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वे पंद्रह दिन भाग 2/15

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02 अगस्त

१७, यॉर्क रोड…. इस पते पर स्थित मकान, अब केवल दिल्ली के निवासियों के लिए ही नहीं, पूरे भारत देश के लिए महत्त्वपूर्ण बन चुका था. असल में यह बंगला पिछले कुछ वर्षों से पंडित जवाहरलाल नेहरू का निवास स्थान था. भारत के ‘मनोनीत’ प्रधानमंत्री का निवास स्थान. और इस उपनाम या पद में से ‘मनोनीत’ शब्द मात्र तेरह दिनों में समाप्त होने वाला था. क्योंकि १५ अगस्त से जवाहरलाल नेहरू स्वतन्त्र भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार का आरम्भ करने जा रहे थे.

१७, यॉर्क रोड…. इस पते पर अधिकारियों एवं नागरिकों की हलचल तेजी से बढ़ने लगी थी. वैसे तो यॉर्क रोड यह पहले से ही महत्त्वपूर्ण मार्ग था. बंगाल की अशांत स्थिति के कारण अंग्रेजों ने जब अपनी राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने का निर्णय लिया, उस समय अर्थात १९११ में एडविन लुटियन नामक ब्रिटिश आर्किटेक्ट को ‘नई दिल्ली’ की रचना का कार्य सौंपा गया. लुटियन ने दिल्ली के इस महत्त्वपूर्ण इलाके की रचना का काम इसी यॉर्क रोड से प्रारम्भ किया था. नेहरू जिस बंगले में रह रहे थे, वह सन १९१२ में बनाया गया था.

इसी बंगले में २ अगस्त १९४७ की सुबह, बेहद व्यस्तता और आपाधापी भरी थी. ब्रिटिश साम्राज्य की तरफ से हस्तांतरण के लिए केवल तेरह दिन बाकी थे. उस कार्यक्रम की तैयारी करना तो एक प्रमुख विषय था ही, परन्तु अनेक महत्त्वपूर्ण विषय लगातार बहते झरने के समान नेहरू के सामने आते जा रहे थे. राष्ट्रगीत से लेकर मंत्रिमंडल के गठन तक की बड़ी लंबी कार्यसूची नेहरू के सामने थी. इन सबके बीच १५ अगस्त के दिन किस प्रकार की पोशाक पहनी जाए, इतनी छोटी सी बात पर भी नेहरू ध्यान रखे हुए थे. काँग्रेस के कुछ नेता एवं प्रशासन के कई वरिष्ठ अधिकारी १७, यॉर्क रोड पर आकर बैठे थे. उन सभी से नेहरू को अलग-अलग विषयों पर चर्चा करनी थी. इसी कारण उस दिन नेहरू ने जल्दी-जल्दी में अपना नाश्ता समाप्त किया और एक अत्यधिक व्यस्त दिन का सामना करने की तैयारी में लग गए.

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इधर दूसरी तरफ, भारत के स्वतंत्रता दिवस से पहले भारत में शामिल होने वाले राज्यों के बारे में कई घटनाएं लगातार घटित हो रही थीं. सरदार वल्लभभाई पटेल स्वयं एक-एक राज्य, एक-एक राजशाही पर अपनी निगाह बनाए हुए थे. इस काम के लिए उन्होंने अपने गृह विभाग में वी. के. मेनन जैसे अत्यधिक कुशल प्रशासनिक अधिकारी की नियुक्ति भी कर रखी थी. सरदार पटेल की सूचना के आधार पर २ अगस्त को प्रातः वी के मेनन ने भारत के विषय को देखने वाले विभाग के डिप्टी सेक्रेटरी सर पेट्रिक को एक पत्र लिखा. इस पत्र में उन्होंने सूचित किया कि ‘भारत में आकार एवं आर्थिक दृष्टि से जो बड़े रजवाड़े हैं, जैसे कि मैसूर, बड़ौदा, ग्वालियर, बीकानेर, जयपुर एवं जोधपुर, वह भारतीय संघ में शामिल होने के लिए तैयार हैं. फिलहाल हैदराबाद, भोपाल एवं इंदौर ने इस सम्बन्ध ने कोई निर्णय नहीं लिया है.’ इन रजवाड़ों का निर्णय अभी लंबित था.

भोपाल, हैदराबाद एवं जूनागढ़ इन तीनों रजवाड़ों की इच्छा भारत के साथ रहने की कतई नहीं थी. इसी सन्दर्भ में २ अगस्त को भोपाल के नवाब ने जिन्ना को एक पत्र लिखा. जिन्ना और भोपाल के नवाब हमीदुल्ला दोनों अच्छे मित्र थे. अपने इस मित्र को लिखे पत्र में नवाब हमीदुल्ला ने लिखा कि ‘अस्सी प्रतिशत हिन्दू जनसंख्या वाली मेरी भोपाल रियासत इस ‘हिन्दू भारत’ में एकदम एकाकी और अलग-थलग पड़ गई है. मेरी इस रियासत को मेरे और इस्लाम के दुश्मनों ने चारों तरफ से घेर रखा है. कल रात को ही आपने यह स्पष्ट कर दिया था कि पाकिस्तान भी हमारी कोई मदद नहीं कर सकता है.’

