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स्त्रियों का सबसे बड़ा आभूषण उनका वस्त्र है,अपने प्राचीन पहनावे को न भूले भारतीय महिलाएँ

……. विज्ञान के अनुसार 4 तरह के नशो में एक नशा अश्लीलता भी है,इसलिए पूरे समाज का संस्कारित होना अति आवश्यक है

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नसीब सैनी

प्राचीन काल से ही भारत देश को अपनी संस्कृति के नाम से ही जाना जाता है। देश में पुरषो और महिलाओं के रहन सहन काफी कुछ दर्शाते थे। जो समय के साथ इतना बदलाव आ गया है। अब भारत में विदेशी पहनावे को अपनाने लगे है जो भारतीय संस्कृति को खत्म नष्ट क्र रहे है। भारत देश प्राचीन काल से ही अपनी सांस्कृति को बनाये रखे हुए है जिसको विश्व के अन्य देश भी मानते है,लेकिन अब कुछ 10 सालो में जिस प्रकार के पहनावे को देश में अपनाया जा रहा है। उसको देख के नहीं लगता है की ये भारत है बल्कि ऐसा लगता है की हम फॉरन में है। पुरषो के पहनावे के साथ औरतो के पहनावे में बिल्कुल बदलाव देखने को मिल रहा है।

भारत देश प्राचीन काल से ही अपनी सांस्कृति को बनाये रखे हुए है जिसको विश्व के अन्य देश भी मानते है,लेकिन अब कुछ 10 सालो में जिस प्रकार के पहनावे को देश में अपनाया जा रहा है। उसको देख के नहीं लगता है की ये भारत है बल्कि ऐसा लगता है की हम फॉरन देश में जिंदगी जी रहे है। पुरषो के पहनावे के साथ औरतो के पहनावे में बिल्कुल बदलाव देखने को मिल रहा है।

बात करे सन 1980 तक लड़कियाँ कालेज में साड़ी पहनती थी या फिर सलवार सूट। इसके बाद साड़ी पूरी तरह गायब हुई और सलवार सूट के साथ जीन्स आ गया। 2005 के बाद सलवार सूट लगभग गायब हो गया और इसकी जगह Skin Tight काले सफेद स्लैक्स आ गए। फिर 2010 तंक लगभग पारदर्शी स्लैक्स आ गए जिसमे आंतरिक वस्त्र पूरी तरह स्प्ष्ट दिखते हैं। फिर सूट, जोकि पहले घुटने या जांघो के पास से 2 भाग मे कटा होता था, वो 2012 के बाद कमर से 2 भागों में बंट गया और फिर 2015 के बाद यह सूट लगभग ऊपर नाभि के पास से 2 भागो मे बंट गया जिससे कि लड़की या महिला के नितंब पूरी तरह स्प्ष्ट दिखाई पड़ते हैं और 2 पहिया गाड़ी चलाती या पीछे बैठी महिला अत्यंत विचित्र सी दिखाई देती है।

आश्चर्य की बात यह है कि यह पहनावा कालेज से लेकर 40 वर्ष या ऊपर उम्र की महिलाओ में अब भी दिख रहा है। बड़ी उम्र की महिलायें छोटी लड़कियों को अच्छा सिखाने की बजाए उनसे बराबरी की होड़ लगाने लगी है। अब कुछ नया हो रहा 2018 मे, स्लैक्स ही कुछ Printed या रंग बिरंगा सा हो गया और सूट अब कमर तक आकर समाप्त हो गया।

साथ ही कालेजी लड़कियों या बड़ी महिलाओ मे एक नया ट्रेंड और आ गया, स्लैक्स अब पिंडलियों तंक पहुच गया, कट गया है नीचे से, इस्लाममिक पायजामे की तरह है ( हिन्दू पुरुषों की वेशभूषा में पिछले 40 वर्ष मे कोई उल्लेखनीय परिवर्तन नही हुआ ) जबकि इसके उलट मुस्लिम लड़कियाँ तो अब Mall जाती है, बड़े होटलों में, सामाजिक पार्टियों में जाती है, तो पूरा ढका हुआ बुर्का या सिर में चारो तरफ लिपटे कपड़े के साथ दिखाई पड़ती है।

लड़कियो के अधनग्न घूमने पर जो लोग या स्त्रिया ये कहते है की कपडे नहीं सोच बदलो उन लोगो से कुछ प्रश्न है !

