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अनियंत्रित रूप से बढ़ती मुस्लिम जनसंख्या

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07 August

अनियंत्रित रूप से बढ़ती मुस्लिम जनसंख्या

हिन्दू समाज को खुली चेतावनी !!

विश्व में कोई भी देश ऐसा नही हैं जहां मुसलमानों अथवा तथाकथित अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यक समाज से अधिक सुविधाएं तथा अधिकार प्राप्त हों, सिवाय भारत के।
किसी भी मुस्लिम देश में यहां तक कि पाकिस्तान, बंगलादेश, इण्डोनेशिया या तुर्की में भी मुसलमानों को इतने संविधान स्वीकृत अधिकार भी नही हैं।
किसी ने सच कहा है कि मुसलमानों के लिए एक मात्र देश भारत बहस्व (स्वर्ग) है।
वस्तुत: भारत के अनेक राजनीतिक दलों का वोट बटोरने की खातिर का केन्द्र बिन्दु मुस्लिम चाटुकारिता बन गया है।
वे इसका दुरुपयोग कर भारतीय संविधान की अन्तर्निहित भावना से खिलवाड़ कर रहे हैं।
क्षुद्र राजनीति से प्रेरित हो, वे इतना गिर गये हैं कि उन्हें देश की एकता, अखण्डता तथा  स्वतंत्रता की भी परवाह नहीं है।
उनका बस चले तो वे भारत, भारत का नाम ‘इंडिया दैट इज मुस्लिम’ रख दें। पर यह भी सत्य है कि विश्व में एक साथ भारत तथा हिन्दू विरोध कहीं भी नहीं है जितना भारत में।
भारत ने सर्वदा इस चुनौती को साहसपूर्वक स्वीकार किया है।
इस्लाम का प्रसार
यदि ऐतिहासिक संदर्भ में देखें तो यह सर्वविदित है कि हिन्दू देश भारत सदैव ही इस्लाम के लिए एक महान चुनौती रहा है।
उनकी सदैव ही भारत के दारुल-हरब से दारुल इस्लाम बनाने की प्रबल इच्छा रही है।
मोहम्मद बिन कासिम से लेकर मुगलों के अंतिम शासक बहादुरशाह जफर तक भारत को इस्लामीकरण तथा गुलामीकरण के दर्जनों असफल प्रयास होते रहे हैं।
क्रूर मुस्लिम शासकों ने मतान्धता तथा मजहबी उन्माद के आधार पर भारत को मुस्लिम तथा ‘जिम्मी’ एवं काफिर में बांटकर रखा। इस निमित्त हिन्दुओं पर क्रूर अत्याचारों, भीषण नरसंहार तथा जबरदस्ती कन्वर्जन के निरंतर कुत्सित प्रयास होते रहे हैं।
संकलित आंकड़ों से ज्ञात होता है कि 1000 ई. अर्थात महमूद गजनवी के समय भारत की जनसंख्या लगभग 20 करोड़ थी जो आगामी 500 वर्षों में घटकर 17 करोड़ हो गई थी।
संख्या घटने के कारण थे।
मुस्लिम जिहाद,जबरदस्ती सामूहिक कन्वर्जन, नरसंहार तथा मुस्लिम बनने पर तरह-तरह की सुविधाएं प्रदान करना।
1600-1800 ई. तक अर्थात लगभग 200 वर्षों तक इसमें कोई उल्लेखनीय अन्तर नहीं आया।
यह स्थिति न केवल भारत में बल्कि विश्व के अन्य देशों में भी था। भारत में केवल 26 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
ब्रिटिश संरक्षण
ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल में भारत को मुस्लिम तथा गैर मुस्लिम में बांटा गया।
भारत में सीधे ब्रिटिश शासन होने पर इसे अल्पसंख्यक तथा बहुसंख्यक शब्दों के साथ दोनों को अलग किया गया।
ब्रिटिश शासनकाल में जहां अंग्रेजों ने ‘बांटो और राज करो नीति का अनुकरण किया’,
वहां साथ-साथ मुस्लिम संरक्षण तथा तुष्टीकरण का भी सहारा लिया।
यदि 1881 ई. की जनगणना से निरंतर 1941 ई. तक की समस्त जनगणनाओं के विकासक्रम को देखें अथवा पाकिस्तान के बनने से पूर्व तक के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो यह सरलता से पता चलता है कि प्रत्येक दस वर्षीय जनगणना रपटों में हिन्दुओं की जनसंख्या बिना किसी अपवाद के घटती रही।
अंग्रेज सदैव हिन्दुओं की जनसंख्या को बड़ा खतरा कहते रहे। इसके विपरीत मुसलमानों की जनंसख्या निरंतर बढ़ती गई, सरकारी आंकड़ों के अनुसार 1881 ई. में हिन्दुओं की जनसंख्या भारत की कुल जनसंख्या का 75.09 प्रतिशत थी जो क्रमश: 1891 ई. में
74.24 प्रतिशत, 1901 ई. में 72.68 प्रतिशत, 1911 ई. में 71.68 प्रतिशत,1921 ई.में 70.73 प्रतिशत, 1931 में 70.67, 1941 ई. में 69.46 प्रतिशत रही (देखें, प्रो. विक्टर पेट्रोव, इंडिया: स्पॉटलाइट्स ऑन पापुलेशन, पृ. 78)
विश्व के एकमात्र हिन्दू बहुसंख्यक देश भारत में उसकी लगभग छह प्रतिशत जनसंख्या घट गई थी।
विश्व में शायद ही किसी भी देश में ऐसा घटता हुआ अनुपात रहा हो इसके विपरीत मुसलमानों की जनसंख्या 1881 ई. में कुल 19.97 प्रतिशत थी जो निरंतर बढ़कर क्रमश: 1891 ई. में 20.41 प्रतिशत, 1901ई. में 21.88 प्रतिशत, 1911 ई. में 24.28 प्रतिशत हो गई।
अर्थात इस काल 1905 में पांच प्रतिशत बढ़ गई।
उल्लेखनीय है कि 1941ई. की जनगणना में अंग्रेजों ने मुसलमानों के प्रति पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया।
मुसलमानों की जनगणना में तथाकथित वकीलों की संख्या भी जोड़ दी (देखें, वहीं, पृ. 77)
