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लेख

दो ईसाई पादरियों और पं० शान्ति प्रकाश में शास्त्रार्थ

हम किसी भी मनुष्य को मुक्तिदाता नहीं मानते वेद का आदेश है कि ईश्वर का कोई प्रतिनिधि या नायाब नहीं है । किसी मनुष्य पर ईमान लाना यह मर्दुम परस्ती है । आर्य समाज इसके सख्त विरुद्ध है ।

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आर्योदय से संङ्कलित खबर है कि दिल्ली २२ नवम्बर, रविवार देहली के प्रसिद्ध स्थान गांधी ग्राउण्ड में दोपहर के पश्चात् २ से ५ बजे तक आर्यसमाज और ईसाइयों के मध्य एक बड़ा शास्त्रार्थ होना निश्चित हुआ । ईसाई पादरी समय पर न पहुच सके । उनकी प्रतीक्षा की गई। उनके पधारने पर ३ वजे से ५ बजे तक शास्त्रार्थ हुआ । शास्त्रार्थ की प्रधानता आर्य प्रतिनिधि के कुशल मंत्री श्री पं० रघुवीर सिंह जी शास्त्री ने की । शास्त्रार्थ में स्वामी आनन्द भिक्षुजी, प्रोफेसर रामसिंह जी, पं० जगदेवसिंह जी सिद्धान्ती एम०पी०, पं० भारतेन्द्रनाथ साहित्यालंकार आदि अनेक नेतागण उपस्थित थे ।
दूर-दूर के नगरों के लोग भी शास्त्रार्थ में उपस्थित थे । भूपाल, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कुछ सज्जन भी शास्त्रार्थ सुनने पहुंचे हुए थे । उपरिथति की संख्या बहुत अधिक थी । मैदान लोगों से खचाखच भरा हुआ था ।
सर्वतः प्रथम पं० रघुवीर सिंहजी शास्त्री ने शास्त्रार्थ के नियम घोषित किये और जनता से प्रार्थना की कि वह जोश में न आएं। धैर्य से दोनों पक्षों को सुनकर सत्य और असत्य का निर्णय करें ।
शास्त्रार्थ के विषय की स्थापना पं० शान्तिप्रकाश ने करते हुए कहा कि वेद में ईश्वर की उपासना के द्वारा अपने मन को शुद्ध करके शुभ कर्मो से मोक्ष प्राप्ति के सिद्धान्तों को स्वीकार किया गया है । इस सृष्टि की रचना का प्रयोजन शास्त्रों में भोग और अपवर्ग बताकर स्पष्ट किया है कि जीवो के कर्मफल भुक्तान और मोक्ष प्राप्ति के लिए शुद्धाचरण और निष्काम कर्मो का संपादन बताया है ।
हम किसी भी मनुष्य को मुक्तिदाता नहीं मानते वेद का आदेश है कि ईश्वर का कोई प्रतिनिधि या नायाब नहीं है । किसी मनुष्य पर ईमान लाना यह मर्दुम परस्ती है । आर्य समाज इसके सख्त विरुद्ध है ।
▪️पादरीजी :- पं० जी ने जो कुछ वेदों में आर्य समाज का पक्ष रखा है वह भी ठीक नहीं, क्योंकि वेदों में अनेक देवतावाद का सिद्धान्त है। अग्नि आदि देवताओं की पूजा वेदों में भरी पड़ी है। अतः ईश्वर की उपासना यह केवल छल और धोखा है । वेद अग्नि आदि देवताओं की पूजा से भरा पड़ा है ।
आर्यसमाज अच्छे काम करता है । इसकी मैं प्रशंसा करता हूँ, किन्तु वेदों में जड़ोपासना है। ईश्वर की उपासना को आर्य लोग नहीं जानते । आर्यो को ईश्वर के भेद ज्ञात नहीं हैं ।
ईश्वर का बलिदान संसार के पापों के बदले में हुआ । यह ईश्वरजी की दया है ।
ईश्वर सर्वशक्तिमान् है । अतः वह ईसामसीह के रूप में संसार में प्रकट हुआ । ताकि संसार का त्राण करे। ईश्वर साकार भी हो सकता है ।
ईश्वर से प्रेम करने में सब का भला है । मसीह ईश्वर का रूप है । उससे प्रेम किये बिना मुक्ति नहीं हो सकती । मुक्तिदाता तो केवल प्रभु ईसामसी हैं ।
🔥 पं० जी :- वेदों में जड़ उपासना का चिन्ह तक भी नहीं, अग्नि के अर्थ प्रकाश स्वरूप हैं । परमात्मा प्रकाशकों का प्रकाशन होने से अग्नि नाम से पुकारा गया । इन्द्र, मित्र, वरुण, यम, मातरिश्वा, अग्नि आदि नामों से विद्वान लोग ईश्वर को पुकारते हैं और ईश्वर एक है। यह वेद में लिखा है ।
