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लेख

वे पन्द्रह दिन भाग 07/15

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 07 अगस्त

 

देश भर के अनेक समाचारपत्रों में कल गांधीजी द्वारा भारत के राष्ट्रध्वज के बारे में लाहौर में दिए गए वक्तव्य को अच्छी खासी प्रसिद्धि मिली है. मुम्बई के ‘टाईम्स’ में इस बारे में विशेष समाचार है, जबकि दिल्ली के ‘हिन्दुस्तान’ में भी इसे पहले पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया है. कलकत्ता के ‘स्टेट्समैन’ अखबार में भी यह खबर है, साथ ही मद्रास के ‘द हिन्दू’ ने भी इस प्रकाशित किया है.

“भारत के राष्ट्रध्वज में यदि चरखा नहीं होगा, तो मैं उस ध्वज को प्रणाम नहीं करूंगा”, ऐसा क्षोभ प्रकट करने जैसा वक्तव्य गांधीजी के व्यक्तित्त्व एवं छवि से मेल नहीं खाता था. अभी भारत के अनेक समाचारपत्रों में यह खबर प्रकाशित नहीं हो पाई, क्योंकि उन तक यह खबर पहुंची ही नहीं. लेकिन पंजाब के पंजाबी, हिन्दी एवं उर्दू अखबारों ने इस वक्तव्य को भरपूर उछाला है. समूचे देश में सुबह-सुबह लोग गांधीजी के इसी बयान पर चर्चाएं कर रहे हैं.

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लाहौर से प्रकाशित होने वाला दैनिक ‘मिलाप’, सुबह – सुबह लोगों के हाथों में हैं. वहां के हिंदुओं का यह प्रमुख समाचारपत्र हैं. इससे पहले हिन्दू महासभा का मुखपत्र ‘भारत माता’ अधिकांश हिंदुओं के घर में आता था. परन्तु कुछ माह पहले उनके कैलीग्राफी कलाकार ने गांधीजी के सम्बन्ध में कुछ गलत सूचना, बेहद अपमानजनक शब्दों में प्रकाशित कर दी थी. उसके बाद वह दैनिक अखबार बन्द ही हो गया. परन्तु मिलाप, वन्देमातरम, पारस, प्रताप जैसे हिन्दी में प्रकाशित होने वाले अनेक दैनिक समाचार पत्रों ने सिंध प्रांत के हैदराबाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विशाल आमसभा का खासा वर्णन प्रकाशित किया है. सरसंघचालक गुरूजी के भाषण को संक्षेप में प्रकाशित भी किया हैं. डॉन नामक अंग्रेजी दैनिक अखबार ने भी गुरूजी का भाषण प्रकाशित किया है.

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रावलपिंडी के एक घर में आज, यानी गुरूवार, सुबह ‘पाकिस्तानी हिन्दू महासभा’ के नेताओं की एक संक्षिप्त बैठक संपन्न हो रही हैं.

विभाजन तो अब निश्चित ही है और पिण्डी सहित अधिकांश पंजाब और पूरा का पूरा सिंध प्रांत पाकिस्तान में जाने वाला है, यह स्पष्ट हो चुका हैं. पाकिस्तान के मुस्लिम नेशनल गार्ड द्वारा हिंदुओं एवं उनकी संपत्ति पर लगातार हमले बढ़ते ही जा रहे हैं. ऐसी परिस्थिति में पाकिस्तान में बचे रह जाने वाले हिंदुओं के लिए कुछ न कुछ करना आवश्यक हो चला हैं. इसीलिए ‘पाकिस्तान हिन्दू महासभा’ के नेताओं ने अपना एक वक्तव्य सभी अखबारों में प्रकाशन हेतु जारी किया हैं. इस वक्तव्य में उन्होंने पाकिस्तान में रहने वाले हिंदुओं से आग्रह किया हैं कि ‘उन्हें मुस्लिम लीग के ध्वज का आदर एवं सम्मान करना चाहिए’. इसी के साथ पाकिस्तान हिन्दू महासभा ने, पश्चिम पंजाब के मुस्लिम लीग के असेंब्ली पार्टी का नेता चुने जाने के अवसर पर इफ्तिखार हुसैन खान ‘मेमदोन’ को बधाई दी हैं. इसी प्रकार ईस्ट बंगाल मुस्लिम लीग असेम्बली पार्टी का नेता चुने जाने पर ख्वाज़ा निजामुद्दीन का भी सार्वजनिक अभिनन्दन किया.

पाकिस्तान तो अब बनकर रहेगा, बल्कि बन ही चुका है… यह बात वहां के हिंदुओं को अच्छी तरह समझ में आ चुकी हैं….

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हैदराबाद…. सिंध

रात को हल्की सी बारिश हुई थी, इस कारण वातावरण में गर्मी थोड़ी कम हो गई है. गुरूजी तड़के ही जाग चुके हैं. जिस प्रभात शाखा में गुरूजी को ले जाया गया है, वहां पर स्वयंसेवकों की भरपूर उपस्थिति है. अच्छा बड़ा सा मैदान है. उसमें छह गण खेल रहे हैं. आज साक्षात गुरूजी अपनी शाखा में पधारे हैं, इसे देखते हुए स्वयंसेवकों के चेहरों पर प्रसन्नता छलक रही है. लेकिन साथ ही इस बात की मायूसी भी दिखाई दे रही है कि जल्दी ही पूर्वजों की यह पवित्र भूमि हमारे लिए पराई होने जा रही है. इसे छोड़कर सभी को अब हिन्दुस्थान के किसी अज्ञात प्रदेश में निवास करने जाना है.

शाखा पूर्ण होने के पश्चात एक संक्षिप्त सी अनौपचारिक बैठक रखी गई हैं. इसमें सभी स्वयंसेवकों के लिए अल्पाहार की व्यवस्था हैं. इस तनावपूर्ण वातावरण को गुरूजी, कुछ हलका-फुलका बनाने का प्रयास कर रहे हैं. स्वयंसेवकों में चैतन्य निर्माण करने का उनका प्रयास हैं.

हैदराबाद एवं सिंध प्रांत के आसपास वाले इलाकों से हिंदुओं को सुरक्षित भारत कैसे ले जाया जाए, इस बाबत योजना तैयार हो रही है. दुर्भाग्य से इस समूची कवायद में भारत सरकार की रत्ती भर भी मदद नहीं मिल रही हैं. इन विस्थापित होने जा रहे हिंदुओं को भारत में कहां रखना है, इनकी बस्तियां कहां बसानी हैं इस सम्बन्ध में भारत की वर्तमान और आगामी सरकार की ओर से कोई दिशानिर्देश नहीं मिल रहे हैं. क्योंकि मूलतः जनसंख्या की अदलाबदली की अवधारणा ही काँग्रेस को नामंजूर हैं.

