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वे पन्द्रह दिन…. भाग 4/15

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आज चार अगस्त… सोमवार.

दिल्ली में वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन की दिनचर्या, रोज के मुकाबले जरा जल्दी प्रारम्भ हुई. दिल्ली का वातावरण उमस भरा था, बादल घिरे हुए थे, लेकिन बारिश नहीं हो रही थी. कुल मिलाकर पूरा वातावरण निराशाजनक और एक बेचैनी से भरा था. वास्तव में देखा जाए तो सारी जिम्मेदारियों से मुक्त होने के लिए माउंटबेटन के सामने अभी ग्यारह रातें और बाकी थीं. हालांकि उसके बाद भी वे भारत में ही रहने वाले थे, भारत के पहले ‘गवर्नर जनरल’ के रूप में. लेकिन उस पद पर कोई खास जिम्मेदारी नहीं रहने वाली थी, क्योंकि १५ अगस्त के बाद तो सब कुछ भारतीय नेताओं के कंधे पर आने वाला ही था.

परन्तु अगले ग्यारह दिन और ग्यारह रातें लॉर्ड माउंटबेटन के नियंत्रण में ही रहने वाली थीं. इन दिनों में घटित होने वाली सभी अच्छी-बुरी घटनाओं का दोष अथवा प्रशंसा उन्हीं के माथे पर, अर्थात ब्रिटिश साम्राज्य के माथे पर आने वाली थी. इसीलिए यह जिम्मेदारी बहुत बड़ी थी और उतनी ही उनकी चिंताएं भी…

सुबह की पहली बैठक बलूचिस्तान प्रांत के सम्बन्ध में थी. फिलहाल इस सम्पूर्ण क्षेत्र में अंग्रेजों का निर्विवाद वर्चस्व बना हुआ था. ईरान की सीमा से लगा यह प्रांत, मुस्लिम बहुल था. इस कारण ऐसा माना जा रहा था कि यह प्रांत तो पाकिस्तान में शामिल हो ही जाएगा. लेकिन इस कल्पना में एक पेंच था. बलूच लोगों के तार, संस्कृति एवं मन, कभी भी पाकिस्तान के पंजाब और सिंध प्रांत के मुसलमानों से जुड़े हुए नहीं थे. बलूच लोगों की अपनी एक अलग विशिष्ट संस्कृति थी, स्वयं की अलग भाषा थी. बलूच भाषा काफी कुछ ईरान के सीमावर्ती बलूच लोगों से मिलती-जुलती थी. इस बलूच भाषा और संस्कृति में ‘अवस्ता’ नामक भाषा की झलक दिखाई देती थी, जो कि संस्कृत भाषा से मिलती हुई थी. इसी कारण पाकिस्तान में शामिल होना कभी भी बलूच जनता के सामने पहला या अंतिम विकल्प नहीं था.

बलूच जनता का मत भी दो भागों में बंटा हुआ था. कुछ लोगों की इच्छा थी कि बलूचों को ईरान में विलीन करना चाहिए. लेकिन समस्या यह थी कि ईरान में शिया मुसलमानों का शासन था और बलूच तो सुन्नी मुसलमान थे. इस कारण वह विकल्प खारिज कर दिया गया. अधिकांश नेताओं का मानना था कि भारत के साथ मिलना अधिक सही होगा. इस विचार को कई नेताओं का समर्थन भी हासिल था. लेकिन भौगोलिक समस्या आड़े आ रही थी. बलूच प्रांत और भारत के बीच में पंजाब और सिंध का इलाका आता था, तो इस विकल्प को भी मजबूरी में खारिज करना पड़ा. अंततः दो ही विकल्प बचे थे कि या तो बलूचिस्तान एक स्वतन्त्र राष्ट्र के रूप में रहे या फिर मजबूरी में पाकिस्तान के साथ मिल जाए, जहां संभवतः सुन्नियों का बहुमत रहेगा. माउंटबेटन की आज की बैठक इसी विषय को लेकर होने जा रही थी.

इस विशेष बैठक में बलूचिस्तान के ‘खान ऑफ कलात’ कहे जाने वाले मीर अहमद यार खान और मोहम्मद अली जिन्ना शामिल थे. जिन्ना को सात अगस्त के दिन कराची जाना था इसीलिए उनकी सुविधा को देखते हुए चार अगस्त के दिन सुबह यह बैठक रखी गई थी.

इस बैठक में मीर अहमद यार खान ने, ‘भविष्य के पाकिस्तान’ के सन्दर्भ में अनेक शंकाएं उपस्थित की. उनके अनेक प्रश्न थे. माउंटबेटन का स्वार्थ यह था कि बलूचिस्तान को पाकिस्तान में विलीन हो जाना चाहिए. क्योंकि छोटे-छोटे स्वतन्त्र देशों के बीच सत्ता का हस्तांतरण करना उनके लिए कठिन कार्य था. इसीलिए जब इस बैठक में मोहम्मद अली जिन्ना, बलूच नेता मीर अहमद यार खान को बड़े-बड़े भारी भरकम आश्वासन दे रहे थे, उस समय लॉर्ड माउंटबेटन यह साफ-साफ़ समझ रहे थे कि ये आश्वासन खोखले साबित होने वाले हैं. परन्तु फिर भी अपनी परेशानी कम करने के लिए वे जिन्ना के समर्थन में हां में हां मिलाते रहे. डेढ़-दो घंटे चली इस महत्त्वपूर्ण बैठक के अंत में मीर अहमद यार खान पाकिस्तान में विलीन होने के पक्ष में थोड़े से झुके हुए दिखाई दिये. परन्तु फिर भी उन्होंने अपना अंतिम निर्णय घोषित नहीं किया और यह बैठक अनिर्णय की स्थिति में समाप्त हो गई.

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उधर दूर पंजाब प्रांत के लायलपुर जिले में आतंक ने आज अपना प्रभाव दिखाना आरम्भ कर दिया हैं. पंजाब का लायलपुर इलाका बेहद उपजाऊ जमीन वाला है. इसीलिए यहां के लोग धनवान एवं समृद्ध हैं. कपास एवं गेहूं की जबरदस्त पैदावार होती हैं. कपास के कारण कई सूती मिलें, कारखाने इस जिले में हैं. आटे और शकर की भी कई मिलें हैं. लायलपुर, गोजरा, तन्देवाला, जरनवाला इन नगरों में बड़े-बड़े बाजार हैं. ये सारी मिलें, कारखाने, बाज़ार, अधिकतर हिन्दू-सिख व्यापारियों के नियंत्रण में ही हैं. बड़ी-बड़ी साठ कम्पनियां हिंदुओं और सिखों के पास हैं, जबकि मुसलमानों के पास केवल दो ही हैं. समूचे जिले की ७५% जमीन सिखों के पास हैं. खेती से सम्बन्धित शासन की कमाई का ८०% हिस्सा सिखों के माध्यम से ही आता हैं. लायलपुर में, पिछले वर्ष, १९४६ में,( हिंदुओं और सिखों ने इकसठ लाख, नब्बे हजार रूपए का कर भरा था, जबकि मुसलमानों ने केवल पांच लाख तीस हजार रूपए का.