पादरीजी ने आर्य समाज के कार्यों की प्रशंसा की है । इसके लिए पादरी जी का धन्यवाद है । ईश्वर के भेद का रहस्य वेदों को ज्ञात नहीं, यह आपकी कोरी कल्पना है । बाइबल में ईश्वर का स्वरूप मनुष्यों जैसा बताया है । जैसे ईश्वर की पीठ, भोजन करना, मांस खाना, दुखी होना, हृदय रखना, आंखे और पलके, मुख, तंबू में रहना, कान, पाऊँ, नाक और नथने, सांस लेना, सोना, जागना, हंसना, ठठा मारना, बगल, बाजू आदि शरीर धारियों जैसे कार्यो का वर्णन भरा पड़ा है ।
पादरी जी ने कहा कि ईश्वर का बलिदान संसार ताप हरणार्थ हुआ तो ईश्वर जी बलिदान देने के लिए जब सूली पर चढ़ाये गये तो वह घबरा क्यों गये और उन्होंने परमात्मा से बार-बार चिल्ला-चिल्लाकर प्रार्थना क्यों की कि ईश्वर उनसे मौत का प्याला टाल दे । किन्तु मौत का प्याला टल नहीं सका तो वह ईश्वर भक्त कैसे सिद्ध हुए ? जब वह बार-बार प्रार्थना करके अपनी मौत नहीं टाल सके तो भक्तों का पापों से त्राण कैसे कर सकेंगे ?
इजील के प्रमाण देखो बार-बार मौत से डर कर उससे बचने की प्रार्थना कर रहे हैं। यदि वह ईश्वर थे और स्वयं बलिदान देने की इच्छा से ही उनका अवतार हुआ तो मौत से डरने का क्या अभिप्राय है ?
सर्वशक्तिमान का अर्थ यह नहीं है कि ईश्वर शरीरधारी बन जाये । सर्व शक्तिमान का अर्थ यह है कि ईश्वर अपने कार्यों में किसी दूसरे की सहायता का मोहताज नहीं ? सर्व व्यापक परमात्मा एक छोटे से शरीर में नहीं समा सकता । ईश्वर जब सृष्टि की रचना बिना शरीर के कर सकता है तो वह संसार का प्रबंध करने में भी शरीर का मोहताज नहीं हो सकता। निराकार परमात्मा कभी साकार नहीं हो सकता ।
ईसा मसीह मुक्ति दाता नहीं । वह स्वयं कहते हैं कि जो मुझे हे-प्रभु हे-प्रभु कहेगा वह ईश्वर के राज्य में कभी प्रविष्ट न होगा ।
▪️ पादरीजी :- प्रभु ईसा पूर्ण परमेश्वर और पूर्ण मनुष्य थे । आज वैज्ञानिक युग है अतः अमरीका के कुछ ईसाइयों ने ईसा को प्रभु और निष्पाप तथा मुक्ति दाता मानने से इनकार कर दिया है तो उनकी बुद्धि को विज्ञान के चमत्कार ने हर लिया है ।
कितनी ही पुस्तकों में ईसा के निष्पाप उत्पन्न होने की भविष्य वाणी लिखी हुई है । लक्षणों से यह सिद्धान्त निश्चित है।
आर्य लोग प्रेम और मुहब्बत को छोड़कर केवल निराधार को पकड़े हुए हैं ।
🔥 पं० जी :- ईसा मसीह परमेश्वर नहीं थे । उन्होंने स्वयं भी ऐसा ही माना है । इञ्जील में तो स्पष्ट लिखा है कि हजरत ईसामसीह ने कहा है कि हे मनुष्य ! तू मुझे नेक क्यों कहता है ? नेक कोई नहीं है । नेक केवल परमेश्वर है ।
इस इञ्जील की आदत से सिद्ध हो गया कि हजरत ईसामसीह अपने आपको पूर्ण परमेश्वर और पूर्ण तथा मुक्तिदाता नहीं मानते थे। वह साधु स्वभाव के थे । मैं उनका आदर करता हूं, किन्तु उनको मुक्तिदाता नहीं मानता। मुक्तिदाता तो केवल परमेश्वर है । वह माता-पिता के बिना उत्पन्न नहीं हुए थे । लूका की इञ्जील में उनकी वंशावली में स्पष्ट लिखा है कि उनके पिता यूसुफ थे ।
अमरीका में एक पुस्तक छपी है जिसमें त्रिनेटी के सिद्धान्त को इञ्जील में प्रक्षिप्त माना है । अतः विज्ञान के इस युग में अन्धविश्वास के सिद्धान्त अधिक समय तक नहीं चल सकते ।
भविष्य वाणियां भी बुद्धिवाद के विरुद्ध हैं और यह भी सिद्ध है कि किसी भी पुस्तक की किसी भविष्य वाणी में ईसामसीह का नाम स्पष्ट नहीं लिखा । लक्षणों का अभिप्राय पादरी जी को स्वयं ज्ञात नहीं । जब पादरी जी ईश्वर के स्वरूप को ही नहीं समझते तो उसके साथ प्रेम करना केवल उपहास मात्र है ।