गांधीजी तो पूर्वी पंजाब और सिंध प्रांत के हिंदुओं को वहीं बसे रहने की सलाह दे रहे हैं. वहां रहने वाले हिंदुओं को गांधीजी की सलाह यही हैं कि मुस्लिम गुण्डों द्वारा आक्रमण किए जाने की स्थिति में उन्हें निर्भयता के साथ बलिदान हो जाना चाहिए…! अब काँग्रेस और भारत सरकार द्वारा पीठ फेरने परिस्थिति में हिंदुओं की रक्षा करना और उन्हें सुरक्षित रूप से भारत लेकर आना बेहद धैर्य, साहस और खतरे का काम हैं. लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने यह चुनौती स्वीकार की है.

अल्पाहार होते ही लगभग सुबह नौ बजे के आसपास गुरूजी वापस कराची के लिए निकलने वाले हैं. गुरूजी को विदाई देते समय हैदराबाद और आसपास के गांवों से आए हुए स्वयंसेवकों की आंखों में पानी है. उनका अन्तःकरण भारी हो चुका है. किसी को नहीं मालूम कि अब दोबारा गुरूजी की भेंट कब होगी. गुरूजी भी इस बात को अच्छी तरह जान रहे हैं कि सिंध प्रांत का यह उनका अंतिम दौरा है. ऐसा लग रहा है मानो समय थम गया हो. पूरा वातावरण भारी हो गया है. लेकिन वापसी भी आवश्यक है. गुरूजी के सामने दूसरे और भी कई काम पड़े हैं. आबाजी थत्ते, राजपाल जी इत्यादि के साथ गुरूजी का यह काफिला कराची की दिशा में धीरे-धीरे निकल पड़ता हैं.

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मास्को.

लगभग ठीक इसी समय, अर्थात सुदूर रूस के मॉस्को में सुबह के छः बज रहे थे, तब… तत्कालीन सोवियत संघ के लिए नियुक्त की गईं स्वतन्त्र भारत की पहली राजदूत श्रीमती विजयलक्ष्मी पंडित का विमान मॉस्को के अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरा. अगस्त का महीना मॉस्को निवासियों के लिए भले ही गर्मी का मौसम रहा हो, लेकिन विजयलक्ष्मी पंडित को वातावरण में ठण्डक महसूस हो रही थी. हवाईअड्डे पर उनके स्वागत के लिए स्वतन्त्र भारत का होने वाला, अशोक चक्र से सज्जित राष्ट्रध्वज फहराया गया. संभवतः भारत से बाहर अधिकारिक रूप से भारत का राष्ट्रध्वज फहराने की यह पहली ही घटना हैं. यह विचार दिमाग में आते ही विजयलक्ष्मी पंडित हल्के से मुस्कुराईं.

सैंतालीस वर्षीया विजयलक्ष्मी, भले ही रिश्ते में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की बहन हों, लेकिन यही उनकी एकमात्र पहचान नहीं थी. उन्होंने स्वयं भी अनेक बार स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया और कारावास की सजा भुगती. वे स्वयं भी कुशाग्र बुद्धि की मालिक हैं. चूंकि विजयलक्ष्मी, जवाहरलाल नेहरू से लगभग ग्यारह वर्ष छोटी थीं, इसलिए उन्हें नेहरू का सान्निध्य अधिक नहीं मिला. जब उनकी आयु इक्कीस वर्ष थी, उसी समय उन्होंने अपनी मर्जी से काठियावाड़ रियासत के जानेमाने वकील, रंजीत पंडित के साथ विवाह किया था.

इस लिए स्वतंत्र भारत की तरफ से रूस के राजदूत पद पर उनकी नियुक्ति करते समय, केवल ‘जवाहरलाल नेहरू की बहन’ यही एकमात्र योग्यता नहीं थी, अपितु उनका स्वयं का कर्तृत्त्व भी था. रूसी अधिकारियों ने इस भारतीय राजदूत का, अर्थात जवाहरलाल नेहरू की बहन का, गर्मजोशी एवं आत्मीयता से स्वागत किया. रूस के उनके कार्यकाल का आरम्भ तो बहुत ही सुन्दर हुआ…

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दोपहर एक बजे के आसपास, दिल्ली से कायदे-आज़म जिन्ना को लेकर वाइसरॉय साहब का विशेष डकोटा विमान कराची के मौरिपुर हवाई अड्डे पर उतरा. विमान से जिन्ना, उनकी बहन फातिमा और उनके तीन सहयोगी उतरे. पाकिस्तान के निर्माता के रूप में, ‘प्रस्तावित पाकिस्तान’ की इस पहली यात्रा के अवसर पर मुस्लिम लीग के कार्यकर्ताओं में कोई ख़ास उत्सुकता नहीं थी. इसीलिए जिन्ना का स्वागत करने के लिए बहुत ही थोड़े से कार्यकर्ता हवाई अड्डे पर आए थे. इन कार्यकर्ताओं ने पाकिस्तान और जिन्ना जिंदाबाद जैसे कुछ नारे जरूर लगाए, परन्तु उनकी आवाज़ में जोश लगभग नहीं के बराबर था.

कायदे-आज़म जिन्ना के लिए, आजीवन उनके सपनों के देश, अर्थात पाकिस्तान में पहली बार आना, बड़ा ही निरुत्साहित करने वाला रहा.

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मुंबई….

आकाश में बादल छाए हुए हैं. बारिश के कारण वातावरण प्रसन्न हैं. बोरीबंदर स्थित मुम्बई महानगरपालिका भवन के सामने एक छोटा सा समारोह आयोजित किया गया हैं. भवन के सामने ‘बेस्ट’ (BEST) की दो बसें खड़ी हैं और एक छोटा सा पण्डाल लगाया गया हैं.

‘बॉम्बे इलेक्ट्रिक सप्लाय एंड ट्रांसपोर्ट’ के नाम से, सन १८७४ से मुम्बई निवासियों की सेवा में कार्यरत कम्पनी अब भारत की स्वतंत्रता से सिर्फ एक सप्ताह पहले, मुम्बई महानगरपालिका के अधीन होने जा रही हैं. यह समारोह इसी सन्दर्भ में हैं. ‘बेस्ट’ के पास कुल २७५ बसें हैं और अब ये सभी बसें ७ अगस्त १९४७ से मुम्बई महानगरपालिका के स्वामित्व में हस्तांतरित हो रही हैं. मुम्बई के इतिहास में एक नया अध्याय शुरू होने जा रहा हैं….

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वारंगल….

