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लेख

स्वामी दयानन्द और गोरक्षा

महर्षि जी ने गौ को सभी सुखों का मूल सिद्ध करते हुए लिखा है – “गवादि पशु और कृषि आदि कर्मों की रक्षा वृद्धि होकर सब प्रकार के उत्तम सुख मनुष्यादि प्राणियों को प्राप्त होते है। पक्षपात छोड़कर देखिये, गौ आदि पशु और कृषि आदि कर्मों से सब संसार को असंख्य सुख होते है वा नहीं।”

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गावो विश्वस्य मातर:

स्वामी दयानन्द और गोरक्षा

जब आत्मा शरीर को छोड़ देती है तो शरीर मर जाता है अर्थात निष्क्रिय, निष्प्राण, तेजहिन हो जाता है। गो भारत सरीखे कृषि प्रधान देश की आत्मा है और यदि गो इस देश को छोड़ कर चली गयी तो भारत देश आत्मा के बिना शरीर मात्र रह जाएगा। इस राष्ट्र का पतन निश्चित रूप से कोई नहीं बचा सकेगा यदि गो आदि पशुओं को कटने से नहीं बचाया जाता है।
प्राचीन काल में तो संपत्ति का मापदण्ड भी गोधन(godhan) को ही माना जाता था। भारतीय संस्कृति एवं परंपरा में भारतमाता और गोमाता दोनों ही समानरूप से सेवा और रक्षा के पात्र रहे हैं। संस्कृत में तो गाय और पृथ्वी दोनों के लिए एक ही शब्द ‘गो’ का प्रयोग हुआ है। ऋषि दयानन्द(rishi dayanand) की आर्थिक राष्ट्रियता का वह मुख्य स्तम्भ है। इस कारण उन्होने इस विषय को लेकर ‘गोकरुणानिधि’(gokarunanidhi) के नाम से एक स्वतंत्र ग्रंथ की रचना करके गो-विषयक सभी प्रश्नों का विस्तार से विवेचन किया है। इसी पुस्तक से ब्रिटिश सरकार को राजद्रोह(treason) की गन्ध आने लगी थी।
गोकरुणानिधि का उद्देश्य
इस ग्रंथ की भूमिका में ऋषि दयानन्द जी लिखते है कि “यह ग्रंथ इसी अभिप्राय से लिखा गया है जिससे गौ आदि पशु जहाँ तक सामर्थ्य हो बचाये जावे और उनके बचाने से दूध, घी और खेती के बढ्ने से सब का सुख बढ़ता रहे।”
आर्यराज (स्वराज्य) और गौ
ऋषि वचनामृत1ऋषि वचनामृत
महर्षि जी लिखते है कि “जब आर्यों का राज्य था तब ये महोपकारक गाय आदि पशु नहीं मारे जाते थे। तभी आर्यावर्त व अन्य देशों में बड़े आनंद से मनुष्य आदि प्राणी रहते थे क्योंकि दूध, घी, बैल आदि पशुओं की बहुताई होने से अन्न रस पुष्कल होते थे। जब से विदेशी मांसाहारी इस देश में आकार गौ आदि पशुओं को मरने वाले राज्याधिकारी हुए है तब से क्रमश: आर्यों के दु:खों की बढ़ती होती जाती है क्योंकि “नष्टे मुले नैव फलं न पुष्पम।” (सत्यार्थ प्रकाश) परंतु शोक! महाशोक! विदेशियों से आजादी मिलने के बाद भी हमारे शासकों ने इस भारत रूपी वृक्ष की जड़ को सींचने की बजाय काटने का ही कार्य किया है।
गौ सब सुखों का मूलऋषि वचनामृत3
महर्षि जी ने गौ को सभी सुखों का मूल सिद्ध करते हुए लिखा है – “गवादि पशु और कृषि आदि कर्मों की रक्षा वृद्धि होकर सब प्रकार के उत्तम सुख मनुष्यादि प्राणियों को प्राप्त होते है। पक्षपात छोड़कर देखिये, गौ आदि पशु और कृषि आदि कर्मों से सब संसार को असंख्य सुख होते है वा नहीं।”
गौ की उपयोगिता
गौ का हमारे दैनिक जीवन पर कितना व्यापक प्रभाव है और खाद्य समस्या को हल करने आदि बातों पर महर्षि जी लिखते है – “इनकी रक्षा में अन्न भी महंगा नहीं होता। क्योंकि दूध आदि के अधिक होने से दरिद्री को भी खान-पान में दूध आदि मिलने पर न्यून ही अन्न खाया जाता है और अन्न के कम खाने से मल भी कम होता है। मल के न्यून होने से दुर्गन्ध भी न्यून होता है। दुर्गन्ध के स्वल्प होने से वायु और वृष्टिजल की शुद्धि भी विशेष होती है। उससे रोगों की न्यूनता होने से सबको सुख बढ़ता है।”
गौ की विशेषताऋषि वचनामृत