▪️ पादरीजी :- पं० जी गलत कहते हैं। वह मौत से नहीं हुए। क्राइष्ट पर ईमान लाने वाले लोग सच्चे क्रिश्चन हैं । ईमान लाने वालों पर बड़े-बड़े चमत्कार प्रकट होते हैं ।
🔥 पं०जी :- मैंने इञ्जीलों के प्रमाणों से डरना सिद्ध कर दिया है। किसी मनुष्य पर ईमान लाना यह मर्दुम परस्ती है । यदि ईमान लाने वालो पर चमत्कार प्रकट होते हैं । तो इजील में लिखा है कि जिस व्यक्ति में ईसामसीह पर राई दाने के बराबर ईमान भी हो तो वह पहाड़ को सरका सकता है । नई-नई भाषाएं बोल सकता है । विष पीकर भी नहीं मरता । मुर्दे को जिन्दा कर सकता है ।
यदि पादरी जी अपने ईमान के जोर से मुर्दा जीवित कर दे तो मैं ईसामसीह पर ईमान लाने को तत्पर हूं । अन्यथा वह वैदिक धर्म की शरण में आ जाये ।
पादरीजी तीन बारियों में ही थक गये । उनके भाषण में आर्यो को कुछ गालियों का प्रयोग भी हुआ जिस पर जनता में कुछ शोर मचा किन्तु प्रधान सभा ने तुरन्त कहा कि पादरीजी हमारे अतिथि हैं । उनकी गालियों को सहन किया जाये । जनता में कोई क्षोभ नहीं होना चाहिए। आर्य समाज की ओर से सभ्यतापूर्वक उत्तर दिये जा रहे हैं । कोई ताली आदि न बजाये क्योंकि पादरियों को चिढ़ाना हमारा प्रयोजन नहीं है । केवल सत्यासत्य निर्णय के लिए ही यह शास्त्रार्थ रखा गया है ।
पादरीजी चौथी बारी में उठने का साहस न कर सके । वह पराजित होकर बैठ गये । एक और पादरी उठे और बोले ।
▪️ पादरीजी :- हम भारत के लोगों को पैसे से नहीं फिसलाते । प्रत्युत प्रभु की भक्ति करते हैं। जब खुदा ने देखा कि मनुष्य बिगड़ गये हैं तो तूफान भेजकर संसार को नष्ट किया । नूह ने संसार को बचा लिया । सद्दूम के लोग बिगड़ गये तब भी ऐसे हुआ ।
राईकी दाने बराबर पर ईमान रखने वाला शाम को सूरज को गिर जाकर गिरा देता है । बड़े शोक की बात है कि आर्य लोग हमारी बातों को नहीं समझते ।
🔥 पं०जी :- प्रभु की भक्ति में आपने एक मनुष्य को प्रभु मान रखा है । जो अपने आपको मौत से नहीं बचा सके । वह जीवित आसमान पर नहीं गये । देखो नोटो विव की यह पुस्तक तूफाने नूह से पहले खुदा पछताया उसके पश्चात् भी पछताया । पछताने वाला खुदा नहीं हो सकता । हजरत संसार को क्या दुष्कर्मों से बचा सकते थे जबकि बाईबल में उनके शराब पीने का वर्णन है । सद्दूम के लोगों को बचाने वाले की जीवन बाईबल में पढ़िये ।
सूर्य तो ईश्वरीय नियमों के आधीन सायंकाल को अस्त होता है। ईसाई के कहने से अस्त नहीं होता । ईसाई कह द कि वह अस्त न हो । यदि ऐसा हो जाये तो यह चमत्कार समझा जायेगा । किन्तु ईसाई ऐसा नहीं कर सकता ।
आर्य लोगों ने आपकी सारी बातों को परखा है। इञ्जील में कई स्थानो पर स्पष्ट लिखा है कि जो शुभ कर्म करता है, वह शुभ फल पायेगा । केवल ईमान लाने से मुक्ति नहीं मिल सकती है।
हजरत ईसामसीह के उत्पन्न होने से पूर्व करोड़ों खरबों लोग उत्पन्न होकर मर गये । यदि उनकी मुक्ति शुभ कर्मो से बिना ईसाई पर ईमान लाये हो गई तो आज भी हो सकती है । अन्यथा मुक्ति दाता आरम्भ सृष्टि से आना चाहिए था जिससे ईश्वर पर पक्षपात का दोष न आता।
जो बच्चे आज पैदा होकर मर जाते हैं वह ईसामसीह पर ईमान नहीं लाये तो ईश्वर ने उनको मुक्तिदाता पर ईमान लाने का अवसर क्यों नहीं दिया। यह पक्षपात का दोष ईसाई के माने हुए खुदा से हट नहीं सकता ।
शास्त्रार्थ के प्रधान पं० रघुवीर सिंहजी शास्त्री ने सब का धन्यवाद किया कि शास्त्रार्थ को पूरे ध्यान से सुना गया है । अब शास्त्रार्थ की कार्यवाही विसर्जित की जाती है । इस शास्त्रार्थ में आर्य समाज का अपूर्व प्रभाव पड़ा ।

