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लेख

कम्युनिज्म (साम्यवाद) का काला इतिहास

रूस में 1917-21 के बीच चला गृह-युद्ध यही था। किन्तु इस तरह सारे वास्तविक, संदिग्ध, संभावित विरोधियों का समूल संहार करके भी, अगले 6-7 दशक भी सदैव उसी तानाशाही, बेहिसाब हिंसा, सेंसरशिप, यातना शिविर और जबरदस्ती के बल पर ही रूस में कम्युनिस्ट शासन चल सका।

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(डॉ. शंकर शरण/डॉ विवेक आर्य ) रूस में 25 अक्तूबर (या 7 नवंबर) 1917 की घटना को पहले अक्तूबर या नवंबर क्रांति कहा जाता था, लेकिन 1991 में कम्युनिज्म के विघटन के बाद स्वयं रूसी उसे ‘कम्युनिस्ट पुत्स्च’ यानी “तख्तापलट” कहने लगे, जो वह वास्तव में था। उस दिन सेंट पीटर्सबर्ग में ब्लादिमीर लेनिन के पागलपन या दुस्साहस से मुट्ठी भर रूसी कम्युनिस्टों ने सत्ता पर कब्जे की कार्रवाई शुरू की थी। वह सफल इसलिए हो गई क्योंकि तब सरकार बड़ी संभ्रमित, अनिश्चित हालात में थी। इसलिए सरकारी तंत्र ने कोई निर्णायक जवाबी कदम नहीं उठाया और अंतत: सत्ता कम्युनिस्टों के हाथ में आ गई। यह सब संयोगिक था, क्योंकि वास्तव में रूस में कम्युनिस्टों का समर्थन या संगठन नाम मात्र ही था। इसीलिए, उस दिन के तख्तापलट को सत्ता में जम जाने के बाद “क्रांति” का नाम मिल गया, पर सत्ता खत्म हो जाने के बाद रूसियों ने उसका सही नाम पुनर्स्थापित कर दिया।
बहरहाल, सत्ता पर कब्जे से ठीक पहले रूसी कम्युनिस्ट नेता ब्लादिमीर लेनिन ने अपनी पुस्तक “राज्य और क्रांति” (1917) में लिखा था कि “कम्युनिस्टों की सत्ता अपने पहले दिन से ही दमनात्मकता छोड़ना शुरू कर देगी, क्योंकि दमन की जरूरत पूंजीवादी राज्यसत्ता को रहती है।” लेकिन हुआ ठीक उलटा! लेनिनवादी कम्युनिस्टों ने शुरू से ही क्रूरतम हिंसा, सामूहिक, बर्बर संहार का उपयोग किया। उन्होंने उसके लिए पेशेवर, भयंकर अपराधियों, गंदे लोगों से अपनी पार्टी-राज्य मशीनरी को भर लिया, क्योंकि वही लोग नीचतम, पाशविक हिंसा कर सकते थे। उसके बिना कम्युनिस्ट सत्ता टिक ही नहीं सकती थी।
रूस में 1917-21 के बीच चला गृह-युद्ध यही था। किन्तु इस तरह सारे वास्तविक, संदिग्ध, संभावित विरोधियों का समूल संहार करके भी, अगले 6-7 दशक भी सदैव उसी तानाशाही, बेहिसाब हिंसा, सेंसरशिप, यातना शिविर और जबरदस्ती के बल पर ही रूस में कम्युनिस्ट शासन चल सका। महान रूसी लेखक सोल्झेनित्सिन का ऐतिहासिक ग्रंथ “गुलाग आर्किपेलाग” (1973) उस भयावह सचाई का एक सीमित आकलन भर है। सत्ताधारी कम्युनिस्टों की वह हिंसा उसी जरूरत और उसी भावना से चीन, वियतनाम, कम्बोडिया, पूर्वी यूरोप आदि जगहों पर चली, जिसने अपने-अपने निरीह दसियों-करोड़ देशवासियों को खत्म किया। उसी के साथ वह सिद्धांत भी खत्म हो गया जिसे “मार्क्सवाद-लेनिनवाद” कहा गया था।
‘वर्ग-हीन’, ‘गैर-दमनकारी राज्य’ और ‘शोषण-विहीन समतावादी समाज’ के दावे कम्युनिस्ट शासनों में चिंदी-चिंदी होकर नष्ट हो गए। बाद में जिस पर कम्युनिस्ट देशों की ‘नौकरशाही’ कह कर विफलता का दोष मढ़ने की कोशिश की गई, वह वस्तुत: एक नया शासक वर्ग ही था। उसे विशेषाधिकार, अतुलनीय सुविधाएं और निरंकुश ताकत दिए बिना कोई कम्युनिस्ट राज्य एक दिन भी सत्ता में नहीं रह सकता था। यह सब “समानता के सिद्धांत” का क्रूर मजाक साबित हुआ। जिन देशों में लोकतांत्रिक तरीके से कम्युनिस्ट शासन और समाज बनाने की कोशिशें हुईं, वहां भी वे विफल रहीं। जैसे, चिली और निकारागुआ। आर्थिक-तकनीकी क्षेत्र में समाजवादी सत्ताएं अक्षम साबित हुईं। जो कारण पूंजीवादी देशों में सरकारी क्षेत्र के उद्योगों, सेवाओं के पिछड़ने के हैं, वही और भी बड़े पैमाने पर समाजवादी देशों के पिछड़ने के थे।
