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वे पंद्रह दिन 6/15

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 6 अगस्त,बुधवार..

हमेशा की तरह गांधीजी तड़के ही उठ गए थे. बाहर अभी अंधेरा था. ‘वाह’ के शरणार्थी शिविर के निकट ही गांधीजी का पड़ाव भी था. वैसे तो ‘वाह’ कोई बड़ा शहर तो था नहीं. एक छोटा सा गांव ही था. परन्तु अंग्रेजों ने वहां पर अपना सैनिक ठिकाना तैयार किया हुआ था. इसीलिए ‘वाह’ का अपना महत्व था. प्रशासनिक भाषा में कहें तो यह ‘वाह कैंट’ था. इस ‘कैंट’ में, अर्थात वाह के उस ‘शरणार्थी कैम्प’ के इलाके में, एक बंगले में, गांधीजी ठहरे हुए थे. वाह का शरणार्थी शिविर नजदीक ही था, इसलिए उस शिविर से आने वाली गंदी बदबू अत्यधिक तीव्र महसूस हो रही थी. इसी बदबू वाली पृष्ठभूमि में गांधीजी ने अपनी प्रार्थना समाप्त की.

आज गांधीजी का काफिला लाहौर जाने वाला था. लगभग ढाई सौ मील की दूरी थी. संभावना थी कि कम से कम सात-आठ घंटे तो लगने ही वाले हैं. इसीलिए ‘वाह’ से जल्दी निकलने की योजना थी. निश्चित कार्यक्रम के मद्देनजर, सूर्योदय होते ही गांधीजी ने वाह कैंट छोड़ दिया और रावलपिन्डी मार्ग से वे लाहौर की तरफ निकल पड़े.

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‘लाहौर’….

रावी नदी के तट पर स्थित यह शहर सिख इतिहास का महत्त्वपूर्ण शहर है. प्राचीन ग्रंथों में ‘लवपुर’ अथवा ‘लवपुरी’ के नाम से पहचाना जाने वाला शहर. इस शहर में लगभग चालीस प्रतिशत से ज्यादा, हिन्दू-सिखों की आबादी हैं. मार्च में मुस्लिम लीग द्वारा भड़काए गए दंगों के बाद बड़े पैमाने पर हिन्दु और सिखों ने अपने घरबार छोड़ने आरम्भ कर दिए थे.

लाहौर आर्य समाजियों का भी गढ़ हैं. अनेक कट्टर आर्यसमाजी लाहौर में ही पले-बढ़े और इन्होंने संस्कृत भाषा को भी आगे बढ़ाया. लाहौर में इस समय अनेक संस्कृत पाठशालाएं हैं. संस्कृत के पुरोधा तथा ‘भारत विद्या’ के प्रकाशक, ‘मोतीलाल बनारसीदास’ यहीं के हैं. हालांकि अब लगातार होते दंगों के कारण उन्होंने अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर भारत जाने का फैसला कर लिया हैं.

इस बात के स्पष्ट संकेत मिल चुके हैं कि लाहौर पाकिस्तान में जाएगा. इस कारण महाराजा रणजीत सिंह की राजधानी और उनकी समाधि वाला यह शहर छोड़कर भारत जाना लाहौर के सिखों के लिए बहुत कठिन हो रहा हैं. शीतला माता मंदिर, भैरव मंदिर, दावर रोड स्थित श्रीकृष्ण मंदिर, दूधवाली माता मंदिर, डेरा साहब, भाभारियां स्थित श्वेताम्बर और दिगंबर पंथ के जैन मंदिर, आर्य समाज मंदिर जैसे कई प्रसिद्ध मंदिरों का अब क्या होगा, इसकी चिंता प्रत्येक हिन्दू-सिख के मन में हैं. प्रभु रामचंद्र के पुत्र लव, जिन्होंने यह शहर बसाया था, उनका मंदिर भी लाहौर के किले के अन्दर स्थित हैं. वहां के पुजारियों को भी इस बात की चिंता हैं कि अब इस मंदिर का और हमारा भविष्य क्या होगा?

ऐसे ऐतिहासिक शहर लाहौर में गांधीजी काँग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ बातचीत करने वाले हैं. काँग्रेस कार्यकर्ताओं का दूसरा अर्थ हिन्दू और सिख ही हैं. क्योंकि लाहौर कांग्रेस के मुस्लिम कार्यकर्ता पहले ही ‘मुस्लिम लीग’ का काम करने लगे हैं. जब पाकिस्तान का निर्माण होना ही है और यहाँ काँग्रेस का कोई अस्तित्त्व नहीं रहेगा, तो फिर क्यों खामख्वाह काँग्रेस का बोझा अपनी पीठ पर ढोना? यही सोचकर मुस्लिम कार्यकर्ता काँग्रेस से गायब हो चुके हैं. इसलिए अब लाहौर के इन बचे-खुचे हिन्दू-सिख कार्यकर्ताओं को गांधीजी की यह भेंट बहुत ही आशादायक लग रही हैं.

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जिस समय गांधीजी वाह से लाहौर के लिए निकल रहे थे, लगभग उसी समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक, गुरूजी भी कराची से सिंध प्रांत के दूसरे बड़े शहर, हैदराबाद जाने के लिए निकले थे. गांधीजी की ही तरह वे भी तड़के चार बजे ही उठ गए थे. यह उनकी नियमित दिनचर्या थी. सुबह छह बजे सूर्योदय होते ही गुरूजी ने प्रभात शाखा में प्रार्थना की और शाखा पूर्ण करने के उपरान्त एक छोटी सी बैठक ली. सिंध प्रांत के सभी प्रमुख शहरों के संघचालक, कार्यवाह एवं प्रचारक इस बैठक में उपस्थित थे. ये सभी लोग गुरूजी के कल वाले कार्यक्रम के लिए कराची में आए थे. इस बैठक में ‘पाकिस्तान के हिंदु-सिखों को हिन्दुस्थान में सुरक्षित रूप से कैसे पहुंचाया जाए’, इस बारे में योजना बनाई जा रही थी.

गुरूजी अपने कार्यकर्ताओं की व्यथा सुन रहे थे, उनकी समस्याएं समझ रहे थे. पास में ही बैठे हुए डॉक्टर आबाजी थत्ते, बड़े ही व्यवस्थित पद्धति से अनेक बातों के ‘नोट्स’ तैयार कर रहे थे. कल संघ के सार्वजनिक बौद्धिक में जो बातें गुरूजी ने अपने उदबोधन में कही थीं, वे पुनः एक बार वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को समझाईं. ‘हिंदुओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी नियति ने ही संघ के कंधों पर सौंपी हैं’. गुरूजी ने कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाया और कहा कि ‘संगठन क्षमता से हम लोग बहुत सी असाध्य बातें भी सरलता से पूरी कर सकते हैं’.

बैठक के पश्चात सभी कार्यकर्ताओं के साथ गुरूजी ने अल्पाहार ग्रहण किया, और लगभग सुबह नौ बजे गुरूजी हैदराबाद की तरफ निकल पड़े. कराची के कुछ स्वयंसेवकों के पास कार थी. उन्हीं में से एक कार में गुरूजी, आबाजी, प्रांत प्रचारक राजपाल जी पुरी एवं सुरक्षा की दृष्टि से एक स्वयंसेवक इस गाड़ी में बैठे. कारचालक भी शस्त्र से सुसज्जित था, भले ही ऊपर से ऐसा दिख नहीं रहा था. ऐसी ही एक और कार गुरूजी की कार के पीछे-पीछे चली. उसमें भी कुछ वरिष्ठ कार्यकर्ता थे, जो शस्त्रों से सज्जित थे. खतरे को भांपते हुए इन दोनों कारों के आगे और पीछे कई स्वयंसेवक मोटरसाइकिल से चल रहे थे. दंगों के उस अत्यंत अस्थिर वातावरण में भी, किसी सेनापति या राष्ट्राध्यक्ष की तरह वहां के स्वयंसेवक गुरूजी गोलवलकर को हैदराबाद ले जा रहे थे.