द्वारा : / डॉ विवेक आर्य/नसीब सैनी

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जेएनयू में फीस वृद्धि के नाम पर राजनीति

—यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं

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सुरेश हिन्दुस्थानी

देश के उच्च शिक्षा केन्द्र जब राजनीति के अड्डे बनने की ओर कदम बढ़ाने लगें, तब वहां की शिक्षा की दिशा-दशा क्या होगी, यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। फीस बढ़ोतरी के खिलाफ किया जाने वाला दिल्ली का छात्र आंदोलन कुछ इसी प्रकार का भाव प्रदर्शित कर रहा है, जहां केवल और केवल राजनीति ही की जा रही है। किसी भी आंदोलन की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके पीछे जनहित का कितना भाव है। दिल्ली का यह आंदोलन जनसरोकार से कोसों दूर दिखाई दे रहा है।

हालांकि इसके पीछे बहुत से अन्य कारण भी होंगे। सबसे बड़ा कारण तो यही है कि आज जेएनयू की जो छवि जनता के बीच बनी है, वह जनता को खुद ही दूर कर रही है। जिस विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारों की ध्वनि गूंजित होती है, वह कभी जन आंदोलन का हिस्सा नहीं बन सकते हैं।दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के जिन छात्रों ने कभी भारत के टुकड़े करने के नारे लगाए थे, आज वे ही छात्र फीस बढ़ोतरी के छोटे से मामले को राजनीतिक रुप देने का प्रयास करते दिखाई दे रहे हैं। इस छात्र आंदोलन का राजनीतिक स्वरुप इसलिए भी दिखाई दे रहा है, क्योंकि इसमें राष्ट्रीय मानबिन्दुओं और केन्द्र सरकार को सीधे निशाने पर लिया जा रहा है। जेएनयू वामपंथी विचारधारा का एक बड़ा केन्द्र रहा है।

वामपंथी धारा के कार्यकर्ता देश के महानायकों के बारे में क्या सोच रखते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। पिछले घटनाक्रमों को देखें तो पाएंगे कि जेएनयू में देश के विरोध में वातावरण बनाने का काम किया जाता रहा है। वहां आतंकवादी बुरहान वानी के समर्थन में कार्यक्रम किए जाते हैं। सवाल यह कि जेएनयू में शिक्षा के नाम पर आखिर क्या हो रहा है। जहां तक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में फीस बढ़ोतरी की बात है तो यह कहना तर्कसंगत ही होगा कि विगत 19 वर्ष से विश्वविद्यालय के छात्रावास के कमरों और भोजन का शुल्क नहीं बढ़ाया गया, जबकि पिछले 19 सालों में महंगाई का ग्राफ बहुत ऊपर गया है। इस सबका भार पूरी तरह से विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के कंधों पर ही आया। देश के अन्य विश्वविद्यालयों में भी शिक्षा महंगी हो रही है, जो जेएनयू के मुकाबले बहुत अधिक है। ऐसे में विश्वविद्यालय द्वारा कुछ हद तक फीस बढ़ाना न्यायोचित कदम ही है। जिसे वहां के कई छात्र भी सही मानते हैं। लेकिन यह आंदोलन इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि इसमें परदे के पीछे राजनीतिक कार्यकर्ता भूमिका निभा रहे हैं। यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं।

खैर… यह जांच का विषय हो सकता है।देश के प्रसिद्ध अधिवक्ता सांसद डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने इस छात्र आंदोलन के बारे में बहुत ही गहरी बात कही है। उनका मानना है कि जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय को कुछ समय के लिए बंद कर दिया जाए। उनके इस कथन के गहरे निहितार्थ निकल रहे हैं। स्वामी के संकेत को विस्तार से समझना हो तो एक बार जेएनयू की गतिविधियों का अध्ययन करना चाहिए। फिर वह सब सामने आ जाएगा जो वहां होता है। कहा जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जमकर राजनीति की जाती रही है। देश के जो शिक्षा केन्द्र राजनीति के केन्द्र बनते जा रहे हैं, उन पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है।