सभी पशुओं की रक्षा का आदेश देते हुए ऋषि ने सबसे अधिक बल गौ पर ही दिया है। उन्होने लिखा है – “वर्तमान में परमोपकरक गौ की रक्षा में ही मुख्य तात्पर्य है।” एक ही गौ से होने वाले लाभ का सविस्तार ब्योरा लिखने के बाद ऋषि लिखते है कि “एक गाय कि एक पीढ़ी में चार लाख पचहत्तर हजार छ: सौ मनुष्यों का पालन होता है और पीढ़ी पर पीढ़ी बढ़ा कर लेखा करें तो असंख्य मनुष्यों का पालन होता है।” (स०प्र०) गुणों में सर्वश्रेष्ठ होने के कारण ही आर्यों ने गाय को सब पशुओं को सर्वोत्तम माना है। आजकल तो सभी विद्वानों आदि ने स्वीकार कर लिया है कि भारत की देशी गाय के दूध में A२ होता है जिससे सभी रोग यहाँ तक की कैंसर व एडस जैसे असाध्य रोग भी ठीक हो सकते है।
गौवध महापाप
‘गोकरुणानिधि’ में एक गाय से होने वाले लाभ की चर्चा करते हुए स्वामीजी लिखते है कि “जबकि एक गाय की एक पीढ़ी में कई लाख मनुष्यों का पालन होता है। इसके मांस से अनुमान है कि केवल ८० मांसाहारी मनुष्य एक बार तृप्त हो सकते है। देखों, तुच्छ लाभ के लिए लाखों प्राणियों को मार असंख्य प्राणियों की हानि करना महापाप क्यों नहीं है?”
महोपकारक गौ और क्रूर मनुष्य
महर्षि जी लिखते है कि “देखिये, जो पशु नि:सार तृण, पत्ते, फल, फूल आदि खावे और सार दूध आदि अमृतरूपी रत्न देवे, हल गाड़ी आदि में चलके अनेकविध अन्न आदि उत्पन्न कर सब के बुद्धि, बल, प्राक्रम को बढ़ा के नीरोगता करे, पुत्र, पुत्री और मित्र आदि के समान पुरुषों के साथ विश्वास और प्रेम करें, जहाँ बांधे वही बंधे रहे, जिधर चलावे उधर चलें, जहां से हटावे वहां से हट जावे, देखने और बुलाने पर समीप चले आवें, जब कभी व्याघ्रादि पशु या मरने वाले को देखें तो अपनी रक्षा के लिए पालन करने वाले के समीप दौड़ कर आवे कि यह हमारी रक्षा करेगा।ऋषि वचनामृत4
जिसके मरे पर चमड़ा भी कंटक आदि से रक्षा करे, जंगल में चर के अपने बच्चे और स्वामी के लिए दूध देने को नियत स्थान पर नियत समय पर चले आवें, अपने स्वामी की रक्षा के लिए तन-मन लगावे, जिनका सर्वस्व राजा और प्रजा आदि मनुष्यों के सुखों के लिए है, इत्यादि शुभ गुणयुक्त सुखकारक पशुओं के गले छुरों से काटकर जो अपना पेट भर सब संसार की हानि करते है, क्या संसार में उन से भी अधिक कोई विश्वासघाती, अनुपकारी, दु:ख देने वाले और पापी जन होंगे? इसलिए यजुर्वेद के प्रथम ही मंत्र में परमात्मा की आज्ञा है कि [अघ्न्या: पशून् पाहि] हे पुरुष ! तू इन पशुओं को कभी मत मार अपितु इनकी रक्षा कर जिससे तेरी भी रक्षा होवे। इसी से ब्रह्मा से लेकर आज पर्यन्त आर्य लोग पशुओं कि हिंसा में पाप और अधर्म समझते थे और अब भी समझते है।”
राजा को चेतावनीऋषि वचनामृत5
गोवध से होने वाली हानियों का उल्लेख करते हुए स्वामी जी लिखते हैं – “गो आदि पशु के नाश होने से राजा और प्रजा का भी नाश हो जाता है। क्योंकि जब पशु न्यून हो जाते है तब दूध आदि पदार्थ और खेती आदि कार्यों की भी घटती होती है। ……..और यह भी ध्यान रखिए, कि वे पशु आदि और उनके स्वामी खेती आदि कार्य करने वाले प्रजा के पशु आदि और मनुष्यों के अधिक पुरुषार्थ से ही राजा का ऐश्वर्य अधिक बढ़ता और न्यून से नष्ट हो जाता है।”
राजा का कर्तव्यऋषि वचनामृत6
ऐसी दशा में राजा के कर्तव्य का निर्देश करते हुए स्वामी जी लिखते है – “राजा प्रजा से कर (tax) लेता है कि उनकी रक्षा यथावत करे न कि राजा और प्रजा के जो सुख के कारण गाय आदि पशु है उनका नाश किया करे। इसलिए आज तक जो हुआ सो हुआ आगे आँख खोलकर सब के हानिकारक कर्मों को न कीजिये और न करने दीजिये। हां, हम लोगों का यही काम है कि आप लोगों की भलाई और बुराई के काम जता देवेन और आप लोगों का यही काम है कि पक्षपात छोड़ कर सब कि रक्षा और बढ़ती करने में तत्पर रहें।”
शासन विधान में गोवध-निषेध की मांग
