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प्रसंगवश/आर.के.सिन्हा….. जेएनयू में क्यों तार-तार हो गई गुरु-शिष्य परंपरा

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नई दिल्ली
अगले वर्ष जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी (जेएनयू) अपनी स्थापना के 50 साल की यात्रा पूरी कर रहा है। किसी भी शिक्षण संस्थान के लिए पांच दशकों का सफर पूरा करना महत्वपूर्ण उपलब्धि ही माना जाएगा। जेएनयू से देश को बहुत उम्मीदें थी, अभी भी हैं। यहां से देश को शोधार्थी,नौकरशाह, विद्वान, कलाकार, उद्यमी वगैरह मिलें, इसी उद्देश्य से इसकी स्थापना हुई थी। लेकिन, इधर हाल के वर्षों में यौन उत्पीड़न के मामलों जिस तेजी के साथ जेएनयू में बढे हैं और सामने आ रहे हैं, वे चिंता अवश्य पैदा करते हैं। छात्रोओं का अपने अध्यापकों और सहपाठियों पर बार-बार यौन उत्पीड़न के आरोप लगाना यहां पर हाल के दौर में व्याप्त सडांध और गड़बड़ी को दर्शाता है। अंग्रेजी अखबार डीएनए ने रविवार 15 अप्रैल, 2015 को अपने पहले पन्ने पर प्रकाशित एक खबर में बताया कि जेएनयू में वर्ष 2013-14 में यौन उत्पीड़न के 25, 2014-15 में 35 और 2015-16 में 42 मामले दर्ज किए गए। ये दर्ज मामले हैं। हुए कितने होंगे, यह तो कोई भी अंदाजा लगा सकता है। जबतक पानी सर के ऊपर से नहीं बहने लगता, शायद ही कोई अबला शिकायत दर्ज करने को तैयार होती है। बदनामी तो आखिर उसकी ही होती है। देश के सर्वोत्कृष्ट कहे जाने वाले इस शिक्षण संस्थान में टी हर महीने दो-तीन यौन उत्पीड़न के केस सामने आ रहे हैं। इससे जेएनयू बिरादरी की छीछालेदर तो होती ही है। स्थिति इतनी बदतर हो रही है कि एक मामला शांत होता नहीं है कि दूसरे पर हंगामा होने लगता है। एक ताजा मामले में जेएनयू के एक और प्रोफेसर के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने छात्रा के यौन उत्पीड़न का मामला दर्ज किया है। जेएनयू के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज में प्रोफेसर अजय कुमार के खिलाफ मामला दर्ज किया है। पीड़ित छात्रा ने प्रोफेसर के खिलाफ वसंत कुंज थाने में शिकायत दर्ज कराई कि उन्होंने (प्रोफेसर) उसके साथ अश्लील अभद्रता की। प्रोफेसर के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 354 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है। एक महीने के दौरान ही जेएनयू में छात्रा उत्पीड़न का यह तीसरा मामला है। इससे पहले दो अलग-अलग मामलों में चार प्रोफेसर आरोपी हैं। क्या यह शोभा देता है कि किसी शिक्षा के प्रतिष्ठित मंदिर में अध्यापक अपनी छात्राओं का यौन उत्पीड़न करें? गुरु द्रोणाचार्य-एकलव्य की परंपरा वाले इस देश में गुरु-शिष्य के बीच की खाई गहरी ही होती जा रही रही है।पढ़ने और पढ़ाने वालों के बीच तालमेल का साफ अभाव दिख रहा है। दोनों के रास्ते अलग-अलग क्यों हैं? आखिर कमी किस स्तर पर है? इस पर समाज और जेएनयू बिरादरी को सोचना तो होगा ही ।