काकतीय राजवंश की राजधानी. एक हजार स्तंभों वाले मंदिर के लिए प्रसिद्ध स्थान और निज़ामशाही रियासत का एक बड़ा शहर. सुबह के ग्यारह बजे हैं. अगस्त महीने में भी सूर्य आग उगल रहा है. दूर-दूर तक बादलों के कोई चिन्ह नहीं हैं. हवा भी नहीं चल रही. पेड़-पौधों के पत्ते निस्तब्ध और निष्प्राण जैसे स्थिर हैं. वारंगल शहर के मुख्य चौराहे पर लगभग सन्नाटा ही है. ऐसे माहौल में, अचानक इस चौराहे पर मिलने वाले चारों मार्गों से कांग्रेस के झंडे हाथों में लेकर नारे लगाते हुए लगभग सौ – सवासौ कार्यकर्ता चौराहे पर इकठ्ठे हुए. “निजामशाही को भारतीय संघ राज्य में विलीन करो”… ऐसे नारे जोरशोर के साथ लगाए जाने लगे. कांग्रेस कार्यकर्ताओं की इस भीड़ का नेतृत्व कर रहे थे, वारंगल जिला कांग्रेस समिति के अध्यक्ष कोलिपाका किशनराव गारू.

हैदराबाद राज्य कांग्रेस कमेटी के आदेशानुसार इन कार्यकर्ताओं ने भारत में विलीन होने के लिए निज़ाम के खिलाफ सत्याग्रह शुरू किया है. हैदराबाद राज्य कांग्रेस के अध्यक्ष स्वामी रामतीर्थ ने जनता से अपील की है कि वे सत्याग्रह में शामिल हों. वे स्वयं भी काचिगुड़ा इलाके में सैकड़ों कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ नारेबाजी और प्रदर्शन में शामिल हैं.

समूचे भारत में स्वतंत्रता की आहट सुनाई दे रही है. और इधर निज़ाम की रियासत का यह विशाल भूभाग अभी भी गुलामी के अंधेरे में ही है. रज़ाकारों के अमानुषिक अत्याचार को सहन कर रहा है…!

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कलकत्ता की ‘आनंद बाज़ार पत्रिका’, ‘दैनिक बसुमती’, ‘स्टेट्समैन’ जैसे सभी दैनिक समाचारपत्रों के पहले पन्ने पर आज का प्रमुख समाचार है कि चक्रवर्ती राजगोपालाचारी अर्थात ‘राजाजी’ को बंगाल का गवर्नर नियुक्त किया गया है. राजाजी यह विभाजित बंगाल के, अर्थात ‘पश्चिम बंगाल’ के पहले राज्यपाल बनने जा रहे हैं. राजाजी काँग्रेस पार्टी के विराट व्यक्तित्व हैं. पूरे मद्रास प्रांत को अकेले दम पर चलाने वाले. लेकिन हाल ही में संपन्न हुए प्रांतीय चुनावों में उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा. इसके अलावा राजाजी की पहचान यह ‘विभाजन के विचार को अति-सक्रियता से आगे बढ़ाने वाले’ की थी. इस कारण बंगाल के लोगों ने इस निर्णय को पसंद नहीं किया.

अपनी लायब्रेरी में बैठे यह खबर पढ़ते हुए शरदचंद्र बोस का दिमाग घूम गया. उन्होंने तत्काल एक वक्तव्य तैयार किया और सभी दैनिक समाचारपत्रों में प्रकाशन हेतु भेज दिया. शरद बाबू ने लिखा कि, ‘राजगोपालाचारी की नियुक्ति वास्तव में बंगाल का अपमान है. जिस व्यक्ति को मद्रास ने नकार दिया, चुनावों में परास्त कर दिया, उसी को हमारे सिर पर लाकर बैठाना कौन सी बुद्धिमत्ता है..?’

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इधर दिल्ली में भारतीय सेना का मुख्यालय.

एक अनुशासित वातावरण. कलफ लगे कड़क और चकाचक गणवेश में सैनिकों की चहलपहल जारी है. थोड़ा अंदर जाने पर वातावरण में परिवर्तन स्पष्ट दीखता है. अधिक गंभीर… अधिक अनुशासित… अधिक सम्मानयुक्त. यहां पर भारत के कमाण्डर-इन-चीफ का कार्यालय है. दरवाजे के पास ही पीतल की बड़ी सी प्लेट पर रौबदार अक्षरों में नाम लिखा हुआ है – Sir Claude John Auchinleck. इस दफ्तर के बड़े से अहाते में उतनी ही बड़ी महागनी टेबल के पीछे शानदार से कुर्सी पर विराजित हैं, सर ऑचिनलेक. उनके टेबल पर रखा हुआ छोटा सा यूनियन जैक सहसा हमारा ध्यान आकर्षित कर ही लेता है.

सर ऑचिनलेक के सामने एक बहुत ही महत्वपूर्ण पत्र रखा हुआ है. प्रस्तावित स्वतंत्रता दिवस के दिन राजनैतिक स्वरूप के सभी भारतीय कैदियों को मुक्त कर देने बाबत यह नोटशीट है. इस पत्र में ‘सभी भारतीय’, इस शब्द पर सर ऑचिनलेक की निगाह ठहर जाती है. इसका अर्थ यह कि, सुभाषचंद्र बोस की ‘ईन्डियन नेशनल आर्मी’ की ओर से लड़े हुए सैनिक भी…? हां, नोटशीट के अनुसार तो इसका यही अर्थ निकलता है. ऑचिनलेक के दिमाग की नस फडकने लगती है. ‘सुभाषचंद्र बोस के सहयोगियों को छोड़ दें..? अंग्रेजों के सामने एक वास्तविक चुनौती पेश करने वाले ‘आज़ाद हिन्द सेनानियों’ को रिहा कर दें?? नहीं… कदापि नहीं. कम से कम १५ अगस्त तक तो ब्रिटिश सत्ता है ही, तब तक तो मैं उन्हें नहीं छोड़ने वाला.’

फिर उन्होंने अपने स्टेनो को बुलाया और धीमी किन्तु कठोर आवाज में उस पत्र का जवाब लिखवाने लगे – ‘अन्य सभी राजनैतिक बंदियों को रिहा करने में भारतीय सेना को कोई आपत्ति नहीं है. परंतू सुभाषचंद्र बोस के नेतृत्व में बनी ‘इन्डियन नेशनल आर्मी’ के सैनिकों को छोड़ने पर हमारा प्रखर विरोध है’.

इस प्रकार सुभाष बाबू के तमाम सहयोगी, जिन्होंने भारत को स्वतन्त्र करने के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी थी, उस ‘आजाद हिन्द सेना’ के शूरवीर सैनिक, कम से कम १५ अगस्त तक तो नहीं छूटेंगे, यह निश्चित हो चुका था.

उधर मद्रास सरकार ने दोपहर को एक सर्कुलर जारी कर दिया, जिसके अनुसार यह घोषणा की गई कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने वाले मद्रास प्रांत के सभी लोगों को पांच-पांच एकड़ जमीन मुफ्त में दी जाएगी. १५ और १६ अगस्त को सार्वजनिक अवकाश की घोषणा भी इसी के साथ की गई.

स्वतंत्रता के सूर्य को उगने में अब केवल एक सप्ताह ही बचा हैं….

