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यादों में अटल जी : कूटनीति व आर्थिक उदारीकरण के पुरोधा थे वाजपेयी

अटल बिहारी वाजपेयी कटु आलोचक विरोधी दलों के नेताओं को भी अपने व्यवहार से, इज्जत देकर प्रभावित कर लेते थे,

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नई दिल्ली । अटल बिहारी वाजपेयी कटु आलोचक विरोधी दलों के नेताओं को भी अपने व्यवहार से, इज्जत देकर प्रभावित कर लेते थे, जिसके चलते विपक्ष उनकी बात मान लेता था। इसके कई उदाहरण हैं। पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने एक वर्ष पहले कहा था कि वाजपेयी तब प्रधानमंत्री थे। वह एक दिन सदन में सीधे विपक्ष की बेंच की तरफ चले आए और उनसे (प्रणव मुखर्जी) से मिले। जिस पर उन्होंने( प्रणव मुखर्जी ने) कहा था , प्रधानमंत्री जी, आप संदेश भेजवा दिये होते, मैं मिलने चला आता। इस पर वाजपेयी ने कहा था, यह बहुत छोटी बात है| हम सब साथी,सहकर्मी हैं।
वाजपेयी ने उस समय प्रणव मुखर्जी से एक विशेष आग्रह किया। कहा ,वह चाहते हैं कि विपक्ष जार्ज फर्नाडीज पर नरम रूख अपना ले, क्योंकि जार्ज गंभीर स्वास्थ्य समस्या से पीड़ित हैं। मुखर्जी इसके लिए तैयार हो गए। यह उन्होंने प्रधानमंत्री वाजपेयी द्वारा विपक्ष को आदर देने के कारण किया।
वाजपेयी जब पहली बार प्रधानमंत्री बने थे तो उनको 13 वें दिन विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ा था। जिसमें उनकी सरकार तो गिर गई, लेकिन अविश्वास प्रस्ताव पर 01 जून 1996 को जो उन्होंने बोला वह अद्भुत था। विपक्ष पर तीखा प्रहार किया, लेकिन एक भी शब्द ऐसा नहीं जिससे कोई विपक्षी नेता, विपक्षी पार्टी आहत हुई हो| किसी भी पार्टी नेता पर व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं की, लेकिन अपनी बात बहुत ही मारक तरीके से रख दी। शब्द ऐसे, भाव ऐसे, विपक्ष के एक-एक आरोप की काट ऐसी कि उनकी सरकार गिरने के बाद कई विपक्षी नेताओं ने बिना लाग लपेट कहा था, वाजपेयी जी की सरकार भले गिर गई, लेकिन वह जीत गए।

उसका असर बाद के चुनाव में दिखा। वाजपेयी से, उनकी पार्टी से कई मुद्दों पर मतभेद होने के बावजूद उनको (वाजपेयी ) गुरूदेव कहने वाले चन्द्रशेखर ने तो संसद में ही कहा था कि मुझे यदि यह पता होता कि यह सरकार ( वाजपेयी की) एक वोट से गिर जाएगी तो मैं अपना वोट इसको दे दिया होता। लोकसभा में उस समय वाजपेयी के दिये भाषण का टेलीविजन के मार्फत सीधे प्रसारण हुआ था। जिसने जनता पर जो असर किया उसका नतीजा यह निकला कि इसके बाद वाजपेयी को 13 माह की सत्ता और उसके बाद 05 साल की सत्ता मिली। किसी गैर कांग्रेसी पार्टी के नेता का पहली बार 05 वर्ष प्रधानमंत्री रहने का रिकार्ड बना।
इस बारे में बीएचयू छात्र संघ के अध्यक्ष रहे, उ.प्र. कांग्रेस के पदाधिकारी का कहना है कि 16 अगस्त 2018 की शाम को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के देहावसान की सूचना के बाद कई टेलीविजन चैनलों पर उनकी सरकार के विरूद्ध 1996 में और उसके बाद एक बार और विपक्ष द्वारा लाये गये अविश्वास प्रस्ताव पर उनको (वाजपेयी ) बोलते हुए , विपक्ष के एक-एक आरोप का जवाब देते हुए दिखाया गया।

विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव पर उनके दोनों भाषण को सुनने के बाद, इसी माह (अगस्त 2018) अभी हाल ही में खत्म हुए संसद के मानसून सत्र में विपक्ष द्वारा लाये गये अविश्वास प्रस्ताव पर वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बोलते हुए जो सुना था, उसकी याद आ गई। दोनों की तुलना करने पर लगा कि अटल बिहारी वाजपेयी का भाषण कितना अद्भुत था। विपक्ष पर प्रखर प्रहार करने के बावजूद कहीं कटुता, घमंड, अकड़, ऐंठ व पूर्ववर्ती विपक्षी सरकारों के कार्यों को नकारने वाला नहीं था। किसी भी विपक्षी नेता पर व्यक्तिगत प्रहार या कटु व्यंग्य वाला नहीं था।

