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ज़ाकिर नाईक की आर्यसमाज द्वारा पोल-खोल 

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07  JULY

ज़ाकिर नाईक की आर्यसमाज द्वारा पोल-खोल

विषय-वेद और क़ुरान में से ईश्वरीय ज्ञान कौन सा हैं?
डॉ ज़ाकिर नाईक ने अपने वीडियो में केवल क़ुरान को सभी के मानने के लायक धार्मिक पुस्तक बताता है। उसके अनुसार प्रत्येक काल में अल्लाह की ओर से धार्मिक पुस्तकें तौरेत, जबूर, इंजील एवं अंत में क़ुरान अवतरित करी गई। क़ुरान अंतिम एवं निर्णायक पुस्तक है। क्यूंकि वेदों का कोई भी वर्णन क़ुरान में नहीं मिलता। इसलिए वेदों को ईश्वरीय पुस्तक मानने या न मानने पर शंका है।  हालाँकि जो बात क़ुरान कि वेदों में मिलती है, वह मान्य है।  जो जो बात क़ुरान की वेदों में नहीं मिलती वह अमान्य है।
समीक्षा-
क़ुरान करीब 1400 वर्षों पहले इस धरती पर अवतरित हुई। इस्लामिक मान्यता अनुसार हज़रत मुहम्मद के पास खुदा के भेजे हुए खुदा का पैगाम लेकर फरिश्ते आते थे। रसूल उन्हें लिखवा देते। इस तरीके से समय समय पर क़ुरान की आयतें नाज़िल हुई। इस प्रकार से क़ुरान की उत्पत्ति हुई।
 1. ईश्वरीय ज्ञान सृष्टी के आरंभ में आना चाहिये न की मानव की उत्पत्ति के करोड़ो वर्षों के बाद।
 ज़ाकिर नाईक के अनुसार सबसे पहली आसमानी पुस्तक तौरेत थी। तौरेत मूसा नामक पैगम्बर पर नाजिल हुई थी। सैमेटिक मत अनुसार सबसे पहले आदम की उत्पत्ति हुई थी। आदम से लेकर मूसा तक करोड़ो लोगों का इस धरती पर जन्म हुआ।  क्या क़ुरान का अल्लाह इतना अपरिपक्व है जो उन करोड़ो लोगों को अपने ज्ञान से वंचित रखता? उस काल में जन्में करोड़ों लोगों को कोई ज्ञान नहीं था और मनुष्य बिना कुछ सिखाये कुछ भी सीख नहीं सकता था। इसलिए मनुष्य की उत्पत्ति के तुरंत बाद उसे ईश्वरीय ज्ञान की आवश्यकता थी। सत्य के परिज्ञान न होने के कारण यदि सृष्टी के आदि काल में मनुष्य कोई अधर्म आचरण करता तो उसका फल उसे क्यूँ मिलता क्यूंकि इस अधर्माचरण में उसका कोई दोष नहीं होता, क्यूंकि अगर किसी का दोष होता भी हैं तो वह परमेश्वर का होता क्यूंकि उन्होंने मानव को आरंभ में ही सत्य का ज्ञान नहीं करवाया।
यह क़ुरान के अल्लाह की कमी दर्शाता है।  ईश्वरीय ज्ञान या ईश्वर में कोई कमी नहीं होनी चाहिए।
परमेश्वर सकल मानव जाति के परम पिता है और सभी मनुष्यों का कल्याण चाहते हैं। वह मनुष्यों में कोई भेदभाव नहीं करता। केवल एक वेद ही हैं जो सृष्टी के आरंभ में ईश्वर द्वारा मानव जाति को प्रदान किया गया था।
2. क़ुरान का अल्लाह बार बार अपना ज्ञान क्यों परिवर्तन करता रहा? यह महत्वपूर्ण प्रश्न है।
पहले तौरेत, फिर जबूर, फिर इंजील और अंत में क़ुरान नाजिल हुई। प्रश्न उठता है कि ऐसी क्या कमी क़ुरान के अल्लाह से रह जाती थी जो वह उसे बार बार दुरुस्त करता था। मुसलमान लोग क़ुरान को अंतिम एवं निर्णायक ज्ञान मानते है? अल्लाह ने क़ुरान के ज्ञान को पहले ही क्यों नहीं दे दिया। उसे न बार बार परिवर्तन की आवश्यकता होती। ज़ाकिर नाईक कहता है जो ज्ञान जिस काल में उपयोगी था उस उस ज्ञान को अल्लाह ने उपलब्ध करवाया। शंका उठती है कि फिर आप क़ुरान को अंतिम एवं निर्णायक किस आधार पर मानते है? क़ुरान के पश्चात क्या देश, काल और परिस्थिति नहीं बदलेगी। क़ुरान काल में तलवार, खंजर आदि चलते थे। आज बन्दुक, मिसाइल आदि युद्ध में प्रयोग होते है।  इससे तो यही सिद्ध हुआ कि क़ुरान का ज्ञान तो आज भी अप्रासंगिक हो गया है।  आगे यही पर समाप्त नहीं हो जाती। अंतिम पुस्तक क़ुरान की आयतों को भीअनेक बार गलत समझ कर मंसूख़ अर्थात रद्द भी किया गया। यह रद्द करना ठीक वैसे था जैसे पहले की आसमानी किताबों को रद्द किया गया था। क्या क़ुरान का अल्लाह एक नर्सरी के बालक के समान नासमझ है?  