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वे पंद्रह दिन भाग 10/15

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10 अगस्त

चौथा खंभा न्यूज़ .com

दस अगस्त रविवार की एक अलसाई हुई सुबह. सरदार वल्लभभाई पटेल के बंगले अर्थात १, औरंगजेब रोड पर काफी हलचल शुरू हो गयी है. सरदार पटेल वैसे भी सुबह जल्दी सोकर उठते हैं. उनका दिन जल्दी प्रारम्भ होता है. बंगले में रहने वाले सभी लोगों को इसकी आदत हो गयी है. इसलिए जब सुबह सवेरे जोधपुर के महाराज की आलीशान चमकदार गाड़ी पोर्च में आकर खड़ी हुई, तब वहां के कर्मचारियों के लिए यह एक साधारण सी बात थी.

जोधपुर नरेश, हनुमंत सिंह…. ये कोई मामूली व्यक्ति नहीं थे. राजपूताना की सबसे बड़ी रियासत. जिसका इतिहास बहुत पीछे, यानी सन १२५० तक जाता है. पच्चीस लाख जनसंख्या वाली यह विशाल रियासत, छत्तीस हजार स्क्वेयर मील में फ़ैली हुई है. पिछले कुछ दिनों से मोहम्मद अली जिन्ना इस रियासत को पाकिस्तान में विलीन कराने के लिए भरसक प्रयास कर रहे हैं. वी. के. मेनन ने यह सारी जानकारी सरदार वल्लभभाई पटेल को दी थी. इसीलिए सरदार जी ने जोधपुर नरेश हनुमंत सिंह को अपने घर आमंत्रित किया हुआ हैं.

सरदार पटेल, हनुमंत सिंह को साथ लेकर अपने विशाल और शानदार दीवानखाने में आए. आरंभिक औपचारिक बातचीत के बाद सरदार पटेल सीधे मूल विषय पर आ गए, “मैंने सुना है कि लॉर्ड माउंटबेटन से आपकी भेंट हुई थी, क्या चर्चा हुई?”
हनुमंत सिंह : जी सरदार साहब. भेंट तो हुई, लेकिन कोई ख़ास चर्चा नहीं हुई है.
सरदार पटेल : परन्तु मैंने तो सुना है कि आपकी भेंट जिन्ना से भी हुई है और आपने यह निर्णय लिया है कि आपकी रियासत स्वतंत्र रहेगी?
हनुमंत सिंह : (झेंपते हुए) हां, आपने एकदम सही सुना है.
सरदार पटेल : यदि आपको स्वतंत्र रहना है, तो रह सकते हैं. परन्तु आपके इस निर्णय के बाद यदि जोधपुर रियासत में कोई विद्रोह हुआ तो भारत सरकार से आप किसी सहायता की उम्मीद ना रखें.
हनुमंत सिंह : परन्तु जिन्ना साहब ने हमें बहुत सी सुविधाएं और आश्वासन दिए हैं. उन्होंने यह भी कहा है कि वे जोधपुर को कराची से रेलमार्ग द्वारा जोड़ देंगे. यदि ऐसा नहीं हुआ, तो हमारी रियासत का व्यापार ठप्प पड़ जाएगा.
सरदार पटेल : हम आपके जोधपुर को कच्छ से जोड़ देंगे. आपकी रियासत के व्यापार पर कतई कोई फर्क नहीं पड़ेगा. और हनुमंत जी, एक बात और है कि आपके पिताजी यानी उमेश सिंह जी, मेरे अच्छे मित्रों में से एक थे. उन्होंने मुझे आपकी देखभाल का जिम्मा सौंपा हुआ है. यदि आप सीधे रास्ते पर नहीं चलते हैं, तो आपको अनुशासन में लाने के लिए मुझे आपके पिता की भूमिका निभानी पड़ेगी.
हनुमंत सिंह : सरदार पटेल साहब, आपको ऐसा करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. मैं कल ही जोधपुर जाकर भारत देश के साथ विलीनीकरण के करार पर अपने हस्ताक्षर करता हूं.

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कलकत्ता. सोडेपुर आश्रम.

संभवतः रविवार होने के कारण कलकत्ता के सोडेपुर आश्रम में गांधीजी की प्रातः प्रार्थना में अच्छी खासी भीड़ इकठ्ठा थी. गांधीजी ने सदा की भांति अपनी शैली में प्रार्थना और सूत कताई की और अब वे लोगों को संबोधित करने के तैयार हैं. गांधीजी अक्सर बैठे-बैठे ही संवाद स्थापित करते हैं. उन्होंने बोलना शुरू किया – “मैं नोआखाली जाने के लिए निकलने ही वाला था, परन्तु मेरा वह पूर्व-नियोजित दौरा मैंने कुछ दिनों के लिए आगे टाल दिया है. क्योंकि कलकत्ता के अनेक मुस्लिम मित्रों ने मुझसे ऐसा करने की बिनती की है. मुझे ऐसा लग रहा है कि यदि मैं नोआखाली गया, और यहां कलकत्ता में कोई अप्रिय घटना हुई तो समझिये कि मेरा जीवन जीने का प्रयोजन ही नष्ट हो जाएगा.”

धीमे स्वरों में वे आगे बोलते रहे…. “मुझे यह सुनकर बेहद दुःख हुआ है कि कलकत्ता के अनेक भागों में मुस्लिम बन्धु जा नहीं सकते हैं और कई भागों में हिन्दू लोग नहीं जा सकते हैं. मैं स्वयं इन सभी क्षेत्रों में जाकर देखने वाला हूँ कि क्या स्थिति है. इस शहर में केवल २३% मुसलमान हैं. ये २३% लोग किसी का क्या बिगाड़ सकते हैं? मैंने तो ऐसा भी सुना है कि आगामी कांग्रेस शासन की आड़ लेकर कुछ हिन्दू पुलिसवाले मुसलमानों को परेशान कर रहे हैं. यदि पुलिस बल में भी ऐसी ही जातीय भावना घर कर गयी है, तो भारत का भविष्य निश्चित ही अंधकारमय हो जाएगा…”

प्रार्थना के लिए एकत्रित लोगों में हिन्दुओं की संख्या ही अधिक हैं. उन्हें गांधीजी द्वारा दिया गया भाषण बिलकुल पसंद नहीं आया हैं. यदि केवल २३% मुसलमान पिछले वर्ष ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के दिन हजारों हिन्दुओं का खून बहा सकते हैं, तो यदि वे बहुमत में आ जाएंगे, तो हमारा क्या होगा? यही प्रश्न वे सभी लोग आपस में एक-दूसरे से पूछ रहे हैं.