कराची से हैदराबाद का रास्ता लगभग चौरानवे मील का हैं, लेकिन काफी अच्छा हैं. इस कारण ऐसा विचार था कि दोपहर भोजन के समय गुरूजी हैदराबाद पहुंच जाएंगे. रास्ते में ही प्रांत प्रचारक राजपाल जी ने गुरूजी को वहां की भयावह परिस्थिति के बारे में अवगत कर दिया था.

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’१७, यॉर्क रोड’… नेहरू जी के निवास स्थान का कार्यालय.
नेहरू जी के सामने कल ५ अगस्त को लॉर्ड माउंटबेटन द्वारा लिखित एक पत्र रखा हुआ था. उसका उत्तर उन्हें देना था. माउंटबेटन ने एक बड़ी ही विचित्र मांग रख दी थी. काफी विचार करने के बाद नेहरू जी ने इस पत्र का उत्तर अपने सचिव को डिक्टेट करना आरम्भ किया…

“प्रिय लॉर्ड माउंटबेटन,

आपके पाँच अगस्त वाले पत्र का आभार. इस पत्र में आपने उन दिनों की सूची भेजी है, जिन दिनों में भारत की शासकीय इमारतों पर यूनियन जैक फहराया जाना चाहिए. मेरे अनुसार इसका अर्थ यह निकलता है कि भारत के सभी सार्वजनिक स्थानों पर हमारे राष्ट्र ध्वज के साथ-साथ यूनियन जैक भी फहराया जाए. आपकी इस सूची में केवल एक दिन के बारे में मुझे समस्या है. वह दिन है १५ अगस्त का, अर्थात हमारी स्वतंत्रता का दिवस. मुझे ऐसा लगता है कि इस दिन यूनियन जैक फहराना उचित नहीं होगा. हालांकि लन्दन स्थित इण्डिया हाउस पर आप उस दिन यूनियन जैक फहराएं तो उसमें मुझे कोई आपत्ति नहीं है.

अलबत्ता जो अन्य दिन आपने सुझाए हैं – जैसे १ जनवरी – सैनिक दिवस; १ अप्रैल – वायुसेना दिवस; २५ अप्रैल – अन्झाक दिवस; २४ मई – राष्ट्रकुल दिवस; १२ जून – (ब्रिटेन के) राजा का जन्मदिन; १४ जून – संयुक्त राष्ट्रसंघ का ध्वज दिवस; ४ अगस्त – (ब्रिटिश) महारानी का जन्मदिन; ७ नवंबर – नौसेना दिवस; ११ नवंबर – विश्व युद्ध में दिवंगत हुए सैनिकों का स्मरण दिवस… इन सभी दिनों में हमें कोई समस्या नहीं है. इन अवसरों पर सभी सार्वजनिक स्थानों पर यूनियन जैक फहराया जाएगा.”

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डॉक्टर बाबासाहब आंबेडकर आज मुम्बई में हैं. स्वतंत्र भारत के पहले मंत्रिमंडल की घोषणा हुए अभी केवल दो ही दिन हुए हैं. ऐसे स्पष्ट संकेत हैं कि उन्हें क़ानून मंत्रालय सौंपा जाएगा. इस कारण मुम्बई के उनके निवास स्थान पर उनसे भेंट करने वालों, विशेषकर शेड्यूल कास्ट फेडरेशन कार्यकर्ताओं की लंबी कतारें हैं. स्वाभाविक ही हैं, क्योंकि उनके प्रिय नेता को भारत के पहले केन्द्रीय मंत्रिमंडल में मंत्री पद मिला हैं.

इस तमाम व्यस्तताओं के बीच बाबासाहब को थोड़ा एकांत चाहिए था. उनके दिमाग में अनेक विचार चल रहे थे. विशेषकर देश के पश्चिम भाग में भीषण हिन्दू-मुस्लिम दंगों की ख़बरें उन्हें बेचैन कर रही थीं. इस सम्बन्ध में उनके विचार एकदम स्पष्ट थे. बाबासाहब भी विभाजन के पक्ष में ही थे, क्योंकि उनका यह साफ़ मानना था कि हिंदुओं और मुसलमानों का सह-अस्तित्त्व संभव ही नहीं है. अलबत्ता विभाजन के लिए अपनी सहमति देते समय बाबासाहब की प्रमुख शर्त थी ‘जनसंख्या की अदला-बदली करना’. उनका कहना था कि चूंकि विभाजन धर्म के आधार पर हो रहा है, इसलिए प्रस्तावित पाकिस्तान के सभी हिंदु-सिखों को भारत में तथा भारत के सभी मुसलमानों को पाकिस्तान में विस्थापित किया जाना आवश्यक है. जनसंख्या की इस अदला-बदली से ही भारत का भविष्य शांतिपूर्ण होगा.

काँग्रेस के अन्य कई नेताओं, विशेषकर गांधीजी और नेहरू के कारण बाबासाहब का यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं हुआ, इसका उन्हें बहुत दुःख हुआ था. उन्हें बार-बार लगता था कि यदि योजनाबद्ध तरीके से हिंदु-मुस्लिमों की जनसंख्या की अदलाबदली हुई होती, तो लाखों निर्दोषों के प्राण बचाए जा सकते थे. गांधीजी के इस वक्तव्य पर कि “भारत में हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई की तरह रहेंगे”, उन्हें बहुत क्रोध आता था.

कार्यकर्ताओं की भारी भीड़ से किसी तरह बाहर निकलकर बाबासाहेब अपने ‘अध्ययन-कक्ष’ में बैठे थे. वे इस बात का विचार कर रहे थे कि अब उन्हें अपने मंत्रालय में क्या-क्या काम करने हैं. इसी बीच उन्हें ध्यान आया कि आज हिरोशिमा दिवस है. आज के ही दिन अमेरिका ने जापान पर अणुबम गिराया था, इस घटना को दो वर्ष होने जा रहे हैं. जापान के निर्दोष नागरिकों की हत्या के स्मरण से बाबासाहब का मन खिन्न हो चला था.

आज शाम को मुम्बई के वकीलों की एक संस्था ने बाबासाहब का सार्वजनिक अभिनन्दन समारोह आयोजित किया था. इस समारोह में क्या बोलना है, इस बात पर वे गहन विचार करने लगे.

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आज सूर्योदय प्रातः ६ बजकर १७ मिनट पर हुआ. परन्तु इससे कुछ पहले ही गांधीजी ने लाहौर की दिशा में अपनी यात्रा आरम्भ की. एक घंटे के बाद ही रावलपिंडी में उनका संक्षिप्त ठहराव था. वहां के कार्यकर्ताओं ने जिद करके गांधीजी को रोक लिया था. सभी के लिए शरबत एवं सूखे मेवे की व्यवस्था की गई थी. गांधीजी ने केवल नींबू शर्बत ग्रहण किया.

दोपहर लगभग डेढ़ बजे गांधीजी का काफिला लाहौर पहुंचा. यहां भोजन करने के पश्चात तुरंत ही गांधीजी काँग्रेस के अपने कार्यकर्ताओं को संबोधित करने वाले थे.