एक नर्सरी का बालक क्या करता है? पहले स्लेट पर अक्षर बनाता है फिर उसे वह नहीं जचता तो उसे फिर मिटाता है। फिर दोबारा से बनाता है।  वह कर्म तब तक चलता रहता है जब तक ठीक अक्षर नहीं बनता। क़ुरान का अल्लाह भी अपनी ही बताई आयतों को एक बालक के समान गलत-ठीक करता रहता है। ज़ाकिर  नाईक अगर इस तर्क के उत्तर में यह शंका करें कि जैसे आप चिकित्सा विज्ञान कि पुस्तक का पुराना संस्करण क्यों नहीं पढ़ते आप नया क्यों पढ़ते हो। वैसे ही आप आज तौरेत, जबूर और इंजील के स्थान पर अंतिम क़ुरान को पढ़ते है। ज़ाकिर नाईक की बात सुनकर आप मुस्कुरा देंगे। ज़ाकिर भाई मेडिकल की पुस्तक का अगला संस्करण भी आएगा। आप तब क़ुरान को किस आधार पर अंतिम एवं निर्णायक कहेंगे?
इसके विपरीत वेदों का ज्ञान सृष्टि के आदि में आया और सृष्टि के अंत तक उसमें न कोई परिवर्तन होता है। वह श्रुति परम्परा से पूर्ण रूप से सुरक्षित है।  कोई चाहे भी तो उसमें बदलाव नहीं कर सकता। वैदिक ईश्वर सर्वज्ञ अर्थात सब ज्ञान को जानने वाला है। इसलिए उन्हें किसी भी वेद मंत्र को कभी भी बदलने की कोई आवश्यकता नहीं होती।
3.  क़ुरान के ज्ञान को देने के लिए पैगम्बर और फरिश्तों की आवश्यकता क्यों हुई?
इस्लाम मान्यता के अनुसार हजरत पैगम्बर को पैगाम लेकर अल्लाह के फरिशते आते थे। कोई भी पैगाम किसी फासले अर्थात दूरी से आता है। ज़ाकिर नाईक से यह पहला प्रश्न है कि अल्लाह और पैगम्बर (मनुष्य) के मध्य का फासला बताये? दूसरा  प्रश्न यह है कि क्या क़ुरान का अल्लाह असक्षम और असमर्थ है जो उसे अपना पैगाम देने के लिए फरिश्तों या संदेशवाहकों की आवश्यकता हुई? अधिकतर मुस्लिम विद्वान् इस प्रश्न पर मौन धारण कर लेते है।
इस विषय में वैदिक सिद्धांत है कि ईश्वर और मनुष्य में कोई दूरी नहीं है क्यूंकि परमात्मा आत्मा में विराजमान है एवं हमें सदा देख, सुन रहा हैं और प्रेरणा दे रहा है। सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर द्वारा ऋषियों के ह्रदय में ही वेदों का ज्ञान बिना किसी संदेशवाहक के सहज भाव से स्वयं प्रकाशित किया गया।  इससे न केवल वैदिक ईश्वर सर्वशक्तिमान सिद्ध होता है अपितु पूर्ण भी सिद्ध होता है।
4. क्या क़ुरान का अल्लाह कमजोर है?
इस्लाम मानने वाले शैतान की कहानी को मानते है।  इस कहानी के अनुसार अल्लाह ने इबलीस को आदम को सजदा करने को कहा। इबलीस ने अल्लाह के हुकुम की अवमानना करते हुए आदम को सजदा करने से मना कर दिया। इससे क्रोधित होकर अल्लाह ने इबलीस को सजा दे दी। तब से इबलीस शैतान बनकर बहकाता फिरता है। क़ुरान के अल्लाह के हुकुम की अवमानना से यह सिद्ध हुआ कि क़ुरान का अल्लाह न केवल कमजोर है अपितु मनुष्यों एक समान क्रोधित होने वाला भी है।
सर्वप्रथम तो कोई ईश्वर की आज्ञा को कैसे नकार सकता है? इससे क़ुरान का अल्लाह अशक्त सिद्ध हुआ।
दूसरा क्या क़ुरान का अल्लाह अल्पज्ञ अर्थात कम ज्ञान वाला है, जो उसे यह भी नहीं मालूम कि जिस इबलीस को उसने बनाया है वह उसकी आज्ञा नहीं मानेगा?
तीसरा शाप देकर अल्लाह ने इबलीस को शैतान बना दिया जो मनुष्यों को बहकाकर काफ़िर बनाता है। काफ़िर बनने पर अल्लाह को काफ़िरों को मारने के लिए आयत उतारनी पड़ी। इसका परिणाम यह निकला कि यह धरती मुसलमानों और गैर मुसलमानों में विभाजित हो गई। मुसलमानों को अपने आपको सच्चा मुसलमान सिद्ध करने के काफिरों को मारना नैतिक कर्त्तव्य बन गया। इसका अंतिम परिणाम यह निकला की 1400 वर्षों में इतनी मारकाट हुई कि यह स्वर्ग सी धरती दोज़ख अर्थात नरक बन गई। न क़ुरान का अल्लाह इबलीस को ऊटपटांग हुकुम देता, न वह अवमानना करता, न शैतान बनने का शाप दिया जाता, न काफ़िर बनते, न खून खराबा होता।