पिछले दिनों जेएनयू के प्रोफेसर अतुल जौहरी को यौन उत्पीड़न के मामले में दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार कर पटियाला हाउस कोर्ट में पेश किया था। उन पर यौन उत्पीड़न के आठ मामले दर्ज हैं। उनकी गिरफ्तारी की मांग को लेकर छात्रों ने थाने पर प्रदर्शन भी किया था। प्रोफेसर परआरोप है कि वे अक्सर आपत्तिजनक द्विअर्थी टिप्पणियां करते थे, यौन संबंध बनाने के लिए खुले तौर पर मांग करने के अलावा लगभग सभी लड़कियों की शारीरिक बनावट को लेकर टिप्पणी करते थे। अगर कोई लड़की विरोध करती तो उसे तरह-तरह से प्रताड़ित करते थे। प्रोफेसर पर लगे आरोपों को सुनकर शर्म आती है। यद्यपि प्रोफेसर जौहरी इन आरोपों को खारिज कर रहे हैं। लेकिन,आप यह तो मानेंगे ही कि जेएनयू में सब कुछ ठीक तो नहीं है। राजधानी दिल्ली में दिल्ली यूनिवर्सिटी, जमिया मिलिया यूनिवर्सिटी और आईआईटी जैसे शिक्षण संस्थान भी हैं। वहां पर यौन उत्पीड़न के मामले शायद ही कभी सुनाई देते हैं। फिर जेएनयू में ही क्यों हर तरह की अराजकता व्याप्त रहती है? निश्चित रूप से यहां के छात्र देश के सबसे मेधावी छात्रों में शुमार होते हैं। इधर की फैकल्टी का भी सारे देश में अच्छा-खासा सम्मान रहा है। यहां प्रो. कमला प्रसाद, प्रो. ईश्वरी प्रसाद, प्रो. कृष्णा भारद्वाज, प्रो. धर्मा कुमार, डॉ. अमुन, डा. पुष्पेश पंत जैसे दर्जनों अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुके शिक्षाविद रहे हैं। गड़बडी तो इधर कुछ सालों में ही पैदा हुई है, जिसकी वजह से यहां से सिर्फ धरनों और प्रदर्शनों की ही खबरें बाहर आती हैं। पिछले दशकों से जेएनयू में कोई अन्तरराष्ट्रीय स्तर का शोध कार्य हुआ हो, ऐसा भी सुनने को नहीं मिला ।

जेएनयू कैंपस को आप देश की किसी भी अन्य यूनिवर्सिटी के कैंपस से अधिक आकर्षक मान सकते हैं। हजारों एकड़ में फैले इस विशाल हरियाली भरे परिसर में प्रवेश करते ही आपको समझ आ जाएगा कि ये कोई सामान्य शिक्षण संस्थान नहीं है। चारों तरफ हरियाली और पहाड़ियों के बीच-बीच में क्लास रूम, लाइब्रेरी, हॉस्टल, प्रशासनिक ब्लॉक, फैक्ल्टी के फ्लैट, जिम आदि हैं। जेएनयू कैंपस के डिजाइनर प्रख्यात आर्किटेक्ट सी.पी.कुकरेजा ने जब इसका डिजाइन तैयार किया होगा तो उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि आगे चलकर यहां पर पढ़ाई कम और नारेबाजी अधिक होगी। सन 1969 में स्थापित जेएनयू में देश को बहुत कुछ देने की संभावनाएं हैं। पर ये अपनी क्षमताओं के अनुसार काम तो नहीं कर रहा। यहां से सकारात्मक खबरें कम और नकारात्मक खबरें अधिक आती हैं। जरा सोचिए कि जेएनयू में संसद पर हमले के गुनहगार अफजल गुरु की बरसी मनाई जाती है।जेएनयू में अफजल गुरु की बरसी को आयोजित करने में वामपंथी संगठन और कश्मीरी छात्र सक्रिय रहते हैं। पिछले साल बाकायदा इसके लिए कैंपस में एक सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया। यहां अफजल गुरु को फांसी दिए जाने के वक्त भी बवाल हुआ था। जेएनयू ने देश को बड़े-बड़े बुद्धिजीवी दिए हैं। दक्षिणपंथी और वामपंथी विचारधाराके बीच यहां हमेशा से बौद्धिक टकराव होते रहे हैं। बिहार के दिग्विजय सिंह (अब स्वर्गीय), सीताराम येचुरी, निर्मला सीतारमण जैसे राजनीतिज्ञ यहीं के पूर्ववर्ती छात्र हैं। यहां तक सब ठीक है। लोकतंत्र में मत-भिन्नता रह सकती है।आपको दूसरी विचारधारा का भी आदर करना होगा। लेकिन, अब वहां पर राष्ट्रद्रोह और यौन उत्पीड़न के मामलों में अप्रत्याशित इजाफा चिंता पैदा करता है। इन कारणों के चलते जेएनयू की छवि पर बदनुमा दाग लग गया है। इस छवि को ठीक करने की आवश्यकता है। जेएनयू बिरादरी को भी सोचना होगा कि यहां से अब तक देश को कोई भी सम्मानित उपन्यासकार,रंगकर्मी, एक्टर, चिंतक, उद्यमी, खिलाड़ी नहीं मिला। अगर मुझे जानकारी नहीं है तो मेरा इस लिहाज से कोई भी ज्ञानवर्द्धन कर सकता है। क्या यहां शोध करने वालों ने कोई अनूठा मूल काम करके दिखाया है? यह जरूर है कि जेएनयू के बहुत से छात्र-छात्राएं हर साल यूपीएससी की परीक्षा उत्तीर्ण कर आईएएस, आईपीएस, आईएफएस जैसे अधिकारी बनते हैं। कुछ मीडिया में भी अपनी शेखी बघारते मिल जायेंगे। पहली नजर में बस यही उपलब्धि सामने आती है। क्या यह पर्याप्त है? क्या जेएनयू से “देश के टुकड़े करने” जैसे नारों केअतिरिक्त भी कुछ सुनने को मिलेगा?