जिस काँग्रेस पदाधिकारी के यहां गांधीजी का भोजन होने वाला था, उनका घर हिन्दू बहुल बस्ती में ही था. हालांकि वहां भी गांधीजी ने जो दृश्य देखा, वह मन को खिन्न करने वाला ही था. उन्हें मार्ग में कुछ जले हुए मकान, कुछ जली हुई दुकानें दिखाई दीं. हनुमानजी के मंदिर का दरवाजा किसी ने उखाड़कर फेंक दिया था. एक प्रकार से देखा जाए तो वह मोहल्ला भुतहा नजर आ रहा था.

गांधीजी बहुत ही कम आहार लेते थे, केवल बकरी का थोड़ा सा दूध, सूखा मेवा और अंगूर या कोई और फल. बस इतना ही उनका आहार था. इन सभी वस्तुओं की व्यवस्था पहले ही कर ली गई थी. गांधीजी के साथ आए हुए काफिले के लोगों की भोजन व्यवस्था भी इसी पदाधिकारी के यहां थी. भोजन वगैरह संपन्न होने के पश्चात लगभग ढाई बजे गांधीजी काँग्रेस कार्यकर्ताओं की बैठक में पहुँचे.

हमेशा की तरह प्रार्थना के बाद उनकी सभा शुरू हुई. गांधीजी ने हलके हलके मुस्कुराते हुए कार्यकर्ताओं से अपनी बात रखने का आग्रह किया…. और मानो कोई बांध ही फूट पड़ा हो, इस प्रकार सभी कार्यकर्ता धड़ाधड़ बोलने लगे. केवल हिन्दू-सिख कार्यकर्ता ही बचे थे, वे अपने ही नेतृत्व पर बेहद चिढ़े हुए थे. क्रोध में थे. उन्हें अंतिम समय तक यही आशा थी, कि जब गांधीजी ने कहा है, कि “देश का विभाजन नहीं होगा, और यदि हुआ भी तो वह मेरे शरीर के दो टुकड़े होने के बाद ही होगा”, तो चिंता की कोई बात ही नहीं. इस बयान के आधार पर लाहौर के सभी काँग्रेस कार्यकर्ता आश्वस्त थे कि कुछ नहीं होगा.

लेकिन ऐसा नहीं हुआ. तीन जून को ही मानो सब कुछ बदल चुका था. इसी दिन विभाजन की घोषणा हुई थी, और वह भी काँग्रेस की सहमति से. ‘अब अगले आठ-पन्द्रह दिनों के भीतर हम जितना भी सामान समेट सकते हैं, उतना लेकर हमें निर्वासित की तरह भारत में जाना होगा. सम्पूर्ण जीवन मानो उलट-पुलट हो गया हैं, अस्तव्यस्त हो चुका हैं.. जबकि हम सब काँग्रेस के ही कार्यकर्ता हैं…!’

सभी कार्यकर्ताओं ने गांधीजी पर अपने प्रश्नों की बौछार कर दी. गांधीजी भी शांत चित्त से यह सब कुछ सुन रहे थे. वे चुपचाप बैठे थे. अंततः पंजाब काँग्रेस कमेटी के अध्यक्ष ने कार्यकर्ताओं को शांत किया और उन्हें रोकते हुए कहा कि ‘गांधीजी क्या कहना चाहते हैं, कम से कम उन्हें सुन तो लीजिए’.

लाहौर शहर के सात-आठ सौ कार्यकर्ता एकदम शांत हो गए. अब वे बड़ी आशा भरी निगाहों से यह जानने के लिए उत्सुक थे कि आखिर गांधीजी के मुंह से उनके लिए कौन से शब्द मरहम के रूप में निकलते हैं.

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इसी बीच उधर सिंध प्रांत के हैदराबाद में गुरूजी का भोजन समाप्त हो चुका था, और वे वहां के स्वयंसेवकों के साथ बातचीत कर रहे थे. आबाजी ने उन्हें एक-दो बार टोका भी कि, वे कृपया थोड़ी देर आराम कर लें, निद्रा ले लें. परन्तु सिंध प्रान्त के उस विषाक्त वातावरण को देखते हुए गुरूजी के लिए निद्रा तो दूर, थोड़ी देर लेटना भी संभव नहीं था.

हैदराबाद के स्वयंसेवक पिछले वर्ष नेहरू जी के हैदराबाद दौरे का किस्सा सुना रहे थे.

नेहरू जी ने पिछले वर्ष, अर्थात १९४६ में, हैदराबाद में एक आमसभा लेने का सोचा था. उस समय तक विभाजन वाली कोई बात नहीं थी. सिंध प्रांत में मुसलमानों की संख्या गांवों में ही अधिक थी. कराची को छोड़कर लगभग सभी शहर हिन्दू बहुल थे. लरकाना, और शिकारपुर में ६३% हिन्दू जनसंख्या थी, जबकि हैदराबाद में लगभग एक लाख हिन्दू थे, अर्थात ७०% से भी अधिक हिन्दू जनसंख्या थी. इसके बावजूद मुस्लिम लीग की तरफ से देश के विभाजन की मांग वाला आंदोलन जोर शोर से चल रहा था, और यह आंदोलन पूरी तरह हिंसक था. इसीलिए केवल ३०% होने के बावजूद मुसलमानों ने शहर पर अपना दबदबा कायम कर लिया था. सभी सार्वजनिक स्थानों पर हिंदुओं के विरोध में बड़े-बड़े बैनर लगे हुए थे. सिंध प्रांत के मंत्रिमंडल में मुस्लिम लीग का मंत्री खुर्रम तो सरेआम अपने भाषणों में हिंदुओं की लड़कियां उठा ले जाने की धमकियां दे रहा था.

इन दंगाई मुसलमानों की गुंडागर्दी का मुकाबला करने में केवल एक ही संस्था सक्षम सिद्ध हो रही थी, और वह थी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ. हैदराबाद में संघ शाखाओं की अच्छी खासी संख्या थी. प्रांत प्रचारक राजपाल पुरी इस क्षेत्र में नियमित रूप से प्रवास पर आते रहते थे.

इसीलिए जब कांग्रेस कार्यकर्ताओं को यह पता चला कि हैदराबाद में १९४६ में जवाहरलाल नेहरू की होने वाली सभा को मुस्लिम लीग के गुंडे बर्बाद करने वाले हैं तथा नेहरू की हत्या की योजना बना रहे हैं, तब उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए. इस समय सिंध के वरिष्ठ कांग्रेस नेता चिमनदास और लाला कृष्णचंद ने संघ के प्रांत प्रचारक राजपाल पुरी से संपर्क किया और नेहरू की सुरक्षा के लिए संघ स्वयंसेवकों की मदद मांगी. राजपाल जी ने सहमति जताई और मुस्लिम लीग की चुनौती स्वीकार की.

इसके बाद ही हैदराबाद में नेहरू जी की एक विशाल आमसभा हुई, जिसमें संघ के स्वयंसेवकों की सुरक्षा व्यवस्था एकदम चौकस थी. उन्हीं के कारण इस आमसभा में कोई गड़बड़ी नहीं हुई ना ही कोई व्यवधान उत्पन्न हुआ. (सन्दर्भ :- ‘Hindus in Partition – During and After’, www.revitalization.blogspot.in – V. Sundaram, Retd IAS Officer)

गुरूजी के सान्निध्य में हैदराबाद में स्वयंसेवकों का बड़े पैमाने पर एकत्रीकरण हुआ. लगभग दो हजार से अधिक स्वयंसेवक उपस्थित थे. पूर्ण गणवेश में उत्तम सांघिक संपन्न हुआ. इसके पश्चात गुरूजी अपना उदबोधन देने के लिए खड़े हुए. उनके अधिकांश मुद्दे वही थे जो उन्होंने कराची के भाषण में कहे थे. अलबत्ता गुरूजी ने इस बात पर बल दिया कि “नियति ने हमारे संगठन पर एक बड़ी जिम्मेदारी सौंप दी है. परिस्थितियों के कारण राजा दाहिर जैसे वीरों के इस सिंध प्रांत में हमें अस्थायी और तात्कालिक रूप से पीछे हटना पड़ रहा है. इस कारण सभी हिन्दू-सिख बंधुओं को उनके परिवारों सहित सुरक्षित रूप से भारत ले जाने के लिए हमें अपने प्राणों की बाजी लगानी है.”