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१, क्वीन विक्टोरिया रोड स्थित निवास में रहने वाले डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद की व्यस्तताएं भी बहुत बढ़ गयी थीं. हालांकि भविष्य में भारत के पहले राष्ट्रपति बनने में काफी समय था, परन्तु वर्तमान नेतृत्व में वे एक पितृपुरुष के समान सभी बातों पर चारों ओर ध्यान रखे हुए थे. स्वाभाविक सी बात थी कि सत्ता हस्तांतरण के इस प्रमुख एवं नाजुक समय पर उनके पास विभिन्न प्रकार की सलाह मांगने वाले अथवा अन्य मसलों पर चर्चा करने वालों की भीड़ बढ़ती ही जा रही थी. डॉक्टर राजेन्द्रप्रसाद मूलतः बिहार से थे. इसलिए बिहार से आने वाले अनेक प्रतिनिधिमंडल भिन्न-भिन्न प्रश्न लेकर उनके पास आते थे. इसी बीच २ अगस्त की दोपहर को वे तत्कालीन रक्षामंत्री सरदार बलदेव सिंह को एक पत्र लिख रहे थे. यह पत्र १५ अगस्त का उत्सव मनाने के विषय में था. उन्होंने लिखा कि ‘पटना शहर में नागरिकों एवं प्रशासन के साथ सेना को भी इस उत्सव में शामिल होना चाहिए, ताकि इस कार्यक्रम की भव्यता में और भी वृद्धि होगी’.

सरदार बलदेव सिंह अकाली दल की तरफ से मंत्रिमंडल में शामिल हुए थे और वे डॉक्टर राजेन्द्रप्रसाद का बहुत सम्मान करते थे. इसलिए वे राजेन्द्र बाबू के पत्र पर समुचित कार्यवाही करेंगे, यह निश्चित ही था.

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२ अगस्त की सुबह से ही संयुक्त प्रांत में (यानी वर्तमान उत्तरप्रदेश में) एक अलग ही नाटक खेला जा रहा था. इस प्रदेश की हिन्दू महासभा के नेताओं को सरकार ने गत रात्रि को ही गिरफ्तार करके जेल भेज दिया था. इन पर आरोप लगाया गया था कि महासभा के नेतागण सरकार के विरुद्ध ‘’डायरेक्ट एक्शन’ का शंखनाद करने वाले हैं. ‘डायरेक्ट एक्शन’ नामक शब्द भारतीय राजनीति में बदनाम हो चुका था, क्योंकि केवल एक वर्ष पहले ही बंगाल में मुस्लिम लीग के हिंसक गुण्डों ने ‘डायरेक्ट एक्शन’ के नाम पर पांच हजार से अधिक हिंदुओं का कत्लेआम एवं हजारों स्त्रियों के साथ बलात्कार किया था.

काँग्रेस कार्यसमिति ने आगे चलकर विभाजन का जो प्रस्ताव स्वीकार किया, उसके पीछे ‘डायरेक्ट एक्शन’ शब्द की पाशविक स्मृतियां प्रमुख रूप से थीं. इस कारण ‘डायरेक्ट एक्शन’ के नाम से हिन्दू नेताओं को उठाकर जेल में ठूंसना बड़ा ही विचित्र मामला था, क्योंकि इस शब्द का उपयोग केवल मुस्लिम लीग से ही जोड़ा जा सकता था. यहां तक कि इस विचित्र समाचार को सिंगापुर से प्रकाशित होने वाले ‘इन्डियन डेली मेल’ नामक दैनिक ने भी प्रमुखता दी. शनिवार २ अगस्त के अंक में बिलकुल प्रथम पृष्ठ पर उन्होंने यह समाचार प्रकाशित किया था. इस समाचार के साथ ही हिन्दू महासभा की दस प्रमुख माँगें भी प्रकाशित की थीं. इस समाचार के कारण हिन्दू महासभा के समर्थकों में बेचैनी का वातावरण निर्मित हो गया था.

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उधर सुदूर ईस्टर्न फ्रंट के ‘कोहिमा’ से शनिवार २ अगस्त को एक और समाचार ने धमाका किया, जो कि भारतीय संघ राज्य के लिए अच्छी बात नहीं थी. ‘इंडिपेंडेंट लीग ऑफ कोहिमा’ ने ऐसी घोषणा की, कि १५ अगस्त को वे भारतीय संघ राज्य में शामिल नहीं हो रहे हैं. वे एक निर्दलीय नागा सरकार का गठन करेंगे, जिसमें नागा जनजाति की जनसंख्या वाला सम्पूर्ण प्रदेश होगा. १५ अगस्त को आकार ग्रहण करने जा रहे भारतीय संघ राज्य के सामने एक के बाद एक लगातार चुनौतियां खड़ी होती जा रही थीं.

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इन सब तनाव भरी ख़बरों की पृष्ठभूमि में देश-विदेश में भारतीय फ़िल्में लोगों का मनोरंजन कर ही रही थीं. सिंगापुर के डायमंड थियेटर में अशोक कुमार एवं वीरा अभिनीत फिल्म ‘आठ दिन’ काफी भीड़ खींच रही थी. इस फिल्म की कहानी उर्दू के प्रसिद्ध कथाकार सआदत हसन मंटो ने लिखी थी और संगीतकार एस. डी. बर्मन ने इसी फिल्म के द्वारा भारतीय फिल्म जगत में पहला कदम रखा था.

