन्द्र सरकार को दोष देना सही नहीं कहा जा सकता।

जब से देश में राजनीतिक सत्ता का परिवर्तन हुआ है, तब से ही देश में उन संस्थानों की सक्रियता दिखाई देने लगी है, जो भारत के बारे में भ्रम का वातावरण बनाने में सहायक हो सकते हैं। चाहे वह शहरी नक्सलवाद को प्रायोजित करने वाले कथित बुद्धिजीवियों की संस्था हो या फिर उनके विचार को अंगीकार करने वाली ही संस्थाएं क्यों न हों। सभी केन्द्र सरकार का विरोध करने के लिए आगे आ रहे हैं। इस विश्वविद्यालय में पढ़ाई करने वाले छात्र कभी भारतीय सेना द्वारा की जाने वाली आतंकियों के विरोध में कार्यवाही पर सवाल उठाते दिखाई देते हैं तो कभी अनुच्छेद 370 को हटाने का विरोध करते हैं। चार वर्ष पूर्व जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में छात्र संघ की उपाध्यक्ष रहीं शेहला राशिद ने भारतीय सेना के विरोध में जमकर भड़ास निकाली थी, जबकि सेना की ओर से स्पष्ट कहा गया था कि ऐसा कुछ भी नहीं है। इससे समझ में आ सकता है कि इस विश्वविद्यालय में कौन-सा पाठ पढ़ाया जाता है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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देश की युवा पीढ़ी में विदेशों के प्रति रुचि बढ़ी

—गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है

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मनोज ज्वाला

एक मीडिया संस्थान के सर्वेक्षण के अनुसार हमारे देश के पढ़े-लिखे और शहरी नौजवानों में से आधे से अधिक ऐसे हैं, जो अपने देश को पसंद नहीं करते। वे विदेशों में जाकर बस जाना चाहते हैं। लगभग दो साल पहले के उक्त सर्वेक्षण के मुताबिक उनमें से 75 फीसदी युवाओं का कहना था कि वे बे-मन और मजबूरीवश भारत में रह रहे हैं। 62.08 फीसदी युवतियों और 66.01 फीसदी युवाओं का मानना था कि भारत  में उनका भविष्य सुरक्षित नहीं है। क्योंकि, यहां अच्छे दिन आने की संभावना कम है। उनमें से 50 फीसदी का मानना था कि भारत में किसी महापुरुष का अवतरण होगा, तभी हालात सुधर सकते हैं, अन्यथा नहीं।

40 फीसदी युवाओं का मानना था कि उन्हें अगर इस देश का प्रधानमंत्री बना दिया जाए, तो वे पांच साल में इस देश का कायापलट कर देंगे।अखबार का वह सर्वेक्षण आज भी बिल्कुल सही लगता है। अगर व्यापक स्तर पर सर्वेक्षण किया जाता, तो देश छोड़ने को तैयार युवाओं का प्रतिशत और अधिक दिखता। वह सर्वेक्षण तो सिर्फ शहरों तक सीमित था। अपने देश में गांवों पर भी तेजी से शहर छाते जा रहे हैं। गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है। गौर कीजिए कि देश छोड़ने को तैयार वे युवा पढ़े-लिखे हैं और शहरों में पले-बढ़े हैं। वे किस पद्धति से किस तरह के विद्यालयों में क्या पढ़े-लिखे हैं और किस रीति-रिवाज से कैसे परिवारों में किस तरह से पले-बढ़े हैं, यह ज्यादा गौरतलब है।

विद्यालय सरकारी हों या गैर सरकारी, सभी में शिक्षा की पद्धति एक है और वह है मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा पद्धति। भारतीयता विरोधी इसी शिक्षा पद्धति को सरकारी मान्यता प्राप्त है। सरकार का पूरा तंत्र इसी तरह की शिक्षा के विस्तार में लगा हुआ है। वैसे अंग्रेजी माध्यम वाले विद्यालय सबसे अच्छे माने जाते हैं और गैर-सरकारी निजी क्षेत्र के अधिकतर विद्यालय अंग्रेजी माध्यम के ही हैं। शहरों में ऐसे ही विद्यालयों की भरमार है और जिन युवाओं के बीच उक्त मीडिया संस्थान ने उपरोक्त सर्वेक्षण किया उनमें से सर्वाधिक युवा ऐसे ही तथाकथित ‘उत्कृष्ट’ विद्यालयों से पढ़े-लिखे हुए हैं। अब रही बात यह कि इन विद्यालयों में आखिर शिक्षा क्या और कैसी दी जाती है, तो यह इन युवाओं की उपरोक्त सोच से ही स्पष्ट है।