“इस बात पर हमें पूरा विश्वास और श्रद्धा है कि गुण्डागर्दी और हिंसा के सामने झुककर जो विभाजन स्वीकार किया गया है, वह कृत्रिम है. आज नहीं तो कल हम पुनः अखंड भारत बनेंगे. लेकिन फिलहाल हमारे सामने हिन्दुओं की सुरक्षा का काम अधिक महत्त्वपूर्ण और चुनौती भरा है.” अपने बौद्धिक का समापन करते हुए गुरूजी ने संगठन का महत्त्व प्रतिपादित किया. “अपनी संगठन शक्ति के बल पर ऐसे अनेक असाध्य कार्य हम संपन्न कर सकते हैं, इसलिए धैर्य रखें. संगठन के माध्यम से हमें अपना पुरुषार्थ दिखाना है…”.

इस बौद्धिक के पश्चात गुरूजी स्वयंसेवकों से भेंट करते जा रहे थे. उन्हें हालचाल पूछ रहे थे. ऐसे अस्थिर, विपरीत एवं हिंसक वातावरण में भी गुरूजी के मुख से निकले शब्द स्वयंसेवकों के लिए बहुमूल्य और धैर्य बढाने वाले साबित हो रहे थे… उनका उत्साह बढाने वाले शब्द थे वे.

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उधर लाहौर में कांग्रेस कार्यकर्ताओं की बैठक में गांधीजी ने शांत चित्त से अपना भाषण आरम्भ किया.

“…मुझे यह देखकर बहुत ही बुरा लग रहा है कि पश्चिमी पंजाब से सभी गैर-मुस्लिम लोग पलायन कर रहे हैं. कल ‘वाह’ के शिविर में भी मैंने यही सुना, और आज लाहौर में भी मैं यही सुन रहा हूँ. ऐसा नहीं होना चाहिए. यदि आपको लगता है कि आपका लाहौर शहर अब मृत होने जा रहा है, तो इससे दूर न भागें. बल्कि इस मरते हुए शहर के साथ ही आप भी अपना आत्मबलिदान करते हुए मृत्यु का वरण करें. जब आप भयग्रस्त हो जाते हैं, तब वास्तव में आप मरने से पहले ही मर जाते हैं. यह उचित नहीं है. मुझे कतई बुरा नहीं लगेगा, यदि मुझे यह खबर मिले कि पंजाब के लोगों ने डर के मारे नहीं, बल्कि पूरे धैर्य के साथ मृत्यु का सामना किया…!”

गांधीजी के मुंह से यह वाक्य सुनकर दो मिनट तक तो कांग्रेस कार्यकर्ताओं को समझ में ही नहीं आया कि क्या कहें. वहां बैठे प्रत्येक कांग्रेस कार्यकर्ता को ऐसा लग रहा था मानो किसी ने उबलता हुआ लोहा उनके कानों में उंडेल दिया हो. गांधीजी कह रहे हैं कि ‘मुस्लिम लीग के गुंडों द्वारा किए जा रहे प्राणघातक हमलों के दौरान आने वाली मृत्यु का सामना धैर्य से करें..!” ये कैसी सलाह है?

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लाहौर आते समय ही रास्ते में गांधीजी को एक कार्यकर्ता ने बताया कि “भारत का राष्ट्रध्वज लगभग तैयार हो चुका है. केवल उसके बीच में स्थित चरखे को निकालकर सम्राट अशोक का प्रतीक चिन्ह ‘अशोक चक्र’ रखा गया है”.

यह सुनते ही गांधीजी भड़क गए. चरखा हटाकर सीधे ‘अशोक चक्र’? सम्राट अशोक ने तो भरपूर हिंसा की थी. उसके बाद में बौद्ध पंथ अवश्य स्वीकार किया था. लेकिन उससे पहले तो जबरदस्त हिंसा की थी ना? ऐसे हिंसक राजा का प्रतीक चिन्ह भारत के राष्ट्रध्वज में?? नहीं, कदापि नहीं…. इसीलिए कार्यकर्ताओं की बैठक समाप्त होते ही गांधीजी ने महादेव भाई से तुरंत एक वक्तव्य तैयार करके अखबारों में देने का आदेश दिया.

गांधीजी ने अपना बयान लिखवाया, “मुझे आज पता चला है कि भारत के राष्ट्रध्वज के सम्बन्ध में अंतिम निर्णय लिया जा चुका है. परन्तु यदि इस ध्वज के बीचोंबीच चरखा नहीं होगा, तो मैं इस ध्वज को प्रणाम नहीं करूंगा. आप सभी जानते हैं कि भारत के राष्ट्रध्वज की कल्पना सबसे पहले मैंने ही की थी. और ऐसे में यदि राष्ट्रध्वज के बीच में चरखा नहीं हो, तो ऐसे ध्वज की मैं कल्पना भी नहीं कर सकता…”

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६ अगस्त की शाम…. मुम्बई के आकाश में हल्के-फुल्के बादल हैं. बारिश की संभावना नहीं के बराबर हैं.

मध्य मुम्बई के एक प्रतिष्ठित सभागार में मुंबई के समस्त अधिवक्ताओं के संगठन का एक कार्यक्रम रखा गया हैं, जिसमें स्वतंत्र भारत के पहले क़ानून मंत्री डॉक्टर बाबासाहब अम्बेडकर का स्वागत और सत्कार किया जाना हैं.

कार्यक्रम शानदार तरीके से संपन्न हुआ. बाबासाहब ने भी पूरे मनोयोग से अपना भाषण दिया. भारत की पूर्वी और पश्चिमी सीमा पर फैले दंगों और हिंसात्मक वातावरण पर भी वे बोले. पाकिस्तान के सम्बन्ध में उनके विचार एक बार पुनः उन्होंने अपने मजबूत तर्कों के साथ रखे. जनसंख्या की शांतिपूर्ण अदलाबदली की आवश्यकता भी उन्होंने बताई.

कुल मिलाकर यह कार्यक्रम बेहद सफल रहा. बाबासाहब ने पाकिस्तान और मुसलमानों से सम्बंधित उनकी भूमिका और विचार स्पष्ट रूप से समझाए एवं अधिकांश वकीलों को उनके तर्क समझ में भी आ रहे थे.

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६ अगस्त की रात को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक गुरूजी सिंध प्रांत के हैदराबाद में हिन्दुओं के भविष्य की योजना बनाकर उन्हें सुरक्षित रूप से भारत लाने के बारे में विचार करने में मग्न थे, जबकि उनके सोने का समय भी हो चुका था. उधर गांधीजी एक घंटे पहले ही लाहौर से पटना होते हुए कलकत्ता के लिये रवाना हो चुके थे. उनकी ट्रेन अमृतसर-अम्बाला-मुरादाबाद-वाराणसी होते हुए तीस घंटे में पटना पहुंचने वाली थी.