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दोपहर के चार बजे हैं. मद्रास में स्थानीय सिनेमाघरों के मैनेजरों की एक बैठक चल रही है. स्वतंत्रता के सन्दर्भ में ही यह बैठक आयोजित की गई हैं. के सी आर रेड्डी सबसे वरिष्ठ थियेटर मालिक हैं. उन्होंने बैठक में प्रस्ताव रखा कि, – ’१५ अगस्त से सभी सिनेमाघरों में अंग्रेजों का, अर्थात ब्रिटिश सरकार का, राष्ट्रगीत नहीं बजाया जाएगा. उसके स्थान पर कोई भी भारतीय राष्ट्रीय विचारों का गीत बजाया जाएगा.’ यह प्रस्ताव सर्वानुमति एवं तालियों की गडगडाहट के साथ स्वीकार कर लिया जाता है.

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उधर कराची की एक बड़ी सी हवेली में, श्रीमती सुचेता कृपलानी लगभग सौ-सवासौ सिंधी महिलाओं की एक बैठक ले रही हैं. ये सभी सिंधी स्त्रियां इतने असुरक्षित वातावरण के बावजूद इस बंगले पर एकत्रित हुई हैं. सुचेता कृपलानी के पति, आचार्य जे बी कृपलानी काँग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. काँग्रेस द्वारा विभाजन का निर्णय स्वीकार किए जाने के कारण सीमावर्ती इलाकों में जनमत बेहद क्रोधित है. अतः अपने गृह प्रांत में काँग्रेस के खिलाफ उबल रहे इस वातावरण को शांत करने के लिए दोनों पति-पत्नी के प्रयत्न जारी हैं. वे सभी सिंधी औरतें, सुचेता कृपलानी से शिकायत कर रही हैं कि वे कितनी असुरक्षित हैं. सिंधी स्त्रियों पर मुसलमानों के नृशंस अत्याचार के बारे में बता रही हैं.

लेकिन इन महिलाओं के कथनों से सुचेता कृपलानी सहमत नहीं दिखतीं. वे आवेश में आकर अपना पक्ष प्रस्तुत करती हैं कि, “मैं पंजाब और नोआखाली में सरेआम घूमती हूं, मेरी तरफ तो कोई भी मुस्लिम गुण्डा, तिरछी निगाह से देखने की भी हिम्मत नहीं करता..? क्योंकि मैं ना तो भडकीला मेकअप करती हूं और ना ही लिपस्टिक लगाती हूं. आप महिलाएं लो-नेक का ब्लाउज पहनती हैं, पारदर्शी साडियां पहनती हैं. इसीलिए मुस्लिम गुंडों का ध्यान आपकी तरफ जाता है. और मान लीजिए किसी गुण्डे ने आप पर आक्रमण कर भी दिया, तो आपको राजपूत बहनों का आदर्श अपने सामने रखना चाहिए, ‘जौहर’ करना चाहिए…!
(Indian Daily Mail – ७ अगस्त का समाचार. पहला पृष्ठ)

उस बड़ी सी हवेली में बैठी, अपने प्राणों की बाजी लगाकर किसी तरह एक-एक दिन गिनने वाली, उन घबराई हुई सिंधी महिलाओं को सुचेता कृपलानी के इस वक्तव्य पर क्या कहें, समझ नहीं आ रहा था… वे अक्षरशः अवाक रह गई हैं. ‘एक राष्ट्रीय अध्यक्ष की पत्नी ये हमसे क्या कह रही हैं? ऐसे घोर संकट के समय क्या हम औरतें भडकीला मेकअप करेंगी? लो-कट ब्लाउज़ पहनेंगी? और क्या केवल इसलिए मुसलमान गुण्डे हमारी तरफ आकृष्ट होते हैं? और मान लो यदि वे हमारे साथ बलात्कार करने का प्रयास करें, तो क्या हमें राजपूत स्त्रियों के समान जौहर कर लेना चाहिए..?’
इस समय केवल काँग्रेस के नेता ही नहीं, बल्कि उनकी पत्नियां भी जमीनी वास्तविकता और मुस्लिम मानसिकता से कोसों दूर हैं…

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दिल्ली का वही सैन्य मुख्यालय…

दूसरी मंजिल पर एक बड़ा सा अहाता. इसमें गोरखा रेजिमेंट के सैन्य मुख्यालय से सम्बन्धित छोटा सा कार्यालय. ‘गोरखा राइफल्स’ के नाम से समूचे विश्व में अपनी बहादुरी प्रदर्शित करने वाले शूरवीर सैनिकों की टुकड़ी. यहां एक बड़े से टेबल के पास इस रेजिमेंट के चार अधिकारी गहन विचार-विमर्श कर रहे हैं. चूंकि भारतीय सैनिकों का भी बंटवारा होने जा रहा हैं, इसलिए अब गोरखा रेजिमेंट को पाकिस्तान में जाना चाहिए या नहीं, यह प्रमुख मुद्दा हैं. इससे पहले अंग्रेज अधिकारियों के अनुरोध पर गोरखा रेजिमेंट की कुछ टुकडियां सिंगापुर को दे दी गई थीं. कुछ गोरखा सैनिक ब्रुनेई भी भेज दिए गए. इन सारी बातों के लिए नेपाल सरकार की भी सहमति थी. परन्तु एक भी गोरखा सैनिक पाकिस्तान जाने को तैयार नहीं हैं.
अंततः गोरखा रेजिमेंट के उन चारों वरिष्ठ अधिकारियों ने एकमत होकर एक नोटशीट तैयार की और उसे कमाण्डर-इन-चीफ को सौंपा, कि गोरखा रेजिमेंट की एक भी बटालियन पाकिस्तान की सेना में शामिल होने के लिए तैयार नहीं है, हम भारत में ही रहेंगे.

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लखनऊ….

स्टेट असेम्बली में मुख्यमंत्री का कार्यालय. मजबूत देहयष्टि के मालिक और घनी-मोटी मूंछों वाले गोविन्द वल्लभ पंत, अपने जिंदादिल स्वभाव के अनुसार हमेशा की तरह अपने सहयोगियों के साथ हंसी-मजाक सहित चर्चा कर रहे हैं. कैलाशनाथ काटजू, रफ़ी अहमद किदवई और पी एल शर्मा जैसे मंत्री उनके आसपास बैठे हैं.

चर्चा का विषय है कि ब्रिटिश सत्ता द्वारा अपभ्रंश किए गए शहरों के, नदियों के नाम बदलकर उन्हें मूल हिन्दू नाम से पहचाना जाए. अंग्रेजों ने गंगा को ‘गैंजेस’ और यमुना नदी को ‘जुम्ना’ बना डाला था. पवित्र मथुरा नगरी का नाम अंग्रेजों ने ‘मुत्रा (Muttra) कर दिया था. इन सभी की पहचान इनके मूल नाम से ही होनी चाहिए. इस सन्दर्भ में मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में इस समिति ने एक आदेश निकाला एवं तत्काल प्रभाव से नदियों-गांवों-शहरों के बदले हुए मूल नामों से ही लिखा जाए ऐसा घोषित कर दिया.