1) सोच बदलने की नौबत आखिर आ ही क्यों रही है?
2) लड़कियो की सोच का आकलन क्यों नहीं करते? कि उन्होंने क्या सोचकर ऐसे कपडे पहने कि उसके पीठ जांघे इत्यादि सब दिखाई दे रहा है. इन कपड़ो के पीछे उसकी सोच क्या थी? एक निर्लज्ज लड़की चाहती है की पूरा पुरुष समाज उसे देखे,वही दूसरी तरफ एक सभ्य लड़की बिलकुल पसंद नहीं करेगी की कोई उसे इस तरह से देखे।

सत्य यह है की अश्लीलता को किसी भी दृष्टिकोण से सही नहीं ठहराया जा सकता। ये कम उम्र के बच्चों को यौन अपराधो की तरफ ले जाने वाली एक नशे की दुकान है। मष्तिष्क विज्ञान के अनुसार 4 तरह के नशो में एक नशा अश्लीलता भी है। गली-गली और हर मोहल्ले में जिस तरह शराब की दुकान खोल देने पर बच्चों पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है उसी तरह अश्लीलता समाज में यौन अपराधो को जन्म देती है।

जितने श्रिंगार की वस्तुयें हैं, वे स्त्रियों के लिए हैं। पुरुष को श्रिंगार की जरुरत नहीं होती। स्त्रियों का सबसे बड़ा आभूषण उनका वस्त्र है। स्त्री कितनी भी खूबसूरत क्यों न हो पर बिना वस्त्र, कल्पना करें, केवल काम वासना ही सही ठहरा सकती है। भोजन अपनी रुचि और दूसरे के रुचि के श्रिंगार का उल्लेख शास्त्रों में है।

समाज को स्वस्थ एवं चरित्रवान बनाने का दायित्व स्त्री-पुरुष, दोनो, का है, नग्नता, अर्ध नग्नता की समस्या महिला समुदाय, खासकर वरिष्ठ माताओं/दादियोंको, को गंभीरता से लेना चाहिए और अपने स्तर से देखना चाहिए कि बच्चियों/लड़कियों/युवतियों के लिए कौन सा पहनावा शालीन और दूसरों के लिए रुचिकर होगा। इसलिए पूरे समाज का संस्कारित होना अति आवश्यक है।

….. नसीब सैनी

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मोदी सरकार पिता के साए जैसी : ‘विजय भवभारत’

भवभारत’ विदेश से लाए युवक ने कहा है कि ऐसी व्यवस्था तो उसने जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों में भी नहीं देखी है। शख्स बता रहा है कि सरकार ने करीब 70 किलोमीटर दूर सभी पैसेंजर को कोरोन्टाइन किया है

विदेश से लाए युवक ने कहा है कि ऐसी व्यवस्था तो उसने जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों में भी नहीं देखी है। शख्स बता रहा है कि सरकार ने करीब 70 किलोमीटर दूर सभी पैसेंजर को कोरोन्टाइन किया है । बिल्डिंग को लगातार सैनेटाइज किया जा रहाहै। उन्हें 24 घंटे की देख रेख में रखा है, जहॉं बेहतरीन सुविधाएँ हैं। भवभारत’ विदेश से लाए युवक ने कहा है कि ऐसी व्यवस्था तो उसने जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों में भी नहीं देखी है। शख्स बता रहा है कि सरकार ने करीब 70 किलोमीटर दूर सभी पैसेंजर को कोरोन्टाइन किया है। बिल्डिंग को लगातार सैनेटाइज किया जा रहा है। उन्हें 24 घंटे की देख रेख में रखा है , जहॉं बेहतरीन सुविधाएँ हैं ।

विजय भव भारत का फेसबुक पेज, 24,000 से अधिक फौलोवेर्स.