जब यह ख़बरें आने लगीं कि लायलपुर पाकिस्तान में शामिल होगा और मुस्लिम लीग के पोस्टर दिखाई देने लगे, तब भी हिंदु और सिख व्यापारियों ने इस बात को गंभीरता से नहीं लिया. जिले के डिप्टी कमिश्नर हमीद, मुसलमान होने के बावजूद निष्पक्ष रवैया अपनाए हुए थे. इसलिए हिन्दू – सिखों को कभी भी ऐसा लगा ही नहीं कि उन्हें इस क्षेत्र में कोई दिक्कत होगी.

आज, यानी ४ अगस्त १९४७ को, जिले के जरनवाला में ‘मुस्लिम नेशनल गार्ड’ की एक बैठक चल रही हैं. पन्द्रह अगस्त से पहले इस पूरे जिले के हिन्दू-सिख व्यापारियों और किसानों को यहां से मारकर कैसे भगाना है, और उनकी संपत्ति-जमीन-मकान अपने कब्जे में कैसे लिए जाएं… इस बारे में गंभीर चर्चा चल रही हैं. लाहौर से आए मुस्लिम नेशनल गार्ड के पदाधिकारियों ने इस बात पर जोर दिया कि हिंदु – सिखों की लड़कियों को छोड़कर सभी को मारा जाए. आज की रात को छोटी-छोटी कार्यवाहियां करने का निश्चय किया गया. मध्यरात्रि को सूती मिलों के मालिकों के मकानों पर हमला करना तय हुआ.

यदि आज की रात, यानी ४ अगस्त १९४७ को, किसी व्यक्ति ने हिंदु और सिखों से यह कहा होता कि ‘अगले तीन सप्ताह के भीतर लायलपुर जिले के लगभग सभी हिन्दू-सिख अपनी-अपनी संपत्ति, समृद्धि, मकान, जमीन छोड़कर निःसहाय स्थिति में शरणार्थी शिविर में रोटी के दो टुकड़ों के लिए मोहताज होने वाले हैं, इनमें आधे से अधिक हिन्दू-सिख काट दिए जाएंगे और कई हजार हिन्दू लड़कियों को उठा लिया जाएगा….’ तो निश्चित ही उस व्यक्ति को लोगों ने पागल कहा होता…

परन्तु दुर्भाग्य से यही सही था, और वैसा ही हुआ भी.

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दिल्ली के १७, यॉर्क रोड, अर्थात नेहरू के निवास स्थान पर तमाम दौडधूप जारी थी. स्वतन्त्र भारत के पहले मंत्रिमंडल का गठन होने जा रहा था. इस सम्बन्ध की अनेक औपचारिकताएं पूरी करनी थीं. कल डॉक्टर राजेन्द्रप्रसाद को मंत्रिमंडल स्थापना के सम्बन्ध में जो पत्र दिया जाना था, वह रह गया था. इसलिए आज सुबह नेहरू ने वह पत्र, डॉक्टर राजेन्द्रप्रसाद के घर भिजवाया.

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इधर श्रीनगर में गांधीजी की सुबह हमेशा की तरह ही हुई. पिछले तीन दिनों से उनका निवास स्थान, अर्थात किशोरीलाल सेठी का घर, काफी आरामदेह था. परन्तु अब गांधीजी के प्रस्थान का समय आ चुका था. उनका अगला ठिकाना जम्मू था. हालांकि वहां पर वे अधिक समय रुकने वाले नहीं थे, क्योंकि उन्हें आगे पंजाब में जाना था. इसलिए नित्य प्रार्थना समाप्त करने के बाद गांधीजी ने स्वल्पाहार ग्रहण किया. शेख अब्दुल्ला की बीवी यानी बेगम अकबर जहाँ, और उनकी लड़की, सुबह से ही गांधीजी को विदा करने के लिए पहुंचे हुए थे. बेगम साहिबा की तहे-दिल से यह इच्छा थी कि गांधीजी अपने सम्पूर्ण प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए शेख अब्दुल्ला को जेल से बाहर निकालने का प्रयास करें. इसी विषय पर वे बारम्बार गांधीजी को स्मरण दिलवाती रहती थीं. गांधीजी भी अपने दांत विहीन पोपले मुंह से, मुस्कुराते हुए उन्हें समर्थन देते रहते थे.

(उस समय बेगम साहिबा को कतई अंदाजा नहीं था कि गांधीजी की इस मेजबानी और उनकी लगातार बिनती का फायदा होगा, और शेख अब्दुल्ला साहब उनकी सजा पूरी होने से काफी पहले, केवल डेढ़ माह में ही जेल से बाहर आएंगे).

दरवाजे के बाहर गाड़ियों का काफिला खडा था. मेजबान, यानी किशोरीलाल सेठी स्वयं सारी व्यवस्थाओं पर ध्यान रखे हुए थे. महाराज हरिसिंह के राजदरबार से भी एक अधिकारी गांधीजी की विदाई हेतु नियुक्त किया गया था. ठीक दस बजे गांधीजी के इस काफिले ने अपनी पहली कश्मीर यात्रा का समापन करते हुए जम्मू की दिशा में प्रवास शुरू किया.

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सईद हारून. उन्नीस वर्ष का एक लड़का. जिन्ना का परम भक्त. कराची में ही पैदा हुआ और बड़ा हुआ. आगे जाकर कॉलेज में ‘मुस्लिम नेशनल गार्ड’ के संपर्क में आया और उनका कट्टर कार्यकर्ता बन गया.

दोपहर चार बजे कराची के क्लिफटन नामक एक धनाढ्य बस्ती में स्थित एक मस्जिद में उसने कुछ मुसलमान युवकों की एक बैठक रखी थी. कराची से सारे के सारे हिंदुओं को मारकर भगाने के लिए भिन्न-भिन्न उपायों पर चर्चा करने के लिए यह बैठक थी.

सात अगस्त को साक्षात जिन्ना कराची में पधारने वाले थे. उनके स्वागत की तैयारियां भी इस चर्चा का एक प्रमुख मुद्दा था. मुस्लिम नेशनल गार्ड के सभी कार्यकर्ता भावुक हो चले थे. पिछले कुछ दिनों से इन सभी का प्रशिक्षण चल रहा था. लेकिन इनमें से एक लड़के, गुलाम रसूल का कहना था कि, “आर. एस. एस. वाले ज्यादा अच्छे तरीके से प्रशिक्षण देते हैं”. अंत में यह सहमति बनी कि आर. एस. एस. के कार्यकर्ता और कुछ सिखों को छोड़कर बाकी कहीं से अधिक प्रतिकार होने की उम्मीद कम ही है. इसके अनुसार ही हिंदुओं पर हमला किया जाएगा.