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सरदार पटेल के दिल्ली स्थित निवास (यानी वर्तमान में १, औरंगजेब रोड) पर भी हलचलें तेज़ हो चुकी थीं. राज्यों के विलीनीकरण एवं साथ ही सिंध, बलूचिस्तान एवं बंगाल में भड़के हुए दंगे, इत्यादि तमाम मुद्दों पर गृह मंत्रालय की परीक्षा जारी थी. इसी समय दोपहर को सरदार पटेल को पंडित नेहरू द्वारा लिखा एक पत्र प्राप्त हुआ. पत्र छोटा सा ही था. उसमें नेहरू ने लिखा था – “देखा जाए तो केवल एक औपचारिकता के नाते मैं आपको यह पत्र भेज रहा हूं. मैं आपको अपने मंत्रिमंडल में शामिल होने का निमंत्रण देना चाहता हूं. वैसे तो इस पत्र का कोई विशेष अर्थ नहीं है, क्योंकि आप तो पहले से ही मेरे मंत्रिमंडल के सुदृढ़ स्तंभ हैं…”.

सरदार पटेल ने वह पत्र ग्रहण किया. थोड़ी देर उस पत्र की तरफ देखा. हल्के से मुस्कुराए और तत्काल ही वे भारत-पाकिस्तान की सीमा (जो कि अभी तक घोषित नहीं हुई थी) पर भड़के हुए भीषण दंगों के बारे में अपने सचिव से चर्चा करने लगे.

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दिल्ली की इस आपाधापी और व्यस्तता के बीच उधर दूर महाराष्ट्र में आलंदी नामक स्थान पर काँग्रेस के अंदर वामपंथी विचारों वाले नेताओं का जमावड़ा लगा हुआ था. इस अंदरूनी वामपंथी समूह ने दो माह पहले ही तय कर लिया था कि २ और ३ अगस्त को इस समूह की बैठक होगी. शंकरराव मोरे एवं भाऊसाहेब राउत के आव्हान पर काँग्रेस की यह वामपंथी मण्डली वहां जमा हुई थी. भारत स्वतन्त्र होने वाला है और इस स्वतन्त्र भारत की चाभी अब काँग्रेस के हाथों में आने वाली है, यह उन्हें स्पष्ट रूप से दो माह पहले ही दिख गया था. अब इस समूह के सामने बड़ा सवाल यह था कि सत्ता हस्तांतरण की इस प्रक्रिया में वामपंथी और साम्यवादियों का क्या होगा? इसी का विचार मंथन करने के लिए यह बैठक दिल्ली से बहुत दूर बुलाई गई थी.

काँग्रेस के लिए काम कर रहे, लेकिन विचारों से वामपंथी, अनेक नेता जैसे तुलसीदास जाधव, कृष्णराव धुलूप, ज्ञानोबा जाधव, दत्ता देशमुख, र. के. खाडिलकर, केशवराव जेधे जैसे नामचीन और वरिष्ठ नेता इस बैठक में आए थे. काँग्रेस के अंदर ही मजदूरों एवं किसानों के लिए एक अलग कार्यकर्ता संघ की स्थापना करने की उनकी योजना थी. किसी ने सोचा भी न था कि इस बैठक से ही आगे चलकर भविष्य में महाराष्ट्र की एक प्रमुख और बड़ी वामपंथी विचारों का पोषण करने वाली तथा किसान-मजदूरों का पक्ष रखने वाली पार्टी जन्म लेगी. २ अगस्त को संपन्न हुई इस बैठक में इन बड़े वामपंथी नेताओं ने भारत विभाजन अथवा भीषण पाशविक अत्याचारों से युक्त दंगों के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा.. इन्हें केवल काँग्रेस में अपने भविष्य की चिंता सता रही थी.

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दो अगस्त को ही मद्रास के एग्मोर इलाके में शाम को एक विशाल सभा में मद्रास प्रेसीडेंसी के खाद्य, औषधि एवं स्वास्थ्य मंत्री टी. एस. एस. राजन, एंग्लो इन्डियन समुदाय से संवाद स्थापित करने में लगे हुए थे. अंग्रेजों के जाने के बाद एंग्लो इंडियन समुदाय का क्या होगा यह प्रश्न अनेकों के मन में शंकाएं उत्पन्न कर रहा था.

इस समुदाय को आश्वस्त करते मंत्री महोदय ने कहा कि आपके इस छोटे से समुदाय ने अभी तक उत्तम पद्धति एवं संस्कार दिखाते हुए भारतीय समाज में मिल-जुलकर रहने की शानदार मिसाल पेश की है. आगे भी स्वतंत्रता के पश्चात आपको एक जिम्मेदार नागरिक की भूमिका निभानी है. काँग्रेस आपका पूरा ध्यान रखेगी.

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उधर पूना में हिन्दू महासभा ने एस. पी. कॉलेज पर एक सार्वजनिक सभा आयोजित की थी. देश की वर्तमान परिस्थिति, देश की स्वतंत्रता एवं विभाजन की घटनाओं पर इस सभा में स्वयं वीर सावरकर अपना भाषण देने वाले थे.