स्वामी जी की निश्चित धारणा थी कि गाय जैसे उपकारी पशुओं का वध राजकीय व्यवस्था में दण्डनीय होना चाहिए और शासन विधान में गोवध का निषेध करने वाली धारा का समावेश होना चाहिए। ऋषि लिखते है कि “बड़े आश्चर्य की बात है कि पशुओं को पीड़ा न देने के लिए न्याय पुस्तक में व्यवस्था भी लिखी है कि जो पशु दुर्बल और रोगी हो उनको कष्ट न दिया जाये। जितना बोझ सुखपूर्वक उठा सके उतना ही उन पर धरा जावे। श्रीमति विक्टोरिया महारानी का विज्ञापन भी प्रसिद्ध है कि इन अव्यक्तवाणी पशुओं को जो-जो दु:ख दिया जाता है वह न दिया जावे। तो भला क्या मार डालने से भी अधिक कोई दु:ख होता है? क्या फांसी से अधिक दु:ख बन्दीगृह में होता है ?
आज उनकी मृत्यु के लगभग १३० वर्ष बाद भी स्थिति ज्यों की त्यों बनी हुई है बल्कि ओर ज्यादा खराब हुई है।
गोवध करने वाले को प्राणदण्डऋषि वचनामृत7
गौ की उपयोगिता को देखते हुए ऋषि ने गोवध करने वाले को मनुष्य की हत्या करने वाले से भी अधिक अपराधी माना। वे लिखते है – “इन पशुओं की हत्या करने वालों को सब मनुष्यों की हत्या करने वाला जानिए।” (स० प्र०)
इन मूक प्राणियों की दयनीय अवस्था पर आँसू बहाते हुए स्वामी जी उन पशुओं की अन्त:करण की आवाज कहलवाते है – “देखों हमको बिना अपराध के बुरे हाल से मारते है और हम रक्षा करने तथा मारने वालों को भी दूध आदि अमृत पदार्थ देने को जीवित रहना चाहते है और मारे जाना नहीं चाहते। देखो, हम लोगों का सर्वस्व परोपकार के लिए है और हम इसलिए पुकारते है कि हमको आप लोग बचावे। हम तुम्हारी भाषा में अपना दु:ख नहीं समझ सकते और आप लोग हमारी भाषा नहीं जानते। नहीं तो क्या हममें से किसी को कोई मारता तो हम भी आप लोगों के सदृश अपने मारने वालों को न्यायव्यवस्था से फांसी प न चढ़वा देते ?
गोचरभूमि की मांग
गोवंश की रक्षा और वृद्धि के लिए यह आवश्यक है कि गवादि पशुओं के चरने के लिए पर्याप्त जमीन पड़ी हुई हो। स्वामी जी ने इस आवश्यकता को अनुभव करते हुए लिखा है कि – “जो कोई मनुष्य भोजन करने उपस्थित हो उसके आगे से भोजन के पदार्थ उठा लिए जावे और उसको वहां से दूर किया जावे तो क्या वह सुख मानेगा? ऐसे ही आज कल के समय में कोई गाय आदि पशु सरकारी जंगल में जाकर घास और पत्ता जोकि उन्हीं के भोजनार्थ है बिना महसूल दिये खावे वा खाने को जावे तो बेचारे उन पशुओं और उनके स्वामियों की दुर्दशा होती है। जंगल में आग लग जावे तो कुछ चिंता नहीं, किन्तु वे पशु न खाने पावे। ध्यान देकर सुनिये कि जैसा सुख-दु:ख अपने को होता है वैसा ही औरों को भी समझा कीजिये।” राष्ट्रीय सरकार का प्रथम कर्तव्य है कि वह उस समस्त गोचरभूमि को जोकि उसने जब्त की हुई है, तत्काल लौटा देवे जिससे भारत के मनुष्यों की भांति पशु भी स्वाधीनता पूर्वक विचार सकें।
हमारा कर्तव्यऋषि वचनामृत8
ऋषि लोगों को उपदेश करते है – “सुनो बन्धुवर्गो ! तुम्हारा तन, मन, धन गाय आदि की रक्षा रूप परोपकार में न लगे तो किस काम का ? देखो, परमात्मा का स्वभाव कि जिसने सब विश्व और सब पदार्थ परोपकार ही के लिए रच रखे है वैसे तुम भी अपना तन, मन, धन परोपकार ही के अर्पण करो।”
ऋषि के उपदेश को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक भारतवासी का कर्तव्य है कि वह गोरक्षा आन्दोलन को सफल बनाने के लिए प्राणर्पण से जुट जावे।
गोकृष्यादि रक्षिणी सभा
इस (गोरक्षा) उद्देश की पूर्ति के निमित्त स्वामी जी ने गांव-गांव में गोकृष्यादि रक्षिणी सभाओं की स्थापना करने की योजना देश के सामने रखी थी। यदि देश ने उस पर आचरण किया होता तो उसमें भुखमरी की सृष्टि न हुई होती। होती भी तो उसका रूप इतना भयंकर कदापि न होता। गोधन के ह्रास के साथ-साथ हमारा आर्थिक ह्रास तो हो ही रहा है, हमारे शरीर भी दिन प्रतिदिन निर्बल होते है। हमारा सम्पूर्ण सुख और वैभव अतीत की कहानी भर रह गया है।