प्रार्थना पूरी होने के बाद गांधीजी ने उनका नियमित हल्का नाश्ता, यानी एक कप बकरी का दूध, थोड़ा सा सूखा मेवा और खजूर ग्रहण किया और वे अंदर के कमरे में आए. यहां वे काँग्रेस सरकार के मंत्रियों के साथ चर्चा करने वाले हैं. धीरे-धीरे सारे मंत्री वहां इकठ्ठा होने लगे. अगले पन्द्रह मिनट में ही भावी मुख्यमंत्री प्रफुल्लचंद्र घोष और उनके आवश्यक सहयोगी भी आ गए. गांधीजी अपनी हमेशा वाली, धीमी बोलने वाली, शैली में इन सभी मंत्रियों को समझाने लगे. उन्होंने कहा, “सुहरावर्दी के शासनकाल में भले ही हिंदुओं पर थोड़े-बहुत अत्याचार हुए हों, हो सकता है कि कुछ मुस्लिम पुलिसवालों ने भी हिंदुओं से अच्छा बर्ताव नहीं किया हो. लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हम भी प्रतिशोधात्मक कार्यवाही करने लग जाएं. कलकत्ता का एक-एक मुसलमान सुरक्षित रहना चाहिए, इसकी चिंता आप सभी को करनी हैं.”

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उधर दिल्ली के मंदिर मार्ग स्थित हिन्दू महासभा के भवन में चल रही ‘अखिल भारतीय हिन्दू संसद’ का आज दूसरा दिन हैं. अखण्ड हिन्दुस्तान से इस परिषद् के लिए आए हुए सभी प्रतिनिधियों के मन में विभाजन के प्रति गहरा क्रोध हैं, आक्रोश हैं. उनके मन में विस्थापित होने वाले एवं मारे जा रहे हिंदुओं-सिखों के लिए वेदना हैं.

आज इस सभा में प्रस्ताव का दिन हैं. बहुत से वक्ताओं ने अपनी बात रखी. बंगाल से आए हुए न्यायमूर्ति निर्मलचन्द्र चटर्जी बहुत ही बढ़िया बोले. उन्होंने कहा कि “तीन जून को ब्रिटिश सरकार द्वारा दिया गया विभाजन का प्रस्ताव स्वीकार करके काँग्रेस ने न केवल बहुत बड़ी गलती की है वरन करोड़ों भारतीयों की पीठ में छुरा भी घोंपा है. भारत का विभाजन स्वीकार करने का अर्थ यह है कि काँग्रेस ने मुस्लिम लीग की गुंडागर्दी के सामने पराजय स्वीकार कर ली है.”

इस परिषद् में सुबह के सत्र में सबसे अंत में बोलने वाले थे वीर सावरकर. उन्होंने अपने शानदार वक्तृत्व एवं तर्कशुद्ध मुद्दों के साथ सभी प्रतिनिधियों को मंत्रमुग्ध कर दिया. सावरकर ने कहा कि, “अब सरकारों से कोई निवेदन अथवा अनुरोध नहीं करना हैं. अब हमें सीधे प्रत्यक्ष रूप में कृति करनी चाहिए. सभी दलों के हिन्दू, अपने हिन्दुस्तान को अखंड बनाने के लिए अपने-अपने काम से लग जाएं. नेहरू ने जो डरपोक तर्क दिया है कि ‘खूनखराबा टालने के लिए हमने पाकिस्तान के निर्माण की मान्यता दी है’, वह केवल धोखेबाजी है. क्योंकि विभाजन मंजूर होने के बाद भी मुसलमानों द्वारा हिंदुओं का रक्तपात बन्द तो हुआ ही नहीं, वरन अब देश के और भी टुकड़े करने की मांग वे कर रहे हैं. यदि समय रहते इन बातों पर प्रतिबन्ध नहीं लगाया गया, तो इस देश में चौदह पाकिस्तान बनने का खतरा है. इस कारण केवल रक्तपात से भयभीत न होते हुए हमें ‘जैसे को तैसा’ वाला जवाब देना चाहिए. सभी हिंदुओं को पार्टी भेद भुलाकर संगठित होते हुए, सामर्थ्यवान बनना चाहिए, ताकि देश का विभाजन नष्ट किया जा सके.”

इसी सभा में सर्वानुमति से यह मांगे की गई कि ‘सभी हिंदुओं को एक होकर अखंड भारत निर्माण हेतु संगठित होना चाहिए. भगवा ध्वज, ही राष्ट्रध्वज होना चाहिए. हिन्दी राष्ट्रभाषा होनी चाहिए तथा भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित किया जाए. देश में जल्दी से जल्दी आम चुनाव भी करवाए जाएं.’

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आकाश में बादल छाए हुए हैं, और हल्की बारिश के कारण गीला-गीला सा हो गया हैं, कराची शहर. सिंध प्रोविंशियल लेजिस्लेटिव असेम्बली के उस हॉल में पाकिस्तान की संविधान सभा की पहली संक्षिप्त बैठक शुरू हुई हैं. वैसे तो आज कोई खास कामकाज नहीं हैं. मुख्य कार्य जो भी होना हैं, वह तो कल ही होगा. क्योंकि कल ‘कायदे-आज़म’ जिन्ना, स्वतः असेम्बली को संबोधित करने वाले हैं.