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१७, यॉर्क रोड. जवाहरलाल नेहरू का वर्तमान निवास… अर्थात स्वतन्त्र भारत का वर्तमान मुख्य प्रशासनिक केन्द्र.

अब शाम के छह बज चुके हैं और नेहरू विदेश मंत्री की भूमिका में आ गए हैं. पाकिस्तान को अस्तित्त्व में आने के लिए केवल एक सप्ताह ही बाकी रह गया है. इस पाकिस्तान में भारत का भी एक राजदूत होना अति-आवश्यक है. अभी तो बहुत से ऐसे काम हैं जिन्हें भारत-पाकिस्तान को आपसी सामंजस्य से पूरे करना है. हिंदुओं-सिखों के विस्थापन एवं उनकी समस्याओं का प्रमुख प्रश्न है, उसका भी हल निकालना है, इसलिए पाकिस्तान में तो भारत का राजदूत चाहिए ही. ऐसे में नेहरू के समक्ष एक नाम उभरा, श्रीप्रकाश का.

श्रीप्रकाश प्रयाग से ही हैं. अर्थात नेहरू के इलाहाबाद से. इन्होंने अनेक बार स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया. ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन में वे दो वर्षों तक जेल में रहे. श्रीप्रकाश एक विनम्र एवं स्पष्ट वक्ता व्यक्ति हैं. कैम्ब्रिज में उच्च शिक्षा प्राप्त इस सत्तावन वर्षीय व्यक्ति की प्रशासनिक क्षमता बेहतरीन है. अर्थात नवनिर्मित पाकिस्तान में भारत के पहले हाई कमिश्नर के रूप में, श्रीप्रकाश की नियुक्ति तय हुई. ११ अगस्त को कायदेआज़म जिन्ना पाकिस्तान की संसद में अपना पहला भाषण देने वाले हैं. उससे पहले ही श्रीप्रकाश को कराची जाकर रिपोर्ट करना आवश्यक हैं.

अगले दो वर्ष तक पाकिस्तान से विस्थापित होने वाले लाखों हिंदु-सिखों का मुद्दा… पाकिस्तान का हठी, दबंग और उच्छृंखल स्वभाव… कश्मीर को हड़प करने संबंधी पाकिस्तानी चालबाजियां… ऐसे कई कठिन प्रश्नों-समस्याओं का सामना श्रीप्रकाश को करना पड़ेगा, ऐसा उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था.

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गुरुवार. ७ अगस्त…
रात गहराती जा रही है. अमृतसर से आरम्भ हुई गांधीजी की ट्रेन यात्रा जारी है. एक ही स्थान पर बैठे-बैठे गांधीजी का शरीर अकड़ गया है. उन्हें पैदल चलना बहुत पसंद हैं. ऐसे व्यक्ति को लगातार चौबीस घंटे एक ही स्थान पर बैठाए रखना वास्तव में उनके लिए सजा के समान ही हैं. परन्तु ट्रेन में भी गांधीजी का पठन-पाठन एवं चिंतन-मनन चालू ही है. इस समय ट्रेन संयुक्त प्रान्त से गुज़र रही है. जहां-जहां भी ट्रेन रुकती है, रेलवे स्टेशन पर काँग्रेस कार्यकर्ता और जनता उन्हें मिलने जरूर आती है. अधिकांश लोगों के मन में बस एक ही सवाल है – ‘बापू, ये हिन्दू-मुस्लिम दंगे कब थमेंगे?’

इधर ट्रेन में उनके प्यारे बापू बेचैन हैं. उन्होंने वाह के शरणार्थी शिविर और लाहौर शहर में जो भी देखा और सुना, वह बहुत ही भयानक हैं. लेकिन फिर भी उनका दिल नहीं मान रहा हैं कि ‘क्या मुसलमानों के हमलों के कारण अपना स्थान, अपनी जमीन, अपने मकान छोड़कर भारत भाग जाना चाहिए? फिर तो मैं जिन सिद्धांतों की बात करता हूं, वे सब झूठे ही सिद्ध हो जाएंगे…’

कल सुबह गांधीजी पटना में उतरेंगे. अंधेरे को चीरती उनकी ट्रेन आगे बढ़ी जा रही है और ट्रेन की खिड़की से गांधीजी दूर क्षितिज की ओर देख रहे हैं… एक अस्वस्थ भारत का भविष्य देखने का उनका व्यक्तिगत मनस्वी प्रयास है…!
– प्रशांत पोळ

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जेएनयू में फीस वृद्धि के नाम पर राजनीति

—यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं

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सुरेश हिन्दुस्थानी

देश के उच्च शिक्षा केन्द्र जब राजनीति के अड्डे बनने की ओर कदम बढ़ाने लगें, तब वहां की शिक्षा की दिशा-दशा क्या होगी, यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। फीस बढ़ोतरी के खिलाफ किया जाने वाला दिल्ली का छात्र आंदोलन कुछ इसी प्रकार का भाव प्रदर्शित कर रहा है, जहां केवल और केवल राजनीति ही की जा रही है। किसी भी आंदोलन की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके पीछे जनहित का कितना भाव है। दिल्ली का यह आंदोलन जनसरोकार से कोसों दूर दिखाई दे रहा है।

हालांकि इसके पीछे बहुत से अन्य कारण भी होंगे। सबसे बड़ा कारण तो यही है कि आज जेएनयू की जो छवि जनता के बीच बनी है, वह जनता को खुद ही दूर कर रही है। जिस विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारों की ध्वनि गूंजित होती है, वह कभी जन आंदोलन का हिस्सा नहीं बन सकते हैं।दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के जिन छात्रों ने कभी भारत के टुकड़े करने के नारे लगाए थे, आज वे ही छात्र फीस बढ़ोतरी के छोटे से मामले को राजनीतिक रुप देने का प्रयास करते दिखाई दे रहे हैं। इस छात्र आंदोलन का राजनीतिक स्वरुप इसलिए भी दिखाई दे रहा है, क्योंकि इसमें राष्ट्रीय मानबिन्दुओं और केन्द्र सरकार को सीधे निशाने पर लिया जा रहा है। जेएनयू वामपंथी विचारधारा का एक बड़ा केन्द्र रहा है।