देखते ही देखते सभा में जबदरस्त भीड़ हो गई. इसे सच में एक ‘विशाल आमसभा’ कहा जा सकता था. अपने गरजदार और वैचारिक आग से भरे भाषण में स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने कहा कि, आज देश में जो परिस्थिति निर्मित हुई है, इसके लिए प्रमुखता से केवल काँग्रेस ही नहीं सामान्य जनता भी उतनी ही जिम्मेदार है. जनता ने समय-समय पर आंख मूंदकर लगातार काँग्रेस को जो समर्थन दिया, देश का विभाजन उसी की परिणति है. काँग्रेस के नेताओं द्वारा बारंबार एक ही वर्ग का तुष्टिकरण करने की वजह से यह वर्ग और इसके नेता विभाजन करने में सफल हुए हैं.

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उधर श्रीनगर में गांधीजी की पहली बहुप्रचारित यात्रा का आज दूसरा दिन समाप्त होने जा रहा हैं. आज का दिन कोई खास महत्त्वपूर्ण घटनाओं से भरा हुआ नहीं था. सुबह की प्रार्थना के पश्चात गांधीजी के ठिकाने, अर्थात किशोरीलाल सेठी के निवास स्थान, पर अकबर जहाँ अपनी बेटी को लेकर आईं. इस मुलाक़ात में भी उन्होंने गांधीजी के सामने बार-बार यही सिद्ध करने का प्रयास किया कि उनके शौहर अर्थात शेख अब्दुल्ला को जेल से रिहा किया जाना कैसे और क्यों जरूरी है.

आज के दिन भी गांधीजी के चारों तरफ नेशनल कांफ्रेंस के ही मुस्लिम नेताओं का चुस्त घेरा बना हुआ था. हालांकि आज गांधीजी ने अनेक लोगों से भेंट की, जिसमें हिन्दू नेता भी थे. रामचंद्र काक द्वारा दिए गए निमंत्रण के अनुसार कल, अर्थात ३ अगस्त को गांधीजी, कश्मीर के महाराजा हरिसिंह से भेंट करने वाले हैं.

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आज के दिन भी लाहौर, रावलपिंडी, पेशावर, चटगाँव, ढाका, अमृतसर इत्यादि स्थानों से लगातार हिन्दू-मुस्लिम दंगों की ख़बरें आती रही हैं. जैसे-जैसे रात का अंधेरा गहरा होता जा रहा हैं, वैसे-वैसे सम्पूर्ण प्रदेश के क्षितिज पर आग और धुएं की बड़ी-बड़ी लपटें दिखाई देने लगीं हैं… दो अगस्त की यह काली और भयानक रात ऐसी ही अशांत रहने वाली हैं…

चौथा खंभा न्यूज़ .com

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जेएनयू में फीस वृद्धि के नाम पर राजनीति

—यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं

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सुरेश हिन्दुस्थानी

देश के उच्च शिक्षा केन्द्र जब राजनीति के अड्डे बनने की ओर कदम बढ़ाने लगें, तब वहां की शिक्षा की दिशा-दशा क्या होगी, यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। फीस बढ़ोतरी के खिलाफ किया जाने वाला दिल्ली का छात्र आंदोलन कुछ इसी प्रकार का भाव प्रदर्शित कर रहा है, जहां केवल और केवल राजनीति ही की जा रही है। किसी भी आंदोलन की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके पीछे जनहित का कितना भाव है। दिल्ली का यह आंदोलन जनसरोकार से कोसों दूर दिखाई दे रहा है।

हालांकि इसके पीछे बहुत से अन्य कारण भी होंगे। सबसे बड़ा कारण तो यही है कि आज जेएनयू की जो छवि जनता के बीच बनी है, वह जनता को खुद ही दूर कर रही है। जिस विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारों की ध्वनि गूंजित होती है, वह कभी जन आंदोलन का हिस्सा नहीं बन सकते हैं।दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के जिन छात्रों ने कभी भारत के टुकड़े करने के नारे लगाए थे, आज वे ही छात्र फीस बढ़ोतरी के छोटे से मामले को राजनीतिक रुप देने का प्रयास करते दिखाई दे रहे हैं। इस छात्र आंदोलन का राजनीतिक स्वरुप इसलिए भी दिखाई दे रहा है, क्योंकि इसमें राष्ट्रीय मानबिन्दुओं और केन्द्र सरकार को सीधे निशाने पर लिया जा रहा है। जेएनयू वामपंथी विचारधारा का एक बड़ा केन्द्र रहा है।