जाहिर है, उन्हें शिक्षा के नाम पर ऐसी-ऐसी डिग्रियां दी जाती हैं, जिनके कारण वे महात्वाकांक्षी, स्वार्थी बनकर असंतोष, अहंकार, खीझ, पलायन एवं हीनता-बोध से ग्रसित हो जाते हैं और कमाने-खाने भर थोड़े-बहुत हुनर हासिल कर स्वभाषा व स्वदेश के प्रति ‘नकार’ भाव से पीड़ित होकर विदेश चले जाते हैं।थॉमस विलिंग्टन मैकाले कोई शिक्षा-शास्त्री नहीं था। वह एक षड्यंत्रकारी था, जिसने भारत पर ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जड़ें जमाने की नीयत से भारतीय शिक्षा-पद्धति की जड़ें उखाड़कर मौजूदा शिक्षा-पद्धति को प्रक्षेपित किया था। जो आज भी उसी रूप में कायम है। 20 अक्टूबर 1931 को लंदन के रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ फौरन अफेयर्स के मंच से महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘अंग्रेजी शासन से पहले भारत की शिक्षा-व्यवस्था इंग्लैण्ड से भी अच्छी थी।’ उस पूरी व्यवस्था को सुनियोजित तरीके से समूल नष्ट कर देने के पश्चात ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जरूरतों के मुताबिक उसके रणनीतिकारों ने लम्बे समय तक बहस-विमर्श कर के मैकाले की योजनानुसार यह शिक्षा-पद्धति लागू की थी।

मैकाले ने ब्रिटिश पार्लियामेंट की शिक्षा समिति के समक्ष कहा था ‘हमें भारत में ऐसा शिक्षित वर्ग तैयार करना चाहिए, जो हमारे और उन करोड़ों भारतवासियों के बीच जिन पर हम शासन करते हैं, उन्हें समझाने-बुझाने का काम कर सके। जो केवल खून और रंग की दृष्टि से भारतीय हों, किन्तु रुचि, भाषा व भावों की दृष्टि से अंग्रेज हों।’ विदेशों में बस जाने को उतावले भारतीय युवाओं ने पूरी मेहनत व तबीयत से मैकाले शिक्षा-पद्धति को आत्मसात किया है, ऐसा समझा जा सकता है। यहां प्रसंगवश मैकाले के बहनोई चार्ल्स ट्रेवेलियन द्वारा ब्रिटिश पार्लियामेंट की एक समिति के समक्ष ‘भारत में भिन्न-भिन्न शिक्षा-पद्धतियों के भिन्न-भिन्न परिणाम’ शीर्षक से प्रस्तुत किये गए एक लेख का यह अंश भी उल्लेखनीय है कि ‘मैकाले शिक्षा-पद्धति का प्रभाव अंग्रेजी राज के लिए हितकर हुए बिना नहीं रह सकता। हमारे पास उपाय केवल यही है कि हम भारतवासियों को यूरोपियन ढंग की उन्नति में लगा दें। इससे हमारे लिए भारत पर अपना साम्राज्य कायम रखना बहुत आसान और असंदिग्ध हो जाएगा।’ ऐसा ही हुआ। बल्कि, मैकाले की योजना तो लक्ष्य से ज्यादा ही सफल रही।

हमारे देश के मैकालेवादी राजनेताओं ने अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासन की समाप्ति के बाद भी उनकी अंग्रेजी-मैकाले शिक्षा-पद्धति को न केवल यथावत कायम रखा, बल्कि उसे और ज्यादा अभारतीय रंग-ढंग में ढाल दिया। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष लक्षित प्राचीन भारतीय शिक्षा-पद्धति को अतीत के गर्त में डालकर शिक्षा को उत्पादन-विपणन-मुनाफा-उपभोग-केन्द्रित बना देने और उसे नैतिक सांस्कृतिक मूल्यों से विहीन कर देने तथा राष्ट्रीयता के प्रति उदासीन बना देने का ही परिणाम है कि हमारी यह युवा पीढ़ी महज निजी सुख-स्वार्थ के लिए अपने देश से विमुख हो जाना पसंद कर रही है। उसे विदेशों में ही अपना भविष्य दीख रहा है।