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सूचना, जनसंपर्क एवं भाषा विभाग द्वारा अमृत महोत्सव के अंतर्गत 8 दिसंबर तक चलाया जा रहा है विशेष प्रचार अभियान : डीआईपीआरओ धर्मवीर सिंह

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कैथल । जिला सूचना एवं जन संपर्क अधिकारी धर्मवीर सिंह ने बताया कि विभाग के महानिदेशक अमित अग्रवाल के निर्देशानुसार तथा उपायुक्त प्रदीप दहिया के मार्ग दर्शन में प्रचार अभियान पूरे यौवन पर है। यह विशेष अभियान आगामी 8 दिसंबर तक चलाया जाएगा। कार्यालय द्वारा प्रिंट, इलैक्ट्रोनिक, सोशल मीडिया के माध्यम से प्रचार किया जा रहा है, वहीं भजन पार्टियों द्वारा गांव-गांव लोक गीतों के माध्यम से सरकार की नीतियों के बारे में लोगों को जागरूक किया जा रहा है।

भियान के तहत गांव-गांव लोक गीतों के माध्यम से सरकार की नीतियों का किया जा रहा है प्रचार-प्रसार

कार्यालय की पार्टियों द्वारा एक दिन में दो-दो गांव कवर किए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि विभागीय पार्टी द्वारा 29 नवंबर को सजूमा, दीवाल, गुहणा, धुंधरेहड़ी, 30 नवंबर को चौसाला, चंदाना, वजीर नगर, कैलरम, एक दिसंबर को कलायत, खड़क पांडवा, रामगढ़, दो दिसंबर को जुलानी खेड़ा, बालु रापडिय़ा, बालु बिढ़ान, बालू गादड़ा, तीन दिसंबर को सौंगल, जाखौली दाबदल, माजरा, जाखौली कमान, चार दिसंबर को किठाना, माजरा, रोहेड़ा, खेड़ी तेलियां, छ: दिसंबर को किछाना, नरवल, कोटड़ा, संतोख माजरा, सात दिसंबर को कसान, सौंगरी, तारागढ़, गुलियाणा, आठ दिसंबर को खुरड़ा, राजौंद, खिड़कली, बीरबांगडा को कार्यक्रम किए जाएंगे।
उन्होंने बताया कि सरकार द्वारा मुख्यमंत्री परिवार उत्थान योजना, परिवार पहचान पत्र योजना, जगमग योजना, प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत जन आरोग्य योजना, श्रम एवं किसान निधि योजना इत्यादि स्कीमों के बारे में भजनों और गीतों तथा इलैक्ट्रोनिक, प्रिंट मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से प्रचार किया जा रहा है। इतना ही नही आयोजित किए गए कार्यक्रमों के दौरान लोगों को कोरोना से बचाव के साथ-साथ डेंगू तथा मलेरिया इत्यादि से बचाव के बारे में भी लोगों को जागरूक किया जा रहा है।