ठीक ग्यारह बजे असेंब्ली का कामकाज आरम्भ हुआ. कुल ७२ सदस्यों में से ५२ सदस्य उपस्थित थे. पश्चिम पंजाब के दो सिख सदस्यों ने इस असेम्बली का बहिष्कार किया हुआ हैं, तो ज़ाहिर है कि वे भी उपस्थित नहीं हैं. पहली पंक्ति में बैठे, पाकिस्तान के गवर्नर जनरल घोषित किए गए, बैरिस्टर मोहम्मद अली जिन्ना, जब अपनी सीट से उठकर मंच पर जाने लगे तो सभी सदस्यों ने सम्मानपूर्वक, तालियों की गडगडाहट और मेजे थपथपाकर उनका स्वागत किया. जिन्ना ने पाकिस्तान की संसदीय कार्यवाही के रजिस्टर पर सबसे पहले हस्ताक्षर किए. पाकिस्तान की संविधान सभा के अध्यक्ष पद हेतु उन्होंने बंगाल के जोगेन्द्रनाथ मण्डल का नाम प्रस्तावित किया और वह तत्काल मंजूर भी हो गया.

अखंड भारत की अंतरिम सरकार में क़ानून मंत्री रहे, दलितों के नेता जोगेंद्रनाथ मण्डल ही पाकिस्तान की पहली Constituent Assembly के पहले अध्यक्ष बने. जोगेंद्रनाथ मंडल १९४० में काँग्रेस से निष्कासित किए जाने के बाद मुस्लिम लीग में शामिल हुए थे. बंगाल के सुहरावर्दी मंत्रिमंडल में वे मंत्री भी थे. १९४६ में हिंदुओं के खिलाफ बंगाल के कुख्यात ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ की भीषण हिंसा के समय मंडल साहब पूरे बंगाल में प्रवास करते हुए ‘दलितों को मुसलमानों के खिलाफ नहीं होने के लिए’ मनाते रहे. मुस्लिम लीग और जिन्ना ने जोगेंद्रनाथ मण्डल के इस कार्य की ‘सराहना’ की, और उन्हें पुरस्कार स्वरूप असेम्बली का अध्यक्ष बनाया. असेम्बली की आज की कार्यवाही केवल एक घंटा दस मिनट चली. बाहर कोई खास भीड़ नहीं थी और ना ही लोगों में कोई उत्साह दिखाई दिया.

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रविवार दोपहर का समय. पुरानी दिल्ली के मुस्लिम लीग कार्यालय के बाहर अनेक मुसलमान क्रोध में हैं और आपस में विवाद कर रहे हैं. दिल्ली के मुस्लिम व्यापारियों का आरोप है कि ‘मुस्लिम लीग के नेता हमें मुसीबत में छोड़कर पाकिस्तान भाग रहे हैं’. प्रतिदिन निकलने वाली ‘पाकिस्तान स्पेशल ट्रेन’ में मुस्लिम लीग का कोई न कोई नेता पाकिस्तान जा रहा है. इन्हीं नेताओं के विरोध में आक्रोशित मुस्लिम व्यापारियों ने दरियागंज बाज़ार बन्द का आव्हान किया हुआ है. दिल्ली के मुसलमानों को ऐसा लग रहा है कि वे नेतृत्वविहीन हो गए हैं.

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दिल्ली की म्युनिसिपल कमेटी ने बैठकों एवं छोटे-मोटे कार्यक्रमों के लिए एक सुन्दर हॉल का निर्माण किया है. दोपहर के भोजन के बाद नेहरू ने इस नवनिर्मित हॉल का निरीक्षण किया.

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शाम को १७, यॉर्क रोड के अपने विशाल बंगले में नेहरू अपने सेक्रेटरी को एक पत्र का डिक्टेशन दे रहे हैं….

प्रिय लॉर्ड माउंटबेटन,
९ अगस्त को आपके द्वारा लिखे गए उस पत्र हेतु आभार, जिसमें आपने अगले वर्ष से पन्द्रह अगस्त के दिन शासकीय इमारतों पर ‘यूनियन जैक’ फहराने के सम्बन्ध में लिखा है. मुझे आपको यह बताते हुए हर्ष होता है कि आपके सुझाव के अनुसार अगले वर्ष से हम १५ अगस्त को तिरंगे के साथ यूनियन जैक भी फहराएंगे.
आपका विश्वासपात्र
जवाहरलाल नेहरू

यानी जिस ध्वज को खत्म करने, नीचे गिराने के लिए अनेक क्रांतिकारियों, अनेक सत्याग्रहियों ने गोलियां खाईं, अत्याचार सहे… वही यूनियन जैक स्वतंत्रता दिवस के साथ ही और १२ प्रमुख दिनों में भारत की सभी शासकीय इमारतों पर फहरने वाला हैं..!

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दोपहर की परछाईयां अब धीरे-धीरे लंबी होती जा रही हैं. लाहौर के ‘बारूदखाना’ नामक इलाके में मुसलमानों की गंभीर हलचल, अत्यधिक जोश और उत्साह से जारी हैं. यह वही इलाका है, जहां हिंदुओं और सिखों की दिनदहाड़े भी जाने की हिम्मत नहीं होती. इस इलाके में मियाँ परिवार का एकछत्र साम्राज्य हैं. लाहौर के प्रथम नागरिक (मेयर) का यह क्षेत्र हैं. इस क्षेत्र में नियमित रूप से एक भटियारखाना चलता रहता है. हिन्दू-सिख परिवारों को पाकिस्तान से भगाने और उनकी लड़कियां उठाने वाले मुस्लिम गुण्डों के लिए यहां दिन भर खाने-पीने की व्यवस्था रहती है.

आज ‘मियाँ की हवेली’ में षड्यंत्र रचा जा रहा हैं, १४ अगस्त के बारे में. एकमत से यह तय किया होता हैं की १४ अगस्त के बाद लाहौर में एक भी हिन्दू-सिख को नहीं रहने दिया जाएगा. यह योजना, इसी सन्दर्भ में बन रही हैं.

