Connect with us

लेख

वैदिक कर्मफल सिद्धान्त

Published

on
13 JULY
वैदिक मान्यता है कि जीवात्माएँ कर्म करने में स्वतन्त्र हैं क्योंकि प्रत्येक जीवात्मा को ईश्वर की न्यायव्यवस्था में अपने अच्छे तथा बुरे किए कर्मों का फल भोगना पड़ता है। शुभ कर्मों का फल सुख तथा अशुभ कर्मों का फल दुःख जीवात्माएं भोगती हैं। प्रश्न है कि कर्म क्या है। कर्म शब्द “कृ” धातु से बना है जिसका अर्थ होता है क्रिया करना। संस्कृत के विद्वानों ने कर्म की परिभाषा की है ‘यत्क्रियते तत्कर्म’ अर्थात् जो किया जाता है उसे कर्म कहते हैं। कर्म का अभिप्राय है चेतन द्रव्य की सोची समझी क्रिया। जड़ द्रव्य की क्रिया कर्म नहीं कहलाती। पृथ्वी का अपनी धूरी पर घूमना, सूर्य की ग्रहों द्वारा परिक्रमा करना क्रिया तो है कर्म नहीं। कर्म उन्हें ही कहते है जो चेतन द्रव्य-आत्मा द्वारा निश्चयपूर्वक क्रिया (रूप में) किये जाते हैं। आंख का झपकना, दिल का धड़कना आदि नैसर्गिक क्रियाएं कर्म के अन्तर्गत नहीं आती।
प्रश्न यह होता है कि कर्म का आरंभ कब से हुआ? इसका सीधा उत्तर है कि जब से शरीर तथा आत्मा का सम्बन्ध हुआ। यहां यह जानना आवश्यक है कि जिस प्रकार सृष्टि प्रवाह से अनादि है इसी प्रकार जीव तथा शरीर का सम्बन्ध अनादि है इसलिए कर्म भी प्रवाह से अनादि है। अत: कर्म का आरम्भ नहीं होता। कर्म और जीवात्मा का स्वाभाविक सम्बन्ध है अतः जीवात्मा बिना कर्म के नहीं रह सकता। पाणिनि ने अष्टाध्यायी में ‘स्वतंत्र कर्त्ता’ सूत्र द्वारा कहा कि कर्त्ता कर्म करने में स्वतन्त्र है। कर्त्ता यदि चाहे तो कल्याण का कार्य अर्थात् परोपकार करे, दीन-दुखियों की सेवा करे अथवा अशिव अर्थात् अन्याय, अत्याचार, चोरी, बलात्कार करे। परन्तु उसका फल उसके हाथ में नहीं है। जैसा कि महाभारत में कहा है: ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’। कर्म करना अधिकार में है परन्तु उसका फल नहीं है। फल दाता दूसरा है।
वेद में एक मन्त्र में स्पष्ट कहा है:-
न किल्विषमत्र नाधारो अस्ति न यन्मित्रै: समममान एति।
अनूनं निहितं पात्रं न एतत् पक्तारं पक्व: पुनराविशति।। -अथर्व १२/३/४८
अर्थ- “कर्मफल के विषय में कोई त्रुटि कभी नहीं होती और किसी की सिफारिश भी नहीं सुनी जाती, ऐसी बातें नहीं होती। यह भी नहीं है कि मित्रों के साथ सङ्गति करता हुआ जा सकता है। कर्मफल रूपी तराजू पूर्ण है बिना किसी घटा-बढ़ी के सुरक्षित रखी है। पकाने वाले को पकाया हुआ पदार्थ, कर्मफल के रूप में आ मिलता है, प्राप्त हो जाता है।”
उपर्युक्त मन्त्र में स्पष्ट किया गया है कि ईश्वरीय न्याय व्यवस्था में प्रत्येक को उसके कर्मों के अनुसार फल प्राप्त होता है। यदि धर्म के मार्ग पर चलकर कल्याणार्थ कर्म है तो इसका फल पुण्य तथा अधर्मपूर्ण कार्य है तो पाप फल प्राप्त होगा। जिसे हम दूसरे शब्दों में धर्म वाले कार्य का फल स्वर्ग (सुख) तथा अधर्म वाले कार्य का फल नरक (दुःख) भोगना पड़ेगा ऐसा कहते हैं। कहा भी है-
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।
प्रत्येक जीव को अपने किये हुए अच्छे एवं बुरे कर्मों के फल को भोगना पड़ता है।