उनके वाले भाजपा राज, राजा व शासन और आज के भाजपा राज, राजा व शासन की तुलना करने पर आभास हो रहा है कि वाजपेयी जी कितने बड़े थे। मन से, कर्म से, वाणी से, व्यवहार से, हर मामले में बड़े थे। उनके इस विराट व्यक्तित्व के सामने तो आज की भाजपा के नेता बौने लगते हैं। उनको जन-जन तक अपनी बात पहुंचाने की न तो तब इवेंट मैनेजमेंट की जरूरत थी, न देह त्यागने के बाद रही। उनके न रहने की खबर के बाद दो दिन से देशभर के जनमानस में जो भाव बना है वह साबित करता है वह कितने विराट थे। जबकि बीते एक दशक से बीमार होने के कारण उनका जनता से मिलना-जुलना बंद हो गया था।
इस बारे में वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह का कहना है कि इस समय की राजनीतिक व सामाजिक हालात क्या हो गई है सबको पता है। जो सत्ता में होता है, पावरफुल पद पर होता है, जिससे कुछ लाभ होने की उम्मीद होती है, उसके पीछे हुजूम लगा रहता है। वाजपेयी जी का तो बीमारी के कारण एक दशक से अधिक समय से जनता से मिलना-जुलना ही बंद हो गया था। न तो वह किसी के लिए कुछ करने की स्थिति में थे, न ही कुछ कहने की स्थिति में। इसके बावजूद उनके पार्थिव शरीर को देखने के लिए जिस तरह से जनता उमड़ी, जिस तरह से देशभर में उनके न रहने का दु:ख जताया जा रहा है, विशेषकर युवा वर्ग द्वारा, इससे यह साबित होता है कि उनका प्रभाव कितना व्यापक रहा है। उनका कद कितना बड़ा रहा है। वह कितने लोकप्रिय रहे हैं।
इस बारे में गुजरात के वरिष्ठ पत्रकार डा. हरि देसाई का कहना है कि ममता बनर्जी ने यूं ही नहीं कहा कि अटल जी के कार्य करने का तरीका वर्तमान सरकार के कार्य करने के तरीके से बिल्कुल भिन्न था। दोनों में कोई समानता ही नहीं है। हरि देसाई का कहना है कि यह अटल जी की कार्य पद्धति, बड़े मन, सबको साथ लेकर चलने, विपक्ष व उनके नेताओं की भी इज्जत करने का प्रमाण है। यह बात वर्तमान केन्द्र सरकार में नहीं है। शायद इसी के मद्देनजर बसपा प्रमुख मायावती ने कहा है कि अटल जी रहते तो भाजपा इतनी अहंकारी पार्टी नहीं बनती।
वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार जयंत राय चौधरी का कहना है कि वाजपेयी जैसा व्यक्ति हजारों वर्षों में एक बार पैदा होता है। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी सहमति बनाकर आर्थिक सुधार की गति को जारी रखा। उन्होंने जिनको भी मंत्री बनाया, उनको फ्री हैंड दिया, खुलकर काम करने की स्वतंत्रता दी। उसी का परिणाम है कि देश की आर्थिक सुधार की जो नींव पीवी नरसिंह राव ने रखी थी, वह जारी रह सकी। जिसके चलते देश आज इतनी प्रगति किया है। उन्होंने 1999 में नई दूरसंचार नीति लाई। बीमा को निजी कम्पनियों के लिए खोला। सरकारी उपक्रमों का निजीकरण शुरू किया, जिसमें बाल्को, वीएसएनएल को निजी कम्पनियों को बेचा गया। स्वर्ण चतुर्भुज योजना की शुरूआत की, जिससे देशभर में बेहतर रोड सुविधा बनी। बंगाल के तत्कालीन वित्त मंत्री असीम दासगुप्ता के नेतृत्व में “एक राष्ट्र, एक कर ” के लिए समिति बनाई, जो जीएसटी का आधार बनी। जो 2017 में जीएसटी के रूप में लागू हुई।
वाजपेयी का विपक्षी दलों से इतना संबंध था कि 2001 में तहलका कांड भी उनकी साख को क्षति नहीं पहुंचा सका। उस समय लोकसभा में प्रमुख विपक्षी नेता सोमनाथ चटर्जी (माकपा),माधव राव सिंधिया और प्रियरंजन दास मुंशी (कांग्रेस) ने वाजपेयी का खुलकर बचाव किया था और कहा था कि उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी पर शक नहीं किया जा सकता।
विपक्ष से वाजपेयी के घनिष्ठ संबंधों का एक और महत्वपूर्ण उदाहरण है इराक मामला। उस समय इराक के विरूद्ध लगा अमेरिका भारत पर अपने 20,000 सैनिक इराक में युद्ध के लिए भेजने का दबाव बनाया हुआ था। अचरज यह है कि वाजपेयी मंत्रिमंडल के उनके प्रमुख सहयोगी आडवाणी, जसवंत, जार्ज चाहते थे कि सैनिक इराक भेजे जायें। जबकि अटल बिहारी वाजपेयी इसके पक्ष में नहीं थे।

उनका मत था कि इससे भारत को सैनिकों का तो नुकसान होगा ही, तटस्थतावाली छवि को भी धक्का लगेगा| इराक व अन्य मुस्लिम देशों से संबंध खराब होगा। इसकी काट के लिए वाजपेयी ने वामपंथी नेताओं को अपने यहां निजी तौर पर मिलने के लिए बुलाया। उसमें उन्होंने यह बात बताई और इसे संसद में उठाने, मुद्दा बनाने के लिए कहा, ताकि भारत को इराक मामले में फंसने से बचाया जा सके। इसी तरह की बात उन्होंने कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं से भी की।