वामपंथी धारा के कार्यकर्ता देश के महानायकों के बारे में क्या सोच रखते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। पिछले घटनाक्रमों को देखें तो पाएंगे कि जेएनयू में देश के विरोध में वातावरण बनाने का काम किया जाता रहा है। वहां आतंकवादी बुरहान वानी के समर्थन में कार्यक्रम किए जाते हैं। सवाल यह कि जेएनयू में शिक्षा के नाम पर आखिर क्या हो रहा है। जहां तक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में फीस बढ़ोतरी की बात है तो यह कहना तर्कसंगत ही होगा कि विगत 19 वर्ष से विश्वविद्यालय के छात्रावास के कमरों और भोजन का शुल्क नहीं बढ़ाया गया, जबकि पिछले 19 सालों में महंगाई का ग्राफ बहुत ऊपर गया है। इस सबका भार पूरी तरह से विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के कंधों पर ही आया। देश के अन्य विश्वविद्यालयों में भी शिक्षा महंगी हो रही है, जो जेएनयू के मुकाबले बहुत अधिक है। ऐसे में विश्वविद्यालय द्वारा कुछ हद तक फीस बढ़ाना न्यायोचित कदम ही है। जिसे वहां के कई छात्र भी सही मानते हैं। लेकिन यह आंदोलन इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि इसमें परदे के पीछे राजनीतिक कार्यकर्ता भूमिका निभा रहे हैं। यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं।

खैर… यह जांच का विषय हो सकता है।देश के प्रसिद्ध अधिवक्ता सांसद डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने इस छात्र आंदोलन के बारे में बहुत ही गहरी बात कही है। उनका मानना है कि जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय को कुछ समय के लिए बंद कर दिया जाए। उनके इस कथन के गहरे निहितार्थ निकल रहे हैं। स्वामी के संकेत को विस्तार से समझना हो तो एक बार जेएनयू की गतिविधियों का अध्ययन करना चाहिए। फिर वह सब सामने आ जाएगा जो वहां होता है। कहा जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जमकर राजनीति की जाती रही है। देश के जो शिक्षा केन्द्र राजनीति के केन्द्र बनते जा रहे हैं, उन पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है।

वर्तमान में जिस प्रकार से जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय का आंदोलन चल रहा है, उसे छात्र आंदोलन कहना न्याय संगत नहीं होगा। क्योंकि, यह विशुद्ध राजनीतिक आंदोलन है। फीस बढ़ोतरी का विरोध तो मात्र बहाना है। इस आंदोलन के समर्थन में देश की संसद में कांग्रेस और वामपंथी दलों की ओर से आवाज उठाई गई। इससे यही संदेश जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जो देश विरोधी नारे लगाए गए, उनके प्रति इन राजनीतिक दलों के समर्थन का ही भाव रहा होगा। इतना ही नहीं, जब भारत तेरे टुकड़े होंगे और हमें चाहिए आजादी जैसे नारे लगाए गए थे, तब भी कांग्रेस और वाम दलों ने खुलेआम समर्थन किया था। ऐसे में सवाल यह उठता है कि कहीं यही दोनों दल छात्रों को आंदोलन करने के लिए तो नहीं उकसा रहे? अगर यह सही है तो फिर केन्द्र सरकार को दोष देना सही नहीं कहा जा सकता।

जब से देश में राजनीतिक सत्ता का परिवर्तन हुआ है, तब से ही देश में उन संस्थानों की सक्रियता दिखाई देने लगी है, जो भारत के बारे में भ्रम का वातावरण बनाने में सहायक हो सकते हैं। चाहे वह शहरी नक्सलवाद को प्रायोजित करने वाले कथित बुद्धिजीवियों की संस्था हो या फिर उनके विचार को अंगीकार करने वाली ही संस्थाएं क्यों न हों। सभी केन्द्र सरकार का विरोध करने के लिए आगे आ रहे हैं। इस विश्वविद्यालय में पढ़ाई करने वाले छात्र कभी भारतीय सेना द्वारा की जाने वाली आतंकियों के विरोध में कार्यवाही पर सवाल उठाते दिखाई देते हैं तो कभी अनुच्छेद 370 को हटाने का विरोध करते हैं। चार वर्ष पूर्व जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में छात्र संघ की उपाध्यक्ष रहीं शेहला राशिद ने भारतीय सेना के विरोध में जमकर भड़ास निकाली थी, जबकि सेना की ओर से स्पष्ट कहा गया था कि ऐसा कुछ भी नहीं है। इससे समझ में आ सकता है कि इस विश्वविद्यालय में कौन-सा पाठ पढ़ाया जाता है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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देश की युवा पीढ़ी में विदेशों के प्रति रुचि बढ़ी

—गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है

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मनोज ज्वाला

एक मीडिया संस्थान के सर्वेक्षण के अनुसार हमारे देश के पढ़े-लिखे और शहरी नौजवानों में से आधे से अधिक ऐसे हैं, जो अपने देश को पसंद नहीं करते। वे विदेशों में जाकर बस जाना चाहते हैं। लगभग दो साल पहले के उक्त सर्वेक्षण के मुताबिक उनमें से 75 फीसदी युवाओं का कहना था कि वे बे-मन और मजबूरीवश भारत में रह रहे हैं। 62.08 फीसदी युवतियों और 66.01 फीसदी युवाओं का मानना था कि भारत  में उनका भविष्य सुरक्षित नहीं है। क्योंकि, यहां अच्छे दिन आने की संभावना कम है। उनमें से 50 फीसदी का मानना था कि भारत में किसी महापुरुष का अवतरण होगा, तभी हालात सुधर सकते हैं, अन्यथा नहीं।

40 फीसदी युवाओं का मानना था कि उन्हें अगर इस देश का प्रधानमंत्री बना दिया जाए, तो वे पांच साल में इस देश का कायापलट कर देंगे।अखबार का वह सर्वेक्षण आज भी बिल्कुल सही लगता है। अगर व्यापक स्तर पर सर्वेक्षण किया जाता, तो देश छोड़ने को तैयार युवाओं का प्रतिशत और अधिक दिखता। वह सर्वेक्षण तो सिर्फ शहरों तक सीमित था। अपने देश में गांवों पर भी तेजी से शहर छाते जा रहे हैं। गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है। गौर कीजिए कि देश छोड़ने को तैयार वे युवा पढ़े-लिखे हैं और शहरों में पले-बढ़े हैं। वे किस पद्धति से किस तरह के विद्यालयों में क्या पढ़े-लिखे हैं और किस रीति-रिवाज से कैसे परिवारों में किस तरह से पले-बढ़े हैं, यह ज्यादा गौरतलब है।

विद्यालय सरकारी हों या गैर सरकारी, सभी में शिक्षा की पद्धति एक है और वह है मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा पद्धति। भारतीयता विरोधी इसी शिक्षा पद्धति को सरकारी मान्यता प्राप्त है। सरकार का पूरा तंत्र इसी तरह की शिक्षा के विस्तार में लगा हुआ है। वैसे अंग्रेजी माध्यम वाले विद्यालय सबसे अच्छे माने जाते हैं और गैर-सरकारी निजी क्षेत्र के अधिकतर विद्यालय अंग्रेजी माध्यम के ही हैं। शहरों में ऐसे ही विद्यालयों की भरमार है और जिन युवाओं के बीच उक्त मीडिया संस्थान ने उपरोक्त सर्वेक्षण किया उनमें से सर्वाधिक युवा ऐसे ही तथाकथित ‘उत्कृष्ट’ विद्यालयों से पढ़े-लिखे हुए हैं। अब रही बात यह कि इन विद्यालयों में आखिर शिक्षा क्या और कैसी दी जाती है, तो यह इन युवाओं की उपरोक्त सोच से ही स्पष्ट है।