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अब केवल अगले चार दिन ही अखंड रहने वाले इस भारत में, शाम की विभिन्न छटाएं देखने को मिल रही हैं. जहां सुदूर पूर्व अर्थात असम और कलकत्ता में दीपक और बिजली जलाने का समय हो चुका हैं, वहीं पूर्व में पेशावर और माउंटगोमरी में अभी भी धूप अपने हाथ-पैर लंबे कर, अलसाई हुई मुद्रा में शाम ढलने का इंतज़ार कर रही हैं.

इसी पृष्ठभूमि में, अलवर, हापुड, लायलपुर, अमृतसर जैसे शहरों से भयंकर दंगों की ख़बरें लगातार आती जा रही हैं. अनेक हिंदुओं के मकानों पर आग लगाए हुए कपड़े के गोले फेंके जा रहे हैं. अनेक हिंदू बस्तियों में व्यापारियों की दुकाने लूटकर उन्हें खाली कर दिया गया हैं.

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लाहौर स्थित जेल रोड पर रहने वाले वीरभान. असिस्टेंट डायरेक्टर ऑफ इंडस्ट्रीज़ जैसे बड़े पद पर आसीन, एकदम जिंदादिल, परोपकारी व्यक्ति. लाहौर शहर की अस्थिर और खतरनाक स्थिति को देखते हुए, उन्होंने रविवार की छुट्टी का फायदा उठाते हुए, यह शहर छोड़ने का निर्णय लिया. इस काम के लिए उन्होंने दो ट्रक बुक किए. अनेक वर्षों तक उनकी सेवा करने वाला और उन्हें भरोसेमंद लगने वाला उनका ड्रायवर मुसलमान ही हैं. वीरभान ने उसी को ट्रक में भरने के लिए कुछ कुली लाने भेजा. उनका वह कथित भरोसेमंद मुस्लिम ड्रायवर, लाहौर के मोझंग इलाके के कुछ मुस्लिम गुण्डों को कुली के रूप में ले आया. शाम तक उन सभी ने वीरभान का सारा सामान दोनों ट्रकों में भर लिया. जब वीरभान महोदय कुलियों को पैसा देने पहुंचे, तो उन सभी ने आपस में मिलकर वीरभान पर आक्रमण कर दिया. चाकुओं के लगातार कई वार किए. अपने पति को तडपते हुए रक्त में डूबा देखकर उनकी पत्नी को चक्कर आ गए. गुण्डों ने उन्हें भी ट्रक में डाला और रात के अंधेरे में दोनों ही ट्रक उनके इच्छित स्थान की तरफ रवाना हो गए. सौभाग्य केवल इतना ही रहा कि वीरभान की दोनों किशोरवयीन लड़कियां, यह घटना देखकर पिछले दरवाजे से निकल भागीं और सीधे हिन्दू बहुल मोहल्ले ‘किशन नगर’ में ही रुकीं… इसीलिए वे बच गईं.

एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी की, पंजाब की राजधानी में, एक भरीपूरी बस्ती के बीचोंबीच, दस अगस्त की शाम को हत्या और लूटपाट कर दी गई, लेकिन कोई हलचल नहीं हुई.

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जिस समय लाहौर में वीरभान रक्त के तालाब में डूबे तड़प रहे थे, और वे मुस्लिम गुण्डे उनकी पत्नी के साथ ही उनकी पूरी संपत्ति लूट रहे थे….. ठीक उसी समय आठ सौ मील दूर कराची में पाकिस्तान के आगामी वज़ीर-ए-आज़म, लियाकत अली का वक्तव्य अखबारों के कार्यालयों में पहुंच चुका था. लियाकत अली ने अपने प्रेस नोट में लिखा था कि, “हम बारंबार आश्वासन देते हैं कि पाकिस्तान में गैर-मुस्लिमों को न केवल संरक्षण दिया जाएगा, बल्कि उन्हें कायदे-क़ानून के अनुसार पूरे अधिकार भी प्रदान किए जाएंगे. हिन्दू यहां पूरी तरह सुरक्षित रहेंगे. लेकिन दुर्भाग्य से हिन्दुस्तान के बहुसंख्यक हिन्दू लोग इस प्रकार से नहीं सोच रहे हैं.”

लियाकत अली ने आगे लिखा कि, “भारत के विविध प्रान्तों से जो ख़बरें आ रही हैं… खासकर पूर्वी पंजाब, पश्चिम बंगाल और संयुक्त प्रान्त से, उसके अनुसार हमारे मुस्लिम बंधुओं पर बहुसंख्यक हिन्दू जबरदस्त अत्याचार कर रहे हैं. काँग्रेस पार्टी के अध्यक्ष स्वयं ही सिंध प्रांत के अपने दौरे में यहां के हिंदुओं को हमारे खिलाफ भड़का रहे हैं. विभिन्न प्रेस रिपोर्ट्स के जरिये मेरी जानकारी में आया है कि कृपलानी ने यह धमकी दी है कि सिंध प्रांत के हिन्दू क़ानून अपने हाथों में लेंगे, और जो घटनाएं बिहार में हुई हैं, वैसी ही सिंध में भी दोहराई जाएंगी….!”

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लाहौर का संघ कार्यालय…. वैसे तो छोटा सा ही हैं, परन्तु आज कार्यकर्ताओं / स्वयंसेवकों की भीड़ से भरा हुआ हैं. रविवार दस अगस्त की रात को दस बजे भी इस कार्यालय में खासी चहल-पहल हैं. स्वयंसेवकों के चेहरे से साफ़ दिख रहा हैं कि वे तनावग्रस्त हैं. लाहौर के हिन्दू और सिखों को सुरक्षित रूप से भारत की तरफ वाले पंजाब कैसे पहुंचाया जाए, इसकी चिंता सभी के मन में हैं.