ब्रिटिश राज्य में हिन्दू मुस्लिम जनगणना का असंतुलन अनोखा था इसके अनेक कारणों में से ब्रिटिश संरक्षण प्रमुख था।
कांग्रेस द्वारा मुस्लिम तुष्टीकरण
भारत का विभाजन अथवा पाकिस्तान का निर्माण कांग्रेस द्वारा ‘मजहब के आधार’ को स्वीकार करने पर हुआ था।
भारत के 96.5 प्रतिशत मुसलमानों ने पाकिस्तान के निर्माण का समर्थन किया था।केवल 3.5 प्रतिशत मुसलमानों ने इसके बनने का विरोध किया था। विभाजन के साथ ही, विश्व के इतिहास में पहली बार इतनी बड़ी जनसंख्या की अदला-बदला की गई और वह भी केवल तीन महीने में।
इसमें लाखों लोग खून खराबे का शिकार हुए।
विभाजन पर भारत में मुसलमानों की कुल जनसंख्या केवल 3.5 प्रतिशत रह गई थी जिन्होंने विभाजन का विरोध किया था। 1951 ई. की दस वर्षीय जनगणना के अनुसार भारत में हिन्दुओं की जनसंख्या 84-98 प्रतिशत थी तथा मुसलमानों की अचानक बढ़कर 9.91 प्रतिशत हो गई थी।
विभाजन के पश्चात मुसलमानों की इतनी बढ़ी हुई जनसंख्या का प्रमुख कारण यह था कि अनेक मुसलमान भारत के प्रधानमंत्री पं. नेहरू के आश्वासन पर भारत में ही रुक गये थे,यद्यपि उन्होंने पाकिस्तान के निर्माण का भरपूर समर्थन किया था।
इतना ही नहीं, अनेक मुसलमान पाकिस्तान से लौटकर वापस आ गये थे।
1961 ई. की जनगणना में हिन्दुओं की संख्या 85 प्रतिशत थी जो 1971 ई. में घटकर 83.00 प्रतिशत हो गई थी जबकि इस कालखण्ड में मुसलमानों की जनसंख्या बढ़कर 11.21 प्रतिशत हो गई थी।
26 जनवरी 1950 से भारत में गणतंत्र की स्थापना हुई।
इसके साथ ही चुनाव में वोट की राजनीति प्रारंभ हुई। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपने घटते हुए जनाधार के चलते एक ओर मुस्लिम तुष्टीकरण का सहारा लिया तो दूसरी ओर हिन्दू प्रतिरोध किया।
पं. नेहरू तथा इन्दिरा गांधी को तो पहले से ही हिन्दुत्व से कोई लगाव न था।
जहां कांग्रेस ने मिश्रित संस्कृति, मुस्लिम अल्पसंख्यक तथा हिन्दू साम्प्रदायिकता का राग अलापा, वहां आपातकाल के दौरान समाजवाद तथा सेकुलरवाद को जोड़कर इनकी मनमानी व्याख्या की गई।
संजय गांधी ने मुस्लिम तुष्टीकरण का अवश्य कुछ विरोध किया, विशेषकर नसबंदी के प्रश्न पर दिल्ली के तुर्कमान गेट के आसपास के क्षेत्र में नसबंदी अभियान चला, जिसका परिणाम उसे भुगतना पड़ा।
कांग्रेस के भावी एजेण्डे से मुसलमानों की नसबंदी अभियान हटा दिया गया।
कांग्रेस के साथ अन्य छद्म सेकुलरवादी दलों तथा वामपंथियों ने भी मुसलमानों की मजहबी भावना तथा उन्माद को प्रोत्साहन दिया।
केन्द्रीय कांग्रेस सरकार तथा प्रांतीय सरकारों ने मुस्लिम वोट प्राप्त करने के लिए उन्हें तरह-तरह के प्रलोभन तथा सुविधाएं दीं।
अलग अल्पसंख्यक मंत्रालय, 15 सूत्रीय कार्यक्रम में बजट में विशेष सुविधाएं, आरक्षण में विशेष ध्यान, हज यात्रा पर विशेष छूट तथा आयकर से मुक्ति, पंचवर्षीय योजना केविकास में 15 प्रतिशत धन अल्पसंख्यकों पर व्यय आदि इसी तुष्टीकरण के प्रमाण हैं।
इसी कड़ी में सच्चर कमेटी व रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफारिशें भी हैं।
कांग्रेस शासन की भी कानून की उपेक्षा तथा उदासीनता से मुसलमानों के विरुद्ध किसी मुस्लिम को बढ़ावा मिला।
उदाहरणत: मुम्बई में 50,000 मुसलमानों का हिंसक प्रदर्शन हुआ, परंतु भारत का गुप्तचर विभाग तथा पुलिस विभाग मूकदर्शक मात्र बना रहा।
लाखों असमी पुरुषों तथा महिलाओं को योजनाबद्ध ढंग से फैलाई अफवाहों के फलस्वरूप दक्षिण भारत तथा मुम्बई से वापस असम भागना पड़ा।
ताज्जुब है कि सरकार को इसका बहुत समय तक पता ही नहीं चला।
लाखों मुस्लिम बंगला घुसपैठिये नित्य भारत की सीमाओं को लांघकर असम तथा बंगाल सरकार के नागरिक भी बन गए।
इसके साथ ही पाकिस्तान से हजारों हिन्दू अनेक कष्ट उठाकर भारत आये।
परंतु कांग्रेस राजनीति तो मुस्लिम तुष्टीकरण तथा उनकी जनसंख्या वृद्धि में लगी रही।
उल्लेखनीय है कि गत 2014 के चुनाव के दिन ज्यों-ज्यों निकट आये त्यों-त्यों भारत के कई राजनीतिक दलों में भी मुसलमानों की चापलूसी की प्रतिद्वन्द्विता बढ़ती गई।
कांग्रेस ने भी राष्ट्रहित को भुलाकर क्षुद्र पार्टी स्वार्थ को महत्ता दी।
शीघ्र ही भारतीय नेताओं द्वारा मुस्लिम टोपियां ओढ़कर मुसलमानों को रिझानें का स्वांग प्रारंभ हुआ।
कल तक मजहब, जाति को गाली देने वाले, कठमुल्ले-मौलवियों के पांव चाटते दिखलाई देने लगे।
2011 की भारतीय जनगणना में मुस्लिम जनसंख्या के आंकड़े चौकाने वाले हैं इसमें मुसलमानों की जनसंख्या 14 प्रतिशत बतलाई गई है।
इसमें गैरकानूनी रूप से आये ढाई-तीन करोड़ से अधिक मुस्लिम नहीं हैं।
यदि ये मिला दें तो यह जनसंख्या 16 से 18 प्रतिशत हो जाती है तो वे इस्लाम खतरे में का नारा लगा देते हैं,स्वतंत्र देश की मांग करने लगते हैं।