वामपंथी धारा के कार्यकर्ता देश के महानायकों के बारे में क्या सोच रखते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। पिछले घटनाक्रमों को देखें तो पाएंगे कि जेएनयू में देश के विरोध में वातावरण बनाने का काम किया जाता रहा है। वहां आतंकवादी बुरहान वानी के समर्थन में कार्यक्रम किए जाते हैं। सवाल यह कि जेएनयू में शिक्षा के नाम पर आखिर क्या हो रहा है। जहां तक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में फीस बढ़ोतरी की बात है तो यह कहना तर्कसंगत ही होगा कि विगत 19 वर्ष से विश्वविद्यालय के छात्रावास के कमरों और भोजन का शुल्क नहीं बढ़ाया गया, जबकि पिछले 19 सालों में महंगाई का ग्राफ बहुत ऊपर गया है। इस सबका भार पूरी तरह से विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के कंधों पर ही आया। देश के अन्य विश्वविद्यालयों में भी शिक्षा महंगी हो रही है, जो जेएनयू के मुकाबले बहुत अधिक है। ऐसे में विश्वविद्यालय द्वारा कुछ हद तक फीस बढ़ाना न्यायोचित कदम ही है। जिसे वहां के कई छात्र भी सही मानते हैं। लेकिन यह आंदोलन इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि इसमें परदे के पीछे राजनीतिक कार्यकर्ता भूमिका निभा रहे हैं। यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं।

खैर… यह जांच का विषय हो सकता है।देश के प्रसिद्ध अधिवक्ता सांसद डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने इस छात्र आंदोलन के बारे में बहुत ही गहरी बात कही है। उनका मानना है कि जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय को कुछ समय के लिए बंद कर दिया जाए। उनके इस कथन के गहरे निहितार्थ निकल रहे हैं। स्वामी के संकेत को विस्तार से समझना हो तो एक बार जेएनयू की गतिविधियों का अध्ययन करना चाहिए। फिर वह सब सामने आ जाएगा जो वहां होता है। कहा जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जमकर राजनीति की जाती रही है। देश के जो शिक्षा केन्द्र राजनीति के केन्द्र बनते जा रहे हैं, उन पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है।

वर्तमान में जिस प्रकार से जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय का आंदोलन चल रहा है, उसे छात्र आंदोलन कहना न्याय संगत नहीं होगा। क्योंकि, यह विशुद्ध राजनीतिक आंदोलन है। फीस बढ़ोतरी का विरोध तो मात्र बहाना है। इस आंदोलन के समर्थन में देश की संसद में कांग्रेस और वामपंथी दलों की ओर से आवाज उठाई गई। इससे यही संदेश जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जो देश विरोधी नारे लगाए गए, उनके प्रति इन राजनीतिक दलों के समर्थन का ही भाव रहा होगा। इतना ही नहीं, जब भारत तेरे टुकड़े होंगे और हमें चाहिए आजादी जैसे नारे लगाए गए थे, तब भी कांग्रेस और वाम दलों ने खुलेआम समर्थन किया था। ऐसे में सवाल यह उठता है कि कहीं यही दोनों दल छात्रों को आंदोलन करने के लिए तो नहीं उकसा रहे? अगर यह सही है तो फिर केन्द्र सरकार को दोष देना सही नहीं कहा जा सकता।

जब से देश में राजनीतिक सत्ता का परिवर्तन हुआ है, तब से ही देश में उन संस्थानों की सक्रियता दिखाई देने लगी है, जो भारत के बारे में भ्रम का वातावरण बनाने में सहायक हो सकते हैं। चाहे वह शहरी नक्सलवाद को प्रायोजित करने वाले कथित बुद्धिजीवियों की संस्था हो या फिर उनके विचार को अंगीकार करने वाली ही संस्थाएं क्यों न हों। सभी केन्द्र सरकार का विरोध करने के लिए आगे आ रहे हैं। इस विश्वविद्यालय में पढ़ाई करने वाले छात्र कभी भारतीय सेना द्वारा की जाने वाली आतंकियों के विरोध में कार्यवाही पर सवाल उठाते दिखाई देते हैं तो कभी अनुच्छेद 370 को हटाने का विरोध करते हैं। चार वर्ष पूर्व जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में छात्र संघ की उपाध्यक्ष रहीं शेहला राशिद ने भारतीय सेना के विरोध में जमकर भड़ास निकाली थी, जबकि सेना की ओर से स्पष्ट कहा गया था कि ऐसा कुछ भी नहीं है। इससे समझ में आ सकता है कि इस विश्वविद्यालय में कौन-सा पाठ पढ़ाया जाता है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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देश की युवा पीढ़ी में विदेशों के प्रति रुचि बढ़ी

—गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है

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मनोज ज्वाला

एक मीडिया संस्थान के सर्वेक्षण के अनुसार हमारे देश के पढ़े-लिखे और शहरी नौजवानों में से आधे से अधिक ऐसे हैं, जो अपने देश को पसंद नहीं करते। वे विदेशों में जाकर बस जाना चाहते हैं। लगभग दो साल पहले के उक्त सर्वेक्षण के मुताबिक उनमें से 75 फीसदी युवाओं का कहना था कि वे बे-मन और मजबूरीवश भारत में रह रहे हैं। 62.08 फीसदी युवतियों और 66.01 फीसदी युवाओं का मानना था कि भारत  में उनका भविष्य सुरक्षित नहीं है। क्योंकि, यहां अच्छे दिन आने की संभावना कम है। उनमें से 50 फीसदी का मानना था कि भारत में किसी महापुरुष का अवतरण होगा, तभी हालात सुधर सकते हैं, अन्यथा नहीं।