जहाँ एक और पूरी दुनिया कोरोना (महामारी) से लडर ही है, हर देश इसकी रोकथाम में लगा हुआ है अपने नागरिकों के बचाव में हर कोशिश कर रहा है, वहीं भारत की कोशिशों की विश्वपटल सरहाना हो रही है। कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी भले इस वैश्विक महामारी को मोदी सरकार पर हमले के मौके की तरह तलाश कर रहे हैं, लेकिन सोशल मीडिया में सरकार की तारीफ करते हुए कुछ लोगों ने जो आपबीती शेयर की है जो बेहद मार्मिक है। हालफिलाहल इटली से लाई गई एक युवती के पिता ने अपनी भावना साझा कि, वो सालों से सरकार की आलोचना कर रहे थे। लेकिन, अब उन्हें एहसास हो रहा है कि मोदी सरकार पिता के साए (fatherly figure) जैसी है। विदेश से लाए गए एक युवक ने कहा है कि ऐसी व्यवस्था तो उसने जर्मनी जैसे यूरोपीय मुल्कों में भी नहीं देखी है।टाइम्स ऑफ इंडिया के पत्रकार रोहन दुआ ने इटली से लौटी युवती के पिता का पत्र शेयर किया है। इस पत्र में उन्होंने इंडियन एंबेसी, भारत सरकार और विशेषत: नरेंद्र मोदी को धन्यवाद दिया है। पिता के मुताबिक उनकी बेटी मास्टर की पढ़ाई करने इटली के मिलान गई थी। वहॉं हालात बिगड़ने पर उसे वापस लौटने को कहा। जब वह लौटने लगी तो उससे भारत वापस जाने का सर्टिफिकेट माँगा गया। न्होंने खुद इंडियन एंबेसी को संपर्क करने की कोशिश की। मगर मिलान में एंबेसी का कार्यालय बंद होने के कारण ऐसा नहीं हो पाया। उन्होंने इंडियन एंबेसी के अन्य लोगों को मेल के जरिए संपर्क किया और रात के 10:30 बजे उनकी बेटी ने फोन पर बताया कि उसकी बात दूतावास में हो गई है और वह अगली फ्लाइट से भारत लौट रही है।

पिता के मुताबिक, वे सालों से भारतीय सरकार को कोस रहे थे। लेकिन मोदी सरकार में पिता का चेहरा है। उन्होंने बताया कि उनकी बेटी 15 मार्च को भारत आई और आईटीबीपी अस्पताल में उसकी स्वास्थ्य संबंधी, खान-पान संबंधी सभी जरूरतों का ख्याल रखा गया। गौरतलब है कि इटली उन देशों में शामिल है जो कोरोना संक्रमण से सर्वाधिक प्रभावित हैं।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार कोरोना वायरस के संक्रमण से निबटने के लिए सरकार ने 400 बेड का कोरोन्टाइन वार्ड तैयार करवाया है। यहाँ विदेश से लौटने वालों को सीधे दिल्ली एयरपोर्ट से लेकर जाया जाएगा। यहाँ इन सभी लोगों की 14 तक की निगरानी होगी और अगर इनमें कोरोना के लक्षण मिलते हैं तो इन्हें आइसोलेट कर छोड़ा जाएगा। ये कोरोन्टाइन वार्ड नोयडा के सेक्टर 39 में स्थित जिला अस्पताल की नई बिल्डिंग में बना है। यहाँ पर्याप्त संख्या में पैरामेडिकल स्टॉफ तैनात हैं।

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इन टीमों के जरिये समझिये समाज की सच्चाई को: ‘विजय भवभारत’

समाज की सच्चाई को दिखाने का बीड़ा उठाने वालों में से एक नाम ‘विजय भव भारत’ का भी है

21वीं सदी के दो दशक बीतते तक मीडिया को किस तरह से टुकड़े टुकड़े गैंग ने बर्बाद कर दिया और मीडिया ने किस तरह से समाज को बर्बाद किया, यह हम सभी जानते हैं और टुकड़े टुकड़े गैंग व् मीडिया में बैठे उनके नेटवर्क को भी हम समझ चुके हैं. उस नेटवर्क को तोड़ने और मीडिया में जमे इस कचरे की सफाई का जिम्मा जिनसोशल मीडिया के पोर्टलों ने ली है, उनकी श्रृंखला में एक और नाम की चर्चा इस लेख में हम करेंगे. इस बार चर्चा है फेसबुक कैलेंडर पेज –‘विजय भव भारत’ की

विजय भव भारत का फेसबुक पेज, 24,000 से अधिक फौलोवेर्स.