कृषि क्षेत्र में मार्क्सवादी-लेनिनवादी प्रयोगों ने और भी ज्यादा विध्वंस किया। किसानों से जमीन छीन कर सामूहिकीकरण और नौकरशाही संचालन से अभूतपूर्व कई अकाल पड़े। रूस, चीन, कोरिया, कम्बोडिया, इथियोपिया, आदि देशों में करोड़ों लोग भूख से मर गए, जिनकी जानकारी भी दुनिया को दशकों बाद मिली। इस प्रकार, जमीन के निजी स्वामित्व वाली किसानी को खत्म कर ‘कम्युनिस्ट स्वामित्व’ में उत्पादन कई गुना बढ़ाने की कल्पना उलटी साबित हुई। वह तो रूस की विशाल प्राकृतिक संपदा थी, जिसके बल पर रूस के साथ-साथ पूर्व यूरोप की भी ‘समाजवादी उन्नति’ का झूठा चित्र दो-तीन दशकों तक दिखाया जाता रहा। लेकिन जैसा कि 1986-90 की घटनाओं ने दिखाया, रूसी सहारा हटते ही पूर्व यूरोप की सत्ताएं ताश के महलों की तरह ढह गर्इं।
वह शासन इतना कृत्रिम, विचारहीन था कि जब आम रूसियों ने 1991 में कम्युनिस्ट शासन को भंग करना शुरू किया तो 2 करोड़ सदस्यों वाली “सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी” और उसके अभिजातों ने कोई प्रतिरोध नहीं किया क्योंकि आदर्श या सिद्धांत का मनोबल तो 1918-19 से ही नहीं था। मुख्यत: निर्मम तानाशाही और लोभ-भय, आतंक, झूठ आदि के बल पर राज चलाया जाता रहा था। जैसा कि चीन में अभी भी चल रहा है।
सामाजिक, सांस्कृतिक क्षेत्र में भी कम्युनिस्ट देशों में ‘पूंजी की गुलामी’ से मुक्त होकर ‘स्वतंत्र मनुष्य’ बनने के बदले मनुष्य “मूक जानवरों-सी” अवस्था में पहुंच गया। ऐसी व्यवस्था में, जहां राज्य-शासन एकमात्र रोजगारदाता था, वहां अंध-आज्ञापालन के सिवाय जीने का ही कोई अवसर न था! इसीलिए कई कम्युनिस्टों ने भी शुरू में ही भांप लिया था कि घोर-गुलामी की व्यवस्था बनने जा रही है। रूस में 1917-18 में ही महान कम्युनिस्ट लेखक मैक्सिम गोर्की ने अपने सैकड़ों लेखों, संपादकीयों में यह क्षोभ व्यक्त किया था। “अनटाइमली थॉट्स” नाम से उनका यह संग्रह बाद में विदेशों में छपा। ट्रॉट्स्की, रोजा लक्जमबर्ग आदि अन्य विवेकशील कम्युनिस्टों ने भी वही आशंका व्यक्त की थी। सभी सत्य साबित हुए।
समाजवाद का राजनीतिक तंत्र बनाने के मामले में भी कठोर, सैनिक ढांचे वाला मॉडल सीमित उपयोगिता का रहा। हालांकि बाहरी हमले आदि का मुकाबला करने में यह जरूर उपयोगी हुआ जिसमें लोगों और चीजों को मनचाहे, फौरन जहां से तहां भेजा जा सकता था। किन्तु अर्थतंत्र, शिक्षा, विचार, दर्शन और संस्कृति की दरिद्रता आदि इसके निकम्मेपन के उदाहरण हैं। आलोचनाओं का उत्तर देना, स्वयं को सुधारना, विदेशी साहित्य का अध्ययन, सांस्कृतिक आदान-प्रदान चला सकना आदि में सभी कम्युनिस्ट देश नाकारा साबित हुए। झूठे आंकड़े, विवरण और दूसरे देशों के बारे में दुष्प्रचार के सिवाय उनकी साहित्यिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक क्षमता कभी कुछ न दे सकी।
रूसी कम्युनिज्म के पूरे सात दशक में एक भी मार्क्सवादी साहित्यिक, दार्शनिक, सामाजिक पुस्तक या विद्वान नहीं है, जिसे आज भी मूल्यवान कहा जाता हो। इसके विपरीत यूरोप, अमेरिका और संपूर्ण पूंजीवादी जगत में इसी दौरान तकनीक ही नहीं, साहित्यिक, बौद्धिक अवदानों के एक से एक स्तंभ खड़े हुए जिनकी गिनती तक कठिन है।