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सुबह वायसरॉय हाउस में बलूचिस्तान संबंधी अपनी बैठक निपटाकर बैरिस्टर मोहम्मद अली जिन्ना अपने १०, औरंगजेब रोड स्थित बंगले में वापस आए. दिल्ली के लुटियन ज़ोन का यह बंगला जिन्ना ने १९३८ में खरीदा था. इस विशालकाय बंगले की दीवारों ने पिछले चार-पांच वर्षों में अनेक महत्त्वपूर्ण राजनैतिक बैठकें देखी थीं. जिन्ना कुछ माह पहले ही समझ चुके थे कि दिल्ली से अब उनका दानापानी उठने वाला है. इसीलिए उन्होंने यह बंगला एक महीने पहले ही, प्रसिद्ध व्यवसायी रामकृष्ण डालमिया को बेच दिया था.

जिन्ना को यह आभास हो चला था, कि अब शायद अगली दो या तीन रातें ही इस बंगले में उनकी अंतिम रातें साबित होने जा रही हैं. इस कारण सामान की पैकिंग और साज-संभाल के लिए उन्हें थोड़ा वक्त चाहिए था. गुरूवार, सात अगस्त की दोपहर को वे लॉर्ड माउंटबेटन द्वारा उपलब्ध करवाए गए विशेष डकोटा विमान से कराची जाने वाले थे. कराची, यानी पाकिस्तान में… उनके सपनों के देश में…!

इस बीच उन्होंने एक प्रतिनिधिमंडल को समय दे रखा था. यह प्रतिनिधिमंडल था, दक्षिण भारत की विशाल रियासत, हैदराबाद के निजाम का. निजाम, भारत में विलय नहीं चाहता था. उसे पाकिस्तान में शामिल होना था. भौगोलिक रूप से यह नितांत असंभव था. इसीलिए निजाम को स्वतन्त्र राष्ट्र के रूप में, यानी ‘हैदराबाद स्टेट’ के रूप में, ही रहने की इच्छा थी. स्वतन्त्र राष्ट्र की इच्छा रखने वाले हैदराबाद के निजाम को अन्य देशों के साथ व्यापार करने के लिए एक बंदरगाह की आवश्यकता थी. चूंकि हैदराबाद भारत के बीच में स्थित था, और उसके पास कोई समुद्री किनारा नहीं था, इसलिए ‘हैदराबाद स्टेट को भारत के बीच से किसी बंदरगाह के लिए ‘सुरक्षित मार्ग’ मिले, इस हेतु ‘मोहम्मद अली जिन्ना, लॉर्ड माउंटबेटन को एक पत्र लिखें’, ऐसी बिनती लेकर यह प्रतिनिधिमंडल आया था, जिससे जिन्ना चर्चा करने वाले थे.

जिन्ना ने हैदराबाद के इस प्रतिनिधिमंडल की अच्छी खातिरदारी की. वे निजाम को दुखी भी नहीं करना चाहते थे. क्योंकि आखिर एक बड़े भू-भाग पर निजाम का शासन था. उनके पास अकूत धन-सम्पदा थी और वह मुसलमान भी थे. इसीलिए जिन्ना ने इस प्रतिनिधिमंडल की बातें बड़े ध्यान से सुनीं. वायसरॉय को वे ठीक वैसा ही पत्र लिखेंगे, ऐसा आश्वासन भी उन्होंने इस प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों को दिया. शाम ढलने लगी थी. आकाश में अभी भी बादल छाए हुए थे. गोधुली बेला के इस वातावरण में एक प्रकार की उदासीनता पसर चुकी थी. हालांकि इस लगभग उत्साहहीन माहौल में भी मोहम्मद अली जिन्ना, “मैं अगले दो दिनों में ही मेरे सपनों के देश, यानी पाकिस्तान जाने वाला हूँ”, ऐसा विचार करके अपने मन को उत्साहित रखने का असफल प्रयास कर रहे थे.

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उधर दूर, मुम्बई के लेमिंग्टन रोड पर नाज़ सिनेमा के पास, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्यालय.

कार्यालय हालांकि छोटा सा ही हैं, परन्तु आज के दिन इस पूरे परिसर में एक विशिष्ट चैतन्यता का आभास हो रहा हैं. अनेक स्वयंसेवक कार्यालय की तरफ जाते दिखाई दे रहे हैं. शाम का अंधेरा हो चुका हैं. दिया-बत्ती का समय हैं. आज कार्यालय में प्रत्यक्ष सरसंघचालक श्री गुरूजी उपस्थित हैं.

मुम्बई के संघ अधिकारियों के साथ गुरूजी की तय की गई बैठक समाप्त हुई. बैठक के पश्चात संघ की प्रार्थना हुई. विकीर के बाद स्वयंसेवक व्यवस्थित कतारों से बाहर निकले. सभी को गुरूजी से भेंट करने की इच्छा थी. गुरूजी के साथ ऐसी अनौपचारिक बैठकें बहुत लाभदायी सिद्ध होती थीं.

परन्तु आज के दिन स्वयंसेवकों के मन में, इस बैठक को लेकर कौतूहल के साथ ही चिंता भी हैं. क्योंकि कल से गुरूजी चार दिनों के सिंध प्रवास पर जा रहे हैं. तीन जून के निर्णय के अनुसार, समूचा सिंध प्रांत पाकिस्तान के कब्जे में जाने वाला हैं. कराची, हैदराबाद, नवाबशाह जैसे समृद्ध शहरों वाला सिंध प्रांत भारत में नहीं रहेगा, इसकी त्रासदी प्रत्येक स्वयंसेवक के मन में हैं.

संघ स्वयंसेवकों के मन में इससे भी अधिक चिंता का कारण यह हैं कि सिंध प्रांत में जबरदस्त दंगे शुरू हो गए हैं. मुस्लिम लीग के ‘मुस्लिम नेशनल गार्ड’ ने पन्द्रह अगस्त से पहले सिंध से सभी हिंदुओं का सफाया करने का निश्चय किया हैं. चूंकि कराची शहर, जिन्ना के निवास के कारण, होने जा रहे पाकिस्तान की ‘अस्थायी राजधानी’ जैसा बन चुका हैं. इसलिए इस शहर में बड़े पैमाने पर पुलिस और सेना का बंदोबस्त हैं. इसी कारण कराची शहर में हिंदुओं पर होने वाले आक्रमणों और अत्याचारों की संख्या तुलनात्मक रूप से कम हैं. लेकिन हैदराबाद, नवाबशाह जैसे शहरों एवं ग्रामीण भागों में बड़े पैमाने पर हिंसाचार, हिंदुओं की लड़कियां उठा ले जाना, उनके मकान और कारखाने जलाना, दो-चार हिन्दू कहीं अलग से दिखाई दे जाएं तो उन्हें दिनदहाड़े काट डालना, जैसी असंख्य घटनाएं सामने आ रही हैं.