ऐसे अल्लाह को मुसलमान लोग खुदा मानते है।  यह उनकी अज्ञानता है।
वेदों में वैदिक ईश्वर के गुण-कर्म- स्वभाव के विपरीत कोई भी बात नहीं है। ईश्वर सत्यस्वरूप, न्यायकारी, दयालु, पवित्र, शुद्ध-बुद्ध मुक्त स्वभाव, नियंता, सर्वज्ञ आदि गुणों वाला है। ईश्वरीय ज्ञान में ईश्वर के इन गुणों के विपरीत बातें नहीं लिखी है।  कुरान  में कई ऐसी बातें हैं जो की ईश्वर के गुणों के विपरीत है।
 एक अन्य उदहारण लीजिए।  इस्लाम मानने वालों की मान्यता है कि ईद के दिन निरीह पशु की क़ुरबानी देने से पुण्य की प्राप्ति होती है। यह कर्म ईश्वर के दयालु गुण के विपरीत कर्म है। इसलिए केवल वेद ही ईश्वरीय गुण-कर्म-स्वभाव के अनुकूल होने के कारण एक मात्र मान्य धर्म ग्रन्थ है।
इस प्रकार इस लेख में दिया गए तर्कों से यह सिद्ध होता हैं वेद ही ईश्वरीय ज्ञान मानने लायक है।
वेदों को लेकर ज़ाकिर नाईक केवल अपने जैसों को बरगला रहा है। ज़ाकिर नाईक के कुतर्क कि परीक्षा एक अन्य उदहारण से होती है। ज़ाकिर नाईक कहता है कि जो बात क़ुरान कि वेदों में मिलती है, वह मान्य है। जो जो बात क़ुरान की वेदों में नहीं मिलती वह अमान्य है।
मतलब बाप का होना तभी माना जायेगा जब बेटे के दर्शन होंगे। अगर बेटा नहीं है तो बाप पैदा ही नहीं हुआ। ज़ाकिर भाई आप इस धरती पर हो इससे यह केवल यह सिद्ध नहीं होता की आपके पूर्वज भी इस धरती पर थे। परन्तु अगर आपके पूर्वज ही नहीं होते तो आप आज होते ही नहीं।
वेदों का ज्ञान सृष्टि के आरम्भ में आया तभी उसमें से कुछ बातें क़ुरान वालों ने उधारी ली। अब उन उधार ली गई बातों से वेद के सही या गलत होने की कसौटी स्थापित नहीं होती अपितु यह कसौटी क़ुरान के लिए सिद्ध होती है।  जो जो बातें वेदों की क़ुरान में मिलती है वह ईश्वरकृत होने के कारण मान्य है और जो जो बातें क़ुरान में वेदों से भिन्न मिलती है वह मनुष्यकृत होने के कारण अमान्य एवं कपोलकल्पित है।
 वेदों के ईश्वरीय ज्ञान होने की वेद स्वयं ही अंत साक्षी देते हैं। अनेक मन्त्रों से हम इस बात को सिद्ध करते हैं जैसे
1. सबके पूज्य,सृष्टीकाल में सब कुछ देने वाले और प्रलयकाल में सब कुछ नष्ट कर देने वाले उस परमात्मा से ऋग्वेद उत्पन्न हुआ, सामवेद उत्पन्न हुआ, उसी से अथर्ववेद उत्पन्न हुआ और उसी से यजुर्वेद उत्पन्न हुआ हैं- ऋग्वेद 10/90/9, यजुर्वेद 31/7, अथर्ववेद 19/6/13
2. सृष्टी के आरंभ में वेदवाणी के पति परमात्मा ने पवित्र ऋषियों की आत्मा में अपनी प्रेरणा से विभिन्न पदार्थों का नाम बताने वाली वेदवाणी को प्रकाशित किया- ऋग्वेद 10/71/1
3. वेदवाणी का पद और अर्थ के सम्बन्ध से प्राप्त होने वाला ज्ञान यज्ञ अर्थात सबके पूजनीय परमात्मा द्वारा प्राप्त होता हैं- ऋग्वेद 10/71/3
4. मैंने (ईश्वर) ने इस कल्याणकारी वेदवाणी को सब लोगों के कल्याण के लिए दिया हैं- यजुर्वेद 26/2
5. ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद स्कंभ अर्थात सर्वाधार परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं- अथर्ववेद 10/7/20
6. यथार्थ ज्ञान बताने वाली वेदवाणियों को अपूर्व गुणों वाले स्कंभ नामक परमात्मा ने ही अपनी प्रेरणा से दिया हैं- अथर्ववेद 10/8/33
7. हे मनुष्यों! तुम्हे सब प्रकार के वर देने वाली यह वेदरूपी माता मैंने प्रस्तुत कर दी हैं- अथर्ववेद 19/71/1
8. परमात्मा का नाम ही जातवेदा इसलिए हैं की उससे उसका वेदरूपी काव्य उत्पन्न हुआ हैं- अथर्ववेद- 5/11/2
आइये ईश्वरीय के सत्य सन्देश वेद को जाने
वेद के पवित्र संदेशों को अपने जीवन में ग्रहण कर अपने जीवन का उद्धार करे।