40 फीसदी युवाओं का मानना था कि उन्हें अगर इस देश का प्रधानमंत्री बना दिया जाए, तो वे पांच साल में इस देश का कायापलट कर देंगे।अखबार का वह सर्वेक्षण आज भी बिल्कुल सही लगता है। अगर व्यापक स्तर पर सर्वेक्षण किया जाता, तो देश छोड़ने को तैयार युवाओं का प्रतिशत और अधिक दिखता। वह सर्वेक्षण तो सिर्फ शहरों तक सीमित था। अपने देश में गांवों पर भी तेजी से शहर छाते जा रहे हैं। गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है। गौर कीजिए कि देश छोड़ने को तैयार वे युवा पढ़े-लिखे हैं और शहरों में पले-बढ़े हैं। वे किस पद्धति से किस तरह के विद्यालयों में क्या पढ़े-लिखे हैं और किस रीति-रिवाज से कैसे परिवारों में किस तरह से पले-बढ़े हैं, यह ज्यादा गौरतलब है।

विद्यालय सरकारी हों या गैर सरकारी, सभी में शिक्षा की पद्धति एक है और वह है मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा पद्धति। भारतीयता विरोधी इसी शिक्षा पद्धति को सरकारी मान्यता प्राप्त है। सरकार का पूरा तंत्र इसी तरह की शिक्षा के विस्तार में लगा हुआ है। वैसे अंग्रेजी माध्यम वाले विद्यालय सबसे अच्छे माने जाते हैं और गैर-सरकारी निजी क्षेत्र के अधिकतर विद्यालय अंग्रेजी माध्यम के ही हैं। शहरों में ऐसे ही विद्यालयों की भरमार है और जिन युवाओं के बीच उक्त मीडिया संस्थान ने उपरोक्त सर्वेक्षण किया उनमें से सर्वाधिक युवा ऐसे ही तथाकथित ‘उत्कृष्ट’ विद्यालयों से पढ़े-लिखे हुए हैं। अब रही बात यह कि इन विद्यालयों में आखिर शिक्षा क्या और कैसी दी जाती है, तो यह इन युवाओं की उपरोक्त सोच से ही स्पष्ट है।

जाहिर है, उन्हें शिक्षा के नाम पर ऐसी-ऐसी डिग्रियां दी जाती हैं, जिनके कारण वे महात्वाकांक्षी, स्वार्थी बनकर असंतोष, अहंकार, खीझ, पलायन एवं हीनता-बोध से ग्रसित हो जाते हैं और कमाने-खाने भर थोड़े-बहुत हुनर हासिल कर स्वभाषा व स्वदेश के प्रति ‘नकार’ भाव से पीड़ित होकर विदेश चले जाते हैं।थॉमस विलिंग्टन मैकाले कोई शिक्षा-शास्त्री नहीं था। वह एक षड्यंत्रकारी था, जिसने भारत पर ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जड़ें जमाने की नीयत से भारतीय शिक्षा-पद्धति की जड़ें उखाड़कर मौजूदा शिक्षा-पद्धति को प्रक्षेपित किया था। जो आज भी उसी रूप में कायम है। 20 अक्टूबर 1931 को लंदन के रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ फौरन अफेयर्स के मंच से महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘अंग्रेजी शासन से पहले भारत की शिक्षा-व्यवस्था इंग्लैण्ड से भी अच्छी थी।’ उस पूरी व्यवस्था को सुनियोजित तरीके से समूल नष्ट कर देने के पश्चात ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जरूरतों के मुताबिक उसके रणनीतिकारों ने लम्बे समय तक बहस-विमर्श कर के मैकाले की योजनानुसार यह शिक्षा-पद्धति लागू की थी।

मैकाले ने ब्रिटिश पार्लियामेंट की शिक्षा समिति के समक्ष कहा था ‘हमें भारत में ऐसा शिक्षित वर्ग तैयार करना चाहिए, जो हमारे और उन करोड़ों भारतवासियों के बीच जिन पर हम शासन करते हैं, उन्हें समझाने-बुझाने का काम कर सके। जो केवल खून और रंग की दृष्टि से भारतीय हों, किन्तु रुचि, भाषा व भावों की दृष्टि से अंग्रेज हों।’ विदेशों में बस जाने को उतावले भारतीय युवाओं ने पूरी मेहनत व तबीयत से मैकाले शिक्षा-पद्धति को आत्मसात किया है, ऐसा समझा जा सकता है। यहां प्रसंगवश मैकाले के बहनोई चार्ल्स ट्रेवेलियन द्वारा ब्रिटिश पार्लियामेंट की एक समिति के समक्ष ‘भारत में भिन्न-भिन्न शिक्षा-पद्धतियों के भिन्न-भिन्न परिणाम’ शीर्षक से प्रस्तुत किये गए एक लेख का यह अंश भी उल्लेखनीय है कि ‘मैकाले शिक्षा-पद्धति का प्रभाव अंग्रेजी राज के लिए हितकर हुए बिना नहीं रह सकता। हमारे पास उपाय केवल यही है कि हम भारतवासियों को यूरोपियन ढंग की उन्नति में लगा दें। इससे हमारे लिए भारत पर अपना साम्राज्य कायम रखना बहुत आसान और असंदिग्ध हो जाएगा।’ ऐसा ही हुआ। बल्कि, मैकाले की योजना तो लक्ष्य से ज्यादा ही सफल रही।