माना कि हमारे देश में तरह-तरह की समस्याएं हैं, किन्तु इनसे जूझने और इन्हें दूर करने की बजाय पलायन कर जाने अथवा कोरा लफ्फाजी करने कि हमें प्रधानमंत्री बना दिया जाए तो हम देश को सुंदर बना देंगे, अति महात्वाकांक्षा-युक्त मानसिक असंतुलन का ही द्योत्तक है। लेकिन आधे से अधिक ये शहरी युवा मानसिक रुप से असंतुलित नहीं हैं, बल्कि असल में वे पश्चिम के प्रति आकर्षित हैं। इसके लिए हमारे देश की चालू शिक्षा-पद्धति का पोषण करने वाले हमारे राजनेता ही जिम्मेवार हैं। यह ‘यूरोपियन ढंग की उन्नति’ के प्रति बढ़ते अनावश्यक आकर्षण का परिणाम है। इस मानसिक पलायन को रोकने के लिए जरूरी है कि हम अपने बच्चों को हमारे राष्ट्र की जड़ों से जोड़ने वाली और संतुलित समग्र मानसिक विकास करने वालीप्राचीन भारतीय पद्धति से भारतीय भाषाओं में समस्त ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा देने की सम्पूर्ण व्यवस्था कायम करें।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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भाई-बहन में प्रेम भाव बढ़ाता है भैया दूज

–बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था

Published

योगेश कुमार गोयल

(भैया दूज, 29 अक्टूबर पर विशेष)

भाई-बहन के दिलों में पावन संबंधों की मजबूती और प्रेमभाव स्थापित करने वाला पर्व है भैया दूज। इस दिन बहनें अपने भाईयों को तिलक लगाकर ईश्वर से उनकी दीर्घायु की कामना करती हैं। कहा जाता है कि इससे भाई यमराज के प्रकोप से बचे रहते हैं। दीपावली के दो दिन बाद अर्थात कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाए जाने वाले इस पर्व को ‘यम द्वितीया’ व ‘भ्रातृ द्वितीया’ के नाम से भी जाना जाता है। बहुत से भाई-बहन सौभाग्य तथा आयुष्य की प्राप्ति के लिए इस दिन यमुना अथवा अन्य पवित्र नदियों में साथ-साथ स्नान भी करते हैं। भैया दूज मनाने के संबंध में कई किवंदतियां प्रचलित हैं। एक कथा यमराज और उनकी बहन यमुना देवी से संबंधित है। बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था। यमुना अपने भाई यमराज से बहुत स्नेह करती थीं और अक्सर उनसे अनुरोध करती रहती थीं कि वे अपने इष्ट-मित्रों सहित उसके घर भोजन के लिए पधारें लेकिन यमराज हर बार उसके निमंत्रण को किसी न किसी बहाने से टाल जाते। कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमुना ने यमराज को एक बार फिर भोजन के लिए आमंत्रित किया।

उस समय यमराज ने विचार किया कि मैं तो अपने कर्त्तव्य से बंधा सदैव प्राणियों के प्राण ही हरता हूं। इसलिए इस चराचर जगत में कोई भी मुझे अपने घर नहीं बुलाना चाहता। लेकिन बहन यमुना तो मुझे बार-बार अपने घर आमंत्रित कर रही है। इसलिए अब तो उसका निमंत्रण स्वीकार करना ही चाहिए।यमराज को अपने घर आया देख यमुना की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने भाई का खूब आदर-सत्कार करते हुए उनके समक्ष नाना प्रकार के व्यंजन परोसे। बहन के आतिथ्य से यमराज बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे कोई वर मांगने को कहा। इस पर यमुना ने उनसे अनुरोध किया कि आप प्रतिवर्ष इसी दिन मेरे घर आकर भोजन करें और मेरी तरह जो भी बहन इस दिन अपने भाई का आदर-सत्कार करे, उसे तुम्हारा भय न रहे। यमराज ने बहन यमुना को उसका इच्छित वरदान दे दिया। ऐसी मान्यता है कि उसी दिन से ‘भैया दूज’ का पर्व मनाया जाने लगा। भैया दूज के संबंध में और भी कई कथाएं प्रचलित हैं। ऐसी ही एक कथा के अनुसार, एक ब्राह्मण की दो संतानें थी।