वर्तमान में जिस प्रकार से जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय का आंदोलन चल रहा है, उसे छात्र आंदोलन कहना न्याय संगत नहीं होगा। क्योंकि, यह विशुद्ध राजनीतिक आंदोलन है। फीस बढ़ोतरी का विरोध तो मात्र बहाना है। इस आंदोलन के समर्थन में देश की संसद में कांग्रेस और वामपंथी दलों की ओर से आवाज उठाई गई। इससे यही संदेश जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जो देश विरोधी नारे लगाए गए, उनके प्रति इन राजनीतिक दलों के समर्थन का ही भाव रहा होगा। इतना ही नहीं, जब भारत तेरे टुकड़े होंगे और हमें चाहिए आजादी जैसे नारे लगाए गए थे, तब भी कांग्रेस और वाम दलों ने खुलेआम समर्थन किया था। ऐसे में सवाल यह उठता है कि कहीं यही दोनों दल छात्रों को आंदोलन करने के लिए तो नहीं उकसा रहे? अगर यह सही है तो फिर केन्द्र सरकार को दोष देना सही नहीं कहा जा सकता।

जब से देश में राजनीतिक सत्ता का परिवर्तन हुआ है, तब से ही देश में उन संस्थानों की सक्रियता दिखाई देने लगी है, जो भारत के बारे में भ्रम का वातावरण बनाने में सहायक हो सकते हैं। चाहे वह शहरी नक्सलवाद को प्रायोजित करने वाले कथित बुद्धिजीवियों की संस्था हो या फिर उनके विचार को अंगीकार करने वाली ही संस्थाएं क्यों न हों। सभी केन्द्र सरकार का विरोध करने के लिए आगे आ रहे हैं। इस विश्वविद्यालय में पढ़ाई करने वाले छात्र कभी भारतीय सेना द्वारा की जाने वाली आतंकियों के विरोध में कार्यवाही पर सवाल उठाते दिखाई देते हैं तो कभी अनुच्छेद 370 को हटाने का विरोध करते हैं। चार वर्ष पूर्व जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में छात्र संघ की उपाध्यक्ष रहीं शेहला राशिद ने भारतीय सेना के विरोध में जमकर भड़ास निकाली थी, जबकि सेना की ओर से स्पष्ट कहा गया था कि ऐसा कुछ भी नहीं है। इससे समझ में आ सकता है कि इस विश्वविद्यालय में कौन-सा पाठ पढ़ाया जाता है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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देश की युवा पीढ़ी में विदेशों के प्रति रुचि बढ़ी

—गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है

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मनोज ज्वाला

एक मीडिया संस्थान के सर्वेक्षण के अनुसार हमारे देश के पढ़े-लिखे और शहरी नौजवानों में से आधे से अधिक ऐसे हैं, जो अपने देश को पसंद नहीं करते। वे विदेशों में जाकर बस जाना चाहते हैं। लगभग दो साल पहले के उक्त सर्वेक्षण के मुताबिक उनमें से 75 फीसदी युवाओं का कहना था कि वे बे-मन और मजबूरीवश भारत में रह रहे हैं। 62.08 फीसदी युवतियों और 66.01 फीसदी युवाओं का मानना था कि भारत  में उनका भविष्य सुरक्षित नहीं है। क्योंकि, यहां अच्छे दिन आने की संभावना कम है। उनमें से 50 फीसदी का मानना था कि भारत में किसी महापुरुष का अवतरण होगा, तभी हालात सुधर सकते हैं, अन्यथा नहीं।

40 फीसदी युवाओं का मानना था कि उन्हें अगर इस देश का प्रधानमंत्री बना दिया जाए, तो वे पांच साल में इस देश का कायापलट कर देंगे।अखबार का वह सर्वेक्षण आज भी बिल्कुल सही लगता है। अगर व्यापक स्तर पर सर्वेक्षण किया जाता, तो देश छोड़ने को तैयार युवाओं का प्रतिशत और अधिक दिखता। वह सर्वेक्षण तो सिर्फ शहरों तक सीमित था। अपने देश में गांवों पर भी तेजी से शहर छाते जा रहे हैं। गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है। गौर कीजिए कि देश छोड़ने को तैयार वे युवा पढ़े-लिखे हैं और शहरों में पले-बढ़े हैं। वे किस पद्धति से किस तरह के विद्यालयों में क्या पढ़े-लिखे हैं और किस रीति-रिवाज से कैसे परिवारों में किस तरह से पले-बढ़े हैं, यह ज्यादा गौरतलब है।