यद्यपि भारत में सभी मुसलमान ऐसे नहीं हैं।
इनमें से अनेक देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत भी हैं।
पीयू- रपट
3 अप्रैल 2015 के वाशिंगटन के एक अमरीकी थिंक टैंक ने 2010 से लेकर 2050 ई.तक के संदर्भ में अपने पीयू रिसर्च सेंटर से एक भावी 35 वषार्ें के बाद विश्व में विभिन्न धार्मिक समुदायों की जनसंख्या की रपट निकाली है।
यह उनके निष्कर्ष हैं।
यह सेंटर अपने को किसी भी प्रकार के धार्मिक या अन्यत्र समुदायों से प्रभावित नहीं मानता है।
विशेषकर विश्व तथा भारत के संदर्भ में इसके निष्कर्ष चौकाने वाले चमत्कारपूर्ण  तथा कौतहुल उत्पन्न करने वाले है।
भारत के सभी समाचारपत्रों तथा पत्र-पत्रिकाओं ने इसे प्रमुख स्थान दिया है।
विश्व के संदर्भ में रिपोर्ट में 2010ई. को आधार मानकर 2050 ई. तक विभिन्न प्रमुख धार्मिक ८ समुदायों की जनसंख्या का आंकलन किया है।
रपट के अनुसार 2010 से 2050 तक विश्व की जनसंख्या की 35 प्रतिशत की वृद्धि होगी,जिसमें प्रमुख समुदायों में मुसलमानों की जनसंख्या सर्वाधिक यानी 73 प्रतिशत, ईसाई समाज की 35 प्रतिशत तथा हिन्दुओं की जनसंख्या 34 प्रतिशत बढ़ेगी, विश्व में क्रम की दृष्टि से ईसाई सर्वाधिक, तत्पश्चात मुसलमान तथा इसके बाद हिन्दू होंगे।
रपट में जनसंख्या वृद्धि के मुख्यत: दो कारण दिये हैं। प्रथम मुसलमान युवकों की आयु 22 की है जबकि अनुपात में गैर मुस्लिम की 30 है।
अर्थात मुसलमानों को 7-8 वर्ष आयु न होने का लाभ मिलेगा जो जनसंख्या वृद्धि में सहायक होगा।
दूसरे, मुस्लिम महिला की प्रजनन शक्ति का अनुपात 3.2 है जबकि हिन्दुओं का 2.5 तथा ईसाइयों का 2.3 है।
उल्लेखनीय है कि रपट में मुस्लिम जनसंख्या की वृद्धि के कारण तो बताये, परंतु ईसाई समुदायों के बढ़ने की समुचित कारण मीमांसा नहीं की गई।
विचारणीय है कि इस्लाम या ईसाई समाज के जनसंख्या वृद्धि के महानतम कारण कन्वर्जनपर कोई उल्लेखनीय प्रकाश न डालकर उसे छिपाया गया है।
हिन्दू जनसंख्या की बढ़ोतरी बताई पर उसका अनुपात वही बताया जो 2010 में था।
भारत के संदर्भ में रपट विश्व में जनसंख्या की की दृष्टि से सर्वाधिक में बतलाया गया कि 2050 ई. में विश्व जनसंख्या की दृष्टि में से सर्वाधिक मुसलमान भारत में होंगे।
अभी तक इण्डोनेशिया इसमें सबसे आगे है।
रपट के अनुसार सर्वाधिक मुसलमानों की जनसंख्या क्रमश: भारत, पाकिस्तान तथा इण्डोनेशिया में होगी।
इसके साथ यह भी बताया गया है कि 2070 ई. में विश्व में सर्वाधिक जनसंख्या मुसलमानों की होगी।
उपरोक्त आंकड़ों के आधार पर पीयू रिसर्च सेंटर की रपट चौकाने वाली अवश्य है कि यह किसी को भयभीत करने वाली नहीं है।
यह संदेहास्पद तथा सभी प्रकार के तथ्यों का गहन अध्ययन न कर बनाई गई प्रतीत होती है।
वस्तुत: जनगणना एक बड़ी पेचीदगी प्रक्रिया है जो किसी भी देश के सामाजिक तथा आर्थिक कारणों, भौगोलिक तथा प्रकृति विज्ञान का परिणाम होती है (देखें, डी आर बेलन्दाई, द फण्डामेन्टल्स ऑफ पॉपुलेशन स्टडी)
बदलते हुए विभिन्न क्षेत्रों में परिवेश का इस पर बड़ा प्रभाव होता है। यह उल्लेखनीय है किगणित या भौतिक विज्ञान की भांति इसके निष्कर्ष या आंकड़े सही साबित नहीं होते हैं।
मानव व्यवहार के बारे में ऐसे निष्कर्ष प्राय: बेबुनियाद होते हैं तथा ऐतिहासिक कसौटी पर खरे नहीं उतरते।
इसके साथ ही रपट पूर्वाग्रहों से ग्रसित तथा ईसाईयत के समर्थक द्वारा बनाई गई लगती है।
इसके लेखक हिन्दुओं के प्रति पहले से ही पूर्वाग्रहों से विचलित दिखाई देते रहे हैं।
उदाहरण के लिए इसमें भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के 2002 के काल जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे के दंगों का वर्णन करते हुए 2000 लोगों के मरने की संख्या दी है जो आज पूर्णत: गलत साबित हो चुकी है तथा राजनीतिक प्रचार का केवल हथियारमात्र रही है। इसी भांति पीयू की पहली रपट में उसे गुजरात का गर्वनर लिखा है जो बाद में सुधार किया गया है।
उक्त रपट यद्यपि प्रोजेक्शन मात्र है, परंतु हिन्दुओं के लिए यह चेतावनी है।
यह अत्यंत गंभीर चिंता का विषय है कि भारत में अब भी कुछ नेता बेशर्मी से यह कहते नहीं सकुचाते कहते हैं कि निकट भविष्य में कोई परेशानी का कारण नहीं है।
अगले बीस वर्षों में जब मुसलमानों की जनसंख्या 30 प्रतिशत हो जायेगी, तब सोचने का वक्त आयेगा। पीयू रपट जहां हिन्दुओं के लिए भावी खतरा है, वहां देश की एकता, अखण्डता की स्वतंत्रता देश के नवयुवकों को आह्वान भी है। क्या भारत का हिन्दू अभी भी न चेतेगा?
,,,,-डॉ. सतीशचन्द्र मित्तल पांचजन्य से साभार उद्धृत