कर्म कितने प्रकार के हैं यदि हम इस विषय में विचार करें तो कर्म का साधन मन, वाणी और शरीर हैं। इनकी दृष्टि से कर्म तीन प्रकार के होते हैं- मानसिक, वाचिक तथा शारीरिक। प्रकृति के तीन गुण होते हैं- सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण। इन्हीं गुणों के आधार पर जो कर्म किये जाते हैं उन्हें सात्विक, राजसिक, सामसिक कर्म कहते हैं। मनु महाराज ने सात्विक कर्मों की व्याख्या इस प्रकार की है-
वेदाभ्यासस्तपो ज्ञानं शौचमिन्द्रियनिग्रह:।
धर्मक्रियात्मचिंता च सात्विकं गुण लक्षणम्।। -मनु. १२/३१
अर्थ- जो वेदों का अभ्यास, धर्मानुष्ठान, ज्ञान की वृद्धि, पवित्रता की इच्छा, इन्द्रियों का निग्रह, धर्म के कार्य और आत्मा का चिंतन होता है यही सत्वगुण का लक्षण है। (स. प्र. नवम समु.)
जो कर्म अहंकार और फल की कामना से अति प्रपण के साथ किया जाता है वह रजोगुणी कहा जाता है। (गीता १८/२४)
लोभ, अत्यन्त आलस्य और निद्रा, धैर्य का अभाव, अत्याचार, नास्तिकता, एकात्मता का अभाव, जिस किसी से मांगना, प्रमोद अर्थात् मद्यपानादि और दुष्ट व्यसनों में फंसना यह तमोगुण के लक्षण हैं। -मनु. १२/३३
कुछ कर्मों का फल दृष्य होता है जो इस लोक और इस जन्म में प्राप्त होता है, और अन्य कर्मों का फल अदृष्य है जन्म-जन्मान्तर में मिलता है। जिसे जीव उपर्युक्त कर्मानुसार भोगता है।
फल की दृष्टि से कर्म का एक अन्य विभाजन तीन प्रकार से किया गया है- संचित, प्रारब्ध तथा क्रियमाण। मनुष्य जो कर्म करता है उसे क्रियमाण कहते हैं। जन्म जन्मान्तर के किये हुए तथा उन कर्मों का कोष जिनका फल नहीं प्राप्त हुआ है उन्हें संचित कर्म कहते हैं। संचित कर्मों से जिन कर्मों का फल हम वर्तमान में भोग रहे हैं उसे ही प्रारब्ध कहते हैं इसी प्रारब्ध को लोग दूसरे शब्दों में ‘भाग्य’ कहते हैं। भाग्य ईश्वर की ओर से नहीं होता अपितु जीवों के कर्मों का कर्मफल ही भाग्य है।
कुछ विचारकों ने कर्म के दो रूप बताये हैं- सकाम कर्म तथा निष्काम कर्म। इस संसार में कामना के बिना कोई कर्म नहीं होता, मनुष्य जो भी कर्म करता है वह कामना के द्वारा ही करता है। संसार में कोई कर्म निष्काम नहीं होता। उसे भले ही मनोभावों से निष्काम बनाया जाय। जैसे माता-पिता अपने सन्तान का जन्म से पालन-पोषण करते हैं एवं ईश्वर की भक्ति पावन कर्म है किन्तु स्वार्थ एवं मुक्ति की कामना न रख कर किया जाए। लोग इन्हें ही निष्काम कर्म की संज्ञा देते हैं।
कतिपय लोगों का मानना है कि ईश्वर ही जीवों से अच्छे बुरे कर्म करवाता है। परन्तु यह भ्रांत धारणा है क्योंकि जीव कर्म करने में स्वतन्त्र है। यदि ईश्वर कर्म कराता होता, जीव कोई भी पाप कर्म न करता क्योंकि परमात्मा पवित्र एवं धार्मिक होने से किसी जीव को पाप करने की प्रेरणा नहीं करता है अतः जीव कर्म करने में पूर्ण स्वतन्त्र है। जीवात्मा और कर्म का स्वाभाविक सम्बन्ध है अतः जीवात्मा बिना कर्म किये नहीं रह सकता इसलिए वेद में कहा है-
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत समा:।
एवन्त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे। -यजु ४०/२
अर्थ- “परमात्मा आदेश करते हैं कि ऐ मनुष्यो आलस्य त्यागकर सत्कर्मों को करते हुए सौ वर्ष या उससे अधिक जीने की शुद्ध मन से कामना करो। क्योंकि यही मनुष्य के लिए श्रेष्ठ मार्ग है। ऐसा करने वाला मनुष्य कर्म में लिप्त नहीं होता। इसके अतिरिक्त दूसरा कोई मार्ग नहीं है।”