 

कार्यालय के बाहर संघ के संस्थापक डॉक्टर हेडगेवार की अर्ध-प्रतिमा लगी हुई हैं. पास के मकान से आने वाले बल्ब की पीली रोशनी मूर्ति पर पड़ने से वह चेहरा चमक रहा हैं. डॉक्टर हेडगेवार की देश में यह पहली मूर्ति हैं. लेकिन यह मूर्ति गवाह हैं, कि पंजाब प्रांत के स्वयंसेवकों ने पिछले दिनों, हिंदु-सिखों को बचाने के लिए किस प्रकार अदम्य साहस, धैर्य, पुरुषार्थ एवं जिजीविषा का परिचय दिया हैं….!

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जेएनयू में फीस वृद्धि के नाम पर राजनीति

—यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं

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सुरेश हिन्दुस्थानी

देश के उच्च शिक्षा केन्द्र जब राजनीति के अड्डे बनने की ओर कदम बढ़ाने लगें, तब वहां की शिक्षा की दिशा-दशा क्या होगी, यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। फीस बढ़ोतरी के खिलाफ किया जाने वाला दिल्ली का छात्र आंदोलन कुछ इसी प्रकार का भाव प्रदर्शित कर रहा है, जहां केवल और केवल राजनीति ही की जा रही है। किसी भी आंदोलन की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके पीछे जनहित का कितना भाव है। दिल्ली का यह आंदोलन जनसरोकार से कोसों दूर दिखाई दे रहा है।

हालांकि इसके पीछे बहुत से अन्य कारण भी होंगे। सबसे बड़ा कारण तो यही है कि आज जेएनयू की जो छवि जनता के बीच बनी है, वह जनता को खुद ही दूर कर रही है। जिस विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारों की ध्वनि गूंजित होती है, वह कभी जन आंदोलन का हिस्सा नहीं बन सकते हैं।दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के जिन छात्रों ने कभी भारत के टुकड़े करने के नारे लगाए थे, आज वे ही छात्र फीस बढ़ोतरी के छोटे से मामले को राजनीतिक रुप देने का प्रयास करते दिखाई दे रहे हैं। इस छात्र आंदोलन का राजनीतिक स्वरुप इसलिए भी दिखाई दे रहा है, क्योंकि इसमें राष्ट्रीय मानबिन्दुओं और केन्द्र सरकार को सीधे निशाने पर लिया जा रहा है। जेएनयू वामपंथी विचारधारा का एक बड़ा केन्द्र रहा है।

वामपंथी धारा के कार्यकर्ता देश के महानायकों के बारे में क्या सोच रखते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। पिछले घटनाक्रमों को देखें तो पाएंगे कि जेएनयू में देश के विरोध में वातावरण बनाने का काम किया जाता रहा है। वहां आतंकवादी बुरहान वानी के समर्थन में कार्यक्रम किए जाते हैं। सवाल यह कि जेएनयू में शिक्षा के नाम पर आखिर क्या हो रहा है। जहां तक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में फीस बढ़ोतरी की बात है तो यह कहना तर्कसंगत ही होगा कि विगत 19 वर्ष से विश्वविद्यालय के छात्रावास के कमरों और भोजन का शुल्क नहीं बढ़ाया गया, जबकि पिछले 19 सालों में महंगाई का ग्राफ बहुत ऊपर गया है। इस सबका भार पूरी तरह से विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के कंधों पर ही आया। देश के अन्य विश्वविद्यालयों में भी शिक्षा महंगी हो रही है, जो जेएनयू के मुकाबले बहुत अधिक है। ऐसे में विश्वविद्यालय द्वारा कुछ हद तक फीस बढ़ाना न्यायोचित कदम ही है। जिसे वहां के कई छात्र भी सही मानते हैं। लेकिन यह आंदोलन इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि इसमें परदे के पीछे राजनीतिक कार्यकर्ता भूमिका निभा रहे हैं। यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं।

खैर… यह जांच का विषय हो सकता है।देश के प्रसिद्ध अधिवक्ता सांसद डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने इस छात्र आंदोलन के बारे में बहुत ही गहरी बात कही है। उनका मानना है कि जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय को कुछ समय के लिए बंद कर दिया जाए। उनके इस कथन के गहरे निहितार्थ निकल रहे हैं। स्वामी के संकेत को विस्तार से समझना हो तो एक बार जेएनयू की गतिविधियों का अध्ययन करना चाहिए। फिर वह सब सामने आ जाएगा जो वहां होता है। कहा जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जमकर राजनीति की जाती रही है। देश के जो शिक्षा केन्द्र राजनीति के केन्द्र बनते जा रहे हैं, उन पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है।

वर्तमान में जिस प्रकार से जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय का आंदोलन चल रहा है, उसे छात्र आंदोलन कहना न्याय संगत नहीं होगा। क्योंकि, यह विशुद्ध राजनीतिक आंदोलन है। फीस बढ़ोतरी का विरोध तो मात्र बहाना है। इस आंदोलन के समर्थन में देश की संसद में कांग्रेस और वामपंथी दलों की ओर से आवाज उठाई गई। इससे यही संदेश जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जो देश विरोधी नारे लगाए गए, उनके प्रति इन राजनीतिक दलों के समर्थन का ही भाव रहा होगा। इतना ही नहीं, जब भारत तेरे टुकड़े होंगे और हमें चाहिए आजादी जैसे नारे लगाए गए थे, तब भी कांग्रेस और वाम दलों ने खुलेआम समर्थन किया था। ऐसे में सवाल यह उठता है कि कहीं यही दोनों दल छात्रों को आंदोलन करने के लिए तो नहीं उकसा रहे? अगर यह सही है तो फिर केन्द्र सरकार को दोष देना सही नहीं कहा जा सकता।