चौथा खंभा न्यूज़ .com /डॉ. सतीशचन्द्र मित्तल/ डॉ विवेक आर्य /नसीब सैनी

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जेएनयू में फीस वृद्धि के नाम पर राजनीति

—यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं

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सुरेश हिन्दुस्थानी

देश के उच्च शिक्षा केन्द्र जब राजनीति के अड्डे बनने की ओर कदम बढ़ाने लगें, तब वहां की शिक्षा की दिशा-दशा क्या होगी, यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। फीस बढ़ोतरी के खिलाफ किया जाने वाला दिल्ली का छात्र आंदोलन कुछ इसी प्रकार का भाव प्रदर्शित कर रहा है, जहां केवल और केवल राजनीति ही की जा रही है। किसी भी आंदोलन की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके पीछे जनहित का कितना भाव है। दिल्ली का यह आंदोलन जनसरोकार से कोसों दूर दिखाई दे रहा है।

हालांकि इसके पीछे बहुत से अन्य कारण भी होंगे। सबसे बड़ा कारण तो यही है कि आज जेएनयू की जो छवि जनता के बीच बनी है, वह जनता को खुद ही दूर कर रही है। जिस विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारों की ध्वनि गूंजित होती है, वह कभी जन आंदोलन का हिस्सा नहीं बन सकते हैं।दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के जिन छात्रों ने कभी भारत के टुकड़े करने के नारे लगाए थे, आज वे ही छात्र फीस बढ़ोतरी के छोटे से मामले को राजनीतिक रुप देने का प्रयास करते दिखाई दे रहे हैं। इस छात्र आंदोलन का राजनीतिक स्वरुप इसलिए भी दिखाई दे रहा है, क्योंकि इसमें राष्ट्रीय मानबिन्दुओं और केन्द्र सरकार को सीधे निशाने पर लिया जा रहा है। जेएनयू वामपंथी विचारधारा का एक बड़ा केन्द्र रहा है।