चौथा खंभा न्यूज़ .com /डॉ विवेक आर्य/ नसीब सैनी

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जेएनयू में फीस वृद्धि के नाम पर राजनीति

—यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं

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सुरेश हिन्दुस्थानी

देश के उच्च शिक्षा केन्द्र जब राजनीति के अड्डे बनने की ओर कदम बढ़ाने लगें, तब वहां की शिक्षा की दिशा-दशा क्या होगी, यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। फीस बढ़ोतरी के खिलाफ किया जाने वाला दिल्ली का छात्र आंदोलन कुछ इसी प्रकार का भाव प्रदर्शित कर रहा है, जहां केवल और केवल राजनीति ही की जा रही है। किसी भी आंदोलन की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके पीछे जनहित का कितना भाव है। दिल्ली का यह आंदोलन जनसरोकार से कोसों दूर दिखाई दे रहा है।

हालांकि इसके पीछे बहुत से अन्य कारण भी होंगे। सबसे बड़ा कारण तो यही है कि आज जेएनयू की जो छवि जनता के बीच बनी है, वह जनता को खुद ही दूर कर रही है। जिस विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारों की ध्वनि गूंजित होती है, वह कभी जन आंदोलन का हिस्सा नहीं बन सकते हैं।दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के जिन छात्रों ने कभी भारत के टुकड़े करने के नारे लगाए थे, आज वे ही छात्र फीस बढ़ोतरी के छोटे से मामले को राजनीतिक रुप देने का प्रयास करते दिखाई दे रहे हैं। इस छात्र आंदोलन का राजनीतिक स्वरुप इसलिए भी दिखाई दे रहा है, क्योंकि इसमें राष्ट्रीय मानबिन्दुओं और केन्द्र सरकार को सीधे निशाने पर लिया जा रहा है। जेएनयू वामपंथी विचारधारा का एक बड़ा केन्द्र रहा है।

वामपंथी धारा के कार्यकर्ता देश के महानायकों के बारे में क्या सोच रखते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। पिछले घटनाक्रमों को देखें तो पाएंगे कि जेएनयू में देश के विरोध में वातावरण बनाने का काम किया जाता रहा है। वहां आतंकवादी बुरहान वानी के समर्थन में कार्यक्रम किए जाते हैं। सवाल यह कि जेएनयू में शिक्षा के नाम पर आखिर क्या हो रहा है। जहां तक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में फीस बढ़ोतरी की बात है तो यह कहना तर्कसंगत ही होगा कि विगत 19 वर्ष से विश्वविद्यालय के छात्रावास के कमरों और भोजन का शुल्क नहीं बढ़ाया गया, जबकि पिछले 19 सालों में महंगाई का ग्राफ बहुत ऊपर गया है। इस सबका भार पूरी तरह से विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के कंधों पर ही आया। देश के अन्य विश्वविद्यालयों में भी शिक्षा महंगी हो रही है, जो जेएनयू के मुकाबले बहुत अधिक है। ऐसे में विश्वविद्यालय द्वारा कुछ हद तक फीस बढ़ाना न्यायोचित कदम ही है। जिसे वहां के कई छात्र भी सही मानते हैं। लेकिन यह आंदोलन इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि इसमें परदे के पीछे राजनीतिक कार्यकर्ता भूमिका निभा रहे हैं। यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं।

खैर… यह जांच का विषय हो सकता है।देश के प्रसिद्ध अधिवक्ता सांसद डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने इस छात्र आंदोलन के बारे में बहुत ही गहरी बात कही है। उनका मानना है कि जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय को कुछ समय के लिए बंद कर दिया जाए। उनके इस कथन के गहरे निहितार्थ निकल रहे हैं। स्वामी के संकेत को विस्तार से समझना हो तो एक बार जेएनयू की गतिविधियों का अध्ययन करना चाहिए। फिर वह सब सामने आ जाएगा जो वहां होता है। कहा जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जमकर राजनीति की जाती रही है। देश के जो शिक्षा केन्द्र राजनीति के केन्द्र बनते जा रहे हैं, उन पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है।