उपर्युक्त मन्त्र में स्पष्ट कहा गया है कि मनुष्य निष्क्रिय या निष्कर्म होकर जीने की कभी इच्छा न करे। जीवन भर सत्कर्म करते हुए, सेवा कर्म करते हुए जीवे। निठल्ला, निष्क्रिय या निष्कर्म होकर न जीवे क्योंकि कर्म ही मनुष्य की शोभा है। मानव जीवन की सार्थकता है। कर्म ही पूजा है, कर्म ही उन्नति का मार्ग है और सफलता की कुंजी है। चारों वेदों में सर्वत्र मनुष्य को श्रेष्ठ कर्म करने की प्रेरणा देते हुए जीवन में उन्नति, सौभाग्य और धन अर्जन कर दानादि देकर समाज, देश तथा राष्ट्र के कल्यार्थ कर्म करना उसका परम कर्तव्य बताया गया है। महर्षि दयानंद जी श्रेष्ठ कर्म करने के लिए सदैव प्रेरित करते रहे, उनका मानना था कि मानव धर्म श्रेष्ठ है तथा मानवता के कल्याण में मनसा, वाचा, कर्मणा संलग्न रहना चाहिए। वह देश ही सुखी, सम्पन्न तथा स्वस्थ माना जाता है जहां के लोग कर्मशील व धार्मिक हों। इसलिए ही ज्ञान, कर्म तथा उपासना को भौतिक सुख तथा अध्यत्मिक आनन्द प्राप्ति का श्रेष्ठ साधन माना गया है। इससे हम जहां सांसारिक जीवन को सुखी बना सकते हैं वहीं हम ईश्वर प्राप्ति कर मोक्ष के मार्ग को प्रशस्त करते हैं। कर्मफल का मूल उद्देश्य सद्गुणों का विकास कर सुधार करना है।
कई लोग यह प्रश्न करते हैं कि ईश्वर ने जीव को क्यों बनाया? न जीव को बनाता, न जीव इस ईश्वर की दुःखमयी सृष्टि में दुःख भोगता। उन्हें जानना चाहिए कि ईश्वर ने जीव को नहीं बनाया बल्कि ईश्वर, जीव तथा प्रकृति तीन अनादि सत्ताएं हैं। जिन्हें न कोई बना सकता है न नष्ट कर सकता है। ईश्वर की सृष्टि व्यवस्था में जीव को शरीरधारी बनाकर उसको भोग और कर्म करने का अवसर प्रदान किया गया है। जीव स्वतन्त्रता पूर्वक पुण्य का कार्य करके सुख प्राप्त करे तथा यदि पाप कर्म करे तो उसे दुःख प्राप्त होगा। इसी प्रकार जो लोग जीव को ईश्वर का अंश मात्र मानते हैं वह कर्मवाद पर पूर्ण विचार नहीं करते। जीव को ईश्वर का अंश मानना तो ईश्वर को अखण्ड तथा अखण्डनीय मानने से इन्कार करना है। यह दोष ईश्वर पर लागू होगा। जैसे ईश्वर का एक अंश, ईश्वर के दूसरे अंश के यहां चोरी करे, बलात्कार करे, हत्या करे आदि बुरे कर्म को दूसरा अंश पुलिस में रिपोर्ट करे, ईश्वर का अंश पकड़ा जाए, वाद न्यायालय जाए में एक अंश उसे दोषी माने और दण्ड दे। ईश्वर का एक अंश पाप कर्म करे और दूसरा अंश दण्ड दे। जीव को ईश्वर का अंश मानना न तर्कपूर्ण है न वैज्ञानिक है। हां ऐसी काल्पनिक बात तो कल्पना मात्र ही है। ईश्वर पर दोषारोपण है। सत्यता यह है कि जीव सूक्ष्म है, परमात्मा सूक्ष्मतम है, दोनों में व्याप्य-व्यापक सम्बन्ध है।
ईश्वर की सृष्टि में जीव को सुख और दुःख दोनों प्राप्त होते रहते हैं क्योंकि दोनों की आवश्यकताएं हैं। यदि जीव को केवल सुख प्राप्त हो तो वह भी कुछ दिनों के बाद दुःख लगने लगता है और दुःख तो दुःख ही है। “सुख तो आत्मा का भोजन एवं वरदान है और दुःख अमृत और औषध।” सुखी होकर आत्मा अच्छे एवं इष्ट काम करने को उत्साहित होता है और दुःख दोनों आत्म विकास के श्रेष्ठ साधन हैं। अतः सुख-दुःख जीव के कर्मों का फल है।
चौथा खंभा न्यूज़ .com /डॉ विवेक आर्य / नसीब सैनी
Continue Reading
Click to comment