विद्यालय सरकारी हों या गैर सरकारी, सभी में शिक्षा की पद्धति एक है और वह है मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा पद्धति। भारतीयता विरोधी इसी शिक्षा पद्धति को सरकारी मान्यता प्राप्त है। सरकार का पूरा तंत्र इसी तरह की शिक्षा के विस्तार में लगा हुआ है। वैसे अंग्रेजी माध्यम वाले विद्यालय सबसे अच्छे माने जाते हैं और गैर-सरकारी निजी क्षेत्र के अधिकतर विद्यालय अंग्रेजी माध्यम के ही हैं। शहरों में ऐसे ही विद्यालयों की भरमार है और जिन युवाओं के बीच उक्त मीडिया संस्थान ने उपरोक्त सर्वेक्षण किया उनमें से सर्वाधिक युवा ऐसे ही तथाकथित ‘उत्कृष्ट’ विद्यालयों से पढ़े-लिखे हुए हैं। अब रही बात यह कि इन विद्यालयों में आखिर शिक्षा क्या और कैसी दी जाती है, तो यह इन युवाओं की उपरोक्त सोच से ही स्पष्ट है।

जाहिर है, उन्हें शिक्षा के नाम पर ऐसी-ऐसी डिग्रियां दी जाती हैं, जिनके कारण वे महात्वाकांक्षी, स्वार्थी बनकर असंतोष, अहंकार, खीझ, पलायन एवं हीनता-बोध से ग्रसित हो जाते हैं और कमाने-खाने भर थोड़े-बहुत हुनर हासिल कर स्वभाषा व स्वदेश के प्रति ‘नकार’ भाव से पीड़ित होकर विदेश चले जाते हैं।थॉमस विलिंग्टन मैकाले कोई शिक्षा-शास्त्री नहीं था। वह एक षड्यंत्रकारी था, जिसने भारत पर ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जड़ें जमाने की नीयत से भारतीय शिक्षा-पद्धति की जड़ें उखाड़कर मौजूदा शिक्षा-पद्धति को प्रक्षेपित किया था। जो आज भी उसी रूप में कायम है। 20 अक्टूबर 1931 को लंदन के रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ फौरन अफेयर्स के मंच से महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘अंग्रेजी शासन से पहले भारत की शिक्षा-व्यवस्था इंग्लैण्ड से भी अच्छी थी।’ उस पूरी व्यवस्था को सुनियोजित तरीके से समूल नष्ट कर देने के पश्चात ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जरूरतों के मुताबिक उसके रणनीतिकारों ने लम्बे समय तक बहस-विमर्श कर के मैकाले की योजनानुसार यह शिक्षा-पद्धति लागू की थी।

मैकाले ने ब्रिटिश पार्लियामेंट की शिक्षा समिति के समक्ष कहा था ‘हमें भारत में ऐसा शिक्षित वर्ग तैयार करना चाहिए, जो हमारे और उन करोड़ों भारतवासियों के बीच जिन पर हम शासन करते हैं, उन्हें समझाने-बुझाने का काम कर सके। जो केवल खून और रंग की दृष्टि से भारतीय हों, किन्तु रुचि, भाषा व भावों की दृष्टि से अंग्रेज हों।’ विदेशों में बस जाने को उतावले भारतीय युवाओं ने पूरी मेहनत व तबीयत से मैकाले शिक्षा-पद्धति को आत्मसात किया है, ऐसा समझा जा सकता है। यहां प्रसंगवश मैकाले के बहनोई चार्ल्स ट्रेवेलियन द्वारा ब्रिटिश पार्लियामेंट की एक समिति के समक्ष ‘भारत में भिन्न-भिन्न शिक्षा-पद्धतियों के भिन्न-भिन्न परिणाम’ शीर्षक से प्रस्तुत किये गए एक लेख का यह अंश भी उल्लेखनीय है कि ‘मैकाले शिक्षा-पद्धति का प्रभाव अंग्रेजी राज के लिए हितकर हुए बिना नहीं रह सकता। हमारे पास उपाय केवल यही है कि हम भारतवासियों को यूरोपियन ढंग की उन्नति में लगा दें। इससे हमारे लिए भारत पर अपना साम्राज्य कायम रखना बहुत आसान और असंदिग्ध हो जाएगा।’ ऐसा ही हुआ। बल्कि, मैकाले की योजना तो लक्ष्य से ज्यादा ही सफल रही।

हमारे देश के मैकालेवादी राजनेताओं ने अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासन की समाप्ति के बाद भी उनकी अंग्रेजी-मैकाले शिक्षा-पद्धति को न केवल यथावत कायम रखा, बल्कि उसे और ज्यादा अभारतीय रंग-ढंग में ढाल दिया। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष लक्षित प्राचीन भारतीय शिक्षा-पद्धति को अतीत के गर्त में डालकर शिक्षा को उत्पादन-विपणन-मुनाफा-उपभोग-केन्द्रित बना देने और उसे नैतिक सांस्कृतिक मूल्यों से विहीन कर देने तथा राष्ट्रीयता के प्रति उदासीन बना देने का ही परिणाम है कि हमारी यह युवा पीढ़ी महज निजी सुख-स्वार्थ के लिए अपने देश से विमुख हो जाना पसंद कर रही है। उसे विदेशों में ही अपना भविष्य दीख रहा है।