गौ भारत का अभिमान है, राष्ट्र की पताका है, स्वराज्य का आधार है, सुखों का स्त्रोत है, संपत्ति का केंद्र है, निर्धन का जीवन है, धनवान की शोभा है, सरलता और सौम्यता की सजीव मूर्ति है, परोपकार की प्रतिमा है और नि:स्वार्थ सेवा का पार्थिव रूप है। ऐसी गौ की हर प्रकार से रक्षा करना मनुष्य-मात्र का कर्तव्य है।
महर्षि दयानन्द जी का स्तुत्य प्रयत्न
१५ अगस्त सन् १८८२ को महाराजा नाहरसिंह वर्मा जी के नाम पत्र में महर्षि जी ने लिखा :-
“प्रथम तो श्रीमान् महाशयों ने करुणा पूर्वक ४०००० पुरुषों की ओर से हस्ताक्षर कर पत्र मुम्बापुरी में हमारे पास भेजा था परंतु अब इस विषय में श्रीमानों के प्रबन्ध से कितनी सही हुई है। जो महाशय इन महोपकरक माता-पिता के समान संसार के रक्षक करुणा पात्र गायादि पशुओं के दु:ख निवारणार्थ प्रयत्न किया है वा करते जाते हैं वह अवश्य सफल होकर इस आर्यावर्त की ओषधि रूप होकर सब आर्यों के हृदय की अग्नि को शान्त करेगा।”
ज्येष्ठ बदी ९ सम्वत् १९३८ में म० रूपसिंह जी को महर्षि जी ने लिखा :-
“आपने गोरक्षार्थ पत्र के बाबत में लिखा सो हमने जिस समय आपके पास पत्र भेजा था उसी समय लाहौर आदि स्थानों में पत्र भेज दिये थे। ऐसा आर्यावर्त के भीतर कोई देश बचा हो कि जहाँ दो-चार स्थानों में पत्र न भेजे हों। और जहाँ-जहाँ की यादगारी आती जाती है वहाँ-वहाँ अभी भेजे जाते है। क्या आप पुन: दो-एक मास की छुट्टी लेकर पंजाब हाथा, पटियाला और कश्मीर आदि राज स्थानों में गोवध के नुकसान व्याख्यान द्वारा विदित करा, बड़े-बड़े प्रधान राज पुरुष तथा राजा महाराजों को सही कराएँ तो बस आप आर्यावर्त के सर्वोत्तम प्रतिष्ठा और महापुण्य के भागी होंगे। यह लेख मैंने आपकी योग्यता समझ के लिखा।”
८ अप्रैल १८८२ को बम्बई से महर्षि दयानन्द जी ने जयपुर कौंसिल के एक मंत्री श्री ठा० नंदकिशोरसिंह जी को जो पत्र भिजवाया उसमें लिखा :-
“गोरक्षा के विषय में बड़ी तत्परता से कार्य चल रहा है और सफलता मिल रही है। बम्बई से गोहत्या को बंद करवाने के लिए २००० हस्ताक्षर करवाए जा रहे हैं। हम न केवल अपनी देशी रियासतों से ही गोहत्या को बन्द करवाना चाहते है बल्कि पार्लियामेंट को भी इस विषयक ऐक्ट (कानून) बनवाने के लिए आवेदन पत्र भेजना चाहते हैं। इस उद्देश्य से हम दो करोड़ व्यक्तियों के हस्ताक्षर इकट्ठे करना चाहते हैं। यह आशा है कि सब राजा लोग भी एक दूसरे को इस विषय में सलाह देंगे।
…… कृपा करके अधिक से अधिक व्यक्तियों के हस्ताक्षर उन फार्मों पर ले लें जिन्हें हम आप के पास पृथक् भिजवा रहे हैं।”
१२ मार्च सन १८८२ को महर्षि दयानन्द ने मंत्री आर्य समाज दानापुर को निम्न पत्र लिखा :-
“मंत्री आर्य समाज दानापुर आनंदित रहो। मैं आप परोपकार प्रिय धार्मिक जनों को सब जगत के उपकारक गाय, बैल और भैंस आदि की हत्या के निवारणार्थ दो पत्र एक तो सही करने का और दूसरा जिसके अनुसार सही करनी करानी हैं दो पत्र भेजता हूँ। इसको आप प्रीति और उत्साह पूर्वक स्वीकार कीजिये जिससे आप महाशय लोगों की कीर्ति की संसार में सदा विराजमान रहे। इस काम को सिद्ध करने का विचार इस प्रकार किया गया है कि दो करोड़ से अधिक राजे महाराजे प्रधान आदि महाशय पुरुषों को सही करा के आर्यावर्तीय श्रीमान् गवर्नर जनरल साहेब बहादुर से इस विषय की अर्जी कर के ऊपरी लिखित गाय आदि पशुओं की हत्या को छुड़वा देना। मुझ को दृढ़ निश्चय है कि प्रसन्नता पूर्वक आप लोग इस महोपकारक कार्य को शीघ्र करेंगे। अधिक प्रति भेजने का प्रयोजन यह है कि जहाँ-२ उचित समझे वहाँ-२ सही करा लीजिये।”