जाहिर है, उन्हें शिक्षा के नाम पर ऐसी-ऐसी डिग्रियां दी जाती हैं, जिनके कारण वे महात्वाकांक्षी, स्वार्थी बनकर असंतोष, अहंकार, खीझ, पलायन एवं हीनता-बोध से ग्रसित हो जाते हैं और कमाने-खाने भर थोड़े-बहुत हुनर हासिल कर स्वभाषा व स्वदेश के प्रति ‘नकार’ भाव से पीड़ित होकर विदेश चले जाते हैं।थॉमस विलिंग्टन मैकाले कोई शिक्षा-शास्त्री नहीं था। वह एक षड्यंत्रकारी था, जिसने भारत पर ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जड़ें जमाने की नीयत से भारतीय शिक्षा-पद्धति की जड़ें उखाड़कर मौजूदा शिक्षा-पद्धति को प्रक्षेपित किया था। जो आज भी उसी रूप में कायम है। 20 अक्टूबर 1931 को लंदन के रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ फौरन अफेयर्स के मंच से महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘अंग्रेजी शासन से पहले भारत की शिक्षा-व्यवस्था इंग्लैण्ड से भी अच्छी थी।’ उस पूरी व्यवस्था को सुनियोजित तरीके से समूल नष्ट कर देने के पश्चात ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जरूरतों के मुताबिक उसके रणनीतिकारों ने लम्बे समय तक बहस-विमर्श कर के मैकाले की योजनानुसार यह शिक्षा-पद्धति लागू की थी।

मैकाले ने ब्रिटिश पार्लियामेंट की शिक्षा समिति के समक्ष कहा था ‘हमें भारत में ऐसा शिक्षित वर्ग तैयार करना चाहिए, जो हमारे और उन करोड़ों भारतवासियों के बीच जिन पर हम शासन करते हैं, उन्हें समझाने-बुझाने का काम कर सके। जो केवल खून और रंग की दृष्टि से भारतीय हों, किन्तु रुचि, भाषा व भावों की दृष्टि से अंग्रेज हों।’ विदेशों में बस जाने को उतावले भारतीय युवाओं ने पूरी मेहनत व तबीयत से मैकाले शिक्षा-पद्धति को आत्मसात किया है, ऐसा समझा जा सकता है। यहां प्रसंगवश मैकाले के बहनोई चार्ल्स ट्रेवेलियन द्वारा ब्रिटिश पार्लियामेंट की एक समिति के समक्ष ‘भारत में भिन्न-भिन्न शिक्षा-पद्धतियों के भिन्न-भिन्न परिणाम’ शीर्षक से प्रस्तुत किये गए एक लेख का यह अंश भी उल्लेखनीय है कि ‘मैकाले शिक्षा-पद्धति का प्रभाव अंग्रेजी राज के लिए हितकर हुए बिना नहीं रह सकता। हमारे पास उपाय केवल यही है कि हम भारतवासियों को यूरोपियन ढंग की उन्नति में लगा दें। इससे हमारे लिए भारत पर अपना साम्राज्य कायम रखना बहुत आसान और असंदिग्ध हो जाएगा।’ ऐसा ही हुआ। बल्कि, मैकाले की योजना तो लक्ष्य से ज्यादा ही सफल रही।

हमारे देश के मैकालेवादी राजनेताओं ने अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासन की समाप्ति के बाद भी उनकी अंग्रेजी-मैकाले शिक्षा-पद्धति को न केवल यथावत कायम रखा, बल्कि उसे और ज्यादा अभारतीय रंग-ढंग में ढाल दिया। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष लक्षित प्राचीन भारतीय शिक्षा-पद्धति को अतीत के गर्त में डालकर शिक्षा को उत्पादन-विपणन-मुनाफा-उपभोग-केन्द्रित बना देने और उसे नैतिक सांस्कृतिक मूल्यों से विहीन कर देने तथा राष्ट्रीयता के प्रति उदासीन बना देने का ही परिणाम है कि हमारी यह युवा पीढ़ी महज निजी सुख-स्वार्थ के लिए अपने देश से विमुख हो जाना पसंद कर रही है। उसे विदेशों में ही अपना भविष्य दीख रहा है।

माना कि हमारे देश में तरह-तरह की समस्याएं हैं, किन्तु इनसे जूझने और इन्हें दूर करने की बजाय पलायन कर जाने अथवा कोरा लफ्फाजी करने कि हमें प्रधानमंत्री बना दिया जाए तो हम देश को सुंदर बना देंगे, अति महात्वाकांक्षा-युक्त मानसिक असंतुलन का ही द्योत्तक है। लेकिन आधे से अधिक ये शहरी युवा मानसिक रुप से असंतुलित नहीं हैं, बल्कि असल में वे पश्चिम के प्रति आकर्षित हैं। इसके लिए हमारे देश की चालू शिक्षा-पद्धति का पोषण करने वाले हमारे राजनेता ही जिम्मेवार हैं। यह ‘यूरोपियन ढंग की उन्नति’ के प्रति बढ़ते अनावश्यक आकर्षण का परिणाम है। इस मानसिक पलायन को रोकने के लिए जरूरी है कि हम अपने बच्चों को हमारे राष्ट्र की जड़ों से जोड़ने वाली और संतुलित समग्र मानसिक विकास करने वालीप्राचीन भारतीय पद्धति से भारतीय भाषाओं में समस्त ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा देने की सम्पूर्ण व्यवस्था कायम करें।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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भाई-बहन में प्रेम भाव बढ़ाता है भैया दूज

–बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था

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योगेश कुमार गोयल

(भैया दूज, 29 अक्टूबर पर विशेष)

भाई-बहन के दिलों में पावन संबंधों की मजबूती और प्रेमभाव स्थापित करने वाला पर्व है भैया दूज। इस दिन बहनें अपने भाईयों को तिलक लगाकर ईश्वर से उनकी दीर्घायु की कामना करती हैं। कहा जाता है कि इससे भाई यमराज के प्रकोप से बचे रहते हैं। दीपावली के दो दिन बाद अर्थात कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाए जाने वाले इस पर्व को ‘यम द्वितीया’ व ‘भ्रातृ द्वितीया’ के नाम से भी जाना जाता है। बहुत से भाई-बहन सौभाग्य तथा आयुष्य की प्राप्ति के लिए इस दिन यमुना अथवा अन्य पवित्र नदियों में साथ-साथ स्नान भी करते हैं। भैया दूज मनाने के संबंध में कई किवंदतियां प्रचलित हैं। एक कथा यमराज और उनकी बहन यमुना देवी से संबंधित है। बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था। यमुना अपने भाई यमराज से बहुत स्नेह करती थीं और अक्सर उनसे अनुरोध करती रहती थीं कि वे अपने इष्ट-मित्रों सहित उसके घर भोजन के लिए पधारें लेकिन यमराज हर बार उसके निमंत्रण को किसी न किसी बहाने से टाल जाते। कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमुना ने यमराज को एक बार फिर भोजन के लिए आमंत्रित किया।