जिसके बाद संसद में यह मुद्दा उठ गया और विपक्ष ने संसद ठप कर दी। इस तरह वाजपेयी ने 20,000 भारतीय सैनिकों को इराक भेजने की अमेरिकी दबाव को परवान नहीं चढ़ने दी। ऐसा संबंध आज सोचा भी नहीं जा सकता है। विपक्षी नेताओं से जिस तरह का संबंध वाजपेयी का था, उस तरह का संबंध आज के सत्ताधारी नेता का नहीं है। इसीलिए आज दिखने लगा है कि वाजपेयी कितने बड़े मन के थे, उनका व्यक्तित्व कितना बड़ा था।

ऐसा भी नहीं कि हिम्मत किसी से कम थी। उन्होंने अमेरिका और उस जैसी विदेशी ताकतों के विरूद्ध बिना एक शब्द बोले ही 1998 में पोखरण में परमाणु परीक्षण करा दिया। इससे आग बबूला हुआ अमेरिका को कुछ साल बाद मना भी लिया, उसके राष्ट्रपति भारत यात्रा पर आए। यह थी वाजपेयी की कूटनीतिक काबिलियत और दमदारी, हिम्मत। लेकिन उन्होंने इसका कभी दिखावा नहीं किया। कभी दंभ नहीं भरा, कभी सीना चौड़ा नहीं बताया।

कभी अपने पहले की सरकारों पर काम नहीं करने का आरोप नहीं लगाया। उन्होंने कहा कि अपने पहले की सरकारों पर कोई काम नहीं करने का आरोप लगाना इस देश के जवानों, कर्मचारियों , मजदूरों , एक से बढ़कर एक आजादी के लिये संघर्ष किये नेताओं की बेइज्जती करनी होगी। वह कहते थे कि आज देश ने जो कुछ प्रगति किया है, सब उनकी देन है, उनके मेहनत से हुआ है। यह बात उन्होंने अपने 13 दिन की सरकार के समय अविश्वास प्रस्ताव पर बोलते हुए भी कहा था। यह थी अपने पूर्ववर्ती सरकारों का सम्मान करने, देश के कर्मचारियों, सैनिकों,मजदूरों का मान रखने का उनका भाव। यूं ही नहीं वह अटल थे और अपनी छवि ,पक्ष – विपक्ष से लगायत जनमानस तक में अटल बना गए।

  नसीब सैनी/ अभिषेक मैहरा

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ऑपरेशन ब्लू स्टार: विनाशकारी प्रभाव के साथ एक गैर-कल्पना ऑपरेशन

– (जयबंस सिंह एक भू-रणनीतिक विश्लेषक, स्तंभकार और लेखक हैं)

– (जयबंस सिंह एक भू-रणनीतिक विश्लेषक, स्तंभकार और लेखक हैं)

भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा ऑपरेशन ब्लू स्टार नामक एक सैन्य हमले को पवित्रतम सिख मंदिर, हरमंदिर साहिब पर सात दिनों से अधिक, 1 जून से 7 जून, 1984 तक किया गया। इसे सिखों द्वारा तीज के रूप में संदर्भित किया जाता है। घल्लूघरा (सिखों का तीसरा नरसंहार / प्रलय), पहले दो क्रमशः 1746 और 1762 में हुए, जब अफगानों ने सिखों को महिलाओं और बच्चों सहित घेर लिया, और फिर बिना पछतावे के नरसंहार किया।
कथित तौर पर, धार्मिक नेता संत जरनैल सिंह भिंडरावाले के नेतृत्व में सिख आतंकवादियों के मंदिर को खाली कराने के लिए हमला किया गया था, जिन्होंने वहां शरण ली थी। यह कहा गया कि उनकी गिरफ्तारी की मांग को लेकर संसद के दोनों सदनों के सदस्यों के साथ राजनीतिक दबाव को देखते हुए यह हमला लाजमी था
अब यह तर्क दिया जा रहा है कि किसी भी अदालत में संत भिंडरावाले के खिलाफ कोई मामला नहीं था और न ही उनके खिलाफ कोई चार्जशीट दायर की गई थी, इसलिए, इस तरह की कठोर कार्रवाई और उन्हें गिरफ्तार करने के लिए अभूतपूर्व हिंसा अतिरिक्त-संवैधानिक, गैरकानूनी और गैर-कानूनी थी।
दुर्भाग्यपूर्ण हमले में दो अतिरिक्त कारक बाहर खड़े हैं। पहला, भारतीय सेना का यह गलत विश्वास कि यह संत भिंडरावाले और उनके अनुयायियों को थोड़े समय के भीतर नगण्य हताहतों के साथ निकालने में सक्षम होगा। दूसरा, संत भिंडरावाले की यह धारणा कि भारत सरकार पवित्र हरमंदिर साहिब पर हमले का आदेश देने की हिम्मत नहीं करेगी। दोनों दल अपने आकलन में भयानक गलत थे और परिणाम एकदम विनाश और तबाही था
संत भिंडरावाले और उनके अनुयायियों को मंदिर के अंदर मार दिया गया था, क्योंकि कई निर्दोष नागरिक थे जो मंदिर में पूजा करने के लिए गए थे और कार्रवाई शुरू होने पर वहां फंस गए।
पवित्र प्रवृत्ति के निकट विनाश और कई हताहतों ने सिखों के मानस पर गहरा नकारात्मक प्रभाव छोड़ा, जिन्होंने पहले से ही सरकार के खिलाफ महान अविश्वास और संदेह का सामना किया।
समस्या को हल करने के बजाय, हमले ने एक बड़ा मुद्दा बनाया। पांच महीने के भीतर, 31 अक्टूबर, 1984 को, उनके सिख अंगरक्षकों, सतवंत सिंह और बेअंत सिंह द्वारा और उसके बाद हुए देश भर में हुए सिख विरोधी दंगों के द्वारा प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की भीषण हत्या हुई। पंजाब में मिलिटेंसी कई सालों तक जारी रही और हजारों युवा सिख लड़कों, सुरक्षा बल के जवानों और निर्दोष नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया।
यह बिना कारण नहीं है कि हमले को सिखों द्वारा एक प्रलय के रूप में संदर्भित किया जाता है, घटना के 36 साल बाद भी कुल मिलाप उन्हें बाहर निकालना जारी रखता है।
हरमंदिर साहिब पर हमला, खालिस्तान आंदोलन, सिख राष्ट्रवादी पहल का एक उप-उत्पाद था जो सिख लोगों के लिए एक स्वतंत्र राज्य बनाने की आकांक्षा रखता था। ऑपरेशन से कुछ साल पहले, खालिस्तान आंदोलन के एक हिस्से के रूप में उग्रवाद ने पंजाब में मजबूत जड़ें जमा ली थीं और संत भिंडरावाले इसका सबसे प्रमुख चेहरा थे, जिसका मुख्य कारण उनके विनीत बयानों और अतिवादी विचारों के कारण था। प्रारंभ में, उन्होंने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पारित करने का एक एजेंडा तय किया, लेकिन, यहां उन्होंने एक सड़क ब्लॉक के साथ मुलाकात की, क्योंकि इंदिरा गांधी सरकार ने इसे एक अलगाववादी दस्तावेज माना था। राजनीतिक मिशन में असफल होने के बाद, संत भिंडरावाले ने सभी सिखों की प्राथमिक आकांक्षा के रूप में आवश्यक होने पर बल के उपयोग से खालिस्तान के निर्माण की घोषणा की।