Leave a Reply

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

लेख

जेएनयू में फीस वृद्धि के नाम पर राजनीति

—यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं

Published

सुरेश हिन्दुस्थानी

देश के उच्च शिक्षा केन्द्र जब राजनीति के अड्डे बनने की ओर कदम बढ़ाने लगें, तब वहां की शिक्षा की दिशा-दशा क्या होगी, यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। फीस बढ़ोतरी के खिलाफ किया जाने वाला दिल्ली का छात्र आंदोलन कुछ इसी प्रकार का भाव प्रदर्शित कर रहा है, जहां केवल और केवल राजनीति ही की जा रही है। किसी भी आंदोलन की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके पीछे जनहित का कितना भाव है। दिल्ली का यह आंदोलन जनसरोकार से कोसों दूर दिखाई दे रहा है।

हालांकि इसके पीछे बहुत से अन्य कारण भी होंगे। सबसे बड़ा कारण तो यही है कि आज जेएनयू की जो छवि जनता के बीच बनी है, वह जनता को खुद ही दूर कर रही है। जिस विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारों की ध्वनि गूंजित होती है, वह कभी जन आंदोलन का हिस्सा नहीं बन सकते हैं।दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के जिन छात्रों ने कभी भारत के टुकड़े करने के नारे लगाए थे, आज वे ही छात्र फीस बढ़ोतरी के छोटे से मामले को राजनीतिक रुप देने का प्रयास करते दिखाई दे रहे हैं। इस छात्र आंदोलन का राजनीतिक स्वरुप इसलिए भी दिखाई दे रहा है, क्योंकि इसमें राष्ट्रीय मानबिन्दुओं और केन्द्र सरकार को सीधे निशाने पर लिया जा रहा है। जेएनयू वामपंथी विचारधारा का एक बड़ा केन्द्र रहा है।

वामपंथी धारा के कार्यकर्ता देश के महानायकों के बारे में क्या सोच रखते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। पिछले घटनाक्रमों को देखें तो पाएंगे कि जेएनयू में देश के विरोध में वातावरण बनाने का काम किया जाता रहा है। वहां आतंकवादी बुरहान वानी के समर्थन में कार्यक्रम किए जाते हैं। सवाल यह कि जेएनयू में शिक्षा के नाम पर आखिर क्या हो रहा है। जहां तक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में फीस बढ़ोतरी की बात है तो यह कहना तर्कसंगत ही होगा कि विगत 19 वर्ष से विश्वविद्यालय के छात्रावास के कमरों और भोजन का शुल्क नहीं बढ़ाया गया, जबकि पिछले 19 सालों में महंगाई का ग्राफ बहुत ऊपर गया है। इस सबका भार पूरी तरह से विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के कंधों पर ही आया। देश के अन्य विश्वविद्यालयों में भी शिक्षा महंगी हो रही है, जो जेएनयू के मुकाबले बहुत अधिक है। ऐसे में विश्वविद्यालय द्वारा कुछ हद तक फीस बढ़ाना न्यायोचित कदम ही है। जिसे वहां के कई छात्र भी सही मानते हैं। लेकिन यह आंदोलन इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि इसमें परदे के पीछे राजनीतिक कार्यकर्ता भूमिका निभा रहे हैं। यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं।

खैर… यह जांच का विषय हो सकता है।देश के प्रसिद्ध अधिवक्ता सांसद डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने इस छात्र आंदोलन के बारे में बहुत ही गहरी बात कही है। उनका मानना है कि जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय को कुछ समय के लिए बंद कर दिया जाए। उनके इस कथन के गहरे निहितार्थ निकल रहे हैं। स्वामी के संकेत को विस्तार से समझना हो तो एक बार जेएनयू की गतिविधियों का अध्ययन करना चाहिए। फिर वह सब सामने आ जाएगा जो वहां होता है। कहा जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जमकर राजनीति की जाती रही है। देश के जो शिक्षा केन्द्र राजनीति के केन्द्र बनते जा रहे हैं, उन पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है।

वर्तमान में जिस प्रकार से जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय का आंदोलन चल रहा है, उसे छात्र आंदोलन कहना न्याय संगत नहीं होगा। क्योंकि, यह विशुद्ध राजनीतिक आंदोलन है। फीस बढ़ोतरी का विरोध तो मात्र बहाना है। इस आंदोलन के समर्थन में देश की संसद में कांग्रेस और वामपंथी दलों की ओर से आवाज उठाई गई। इससे यही संदेश जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जो देश विरोधी नारे लगाए गए, उनके प्रति इन राजनीतिक दलों के समर्थन का ही भाव रहा होगा। इतना ही नहीं, जब भारत तेरे टुकड़े होंगे और हमें चाहिए आजादी जैसे नारे लगाए गए थे, तब भी कांग्रेस और वाम दलों ने खुलेआम समर्थन किया था। ऐसे में सवाल यह उठता है कि कहीं यही दोनों दल छात्रों को आंदोलन करने के लिए तो नहीं उकसा रहे? अगर यह सही है तो फिर केन्द्र सरकार को दोष देना सही नहीं कहा जा सकता।