स्वतंत्र किन्तु खंडित भारत के भावी प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, दिल्ली के अपने ’१७, यॉर्क रोड’ वाले निवास स्थान पर व्यक्तिगत पत्र लिखने में मशगूल थे. उनके सोने की तैयारी पूरी हो चुकी थी. उधर दिल्ली में ही भारत के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल उन सभी रजवाड़ों और रियासतों की फाईलें लेकर बैठे थे जिन्हें भारत में शामिल होना या नहीं होना है. अब बहुत ही कम समय बचा हुआ हैं और जितनी भी बची-खुची रियासतें हैं, उन्हें भी भारत में शामिल करना उनका प्रथम लक्ष्य हैं.

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जैसे-जैसे छह अगस्त की रात, काली और घनी अंधेरी होती जा रही थी, वैसे-वैसे पश्चिम पंजाब, पूर्वी बंगाल, सिंध, बलूचिस्तान इत्यादि स्थानों पर रहने वाले हिदू-सिखों के मकानों पर भय की छाया और गहरी होती जा रही थी. हिन्दु और सिखों के घरों, परिवारों और विशेषकर लड़कियों पर हमले लगातार तीव्र होते जा रहे थे. सीमावर्ती इलाकों में हिन्दुओं के मकानों में लगी आग की ज्वालाओं को दूर से देखा जा सकता था…! स्वतंत्रता के दिशा में जानेवाला एक और दिन समाप्त हो रहा था

 

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ऑपरेशन ब्लू स्टार: विनाशकारी प्रभाव के साथ एक गैर-कल्पना ऑपरेशन

– (जयबंस सिंह एक भू-रणनीतिक विश्लेषक, स्तंभकार और लेखक हैं)

– (जयबंस सिंह एक भू-रणनीतिक विश्लेषक, स्तंभकार और लेखक हैं)

भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा ऑपरेशन ब्लू स्टार नामक एक सैन्य हमले को पवित्रतम सिख मंदिर, हरमंदिर साहिब पर सात दिनों से अधिक, 1 जून से 7 जून, 1984 तक किया गया। इसे सिखों द्वारा तीज के रूप में संदर्भित किया जाता है। घल्लूघरा (सिखों का तीसरा नरसंहार / प्रलय), पहले दो क्रमशः 1746 और 1762 में हुए, जब अफगानों ने सिखों को महिलाओं और बच्चों सहित घेर लिया, और फिर बिना पछतावे के नरसंहार किया।
कथित तौर पर, धार्मिक नेता संत जरनैल सिंह भिंडरावाले के नेतृत्व में सिख आतंकवादियों के मंदिर को खाली कराने के लिए हमला किया गया था, जिन्होंने वहां शरण ली थी। यह कहा गया कि उनकी गिरफ्तारी की मांग को लेकर संसद के दोनों सदनों के सदस्यों के साथ राजनीतिक दबाव को देखते हुए यह हमला लाजमी था
अब यह तर्क दिया जा रहा है कि किसी भी अदालत में संत भिंडरावाले के खिलाफ कोई मामला नहीं था और न ही उनके खिलाफ कोई चार्जशीट दायर की गई थी, इसलिए, इस तरह की कठोर कार्रवाई और उन्हें गिरफ्तार करने के लिए अभूतपूर्व हिंसा अतिरिक्त-संवैधानिक, गैरकानूनी और गैर-कानूनी थी।
दुर्भाग्यपूर्ण हमले में दो अतिरिक्त कारक बाहर खड़े हैं। पहला, भारतीय सेना का यह गलत विश्वास कि यह संत भिंडरावाले और उनके अनुयायियों को थोड़े समय के भीतर नगण्य हताहतों के साथ निकालने में सक्षम होगा। दूसरा, संत भिंडरावाले की यह धारणा कि भारत सरकार पवित्र हरमंदिर साहिब पर हमले का आदेश देने की हिम्मत नहीं करेगी। दोनों दल अपने आकलन में भयानक गलत थे और परिणाम एकदम विनाश और तबाही था
संत भिंडरावाले और उनके अनुयायियों को मंदिर के अंदर मार दिया गया था, क्योंकि कई निर्दोष नागरिक थे जो मंदिर में पूजा करने के लिए गए थे और कार्रवाई शुरू होने पर वहां फंस गए।
पवित्र प्रवृत्ति के निकट विनाश और कई हताहतों ने सिखों के मानस पर गहरा नकारात्मक प्रभाव छोड़ा, जिन्होंने पहले से ही सरकार के खिलाफ महान अविश्वास और संदेह का सामना किया।
समस्या को हल करने के बजाय, हमले ने एक बड़ा मुद्दा बनाया। पांच महीने के भीतर, 31 अक्टूबर, 1984 को, उनके सिख अंगरक्षकों, सतवंत सिंह और बेअंत सिंह द्वारा और उसके बाद हुए देश भर में हुए सिख विरोधी दंगों के द्वारा प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की भीषण हत्या हुई। पंजाब में मिलिटेंसी कई सालों तक जारी रही और हजारों युवा सिख लड़कों, सुरक्षा बल के जवानों और निर्दोष नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया।
यह बिना कारण नहीं है कि हमले को सिखों द्वारा एक प्रलय के रूप में संदर्भित किया जाता है, घटना के 36 साल बाद भी कुल मिलाप उन्हें बाहर निकालना जारी रखता है।
हरमंदिर साहिब पर हमला, खालिस्तान आंदोलन, सिख राष्ट्रवादी पहल का एक उप-उत्पाद था जो सिख लोगों के लिए एक स्वतंत्र राज्य बनाने की आकांक्षा रखता था। ऑपरेशन से कुछ साल पहले, खालिस्तान आंदोलन के एक हिस्से के रूप में उग्रवाद ने पंजाब में मजबूत जड़ें जमा ली थीं और संत भिंडरावाले इसका सबसे प्रमुख चेहरा थे, जिसका मुख्य कारण उनके विनीत बयानों और अतिवादी विचारों के कारण था। प्रारंभ में, उन्होंने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पारित करने का एक एजेंडा तय किया, लेकिन, यहां उन्होंने एक सड़क ब्लॉक के साथ मुलाकात की, क्योंकि इंदिरा गांधी सरकार ने इसे एक अलगाववादी दस्तावेज माना था। राजनीतिक मिशन में असफल होने के बाद, संत भिंडरावाले ने सभी सिखों की प्राथमिक आकांक्षा के रूप में आवश्यक होने पर बल के उपयोग से खालिस्तान के निर्माण की घोषणा की।
24 अप्रैल, 1980 को निरंकारी संप्रदाय के प्रमुख बाबा गुरबचन सिंह की हत्या कर दी गई थी। उनका संप्रदाय, लंबे समय से, संत भिंडरावाले की अध्यक्षता वाली दमदमी टकसाल के साथ लॉगरहेड्स में था। 9 सितंबर 1981 को, अखबार केसरी के संस्थापक संपादक लाला जगत नारायण की हत्या कर दी गई थी। उन्हें निरंकारी संप्रदाय के समर्थक के रूप में देखा गया था और उन्होंने कई संपादकीय लिखे थे, जिन्होंने भिंडरावाले के कृत्यों की निंदा की थी।
जबकि संत भिंडरावाले हरमंदिर साहिब के भीतर थे, पंजाब में हिंसक गतिविधियां बेरोकटोक जारी थीं। 23 अप्रैल, अप्रैल, 1983 को, पंजाब पुलिस के उप महानिरीक्षक ए.एस. अटवाल की भिंडरावाले समूह के एक बंदूकधारी ने गोली मारकर हत्या कर दी थी क्योंकि उन्होंने हरमंदिर साहिब कंपाउंड छोड़ दिया था। 12 मई, 1984 को, लाला जगत नारायण के बेटे रमेश चंदर और हिंद समचार मीडिया समूह के संपादक, भिंडरावाले के आतंकवादियों ने हत्या कर दी थी
सरकार संत भिंडरावाले को गिरफ्तार करने और आवश्यक आदेशों को देखने के लिए उत्सुक थी, जिनकी पवित्रता पर सवाल उठाए जाते हैं, 19 जुलाई, 1982 को पारित किए गए। भाई अमरीक सिंह, दमदम टकसाल से ऑल इंडिया सिख स्टूडेंट्स फेडरेशन के अध्यक्ष और एक और सहयोगी थे उसके साथ गिरफ्तार भी किया जाए। इन आदेशों के कारण, उपायुक्त, अमृतसर के निवास के बाहर कई सिखों ने एक धरना (विरोध) किया।
हरचंद सिंह लोंगोवाल जैसे अकाली नेताओं की गिरफ्तारी से बचने के लिए, संत भिंडरावाले ने हरमंदिर साहिब परिसर में आकर अपने लगभग 200 सशस्त्र अनुयायियों के साथ गुरु नानक निवास में निवास किया। हर दिन 51 सिखों का एक समूह सरकारी कार्यालयों और अदालत में गिरफ्तारी के लिए जाता है। 4 अगस्त, 1982 तक, अकाली दल भी इस आंदोलन में शामिल हो गया था और इसे "धार्मिक युद्ध" का रूप मिला। समूह ने 19, जुलाई, 1982 से 01, जून, 1984 तक कई पहलुओं को बदल दिया
जब पवित्र मंदिर पर हमला हुआ। हरचंद सिंह लोंगोवाल जैसे कुछ सिख नेताओं ने संत भिंडरावाले की गिरफ्तारी के लिए बातचीत करने का प्रयास किया, लेकिन दोनों पक्षों द्वारा लिए गए अनम्य पदों के कारण वे सफल नहीं हुए।
सरकार ने मंदिर परिसर से संत भिंडरावाले का अपहरण करने और एक वरिष्ठ राजनेता, पीवी नरसिम्हा राव को संत की गिरफ्तारी के लिए वार्ताकार के रूप में भेजने के लिए एक संभावित गुप्त अभियान सहित कई विकल्पों को देखा। प्रयासों का कोई फल नहीं हुआ। 26 मई, 1984 को, वरिष्ठ अकाली नेता गुरुचरण सिंह टोहरा ने सरकार को सूचित किया कि वह शांतिपूर्ण समाधान के लिए भिंडरावाले को सहमत करने में विफल रहे हैं।
सरकार के इस तरह के कठोर निर्णय लेने का एक और बड़ा कारण यह था कि पाकिस्तान लगातार सैन्य और मनोवैज्ञानिक क्षेत्र में राज्य में अपनी भागीदारी बढ़ा रहा था। खुफिया रिपोर्टों ने सुझाव दिया कि पाकिस्तान न केवल हथियारों और गोला-बारूद के प्रावधान में मदद करने के लिए तैयार था, बल्कि स्वतंत्रता सेनानियों की आड़ में तस्करी भी करता था।
यह व्यापक रूप से माना जाता है कि उक्त कारक संचयी रूप से संत भिंडरावाले और उनके अनुयायियों को बाहर निकालने के लिए मंदिर पर हमला करने की योजना का ट्रिगर बन गए। बेशक, थोड़े से समय के साथ थोड़े समय के अंतराल में "दगाबाज़" को बाहर निकालने की सेना द्वारा दिए गए विश्वास ने प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी को हरी झंडी दिखाने में एक प्रमुख भूमिका निभाई।