अंतरराष्ट्रीय दृश्य में भी ‘दुनिया के मजदूरो, एक हो!’ का नारा कभी स्वीकृत न हुआ। पहले विश्व-युद्ध से लेकर शीत-युद्ध और शान्ति काल में भी जनता ने अपने देश, भाषा, पंथ, संस्कृति को परे कर ‘वर्गीय’ यानी कम्युनिस्ट-एकता बनाने, दिखाने में कोई रुचि नहीं ली। यहां तक कि कम्युनिस्ट देशों की पार्टियों तक ने मौका मिलते ही अपनी स्वतंत्र हस्ती दिखाने में संकोच न किया। रूस या चीन के साथ दूसरे देशों के कम्युनिस्टों की एकता स्वैच्छिक नहीं थी। इसे फिनलैंड, हंगरी, चेकोस्लोवाकिया, पोलैंड, चीन, युगोस्लाविया और वियतनाम के कम्युनिस्टों ने बार-बार दिखाया। पश्चिमी यूरोप की कम्युनिस्ट पार्टियों ने भी वही दर्शाया। वे या तो रूस के प्रचारक के रूप में महत्वहीन रहे या मजबूत होते ही रूसी कम्युनिज्म से दूरी रखने लगे।
अत: किसी प्रकार सामाजिक परिवर्तन कभी नहीं करना चाहिए, यही रूसी कम्युनिज्म का मूल सबक है। इस दारुण इतिहास के बावजूद आज भी दुनिया भर में जो लोग मार्क्सवाद में बुद्धि लगाते रहते हैं, वैसे ही लोगों को अंधविश्वासी या फैनेटिक कहा जाता है। आज मार्क्सवाद-लेनिनवाद कतई प्रासंगिक नहीं है, क्योंकि यह अपनी ही मान्यताओं पर निष्फल रहा। प्रथम, समानता बनाने के लिए इसे ऐसे दमनकारी तंत्र की जरूरत हुई, जो अपनी परिभाषा से ही एक अलग, अत्यधिक उच्चाधिकारी वर्ग था। यानी नागरिक समानता को असंभव बनाता था। दूसरे, दुनिया के लोगों के बीच अंतरराष्ट्रीय वर्गीय एकता के बदले स्थानीय सांस्कृतिक, राष्ट्रीय एकता के संबंध अत्यधिक सशक्त साबित हुए। इस तरह मार्क्सवाद की पूरी वर्ग-संकल्पना हवाई रही।
यही कारण है कि मार्क्सवादी नाम से दुनिया भर में जितने भी शासन स्थापित हुए, सब जल्द ही जड़, कठोर, मतिहीन व्यवस्थाओं में बदल गए। उनमें जब-जब, जहां-जहां सुधार के प्रयत्न हुए, वे कभी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाए। पूरी व्यवस्था लड़खड़ाने लगती थी, जिसे पुन: बल-प्रयोग कर उसी तरह अनम्य बना लिया जाता था। कम्युनिस्ट व्यवस्था में समयानुरूप बदलने का लचीलापन न था, क्योंकि वे सहज, मानवीय विकास से नहीं, बल्कि एक मतवादी फॉर्मूले पर जबरन बनाई गई थीं।
अंतत: रूस में मिखाइल गोर्बाचेव के प्रयोगों (1986-91) के बाद स्पष्ट दिख गया कि मार्क्सवादी-समाजवाद किसी सुधार के योग्य नहीं है। उसकी व्यवस्था एक जड़-चट्टान की तरह है जिसे सुधारने में उसके पूरे के पूरे टूटने के आसार दिखते थे। वही हुआ। उसी से सबक लेकर चीन में कम्युनिस्टों ने 1989 में लोकतंत्र आंदोलन को निर्ममता से कुचला, वरना चीन में भी कम्युनिस्ट शासन का पटाक्षेप हो जाता। जो लोग मार्क्सवादी व्यवस्थाओं को ‘विचारधारा का शासन’ मानते हैं, वे भी गलत हैं। यह सच है कि आरंभिक दौर में, मार्क्सवादी विचारधारा ने कम्युनिस्ट नेताओं, कार्यकर्ताओं को प्रेरित किया था। किंतु सत्ता ले लेने के बाद हर कहीं केवल बल-छल का तर्क प्रबल हो जाता रहा। कथित विचारधारा सब कुछ छिपाने या जैसे-तैसे व्याख्यायित करने का परदा या औजार भर रह जाती थी।
उसी कारण कम्युनिस्ट शासन वाले देशों में कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य बनना निष्ठा के बदले विवशता, निजी उन्नति, सुविधा और विशेषाधिकारों का पासपोर्ट होता था। अत: उन समाजवादी देशों को ‘विचारधारा शासित’ देश कहना भी भूल ही है। एक जमाने के तत्कालीन सोवियत संघ के सर्वोच्च नेता निकिता ख्रुश्चेव के बेटे सर्गेई ख्रुश्चेव ने अपने संस्मरण में लिखा है कि अपनी किशोरावस्था में जब उसने अपने पिता से बार-बार यह समझने की कोशिश की कि ‘कम्युनिज्म क्या है?’, तो उसे समझ में आने लायक कुछ न मिला। यह लगभग 1960 की बात है।