24 अप्रैल, 1980 को निरंकारी संप्रदाय के प्रमुख बाबा गुरबचन सिंह की हत्या कर दी गई थी। उनका संप्रदाय, लंबे समय से, संत भिंडरावाले की अध्यक्षता वाली दमदमी टकसाल के साथ लॉगरहेड्स में था। 9 सितंबर 1981 को, अखबार केसरी के संस्थापक संपादक लाला जगत नारायण की हत्या कर दी गई थी। उन्हें निरंकारी संप्रदाय के समर्थक के रूप में देखा गया था और उन्होंने कई संपादकीय लिखे थे, जिन्होंने भिंडरावाले के कृत्यों की निंदा की थी।
जबकि संत भिंडरावाले हरमंदिर साहिब के भीतर थे, पंजाब में हिंसक गतिविधियां बेरोकटोक जारी थीं। 23 अप्रैल, अप्रैल, 1983 को, पंजाब पुलिस के उप महानिरीक्षक ए.एस. अटवाल की भिंडरावाले समूह के एक बंदूकधारी ने गोली मारकर हत्या कर दी थी क्योंकि उन्होंने हरमंदिर साहिब कंपाउंड छोड़ दिया था। 12 मई, 1984 को, लाला जगत नारायण के बेटे रमेश चंदर और हिंद समचार मीडिया समूह के संपादक, भिंडरावाले के आतंकवादियों ने हत्या कर दी थी
सरकार संत भिंडरावाले को गिरफ्तार करने और आवश्यक आदेशों को देखने के लिए उत्सुक थी, जिनकी पवित्रता पर सवाल उठाए जाते हैं, 19 जुलाई, 1982 को पारित किए गए। भाई अमरीक सिंह, दमदम टकसाल से ऑल इंडिया सिख स्टूडेंट्स फेडरेशन के अध्यक्ष और एक और सहयोगी थे उसके साथ गिरफ्तार भी किया जाए। इन आदेशों के कारण, उपायुक्त, अमृतसर के निवास के बाहर कई सिखों ने एक धरना (विरोध) किया।
हरचंद सिंह लोंगोवाल जैसे अकाली नेताओं की गिरफ्तारी से बचने के लिए, संत भिंडरावाले ने हरमंदिर साहिब परिसर में आकर अपने लगभग 200 सशस्त्र अनुयायियों के साथ गुरु नानक निवास में निवास किया। हर दिन 51 सिखों का एक समूह सरकारी कार्यालयों और अदालत में गिरफ्तारी के लिए जाता है। 4 अगस्त, 1982 तक, अकाली दल भी इस आंदोलन में शामिल हो गया था और इसे "धार्मिक युद्ध" का रूप मिला। समूह ने 19, जुलाई, 1982 से 01, जून, 1984 तक कई पहलुओं को बदल दिया
जब पवित्र मंदिर पर हमला हुआ। हरचंद सिंह लोंगोवाल जैसे कुछ सिख नेताओं ने संत भिंडरावाले की गिरफ्तारी के लिए बातचीत करने का प्रयास किया, लेकिन दोनों पक्षों द्वारा लिए गए अनम्य पदों के कारण वे सफल नहीं हुए।
सरकार ने मंदिर परिसर से संत भिंडरावाले का अपहरण करने और एक वरिष्ठ राजनेता, पीवी नरसिम्हा राव को संत की गिरफ्तारी के लिए वार्ताकार के रूप में भेजने के लिए एक संभावित गुप्त अभियान सहित कई विकल्पों को देखा। प्रयासों का कोई फल नहीं हुआ। 26 मई, 1984 को, वरिष्ठ अकाली नेता गुरुचरण सिंह टोहरा ने सरकार को सूचित किया कि वह शांतिपूर्ण समाधान के लिए भिंडरावाले को सहमत करने में विफल रहे हैं।
सरकार के इस तरह के कठोर निर्णय लेने का एक और बड़ा कारण यह था कि पाकिस्तान लगातार सैन्य और मनोवैज्ञानिक क्षेत्र में राज्य में अपनी भागीदारी बढ़ा रहा था। खुफिया रिपोर्टों ने सुझाव दिया कि पाकिस्तान न केवल हथियारों और गोला-बारूद के प्रावधान में मदद करने के लिए तैयार था, बल्कि स्वतंत्रता सेनानियों की आड़ में तस्करी भी करता था।
यह व्यापक रूप से माना जाता है कि उक्त कारक संचयी रूप से संत भिंडरावाले और उनके अनुयायियों को बाहर निकालने के लिए मंदिर पर हमला करने की योजना का ट्रिगर बन गए। बेशक, थोड़े से समय के साथ थोड़े समय के अंतराल में "दगाबाज़" को बाहर निकालने की सेना द्वारा दिए गए विश्वास ने प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी को हरी झंडी दिखाने में एक प्रमुख भूमिका निभाई।