जिस तरह से वातावरण विकसित हो रहा था, उससे मंदिर परिसर में छिपे उग्रवादियों के लिए यह स्पष्ट हो गया था कि उन्हें कम से कम उस समय तक अपनी रक्षा करने की आवश्यकता होगी, जब तक कि देश भर के सिख विद्रोह में नहीं उठते हैं और एक समझौता वार्ता की जा सकती है। । इसलिए मंदिर परिसर को एक आधुनिक आधुनिक किले में बदल दिया गया। नौकरी मुख्य रूप से भारतीय सेना के एक सिख जनरल मेजर जनरल शबेग सिंह द्वारा की गई थी, जिन्हें सेवा से कैश किया गया था। उन्हें बांग्लादेशी क्रांतिकारियों (मुक्ति बाहिनी) के प्रशिक्षण के पीछे सैन्य मास्टरमाइंड के रूप में जाना जाता था। जिन वरिष्ठ सैन्य कमांडरों ने हमले की योजना बनाई थी, उन्हें बहुत महत्वपूर्ण कारक को ध्यान में रखना चाहिए, दुख की बात है कि उन्होंने नहीं किया। टैंक-विरोधी हथियार सहित आवश्यक हथियार, पाकिस्तान से खरीदे गए और समय के साथ जटिल रूप से तस्करी किए गए। संत और उनके अनुयायी, जैसे, भारतीय सेना उन पर क्या फेंकती है, इसके लिए बिल्कुल तैयार थे।घटनाओं के अनुक्रम के कई संस्करण हैं जो ऑपरेशन ब्लू स्टार के लॉन्च के बाद हुए। ओपन मीडिया डोमेन में एक संस्करण यहां दिया गया है। यह पूरी तरह से प्रामाणिक हो सकता है या नहीं भी लेकिन काफी स्वीकार्य है।
समग्र ऑपरेशन को तीन भागों में विभाजित किया गया था: -
• ऑपरेशन मेटल: स्वर्ण मंदिर परिसर से भिंडरावाले सहित आतंकवादियों को बाहर निकालना।
• ऑपरेशन शॉप: पूरे पंजाब राज्य में चरमपंथी ठिकाने पर छापा मारने और देश में शेष बचे आतंकवादियों को मोप करने के लिए।
• ऑपरेशन वुड्रोस: पाकिस्तान के साथ सीमा को सील करने और उग्रवादी तत्वों के पंजाब में अन्य गुरुद्वारा को खाली करने के लिए।
प्रारंभिक चरण में, सेना के लगभग सात विभाग पंजाब में ही ऑपरेशन में शामिल थे। इनमें सीमा पर पहले से ही रक्षात्मक मुद्रा में सैनिक शामिल थे और आतंकवादियों के समर्थन में एक पाकिस्तानी दुस्साहसियों के खिलाफ सीलिंग के लिए आवश्यक वृद्धि। LOC के साथ ही सीलिंग भी की गई और पाकिस्तान के साथ सीमा भी
मेजर जनरल केएस बरार (जिसे बुलबुल बरार के नाम से जाना जाता है) की कमान में मेरठ स्थित 9 डिवीजन को वास्तविक हमले (ऑपरेशन मेटल) के लिए शाब्दिक रूप से चलाया गया था। लेफ्टिनेंट जनरल के सुंदरजी आर्मी कमांडर पश्चिमी कमान और ऑपरेशन ब्लू स्टार के समग्र कमांड में थे। थल सेनाध्यक्ष जनरल वैद्य थे।
ऑपरेशन पूर्ण मीडिया ब्लैकआउट, स्थानीय कर्फ्यू और स्थानीय परिवहन के निलंबन के तहत किया गया था। पंजाब में रेल, सड़क और हवाई सेवा निलंबित कर दी गई। विदेशियों और अनिवासी भारतीयों को प्रवेश से वंचित कर दिया गया। पिछले कुछ दिनों में बिजली और पानी भी कट गए।
गोल्डन टेंपल के अंदर Das गुरु राम दास लंगर ’इमारत पर हमले के साथ जून 1, 1984 में ऑपरेशन शुरू हुआ। हैरानी की बात है कि हमले के लिए तैयार होने के बावजूद, पांचवें सिख गुरु, गुरु अर्जन देव जी के शहादत दिवस को मनाने के लिए नागरिकों को जून, 3 को मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति दी गई थी। शाम को उन्हें छोड़ने के लिए कहा गया था। यह व्यापक रूप से माना जाता है कि अवकाश आदेश दिए जाने पर सभी नागरिक मंदिर परिसर को नहीं छोड़ सकते थे; संभवतः उन्हें आतंकवादियों द्वारा मानव ढाल के रूप में बाद में इस्तेमाल करने के लिए हिरासत में लिया गया था। इसके बजाय जो छोड़ गए वे सिख अपराधी और कम्युनिस्ट थे, जो पहले नष्ट हो गए थे, लेकिन तब लड़ाई के लिए पेट नहीं था।
अंतिम हमला दो दिनों से जून, 5 से 7 जून तक हुआ, जब परिसर को आतंकवादियों से मुक्त घोषित किया गया और संत जरनैल सिंह भिंडरावाले की हत्या की घोषणा की गई
"रब्बल" के खिलाफ पेशेवर इन्फैंट्री सैनिकों द्वारा हमला किया जाना चाहिए था, अंततः टैंक, आर्टिलरी और कमांडो को भी तैनात किया गया था। आतंकवादियों में होली से वापसी की आग एंटी-टैंक रॉकेट से ग्रेनेड को लेकर आई थी। अकाल तख्त जहां संत भिंडरावाले स्थित था, को सचमुच टैंक की आग से जमीन तक उठाया गया था। टेंक मंदिर परिसर के द्वार पर बंद रेंज में था।
दुर्भावनापूर्ण हमले में 493 मारे गए और 236 घायल हो गए। सेना को 83 मारे गए (4 अधिकारी और 79 सैनिक) मारे गए। यह व्यापक रूप से महसूस किया जाता है कि मरने वालों की संख्या घोषित की गई तुलना में बहुत अधिक थी। इतना ही नहीं, एक बार जब मंदिर परिसर को आतंकवादियों से मुक्त घोषित किया गया था, राष्ट्रपति ज़ैल सिंह एक यात्रा के लिए आए थे और परिसर के भीतर छिपे एक आतंकवादी द्वारा गोली मार दी गई थी। गोली चली और सेना कर्नल जो उसके साथ था।
ऑपरेशन ने कई देशों द्वारा निंदा की। दुनिया भर में आलोचना और मानवाधिकार संगठनों द्वारा कई शिकायतें। दुनिया भर में सिख तबाह हो गए। यह ऑपरेशन बहुत ही मार्मिक काल के दौरान किया गया था, जब सिख अपने पांचवें गुरु की शहादत की याद कर रहे थे, उनके लिए और भी अधिक वीरता थी। कई सिख सैनिकों ने अपनी इकाइयाँ और प्रख्यात सिख हस्तियों को पुरस्कार लौटा दिए, जो उन्हें राज्य से मिले थे।
पांच साल बाद, मंदिर परिसर को एक बार फिर आतंकवादियों द्वारा "नाकाबंदी दृष्टिकोण" के रूप में मंजूरी दे दी गई, जैसा कि पंजाब पुलिस के तत्कालीन महानिदेशक केपीएस गिल ने कल्पना की थी। ऑपरेशन की सफलता, ऑपरेशन ब्लैक थंडर नाम के कोड ने साबित किया कि सेना द्वारा किए गए एकमुश्त हमले के विकल्प थे। ऑपरेशन पर कई किताबें और वृत्तचित्र बनाए गए हैं। एक महत्वपूर्ण सबक हमारे अपने लोगों के खिलाफ बल का उपयोग करने से पहले सभी संभावित विकल्पों की कोशिश करना है और, जब आवश्यक हो, इसे न्यूनतम सीमा तक सीमित करें। स्नातक की प्रतिक्रिया पर काम करते समय धैर्य के साथ बेहतर राजनीतिक और सैन्य निर्णय हमेशा बेहतर लाभांश का भुगतान करेगा। उन्मत्त निर्णय लेने से जटिल बल का एक वृद्धिशील उपयोग एक महान और परिपक्व राष्ट्र का संकेत नहीं है
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मोदी सरकार पिता के साए जैसी : ‘विजय भवभारत’