कम्युनिस्ट देशों की तुलना में अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, जापान आदि की राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था अतुलनीय रूप से सहज व रचनात्मक बनी रही है। हर तरह की नई समस्याओं से निबटने और आगे बढ़ने में उन देशों को कभी कोई कठिनाई नहीं हुई। कम्युनिस्ट वैचारिक तानाशाही की तुलना में स्वतंत्र चिंतन ने इनकी राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्थाओं को अधिक लचीला, परिवर्तनीय बनाए रखा है। इस के विपरीत, मार्क्सवाद को ‘वैज्ञानिक’ बताने और विश्व-विजयी बनाने की जिद में सभी मार्क्सवादी देशों ने अपने ही लोगों को अकूत हानि पहुंचाकर भी कुछ हासिल नहीं किया। इस खुले इतिहास के बावजूद भारत में जो लोग मार्क्सवाद में किसी समस्या का समाधान पाना चाहते हैं, उन पर दया ही की जा सकती है। वे बंद-दिमाग, खामख्याल हैं। यद्यपि उनमें ऐसे तेजदिमाग भी हैं जो सच जानते हुए भी केवल ‘धंधा’ कर रहे हैं। देश और समाज को विभाजित करने में लगी देशी-विदेशी शक्तियों के साथ परस्पर लाभ का पेशेवर कारोबार। और इसी कार्य के लिए एक दिखाऊ, वैचारिक आडंबर ही अब उनका वामपंथ है।
वस्तुत: मार्क्सवाद-लेनिनवाद अजायबघर की वस्तु हो चुका है। यह इससे भी प्रमाणित होता है कि कम्युनिस्ट नेता भी अब मूल मार्क्सीय धारणाओ का कभी प्रयोग नहीं करते। वर्ग-संघर्ष, सर्वहारा की तानाशाही, सोशलिज्म, कम्युनिज्म, मजदूर वर्ग की अंतरराष्ट्रीयता, बेशी मूल्य आदि बुनियादी पदों का भी इस्तेमाल किए उन्हें बरसों हो गए हैं। यह अकारण नहीं कि पहले के नामी मार्क्सवादी प्रोफेसर, बुद्धिजीवी अब अपने को ‘सेक्युलर’, ‘लिबरल’ या ‘वामपंथी’ कहते हैं। अपना पुराना अहंकारी विशेषण ‘मार्क्सवादी’ उन्होंने स्वयं छोड़ दिया है! यह सब मार्क्सवाद का जग-जाहिर मूल्यांकन ही है। वैचारिक मंथन के नाम पर वे केवल जुमले दुहराते हैं।
कुछ पहले यहां मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने अपनी कुल समीक्षा यह की है कि “भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस के साथ रहना अनिवार्य था!” यह देखकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महान नेता कॉमरेड डांगे परलोक में हँस रहे होंगे। 40-45 वर्ष पहले वे यही आग्रह करते थे, जिसे ‘दक्षिणपंथी संशोधनवाद’ कहकर मा.क.पा. भर्त्सना करती थी।
बहरहाल, भारत के मार्क्सवादी हमेशा देश के लोगों और अपने को भी छलते रहे हैं। हैरत यह कि दशकों तक रूस, चीन, वियतनाम से सीखने की आदत रखने वाले भारतीय कम्युनिस्ट अब उनसे भी सीखने से कतराते हैं! रूसी गोर्बाचेव हों या चीनी देंग, सबने झक मारकर यही पाया कि “सच्चाई, विचारधारा से बहुत अधिक ताकतवर है।” जैसा कि सोल्झेनित्सिन ने लिखा था, ‘‘सचाई का एक शब्द पूरी दुनिया पर भारी पड़ता है।’’ मार्क्सवादियों को सचाई का अवलंब लेना होगा। शोषित, दुर्बल, गरीब की सेवा केवल प्रत्यक्ष ही हो सकती है। इसके लिए कोई विचारधारा नहीं चाहिए।
यह करके कोई समाज का नायक भी बन सकता है। कम्युनिस्ट विश्व-व्यवस्था के अवसान के दो दशक बाद भी माकपा, उसके सहयोगी मार्क्सवादी प्रोफेसर, बुद्धिजीवी उस महान परिघटना की कोई समीक्षा तथा निष्कर्ष निश्चित नहीं कर सके। उन्होंने कुछ नहीं सीखा। तभी वे बन्दरिया के मरे बच्चे जैसे अपनी विचारधारा या उसकी विभाजनकारी भावना को चिपटाए घूम रहे हैं।
डॉ. शंकर शरण/डॉ विवेक आर्य