वर्तमान में जिस प्रकार से जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय का आंदोलन चल रहा है, उसे छात्र आंदोलन कहना न्याय संगत नहीं होगा। क्योंकि, यह विशुद्ध राजनीतिक आंदोलन है। फीस बढ़ोतरी का विरोध तो मात्र बहाना है। इस आंदोलन के समर्थन में देश की संसद में कांग्रेस और वामपंथी दलों की ओर से आवाज उठाई गई। इससे यही संदेश जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जो देश विरोधी नारे लगाए गए, उनके प्रति इन राजनीतिक दलों के समर्थन का ही भाव रहा होगा। इतना ही नहीं, जब भारत तेरे टुकड़े होंगे और हमें चाहिए आजादी जैसे नारे लगाए गए थे, तब भी कांग्रेस और वाम दलों ने खुलेआम समर्थन किया था। ऐसे में सवाल यह उठता है कि कहीं यही दोनों दल छात्रों को आंदोलन करने के लिए तो नहीं उकसा रहे? अगर यह सही है तो फिर केन्द्र सरकार को दोष देना सही नहीं कहा जा सकता।

जब से देश में राजनीतिक सत्ता का परिवर्तन हुआ है, तब से ही देश में उन संस्थानों की सक्रियता दिखाई देने लगी है, जो भारत के बारे में भ्रम का वातावरण बनाने में सहायक हो सकते हैं। चाहे वह शहरी नक्सलवाद को प्रायोजित करने वाले कथित बुद्धिजीवियों की संस्था हो या फिर उनके विचार को अंगीकार करने वाली ही संस्थाएं क्यों न हों। सभी केन्द्र सरकार का विरोध करने के लिए आगे आ रहे हैं। इस विश्वविद्यालय में पढ़ाई करने वाले छात्र कभी भारतीय सेना द्वारा की जाने वाली आतंकियों के विरोध में कार्यवाही पर सवाल उठाते दिखाई देते हैं तो कभी अनुच्छेद 370 को हटाने का विरोध करते हैं। चार वर्ष पूर्व जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में छात्र संघ की उपाध्यक्ष रहीं शेहला राशिद ने भारतीय सेना के विरोध में जमकर भड़ास निकाली थी, जबकि सेना की ओर से स्पष्ट कहा गया था कि ऐसा कुछ भी नहीं है। इससे समझ में आ सकता है कि इस विश्वविद्यालय में कौन-सा पाठ पढ़ाया जाता है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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देश की युवा पीढ़ी में विदेशों के प्रति रुचि बढ़ी

—गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है

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मनोज ज्वाला

एक मीडिया संस्थान के सर्वेक्षण के अनुसार हमारे देश के पढ़े-लिखे और शहरी नौजवानों में से आधे से अधिक ऐसे हैं, जो अपने देश को पसंद नहीं करते। वे विदेशों में जाकर बस जाना चाहते हैं। लगभग दो साल पहले के उक्त सर्वेक्षण के मुताबिक उनमें से 75 फीसदी युवाओं का कहना था कि वे बे-मन और मजबूरीवश भारत में रह रहे हैं। 62.08 फीसदी युवतियों और 66.01 फीसदी युवाओं का मानना था कि भारत  में उनका भविष्य सुरक्षित नहीं है। क्योंकि, यहां अच्छे दिन आने की संभावना कम है। उनमें से 50 फीसदी का मानना था कि भारत में किसी महापुरुष का अवतरण होगा, तभी हालात सुधर सकते हैं, अन्यथा नहीं।

40 फीसदी युवाओं का मानना था कि उन्हें अगर इस देश का प्रधानमंत्री बना दिया जाए, तो वे पांच साल में इस देश का कायापलट कर देंगे।अखबार का वह सर्वेक्षण आज भी बिल्कुल सही लगता है। अगर व्यापक स्तर पर सर्वेक्षण किया जाता, तो देश छोड़ने को तैयार युवाओं का प्रतिशत और अधिक दिखता। वह सर्वेक्षण तो सिर्फ शहरों तक सीमित था। अपने देश में गांवों पर भी तेजी से शहर छाते जा रहे हैं। गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है। गौर कीजिए कि देश छोड़ने को तैयार वे युवा पढ़े-लिखे हैं और शहरों में पले-बढ़े हैं। वे किस पद्धति से किस तरह के विद्यालयों में क्या पढ़े-लिखे हैं और किस रीति-रिवाज से कैसे परिवारों में किस तरह से पले-बढ़े हैं, यह ज्यादा गौरतलब है।