वामपंथी धारा के कार्यकर्ता देश के महानायकों के बारे में क्या सोच रखते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। पिछले घटनाक्रमों को देखें तो पाएंगे कि जेएनयू में देश के विरोध में वातावरण बनाने का काम किया जाता रहा है। वहां आतंकवादी बुरहान वानी के समर्थन में कार्यक्रम किए जाते हैं। सवाल यह कि जेएनयू में शिक्षा के नाम पर आखिर क्या हो रहा है। जहां तक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में फीस बढ़ोतरी की बात है तो यह कहना तर्कसंगत ही होगा कि विगत 19 वर्ष से विश्वविद्यालय के छात्रावास के कमरों और भोजन का शुल्क नहीं बढ़ाया गया, जबकि पिछले 19 सालों में महंगाई का ग्राफ बहुत ऊपर गया है। इस सबका भार पूरी तरह से विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के कंधों पर ही आया। देश के अन्य विश्वविद्यालयों में भी शिक्षा महंगी हो रही है, जो जेएनयू के मुकाबले बहुत अधिक है। ऐसे में विश्वविद्यालय द्वारा कुछ हद तक फीस बढ़ाना न्यायोचित कदम ही है। जिसे वहां के कई छात्र भी सही मानते हैं। लेकिन यह आंदोलन इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि इसमें परदे के पीछे राजनीतिक कार्यकर्ता भूमिका निभा रहे हैं। यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं।

खैर… यह जांच का विषय हो सकता है।देश के प्रसिद्ध अधिवक्ता सांसद डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने इस छात्र आंदोलन के बारे में बहुत ही गहरी बात कही है। उनका मानना है कि जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय को कुछ समय के लिए बंद कर दिया जाए। उनके इस कथन के गहरे निहितार्थ निकल रहे हैं। स्वामी के संकेत को विस्तार से समझना हो तो एक बार जेएनयू की गतिविधियों का अध्ययन करना चाहिए। फिर वह सब सामने आ जाएगा जो वहां होता है। कहा जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जमकर राजनीति की जाती रही है। देश के जो शिक्षा केन्द्र राजनीति के केन्द्र बनते जा रहे हैं, उन पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है।

वर्तमान में जिस प्रकार से जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय का आंदोलन चल रहा है, उसे छात्र आंदोलन कहना न्याय संगत नहीं होगा। क्योंकि, यह विशुद्ध राजनीतिक आंदोलन है। फीस बढ़ोतरी का विरोध तो मात्र बहाना है। इस आंदोलन के समर्थन में देश की संसद में कांग्रेस और वामपंथी दलों की ओर से आवाज उठाई गई। इससे यही संदेश जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जो देश विरोधी नारे लगाए गए, उनके प्रति इन राजनीतिक दलों के समर्थन का ही भाव रहा होगा। इतना ही नहीं, जब भारत तेरे टुकड़े होंगे और हमें चाहिए आजादी जैसे नारे लगाए गए थे, तब भी कांग्रेस और वाम दलों ने खुलेआम समर्थन किया था। ऐसे में सवाल यह उठता है कि कहीं यही दोनों दल छात्रों को आंदोलन करने के लिए तो नहीं उकसा रहे? अगर यह सही है तो फिर केन्द्र सरकार को दोष देना सही नहीं कहा जा सकता।

जब से देश में राजनीतिक सत्ता का परिवर्तन हुआ है, तब से ही देश में उन संस्थानों की सक्रियता दिखाई देने लगी है, जो भारत के बारे में भ्रम का वातावरण बनाने में सहायक हो सकते हैं। चाहे वह शहरी नक्सलवाद को प्रायोजित करने वाले कथित बुद्धिजीवियों की संस्था हो या फिर उनके विचार को अंगीकार करने वाली ही संस्थाएं क्यों न हों। सभी केन्द्र सरकार का विरोध करने के लिए आगे आ रहे हैं। इस विश्वविद्यालय में पढ़ाई करने वाले छात्र कभी भारतीय सेना द्वारा की जाने वाली आतंकियों के विरोध में कार्यवाही पर सवाल उठाते दिखाई देते हैं तो कभी अनुच्छेद 370 को हटाने का विरोध करते हैं। चार वर्ष पूर्व जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में छात्र संघ की उपाध्यक्ष रहीं शेहला राशिद ने भारतीय सेना के विरोध में जमकर भड़ास निकाली थी, जबकि सेना की ओर से स्पष्ट कहा गया था कि ऐसा कुछ भी नहीं है। इससे समझ में आ सकता है कि इस विश्वविद्यालय में कौन-सा पाठ पढ़ाया जाता है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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देश की युवा पीढ़ी में विदेशों के प्रति रुचि बढ़ी

—गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है

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मनोज ज्वाला

एक मीडिया संस्थान के सर्वेक्षण के अनुसार हमारे देश के पढ़े-लिखे और शहरी नौजवानों में से आधे से अधिक ऐसे हैं, जो अपने देश को पसंद नहीं करते। वे विदेशों में जाकर बस जाना चाहते हैं। लगभग दो साल पहले के उक्त सर्वेक्षण के मुताबिक उनमें से 75 फीसदी युवाओं का कहना था कि वे बे-मन और मजबूरीवश भारत में रह रहे हैं। 62.08 फीसदी युवतियों और 66.01 फीसदी युवाओं का मानना था कि भारत  में उनका भविष्य सुरक्षित नहीं है। क्योंकि, यहां अच्छे दिन आने की संभावना कम है। उनमें से 50 फीसदी का मानना था कि भारत में किसी महापुरुष का अवतरण होगा, तभी हालात सुधर सकते हैं, अन्यथा नहीं।