जब से देश में राजनीतिक सत्ता का परिवर्तन हुआ है, तब से ही देश में उन संस्थानों की सक्रियता दिखाई देने लगी है, जो भारत के बारे में भ्रम का वातावरण बनाने में सहायक हो सकते हैं। चाहे वह शहरी नक्सलवाद को प्रायोजित करने वाले कथित बुद्धिजीवियों की संस्था हो या फिर उनके विचार को अंगीकार करने वाली ही संस्थाएं क्यों न हों। सभी केन्द्र सरकार का विरोध करने के लिए आगे आ रहे हैं। इस विश्वविद्यालय में पढ़ाई करने वाले छात्र कभी भारतीय सेना द्वारा की जाने वाली आतंकियों के विरोध में कार्यवाही पर सवाल उठाते दिखाई देते हैं तो कभी अनुच्छेद 370 को हटाने का विरोध करते हैं। चार वर्ष पूर्व जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में छात्र संघ की उपाध्यक्ष रहीं शेहला राशिद ने भारतीय सेना के विरोध में जमकर भड़ास निकाली थी, जबकि सेना की ओर से स्पष्ट कहा गया था कि ऐसा कुछ भी नहीं है। इससे समझ में आ सकता है कि इस विश्वविद्यालय में कौन-सा पाठ पढ़ाया जाता है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Continue Reading

Top News

देश की युवा पीढ़ी में विदेशों के प्रति रुचि बढ़ी

—गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है

Published

मनोज ज्वाला

एक मीडिया संस्थान के सर्वेक्षण के अनुसार हमारे देश के पढ़े-लिखे और शहरी नौजवानों में से आधे से अधिक ऐसे हैं, जो अपने देश को पसंद नहीं करते। वे विदेशों में जाकर बस जाना चाहते हैं। लगभग दो साल पहले के उक्त सर्वेक्षण के मुताबिक उनमें से 75 फीसदी युवाओं का कहना था कि वे बे-मन और मजबूरीवश भारत में रह रहे हैं। 62.08 फीसदी युवतियों और 66.01 फीसदी युवाओं का मानना था कि भारत  में उनका भविष्य सुरक्षित नहीं है। क्योंकि, यहां अच्छे दिन आने की संभावना कम है। उनमें से 50 फीसदी का मानना था कि भारत में किसी महापुरुष का अवतरण होगा, तभी हालात सुधर सकते हैं, अन्यथा नहीं।

40 फीसदी युवाओं का मानना था कि उन्हें अगर इस देश का प्रधानमंत्री बना दिया जाए, तो वे पांच साल में इस देश का कायापलट कर देंगे।अखबार का वह सर्वेक्षण आज भी बिल्कुल सही लगता है। अगर व्यापक स्तर पर सर्वेक्षण किया जाता, तो देश छोड़ने को तैयार युवाओं का प्रतिशत और अधिक दिखता। वह सर्वेक्षण तो सिर्फ शहरों तक सीमित था। अपने देश में गांवों पर भी तेजी से शहर छाते जा रहे हैं। गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है। गौर कीजिए कि देश छोड़ने को तैयार वे युवा पढ़े-लिखे हैं और शहरों में पले-बढ़े हैं। वे किस पद्धति से किस तरह के विद्यालयों में क्या पढ़े-लिखे हैं और किस रीति-रिवाज से कैसे परिवारों में किस तरह से पले-बढ़े हैं, यह ज्यादा गौरतलब है।

विद्यालय सरकारी हों या गैर सरकारी, सभी में शिक्षा की पद्धति एक है और वह है मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा पद्धति। भारतीयता विरोधी इसी शिक्षा पद्धति को सरकारी मान्यता प्राप्त है। सरकार का पूरा तंत्र इसी तरह की शिक्षा के विस्तार में लगा हुआ है। वैसे अंग्रेजी माध्यम वाले विद्यालय सबसे अच्छे माने जाते हैं और गैर-सरकारी निजी क्षेत्र के अधिकतर विद्यालय अंग्रेजी माध्यम के ही हैं। शहरों में ऐसे ही विद्यालयों की भरमार है और जिन युवाओं के बीच उक्त मीडिया संस्थान ने उपरोक्त सर्वेक्षण किया उनमें से सर्वाधिक युवा ऐसे ही तथाकथित ‘उत्कृष्ट’ विद्यालयों से पढ़े-लिखे हुए हैं। अब रही बात यह कि इन विद्यालयों में आखिर शिक्षा क्या और कैसी दी जाती है, तो यह इन युवाओं की उपरोक्त सोच से ही स्पष्ट है।

जाहिर है, उन्हें शिक्षा के नाम पर ऐसी-ऐसी डिग्रियां दी जाती हैं, जिनके कारण वे महात्वाकांक्षी, स्वार्थी बनकर असंतोष, अहंकार, खीझ, पलायन एवं हीनता-बोध से ग्रसित हो जाते हैं और कमाने-खाने भर थोड़े-बहुत हुनर हासिल कर स्वभाषा व स्वदेश के प्रति ‘नकार’ भाव से पीड़ित होकर विदेश चले जाते हैं।थॉमस विलिंग्टन मैकाले कोई शिक्षा-शास्त्री नहीं था। वह एक षड्यंत्रकारी था, जिसने भारत पर ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जड़ें जमाने की नीयत से भारतीय शिक्षा-पद्धति की जड़ें उखाड़कर मौजूदा शिक्षा-पद्धति को प्रक्षेपित किया था। जो आज भी उसी रूप में कायम है। 20 अक्टूबर 1931 को लंदन के रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ फौरन अफेयर्स के मंच से महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘अंग्रेजी शासन से पहले भारत की शिक्षा-व्यवस्था इंग्लैण्ड से भी अच्छी थी।’ उस पूरी व्यवस्था को सुनियोजित तरीके से समूल नष्ट कर देने के पश्चात ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जरूरतों के मुताबिक उसके रणनीतिकारों ने लम्बे समय तक बहस-विमर्श कर के मैकाले की योजनानुसार यह शिक्षा-पद्धति लागू की थी।