यूँ तो साहित्य समाज का दर्पण कहा जाता था और बाद में मीडिया ने इसकी जगह ले ली, मगर समाज की सच्चाई को समाज का यह दर्पण दिखा नहीं पाया और ख़बरों को व् समाज की सच्चाई को तोड़ मरोड़ कर पेश करने का आरोप मीडिया पर लगने लगा. ऐसे में समाज की सच्चाई को दिखाने का बीड़ा उठाने वालों में से एक नाम ‘विजय भव भारत’ का भी है.

विजय भव भारत

‘विजय भव भारत’ पेज का संचालन फेसबुक पर होता है, जहाँइसे फॉलो करने वाले 24,000 से भी अधिक लोग हैं. यह पेज जाना जाता है समाज में चलने वाले सकारात्मक कामों के प्रचार प्रसार के लिए, जो आम मीडिया कीनज़रों से दूर हैं. इसके साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों पर भी यह पेज नज़र रखता है, और उनसे जुडी तकरीबन हर जानकारी अपने दर्शकों तक पहुँचाता है. विजय भव भारत पेज का एक और काम 365दिनों के विशेष घटनाओं को अपने पेज से जनता तक पहुँचाना भी है. इसका एक नाम ‘कैलेंडर विशेष’ भी है. इनके अतिरिक्त समसामयिक घटनाओं पर पोस्ट व् विडियो डालना भी इस पेज का काम है.

सकारात्मक कामों का प्रचार प्रसार:

विजय भव भारत जिस काम में लगा है, शायद वह काम मीडिया का कोई भी तंत्र नहीं कर पायेगा क्योंकि इस काम में मीडिया को मसाला नहीं मिलेगा बल्कि मेहनत करनी पड़ेगी. मीडिया का एक तंत्र जहाँ केवल टीआरपी बढाने और ख़बर बेचने में लगा है, वहीँ सोशल मीडिया पर विजय भव भारत- दुनिया व् भारत की कुछ बेहतरीन सकारात्मक ख़बरें खोज कर ला रहा है और अपने पेज के माध्यम से साझा कर रहा है. सोशल मीडिया से नकारात्मकता हटाने का यह कदम सराहनीय है. समाज की यह सच्चाई जो छिपी हुई है, उसे खोज निकलने का यह काम विजय भव भारत कर रहा है.

कोरोना से बचाव के लिए दुनिया ने अपनाई भारतीय संस्कृति

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों पर नज़र:                            दुनिया का सबसे बड़ा गैर सरकारी संगठन है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और समाज निर्माण के काम में इसके योगदान को नकारना मुर्खता होगी. महात्मा गाँधी जी से लेकर अन्य कई महापुरुष संघ के बारे में सकारात्मक विचार रख चुके हैं, ऐसे में इस संगठन के कामकाज पर भी नज़र रखे हुए है. इससे पहले कि मीडिया संघ के कामकाज को तोड़ मरोड़ का या अपने अनुरूप पेश करे, विजय भव भारत संघ के विशिष्ट स्त्रोतों से संघसे जुडी प्रमाणिक ख़बरें लेकर आता है और समाज से उसका क्या लेना देना है, यह भी स्पष्ट करता है.

विश्व के सबसे बड़े गैर सरकारी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों पर नज़र.

कैलेंडरविशेष दिन:

विजय भव भारत जिन महत्वपूर्ण सकारात्मक कामों में लगा हुआ है, उनमे से एक कैलेंडर विशेष दिन भी है. साल में 365 दिन होते हैं, और तकरीबन हर दिन महत्वपूर्ण होता है. उन सभी दिनों की विशेषता और महत्त्व बताने का काम भी विजय भव भारत करता है. चाहे किसी महापुरुष का जन्मदिन या पुण्यतिथि हो या कोई स्मरणीय घटना की बात हो, उनके महत्त्व को समझाने का काम भी विजय भव भारत करता है.

16 सितम्बर 1947, गाँधीजी द्वारा छूआछूत की समाप्ति पर राष्ट्रीयस्वयंसेवक संघ के काम पर चर्चा.