विद्यालय सरकारी हों या गैर सरकारी, सभी में शिक्षा की पद्धति एक है और वह है मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा पद्धति। भारतीयता विरोधी इसी शिक्षा पद्धति को सरकारी मान्यता प्राप्त है। सरकार का पूरा तंत्र इसी तरह की शिक्षा के विस्तार में लगा हुआ है। वैसे अंग्रेजी माध्यम वाले विद्यालय सबसे अच्छे माने जाते हैं और गैर-सरकारी निजी क्षेत्र के अधिकतर विद्यालय अंग्रेजी माध्यम के ही हैं। शहरों में ऐसे ही विद्यालयों की भरमार है और जिन युवाओं के बीच उक्त मीडिया संस्थान ने उपरोक्त सर्वेक्षण किया उनमें से सर्वाधिक युवा ऐसे ही तथाकथित ‘उत्कृष्ट’ विद्यालयों से पढ़े-लिखे हुए हैं। अब रही बात यह कि इन विद्यालयों में आखिर शिक्षा क्या और कैसी दी जाती है, तो यह इन युवाओं की उपरोक्त सोच से ही स्पष्ट है।

जाहिर है, उन्हें शिक्षा के नाम पर ऐसी-ऐसी डिग्रियां दी जाती हैं, जिनके कारण वे महात्वाकांक्षी, स्वार्थी बनकर असंतोष, अहंकार, खीझ, पलायन एवं हीनता-बोध से ग्रसित हो जाते हैं और कमाने-खाने भर थोड़े-बहुत हुनर हासिल कर स्वभाषा व स्वदेश के प्रति ‘नकार’ भाव से पीड़ित होकर विदेश चले जाते हैं।थॉमस विलिंग्टन मैकाले कोई शिक्षा-शास्त्री नहीं था। वह एक षड्यंत्रकारी था, जिसने भारत पर ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जड़ें जमाने की नीयत से भारतीय शिक्षा-पद्धति की जड़ें उखाड़कर मौजूदा शिक्षा-पद्धति को प्रक्षेपित किया था। जो आज भी उसी रूप में कायम है। 20 अक्टूबर 1931 को लंदन के रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ फौरन अफेयर्स के मंच से महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘अंग्रेजी शासन से पहले भारत की शिक्षा-व्यवस्था इंग्लैण्ड से भी अच्छी थी।’ उस पूरी व्यवस्था को सुनियोजित तरीके से समूल नष्ट कर देने के पश्चात ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जरूरतों के मुताबिक उसके रणनीतिकारों ने लम्बे समय तक बहस-विमर्श कर के मैकाले की योजनानुसार यह शिक्षा-पद्धति लागू की थी।

मैकाले ने ब्रिटिश पार्लियामेंट की शिक्षा समिति के समक्ष कहा था ‘हमें भारत में ऐसा शिक्षित वर्ग तैयार करना चाहिए, जो हमारे और उन करोड़ों भारतवासियों के बीच जिन पर हम शासन करते हैं, उन्हें समझाने-बुझाने का काम कर सके। जो केवल खून और रंग की दृष्टि से भारतीय हों, किन्तु रुचि, भाषा व भावों की दृष्टि से अंग्रेज हों।’ विदेशों में बस जाने को उतावले भारतीय युवाओं ने पूरी मेहनत व तबीयत से मैकाले शिक्षा-पद्धति को आत्मसात किया है, ऐसा समझा जा सकता है। यहां प्रसंगवश मैकाले के बहनोई चार्ल्स ट्रेवेलियन द्वारा ब्रिटिश पार्लियामेंट की एक समिति के समक्ष ‘भारत में भिन्न-भिन्न शिक्षा-पद्धतियों के भिन्न-भिन्न परिणाम’ शीर्षक से प्रस्तुत किये गए एक लेख का यह अंश भी उल्लेखनीय है कि ‘मैकाले शिक्षा-पद्धति का प्रभाव अंग्रेजी राज के लिए हितकर हुए बिना नहीं रह सकता। हमारे पास उपाय केवल यही है कि हम भारतवासियों को यूरोपियन ढंग की उन्नति में लगा दें। इससे हमारे लिए भारत पर अपना साम्राज्य कायम रखना बहुत आसान और असंदिग्ध हो जाएगा।’ ऐसा ही हुआ। बल्कि, मैकाले की योजना तो लक्ष्य से ज्यादा ही सफल रही।

हमारे देश के मैकालेवादी राजनेताओं ने अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासन की समाप्ति के बाद भी उनकी अंग्रेजी-मैकाले शिक्षा-पद्धति को न केवल यथावत कायम रखा, बल्कि उसे और ज्यादा अभारतीय रंग-ढंग में ढाल दिया। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष लक्षित प्राचीन भारतीय शिक्षा-पद्धति को अतीत के गर्त में डालकर शिक्षा को उत्पादन-विपणन-मुनाफा-उपभोग-केन्द्रित बना देने और उसे नैतिक सांस्कृतिक मूल्यों से विहीन कर देने तथा राष्ट्रीयता के प्रति उदासीन बना देने का ही परिणाम है कि हमारी यह युवा पीढ़ी महज निजी सुख-स्वार्थ के लिए अपने देश से विमुख हो जाना पसंद कर रही है। उसे विदेशों में ही अपना भविष्य दीख रहा है।