मैकाले ने ब्रिटिश पार्लियामेंट की शिक्षा समिति के समक्ष कहा था ‘हमें भारत में ऐसा शिक्षित वर्ग तैयार करना चाहिए, जो हमारे और उन करोड़ों भारतवासियों के बीच जिन पर हम शासन करते हैं, उन्हें समझाने-बुझाने का काम कर सके। जो केवल खून और रंग की दृष्टि से भारतीय हों, किन्तु रुचि, भाषा व भावों की दृष्टि से अंग्रेज हों।’ विदेशों में बस जाने को उतावले भारतीय युवाओं ने पूरी मेहनत व तबीयत से मैकाले शिक्षा-पद्धति को आत्मसात किया है, ऐसा समझा जा सकता है। यहां प्रसंगवश मैकाले के बहनोई चार्ल्स ट्रेवेलियन द्वारा ब्रिटिश पार्लियामेंट की एक समिति के समक्ष ‘भारत में भिन्न-भिन्न शिक्षा-पद्धतियों के भिन्न-भिन्न परिणाम’ शीर्षक से प्रस्तुत किये गए एक लेख का यह अंश भी उल्लेखनीय है कि ‘मैकाले शिक्षा-पद्धति का प्रभाव अंग्रेजी राज के लिए हितकर हुए बिना नहीं रह सकता। हमारे पास उपाय केवल यही है कि हम भारतवासियों को यूरोपियन ढंग की उन्नति में लगा दें। इससे हमारे लिए भारत पर अपना साम्राज्य कायम रखना बहुत आसान और असंदिग्ध हो जाएगा।’ ऐसा ही हुआ। बल्कि, मैकाले की योजना तो लक्ष्य से ज्यादा ही सफल रही।

हमारे देश के मैकालेवादी राजनेताओं ने अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासन की समाप्ति के बाद भी उनकी अंग्रेजी-मैकाले शिक्षा-पद्धति को न केवल यथावत कायम रखा, बल्कि उसे और ज्यादा अभारतीय रंग-ढंग में ढाल दिया। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष लक्षित प्राचीन भारतीय शिक्षा-पद्धति को अतीत के गर्त में डालकर शिक्षा को उत्पादन-विपणन-मुनाफा-उपभोग-केन्द्रित बना देने और उसे नैतिक सांस्कृतिक मूल्यों से विहीन कर देने तथा राष्ट्रीयता के प्रति उदासीन बना देने का ही परिणाम है कि हमारी यह युवा पीढ़ी महज निजी सुख-स्वार्थ के लिए अपने देश से विमुख हो जाना पसंद कर रही है। उसे विदेशों में ही अपना भविष्य दीख रहा है।

माना कि हमारे देश में तरह-तरह की समस्याएं हैं, किन्तु इनसे जूझने और इन्हें दूर करने की बजाय पलायन कर जाने अथवा कोरा लफ्फाजी करने कि हमें प्रधानमंत्री बना दिया जाए तो हम देश को सुंदर बना देंगे, अति महात्वाकांक्षा-युक्त मानसिक असंतुलन का ही द्योत्तक है। लेकिन आधे से अधिक ये शहरी युवा मानसिक रुप से असंतुलित नहीं हैं, बल्कि असल में वे पश्चिम के प्रति आकर्षित हैं। इसके लिए हमारे देश की चालू शिक्षा-पद्धति का पोषण करने वाले हमारे राजनेता ही जिम्मेवार हैं। यह ‘यूरोपियन ढंग की उन्नति’ के प्रति बढ़ते अनावश्यक आकर्षण का परिणाम है। इस मानसिक पलायन को रोकने के लिए जरूरी है कि हम अपने बच्चों को हमारे राष्ट्र की जड़ों से जोड़ने वाली और संतुलित समग्र मानसिक विकास करने वालीप्राचीन भारतीय पद्धति से भारतीय भाषाओं में समस्त ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा देने की सम्पूर्ण व्यवस्था कायम करें।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Continue Reading

Top News

भाई-बहन में प्रेम भाव बढ़ाता है भैया दूज

–बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था

Published

योगेश कुमार गोयल

(भैया दूज, 29 अक्टूबर पर विशेष)