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हरियाणा के MBA पास युवक ने नौकरी छोड़कर शुरू किया ये बिजनेस, आज कमाई लाखों में…

प्रदीप ने साल 2019 में उन्होंने अपना आउटलेट शुरू किया ही था की 2020 की शुरुआत में लॉकडाउन लग गया. वह कहते हैं कि उस समय उनके साथ सात कर्मचारी जुड़े हुए थे. उनका आउटलेट भले ही बंद था लेकिन उन्होंने सभी कर्मचारियों के रहने-खाने की व्यवस्था की और सभी को उनकी 75% सैलरी भी दी. इसके बाद, जिन किसानों से वह दूध ले रहे थे, उनसे उन्होंने कहा कि वे इस दूध का घी बनाकर रखें ताकि लॉकडाउन खुलने पर इसे काम में लिया जा सके.

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रोहतक. आज हम आपको एक ऐसे ही शख्स की कहानी सुनाने जा रहे हैं, जिनका नाम प्रदीप है. प्रदीप ने नौकरी छोड़ने के बाद स्टार्टअप के तहत दूध का कारोबार शुरू किया और इससे वे महीने में लाखों रुपए की कमाई कर रहे हैं. प्रदीप श्योराण हरियाणा के रहने वाले है. प्रदीप ने 2018 में अपनी अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर बागड़ी मिल्क पार्लर की शुरुआत की.

हालांकि पहले यह सिर्फ एक स्टॉल हुआ करता था, लेकिन आज रोहतक में उनका अच्छा-खासा आउटलेट भी है. जो कारोबार कभी सिर्फ दूध से शुरू हुआ था आज वो लगभग 20 तरह के अलग-अलग प्रोडक्ट्स तक पहुंच चुका है.

आज न केवल हरियाणा में बल्कि दिल्ली, पंजाब, राजस्थान से भी लोग प्रदीप के ‘बागड़ी मिल्क पार्लर’ पर आते हैं. उनके उत्पादों का आनंद लेते हैं. इस बारे में प्रदीप का कहना है कि छोटे-बड़े शहरों के पढ़े-लिखे और किसान परिवारों के युवा इस तरह से अपना खुद का काम करके अपने परिवार को आगे बढ़ा सकते हैं.

प्रदीप, मूल रूप से हरियाणा के चरखी दादरी जिला स्थित मांढी पिरानु गांव के निवासी हैं. वह एक किसान परिवार से ताल्लुक रखते है और उनके पिता स्कूल में नौकरी करते थे. प्रदीप ने बताया कि उन्होंने ग्रैजुएशन पूरी की और सिविल परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी लेकिन इसमें सफलता नहीं मिली तब उन्होंने एमबीए में दाखिला ले लिया. एमबीए की डिग्री भी अच्छे नंबरों से पास की. लेकिन शुरुआत में वैसी नौकरी नहीं मिल पाई, जितनी एक युवा को पढ़ाई के दौरान उम्मीद होती है.

कुछ समय बाद उन्हें ह्वेल्स इलेक्ट्रिक में अच्छी नौकरी मिल गयी और 2018 तक वो उस कंपनी से जुड़े भी रहे. नौकरी में उनका कई बार प्रमोशन हुआ और सैलरी भी अच्छी खासी थी. लेकिन उन्हें इस काम से संतुष्टि नहीं मिल पा रही थी.कुछ समय बाद उन्हें ह्वेल्स इलेक्ट्रिक में अच्छी नौकरी मिल गयी और 2018 तक वो उस कंपनी से जुड़े भी रहे. नौकरी में उनका कई बार प्रमोशन हुआ और सैलरी भी अच्छी खासी थी. लेकिन उन्हें इस काम से संतुष्टि नहीं मिल पा रही थी.