एक पुत्र एवं एक पुत्री। पुत्री बहुत समझदार एवं गुणवती थी। वह अपने भाई से जी-जान से प्यार करती थी। एक दिन उसका भाई उससे मिलने उसकी ससुराल पहुंचा। उस समय वह सूत कातने में व्यस्त थी। अतः उसे भाई के आने का पता ही न चल सका। भाई भी बिना कुछ बोले चुपचाप एक ओर बैठा रहा। जब थोड़ी देर बाद बहन की नजर उस पर पड़ी तो भाई को अपने घर आया देख उसे बेहद खुशी हुई। उसने भाई का भरपूर आदर-सत्कार किया। अगले दिन भाई को वापस लौटना था। अतः रास्ते के लिए वह आटे के पकवान बनाने के उद्देश्य से चक्की में आटा पीसने लगी। अनजाने में चक्की में बैठा सांप भी आटे के साथ पिस गया। उसी आटे के पकवान एक पोटली में बांधकर उसने भाई को रास्ते में खाने के लिए देकर विदा किया। भाई के घर से जाने के बाद जब उसे यह मालूम हुआ कि आटे में सांप पिस गया है तो अपने पुत्र को पालने में ही सोता छोड़कर वह अपने भाई के प्राणों की रक्षा के लिए दौड़ी। कुछ दूर जाने पर उसे एक पेड़ की छांव में अपना भाई सोता दिखाई दिया। तब तक उसने पोटली में से कुछ भी नहीं खाया था। उसने भगवान का शुक्रिया अदा किया और पोटली उठाकर दूर फेंक दी तथा भाई के साथ मायके की ओर चल दी।

रास्ते में उसने देखा कि भारी-भारी शिलाएं आकाश में उड़ रही हैं। उसने एक राहगीर से इस रहस्य के बारे में जानना चाहा तो उसने बताया कि जो बहन अपने भाई पर कभी नाराज न होती हो और उसे दिलो-जान से चाहती हो, उस भाई की शादी के समय ये शिलाएं उसकी छाती पर रखी जाएंगी। थोड़ी दूर चलने पर उसे नाग-नागिन दिखाई दिए। नाग ने बताया कि ये शिलाएं जिस व्यक्ति की छाती पर रखी जाएंगी, हम उसे डंस लेंगे। जब बहन ने इस विपत्ति से बचने का उपाय पूछा तो नाग-नागिन ने बताया कि अगर भाई के विवाह के समय उसके सभी कार्य बहन स्वयं करे, तभी भाई की जान बच सकती है।जब उसके भाई के विवाह के लग्न का शुभ मुहूर्त आया तो वह भाई को पीछे धकेलती हुई स्वयं ही लग्न चढ़वाने के लिए आगे हो गई और घोड़ी पर भी स्वयं चढ़ गई। परिवारजन और संबंधी उसके इस विचित्र व्यवहार से हैरान तथा क्रोधित थे। उसके घोड़ी पर चढ़ते ही शिलाएं उड़ती-उड़ती आई लेकिन घोड़ी पर किसी पुरूष की जगह एक महिला को बैठी देख वापस मुड़ गई। जब सुहागरात का समय आया तो वह भाई को पीछे कर खुद भाभी के साथ सोने उसके कमरे में चली गई।

परिवार के सभी सदस्य तथा सभी रिश्तेदार उसके इस अजीबोगरीब व्यवहार से बेहद आश्चर्यचकित और खफा थे। उन्हें उस पर गुस्सा तो बहुत आ रहा था लेकिन उसके जिद के समक्ष सभी विवश थे। सुहागरात पर नियत समय पर नाग-नागिन उसके भाई को डंसने कमरे में पहुंच गए लेकिन उसने नाग-नागिन को मारने की सारी तैयारी पहले ही कर रखी थी। आखिरकार उसने नाग-नागिन का काम तमाम कर दिया। उसके बाद वह निश्चिंत होकर सो गई। सुबह होने पर सभी मेहमानों को विदा करने के बाद परिवार वालों ने सोचा कि अब इस बला को भी कुछ बचा-खुचा देकर यहां से चलता कर दिया जाए लेकिन नींद से जागने पर जब उसने पूरी घटना के बारे में सब को विस्तार से बताया कि किस प्रकार वह अपने बच्चे को पालने में ही सोता छोड़कर दौड़ी-दौड़ी भाई के प्राण बचाने के लिए उसके पीछे चली आई और सभी को नाग-नागिन के मृत शरीर दिखाए तो सभी की आंखों में आंसू आ गए।

भाई के प्रति उसका असीम प्यार तथा समर्पण भाव देखकर उसके प्रति सभी का हृदय श्रद्धा से भर गया।भाई-भाभी तथा माता-पिता ने उसे ढेर सारे उपहारों से लादकर बड़े मान-सम्मान के साथ खुशी-खुशी ससुराल से विदा किया। भाई-बहन के बीच इसी प्रकार के पावन संबंध, प्रेमभाव तथा उनके दिलों में आपसी संबंधों को मजबूत बनाने के लिए ही ‘भैया दूज’ पर्व मनाया जाता है।

(लेखक स्तंभकार हैं।)

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