ऐसी विकट परिस्थिति में गुरूजी की सुरक्षा की चिंता प्रत्येक स्वयंसेवक के मन में हैं और उनके चेहरे पर झलक रही हैं.

समूचा सिंध प्रांत जल रहा हैं, दंगों की आग भड़क चुकी हैं. हिंदुओं की लड़कियां उठाना मुसलमान गुंडों का प्रिय शगल बन चुका हैं. अनेक स्थानों पर, जहां पुलिस कम संख्या में हैं, वहां पुलिस का भी सक्रिय समर्थन इन मुस्लिमों को मिला हुआ हैं. इस कठिन परिस्थिति में संघ के स्वयंसेवक अपने स्तर पर हिंदुओं की यथासंभव मदद कर रहे हैं और उन्हें सुरक्षित भारत पहुंचाने का रास्ता साफ़ कर रहे हैं.

इन्हीं बहादुर संघ स्वयंसेवकों से भेंट करने के लिए गुरूजी अपने साथ डॉक्टर आबाजी थत्ते को लेकर सिंध प्रांत के दंगाग्रस्त इलाके में जा रहे हैं….

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रात के ग्यारह बज चुके हैं. अगस्त महीने की यह नमी भरी रात हैं. सिंध, बलूचिस्तान, बंगाल इन प्रान्तों में अधिकांश हिंदुओं और सिखों के घरों में रतजगा जारी हैं. दहशत के इस वातावरण में भला किसी को नींद आती भी तो कैसे? घर के बाहर युवाओं की गश्त चल रही हैं, जबकि घर के अंदर जितने भी शस्त्र मौजूद हैं, उन्हें लेकर सभी आबाल वृध्द, चिंतित चेहरे लेकर रात भर बैठे रहते हैं. देश के आधिकारिक विभाजन में अब केवल दस रातों का ही समय बचा हैं.

लायलपुर जिले का जरनवाला गांव…, शहीद भगतसिंह का पैतृक गांव. गांव तो क्या, लगभग शहरी इलाके को टक्कर देता हुआ ही हैं. इस गांव में हिन्दू और सिख बड़ी संख्या में रहते हैं. इसलिए उनका आशावाद ऐसा हैं कि शायद इस गांव पर मुसलमानों का हमला नहीं होगा. लेकिन रात के ग्यारह बजे अचानक गांव की तीन दिशाओं से पचास-पचास के जत्थों में, मुस्लिम नेशनल गार्ड के हमलावर कार्यकर्ता तेज धारों वाली तलवारें, फरसे और चाकुओं के साथ ‘अल्ला-हो-अकबर’ का नारा लगाते हुए दौड़ते आए. इस हमलावर भीड़ ने सरदार करतार सिंह के घर को सबसे पहले निशाना बनाया. करतार सिंह का मकान सादा मकान नहीं, बल्कि एक मजबूत गढ़ी हैं. अंदर सरदार करतार सिंह का १८ सदस्यीय परिवार हैं. वे भी अपनी-अपनी कृपाणें एवं तलवार लेकर तैयार बैठे हैं. स्त्रियों के हाथो में लाठियां और चाकू हैं. करतार सिंह की आंखों में गुस्से से खून उतर आया हैं.

इतने में मकान के बाहर से केरोसिन में भिगोया हुआ, कपास और कपड़े का बना हुआ एक जलता हुआ गोला बाहर पड़ी खटिया पर आ गिरा. खटिया जलने लगी. इतने में वैसे ही कई कपड़े के जलते हुए गोले घर के अंदर बरसने लगे. मजबूरी में करतार सिंह और उनके परिवार को, किले जैसे मजबूत घर से बाहर निकलने के अलावा कोई विकल्प बचा ही नहीं. ‘जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल’ का उदघोष करते हुए, क्रोध की ज्वाला अपनी आंखों में लिए, करतार सिंह के परिवार के ग्यारह पुरुष अपनी तलवारें और कृपाण लेकर बाहर निकले. लगभग आधे घंटे तक उन्होंने मुसलमानों के उस विशाल आक्रांता समूह का बड़ी हिम्मत और वीरता से जवाब दिया. लेकिन इन सिखों में से नौ वहीं पर मार दिए गए. गांव वाले अन्य हिन्दू इनकी मदद के लिए दौड़े आए, इसलिए केवल दो लोगों को ही बचाना संभव हो सका. घर में छिपी बैठी सात स्त्रियों में से चार वृद्ध स्त्रियों को मुस्लिम नेशनल गार्ड के कार्यकर्ताओं ने जलाकर मार डाला, जबकि दो जवान सिख लड़कियों को वे उठाकर भाग निकले. करतार सिंह की पत्नी कहां गई, किसीको नहीं मालूम….

मुसलमानों द्वारा दहशत का निर्माण किया जा चुका था. चार अगस्त की मध्यरात्रि तक अनेक स्थानों पर ऐसे ही हजारों हिन्दू-सिख परिवार, अपना सब कुछ वहीं छोड़-छाड़कर हिन्दुस्तान में शरण लेने की मनःस्थिति में आ चुके थे…!
– प्रशांत पोळ

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ऑपरेशन ब्लू स्टार: विनाशकारी प्रभाव के साथ एक गैर-कल्पना ऑपरेशन

– (जयबंस सिंह एक भू-रणनीतिक विश्लेषक, स्तंभकार और लेखक हैं)

– (जयबंस सिंह एक भू-रणनीतिक विश्लेषक, स्तंभकार और लेखक हैं)

भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा ऑपरेशन ब्लू स्टार नामक एक सैन्य हमले को पवित्रतम सिख मंदिर, हरमंदिर साहिब पर सात दिनों से अधिक, 1 जून से 7 जून, 1984 तक किया गया। इसे सिखों द्वारा तीज के रूप में संदर्भित किया जाता है। घल्लूघरा (सिखों का तीसरा नरसंहार / प्रलय), पहले दो क्रमशः 1746 और 1762 में हुए, जब अफगानों ने सिखों को महिलाओं और बच्चों सहित घेर लिया, और फिर बिना पछतावे के नरसंहार किया।
कथित तौर पर, धार्मिक नेता संत जरनैल सिंह भिंडरावाले के नेतृत्व में सिख आतंकवादियों के मंदिर को खाली कराने के लिए हमला किया गया था, जिन्होंने वहां शरण ली थी। यह कहा गया कि उनकी गिरफ्तारी की मांग को लेकर संसद के दोनों सदनों के सदस्यों के साथ राजनीतिक दबाव को देखते हुए यह हमला लाजमी था
अब यह तर्क दिया जा रहा है कि किसी भी अदालत में संत भिंडरावाले के खिलाफ कोई मामला नहीं था और न ही उनके खिलाफ कोई चार्जशीट दायर की गई थी, इसलिए, इस तरह की कठोर कार्रवाई और उन्हें गिरफ्तार करने के लिए अभूतपूर्व हिंसा अतिरिक्त-संवैधानिक, गैरकानूनी और गैर-कानूनी थी।
दुर्भाग्यपूर्ण हमले में दो अतिरिक्त कारक बाहर खड़े हैं। पहला, भारतीय सेना का यह गलत विश्वास कि यह संत भिंडरावाले और उनके अनुयायियों को थोड़े समय के भीतर नगण्य हताहतों के साथ निकालने में सक्षम होगा। दूसरा, संत भिंडरावाले की यह धारणा कि भारत सरकार पवित्र हरमंदिर साहिब पर हमले का आदेश देने की हिम्मत नहीं करेगी। दोनों दल अपने आकलन में भयानक गलत थे और परिणाम एकदम विनाश और तबाही था
संत भिंडरावाले और उनके अनुयायियों को मंदिर के अंदर मार दिया गया था, क्योंकि कई निर्दोष नागरिक थे जो मंदिर में पूजा करने के लिए गए थे और कार्रवाई शुरू होने पर वहां फंस गए।
पवित्र प्रवृत्ति के निकट विनाश और कई हताहतों ने सिखों के मानस पर गहरा नकारात्मक प्रभाव छोड़ा, जिन्होंने पहले से ही सरकार के खिलाफ महान अविश्वास और संदेह का सामना किया।
समस्या को हल करने के बजाय, हमले ने एक बड़ा मुद्दा बनाया। पांच महीने के भीतर, 31 अक्टूबर, 1984 को, उनके सिख अंगरक्षकों, सतवंत सिंह और बेअंत सिंह द्वारा और उसके बाद हुए देश भर में हुए सिख विरोधी दंगों के द्वारा प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की भीषण हत्या हुई। पंजाब में मिलिटेंसी कई सालों तक जारी रही और हजारों युवा सिख लड़कों, सुरक्षा बल के जवानों और निर्दोष नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया।
यह बिना कारण नहीं है कि हमले को सिखों द्वारा एक प्रलय के रूप में संदर्भित किया जाता है, घटना के 36 साल बाद भी कुल मिलाप उन्हें बाहर निकालना जारी रखता है।
हरमंदिर साहिब पर हमला, खालिस्तान आंदोलन, सिख राष्ट्रवादी पहल का एक उप-उत्पाद था जो सिख लोगों के लिए एक स्वतंत्र राज्य बनाने की आकांक्षा रखता था। ऑपरेशन से कुछ साल पहले, खालिस्तान आंदोलन के एक हिस्से के रूप में उग्रवाद ने पंजाब में मजबूत जड़ें जमा ली थीं और संत भिंडरावाले इसका सबसे प्रमुख चेहरा थे, जिसका मुख्य कारण उनके विनीत बयानों और अतिवादी विचारों के कारण था। प्रारंभ में, उन्होंने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पारित करने का एक एजेंडा तय किया, लेकिन, यहां उन्होंने एक सड़क ब्लॉक के साथ मुलाकात की, क्योंकि इंदिरा गांधी सरकार ने इसे एक अलगाववादी दस्तावेज माना था। राजनीतिक मिशन में असफल होने के बाद, संत भिंडरावाले ने सभी सिखों की प्राथमिक आकांक्षा के रूप में आवश्यक होने पर बल के उपयोग से खालिस्तान के निर्माण की घोषणा की।
24 अप्रैल, 1980 को निरंकारी संप्रदाय के प्रमुख बाबा गुरबचन सिंह की हत्या कर दी गई थी। उनका संप्रदाय, लंबे समय से, संत भिंडरावाले की अध्यक्षता वाली दमदमी टकसाल के साथ लॉगरहेड्स में था। 9 सितंबर 1981 को, अखबार केसरी के संस्थापक संपादक लाला जगत नारायण की हत्या कर दी गई थी। उन्हें निरंकारी संप्रदाय के समर्थक के रूप में देखा गया था और उन्होंने कई संपादकीय लिखे थे, जिन्होंने भिंडरावाले के कृत्यों की निंदा की थी।
जबकि संत भिंडरावाले हरमंदिर साहिब के भीतर थे, पंजाब में हिंसक गतिविधियां बेरोकटोक जारी थीं। 23 अप्रैल, अप्रैल, 1983 को, पंजाब पुलिस के उप महानिरीक्षक ए.एस. अटवाल की भिंडरावाले समूह के एक बंदूकधारी ने गोली मारकर हत्या कर दी थी क्योंकि उन्होंने हरमंदिर साहिब कंपाउंड छोड़ दिया था। 12 मई, 1984 को, लाला जगत नारायण के बेटे रमेश चंदर और हिंद समचार मीडिया समूह के संपादक, भिंडरावाले के आतंकवादियों ने हत्या कर दी थी
सरकार संत भिंडरावाले को गिरफ्तार करने और आवश्यक आदेशों को देखने के लिए उत्सुक थी, जिनकी पवित्रता पर सवाल उठाए जाते हैं, 19 जुलाई, 1982 को पारित किए गए। भाई अमरीक सिंह, दमदम टकसाल से ऑल इंडिया सिख स्टूडेंट्स फेडरेशन के अध्यक्ष और एक और सहयोगी थे उसके साथ गिरफ्तार भी किया जाए। इन आदेशों के कारण, उपायुक्त, अमृतसर के निवास के बाहर कई सिखों ने एक धरना (विरोध) किया।
हरचंद सिंह लोंगोवाल जैसे अकाली नेताओं की गिरफ्तारी से बचने के लिए, संत भिंडरावाले ने हरमंदिर साहिब परिसर में आकर अपने लगभग 200 सशस्त्र अनुयायियों के साथ गुरु नानक निवास में निवास किया। हर दिन 51 सिखों का एक समूह सरकारी कार्यालयों और अदालत में गिरफ्तारी के लिए जाता है। 4 अगस्त, 1982 तक, अकाली दल भी इस आंदोलन में शामिल हो गया था और इसे "धार्मिक युद्ध" का रूप मिला। समूह ने 19, जुलाई, 1982 से 01, जून, 1984 तक कई पहलुओं को बदल दिया
जब पवित्र मंदिर पर हमला हुआ। हरचंद सिंह लोंगोवाल जैसे कुछ सिख नेताओं ने संत भिंडरावाले की गिरफ्तारी के लिए बातचीत करने का प्रयास किया, लेकिन दोनों पक्षों द्वारा लिए गए अनम्य पदों के कारण वे सफल नहीं हुए।
सरकार ने मंदिर परिसर से संत भिंडरावाले का अपहरण करने और एक वरिष्ठ राजनेता, पीवी नरसिम्हा राव को संत की गिरफ्तारी के लिए वार्ताकार के रूप में भेजने के लिए एक संभावित गुप्त अभियान सहित कई विकल्पों को देखा। प्रयासों का कोई फल नहीं हुआ। 26 मई, 1984 को, वरिष्ठ अकाली नेता गुरुचरण सिंह टोहरा ने सरकार को सूचित किया कि वह शांतिपूर्ण समाधान के लिए भिंडरावाले को सहमत करने में विफल रहे हैं।
सरकार के इस तरह के कठोर निर्णय लेने का एक और बड़ा कारण यह था कि पाकिस्तान लगातार सैन्य और मनोवैज्ञानिक क्षेत्र में राज्य में अपनी भागीदारी बढ़ा रहा था। खुफिया रिपोर्टों ने सुझाव दिया कि पाकिस्तान न केवल हथियारों और गोला-बारूद के प्रावधान में मदद करने के लिए तैयार था, बल्कि स्वतंत्रता सेनानियों की आड़ में तस्करी भी करता था।
यह व्यापक रूप से माना जाता है कि उक्त कारक संचयी रूप से संत भिंडरावाले और उनके अनुयायियों को बाहर निकालने के लिए मंदिर पर हमला करने की योजना का ट्रिगर बन गए। बेशक, थोड़े से समय के साथ थोड़े समय के अंतराल में "दगाबाज़" को बाहर निकालने की सेना द्वारा दिए गए विश्वास ने प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी को हरी झंडी दिखाने में एक प्रमुख भूमिका निभाई।