समसामयिक घटनाओं पर नज़र:

जब समाज में सकारात्मकता भरने का काम और समाज से नकारात्मकता हटाने का काम विजय भव भारत कर रहा है तो यह तो असंभव है कि ऐसे में समकालीन घटनाओं को न जोड़ा जाये. वर्तमान में घटने वाली हर घटना पर समाज की प्रतिक्रिया, सही ख़बर, तथ्य परक, और प्रमाणिक ख़बरें विडियो और पोस्टर के माध्यम से अपने फौलोवर्स तक विजय भव भारत पहुँचाता है.

राम मंदिर पर शिया वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिज़वी का स्पष्ट बयान. 10 लाख से ज्यादा लोगों द्वारा देखा गया, 50 हज़ार से ज्यादा लोगों द्वारा साझा किया गया.

अपने इस प्रयास के माध्यम से विजय भव भारत ने सोशल मीडिया पर एक ऐसा विमर्श खडा किया है जो सकारात्मक है, प्रमाणिक है और नकारात्मकता को तोड़ने वाला है. जिन ख़बरों में मीडिया की दिलचस्पी नहीं होती मगर समाज के लिए आवश्यक है – उन्हें खोज कर लाने का काम यह पेज कर रहा है.

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दर्पण के ज़रिए समझिये समाज की सच्चाई

टुकड़े टुकड़े मीडिया की सफाई करने का यानि सोशल मीडिया पर फ़ैल रही नकारात्मकता, नफरत और झूठे विमर्श को ख़त्म करने का बीड़ा उठाया है

भारत जैसे बड़े देश में व् दुनिया भर में मीडिया को लोकतंत्र का चौथा अथवा महत्वपूर्ण स्तम्भ बताया जाता है. मीडिया मतलब हर वह माध्यम है जिससे जनता तक जानकारियाँ, विचार व् नीतियाँ पहुँच सके. इस मीडिया के तंत्र में समाचार पत्र, पुस्तक, पत्रिकाएं, टेलीवीजन, रेडियो, इन्टरनेट इत्यादि हैं. टीवी समाचार चैनल करीब 90 के दशक में भारत में आना शुरू हुए, उससे करीब 150 वर्ष पूर्व ही समाचार पत्र, पत्रिकाएं प्रचलित हो चुकी थीं और 90 के दशक तक समाज का दर्पण समाचार पत्र बन चुके थे. ‘राष्ट्र की आवाज़: समाचार पत्र’- ऐसे वाक्य प्रचलित हो चुके थे और जो समाचार पत्र कहे वही जन जन की आवाज़ है; ऐसा माना जाने लगा था. देश में टीवी समाचार चैनल और भी तेज़ी से स्थापित हुए और समाचार पत्र के पत्रकार व टेलीविजन चैनल के पत्रकारों ने मिलकर मीडिया की प्रमाणिकता को लगभग समाप्त कर दिया और अपने निजी स्वार्थ के चक्कर में देश का बंटाधार करने लगे और देश तोड़ने में लग गए. ऐसे में समय बीता और 21वीं सदी में सोशल मीडिया का आगमन हुआ. इन्टरनेट के काल में अब दुनिया समाचार इन्टरनेट से ही प्राप्त करती है और जनता आज स्वयं रिपोर्टर है. ऐसे अनेक स्टार्टअप लोगों ने खुद शुरू किये और जनता तक बात पहुँचाई; हालाँकि प्रमाणिक यह माध्यम भी बहुत ज्यादा नहीं है, मगर मीडिया की प्रमाणिकता जिस कारण समाप्त हुई उसका कारण बेईमानी और पैसों का शक्ति का लोभ है, जो आम जनता में नहीं होती, इसलिए यह मनना कठिन है कि लोग अपनी ख़बर बेचेंगे, बदलेंगे या उस ख़बर की नीयत बदल देंगे, जो काम मीडिया करती है. 

मीडिया में फैले इस कुकर्म से लड़ने का काम सोशल मीडिया से शुरू हुआ, और एक एक पत्रकार, एक एक प्रभावशाली व्यक्ति की पोल खुलनी शुरू हो गयी. मगर उन्हें बचाने के लिए सोशल मीडिया पर भी उन्मादी लोग आ गए और इससे पहले कि सोशल मीडिया पर भी ऐसा कचरा फैले, कुछ स्वायत्त मीडिया पोर्टल ने इन देश तोड़ने वाली गैंग के खिलाफ सफाई का बीड़ा उठाया है. उनमे से एक नाम है- एक दर्पण.