लेख

जेएनयू में फीस वृद्धि के नाम पर राजनीति

—यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं

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सुरेश हिन्दुस्थानी

देश के उच्च शिक्षा केन्द्र जब राजनीति के अड्डे बनने की ओर कदम बढ़ाने लगें, तब वहां की शिक्षा की दिशा-दशा क्या होगी, यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। फीस बढ़ोतरी के खिलाफ किया जाने वाला दिल्ली का छात्र आंदोलन कुछ इसी प्रकार का भाव प्रदर्शित कर रहा है, जहां केवल और केवल राजनीति ही की जा रही है। किसी भी आंदोलन की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके पीछे जनहित का कितना भाव है। दिल्ली का यह आंदोलन जनसरोकार से कोसों दूर दिखाई दे रहा है।

हालांकि इसके पीछे बहुत से अन्य कारण भी होंगे। सबसे बड़ा कारण तो यही है कि आज जेएनयू की जो छवि जनता के बीच बनी है, वह जनता को खुद ही दूर कर रही है। जिस विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारों की ध्वनि गूंजित होती है, वह कभी जन आंदोलन का हिस्सा नहीं बन सकते हैं।दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के जिन छात्रों ने कभी भारत के टुकड़े करने के नारे लगाए थे, आज वे ही छात्र फीस बढ़ोतरी के छोटे से मामले को राजनीतिक रुप देने का प्रयास करते दिखाई दे रहे हैं। इस छात्र आंदोलन का राजनीतिक स्वरुप इसलिए भी दिखाई दे रहा है, क्योंकि इसमें राष्ट्रीय मानबिन्दुओं और केन्द्र सरकार को सीधे निशाने पर लिया जा रहा है। जेएनयू वामपंथी विचारधारा का एक बड़ा केन्द्र रहा है।

वामपंथी धारा के कार्यकर्ता देश के महानायकों के बारे में क्या सोच रखते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। पिछले घटनाक्रमों को देखें तो पाएंगे कि जेएनयू में देश के विरोध में वातावरण बनाने का काम किया जाता रहा है। वहां आतंकवादी बुरहान वानी के समर्थन में कार्यक्रम किए जाते हैं। सवाल यह कि जेएनयू में शिक्षा के नाम पर आखिर क्या हो रहा है। जहां तक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में फीस बढ़ोतरी की बात है तो यह कहना तर्कसंगत ही होगा कि विगत 19 वर्ष से विश्वविद्यालय के छात्रावास के कमरों और भोजन का शुल्क नहीं बढ़ाया गया, जबकि पिछले 19 सालों में महंगाई का ग्राफ बहुत ऊपर गया है। इस सबका भार पूरी तरह से विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के कंधों पर ही आया। देश के अन्य विश्वविद्यालयों में भी शिक्षा महंगी हो रही है, जो जेएनयू के मुकाबले बहुत अधिक है। ऐसे में विश्वविद्यालय द्वारा कुछ हद तक फीस बढ़ाना न्यायोचित कदम ही है। जिसे वहां के कई छात्र भी सही मानते हैं। लेकिन यह आंदोलन इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि इसमें परदे के पीछे राजनीतिक कार्यकर्ता भूमिका निभा रहे हैं। यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं।