माना कि हमारे देश में तरह-तरह की समस्याएं हैं, किन्तु इनसे जूझने और इन्हें दूर करने की बजाय पलायन कर जाने अथवा कोरा लफ्फाजी करने कि हमें प्रधानमंत्री बना दिया जाए तो हम देश को सुंदर बना देंगे, अति महात्वाकांक्षा-युक्त मानसिक असंतुलन का ही द्योत्तक है। लेकिन आधे से अधिक ये शहरी युवा मानसिक रुप से असंतुलित नहीं हैं, बल्कि असल में वे पश्चिम के प्रति आकर्षित हैं। इसके लिए हमारे देश की चालू शिक्षा-पद्धति का पोषण करने वाले हमारे राजनेता ही जिम्मेवार हैं। यह ‘यूरोपियन ढंग की उन्नति’ के प्रति बढ़ते अनावश्यक आकर्षण का परिणाम है। इस मानसिक पलायन को रोकने के लिए जरूरी है कि हम अपने बच्चों को हमारे राष्ट्र की जड़ों से जोड़ने वाली और संतुलित समग्र मानसिक विकास करने वालीप्राचीन भारतीय पद्धति से भारतीय भाषाओं में समस्त ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा देने की सम्पूर्ण व्यवस्था कायम करें।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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भाई-बहन में प्रेम भाव बढ़ाता है भैया दूज

–बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था

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योगेश कुमार गोयल

(भैया दूज, 29 अक्टूबर पर विशेष)

भाई-बहन के दिलों में पावन संबंधों की मजबूती और प्रेमभाव स्थापित करने वाला पर्व है भैया दूज। इस दिन बहनें अपने भाईयों को तिलक लगाकर ईश्वर से उनकी दीर्घायु की कामना करती हैं। कहा जाता है कि इससे भाई यमराज के प्रकोप से बचे रहते हैं। दीपावली के दो दिन बाद अर्थात कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाए जाने वाले इस पर्व को ‘यम द्वितीया’ व ‘भ्रातृ द्वितीया’ के नाम से भी जाना जाता है। बहुत से भाई-बहन सौभाग्य तथा आयुष्य की प्राप्ति के लिए इस दिन यमुना अथवा अन्य पवित्र नदियों में साथ-साथ स्नान भी करते हैं। भैया दूज मनाने के संबंध में कई किवंदतियां प्रचलित हैं। एक कथा यमराज और उनकी बहन यमुना देवी से संबंधित है। बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था। यमुना अपने भाई यमराज से बहुत स्नेह करती थीं और अक्सर उनसे अनुरोध करती रहती थीं कि वे अपने इष्ट-मित्रों सहित उसके घर भोजन के लिए पधारें लेकिन यमराज हर बार उसके निमंत्रण को किसी न किसी बहाने से टाल जाते। कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमुना ने यमराज को एक बार फिर भोजन के लिए आमंत्रित किया।

उस समय यमराज ने विचार किया कि मैं तो अपने कर्त्तव्य से बंधा सदैव प्राणियों के प्राण ही हरता हूं। इसलिए इस चराचर जगत में कोई भी मुझे अपने घर नहीं बुलाना चाहता। लेकिन बहन यमुना तो मुझे बार-बार अपने घर आमंत्रित कर रही है। इसलिए अब तो उसका निमंत्रण स्वीकार करना ही चाहिए।यमराज को अपने घर आया देख यमुना की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने भाई का खूब आदर-सत्कार करते हुए उनके समक्ष नाना प्रकार के व्यंजन परोसे। बहन के आतिथ्य से यमराज बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे कोई वर मांगने को कहा। इस पर यमुना ने उनसे अनुरोध किया कि आप प्रतिवर्ष इसी दिन मेरे घर आकर भोजन करें और मेरी तरह जो भी बहन इस दिन अपने भाई का आदर-सत्कार करे, उसे तुम्हारा भय न रहे। यमराज ने बहन यमुना को उसका इच्छित वरदान दे दिया। ऐसी मान्यता है कि उसी दिन से ‘भैया दूज’ का पर्व मनाया जाने लगा। भैया दूज के संबंध में और भी कई कथाएं प्रचलित हैं। ऐसी ही एक कथा के अनुसार, एक ब्राह्मण की दो संतानें थी।