40 फीसदी युवाओं का मानना था कि उन्हें अगर इस देश का प्रधानमंत्री बना दिया जाए, तो वे पांच साल में इस देश का कायापलट कर देंगे।अखबार का वह सर्वेक्षण आज भी बिल्कुल सही लगता है। अगर व्यापक स्तर पर सर्वेक्षण किया जाता, तो देश छोड़ने को तैयार युवाओं का प्रतिशत और अधिक दिखता। वह सर्वेक्षण तो सिर्फ शहरों तक सीमित था। अपने देश में गांवों पर भी तेजी से शहर छाते जा रहे हैं। गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है। गौर कीजिए कि देश छोड़ने को तैयार वे युवा पढ़े-लिखे हैं और शहरों में पले-बढ़े हैं। वे किस पद्धति से किस तरह के विद्यालयों में क्या पढ़े-लिखे हैं और किस रीति-रिवाज से कैसे परिवारों में किस तरह से पले-बढ़े हैं, यह ज्यादा गौरतलब है।

विद्यालय सरकारी हों या गैर सरकारी, सभी में शिक्षा की पद्धति एक है और वह है मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा पद्धति। भारतीयता विरोधी इसी शिक्षा पद्धति को सरकारी मान्यता प्राप्त है। सरकार का पूरा तंत्र इसी तरह की शिक्षा के विस्तार में लगा हुआ है। वैसे अंग्रेजी माध्यम वाले विद्यालय सबसे अच्छे माने जाते हैं और गैर-सरकारी निजी क्षेत्र के अधिकतर विद्यालय अंग्रेजी माध्यम के ही हैं। शहरों में ऐसे ही विद्यालयों की भरमार है और जिन युवाओं के बीच उक्त मीडिया संस्थान ने उपरोक्त सर्वेक्षण किया उनमें से सर्वाधिक युवा ऐसे ही तथाकथित ‘उत्कृष्ट’ विद्यालयों से पढ़े-लिखे हुए हैं। अब रही बात यह कि इन विद्यालयों में आखिर शिक्षा क्या और कैसी दी जाती है, तो यह इन युवाओं की उपरोक्त सोच से ही स्पष्ट है।

जाहिर है, उन्हें शिक्षा के नाम पर ऐसी-ऐसी डिग्रियां दी जाती हैं, जिनके कारण वे महात्वाकांक्षी, स्वार्थी बनकर असंतोष, अहंकार, खीझ, पलायन एवं हीनता-बोध से ग्रसित हो जाते हैं और कमाने-खाने भर थोड़े-बहुत हुनर हासिल कर स्वभाषा व स्वदेश के प्रति ‘नकार’ भाव से पीड़ित होकर विदेश चले जाते हैं।थॉमस विलिंग्टन मैकाले कोई शिक्षा-शास्त्री नहीं था। वह एक षड्यंत्रकारी था, जिसने भारत पर ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जड़ें जमाने की नीयत से भारतीय शिक्षा-पद्धति की जड़ें उखाड़कर मौजूदा शिक्षा-पद्धति को प्रक्षेपित किया था। जो आज भी उसी रूप में कायम है। 20 अक्टूबर 1931 को लंदन के रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ फौरन अफेयर्स के मंच से महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘अंग्रेजी शासन से पहले भारत की शिक्षा-व्यवस्था इंग्लैण्ड से भी अच्छी थी।’ उस पूरी व्यवस्था को सुनियोजित तरीके से समूल नष्ट कर देने के पश्चात ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जरूरतों के मुताबिक उसके रणनीतिकारों ने लम्बे समय तक बहस-विमर्श कर के मैकाले की योजनानुसार यह शिक्षा-पद्धति लागू की थी।

मैकाले ने ब्रिटिश पार्लियामेंट की शिक्षा समिति के समक्ष कहा था ‘हमें भारत में ऐसा शिक्षित वर्ग तैयार करना चाहिए, जो हमारे और उन करोड़ों भारतवासियों के बीच जिन पर हम शासन करते हैं, उन्हें समझाने-बुझाने का काम कर सके। जो केवल खून और रंग की दृष्टि से भारतीय हों, किन्तु रुचि, भाषा व भावों की दृष्टि से अंग्रेज हों।’ विदेशों में बस जाने को उतावले भारतीय युवाओं ने पूरी मेहनत व तबीयत से मैकाले शिक्षा-पद्धति को आत्मसात किया है, ऐसा समझा जा सकता है। यहां प्रसंगवश मैकाले के बहनोई चार्ल्स ट्रेवेलियन द्वारा ब्रिटिश पार्लियामेंट की एक समिति के समक्ष ‘भारत में भिन्न-भिन्न शिक्षा-पद्धतियों के भिन्न-भिन्न परिणाम’ शीर्षक से प्रस्तुत किये गए एक लेख का यह अंश भी उल्लेखनीय है कि ‘मैकाले शिक्षा-पद्धति का प्रभाव अंग्रेजी राज के लिए हितकर हुए बिना नहीं रह सकता। हमारे पास उपाय केवल यही है कि हम भारतवासियों को यूरोपियन ढंग की उन्नति में लगा दें। इससे हमारे लिए भारत पर अपना साम्राज्य कायम रखना बहुत आसान और असंदिग्ध हो जाएगा।’ ऐसा ही हुआ। बल्कि, मैकाले की योजना तो लक्ष्य से ज्यादा ही सफल रही।