जिस तरह से वातावरण विकसित हो रहा था, उससे मंदिर परिसर में छिपे उग्रवादियों के लिए यह स्पष्ट हो गया था कि उन्हें कम से कम उस समय तक अपनी रक्षा करने की आवश्यकता होगी, जब तक कि देश भर के सिख विद्रोह में नहीं उठते हैं और एक समझौता वार्ता की जा सकती है। । इसलिए मंदिर परिसर को एक आधुनिक आधुनिक किले में बदल दिया गया। नौकरी मुख्य रूप से भारतीय सेना के एक सिख जनरल मेजर जनरल शबेग सिंह द्वारा की गई थी, जिन्हें सेवा से कैश किया गया था। उन्हें बांग्लादेशी क्रांतिकारियों (मुक्ति बाहिनी) के प्रशिक्षण के पीछे सैन्य मास्टरमाइंड के रूप में जाना जाता था। जिन वरिष्ठ सैन्य कमांडरों ने हमले की योजना बनाई थी, उन्हें बहुत महत्वपूर्ण कारक को ध्यान में रखना चाहिए, दुख की बात है कि उन्होंने नहीं किया। टैंक-विरोधी हथियार सहित आवश्यक हथियार, पाकिस्तान से खरीदे गए और समय के साथ जटिल रूप से तस्करी किए गए। संत और उनके अनुयायी, जैसे, भारतीय सेना उन पर क्या फेंकती है, इसके लिए बिल्कुल तैयार थे।घटनाओं के अनुक्रम के कई संस्करण हैं जो ऑपरेशन ब्लू स्टार के लॉन्च के बाद हुए। ओपन मीडिया डोमेन में एक संस्करण यहां दिया गया है। यह पूरी तरह से प्रामाणिक हो सकता है या नहीं भी लेकिन काफी स्वीकार्य है।
समग्र ऑपरेशन को तीन भागों में विभाजित किया गया था: -
• ऑपरेशन मेटल: स्वर्ण मंदिर परिसर से भिंडरावाले सहित आतंकवादियों को बाहर निकालना।
• ऑपरेशन शॉप: पूरे पंजाब राज्य में चरमपंथी ठिकाने पर छापा मारने और देश में शेष बचे आतंकवादियों को मोप करने के लिए।
• ऑपरेशन वुड्रोस: पाकिस्तान के साथ सीमा को सील करने और उग्रवादी तत्वों के पंजाब में अन्य गुरुद्वारा को खाली करने के लिए।
प्रारंभिक चरण में, सेना के लगभग सात विभाग पंजाब में ही ऑपरेशन में शामिल थे। इनमें सीमा पर पहले से ही रक्षात्मक मुद्रा में सैनिक शामिल थे और आतंकवादियों के समर्थन में एक पाकिस्तानी दुस्साहसियों के खिलाफ सीलिंग के लिए आवश्यक वृद्धि। LOC के साथ ही सीलिंग भी की गई और पाकिस्तान के साथ सीमा भी
मेजर जनरल केएस बरार (जिसे बुलबुल बरार के नाम से जाना जाता है) की कमान में मेरठ स्थित 9 डिवीजन को वास्तविक हमले (ऑपरेशन मेटल) के लिए शाब्दिक रूप से चलाया गया था। लेफ्टिनेंट जनरल के सुंदरजी आर्मी कमांडर पश्चिमी कमान और ऑपरेशन ब्लू स्टार के समग्र कमांड में थे। थल सेनाध्यक्ष जनरल वैद्य थे।
ऑपरेशन पूर्ण मीडिया ब्लैकआउट, स्थानीय कर्फ्यू और स्थानीय परिवहन के निलंबन के तहत किया गया था। पंजाब में रेल, सड़क और हवाई सेवा निलंबित कर दी गई। विदेशियों और अनिवासी भारतीयों को प्रवेश से वंचित कर दिया गया। पिछले कुछ दिनों में बिजली और पानी भी कट गए।
गोल्डन टेंपल के अंदर Das गुरु राम दास लंगर ’इमारत पर हमले के साथ जून 1, 1984 में ऑपरेशन शुरू हुआ। हैरानी की बात है कि हमले के लिए तैयार होने के बावजूद, पांचवें सिख गुरु, गुरु अर्जन देव जी के शहादत दिवस को मनाने के लिए नागरिकों को जून, 3 को मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति दी गई थी। शाम को उन्हें छोड़ने के लिए कहा गया था। यह व्यापक रूप से माना जाता है कि अवकाश आदेश दिए जाने पर सभी नागरिक मंदिर परिसर को नहीं छोड़ सकते थे; संभवतः उन्हें आतंकवादियों द्वारा मानव ढाल के रूप में बाद में इस्तेमाल करने के लिए हिरासत में लिया गया था। इसके बजाय जो छोड़ गए वे सिख अपराधी और कम्युनिस्ट थे, जो पहले नष्ट हो गए थे, लेकिन तब लड़ाई के लिए पेट नहीं था।
अंतिम हमला दो दिनों से जून, 5 से 7 जून तक हुआ, जब परिसर को आतंकवादियों से मुक्त घोषित किया गया और संत जरनैल सिंह भिंडरावाले की हत्या की घोषणा की गई
"रब्बल" के खिलाफ पेशेवर इन्फैंट्री सैनिकों द्वारा हमला किया जाना चाहिए था, अंततः टैंक, आर्टिलरी और कमांडो को भी तैनात किया गया था। आतंकवादियों में होली से वापसी की आग एंटी-टैंक रॉकेट से ग्रेनेड को लेकर आई थी। अकाल तख्त जहां संत भिंडरावाले स्थित था, को सचमुच टैंक की आग से जमीन तक उठाया गया था। टेंक मंदिर परिसर के द्वार पर बंद रेंज में था।
दुर्भावनापूर्ण हमले में 493 मारे गए और 236 घायल हो गए। सेना को 83 मारे गए (4 अधिकारी और 79 सैनिक) मारे गए। यह व्यापक रूप से महसूस किया जाता है कि मरने वालों की संख्या घोषित की गई तुलना में बहुत अधिक थी। इतना ही नहीं, एक बार जब मंदिर परिसर को आतंकवादियों से मुक्त घोषित किया गया था, राष्ट्रपति ज़ैल सिंह एक यात्रा के लिए आए थे और परिसर के भीतर छिपे एक आतंकवादी द्वारा गोली मार दी गई थी। गोली चली और सेना कर्नल जो उसके साथ था।
ऑपरेशन ने कई देशों द्वारा निंदा की। दुनिया भर में आलोचना और मानवाधिकार संगठनों द्वारा कई शिकायतें। दुनिया भर में सिख तबाह हो गए। यह ऑपरेशन बहुत ही मार्मिक काल के दौरान किया गया था, जब सिख अपने पांचवें गुरु की शहादत की याद कर रहे थे, उनके लिए और भी अधिक वीरता थी। कई सिख सैनिकों ने अपनी इकाइयाँ और प्रख्यात सिख हस्तियों को पुरस्कार लौटा दिए, जो उन्हें राज्य से मिले थे।
पांच साल बाद, मंदिर परिसर को एक बार फिर आतंकवादियों द्वारा "नाकाबंदी दृष्टिकोण" के रूप में मंजूरी दे दी गई, जैसा कि पंजाब पुलिस के तत्कालीन महानिदेशक केपीएस गिल ने कल्पना की थी। ऑपरेशन की सफलता, ऑपरेशन ब्लैक थंडर नाम के कोड ने साबित किया कि सेना द्वारा किए गए एकमुश्त हमले के विकल्प थे। ऑपरेशन पर कई किताबें और वृत्तचित्र बनाए गए हैं। एक महत्वपूर्ण सबक हमारे अपने लोगों के खिलाफ बल का उपयोग करने से पहले सभी संभावित विकल्पों की कोशिश करना है और, जब आवश्यक हो, इसे न्यूनतम सीमा तक सीमित करें। स्नातक की प्रतिक्रिया पर काम करते समय धैर्य के साथ बेहतर राजनीतिक और सैन्य निर्णय हमेशा बेहतर लाभांश का भुगतान करेगा। उन्मत्त निर्णय लेने से जटिल बल का एक वृद्धिशील उपयोग एक महान और परिपक्व राष्ट्र का संकेत नहीं है
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मोदी सरकार पिता के साए जैसी : ‘विजय भवभारत’