डॉ विवेक आर्य /नसीब सैनी

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जेएनयू में फीस वृद्धि के नाम पर राजनीति

—यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं

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सुरेश हिन्दुस्थानी

देश के उच्च शिक्षा केन्द्र जब राजनीति के अड्डे बनने की ओर कदम बढ़ाने लगें, तब वहां की शिक्षा की दिशा-दशा क्या होगी, यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। फीस बढ़ोतरी के खिलाफ किया जाने वाला दिल्ली का छात्र आंदोलन कुछ इसी प्रकार का भाव प्रदर्शित कर रहा है, जहां केवल और केवल राजनीति ही की जा रही है। किसी भी आंदोलन की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके पीछे जनहित का कितना भाव है। दिल्ली का यह आंदोलन जनसरोकार से कोसों दूर दिखाई दे रहा है।

हालांकि इसके पीछे बहुत से अन्य कारण भी होंगे। सबसे बड़ा कारण तो यही है कि आज जेएनयू की जो छवि जनता के बीच बनी है, वह जनता को खुद ही दूर कर रही है। जिस विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारों की ध्वनि गूंजित होती है, वह कभी जन आंदोलन का हिस्सा नहीं बन सकते हैं।दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के जिन छात्रों ने कभी भारत के टुकड़े करने के नारे लगाए थे, आज वे ही छात्र फीस बढ़ोतरी के छोटे से मामले को राजनीतिक रुप देने का प्रयास करते दिखाई दे रहे हैं। इस छात्र आंदोलन का राजनीतिक स्वरुप इसलिए भी दिखाई दे रहा है, क्योंकि इसमें राष्ट्रीय मानबिन्दुओं और केन्द्र सरकार को सीधे निशाने पर लिया जा रहा है। जेएनयू वामपंथी विचारधारा का एक बड़ा केन्द्र रहा है।

वामपंथी धारा के कार्यकर्ता देश के महानायकों के बारे में क्या सोच रखते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। पिछले घटनाक्रमों को देखें तो पाएंगे कि जेएनयू में देश के विरोध में वातावरण बनाने का काम किया जाता रहा है। वहां आतंकवादी बुरहान वानी के समर्थन में कार्यक्रम किए जाते हैं। सवाल यह कि जेएनयू में शिक्षा के नाम पर आखिर क्या हो रहा है। जहां तक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में फीस बढ़ोतरी की बात है तो यह कहना तर्कसंगत ही होगा कि विगत 19 वर्ष से विश्वविद्यालय के छात्रावास के कमरों और भोजन का शुल्क नहीं बढ़ाया गया, जबकि पिछले 19 सालों में महंगाई का ग्राफ बहुत ऊपर गया है। इस सबका भार पूरी तरह से विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के कंधों पर ही आया। देश के अन्य विश्वविद्यालयों में भी शिक्षा महंगी हो रही है, जो जेएनयू के मुकाबले बहुत अधिक है। ऐसे में विश्वविद्यालय द्वारा कुछ हद तक फीस बढ़ाना न्यायोचित कदम ही है। जिसे वहां के कई छात्र भी सही मानते हैं। लेकिन यह आंदोलन इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि इसमें परदे के पीछे राजनीतिक कार्यकर्ता भूमिका निभा रहे हैं। यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं।

खैर… यह जांच का विषय हो सकता है।देश के प्रसिद्ध अधिवक्ता सांसद डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने इस छात्र आंदोलन के बारे में बहुत ही गहरी बात कही है। उनका मानना है कि जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय को कुछ समय के लिए बंद कर दिया जाए। उनके इस कथन के गहरे निहितार्थ निकल रहे हैं। स्वामी के संकेत को विस्तार से समझना हो तो एक बार जेएनयू की गतिविधियों का अध्ययन करना चाहिए। फिर वह सब सामने आ जाएगा जो वहां होता है। कहा जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जमकर राजनीति की जाती रही है। देश के जो शिक्षा केन्द्र राजनीति के केन्द्र बनते जा रहे हैं, उन पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है।

वर्तमान में जिस प्रकार से जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय का आंदोलन चल रहा है, उसे छात्र आंदोलन कहना न्याय संगत नहीं होगा। क्योंकि, यह विशुद्ध राजनीतिक आंदोलन है। फीस बढ़ोतरी का विरोध तो मात्र बहाना है। इस आंदोलन के समर्थन में देश की संसद में कांग्रेस और वामपंथी दलों की ओर से आवाज उठाई गई। इससे यही संदेश जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जो देश विरोधी नारे लगाए गए, उनके प्रति इन राजनीतिक दलों के समर्थन का ही भाव रहा होगा। इतना ही नहीं, जब भारत तेरे टुकड़े होंगे और हमें चाहिए आजादी जैसे नारे लगाए गए थे, तब भी कांग्रेस और वाम दलों ने खुलेआम समर्थन किया था। ऐसे में सवाल यह उठता है कि कहीं यही दोनों दल छात्रों को आंदोलन करने के लिए तो नहीं उकसा रहे? अगर यह सही है तो फिर केन्द्र सरकार को दोष देना सही नहीं कहा जा सकता।

जब से देश में राजनीतिक सत्ता का परिवर्तन हुआ है, तब से ही देश में उन संस्थानों की सक्रियता दिखाई देने लगी है, जो भारत के बारे में भ्रम का वातावरण बनाने में सहायक हो सकते हैं। चाहे वह शहरी नक्सलवाद को प्रायोजित करने वाले कथित बुद्धिजीवियों की संस्था हो या फिर उनके विचार को अंगीकार करने वाली ही संस्थाएं क्यों न हों। सभी केन्द्र सरकार का विरोध करने के लिए आगे आ रहे हैं। इस विश्वविद्यालय में पढ़ाई करने वाले छात्र कभी भारतीय सेना द्वारा की जाने वाली आतंकियों के विरोध में कार्यवाही पर सवाल उठाते दिखाई देते हैं तो कभी अनुच्छेद 370 को हटाने का विरोध करते हैं। चार वर्ष पूर्व जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में छात्र संघ की उपाध्यक्ष रहीं शेहला राशिद ने भारतीय सेना के विरोध में जमकर भड़ास निकाली थी, जबकि सेना की ओर से स्पष्ट कहा गया था कि ऐसा कुछ भी नहीं है। इससे समझ में आ सकता है कि इस विश्वविद्यालय में कौन-सा पाठ पढ़ाया जाता है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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देश की युवा पीढ़ी में विदेशों के प्रति रुचि बढ़ी

—गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है

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मनोज ज्वाला

एक मीडिया संस्थान के सर्वेक्षण के अनुसार हमारे देश के पढ़े-लिखे और शहरी नौजवानों में से आधे से अधिक ऐसे हैं, जो अपने देश को पसंद नहीं करते। वे विदेशों में जाकर बस जाना चाहते हैं। लगभग दो साल पहले के उक्त सर्वेक्षण के मुताबिक उनमें से 75 फीसदी युवाओं का कहना था कि वे बे-मन और मजबूरीवश भारत में रह रहे हैं। 62.08 फीसदी युवतियों और 66.01 फीसदी युवाओं का मानना था कि भारत  में उनका भविष्य सुरक्षित नहीं है। क्योंकि, यहां अच्छे दिन आने की संभावना कम है। उनमें से 50 फीसदी का मानना था कि भारत में किसी महापुरुष का अवतरण होगा, तभी हालात सुधर सकते हैं, अन्यथा नहीं।

40 फीसदी युवाओं का मानना था कि उन्हें अगर इस देश का प्रधानमंत्री बना दिया जाए, तो वे पांच साल में इस देश का कायापलट कर देंगे।अखबार का वह सर्वेक्षण आज भी बिल्कुल सही लगता है। अगर व्यापक स्तर पर सर्वेक्षण किया जाता, तो देश छोड़ने को तैयार युवाओं का प्रतिशत और अधिक दिखता। वह सर्वेक्षण तो सिर्फ शहरों तक सीमित था। अपने देश में गांवों पर भी तेजी से शहर छाते जा रहे हैं। गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है। गौर कीजिए कि देश छोड़ने को तैयार वे युवा पढ़े-लिखे हैं और शहरों में पले-बढ़े हैं। वे किस पद्धति से किस तरह के विद्यालयों में क्या पढ़े-लिखे हैं और किस रीति-रिवाज से कैसे परिवारों में किस तरह से पले-बढ़े हैं, यह ज्यादा गौरतलब है।

विद्यालय सरकारी हों या गैर सरकारी, सभी में शिक्षा की पद्धति एक है और वह है मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा पद्धति। भारतीयता विरोधी इसी शिक्षा पद्धति को सरकारी मान्यता प्राप्त है। सरकार का पूरा तंत्र इसी तरह की शिक्षा के विस्तार में लगा हुआ है। वैसे अंग्रेजी माध्यम वाले विद्यालय सबसे अच्छे माने जाते हैं और गैर-सरकारी निजी क्षेत्र के अधिकतर विद्यालय अंग्रेजी माध्यम के ही हैं। शहरों में ऐसे ही विद्यालयों की भरमार है और जिन युवाओं के बीच उक्त मीडिया संस्थान ने उपरोक्त सर्वेक्षण किया उनमें से सर्वाधिक युवा ऐसे ही तथाकथित ‘उत्कृष्ट’ विद्यालयों से पढ़े-लिखे हुए हैं। अब रही बात यह कि इन विद्यालयों में आखिर शिक्षा क्या और कैसी दी जाती है, तो यह इन युवाओं की उपरोक्त सोच से ही स्पष्ट है।

जाहिर है, उन्हें शिक्षा के नाम पर ऐसी-ऐसी डिग्रियां दी जाती हैं, जिनके कारण वे महात्वाकांक्षी, स्वार्थी बनकर असंतोष, अहंकार, खीझ, पलायन एवं हीनता-बोध से ग्रसित हो जाते हैं और कमाने-खाने भर थोड़े-बहुत हुनर हासिल कर स्वभाषा व स्वदेश के प्रति ‘नकार’ भाव से पीड़ित होकर विदेश चले जाते हैं।थॉमस विलिंग्टन मैकाले कोई शिक्षा-शास्त्री नहीं था। वह एक षड्यंत्रकारी था, जिसने भारत पर ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जड़ें जमाने की नीयत से भारतीय शिक्षा-पद्धति की जड़ें उखाड़कर मौजूदा शिक्षा-पद्धति को प्रक्षेपित किया था। जो आज भी उसी रूप में कायम है। 20 अक्टूबर 1931 को लंदन के रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ फौरन अफेयर्स के मंच से महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘अंग्रेजी शासन से पहले भारत की शिक्षा-व्यवस्था इंग्लैण्ड से भी अच्छी थी।’ उस पूरी व्यवस्था को सुनियोजित तरीके से समूल नष्ट कर देने के पश्चात ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जरूरतों के मुताबिक उसके रणनीतिकारों ने लम्बे समय तक बहस-विमर्श कर के मैकाले की योजनानुसार यह शिक्षा-पद्धति लागू की थी।

मैकाले ने ब्रिटिश पार्लियामेंट की शिक्षा समिति के समक्ष कहा था ‘हमें भारत में ऐसा शिक्षित वर्ग तैयार करना चाहिए, जो हमारे और उन करोड़ों भारतवासियों के बीच जिन पर हम शासन करते हैं, उन्हें समझाने-बुझाने का काम कर सके। जो केवल खून और रंग की दृष्टि से भारतीय हों, किन्तु रुचि, भाषा व भावों की दृष्टि से अंग्रेज हों।’ विदेशों में बस जाने को उतावले भारतीय युवाओं ने पूरी मेहनत व तबीयत से मैकाले शिक्षा-पद्धति को आत्मसात किया है, ऐसा समझा जा सकता है। यहां प्रसंगवश मैकाले के बहनोई चार्ल्स ट्रेवेलियन द्वारा ब्रिटिश पार्लियामेंट की एक समिति के समक्ष ‘भारत में भिन्न-भिन्न शिक्षा-पद्धतियों के भिन्न-भिन्न परिणाम’ शीर्षक से प्रस्तुत किये गए एक लेख का यह अंश भी उल्लेखनीय है कि ‘मैकाले शिक्षा-पद्धति का प्रभाव अंग्रेजी राज के लिए हितकर हुए बिना नहीं रह सकता। हमारे पास उपाय केवल यही है कि हम भारतवासियों को यूरोपियन ढंग की उन्नति में लगा दें। इससे हमारे लिए भारत पर अपना साम्राज्य कायम रखना बहुत आसान और असंदिग्ध हो जाएगा।’ ऐसा ही हुआ। बल्कि, मैकाले की योजना तो लक्ष्य से ज्यादा ही सफल रही।