हमारे देश के मैकालेवादी राजनेताओं ने अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासन की समाप्ति के बाद भी उनकी अंग्रेजी-मैकाले शिक्षा-पद्धति को न केवल यथावत कायम रखा, बल्कि उसे और ज्यादा अभारतीय रंग-ढंग में ढाल दिया। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष लक्षित प्राचीन भारतीय शिक्षा-पद्धति को अतीत के गर्त में डालकर शिक्षा को उत्पादन-विपणन-मुनाफा-उपभोग-केन्द्रित बना देने और उसे नैतिक सांस्कृतिक मूल्यों से विहीन कर देने तथा राष्ट्रीयता के प्रति उदासीन बना देने का ही परिणाम है कि हमारी यह युवा पीढ़ी महज निजी सुख-स्वार्थ के लिए अपने देश से विमुख हो जाना पसंद कर रही है। उसे विदेशों में ही अपना भविष्य दीख रहा है।

माना कि हमारे देश में तरह-तरह की समस्याएं हैं, किन्तु इनसे जूझने और इन्हें दूर करने की बजाय पलायन कर जाने अथवा कोरा लफ्फाजी करने कि हमें प्रधानमंत्री बना दिया जाए तो हम देश को सुंदर बना देंगे, अति महात्वाकांक्षा-युक्त मानसिक असंतुलन का ही द्योत्तक है। लेकिन आधे से अधिक ये शहरी युवा मानसिक रुप से असंतुलित नहीं हैं, बल्कि असल में वे पश्चिम के प्रति आकर्षित हैं। इसके लिए हमारे देश की चालू शिक्षा-पद्धति का पोषण करने वाले हमारे राजनेता ही जिम्मेवार हैं। यह ‘यूरोपियन ढंग की उन्नति’ के प्रति बढ़ते अनावश्यक आकर्षण का परिणाम है। इस मानसिक पलायन को रोकने के लिए जरूरी है कि हम अपने बच्चों को हमारे राष्ट्र की जड़ों से जोड़ने वाली और संतुलित समग्र मानसिक विकास करने वालीप्राचीन भारतीय पद्धति से भारतीय भाषाओं में समस्त ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा देने की सम्पूर्ण व्यवस्था कायम करें।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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भाई-बहन में प्रेम भाव बढ़ाता है भैया दूज

–बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था

Published

योगेश कुमार गोयल

(भैया दूज, 29 अक्टूबर पर विशेष)

भाई-बहन के दिलों में पावन संबंधों की मजबूती और प्रेमभाव स्थापित करने वाला पर्व है भैया दूज। इस दिन बहनें अपने भाईयों को तिलक लगाकर ईश्वर से उनकी दीर्घायु की कामना करती हैं। कहा जाता है कि इससे भाई यमराज के प्रकोप से बचे रहते हैं। दीपावली के दो दिन बाद अर्थात कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाए जाने वाले इस पर्व को ‘यम द्वितीया’ व ‘भ्रातृ द्वितीया’ के नाम से भी जाना जाता है। बहुत से भाई-बहन सौभाग्य तथा आयुष्य की प्राप्ति के लिए इस दिन यमुना अथवा अन्य पवित्र नदियों में साथ-साथ स्नान भी करते हैं। भैया दूज मनाने के संबंध में कई किवंदतियां प्रचलित हैं। एक कथा यमराज और उनकी बहन यमुना देवी से संबंधित है। बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था। यमुना अपने भाई यमराज से बहुत स्नेह करती थीं और अक्सर उनसे अनुरोध करती रहती थीं कि वे अपने इष्ट-मित्रों सहित उसके घर भोजन के लिए पधारें लेकिन यमराज हर बार उसके निमंत्रण को किसी न किसी बहाने से टाल जाते। कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमुना ने यमराज को एक बार फिर भोजन के लिए आमंत्रित किया।

उस समय यमराज ने विचार किया कि मैं तो अपने कर्त्तव्य से बंधा सदैव प्राणियों के प्राण ही हरता हूं। इसलिए इस चराचर जगत में कोई भी मुझे अपने घर नहीं बुलाना चाहता। लेकिन बहन यमुना तो मुझे बार-बार अपने घर आमंत्रित कर रही है। इसलिए अब तो उसका निमंत्रण स्वीकार करना ही चाहिए।यमराज को अपने घर आया देख यमुना की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने भाई का खूब आदर-सत्कार करते हुए उनके समक्ष नाना प्रकार के व्यंजन परोसे। बहन के आतिथ्य से यमराज बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे कोई वर मांगने को कहा। इस पर यमुना ने उनसे अनुरोध किया कि आप प्रतिवर्ष इसी दिन मेरे घर आकर भोजन करें और मेरी तरह जो भी बहन इस दिन अपने भाई का आदर-सत्कार करे, उसे तुम्हारा भय न रहे। यमराज ने बहन यमुना को उसका इच्छित वरदान दे दिया। ऐसी मान्यता है कि उसी दिन से ‘भैया दूज’ का पर्व मनाया जाने लगा। भैया दूज के संबंध में और भी कई कथाएं प्रचलित हैं। ऐसी ही एक कथा के अनुसार, एक ब्राह्मण की दो संतानें थी।