भाई-बहन के दिलों में पावन संबंधों की मजबूती और प्रेमभाव स्थापित करने वाला पर्व है भैया दूज। इस दिन बहनें अपने भाईयों को तिलक लगाकर ईश्वर से उनकी दीर्घायु की कामना करती हैं। कहा जाता है कि इससे भाई यमराज के प्रकोप से बचे रहते हैं। दीपावली के दो दिन बाद अर्थात कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाए जाने वाले इस पर्व को ‘यम द्वितीया’ व ‘भ्रातृ द्वितीया’ के नाम से भी जाना जाता है। बहुत से भाई-बहन सौभाग्य तथा आयुष्य की प्राप्ति के लिए इस दिन यमुना अथवा अन्य पवित्र नदियों में साथ-साथ स्नान भी करते हैं। भैया दूज मनाने के संबंध में कई किवंदतियां प्रचलित हैं। एक कथा यमराज और उनकी बहन यमुना देवी से संबंधित है। बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था। यमुना अपने भाई यमराज से बहुत स्नेह करती थीं और अक्सर उनसे अनुरोध करती रहती थीं कि वे अपने इष्ट-मित्रों सहित उसके घर भोजन के लिए पधारें लेकिन यमराज हर बार उसके निमंत्रण को किसी न किसी बहाने से टाल जाते। कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमुना ने यमराज को एक बार फिर भोजन के लिए आमंत्रित किया।

उस समय यमराज ने विचार किया कि मैं तो अपने कर्त्तव्य से बंधा सदैव प्राणियों के प्राण ही हरता हूं। इसलिए इस चराचर जगत में कोई भी मुझे अपने घर नहीं बुलाना चाहता। लेकिन बहन यमुना तो मुझे बार-बार अपने घर आमंत्रित कर रही है। इसलिए अब तो उसका निमंत्रण स्वीकार करना ही चाहिए।यमराज को अपने घर आया देख यमुना की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने भाई का खूब आदर-सत्कार करते हुए उनके समक्ष नाना प्रकार के व्यंजन परोसे। बहन के आतिथ्य से यमराज बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे कोई वर मांगने को कहा। इस पर यमुना ने उनसे अनुरोध किया कि आप प्रतिवर्ष इसी दिन मेरे घर आकर भोजन करें और मेरी तरह जो भी बहन इस दिन अपने भाई का आदर-सत्कार करे, उसे तुम्हारा भय न रहे। यमराज ने बहन यमुना को उसका इच्छित वरदान दे दिया। ऐसी मान्यता है कि उसी दिन से ‘भैया दूज’ का पर्व मनाया जाने लगा। भैया दूज के संबंध में और भी कई कथाएं प्रचलित हैं। ऐसी ही एक कथा के अनुसार, एक ब्राह्मण की दो संतानें थी।

एक पुत्र एवं एक पुत्री। पुत्री बहुत समझदार एवं गुणवती थी। वह अपने भाई से जी-जान से प्यार करती थी। एक दिन उसका भाई उससे मिलने उसकी ससुराल पहुंचा। उस समय वह सूत कातने में व्यस्त थी। अतः उसे भाई के आने का पता ही न चल सका। भाई भी बिना कुछ बोले चुपचाप एक ओर बैठा रहा। जब थोड़ी देर बाद बहन की नजर उस पर पड़ी तो भाई को अपने घर आया देख उसे बेहद खुशी हुई। उसने भाई का भरपूर आदर-सत्कार किया। अगले दिन भाई को वापस लौटना था। अतः रास्ते के लिए वह आटे के पकवान बनाने के उद्देश्य से चक्की में आटा पीसने लगी। अनजाने में चक्की में बैठा सांप भी आटे के साथ पिस गया। उसी आटे के पकवान एक पोटली में बांधकर उसने भाई को रास्ते में खाने के लिए देकर विदा किया। भाई के घर से जाने के बाद जब उसे यह मालूम हुआ कि आटे में सांप पिस गया है तो अपने पुत्र को पालने में ही सोता छोड़कर वह अपने भाई के प्राणों की रक्षा के लिए दौड़ी। कुछ दूर जाने पर उसे एक पेड़ की छांव में अपना भाई सोता दिखाई दिया। तब तक उसने पोटली में से कुछ भी नहीं खाया था। उसने भगवान का शुक्रिया अदा किया और पोटली उठाकर दूर फेंक दी तथा भाई के साथ मायके की ओर चल दी।