एक दर्पण एक मीडिया पोर्टल है, जो फेसबुक, इन्स्ताग्राम, ट्विटर व् हेलो एप्प पर उपलब्ध है. इस पोर्टल ने टुकड़े टुकड़े मीडिया की सफाई करने का यानि सोशल मीडिया पर फ़ैल रही नकारात्मकता, नफरत और झूठे विमर्श को ख़त्म करने का बीड़ा उठाया है, और उसके लिए तीन मुख्य कामों पर ध्यान दिया है: त्वरित प्रतिक्रिया, फैक्ट फाइंडिंग, स्मरणीय दिवस. फेसबुक पेज के माध्यम से सही सूचना जन – जन तक पहुँचाता है. इस पेज को लाइक और फॉलो करने वालों की संख्या इन सभी सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट पर 90,000 से अधिक है.

सोशल मीडिया के कचरे को हटाने वाला पोर्टल – एक दर्पण

95,000 से अधिक लोगों द्वारा फॉलो किया गया.

Quick Response: समाज की प्रतिक्रिया

एक दर्पण का सबसे पहला और महत्वपूर्ण काम है समाज में घटने वाली किसी भी घटना पर समाज की प्रतिक्रिया को रखना. समाज के मत को टुकड़े टुकड़े मीडिया तोड़ मरोड़ कर पेश करता है, जिससे समाज का असली भाव व् प्रतिक्रिया पता नहीं लग पाती. ऐसे में विमर्श बदल कर चलाया जाता है, जिसका नुकसान अंततः समाज को ही झेलना पड़ता है. इस समस्या से बचने के लिए ‘एक दर्पण’ त्वरित प्रतिक्रिया यानि quick response देता है यानि जो समाज का स्वर है उसी को आगे रखता है, कोई ग़लत ख़बर या विचार समाज में अगर चल रहा है, तो उस पर समाज का सही जवाब देना एक दर्पण का काम है. कोई देरी किये बिना ही टुकड़े टुकड़े गैंग के विमर्श को समाज की ओर से जवाब देना एक दर्पण की विशेषता है.

15 लाख से ज़्यादा लोगों द्वारा देखा गया, 36 हज़ार से ज्यादा लोगों ने साझा की पोस्ट.

Fact Finder: ख़बरों में फैले सचझूठ को सामने लाना

सोशल मीडिया के आने के साथ जहाँ कई अच्छी बातें आई वहीँ कई दुष्परिणाम भी सामने आये. जैसा कि ऊपर बताया भी हमने कि प्रमाणिकता की कमी तो सोशल मीडिया पर भी है, ऐसे में कोई भी झूठी ख़बर या ऐसी ख़बर चल पड़ती है जिसमें पूरी सच्चाई न हो. ऐसे में समाज भटक जाता है, जिससे अफवाह और दंगों की स्थिति पनपती है. इस परेशानी से लड़ने का भी बीड़ा ‘एक दर्पण’ ने उठाया है. फैक्ट फाइंडिंग यानि तथ्य परखने का काम भी एक दर्पण बखूबी निभा रहा है. ऐसे कई ख़बर व् वीडियों हैं जिनकी तथ्यपरकता एक दर्पण ने की है, और इस काम को आगे भी करता रहेगा.

जामिया के लाइब्रेरी विडियो के सत्य को बताता एक दर्पण

स्मरणीय दिवस: हमारे गौरवशाली दिवस

जिस इतिहास को और जिस गौरवशाली वर्तमान को आज टुकड़े टुकड़े मीडिया दिखाने से मना करता और जिससे बचता है, वह हमारी पिछली पीढ़ी को हमारा अभिवादन होगा और आने वाली पीढ़ी के लिए सीख होगी. ऐसे कई दिवस, कई महापुरुष, कई महत्वपूर्ण घटनाओं का स्मरण एक दर्पण अपने फ़ोटो, विडियो और टाइमलाइन के माध्यम से अपने दर्शकों तक पहुँचाता है.

गौरवशाली दिवस का स्मरण कराता एक दर्पण

इन सभी बातों को ध्यान में रखकर मीडिया के टुकड़े टुकड़े विमर्श को जवाब देने का काम और समाज के विचारों को स्थापित करने का काम एक दर्पण कर रहा है

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