खैर… यह जांच का विषय हो सकता है।देश के प्रसिद्ध अधिवक्ता सांसद डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने इस छात्र आंदोलन के बारे में बहुत ही गहरी बात कही है। उनका मानना है कि जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय को कुछ समय के लिए बंद कर दिया जाए। उनके इस कथन के गहरे निहितार्थ निकल रहे हैं। स्वामी के संकेत को विस्तार से समझना हो तो एक बार जेएनयू की गतिविधियों का अध्ययन करना चाहिए। फिर वह सब सामने आ जाएगा जो वहां होता है। कहा जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जमकर राजनीति की जाती रही है। देश के जो शिक्षा केन्द्र राजनीति के केन्द्र बनते जा रहे हैं, उन पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है।

वर्तमान में जिस प्रकार से जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय का आंदोलन चल रहा है, उसे छात्र आंदोलन कहना न्याय संगत नहीं होगा। क्योंकि, यह विशुद्ध राजनीतिक आंदोलन है। फीस बढ़ोतरी का विरोध तो मात्र बहाना है। इस आंदोलन के समर्थन में देश की संसद में कांग्रेस और वामपंथी दलों की ओर से आवाज उठाई गई। इससे यही संदेश जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जो देश विरोधी नारे लगाए गए, उनके प्रति इन राजनीतिक दलों के समर्थन का ही भाव रहा होगा। इतना ही नहीं, जब भारत तेरे टुकड़े होंगे और हमें चाहिए आजादी जैसे नारे लगाए गए थे, तब भी कांग्रेस और वाम दलों ने खुलेआम समर्थन किया था। ऐसे में सवाल यह उठता है कि कहीं यही दोनों दल छात्रों को आंदोलन करने के लिए तो नहीं उकसा रहे? अगर यह सही है तो फिर केन्द्र सरकार को दोष देना सही नहीं कहा जा सकता।

जब से देश में राजनीतिक सत्ता का परिवर्तन हुआ है, तब से ही देश में उन संस्थानों की सक्रियता दिखाई देने लगी है, जो भारत के बारे में भ्रम का वातावरण बनाने में सहायक हो सकते हैं। चाहे वह शहरी नक्सलवाद को प्रायोजित करने वाले कथित बुद्धिजीवियों की संस्था हो या फिर उनके विचार को अंगीकार करने वाली ही संस्थाएं क्यों न हों। सभी केन्द्र सरकार का विरोध करने के लिए आगे आ रहे हैं। इस विश्वविद्यालय में पढ़ाई करने वाले छात्र कभी भारतीय सेना द्वारा की जाने वाली आतंकियों के विरोध में कार्यवाही पर सवाल उठाते दिखाई देते हैं तो कभी अनुच्छेद 370 को हटाने का विरोध करते हैं। चार वर्ष पूर्व जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में छात्र संघ की उपाध्यक्ष रहीं शेहला राशिद ने भारतीय सेना के विरोध में जमकर भड़ास निकाली थी, जबकि सेना की ओर से स्पष्ट कहा गया था कि ऐसा कुछ भी नहीं है। इससे समझ में आ सकता है कि इस विश्वविद्यालय में कौन-सा पाठ पढ़ाया जाता है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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देश की युवा पीढ़ी में विदेशों के प्रति रुचि बढ़ी

—गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है

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मनोज ज्वाला

एक मीडिया संस्थान के सर्वेक्षण के अनुसार हमारे देश के पढ़े-लिखे और शहरी नौजवानों में से आधे से अधिक ऐसे हैं, जो अपने देश को पसंद नहीं करते। वे विदेशों में जाकर बस जाना चाहते हैं। लगभग दो साल पहले के उक्त सर्वेक्षण के मुताबिक उनमें से 75 फीसदी युवाओं का कहना था कि वे बे-मन और मजबूरीवश भारत में रह रहे हैं। 62.08 फीसदी युवतियों और 66.01 फीसदी युवाओं का मानना था कि भारत  में उनका भविष्य सुरक्षित नहीं है। क्योंकि, यहां अच्छे दिन आने की संभावना कम है। उनमें से 50 फीसदी का मानना था कि भारत में किसी महापुरुष का अवतरण होगा, तभी हालात सुधर सकते हैं, अन्यथा नहीं।