माना कि हमारे देश में तरह-तरह की समस्याएं हैं, किन्तु इनसे जूझने और इन्हें दूर करने की बजाय पलायन कर जाने अथवा कोरा लफ्फाजी करने कि हमें प्रधानमंत्री बना दिया जाए तो हम देश को सुंदर बना देंगे, अति महात्वाकांक्षा-युक्त मानसिक असंतुलन का ही द्योत्तक है। लेकिन आधे से अधिक ये शहरी युवा मानसिक रुप से असंतुलित नहीं हैं, बल्कि असल में वे पश्चिम के प्रति आकर्षित हैं। इसके लिए हमारे देश की चालू शिक्षा-पद्धति का पोषण करने वाले हमारे राजनेता ही जिम्मेवार हैं। यह ‘यूरोपियन ढंग की उन्नति’ के प्रति बढ़ते अनावश्यक आकर्षण का परिणाम है। इस मानसिक पलायन को रोकने के लिए जरूरी है कि हम अपने बच्चों को हमारे राष्ट्र की जड़ों से जोड़ने वाली और संतुलित समग्र मानसिक विकास करने वालीप्राचीन भारतीय पद्धति से भारतीय भाषाओं में समस्त ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा देने की सम्पूर्ण व्यवस्था कायम करें।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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भाई-बहन में प्रेम भाव बढ़ाता है भैया दूज

–बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था

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योगेश कुमार गोयल

(भैया दूज, 29 अक्टूबर पर विशेष)

भाई-बहन के दिलों में पावन संबंधों की मजबूती और प्रेमभाव स्थापित करने वाला पर्व है भैया दूज। इस दिन बहनें अपने भाईयों को तिलक लगाकर ईश्वर से उनकी दीर्घायु की कामना करती हैं। कहा जाता है कि इससे भाई यमराज के प्रकोप से बचे रहते हैं। दीपावली के दो दिन बाद अर्थात कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाए जाने वाले इस पर्व को ‘यम द्वितीया’ व ‘भ्रातृ द्वितीया’ के नाम से भी जाना जाता है। बहुत से भाई-बहन सौभाग्य तथा आयुष्य की प्राप्ति के लिए इस दिन यमुना अथवा अन्य पवित्र नदियों में साथ-साथ स्नान भी करते हैं। भैया दूज मनाने के संबंध में कई किवंदतियां प्रचलित हैं। एक कथा यमराज और उनकी बहन यमुना देवी से संबंधित है। बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था। यमुना अपने भाई यमराज से बहुत स्नेह करती थीं और अक्सर उनसे अनुरोध करती रहती थीं कि वे अपने इष्ट-मित्रों सहित उसके घर भोजन के लिए पधारें लेकिन यमराज हर बार उसके निमंत्रण को किसी न किसी बहाने से टाल जाते। कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमुना ने यमराज को एक बार फिर भोजन के लिए आमंत्रित किया।

उस समय यमराज ने विचार किया कि मैं तो अपने कर्त्तव्य से बंधा सदैव प्राणियों के प्राण ही हरता हूं। इसलिए इस चराचर जगत में कोई भी मुझे अपने घर नहीं बुलाना चाहता। लेकिन बहन यमुना तो मुझे बार-बार अपने घर आमंत्रित कर रही है। इसलिए अब तो उसका निमंत्रण स्वीकार करना ही चाहिए।यमराज को अपने घर आया देख यमुना की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने भाई का खूब आदर-सत्कार करते हुए उनके समक्ष नाना प्रकार के व्यंजन परोसे। बहन के आतिथ्य से यमराज बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे कोई वर मांगने को कहा। इस पर यमुना ने उनसे अनुरोध किया कि आप प्रतिवर्ष इसी दिन मेरे घर आकर भोजन करें और मेरी तरह जो भी बहन इस दिन अपने भाई का आदर-सत्कार करे, उसे तुम्हारा भय न रहे। यमराज ने बहन यमुना को उसका इच्छित वरदान दे दिया। ऐसी मान्यता है कि उसी दिन से ‘भैया दूज’ का पर्व मनाया जाने लगा। भैया दूज के संबंध में और भी कई कथाएं प्रचलित हैं। ऐसी ही एक कथा के अनुसार, एक ब्राह्मण की दो संतानें थी।