जिस तरह से वातावरण विकसित हो रहा था, उससे मंदिर परिसर में छिपे उग्रवादियों के लिए यह स्पष्ट हो गया था कि उन्हें कम से कम उस समय तक अपनी रक्षा करने की आवश्यकता होगी, जब तक कि देश भर के सिख विद्रोह में नहीं उठते हैं और एक समझौता वार्ता की जा सकती है। । इसलिए मंदिर परिसर को एक आधुनिक आधुनिक किले में बदल दिया गया। नौकरी मुख्य रूप से भारतीय सेना के एक सिख जनरल मेजर जनरल शबेग सिंह द्वारा की गई थी, जिन्हें सेवा से कैश किया गया था। उन्हें बांग्लादेशी क्रांतिकारियों (मुक्ति बाहिनी) के प्रशिक्षण के पीछे सैन्य मास्टरमाइंड के रूप में जाना जाता था। जिन वरिष्ठ सैन्य कमांडरों ने हमले की योजना बनाई थी, उन्हें बहुत महत्वपूर्ण कारक को ध्यान में रखना चाहिए, दुख की बात है कि उन्होंने नहीं किया। टैंक-विरोधी हथियार सहित आवश्यक हथियार, पाकिस्तान से खरीदे गए और समय के साथ जटिल रूप से तस्करी किए गए। संत और उनके अनुयायी, जैसे, भारतीय सेना उन पर क्या फेंकती है, इसके लिए बिल्कुल तैयार थे।घटनाओं के अनुक्रम के कई संस्करण हैं जो ऑपरेशन ब्लू स्टार के लॉन्च के बाद हुए। ओपन मीडिया डोमेन में एक संस्करण यहां दिया गया है। यह पूरी तरह से प्रामाणिक हो सकता है या नहीं भी लेकिन काफी स्वीकार्य है।
समग्र ऑपरेशन को तीन भागों में विभाजित किया गया था: -
• ऑपरेशन मेटल: स्वर्ण मंदिर परिसर से भिंडरावाले सहित आतंकवादियों को बाहर निकालना।
• ऑपरेशन शॉप: पूरे पंजाब राज्य में चरमपंथी ठिकाने पर छापा मारने और देश में शेष बचे आतंकवादियों को मोप करने के लिए।
• ऑपरेशन वुड्रोस: पाकिस्तान के साथ सीमा को सील करने और उग्रवादी तत्वों के पंजाब में अन्य गुरुद्वारा को खाली करने के लिए।
प्रारंभिक चरण में, सेना के लगभग सात विभाग पंजाब में ही ऑपरेशन में शामिल थे। इनमें सीमा पर पहले से ही रक्षात्मक मुद्रा में सैनिक शामिल थे और आतंकवादियों के समर्थन में एक पाकिस्तानी दुस्साहसियों के खिलाफ सीलिंग के लिए आवश्यक वृद्धि। LOC के साथ ही सीलिंग भी की गई और पाकिस्तान के साथ सीमा भी
मेजर जनरल केएस बरार (जिसे बुलबुल बरार के नाम से जाना जाता है) की कमान में मेरठ स्थित 9 डिवीजन को वास्तविक हमले (ऑपरेशन मेटल) के लिए शाब्दिक रूप से चलाया गया था। लेफ्टिनेंट जनरल के सुंदरजी आर्मी कमांडर पश्चिमी कमान और ऑपरेशन ब्लू स्टार के समग्र कमांड में थे। थल सेनाध्यक्ष जनरल वैद्य थे।
ऑपरेशन पूर्ण मीडिया ब्लैकआउट, स्थानीय कर्फ्यू और स्थानीय परिवहन के निलंबन के तहत किया गया था। पंजाब में रेल, सड़क और हवाई सेवा निलंबित कर दी गई। विदेशियों और अनिवासी भारतीयों को प्रवेश से वंचित कर दिया गया। पिछले कुछ दिनों में बिजली और पानी भी कट गए।
गोल्डन टेंपल के अंदर Das गुरु राम दास लंगर ’इमारत पर हमले के साथ जून 1, 1984 में ऑपरेशन शुरू हुआ। हैरानी की बात है कि हमले के लिए तैयार होने के बावजूद, पांचवें सिख गुरु, गुरु अर्जन देव जी के शहादत दिवस को मनाने के लिए नागरिकों को जून, 3 को मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति दी गई थी। शाम को उन्हें छोड़ने के लिए कहा गया था। यह व्यापक रूप से माना जाता है कि अवकाश आदेश दिए जाने पर सभी नागरिक मंदिर परिसर को नहीं छोड़ सकते थे; संभवतः उन्हें आतंकवादियों द्वारा मानव ढाल के रूप में बाद में इस्तेमाल करने के लिए हिरासत में लिया गया था। इसके बजाय जो छोड़ गए वे सिख अपराधी और कम्युनिस्ट थे, जो पहले नष्ट हो गए थे, लेकिन तब लड़ाई के लिए पेट नहीं था।
अंतिम हमला दो दिनों से जून, 5 से 7 जून तक हुआ, जब परिसर को आतंकवादियों से मुक्त घोषित किया गया और संत जरनैल सिंह भिंडरावाले की हत्या की घोषणा की गई
"रब्बल" के खिलाफ पेशेवर इन्फैंट्री सैनिकों द्वारा हमला किया जाना चाहिए था, अंततः टैंक, आर्टिलरी और कमांडो को भी तैनात किया गया था। आतंकवादियों में होली से वापसी की आग एंटी-टैंक रॉकेट से ग्रेनेड को लेकर आई थी। अकाल तख्त जहां संत भिंडरावाले स्थित था, को सचमुच टैंक की आग से जमीन तक उठाया गया था। टेंक मंदिर परिसर के द्वार पर बंद रेंज में था।
दुर्भावनापूर्ण हमले में 493 मारे गए और 236 घायल हो गए। सेना को 83 मारे गए (4 अधिकारी और 79 सैनिक) मारे गए। यह व्यापक रूप से महसूस किया जाता है कि मरने वालों की संख्या घोषित की गई तुलना में बहुत अधिक थी। इतना ही नहीं, एक बार जब मंदिर परिसर को आतंकवादियों से मुक्त घोषित किया गया था, राष्ट्रपति ज़ैल सिंह एक यात्रा के लिए आए थे और परिसर के भीतर छिपे एक आतंकवादी द्वारा गोली मार दी गई थी। गोली चली और सेना कर्नल जो उसके साथ था।
ऑपरेशन ने कई देशों द्वारा निंदा की। दुनिया भर में आलोचना और मानवाधिकार संगठनों द्वारा कई शिकायतें। दुनिया भर में सिख तबाह हो गए। यह ऑपरेशन बहुत ही मार्मिक काल के दौरान किया गया था, जब सिख अपने पांचवें गुरु की शहादत की याद कर रहे थे, उनके लिए और भी अधिक वीरता थी। कई सिख सैनिकों ने अपनी इकाइयाँ और प्रख्यात सिख हस्तियों को पुरस्कार लौटा दिए, जो उन्हें राज्य से मिले थे।
पांच साल बाद, मंदिर परिसर को एक बार फिर आतंकवादियों द्वारा "नाकाबंदी दृष्टिकोण" के रूप में मंजूरी दे दी गई, जैसा कि पंजाब पुलिस के तत्कालीन महानिदेशक केपीएस गिल ने कल्पना की थी। ऑपरेशन की सफलता, ऑपरेशन ब्लैक थंडर नाम के कोड ने साबित किया कि सेना द्वारा किए गए एकमुश्त हमले के विकल्प थे। ऑपरेशन पर कई किताबें और वृत्तचित्र बनाए गए हैं। एक महत्वपूर्ण सबक हमारे अपने लोगों के खिलाफ बल का उपयोग करने से पहले सभी संभावित विकल्पों की कोशिश करना है और, जब आवश्यक हो, इसे न्यूनतम सीमा तक सीमित करें। स्नातक की प्रतिक्रिया पर काम करते समय धैर्य के साथ बेहतर राजनीतिक और सैन्य निर्णय हमेशा बेहतर लाभांश का भुगतान करेगा। उन्मत्त निर्णय लेने से जटिल बल का एक वृद्धिशील उपयोग एक महान और परिपक्व राष्ट्र का संकेत नहीं है
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मोदी सरकार पिता के साए जैसी : ‘विजय भवभारत’