एक पुत्र एवं एक पुत्री। पुत्री बहुत समझदार एवं गुणवती थी। वह अपने भाई से जी-जान से प्यार करती थी। एक दिन उसका भाई उससे मिलने उसकी ससुराल पहुंचा। उस समय वह सूत कातने में व्यस्त थी। अतः उसे भाई के आने का पता ही न चल सका। भाई भी बिना कुछ बोले चुपचाप एक ओर बैठा रहा। जब थोड़ी देर बाद बहन की नजर उस पर पड़ी तो भाई को अपने घर आया देख उसे बेहद खुशी हुई। उसने भाई का भरपूर आदर-सत्कार किया। अगले दिन भाई को वापस लौटना था। अतः रास्ते के लिए वह आटे के पकवान बनाने के उद्देश्य से चक्की में आटा पीसने लगी। अनजाने में चक्की में बैठा सांप भी आटे के साथ पिस गया। उसी आटे के पकवान एक पोटली में बांधकर उसने भाई को रास्ते में खाने के लिए देकर विदा किया। भाई के घर से जाने के बाद जब उसे यह मालूम हुआ कि आटे में सांप पिस गया है तो अपने पुत्र को पालने में ही सोता छोड़कर वह अपने भाई के प्राणों की रक्षा के लिए दौड़ी। कुछ दूर जाने पर उसे एक पेड़ की छांव में अपना भाई सोता दिखाई दिया। तब तक उसने पोटली में से कुछ भी नहीं खाया था। उसने भगवान का शुक्रिया अदा किया और पोटली उठाकर दूर फेंक दी तथा भाई के साथ मायके की ओर चल दी।

रास्ते में उसने देखा कि भारी-भारी शिलाएं आकाश में उड़ रही हैं। उसने एक राहगीर से इस रहस्य के बारे में जानना चाहा तो उसने बताया कि जो बहन अपने भाई पर कभी नाराज न होती हो और उसे दिलो-जान से चाहती हो, उस भाई की शादी के समय ये शिलाएं उसकी छाती पर रखी जाएंगी। थोड़ी दूर चलने पर उसे नाग-नागिन दिखाई दिए। नाग ने बताया कि ये शिलाएं जिस व्यक्ति की छाती पर रखी जाएंगी, हम उसे डंस लेंगे। जब बहन ने इस विपत्ति से बचने का उपाय पूछा तो नाग-नागिन ने बताया कि अगर भाई के विवाह के समय उसके सभी कार्य बहन स्वयं करे, तभी भाई की जान बच सकती है।जब उसके भाई के विवाह के लग्न का शुभ मुहूर्त आया तो वह भाई को पीछे धकेलती हुई स्वयं ही लग्न चढ़वाने के लिए आगे हो गई और घोड़ी पर भी स्वयं चढ़ गई। परिवारजन और संबंधी उसके इस विचित्र व्यवहार से हैरान तथा क्रोधित थे। उसके घोड़ी पर चढ़ते ही शिलाएं उड़ती-उड़ती आई लेकिन घोड़ी पर किसी पुरूष की जगह एक महिला को बैठी देख वापस मुड़ गई। जब सुहागरात का समय आया तो वह भाई को पीछे कर खुद भाभी के साथ सोने उसके कमरे में चली गई।

परिवार के सभी सदस्य तथा सभी रिश्तेदार उसके इस अजीबोगरीब व्यवहार से बेहद आश्चर्यचकित और खफा थे। उन्हें उस पर गुस्सा तो बहुत आ रहा था लेकिन उसके जिद के समक्ष सभी विवश थे। सुहागरात पर नियत समय पर नाग-नागिन उसके भाई को डंसने कमरे में पहुंच गए लेकिन उसने नाग-नागिन को मारने की सारी तैयारी पहले ही कर रखी थी। आखिरकार उसने नाग-नागिन का काम तमाम कर दिया। उसके बाद वह निश्चिंत होकर सो गई। सुबह होने पर सभी मेहमानों को विदा करने के बाद परिवार वालों ने सोचा कि अब इस बला को भी कुछ बचा-खुचा देकर यहां से चलता कर दिया जाए लेकिन नींद से जागने पर जब उसने पूरी घटना के बारे में सब को विस्तार से बताया कि किस प्रकार वह अपने बच्चे को पालने में ही सोता छोड़कर दौड़ी-दौड़ी भाई के प्राण बचाने के लिए उसके पीछे चली आई और सभी को नाग-नागिन के मृत शरीर दिखाए तो सभी की आंखों में आंसू आ गए।

भाई के प्रति उसका असीम प्यार तथा समर्पण भाव देखकर उसके प्रति सभी का हृदय श्रद्धा से भर गया।भाई-भाभी तथा माता-पिता ने उसे ढेर सारे उपहारों से लादकर बड़े मान-सम्मान के साथ खुशी-खुशी ससुराल से विदा किया। भाई-बहन के बीच इसी प्रकार के पावन संबंध, प्रेमभाव तथा उनके दिलों में आपसी संबंधों को मजबूत बनाने के लिए ही ‘भैया दूज’ पर्व मनाया जाता है।

(लेखक स्तंभकार हैं।)

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