40 फीसदी युवाओं का मानना था कि उन्हें अगर इस देश का प्रधानमंत्री बना दिया जाए, तो वे पांच साल में इस देश का कायापलट कर देंगे।अखबार का वह सर्वेक्षण आज भी बिल्कुल सही लगता है। अगर व्यापक स्तर पर सर्वेक्षण किया जाता, तो देश छोड़ने को तैयार युवाओं का प्रतिशत और अधिक दिखता। वह सर्वेक्षण तो सिर्फ शहरों तक सीमित था। अपने देश में गांवों पर भी तेजी से शहर छाते जा रहे हैं। गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है। गौर कीजिए कि देश छोड़ने को तैयार वे युवा पढ़े-लिखे हैं और शहरों में पले-बढ़े हैं। वे किस पद्धति से किस तरह के विद्यालयों में क्या पढ़े-लिखे हैं और किस रीति-रिवाज से कैसे परिवारों में किस तरह से पले-बढ़े हैं, यह ज्यादा गौरतलब है।

विद्यालय सरकारी हों या गैर सरकारी, सभी में शिक्षा की पद्धति एक है और वह है मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा पद्धति। भारतीयता विरोधी इसी शिक्षा पद्धति को सरकारी मान्यता प्राप्त है। सरकार का पूरा तंत्र इसी तरह की शिक्षा के विस्तार में लगा हुआ है। वैसे अंग्रेजी माध्यम वाले विद्यालय सबसे अच्छे माने जाते हैं और गैर-सरकारी निजी क्षेत्र के अधिकतर विद्यालय अंग्रेजी माध्यम के ही हैं। शहरों में ऐसे ही विद्यालयों की भरमार है और जिन युवाओं के बीच उक्त मीडिया संस्थान ने उपरोक्त सर्वेक्षण किया उनमें से सर्वाधिक युवा ऐसे ही तथाकथित ‘उत्कृष्ट’ विद्यालयों से पढ़े-लिखे हुए हैं। अब रही बात यह कि इन विद्यालयों में आखिर शिक्षा क्या और कैसी दी जाती है, तो यह इन युवाओं की उपरोक्त सोच से ही स्पष्ट है।

जाहिर है, उन्हें शिक्षा के नाम पर ऐसी-ऐसी डिग्रियां दी जाती हैं, जिनके कारण वे महात्वाकांक्षी, स्वार्थी बनकर असंतोष, अहंकार, खीझ, पलायन एवं हीनता-बोध से ग्रसित हो जाते हैं और कमाने-खाने भर थोड़े-बहुत हुनर हासिल कर स्वभाषा व स्वदेश के प्रति ‘नकार’ भाव से पीड़ित होकर विदेश चले जाते हैं।थॉमस विलिंग्टन मैकाले कोई शिक्षा-शास्त्री नहीं था। वह एक षड्यंत्रकारी था, जिसने भारत पर ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जड़ें जमाने की नीयत से भारतीय शिक्षा-पद्धति की जड़ें उखाड़कर मौजूदा शिक्षा-पद्धति को प्रक्षेपित किया था। जो आज भी उसी रूप में कायम है। 20 अक्टूबर 1931 को लंदन के रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ फौरन अफेयर्स के मंच से महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘अंग्रेजी शासन से पहले भारत की शिक्षा-व्यवस्था इंग्लैण्ड से भी अच्छी थी।’ उस पूरी व्यवस्था को सुनियोजित तरीके से समूल नष्ट कर देने के पश्चात ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जरूरतों के मुताबिक उसके रणनीतिकारों ने लम्बे समय तक बहस-विमर्श कर के मैकाले की योजनानुसार यह शिक्षा-पद्धति लागू की थी।

मैकाले ने ब्रिटिश पार्लियामेंट की शिक्षा समिति के समक्ष कहा था ‘हमें भारत में ऐसा शिक्षित वर्ग तैयार करना चाहिए, जो हमारे और उन करोड़ों भारतवासियों के बीच जिन पर हम शासन करते हैं, उन्हें समझाने-बुझाने का काम कर सके। जो केवल खून और रंग की दृष्टि से भारतीय हों, किन्तु रुचि, भाषा व भावों की दृष्टि से अंग्रेज हों।’ विदेशों में बस जाने को उतावले भारतीय युवाओं ने पूरी मेहनत व तबीयत से मैकाले शिक्षा-पद्धति को आत्मसात किया है, ऐसा समझा जा सकता है। यहां प्रसंगवश मैकाले के बहनोई चार्ल्स ट्रेवेलियन द्वारा ब्रिटिश पार्लियामेंट की एक समिति के समक्ष ‘भारत में भिन्न-भिन्न शिक्षा-पद्धतियों के भिन्न-भिन्न परिणाम’ शीर्षक से प्रस्तुत किये गए एक लेख का यह अंश भी उल्लेखनीय है कि ‘मैकाले शिक्षा-पद्धति का प्रभाव अंग्रेजी राज के लिए हितकर हुए बिना नहीं रह सकता। हमारे पास उपाय केवल यही है कि हम भारतवासियों को यूरोपियन ढंग की उन्नति में लगा दें। इससे हमारे लिए भारत पर अपना साम्राज्य कायम रखना बहुत आसान और असंदिग्ध हो जाएगा।’ ऐसा ही हुआ। बल्कि, मैकाले की योजना तो लक्ष्य से ज्यादा ही सफल रही।