उस समय यमराज ने विचार किया कि मैं तो अपने कर्त्तव्य से बंधा सदैव प्राणियों के प्राण ही हरता हूं। इसलिए इस चराचर जगत में कोई भी मुझे अपने घर नहीं बुलाना चाहता। लेकिन बहन यमुना तो मुझे बार-बार अपने घर आमंत्रित कर रही है। इसलिए अब तो उसका निमंत्रण स्वीकार करना ही चाहिए।यमराज को अपने घर आया देख यमुना की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने भाई का खूब आदर-सत्कार करते हुए उनके समक्ष नाना प्रकार के व्यंजन परोसे। बहन के आतिथ्य से यमराज बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे कोई वर मांगने को कहा। इस पर यमुना ने उनसे अनुरोध किया कि आप प्रतिवर्ष इसी दिन मेरे घर आकर भोजन करें और मेरी तरह जो भी बहन इस दिन अपने भाई का आदर-सत्कार करे, उसे तुम्हारा भय न रहे। यमराज ने बहन यमुना को उसका इच्छित वरदान दे दिया। ऐसी मान्यता है कि उसी दिन से ‘भैया दूज’ का पर्व मनाया जाने लगा। भैया दूज के संबंध में और भी कई कथाएं प्रचलित हैं। ऐसी ही एक कथा के अनुसार, एक ब्राह्मण की दो संतानें थी।

एक पुत्र एवं एक पुत्री। पुत्री बहुत समझदार एवं गुणवती थी। वह अपने भाई से जी-जान से प्यार करती थी। एक दिन उसका भाई उससे मिलने उसकी ससुराल पहुंचा। उस समय वह सूत कातने में व्यस्त थी। अतः उसे भाई के आने का पता ही न चल सका। भाई भी बिना कुछ बोले चुपचाप एक ओर बैठा रहा। जब थोड़ी देर बाद बहन की नजर उस पर पड़ी तो भाई को अपने घर आया देख उसे बेहद खुशी हुई। उसने भाई का भरपूर आदर-सत्कार किया। अगले दिन भाई को वापस लौटना था। अतः रास्ते के लिए वह आटे के पकवान बनाने के उद्देश्य से चक्की में आटा पीसने लगी। अनजाने में चक्की में बैठा सांप भी आटे के साथ पिस गया। उसी आटे के पकवान एक पोटली में बांधकर उसने भाई को रास्ते में खाने के लिए देकर विदा किया। भाई के घर से जाने के बाद जब उसे यह मालूम हुआ कि आटे में सांप पिस गया है तो अपने पुत्र को पालने में ही सोता छोड़कर वह अपने भाई के प्राणों की रक्षा के लिए दौड़ी। कुछ दूर जाने पर उसे एक पेड़ की छांव में अपना भाई सोता दिखाई दिया। तब तक उसने पोटली में से कुछ भी नहीं खाया था। उसने भगवान का शुक्रिया अदा किया और पोटली उठाकर दूर फेंक दी तथा भाई के साथ मायके की ओर चल दी।

रास्ते में उसने देखा कि भारी-भारी शिलाएं आकाश में उड़ रही हैं। उसने एक राहगीर से इस रहस्य के बारे में जानना चाहा तो उसने बताया कि जो बहन अपने भाई पर कभी नाराज न होती हो और उसे दिलो-जान से चाहती हो, उस भाई की शादी के समय ये शिलाएं उसकी छाती पर रखी जाएंगी। थोड़ी दूर चलने पर उसे नाग-नागिन दिखाई दिए। नाग ने बताया कि ये शिलाएं जिस व्यक्ति की छाती पर रखी जाएंगी, हम उसे डंस लेंगे। जब बहन ने इस विपत्ति से बचने का उपाय पूछा तो नाग-नागिन ने बताया कि अगर भाई के विवाह के समय उसके सभी कार्य बहन स्वयं करे, तभी भाई की जान बच सकती है।जब उसके भाई के विवाह के लग्न का शुभ मुहूर्त आया तो वह भाई को पीछे धकेलती हुई स्वयं ही लग्न चढ़वाने के लिए आगे हो गई और घोड़ी पर भी स्वयं चढ़ गई। परिवारजन और संबंधी उसके इस विचित्र व्यवहार से हैरान तथा क्रोधित थे। उसके घोड़ी पर चढ़ते ही शिलाएं उड़ती-उड़ती आई लेकिन घोड़ी पर किसी पुरूष की जगह एक महिला को बैठी देख वापस मुड़ गई। जब सुहागरात का समय आया तो वह भाई को पीछे कर खुद भाभी के साथ सोने उसके कमरे में चली गई।

परिवार के सभी सदस्य तथा सभी रिश्तेदार उसके इस अजीबोगरीब व्यवहार से बेहद आश्चर्यचकित और खफा थे। उन्हें उस पर गुस्सा तो बहुत आ रहा था लेकिन उसके जिद के समक्ष सभी विवश थे। सुहागरात पर नियत समय पर नाग-नागिन उसके भाई को डंसने कमरे में पहुंच गए लेकिन उसने नाग-नागिन को मारने की सारी तैयारी पहले ही कर रखी थी। आखिरकार उसने नाग-नागिन का काम तमाम कर दिया। उसके बाद वह निश्चिंत होकर सो गई। सुबह होने पर सभी मेहमानों को विदा करने के बाद परिवार वालों ने सोचा कि अब इस बला को भी कुछ बचा-खुचा देकर यहां से चलता कर दिया जाए लेकिन नींद से जागने पर जब उसने पूरी घटना के बारे में सब को विस्तार से बताया कि किस प्रकार वह अपने बच्चे को पालने में ही सोता छोड़कर दौड़ी-दौड़ी भाई के प्राण बचाने के लिए उसके पीछे चली आई और सभी को नाग-नागिन के मृत शरीर दिखाए तो सभी की आंखों में आंसू आ गए।

भाई के प्रति उसका असीम प्यार तथा समर्पण भाव देखकर उसके प्रति सभी का हृदय श्रद्धा से भर गया।भाई-भाभी तथा माता-पिता ने उसे ढेर सारे उपहारों से लादकर बड़े मान-सम्मान के साथ खुशी-खुशी ससुराल से विदा किया। भाई-बहन के बीच इसी प्रकार के पावन संबंध, प्रेमभाव तथा उनके दिलों में आपसी संबंधों को मजबूत बनाने के लिए ही ‘भैया दूज’ पर्व मनाया जाता है।

(लेखक स्तंभकार हैं।)

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