रास्ते में उसने देखा कि भारी-भारी शिलाएं आकाश में उड़ रही हैं। उसने एक राहगीर से इस रहस्य के बारे में जानना चाहा तो उसने बताया कि जो बहन अपने भाई पर कभी नाराज न होती हो और उसे दिलो-जान से चाहती हो, उस भाई की शादी के समय ये शिलाएं उसकी छाती पर रखी जाएंगी। थोड़ी दूर चलने पर उसे नाग-नागिन दिखाई दिए। नाग ने बताया कि ये शिलाएं जिस व्यक्ति की छाती पर रखी जाएंगी, हम उसे डंस लेंगे। जब बहन ने इस विपत्ति से बचने का उपाय पूछा तो नाग-नागिन ने बताया कि अगर भाई के विवाह के समय उसके सभी कार्य बहन स्वयं करे, तभी भाई की जान बच सकती है।जब उसके भाई के विवाह के लग्न का शुभ मुहूर्त आया तो वह भाई को पीछे धकेलती हुई स्वयं ही लग्न चढ़वाने के लिए आगे हो गई और घोड़ी पर भी स्वयं चढ़ गई। परिवारजन और संबंधी उसके इस विचित्र व्यवहार से हैरान तथा क्रोधित थे। उसके घोड़ी पर चढ़ते ही शिलाएं उड़ती-उड़ती आई लेकिन घोड़ी पर किसी पुरूष की जगह एक महिला को बैठी देख वापस मुड़ गई। जब सुहागरात का समय आया तो वह भाई को पीछे कर खुद भाभी के साथ सोने उसके कमरे में चली गई।

परिवार के सभी सदस्य तथा सभी रिश्तेदार उसके इस अजीबोगरीब व्यवहार से बेहद आश्चर्यचकित और खफा थे। उन्हें उस पर गुस्सा तो बहुत आ रहा था लेकिन उसके जिद के समक्ष सभी विवश थे। सुहागरात पर नियत समय पर नाग-नागिन उसके भाई को डंसने कमरे में पहुंच गए लेकिन उसने नाग-नागिन को मारने की सारी तैयारी पहले ही कर रखी थी। आखिरकार उसने नाग-नागिन का काम तमाम कर दिया। उसके बाद वह निश्चिंत होकर सो गई। सुबह होने पर सभी मेहमानों को विदा करने के बाद परिवार वालों ने सोचा कि अब इस बला को भी कुछ बचा-खुचा देकर यहां से चलता कर दिया जाए लेकिन नींद से जागने पर जब उसने पूरी घटना के बारे में सब को विस्तार से बताया कि किस प्रकार वह अपने बच्चे को पालने में ही सोता छोड़कर दौड़ी-दौड़ी भाई के प्राण बचाने के लिए उसके पीछे चली आई और सभी को नाग-नागिन के मृत शरीर दिखाए तो सभी की आंखों में आंसू आ गए।

भाई के प्रति उसका असीम प्यार तथा समर्पण भाव देखकर उसके प्रति सभी का हृदय श्रद्धा से भर गया।भाई-भाभी तथा माता-पिता ने उसे ढेर सारे उपहारों से लादकर बड़े मान-सम्मान के साथ खुशी-खुशी ससुराल से विदा किया। भाई-बहन के बीच इसी प्रकार के पावन संबंध, प्रेमभाव तथा उनके दिलों में आपसी संबंधों को मजबूत बनाने के लिए ही ‘भैया दूज’ पर्व मनाया जाता है।

(लेखक स्तंभकार हैं।)

Continue Reading

Featured Post

Top News1 वर्ष पूर्व

रॉबर्ट वाड्रा की गिरफ्तारी पर 5 फरवरी तक जारी रहेगी रोक

---हाईकोर्ट जस्टिस मनोज कुमार गर्ग की कोर्ट ने अधिवक्ता भंवरसिंह मेड़तिया के निधन के बाद कोर्ट में 3.45 बजे रेफरेंस...

Top News1 वर्ष पूर्व

बिजनौर कोर्ट शूटकांड : हाईकोर्ट ने डीजीपी और अपर मुख्य सचिव (गृह) को किया तलब

---दरअसल, बिजनौर में 28 मई को नजीबाबाद में हुई बसपा नेता हाजी अहसान व उनके भांजे शादाब की हत्या के...

Top News1 वर्ष पूर्व

निर्भया केस: दोषी अक्षय की पुनर्विचार याचिका खारिज, फांसी की सजा बरकरार

---सुप्रीम कोर्ट ने कहा-पुनर्विचार याचिका में कोई नए तथ्य नहीं, इसलिए ख़ारिज होने योग्य

Top News1 वर्ष पूर्व

कतर टी-10 लीग पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की आईसीसी ने शुरु की जांच

--उल्लेखनीय है कि कतर टी-10 लीग का आयोजन सात से 16 दिसम्बर तक कतर क्रिकेट संघ ने किया था

Top News1 वर्ष पूर्व

बिजनौर कोर्ट रूम में हुई हत्या मामले में चौकी प्रभारी समेत 18 पुलिसकर्मी सस्पेंड

---एसपी ने बताया कि कोर्ट में दिनदहाड़े कुख्यात बदमाश शाहनवाज की हत्या के बाद जजी परिसर में सुरक्षा की पोल...

Recent Post

Trending

Copyright © 2018 Chautha Khambha News.

Web Design BangladeshBangladesh online Market