एक पुत्र एवं एक पुत्री। पुत्री बहुत समझदार एवं गुणवती थी। वह अपने भाई से जी-जान से प्यार करती थी। एक दिन उसका भाई उससे मिलने उसकी ससुराल पहुंचा। उस समय वह सूत कातने में व्यस्त थी। अतः उसे भाई के आने का पता ही न चल सका। भाई भी बिना कुछ बोले चुपचाप एक ओर बैठा रहा। जब थोड़ी देर बाद बहन की नजर उस पर पड़ी तो भाई को अपने घर आया देख उसे बेहद खुशी हुई। उसने भाई का भरपूर आदर-सत्कार किया। अगले दिन भाई को वापस लौटना था। अतः रास्ते के लिए वह आटे के पकवान बनाने के उद्देश्य से चक्की में आटा पीसने लगी। अनजाने में चक्की में बैठा सांप भी आटे के साथ पिस गया। उसी आटे के पकवान एक पोटली में बांधकर उसने भाई को रास्ते में खाने के लिए देकर विदा किया। भाई के घर से जाने के बाद जब उसे यह मालूम हुआ कि आटे में सांप पिस गया है तो अपने पुत्र को पालने में ही सोता छोड़कर वह अपने भाई के प्राणों की रक्षा के लिए दौड़ी। कुछ दूर जाने पर उसे एक पेड़ की छांव में अपना भाई सोता दिखाई दिया। तब तक उसने पोटली में से कुछ भी नहीं खाया था। उसने भगवान का शुक्रिया अदा किया और पोटली उठाकर दूर फेंक दी तथा भाई के साथ मायके की ओर चल दी।

रास्ते में उसने देखा कि भारी-भारी शिलाएं आकाश में उड़ रही हैं। उसने एक राहगीर से इस रहस्य के बारे में जानना चाहा तो उसने बताया कि जो बहन अपने भाई पर कभी नाराज न होती हो और उसे दिलो-जान से चाहती हो, उस भाई की शादी के समय ये शिलाएं उसकी छाती पर रखी जाएंगी। थोड़ी दूर चलने पर उसे नाग-नागिन दिखाई दिए। नाग ने बताया कि ये शिलाएं जिस व्यक्ति की छाती पर रखी जाएंगी, हम उसे डंस लेंगे। जब बहन ने इस विपत्ति से बचने का उपाय पूछा तो नाग-नागिन ने बताया कि अगर भाई के विवाह के समय उसके सभी कार्य बहन स्वयं करे, तभी भाई की जान बच सकती है।जब उसके भाई के विवाह के लग्न का शुभ मुहूर्त आया तो वह भाई को पीछे धकेलती हुई स्वयं ही लग्न चढ़वाने के लिए आगे हो गई और घोड़ी पर भी स्वयं चढ़ गई। परिवारजन और संबंधी उसके इस विचित्र व्यवहार से हैरान तथा क्रोधित थे। उसके घोड़ी पर चढ़ते ही शिलाएं उड़ती-उड़ती आई लेकिन घोड़ी पर किसी पुरूष की जगह एक महिला को बैठी देख वापस मुड़ गई। जब सुहागरात का समय आया तो वह भाई को पीछे कर खुद भाभी के साथ सोने उसके कमरे में चली गई।

परिवार के सभी सदस्य तथा सभी रिश्तेदार उसके इस अजीबोगरीब व्यवहार से बेहद आश्चर्यचकित और खफा थे। उन्हें उस पर गुस्सा तो बहुत आ रहा था लेकिन उसके जिद के समक्ष सभी विवश थे। सुहागरात पर नियत समय पर नाग-नागिन उसके भाई को डंसने कमरे में पहुंच गए लेकिन उसने नाग-नागिन को मारने की सारी तैयारी पहले ही कर रखी थी। आखिरकार उसने नाग-नागिन का काम तमाम कर दिया। उसके बाद वह निश्चिंत होकर सो गई। सुबह होने पर सभी मेहमानों को विदा करने के बाद परिवार वालों ने सोचा कि अब इस बला को भी कुछ बचा-खुचा देकर यहां से चलता कर दिया जाए लेकिन नींद से जागने पर जब उसने पूरी घटना के बारे में सब को विस्तार से बताया कि किस प्रकार वह अपने बच्चे को पालने में ही सोता छोड़कर दौड़ी-दौड़ी भाई के प्राण बचाने के लिए उसके पीछे चली आई और सभी को नाग-नागिन के मृत शरीर दिखाए तो सभी की आंखों में आंसू आ गए।

भाई के प्रति उसका असीम प्यार तथा समर्पण भाव देखकर उसके प्रति सभी का हृदय श्रद्धा से भर गया।भाई-भाभी तथा माता-पिता ने उसे ढेर सारे उपहारों से लादकर बड़े मान-सम्मान के साथ खुशी-खुशी ससुराल से विदा किया। भाई-बहन के बीच इसी प्रकार के पावन संबंध, प्रेमभाव तथा उनके दिलों में आपसी संबंधों को मजबूत बनाने के लिए ही ‘भैया दूज’ पर्व मनाया जाता है।

(लेखक स्तंभकार हैं।)

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