हमारे देश के मैकालेवादी राजनेताओं ने अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासन की समाप्ति के बाद भी उनकी अंग्रेजी-मैकाले शिक्षा-पद्धति को न केवल यथावत कायम रखा, बल्कि उसे और ज्यादा अभारतीय रंग-ढंग में ढाल दिया। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष लक्षित प्राचीन भारतीय शिक्षा-पद्धति को अतीत के गर्त में डालकर शिक्षा को उत्पादन-विपणन-मुनाफा-उपभोग-केन्द्रित बना देने और उसे नैतिक सांस्कृतिक मूल्यों से विहीन कर देने तथा राष्ट्रीयता के प्रति उदासीन बना देने का ही परिणाम है कि हमारी यह युवा पीढ़ी महज निजी सुख-स्वार्थ के लिए अपने देश से विमुख हो जाना पसंद कर रही है। उसे विदेशों में ही अपना भविष्य दीख रहा है।

माना कि हमारे देश में तरह-तरह की समस्याएं हैं, किन्तु इनसे जूझने और इन्हें दूर करने की बजाय पलायन कर जाने अथवा कोरा लफ्फाजी करने कि हमें प्रधानमंत्री बना दिया जाए तो हम देश को सुंदर बना देंगे, अति महात्वाकांक्षा-युक्त मानसिक असंतुलन का ही द्योत्तक है। लेकिन आधे से अधिक ये शहरी युवा मानसिक रुप से असंतुलित नहीं हैं, बल्कि असल में वे पश्चिम के प्रति आकर्षित हैं। इसके लिए हमारे देश की चालू शिक्षा-पद्धति का पोषण करने वाले हमारे राजनेता ही जिम्मेवार हैं। यह ‘यूरोपियन ढंग की उन्नति’ के प्रति बढ़ते अनावश्यक आकर्षण का परिणाम है। इस मानसिक पलायन को रोकने के लिए जरूरी है कि हम अपने बच्चों को हमारे राष्ट्र की जड़ों से जोड़ने वाली और संतुलित समग्र मानसिक विकास करने वालीप्राचीन भारतीय पद्धति से भारतीय भाषाओं में समस्त ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा देने की सम्पूर्ण व्यवस्था कायम करें।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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भाई-बहन में प्रेम भाव बढ़ाता है भैया दूज

–बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था

Published

योगेश कुमार गोयल

(भैया दूज, 29 अक्टूबर पर विशेष)

भाई-बहन के दिलों में पावन संबंधों की मजबूती और प्रेमभाव स्थापित करने वाला पर्व है भैया दूज। इस दिन बहनें अपने भाईयों को तिलक लगाकर ईश्वर से उनकी दीर्घायु की कामना करती हैं। कहा जाता है कि इससे भाई यमराज के प्रकोप से बचे रहते हैं। दीपावली के दो दिन बाद अर्थात कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाए जाने वाले इस पर्व को ‘यम द्वितीया’ व ‘भ्रातृ द्वितीया’ के नाम से भी जाना जाता है। बहुत से भाई-बहन सौभाग्य तथा आयुष्य की प्राप्ति के लिए इस दिन यमुना अथवा अन्य पवित्र नदियों में साथ-साथ स्नान भी करते हैं। भैया दूज मनाने के संबंध में कई किवंदतियां प्रचलित हैं। एक कथा यमराज और उनकी बहन यमुना देवी से संबंधित है। बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था। यमुना अपने भाई यमराज से बहुत स्नेह करती थीं और अक्सर उनसे अनुरोध करती रहती थीं कि वे अपने इष्ट-मित्रों सहित उसके घर भोजन के लिए पधारें लेकिन यमराज हर बार उसके निमंत्रण को किसी न किसी बहाने से टाल जाते। कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमुना ने यमराज को एक बार फिर भोजन के लिए आमंत्रित किया।

उस समय यमराज ने विचार किया कि मैं तो अपने कर्त्तव्य से बंधा सदैव प्राणियों के प्राण ही हरता हूं। इसलिए इस चराचर जगत में कोई भी मुझे अपने घर नहीं बुलाना चाहता। लेकिन बहन यमुना तो मुझे बार-बार अपने घर आमंत्रित कर रही है। इसलिए अब तो उसका निमंत्रण स्वीकार करना ही चाहिए।यमराज को अपने घर आया देख यमुना की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने भाई का खूब आदर-सत्कार करते हुए उनके समक्ष नाना प्रकार के व्यंजन परोसे। बहन के आतिथ्य से यमराज बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे कोई वर मांगने को कहा। इस पर यमुना ने उनसे अनुरोध किया कि आप प्रतिवर्ष इसी दिन मेरे घर आकर भोजन करें और मेरी तरह जो भी बहन इस दिन अपने भाई का आदर-सत्कार करे, उसे तुम्हारा भय न रहे। यमराज ने बहन यमुना को उसका इच्छित वरदान दे दिया। ऐसी मान्यता है कि उसी दिन से ‘भैया दूज’ का पर्व मनाया जाने लगा। भैया दूज के संबंध में और भी कई कथाएं प्रचलित हैं। ऐसी ही एक कथा के अनुसार, एक ब्राह्मण की दो संतानें थी।