हमारे देश के मैकालेवादी राजनेताओं ने अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासन की समाप्ति के बाद भी उनकी अंग्रेजी-मैकाले शिक्षा-पद्धति को न केवल यथावत कायम रखा, बल्कि उसे और ज्यादा अभारतीय रंग-ढंग में ढाल दिया। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष लक्षित प्राचीन भारतीय शिक्षा-पद्धति को अतीत के गर्त में डालकर शिक्षा को उत्पादन-विपणन-मुनाफा-उपभोग-केन्द्रित बना देने और उसे नैतिक सांस्कृतिक मूल्यों से विहीन कर देने तथा राष्ट्रीयता के प्रति उदासीन बना देने का ही परिणाम है कि हमारी यह युवा पीढ़ी महज निजी सुख-स्वार्थ के लिए अपने देश से विमुख हो जाना पसंद कर रही है। उसे विदेशों में ही अपना भविष्य दीख रहा है।

माना कि हमारे देश में तरह-तरह की समस्याएं हैं, किन्तु इनसे जूझने और इन्हें दूर करने की बजाय पलायन कर जाने अथवा कोरा लफ्फाजी करने कि हमें प्रधानमंत्री बना दिया जाए तो हम देश को सुंदर बना देंगे, अति महात्वाकांक्षा-युक्त मानसिक असंतुलन का ही द्योत्तक है। लेकिन आधे से अधिक ये शहरी युवा मानसिक रुप से असंतुलित नहीं हैं, बल्कि असल में वे पश्चिम के प्रति आकर्षित हैं। इसके लिए हमारे देश की चालू शिक्षा-पद्धति का पोषण करने वाले हमारे राजनेता ही जिम्मेवार हैं। यह ‘यूरोपियन ढंग की उन्नति’ के प्रति बढ़ते अनावश्यक आकर्षण का परिणाम है। इस मानसिक पलायन को रोकने के लिए जरूरी है कि हम अपने बच्चों को हमारे राष्ट्र की जड़ों से जोड़ने वाली और संतुलित समग्र मानसिक विकास करने वालीप्राचीन भारतीय पद्धति से भारतीय भाषाओं में समस्त ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा देने की सम्पूर्ण व्यवस्था कायम करें।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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भाई-बहन में प्रेम भाव बढ़ाता है भैया दूज

–बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था

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योगेश कुमार गोयल

(भैया दूज, 29 अक्टूबर पर विशेष)

भाई-बहन के दिलों में पावन संबंधों की मजबूती और प्रेमभाव स्थापित करने वाला पर्व है भैया दूज। इस दिन बहनें अपने भाईयों को तिलक लगाकर ईश्वर से उनकी दीर्घायु की कामना करती हैं। कहा जाता है कि इससे भाई यमराज के प्रकोप से बचे रहते हैं। दीपावली के दो दिन बाद अर्थात कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाए जाने वाले इस पर्व को ‘यम द्वितीया’ व ‘भ्रातृ द्वितीया’ के नाम से भी जाना जाता है। बहुत से भाई-बहन सौभाग्य तथा आयुष्य की प्राप्ति के लिए इस दिन यमुना अथवा अन्य पवित्र नदियों में साथ-साथ स्नान भी करते हैं। भैया दूज मनाने के संबंध में कई किवंदतियां प्रचलित हैं। एक कथा यमराज और उनकी बहन यमुना देवी से संबंधित है। बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था। यमुना अपने भाई यमराज से बहुत स्नेह करती थीं और अक्सर उनसे अनुरोध करती रहती थीं कि वे अपने इष्ट-मित्रों सहित उसके घर भोजन के लिए पधारें लेकिन यमराज हर बार उसके निमंत्रण को किसी न किसी बहाने से टाल जाते। कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमुना ने यमराज को एक बार फिर भोजन के लिए आमंत्रित किया।

उस समय यमराज ने विचार किया कि मैं तो अपने कर्त्तव्य से बंधा सदैव प्राणियों के प्राण ही हरता हूं। इसलिए इस चराचर जगत में कोई भी मुझे अपने घर नहीं बुलाना चाहता। लेकिन बहन यमुना तो मुझे बार-बार अपने घर आमंत्रित कर रही है। इसलिए अब तो उसका निमंत्रण स्वीकार करना ही चाहिए।यमराज को अपने घर आया देख यमुना की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने भाई का खूब आदर-सत्कार करते हुए उनके समक्ष नाना प्रकार के व्यंजन परोसे। बहन के आतिथ्य से यमराज बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे कोई वर मांगने को कहा। इस पर यमुना ने उनसे अनुरोध किया कि आप प्रतिवर्ष इसी दिन मेरे घर आकर भोजन करें और मेरी तरह जो भी बहन इस दिन अपने भाई का आदर-सत्कार करे, उसे तुम्हारा भय न रहे। यमराज ने बहन यमुना को उसका इच्छित वरदान दे दिया। ऐसी मान्यता है कि उसी दिन से ‘भैया दूज’ का पर्व मनाया जाने लगा। भैया दूज के संबंध में और भी कई कथाएं प्रचलित हैं। ऐसी ही एक कथा के अनुसार, एक ब्राह्मण की दो संतानें थी।