भवभारत’ विदेश से लाए युवक ने कहा है कि ऐसी व्यवस्था तो उसने जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों में भी नहीं देखी है। शख्स बता रहा है कि सरकार ने करीब 70 किलोमीटर दूर सभी पैसेंजर को कोरोन्टाइन किया है

विदेश से लाए युवक ने कहा है कि ऐसी व्यवस्था तो उसने जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों में भी नहीं देखी है। शख्स बता रहा है कि सरकार ने करीब 70 किलोमीटर दूर सभी पैसेंजर को कोरोन्टाइन किया है । बिल्डिंग को लगातार सैनेटाइज किया जा रहाहै। उन्हें 24 घंटे की देख रेख में रखा है, जहॉं बेहतरीन सुविधाएँ हैं। भवभारत’ विदेश से लाए युवक ने कहा है कि ऐसी व्यवस्था तो उसने जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों में भी नहीं देखी है। शख्स बता रहा है कि सरकार ने करीब 70 किलोमीटर दूर सभी पैसेंजर को कोरोन्टाइन किया है। बिल्डिंग को लगातार सैनेटाइज किया जा रहा है। उन्हें 24 घंटे की देख रेख में रखा है , जहॉं बेहतरीन सुविधाएँ हैं ।

विजय भव भारत का फेसबुक पेज, 24,000 से अधिक फौलोवेर्स.

जहाँ एक और पूरी दुनिया कोरोना (महामारी) से लडर ही है, हर देश इसकी रोकथाम में लगा हुआ है अपने नागरिकों के बचाव में हर कोशिश कर रहा है, वहीं भारत की कोशिशों की विश्वपटल सरहाना हो रही है। कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी भले इस वैश्विक महामारी को मोदी सरकार पर हमले के मौके की तरह तलाश कर रहे हैं, लेकिन सोशल मीडिया में सरकार की तारीफ करते हुए कुछ लोगों ने जो आपबीती शेयर की है जो बेहद मार्मिक है। हालफिलाहल इटली से लाई गई एक युवती के पिता ने अपनी भावना साझा कि, वो सालों से सरकार की आलोचना कर रहे थे। लेकिन, अब उन्हें एहसास हो रहा है कि मोदी सरकार पिता के साए (fatherly figure) जैसी है। विदेश से लाए गए एक युवक ने कहा है कि ऐसी व्यवस्था तो उसने जर्मनी जैसे यूरोपीय मुल्कों में भी नहीं देखी है।टाइम्स ऑफ इंडिया के पत्रकार रोहन दुआ ने इटली से लौटी युवती के पिता का पत्र शेयर किया है। इस पत्र में उन्होंने इंडियन एंबेसी, भारत सरकार और विशेषत: नरेंद्र मोदी को धन्यवाद दिया है। पिता के मुताबिक उनकी बेटी मास्टर की पढ़ाई करने इटली के मिलान गई थी। वहॉं हालात बिगड़ने पर उसे वापस लौटने को कहा। जब वह लौटने लगी तो उससे भारत वापस जाने का सर्टिफिकेट माँगा गया। न्होंने खुद इंडियन एंबेसी को संपर्क करने की कोशिश की। मगर मिलान में एंबेसी का कार्यालय बंद होने के कारण ऐसा नहीं हो पाया। उन्होंने इंडियन एंबेसी के अन्य लोगों को मेल के जरिए संपर्क किया और रात के 10:30 बजे उनकी बेटी ने फोन पर बताया कि उसकी बात दूतावास में हो गई है और वह अगली फ्लाइट से भारत लौट रही है।

पिता के मुताबिक, वे सालों से भारतीय सरकार को कोस रहे थे। लेकिन मोदी सरकार में पिता का चेहरा है। उन्होंने बताया कि उनकी बेटी 15 मार्च को भारत आई और आईटीबीपी अस्पताल में उसकी स्वास्थ्य संबंधी, खान-पान संबंधी सभी जरूरतों का ख्याल रखा गया। गौरतलब है कि इटली उन देशों में शामिल है जो कोरोना संक्रमण से सर्वाधिक प्रभावित हैं।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार कोरोना वायरस के संक्रमण से निबटने के लिए सरकार ने 400 बेड का कोरोन्टाइन वार्ड तैयार करवाया है। यहाँ विदेश से लौटने वालों को सीधे दिल्ली एयरपोर्ट से लेकर जाया जाएगा। यहाँ इन सभी लोगों की 14 तक की निगरानी होगी और अगर इनमें कोरोना के लक्षण मिलते हैं तो इन्हें आइसोलेट कर छोड़ा जाएगा। ये कोरोन्टाइन वार्ड नोयडा के सेक्टर 39 में स्थित जिला अस्पताल की नई बिल्डिंग में बना है। यहाँ पर्याप्त संख्या में पैरामेडिकल स्टॉफ तैनात हैं।