एक पुत्र एवं एक पुत्री। पुत्री बहुत समझदार एवं गुणवती थी। वह अपने भाई से जी-जान से प्यार करती थी। एक दिन उसका भाई उससे मिलने उसकी ससुराल पहुंचा। उस समय वह सूत कातने में व्यस्त थी। अतः उसे भाई के आने का पता ही न चल सका। भाई भी बिना कुछ बोले चुपचाप एक ओर बैठा रहा। जब थोड़ी देर बाद बहन की नजर उस पर पड़ी तो भाई को अपने घर आया देख उसे बेहद खुशी हुई। उसने भाई का भरपूर आदर-सत्कार किया। अगले दिन भाई को वापस लौटना था। अतः रास्ते के लिए वह आटे के पकवान बनाने के उद्देश्य से चक्की में आटा पीसने लगी। अनजाने में चक्की में बैठा सांप भी आटे के साथ पिस गया। उसी आटे के पकवान एक पोटली में बांधकर उसने भाई को रास्ते में खाने के लिए देकर विदा किया। भाई के घर से जाने के बाद जब उसे यह मालूम हुआ कि आटे में सांप पिस गया है तो अपने पुत्र को पालने में ही सोता छोड़कर वह अपने भाई के प्राणों की रक्षा के लिए दौड़ी। कुछ दूर जाने पर उसे एक पेड़ की छांव में अपना भाई सोता दिखाई दिया। तब तक उसने पोटली में से कुछ भी नहीं खाया था। उसने भगवान का शुक्रिया अदा किया और पोटली उठाकर दूर फेंक दी तथा भाई के साथ मायके की ओर चल दी।

रास्ते में उसने देखा कि भारी-भारी शिलाएं आकाश में उड़ रही हैं। उसने एक राहगीर से इस रहस्य के बारे में जानना चाहा तो उसने बताया कि जो बहन अपने भाई पर कभी नाराज न होती हो और उसे दिलो-जान से चाहती हो, उस भाई की शादी के समय ये शिलाएं उसकी छाती पर रखी जाएंगी। थोड़ी दूर चलने पर उसे नाग-नागिन दिखाई दिए। नाग ने बताया कि ये शिलाएं जिस व्यक्ति की छाती पर रखी जाएंगी, हम उसे डंस लेंगे। जब बहन ने इस विपत्ति से बचने का उपाय पूछा तो नाग-नागिन ने बताया कि अगर भाई के विवाह के समय उसके सभी कार्य बहन स्वयं करे, तभी भाई की जान बच सकती है।जब उसके भाई के विवाह के लग्न का शुभ मुहूर्त आया तो वह भाई को पीछे धकेलती हुई स्वयं ही लग्न चढ़वाने के लिए आगे हो गई और घोड़ी पर भी स्वयं चढ़ गई। परिवारजन और संबंधी उसके इस विचित्र व्यवहार से हैरान तथा क्रोधित थे। उसके घोड़ी पर चढ़ते ही शिलाएं उड़ती-उड़ती आई लेकिन घोड़ी पर किसी पुरूष की जगह एक महिला को बैठी देख वापस मुड़ गई। जब सुहागरात का समय आया तो वह भाई को पीछे कर खुद भाभी के साथ सोने उसके कमरे में चली गई।

परिवार के सभी सदस्य तथा सभी रिश्तेदार उसके इस अजीबोगरीब व्यवहार से बेहद आश्चर्यचकित और खफा थे। उन्हें उस पर गुस्सा तो बहुत आ रहा था लेकिन उसके जिद के समक्ष सभी विवश थे। सुहागरात पर नियत समय पर नाग-नागिन उसके भाई को डंसने कमरे में पहुंच गए लेकिन उसने नाग-नागिन को मारने की सारी तैयारी पहले ही कर रखी थी। आखिरकार उसने नाग-नागिन का काम तमाम कर दिया। उसके बाद वह निश्चिंत होकर सो गई। सुबह होने पर सभी मेहमानों को विदा करने के बाद परिवार वालों ने सोचा कि अब इस बला को भी कुछ बचा-खुचा देकर यहां से चलता कर दिया जाए लेकिन नींद से जागने पर जब उसने पूरी घटना के बारे में सब को विस्तार से बताया कि किस प्रकार वह अपने बच्चे को पालने में ही सोता छोड़कर दौड़ी-दौड़ी भाई के प्राण बचाने के लिए उसके पीछे चली आई और सभी को नाग-नागिन के मृत शरीर दिखाए तो सभी की आंखों में आंसू आ गए।

भाई के प्रति उसका असीम प्यार तथा समर्पण भाव देखकर उसके प्रति सभी का हृदय श्रद्धा से भर गया।भाई-भाभी तथा माता-पिता ने उसे ढेर सारे उपहारों से लादकर बड़े मान-सम्मान के साथ खुशी-खुशी ससुराल से विदा किया। भाई-बहन के बीच इसी प्रकार के पावन संबंध, प्रेमभाव तथा उनके दिलों में आपसी संबंधों को मजबूत बनाने के लिए ही ‘भैया दूज’ पर्व मनाया जाता है।

(लेखक स्तंभकार हैं।)

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