एक पुत्र एवं एक पुत्री। पुत्री बहुत समझदार एवं गुणवती थी। वह अपने भाई से जी-जान से प्यार करती थी। एक दिन उसका भाई उससे मिलने उसकी ससुराल पहुंचा। उस समय वह सूत कातने में व्यस्त थी। अतः उसे भाई के आने का पता ही न चल सका। भाई भी बिना कुछ बोले चुपचाप एक ओर बैठा रहा। जब थोड़ी देर बाद बहन की नजर उस पर पड़ी तो भाई को अपने घर आया देख उसे बेहद खुशी हुई। उसने भाई का भरपूर आदर-सत्कार किया। अगले दिन भाई को वापस लौटना था। अतः रास्ते के लिए वह आटे के पकवान बनाने के उद्देश्य से चक्की में आटा पीसने लगी। अनजाने में चक्की में बैठा सांप भी आटे के साथ पिस गया। उसी आटे के पकवान एक पोटली में बांधकर उसने भाई को रास्ते में खाने के लिए देकर विदा किया। भाई के घर से जाने के बाद जब उसे यह मालूम हुआ कि आटे में सांप पिस गया है तो अपने पुत्र को पालने में ही सोता छोड़कर वह अपने भाई के प्राणों की रक्षा के लिए दौड़ी। कुछ दूर जाने पर उसे एक पेड़ की छांव में अपना भाई सोता दिखाई दिया। तब तक उसने पोटली में से कुछ भी नहीं खाया था। उसने भगवान का शुक्रिया अदा किया और पोटली उठाकर दूर फेंक दी तथा भाई के साथ मायके की ओर चल दी।

रास्ते में उसने देखा कि भारी-भारी शिलाएं आकाश में उड़ रही हैं। उसने एक राहगीर से इस रहस्य के बारे में जानना चाहा तो उसने बताया कि जो बहन अपने भाई पर कभी नाराज न होती हो और उसे दिलो-जान से चाहती हो, उस भाई की शादी के समय ये शिलाएं उसकी छाती पर रखी जाएंगी। थोड़ी दूर चलने पर उसे नाग-नागिन दिखाई दिए। नाग ने बताया कि ये शिलाएं जिस व्यक्ति की छाती पर रखी जाएंगी, हम उसे डंस लेंगे। जब बहन ने इस विपत्ति से बचने का उपाय पूछा तो नाग-नागिन ने बताया कि अगर भाई के विवाह के समय उसके सभी कार्य बहन स्वयं करे, तभी भाई की जान बच सकती है।जब उसके भाई के विवाह के लग्न का शुभ मुहूर्त आया तो वह भाई को पीछे धकेलती हुई स्वयं ही लग्न चढ़वाने के लिए आगे हो गई और घोड़ी पर भी स्वयं चढ़ गई। परिवारजन और संबंधी उसके इस विचित्र व्यवहार से हैरान तथा क्रोधित थे। उसके घोड़ी पर चढ़ते ही शिलाएं उड़ती-उड़ती आई लेकिन घोड़ी पर किसी पुरूष की जगह एक महिला को बैठी देख वापस मुड़ गई। जब सुहागरात का समय आया तो वह भाई को पीछे कर खुद भाभी के साथ सोने उसके कमरे में चली गई।

परिवार के सभी सदस्य तथा सभी रिश्तेदार उसके इस अजीबोगरीब व्यवहार से बेहद आश्चर्यचकित और खफा थे। उन्हें उस पर गुस्सा तो बहुत आ रहा था लेकिन उसके जिद के समक्ष सभी विवश थे। सुहागरात पर नियत समय पर नाग-नागिन उसके भाई को डंसने कमरे में पहुंच गए लेकिन उसने नाग-नागिन को मारने की सारी तैयारी पहले ही कर रखी थी। आखिरकार उसने नाग-नागिन का काम तमाम कर दिया। उसके बाद वह निश्चिंत होकर सो गई। सुबह होने पर सभी मेहमानों को विदा करने के बाद परिवार वालों ने सोचा कि अब इस बला को भी कुछ बचा-खुचा देकर यहां से चलता कर दिया जाए लेकिन नींद से जागने पर जब उसने पूरी घटना के बारे में सब को विस्तार से बताया कि किस प्रकार वह अपने बच्चे को पालने में ही सोता छोड़कर दौड़ी-दौड़ी भाई के प्राण बचाने के लिए उसके पीछे चली आई और सभी को नाग-नागिन के मृत शरीर दिखाए तो सभी की आंखों में आंसू आ गए।

भाई के प्रति उसका असीम प्यार तथा समर्पण भाव देखकर उसके प्रति सभी का हृदय श्रद्धा से भर गया।भाई-भाभी तथा माता-पिता ने उसे ढेर सारे उपहारों से लादकर बड़े मान-सम्मान के साथ खुशी-खुशी ससुराल से विदा किया। भाई-बहन के बीच इसी प्रकार के पावन संबंध, प्रेमभाव तथा उनके दिलों में आपसी संबंधों को मजबूत बनाने के लिए ही ‘भैया दूज’ पर्व मनाया जाता है।

(लेखक स्तंभकार हैं।)

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