जब से देश में राजनीतिक सत्ता का परिवर्तन हुआ है, तब से ही देश में उन संस्थानों की सक्रियता दिखाई देने लगी है, जो भारत के बारे में भ्रम का वातावरण बनाने में सहायक हो सकते हैं। चाहे वह शहरी नक्सलवाद को प्रायोजित करने वाले कथित बुद्धिजीवियों की संस्था हो या फिर उनके विचार को अंगीकार करने वाली ही संस्थाएं क्यों न हों। सभी केन्द्र सरकार का विरोध करने के लिए आगे आ रहे हैं। इस विश्वविद्यालय में पढ़ाई करने वाले छात्र कभी भारतीय सेना द्वारा की जाने वाली आतंकियों के विरोध में कार्यवाही पर सवाल उठाते दिखाई देते हैं तो कभी अनुच्छेद 370 को हटाने का विरोध करते हैं। चार वर्ष पूर्व जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में छात्र संघ की उपाध्यक्ष रहीं शेहला राशिद ने भारतीय सेना के विरोध में जमकर भड़ास निकाली थी, जबकि सेना की ओर से स्पष्ट कहा गया था कि ऐसा कुछ भी नहीं है। इससे समझ में आ सकता है कि इस विश्वविद्यालय में कौन-सा पाठ पढ़ाया जाता है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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देश की युवा पीढ़ी में विदेशों के प्रति रुचि बढ़ी

—गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है

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मनोज ज्वाला

एक मीडिया संस्थान के सर्वेक्षण के अनुसार हमारे देश के पढ़े-लिखे और शहरी नौजवानों में से आधे से अधिक ऐसे हैं, जो अपने देश को पसंद नहीं करते। वे विदेशों में जाकर बस जाना चाहते हैं। लगभग दो साल पहले के उक्त सर्वेक्षण के मुताबिक उनमें से 75 फीसदी युवाओं का कहना था कि वे बे-मन और मजबूरीवश भारत में रह रहे हैं। 62.08 फीसदी युवतियों और 66.01 फीसदी युवाओं का मानना था कि भारत  में उनका भविष्य सुरक्षित नहीं है। क्योंकि, यहां अच्छे दिन आने की संभावना कम है। उनमें से 50 फीसदी का मानना था कि भारत में किसी महापुरुष का अवतरण होगा, तभी हालात सुधर सकते हैं, अन्यथा नहीं।

40 फीसदी युवाओं का मानना था कि उन्हें अगर इस देश का प्रधानमंत्री बना दिया जाए, तो वे पांच साल में इस देश का कायापलट कर देंगे।अखबार का वह सर्वेक्षण आज भी बिल्कुल सही लगता है। अगर व्यापक स्तर पर सर्वेक्षण किया जाता, तो देश छोड़ने को तैयार युवाओं का प्रतिशत और अधिक दिखता। वह सर्वेक्षण तो सिर्फ शहरों तक सीमित था। अपने देश में गांवों पर भी तेजी से शहर छाते जा रहे हैं। गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है। गौर कीजिए कि देश छोड़ने को तैयार वे युवा पढ़े-लिखे हैं और शहरों में पले-बढ़े हैं। वे किस पद्धति से किस तरह के विद्यालयों में क्या पढ़े-लिखे हैं और किस रीति-रिवाज से कैसे परिवारों में किस तरह से पले-बढ़े हैं, यह ज्यादा गौरतलब है।

विद्यालय सरकारी हों या गैर सरकारी, सभी में शिक्षा की पद्धति एक है और वह है मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा पद्धति। भारतीयता विरोधी इसी शिक्षा पद्धति को सरकारी मान्यता प्राप्त है। सरकार का पूरा तंत्र इसी तरह की शिक्षा के विस्तार में लगा हुआ है। वैसे अंग्रेजी माध्यम वाले विद्यालय सबसे अच्छे माने जाते हैं और गैर-सरकारी निजी क्षेत्र के अधिकतर विद्यालय अंग्रेजी माध्यम के ही हैं। शहरों में ऐसे ही विद्यालयों की भरमार है और जिन युवाओं के बीच उक्त मीडिया संस्थान ने उपरोक्त सर्वेक्षण किया उनमें से सर्वाधिक युवा ऐसे ही तथाकथित ‘उत्कृष्ट’ विद्यालयों से पढ़े-लिखे हुए हैं। अब रही बात यह कि इन विद्यालयों में आखिर शिक्षा क्या और कैसी दी जाती है, तो यह इन युवाओं की उपरोक्त सोच से ही स्पष्ट है।

जाहिर है, उन्हें शिक्षा के नाम पर ऐसी-ऐसी डिग्रियां दी जाती हैं, जिनके कारण वे महात्वाकांक्षी, स्वार्थी बनकर असंतोष, अहंकार, खीझ, पलायन एवं हीनता-बोध से ग्रसित हो जाते हैं और कमाने-खाने भर थोड़े-बहुत हुनर हासिल कर स्वभाषा व स्वदेश के प्रति ‘नकार’ भाव से पीड़ित होकर विदेश चले जाते हैं।थॉमस विलिंग्टन मैकाले कोई शिक्षा-शास्त्री नहीं था। वह एक षड्यंत्रकारी था, जिसने भारत पर ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जड़ें जमाने की नीयत से भारतीय शिक्षा-पद्धति की जड़ें उखाड़कर मौजूदा शिक्षा-पद्धति को प्रक्षेपित किया था। जो आज भी उसी रूप में कायम है। 20 अक्टूबर 1931 को लंदन के रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ फौरन अफेयर्स के मंच से महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘अंग्रेजी शासन से पहले भारत की शिक्षा-व्यवस्था इंग्लैण्ड से भी अच्छी थी।’ उस पूरी व्यवस्था को सुनियोजित तरीके से समूल नष्ट कर देने के पश्चात ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जरूरतों के मुताबिक उसके रणनीतिकारों ने लम्बे समय तक बहस-विमर्श कर के मैकाले की योजनानुसार यह शिक्षा-पद्धति लागू की थी।