भवभारत’ विदेश से लाए युवक ने कहा है कि ऐसी व्यवस्था तो उसने जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों में भी नहीं देखी है। शख्स बता रहा है कि सरकार ने करीब 70 किलोमीटर दूर सभी पैसेंजर को कोरोन्टाइन किया है

विदेश से लाए युवक ने कहा है कि ऐसी व्यवस्था तो उसने जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों में भी नहीं देखी है। शख्स बता रहा है कि सरकार ने करीब 70 किलोमीटर दूर सभी पैसेंजर को कोरोन्टाइन किया है । बिल्डिंग को लगातार सैनेटाइज किया जा रहाहै। उन्हें 24 घंटे की देख रेख में रखा है, जहॉं बेहतरीन सुविधाएँ हैं। भवभारत’ विदेश से लाए युवक ने कहा है कि ऐसी व्यवस्था तो उसने जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों में भी नहीं देखी है। शख्स बता रहा है कि सरकार ने करीब 70 किलोमीटर दूर सभी पैसेंजर को कोरोन्टाइन किया है। बिल्डिंग को लगातार सैनेटाइज किया जा रहा है। उन्हें 24 घंटे की देख रेख में रखा है , जहॉं बेहतरीन सुविधाएँ हैं ।

विजय भव भारत का फेसबुक पेज, 24,000 से अधिक फौलोवेर्स.

जहाँ एक और पूरी दुनिया कोरोना (महामारी) से लडर ही है, हर देश इसकी रोकथाम में लगा हुआ है अपने नागरिकों के बचाव में हर कोशिश कर रहा है, वहीं भारत की कोशिशों की विश्वपटल सरहाना हो रही है। कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी भले इस वैश्विक महामारी को मोदी सरकार पर हमले के मौके की तरह तलाश कर रहे हैं, लेकिन सोशल मीडिया में सरकार की तारीफ करते हुए कुछ लोगों ने जो आपबीती शेयर की है जो बेहद मार्मिक है। हालफिलाहल इटली से लाई गई एक युवती के पिता ने अपनी भावना साझा कि, वो सालों से सरकार की आलोचना कर रहे थे। लेकिन, अब उन्हें एहसास हो रहा है कि मोदी सरकार पिता के साए (fatherly figure) जैसी है। विदेश से लाए गए एक युवक ने कहा है कि ऐसी व्यवस्था तो उसने जर्मनी जैसे यूरोपीय मुल्कों में भी नहीं देखी है।टाइम्स ऑफ इंडिया के पत्रकार रोहन दुआ ने इटली से लौटी युवती के पिता का पत्र शेयर किया है। इस पत्र में उन्होंने इंडियन एंबेसी, भारत सरकार और विशेषत: नरेंद्र मोदी को धन्यवाद दिया है। पिता के मुताबिक उनकी बेटी मास्टर की पढ़ाई करने इटली के मिलान गई थी। वहॉं हालात बिगड़ने पर उसे वापस लौटने को कहा। जब वह लौटने लगी तो उससे भारत वापस जाने का सर्टिफिकेट माँगा गया। न्होंने खुद इंडियन एंबेसी को संपर्क करने की कोशिश की। मगर मिलान में एंबेसी का कार्यालय बंद होने के कारण ऐसा नहीं हो पाया। उन्होंने इंडियन एंबेसी के अन्य लोगों को मेल के जरिए संपर्क किया और रात के 10:30 बजे उनकी बेटी ने फोन पर बताया कि उसकी बात दूतावास में हो गई है और वह अगली फ्लाइट से भारत लौट रही है।

पिता के मुताबिक, वे सालों से भारतीय सरकार को कोस रहे थे। लेकिन मोदी सरकार में पिता का चेहरा है। उन्होंने बताया कि उनकी बेटी 15 मार्च को भारत आई और आईटीबीपी अस्पताल में उसकी स्वास्थ्य संबंधी, खान-पान संबंधी सभी जरूरतों का ख्याल रखा गया। गौरतलब है कि इटली उन देशों में शामिल है जो कोरोना संक्रमण से सर्वाधिक प्रभावित हैं।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार कोरोना वायरस के संक्रमण से निबटने के लिए सरकार ने 400 बेड का कोरोन्टाइन वार्ड तैयार करवाया है। यहाँ विदेश से लौटने वालों को सीधे दिल्ली एयरपोर्ट से लेकर जाया जाएगा। यहाँ इन सभी लोगों की 14 तक की निगरानी होगी और अगर इनमें कोरोना के लक्षण मिलते हैं तो इन्हें आइसोलेट कर छोड़ा जाएगा। ये कोरोन्टाइन वार्ड नोयडा के सेक्टर 39 में स्थित जिला अस्पताल की नई बिल्डिंग में बना है। यहाँ पर्याप्त संख्या में पैरामेडिकल स्टॉफ तैनात हैं।

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इन टीमों के जरिये समझिये समाज की सच्चाई को: ‘विजय भवभारत’

समाज की सच्चाई को दिखाने का बीड़ा उठाने वालों में से एक नाम ‘विजय भव भारत’ का भी है

21वीं सदी के दो दशक बीतते तक मीडिया को किस तरह से टुकड़े टुकड़े गैंग ने बर्बाद कर दिया और मीडिया ने किस तरह से समाज को बर्बाद किया, यह हम सभी जानते हैं और टुकड़े टुकड़े गैंग व् मीडिया में बैठे उनके नेटवर्क को भी हम समझ चुके हैं. उस नेटवर्क को तोड़ने और मीडिया में जमे इस कचरे की सफाई का जिम्मा जिनसोशल मीडिया के पोर्टलों ने ली है, उनकी श्रृंखला में एक और नाम की चर्चा इस लेख में हम करेंगे. इस बार चर्चा है फेसबुक कैलेंडर पेज –‘विजय भव भारत’ की

विजय भव भारत का फेसबुक पेज, 24,000 से अधिक फौलोवेर्स.