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इन टीमों के जरिये समझिये समाज की सच्चाई को: ‘विजय भवभारत’

समाज की सच्चाई को दिखाने का बीड़ा उठाने वालों में से एक नाम ‘विजय भव भारत’ का भी है

21वीं सदी के दो दशक बीतते तक मीडिया को किस तरह से टुकड़े टुकड़े गैंग ने बर्बाद कर दिया और मीडिया ने किस तरह से समाज को बर्बाद किया, यह हम सभी जानते हैं और टुकड़े टुकड़े गैंग व् मीडिया में बैठे उनके नेटवर्क को भी हम समझ चुके हैं. उस नेटवर्क को तोड़ने और मीडिया में जमे इस कचरे की सफाई का जिम्मा जिनसोशल मीडिया के पोर्टलों ने ली है, उनकी श्रृंखला में एक और नाम की चर्चा इस लेख में हम करेंगे. इस बार चर्चा है फेसबुक कैलेंडर पेज –‘विजय भव भारत’ की

विजय भव भारत का फेसबुक पेज, 24,000 से अधिक फौलोवेर्स.

यूँ तो साहित्य समाज का दर्पण कहा जाता था और बाद में मीडिया ने इसकी जगह ले ली, मगर समाज की सच्चाई को समाज का यह दर्पण दिखा नहीं पाया और ख़बरों को व् समाज की सच्चाई को तोड़ मरोड़ कर पेश करने का आरोप मीडिया पर लगने लगा. ऐसे में समाज की सच्चाई को दिखाने का बीड़ा उठाने वालों में से एक नाम ‘विजय भव भारत’ का भी है.

विजय भव भारत

‘विजय भव भारत’ पेज का संचालन फेसबुक पर होता है, जहाँइसे फॉलो करने वाले 24,000 से भी अधिक लोग हैं. यह पेज जाना जाता है समाज में चलने वाले सकारात्मक कामों के प्रचार प्रसार के लिए, जो आम मीडिया कीनज़रों से दूर हैं. इसके साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों पर भी यह पेज नज़र रखता है, और उनसे जुडी तकरीबन हर जानकारी अपने दर्शकों तक पहुँचाता है. विजय भव भारत पेज का एक और काम 365दिनों के विशेष घटनाओं को अपने पेज से जनता तक पहुँचाना भी है. इसका एक नाम ‘कैलेंडर विशेष’ भी है. इनके अतिरिक्त समसामयिक घटनाओं पर पोस्ट व् विडियो डालना भी इस पेज का काम है.

सकारात्मक कामों का प्रचार प्रसार:

विजय भव भारत जिस काम में लगा है, शायद वह काम मीडिया का कोई भी तंत्र नहीं कर पायेगा क्योंकि इस काम में मीडिया को मसाला नहीं मिलेगा बल्कि मेहनत करनी पड़ेगी. मीडिया का एक तंत्र जहाँ केवल टीआरपी बढाने और ख़बर बेचने में लगा है, वहीँ सोशल मीडिया पर विजय भव भारत- दुनिया व् भारत की कुछ बेहतरीन सकारात्मक ख़बरें खोज कर ला रहा है और अपने पेज के माध्यम से साझा कर रहा है. सोशल मीडिया से नकारात्मकता हटाने का यह कदम सराहनीय है. समाज की यह सच्चाई जो छिपी हुई है, उसे खोज निकलने का यह काम विजय भव भारत कर रहा है.

कोरोना से बचाव के लिए दुनिया ने अपनाई भारतीय संस्कृति

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों पर नज़र:                            दुनिया का सबसे बड़ा गैर सरकारी संगठन है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और समाज निर्माण के काम में इसके योगदान को नकारना मुर्खता होगी. महात्मा गाँधी जी से लेकर अन्य कई महापुरुष संघ के बारे में सकारात्मक विचार रख चुके हैं, ऐसे में इस संगठन के कामकाज पर भी नज़र रखे हुए है. इससे पहले कि मीडिया संघ के कामकाज को तोड़ मरोड़ का या अपने अनुरूप पेश करे, विजय भव भारत संघ के विशिष्ट स्त्रोतों से संघसे जुडी प्रमाणिक ख़बरें लेकर आता है और समाज से उसका क्या लेना देना है, यह भी स्पष्ट करता है.

विश्व के सबसे बड़े गैर सरकारी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों पर नज़र.

कैलेंडरविशेष दिन:

विजय भव भारत जिन महत्वपूर्ण सकारात्मक कामों में लगा हुआ है, उनमे से एक कैलेंडर विशेष दिन भी है. साल में 365 दिन होते हैं, और तकरीबन हर दिन महत्वपूर्ण होता है. उन सभी दिनों की विशेषता और महत्त्व बताने का काम भी विजय भव भारत करता है. चाहे किसी महापुरुष का जन्मदिन या पुण्यतिथि हो या कोई स्मरणीय घटना की बात हो, उनके महत्त्व को समझाने का काम भी विजय भव भारत करता है.

16 सितम्बर 1947, गाँधीजी द्वारा छूआछूत की समाप्ति पर राष्ट्रीयस्वयंसेवक संघ के काम पर चर्चा.

समसामयिक घटनाओं पर नज़र:

जब समाज में सकारात्मकता भरने का काम और समाज से नकारात्मकता हटाने का काम विजय भव भारत कर रहा है तो यह तो असंभव है कि ऐसे में समकालीन घटनाओं को न जोड़ा जाये. वर्तमान में घटने वाली हर घटना पर समाज की प्रतिक्रिया, सही ख़बर, तथ्य परक, और प्रमाणिक ख़बरें विडियो और पोस्टर के माध्यम से अपने फौलोवर्स तक विजय भव भारत पहुँचाता है.

राम मंदिर पर शिया वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिज़वी का स्पष्ट बयान. 10 लाख से ज्यादा लोगों द्वारा देखा गया, 50 हज़ार से ज्यादा लोगों द्वारा साझा किया गया.

अपने इस प्रयास के माध्यम से विजय भव भारत ने सोशल मीडिया पर एक ऐसा विमर्श खडा किया है जो सकारात्मक है, प्रमाणिक है और नकारात्मकता को तोड़ने वाला है. जिन ख़बरों में मीडिया की दिलचस्पी नहीं होती मगर समाज के लिए आवश्यक है – उन्हें खोज कर लाने का काम यह पेज कर रहा है.

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