मैकाले ने ब्रिटिश पार्लियामेंट की शिक्षा समिति के समक्ष कहा था ‘हमें भारत में ऐसा शिक्षित वर्ग तैयार करना चाहिए, जो हमारे और उन करोड़ों भारतवासियों के बीच जिन पर हम शासन करते हैं, उन्हें समझाने-बुझाने का काम कर सके। जो केवल खून और रंग की दृष्टि से भारतीय हों, किन्तु रुचि, भाषा व भावों की दृष्टि से अंग्रेज हों।’ विदेशों में बस जाने को उतावले भारतीय युवाओं ने पूरी मेहनत व तबीयत से मैकाले शिक्षा-पद्धति को आत्मसात किया है, ऐसा समझा जा सकता है। यहां प्रसंगवश मैकाले के बहनोई चार्ल्स ट्रेवेलियन द्वारा ब्रिटिश पार्लियामेंट की एक समिति के समक्ष ‘भारत में भिन्न-भिन्न शिक्षा-पद्धतियों के भिन्न-भिन्न परिणाम’ शीर्षक से प्रस्तुत किये गए एक लेख का यह अंश भी उल्लेखनीय है कि ‘मैकाले शिक्षा-पद्धति का प्रभाव अंग्रेजी राज के लिए हितकर हुए बिना नहीं रह सकता। हमारे पास उपाय केवल यही है कि हम भारतवासियों को यूरोपियन ढंग की उन्नति में लगा दें। इससे हमारे लिए भारत पर अपना साम्राज्य कायम रखना बहुत आसान और असंदिग्ध हो जाएगा।’ ऐसा ही हुआ। बल्कि, मैकाले की योजना तो लक्ष्य से ज्यादा ही सफल रही।

हमारे देश के मैकालेवादी राजनेताओं ने अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासन की समाप्ति के बाद भी उनकी अंग्रेजी-मैकाले शिक्षा-पद्धति को न केवल यथावत कायम रखा, बल्कि उसे और ज्यादा अभारतीय रंग-ढंग में ढाल दिया। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष लक्षित प्राचीन भारतीय शिक्षा-पद्धति को अतीत के गर्त में डालकर शिक्षा को उत्पादन-विपणन-मुनाफा-उपभोग-केन्द्रित बना देने और उसे नैतिक सांस्कृतिक मूल्यों से विहीन कर देने तथा राष्ट्रीयता के प्रति उदासीन बना देने का ही परिणाम है कि हमारी यह युवा पीढ़ी महज निजी सुख-स्वार्थ के लिए अपने देश से विमुख हो जाना पसंद कर रही है। उसे विदेशों में ही अपना भविष्य दीख रहा है।

माना कि हमारे देश में तरह-तरह की समस्याएं हैं, किन्तु इनसे जूझने और इन्हें दूर करने की बजाय पलायन कर जाने अथवा कोरा लफ्फाजी करने कि हमें प्रधानमंत्री बना दिया जाए तो हम देश को सुंदर बना देंगे, अति महात्वाकांक्षा-युक्त मानसिक असंतुलन का ही द्योत्तक है। लेकिन आधे से अधिक ये शहरी युवा मानसिक रुप से असंतुलित नहीं हैं, बल्कि असल में वे पश्चिम के प्रति आकर्षित हैं। इसके लिए हमारे देश की चालू शिक्षा-पद्धति का पोषण करने वाले हमारे राजनेता ही जिम्मेवार हैं। यह ‘यूरोपियन ढंग की उन्नति’ के प्रति बढ़ते अनावश्यक आकर्षण का परिणाम है। इस मानसिक पलायन को रोकने के लिए जरूरी है कि हम अपने बच्चों को हमारे राष्ट्र की जड़ों से जोड़ने वाली और संतुलित समग्र मानसिक विकास करने वालीप्राचीन भारतीय पद्धति से भारतीय भाषाओं में समस्त ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा देने की सम्पूर्ण व्यवस्था कायम करें।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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भाई-बहन में प्रेम भाव बढ़ाता है भैया दूज

–बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था

Published

योगेश कुमार गोयल

(भैया दूज, 29 अक्टूबर पर विशेष)

भाई-बहन के दिलों में पावन संबंधों की मजबूती और प्रेमभाव स्थापित करने वाला पर्व है भैया दूज। इस दिन बहनें अपने भाईयों को तिलक लगाकर ईश्वर से उनकी दीर्घायु की कामना करती हैं। कहा जाता है कि इससे भाई यमराज के प्रकोप से बचे रहते हैं। दीपावली के दो दिन बाद अर्थात कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाए जाने वाले इस पर्व को ‘यम द्वितीया’ व ‘भ्रातृ द्वितीया’ के नाम से भी जाना जाता है। बहुत से भाई-बहन सौभाग्य तथा आयुष्य की प्राप्ति के लिए इस दिन यमुना अथवा अन्य पवित्र नदियों में साथ-साथ स्नान भी करते हैं। भैया दूज मनाने के संबंध में कई किवंदतियां प्रचलित हैं। एक कथा यमराज और उनकी बहन यमुना देवी से संबंधित है। बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था। यमुना अपने भाई यमराज से बहुत स्नेह करती थीं और अक्सर उनसे अनुरोध करती रहती थीं कि वे अपने इष्ट-मित्रों सहित उसके घर भोजन के लिए पधारें लेकिन यमराज हर बार उसके निमंत्रण को किसी न किसी बहाने से टाल जाते। कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमुना ने यमराज को एक बार फिर भोजन के लिए आमंत्रित किया।