प्रदीप ने तय कर लिया कि नौकरी छोड़कर किसी बिज़नेस की शुरुआत करेंगे. उनके पास अपनी कुछ सेविंग्स थी और कुछ घरवालों का सपोर्ट भी मिल गया. 2018 में नौकरी छोड़ कर उन्होंने लगभग 24 राज्यों में अलग-अलग किसानों, व्यवसायियों के यहां दौरा किया. क्योंकि बिज़नेस तो करना था, लेकिन कुछ ऐसा बिज़नेस जिसकी मार्किट में मांग हो और जो चलने वाला हो.प्रदीप ने तय कर लिया कि नौकरी छोड़कर किसी बिज़नेस की शुरुआत करेंगे. उनके पास अपनी कुछ सेविंग्स थी और कुछ घरवालों का सपोर्ट भी मिल गया. 2018 में नौकरी छोड़ कर उन्होंने लगभग 24 राज्यों में अलग-अलग किसानों, व्यवसायियों के यहां दौरा किया. क्योंकि बिज़नेस तो करना था, लेकिन कुछ ऐसा बिज़नेस जिसकी मार्किट में मांग हो और जो चलने वाला हो.

प्रदीप ने बताया कि अपने सभी दौरों से उन्हें एक ही बात समझ में आई कि किसान तीन तरह के बिज़नेस कर सकते हैं- पहला अनाज, दलहन आदि से, दूसरा दूध से और तीसरा अंडे आदि का. तो हमने दूध में आगे बढ़ने के बारे में सोचा.

रोहतक में दो बड़े पार्क हैं, जहां सुबह-शाम काफी भीड़ रहती है. इन्हीं पार्कों के बाहर अपना ‘बागड़ी मिल्क पार्लर’ लगाना शुरू किया. दिसंबर 2018 में हमने शुरुआत की तो सर्दियों के मौसम में गर्म दूध मिट्टी के कुल्हड़ में देते थे. उन्होंने सोचा कि लोग चाय तो पीते ही हैं तो हो सकता है हमारा दूध भी पी लें और देखते ही देखते सचमुच हमारा आईडिया काम कर गया.

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गुरुग्राम की सड़कों का हाल बदहाल , इतना बड़ा गड्ढा कि गिर गया सांड, निकालने के लिए बुलानी पड़ी JCB

विभाग ने इन गड्ढों को खोदकर इन्हें ढकना मुनासिब नहीं समझा. विभाग की इस लापरवाही का खामियाजा अब आम लोगों के साथ-साथ बेजुबान जानवरों को भी उठाना पड़ रहा है

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लोगों ने गड्ढा खोदने वाली कंपनी के खिलाफ सोहना थाने में दी शिकायत.

गुरुग्राम के सोहना में एक सांड गड्ढों में फंस गया. सांड के फंसे जानें की खबर फैलते ही लोगों की भीड़ वहां पर पहुंच गई. लोगों ने पुलिस को भी मामले की सूचना दी. सांड को निकालने के लिए जेसीबी मंगवाई गई. जेसीबी की मदद से सांड को एक घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद बाहर निकाला गया. लोगों का कहना है कि विभाग की इलापरवाही का खामियाजा अब आम लोगों के साथ-साथ बेजुबान जानवरों को भी उठाना पड़ रहा है.

इस मामले में लोगों ने कंपनी के खिलाफ एक शिकायत सोहना थाने में दी है. काफी समय से लोग इन गड्ढों की शिकायत कर रहे थे. इससे पहले भी कई हादसे इन गड्ढों के कारण में हो चुके हैं. लोगों का कहना है कि एक निजी कंपनी ने एक नई लाइन दमदमा रोड से जीएलएस तक डाली है. जिसके लिए विभाग ने जगह-जगह पर गहरे गहरे गड्ढे खोदे हुए हैं.

मौके पर पुलिस को भी सूचना दी गई. पुलिस ने भी मौके पर आकर इस सांड को बाहर निकलवाया. लोगों ने बताया कि इससे पहले भी इन गड्ढों में एक बाइक सवार बुरी तरह घायल हो गया था. शिकायतों के बाद भी विभाग इन गड्ढों को नहीं भर रहा जो कि लोगों के लिए एक हादसे का कारण बन रही है. इसको लेकर कई बार शिकायत दी जा चुकी है. इससे पहले भी कई हादसे इन गड्ढों के कारण हो चुके हैं.

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