भवभारत’ विदेश से लाए युवक ने कहा है कि ऐसी व्यवस्था तो उसने जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों में भी नहीं देखी है। शख्स बता रहा है कि सरकार ने करीब 70 किलोमीटर दूर सभी पैसेंजर को कोरोन्टाइन किया है

विदेश से लाए युवक ने कहा है कि ऐसी व्यवस्था तो उसने जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों में भी नहीं देखी है। शख्स बता रहा है कि सरकार ने करीब 70 किलोमीटर दूर सभी पैसेंजर को कोरोन्टाइन किया है । बिल्डिंग को लगातार सैनेटाइज किया जा रहाहै। उन्हें 24 घंटे की देख रेख में रखा है, जहॉं बेहतरीन सुविधाएँ हैं। भवभारत’ विदेश से लाए युवक ने कहा है कि ऐसी व्यवस्था तो उसने जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों में भी नहीं देखी है। शख्स बता रहा है कि सरकार ने करीब 70 किलोमीटर दूर सभी पैसेंजर को कोरोन्टाइन किया है। बिल्डिंग को लगातार सैनेटाइज किया जा रहा है। उन्हें 24 घंटे की देख रेख में रखा है , जहॉं बेहतरीन सुविधाएँ हैं ।

विजय भव भारत का फेसबुक पेज, 24,000 से अधिक फौलोवेर्स.

जहाँ एक और पूरी दुनिया कोरोना (महामारी) से लडर ही है, हर देश इसकी रोकथाम में लगा हुआ है अपने नागरिकों के बचाव में हर कोशिश कर रहा है, वहीं भारत की कोशिशों की विश्वपटल सरहाना हो रही है। कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी भले इस वैश्विक महामारी को मोदी सरकार पर हमले के मौके की तरह तलाश कर रहे हैं, लेकिन सोशल मीडिया में सरकार की तारीफ करते हुए कुछ लोगों ने जो आपबीती शेयर की है जो बेहद मार्मिक है। हालफिलाहल इटली से लाई गई एक युवती के पिता ने अपनी भावना साझा कि, वो सालों से सरकार की आलोचना कर रहे थे। लेकिन, अब उन्हें एहसास हो रहा है कि मोदी सरकार पिता के साए (fatherly figure) जैसी है। विदेश से लाए गए एक युवक ने कहा है कि ऐसी व्यवस्था तो उसने जर्मनी जैसे यूरोपीय मुल्कों में भी नहीं देखी है।टाइम्स ऑफ इंडिया के पत्रकार रोहन दुआ ने इटली से लौटी युवती के पिता का पत्र शेयर किया है। इस पत्र में उन्होंने इंडियन एंबेसी, भारत सरकार और विशेषत: नरेंद्र मोदी को धन्यवाद दिया है। पिता के मुताबिक उनकी बेटी मास्टर की पढ़ाई करने इटली के मिलान गई थी। वहॉं हालात बिगड़ने पर उसे वापस लौटने को कहा। जब वह लौटने लगी तो उससे भारत वापस जाने का सर्टिफिकेट माँगा गया। न्होंने खुद इंडियन एंबेसी को संपर्क करने की कोशिश की। मगर मिलान में एंबेसी का कार्यालय बंद होने के कारण ऐसा नहीं हो पाया। उन्होंने इंडियन एंबेसी के अन्य लोगों को मेल के जरिए संपर्क किया और रात के 10:30 बजे उनकी बेटी ने फोन पर बताया कि उसकी बात दूतावास में हो गई है और वह अगली फ्लाइट से भारत लौट रही है।