उस समय यमराज ने विचार किया कि मैं तो अपने कर्त्तव्य से बंधा सदैव प्राणियों के प्राण ही हरता हूं। इसलिए इस चराचर जगत में कोई भी मुझे अपने घर नहीं बुलाना चाहता। लेकिन बहन यमुना तो मुझे बार-बार अपने घर आमंत्रित कर रही है। इसलिए अब तो उसका निमंत्रण स्वीकार करना ही चाहिए।यमराज को अपने घर आया देख यमुना की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने भाई का खूब आदर-सत्कार करते हुए उनके समक्ष नाना प्रकार के व्यंजन परोसे। बहन के आतिथ्य से यमराज बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे कोई वर मांगने को कहा। इस पर यमुना ने उनसे अनुरोध किया कि आप प्रतिवर्ष इसी दिन मेरे घर आकर भोजन करें और मेरी तरह जो भी बहन इस दिन अपने भाई का आदर-सत्कार करे, उसे तुम्हारा भय न रहे। यमराज ने बहन यमुना को उसका इच्छित वरदान दे दिया। ऐसी मान्यता है कि उसी दिन से ‘भैया दूज’ का पर्व मनाया जाने लगा। भैया दूज के संबंध में और भी कई कथाएं प्रचलित हैं। ऐसी ही एक कथा के अनुसार, एक ब्राह्मण की दो संतानें थी।

एक पुत्र एवं एक पुत्री। पुत्री बहुत समझदार एवं गुणवती थी। वह अपने भाई से जी-जान से प्यार करती थी। एक दिन उसका भाई उससे मिलने उसकी ससुराल पहुंचा। उस समय वह सूत कातने में व्यस्त थी। अतः उसे भाई के आने का पता ही न चल सका। भाई भी बिना कुछ बोले चुपचाप एक ओर बैठा रहा। जब थोड़ी देर बाद बहन की नजर उस पर पड़ी तो भाई को अपने घर आया देख उसे बेहद खुशी हुई। उसने भाई का भरपूर आदर-सत्कार किया। अगले दिन भाई को वापस लौटना था। अतः रास्ते के लिए वह आटे के पकवान बनाने के उद्देश्य से चक्की में आटा पीसने लगी। अनजाने में चक्की में बैठा सांप भी आटे के साथ पिस गया। उसी आटे के पकवान एक पोटली में बांधकर उसने भाई को रास्ते में खाने के लिए देकर विदा किया। भाई के घर से जाने के बाद जब उसे यह मालूम हुआ कि आटे में सांप पिस गया है तो अपने पुत्र को पालने में ही सोता छोड़कर वह अपने भाई के प्राणों की रक्षा के लिए दौड़ी। कुछ दूर जाने पर उसे एक पेड़ की छांव में अपना भाई सोता दिखाई दिया। तब तक उसने पोटली में से कुछ भी नहीं खाया था। उसने भगवान का शुक्रिया अदा किया और पोटली उठाकर दूर फेंक दी तथा भाई के साथ मायके की ओर चल दी।

रास्ते में उसने देखा कि भारी-भारी शिलाएं आकाश में उड़ रही हैं। उसने एक राहगीर से इस रहस्य के बारे में जानना चाहा तो उसने बताया कि जो बहन अपने भाई पर कभी नाराज न होती हो और उसे दिलो-जान से चाहती हो, उस भाई की शादी के समय ये शिलाएं उसकी छाती पर रखी जाएंगी। थोड़ी दूर चलने पर उसे नाग-नागिन दिखाई दिए। नाग ने बताया कि ये शिलाएं जिस व्यक्ति की छाती पर रखी जाएंगी, हम उसे डंस लेंगे। जब बहन ने इस विपत्ति से बचने का उपाय पूछा तो नाग-नागिन ने बताया कि अगर भाई के विवाह के समय उसके सभी कार्य बहन स्वयं करे, तभी भाई की जान बच सकती है।जब उसके भाई के विवाह के लग्न का शुभ मुहूर्त आया तो वह भाई को पीछे धकेलती हुई स्वयं ही लग्न चढ़वाने के लिए आगे हो गई और घोड़ी पर भी स्वयं चढ़ गई। परिवारजन और संबंधी उसके इस विचित्र व्यवहार से हैरान तथा क्रोधित थे। उसके घोड़ी पर चढ़ते ही शिलाएं उड़ती-उड़ती आई लेकिन घोड़ी पर किसी पुरूष की जगह एक महिला को बैठी देख वापस मुड़ गई। जब सुहागरात का समय आया तो वह भाई को पीछे कर खुद भाभी के साथ सोने उसके कमरे में चली गई।

परिवार के सभी सदस्य तथा सभी रिश्तेदार उसके इस अजीबोगरीब व्यवहार से बेहद आश्चर्यचकित और खफा थे। उन्हें उस पर गुस्सा तो बहुत आ रहा था लेकिन उसके जिद के समक्ष सभी विवश थे। सुहागरात पर नियत समय पर नाग-नागिन उसके भाई को डंसने कमरे में पहुंच गए लेकिन उसने नाग-नागिन को मारने की सारी तैयारी पहले ही कर रखी थी। आखिरकार उसने नाग-नागिन का काम तमाम कर दिया। उसके बाद वह निश्चिंत होकर सो गई। सुबह होने पर सभी मेहमानों को विदा करने के बाद परिवार वालों ने सोचा कि अब इस बला को भी कुछ बचा-खुचा देकर यहां से चलता कर दिया जाए लेकिन नींद से जागने पर जब उसने पूरी घटना के बारे में सब को विस्तार से बताया कि किस प्रकार वह अपने बच्चे को पालने में ही सोता छोड़कर दौड़ी-दौड़ी भाई के प्राण बचाने के लिए उसके पीछे चली आई और सभी को नाग-नागिन के मृत शरीर दिखाए तो सभी की आंखों में आंसू आ गए।

भाई के प्रति उसका असीम प्यार तथा समर्पण भाव देखकर उसके प्रति सभी का हृदय श्रद्धा से भर गया।भाई-भाभी तथा माता-पिता ने उसे ढेर सारे उपहारों से लादकर बड़े मान-सम्मान के साथ खुशी-खुशी ससुराल से विदा किया। भाई-बहन के बीच इसी प्रकार के पावन संबंध, प्रेमभाव तथा उनके दिलों में आपसी संबंधों को मजबूत बनाने के लिए ही ‘भैया दूज’ पर्व मनाया जाता है।

(लेखक स्तंभकार हैं।)

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