यूँ तो साहित्य समाज का दर्पण कहा जाता था और बाद में मीडिया ने इसकी जगह ले ली, मगर समाज की सच्चाई को समाज का यह दर्पण दिखा नहीं पाया और ख़बरों को व् समाज की सच्चाई को तोड़ मरोड़ कर पेश करने का आरोप मीडिया पर लगने लगा. ऐसे में समाज की सच्चाई को दिखाने का बीड़ा उठाने वालों में से एक नाम ‘विजय भव भारत’ का भी है.

विजय भव भारत

‘विजय भव भारत’ पेज का संचालन फेसबुक पर होता है, जहाँइसे फॉलो करने वाले 24,000 से भी अधिक लोग हैं. यह पेज जाना जाता है समाज में चलने वाले सकारात्मक कामों के प्रचार प्रसार के लिए, जो आम मीडिया कीनज़रों से दूर हैं. इसके साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों पर भी यह पेज नज़र रखता है, और उनसे जुडी तकरीबन हर जानकारी अपने दर्शकों तक पहुँचाता है. विजय भव भारत पेज का एक और काम 365दिनों के विशेष घटनाओं को अपने पेज से जनता तक पहुँचाना भी है. इसका एक नाम ‘कैलेंडर विशेष’ भी है. इनके अतिरिक्त समसामयिक घटनाओं पर पोस्ट व् विडियो डालना भी इस पेज का काम है.

सकारात्मक कामों का प्रचार प्रसार:

विजय भव भारत जिस काम में लगा है, शायद वह काम मीडिया का कोई भी तंत्र नहीं कर पायेगा क्योंकि इस काम में मीडिया को मसाला नहीं मिलेगा बल्कि मेहनत करनी पड़ेगी. मीडिया का एक तंत्र जहाँ केवल टीआरपी बढाने और ख़बर बेचने में लगा है, वहीँ सोशल मीडिया पर विजय भव भारत- दुनिया व् भारत की कुछ बेहतरीन सकारात्मक ख़बरें खोज कर ला रहा है और अपने पेज के माध्यम से साझा कर रहा है. सोशल मीडिया से नकारात्मकता हटाने का यह कदम सराहनीय है. समाज की यह सच्चाई जो छिपी हुई है, उसे खोज निकलने का यह काम विजय भव भारत कर रहा है.

कोरोना से बचाव के लिए दुनिया ने अपनाई भारतीय संस्कृति

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों पर नज़र:                            दुनिया का सबसे बड़ा गैर सरकारी संगठन है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और समाज निर्माण के काम में इसके योगदान को नकारना मुर्खता होगी. महात्मा गाँधी जी से लेकर अन्य कई महापुरुष संघ के बारे में सकारात्मक विचार रख चुके हैं, ऐसे में इस संगठन के कामकाज पर भी नज़र रखे हुए है. इससे पहले कि मीडिया संघ के कामकाज को तोड़ मरोड़ का या अपने अनुरूप पेश करे, विजय भव भारत संघ के विशिष्ट स्त्रोतों से संघसे जुडी प्रमाणिक ख़बरें लेकर आता है और समाज से उसका क्या लेना देना है, यह भी स्पष्ट करता है.

विश्व के सबसे बड़े गैर सरकारी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों पर नज़र.

कैलेंडरविशेष दिन:

विजय भव भारत जिन महत्वपूर्ण सकारात्मक कामों में लगा हुआ है, उनमे से एक कैलेंडर विशेष दिन भी है. साल में 365 दिन होते हैं, और तकरीबन हर दिन महत्वपूर्ण होता है. उन सभी दिनों की विशेषता और महत्त्व बताने का काम भी विजय भव भारत करता है. चाहे किसी महापुरुष का जन्मदिन या पुण्यतिथि हो या कोई स्मरणीय घटना की बात हो, उनके महत्त्व को समझाने का काम भी विजय भव भारत करता है.

16 सितम्बर 1947, गाँधीजी द्वारा छूआछूत की समाप्ति पर राष्ट्रीयस्वयंसेवक संघ के काम पर चर्चा.

समसामयिक घटनाओं पर नज़र:

जब समाज में सकारात्मकता भरने का काम और समाज से नकारात्मकता हटाने का काम विजय भव भारत कर रहा है तो यह तो असंभव है कि ऐसे में समकालीन घटनाओं को न जोड़ा जाये. वर्तमान में घटने वाली हर घटना पर समाज की प्रतिक्रिया, सही ख़बर, तथ्य परक, और प्रमाणिक ख़बरें विडियो और पोस्टर के माध्यम से अपने फौलोवर्स तक विजय भव भारत पहुँचाता है.

राम मंदिर पर शिया वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिज़वी का स्पष्ट बयान. 10 लाख से ज्यादा लोगों द्वारा देखा गया, 50 हज़ार से ज्यादा लोगों द्वारा साझा किया गया.

अपने इस प्रयास के माध्यम से विजय भव भारत ने सोशल मीडिया पर एक ऐसा विमर्श खडा किया है जो सकारात्मक है, प्रमाणिक है और नकारात्मकता को तोड़ने वाला है. जिन ख़बरों में मीडिया की दिलचस्पी नहीं होती मगर समाज के लिए आवश्यक है – उन्हें खोज कर लाने का काम यह पेज कर रहा है.

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