पिता के मुताबिक, वे सालों से भारतीय सरकार को कोस रहे थे। लेकिन मोदी सरकार में पिता का चेहरा है। उन्होंने बताया कि उनकी बेटी 15 मार्च को भारत आई और आईटीबीपी अस्पताल में उसकी स्वास्थ्य संबंधी, खान-पान संबंधी सभी जरूरतों का ख्याल रखा गया। गौरतलब है कि इटली उन देशों में शामिल है जो कोरोना संक्रमण से सर्वाधिक प्रभावित हैं।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार कोरोना वायरस के संक्रमण से निबटने के लिए सरकार ने 400 बेड का कोरोन्टाइन वार्ड तैयार करवाया है। यहाँ विदेश से लौटने वालों को सीधे दिल्ली एयरपोर्ट से लेकर जाया जाएगा। यहाँ इन सभी लोगों की 14 तक की निगरानी होगी और अगर इनमें कोरोना के लक्षण मिलते हैं तो इन्हें आइसोलेट कर छोड़ा जाएगा। ये कोरोन्टाइन वार्ड नोयडा के सेक्टर 39 में स्थित जिला अस्पताल की नई बिल्डिंग में बना है। यहाँ पर्याप्त संख्या में पैरामेडिकल स्टॉफ तैनात हैं।

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इन टीमों के जरिये समझिये समाज की सच्चाई को: ‘विजय भवभारत’

समाज की सच्चाई को दिखाने का बीड़ा उठाने वालों में से एक नाम ‘विजय भव भारत’ का भी है

21वीं सदी के दो दशक बीतते तक मीडिया को किस तरह से टुकड़े टुकड़े गैंग ने बर्बाद कर दिया और मीडिया ने किस तरह से समाज को बर्बाद किया, यह हम सभी जानते हैं और टुकड़े टुकड़े गैंग व् मीडिया में बैठे उनके नेटवर्क को भी हम समझ चुके हैं. उस नेटवर्क को तोड़ने और मीडिया में जमे इस कचरे की सफाई का जिम्मा जिनसोशल मीडिया के पोर्टलों ने ली है, उनकी श्रृंखला में एक और नाम की चर्चा इस लेख में हम करेंगे. इस बार चर्चा है फेसबुक कैलेंडर पेज –‘विजय भव भारत’ की

विजय भव भारत का फेसबुक पेज, 24,000 से अधिक फौलोवेर्स.

यूँ तो साहित्य समाज का दर्पण कहा जाता था और बाद में मीडिया ने इसकी जगह ले ली, मगर समाज की सच्चाई को समाज का यह दर्पण दिखा नहीं पाया और ख़बरों को व् समाज की सच्चाई को तोड़ मरोड़ कर पेश करने का आरोप मीडिया पर लगने लगा. ऐसे में समाज की सच्चाई को दिखाने का बीड़ा उठाने वालों में से एक नाम ‘विजय भव भारत’ का भी है.

विजय भव भारत

‘विजय भव भारत’ पेज का संचालन फेसबुक पर होता है, जहाँइसे फॉलो करने वाले 24,000 से भी अधिक लोग हैं. यह पेज जाना जाता है समाज में चलने वाले सकारात्मक कामों के प्रचार प्रसार के लिए, जो आम मीडिया कीनज़रों से दूर हैं. इसके साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों पर भी यह पेज नज़र रखता है, और उनसे जुडी तकरीबन हर जानकारी अपने दर्शकों तक पहुँचाता है. विजय भव भारत पेज का एक और काम 365दिनों के विशेष घटनाओं को अपने पेज से जनता तक पहुँचाना भी है. इसका एक नाम ‘कैलेंडर विशेष’ भी है. इनके अतिरिक्त समसामयिक घटनाओं पर पोस्ट व् विडियो डालना भी इस पेज का काम है.

सकारात्मक कामों का प्रचार प्रसार:

विजय भव भारत जिस काम में लगा है, शायद वह काम मीडिया का कोई भी तंत्र नहीं कर पायेगा क्योंकि इस काम में मीडिया को मसाला नहीं मिलेगा बल्कि मेहनत करनी पड़ेगी. मीडिया का एक तंत्र जहाँ केवल टीआरपी बढाने और ख़बर बेचने में लगा है, वहीँ सोशल मीडिया पर विजय भव भारत- दुनिया व् भारत की कुछ बेहतरीन सकारात्मक ख़बरें खोज कर ला रहा है और अपने पेज के माध्यम से साझा कर रहा है. सोशल मीडिया से नकारात्मकता हटाने का यह कदम सराहनीय है. समाज की यह सच्चाई जो छिपी हुई है, उसे खोज निकलने का यह काम विजय भव भारत कर रहा है.

कोरोना से बचाव के लिए दुनिया ने अपनाई भारतीय संस्कृति

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों पर नज़र:                            दुनिया का सबसे बड़ा गैर सरकारी संगठन है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और समाज निर्माण के काम में इसके योगदान को नकारना मुर्खता होगी. महात्मा गाँधी जी से लेकर अन्य कई महापुरुष संघ के बारे में सकारात्मक विचार रख चुके हैं, ऐसे में इस संगठन के कामकाज पर भी नज़र रखे हुए है. इससे पहले कि मीडिया संघ के कामकाज को तोड़ मरोड़ का या अपने अनुरूप पेश करे, विजय भव भारत संघ के विशिष्ट स्त्रोतों से संघसे जुडी प्रमाणिक ख़बरें लेकर आता है और समाज से उसका क्या लेना देना है, यह भी स्पष्ट करता है.

विश्व के सबसे बड़े गैर सरकारी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों पर नज़र.

कैलेंडरविशेष दिन:

विजय भव भारत जिन महत्वपूर्ण सकारात्मक कामों में लगा हुआ है, उनमे से एक कैलेंडर विशेष दिन भी है. साल में 365 दिन होते हैं, और तकरीबन हर दिन महत्वपूर्ण होता है. उन सभी दिनों की विशेषता और महत्त्व बताने का काम भी विजय भव भारत करता है. चाहे किसी महापुरुष का जन्मदिन या पुण्यतिथि हो या कोई स्मरणीय घटना की बात हो, उनके महत्त्व को समझाने का काम भी विजय भव भारत करता है.

16 सितम्बर 1947, गाँधीजी द्वारा छूआछूत की समाप्ति पर राष्ट्रीयस्वयंसेवक संघ के काम पर चर्चा.

समसामयिक घटनाओं पर नज़र:

जब समाज में सकारात्मकता भरने का काम और समाज से नकारात्मकता हटाने का काम विजय भव भारत कर रहा है तो यह तो असंभव है कि ऐसे में समकालीन घटनाओं को न जोड़ा जाये. वर्तमान में घटने वाली हर घटना पर समाज की प्रतिक्रिया, सही ख़बर, तथ्य परक, और प्रमाणिक ख़बरें विडियो और पोस्टर के माध्यम से अपने फौलोवर्स तक विजय भव भारत पहुँचाता है.

राम मंदिर पर शिया वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिज़वी का स्पष्ट बयान. 10 लाख से ज्यादा लोगों द्वारा देखा गया, 50 हज़ार से ज्यादा लोगों द्वारा साझा किया गया.

अपने इस प्रयास के माध्यम से विजय भव भारत ने सोशल मीडिया पर एक ऐसा विमर्श खडा किया है जो सकारात्मक है, प्रमाणिक है और नकारात्मकता को तोड़ने वाला है. जिन ख़बरों में मीडिया की दिलचस्पी नहीं होती मगर समाज के लिए आवश्यक है – उन्हें खोज कर लाने का काम यह पेज कर रहा है.

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