एक पुत्र एवं एक पुत्री। पुत्री बहुत समझदार एवं गुणवती थी। वह अपने भाई से जी-जान से प्यार करती थी। एक दिन उसका भाई उससे मिलने उसकी ससुराल पहुंचा। उस समय वह सूत कातने में व्यस्त थी। अतः उसे भाई के आने का पता ही न चल सका। भाई भी बिना कुछ बोले चुपचाप एक ओर बैठा रहा। जब थोड़ी देर बाद बहन की नजर उस पर पड़ी तो भाई को अपने घर आया देख उसे बेहद खुशी हुई। उसने भाई का भरपूर आदर-सत्कार किया। अगले दिन भाई को वापस लौटना था। अतः रास्ते के लिए वह आटे के पकवान बनाने के उद्देश्य से चक्की में आटा पीसने लगी। अनजाने में चक्की में बैठा सांप भी आटे के साथ पिस गया। उसी आटे के पकवान एक पोटली में बांधकर उसने भाई को रास्ते में खाने के लिए देकर विदा किया। भाई के घर से जाने के बाद जब उसे यह मालूम हुआ कि आटे में सांप पिस गया है तो अपने पुत्र को पालने में ही सोता छोड़कर वह अपने भाई के प्राणों की रक्षा के लिए दौड़ी। कुछ दूर जाने पर उसे एक पेड़ की छांव में अपना भाई सोता दिखाई दिया। तब तक उसने पोटली में से कुछ भी नहीं खाया था। उसने भगवान का शुक्रिया अदा किया और पोटली उठाकर दूर फेंक दी तथा भाई के साथ मायके की ओर चल दी।

रास्ते में उसने देखा कि भारी-भारी शिलाएं आकाश में उड़ रही हैं। उसने एक राहगीर से इस रहस्य के बारे में जानना चाहा तो उसने बताया कि जो बहन अपने भाई पर कभी नाराज न होती हो और उसे दिलो-जान से चाहती हो, उस भाई की शादी के समय ये शिलाएं उसकी छाती पर रखी जाएंगी। थोड़ी दूर चलने पर उसे नाग-नागिन दिखाई दिए। नाग ने बताया कि ये शिलाएं जिस व्यक्ति की छाती पर रखी जाएंगी, हम उसे डंस लेंगे। जब बहन ने इस विपत्ति से बचने का उपाय पूछा तो नाग-नागिन ने बताया कि अगर भाई के विवाह के समय उसके सभी कार्य बहन स्वयं करे, तभी भाई की जान बच सकती है।जब उसके भाई के विवाह के लग्न का शुभ मुहूर्त आया तो वह भाई को पीछे धकेलती हुई स्वयं ही लग्न चढ़वाने के लिए आगे हो गई और घोड़ी पर भी स्वयं चढ़ गई। परिवारजन और संबंधी उसके इस विचित्र व्यवहार से हैरान तथा क्रोधित थे। उसके घोड़ी पर चढ़ते ही शिलाएं उड़ती-उड़ती आई लेकिन घोड़ी पर किसी पुरूष की जगह एक महिला को बैठी देख वापस मुड़ गई। जब सुहागरात का समय आया तो वह भाई को पीछे कर खुद भाभी के साथ सोने उसके कमरे में चली गई।

परिवार के सभी सदस्य तथा सभी रिश्तेदार उसके इस अजीबोगरीब व्यवहार से बेहद आश्चर्यचकित और खफा थे। उन्हें उस पर गुस्सा तो बहुत आ रहा था लेकिन उसके जिद के समक्ष सभी विवश थे। सुहागरात पर नियत समय पर नाग-नागिन उसके भाई को डंसने कमरे में पहुंच गए लेकिन उसने नाग-नागिन को मारने की सारी तैयारी पहले ही कर रखी थी। आखिरकार उसने नाग-नागिन का काम तमाम कर दिया। उसके बाद वह निश्चिंत होकर सो गई। सुबह होने पर सभी मेहमानों को विदा करने के बाद परिवार वालों ने सोचा कि अब इस बला को भी कुछ बचा-खुचा देकर यहां से चलता कर दिया जाए लेकिन नींद से जागने पर जब उसने पूरी घटना के बारे में सब को विस्तार से बताया कि किस प्रकार वह अपने बच्चे को पालने में ही सोता छोड़कर दौड़ी-दौड़ी भाई के प्राण बचाने के लिए उसके पीछे चली आई और सभी को नाग-नागिन के मृत शरीर दिखाए तो सभी की आंखों में आंसू आ गए।

भाई के प्रति उसका असीम प्यार तथा समर्पण भाव देखकर उसके प्रति सभी का हृदय श्रद्धा से भर गया।भाई-भाभी तथा माता-पिता ने उसे ढेर सारे उपहारों से लादकर बड़े मान-सम्मान के साथ खुशी-खुशी ससुराल से विदा किया। भाई-बहन के बीच इसी प्रकार के पावन संबंध, प्रेमभाव तथा उनके दिलों में आपसी संबंधों को मजबूत बनाने के लिए ही ‘भैया दूज’ पर्व मनाया जाता है।

(लेखक स्तंभकार हैं।)

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