हमारे देश के मैकालेवादी राजनेताओं ने अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासन की समाप्ति के बाद भी उनकी अंग्रेजी-मैकाले शिक्षा-पद्धति को न केवल यथावत कायम रखा, बल्कि उसे और ज्यादा अभारतीय रंग-ढंग में ढाल दिया। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष लक्षित प्राचीन भारतीय शिक्षा-पद्धति को अतीत के गर्त में डालकर शिक्षा को उत्पादन-विपणन-मुनाफा-उपभोग-केन्द्रित बना देने और उसे नैतिक सांस्कृतिक मूल्यों से विहीन कर देने तथा राष्ट्रीयता के प्रति उदासीन बना देने का ही परिणाम है कि हमारी यह युवा पीढ़ी महज निजी सुख-स्वार्थ के लिए अपने देश से विमुख हो जाना पसंद कर रही है। उसे विदेशों में ही अपना भविष्य दीख रहा है।

माना कि हमारे देश में तरह-तरह की समस्याएं हैं, किन्तु इनसे जूझने और इन्हें दूर करने की बजाय पलायन कर जाने अथवा कोरा लफ्फाजी करने कि हमें प्रधानमंत्री बना दिया जाए तो हम देश को सुंदर बना देंगे, अति महात्वाकांक्षा-युक्त मानसिक असंतुलन का ही द्योत्तक है। लेकिन आधे से अधिक ये शहरी युवा मानसिक रुप से असंतुलित नहीं हैं, बल्कि असल में वे पश्चिम के प्रति आकर्षित हैं। इसके लिए हमारे देश की चालू शिक्षा-पद्धति का पोषण करने वाले हमारे राजनेता ही जिम्मेवार हैं। यह ‘यूरोपियन ढंग की उन्नति’ के प्रति बढ़ते अनावश्यक आकर्षण का परिणाम है। इस मानसिक पलायन को रोकने के लिए जरूरी है कि हम अपने बच्चों को हमारे राष्ट्र की जड़ों से जोड़ने वाली और संतुलित समग्र मानसिक विकास करने वालीप्राचीन भारतीय पद्धति से भारतीय भाषाओं में समस्त ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा देने की सम्पूर्ण व्यवस्था कायम करें।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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भाई-बहन में प्रेम भाव बढ़ाता है भैया दूज

–बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था

Published

योगेश कुमार गोयल

(भैया दूज, 29 अक्टूबर पर विशेष)

भाई-बहन के दिलों में पावन संबंधों की मजबूती और प्रेमभाव स्थापित करने वाला पर्व है भैया दूज। इस दिन बहनें अपने भाईयों को तिलक लगाकर ईश्वर से उनकी दीर्घायु की कामना करती हैं। कहा जाता है कि इससे भाई यमराज के प्रकोप से बचे रहते हैं। दीपावली के दो दिन बाद अर्थात कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाए जाने वाले इस पर्व को ‘यम द्वितीया’ व ‘भ्रातृ द्वितीया’ के नाम से भी जाना जाता है। बहुत से भाई-बहन सौभाग्य तथा आयुष्य की प्राप्ति के लिए इस दिन यमुना अथवा अन्य पवित्र नदियों में साथ-साथ स्नान भी करते हैं। भैया दूज मनाने के संबंध में कई किवंदतियां प्रचलित हैं। एक कथा यमराज और उनकी बहन यमुना देवी से संबंधित है। बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था। यमुना अपने भाई यमराज से बहुत स्नेह करती थीं और अक्सर उनसे अनुरोध करती रहती थीं कि वे अपने इष्ट-मित्रों सहित उसके घर भोजन के लिए पधारें लेकिन यमराज हर बार उसके निमंत्रण को किसी न किसी बहाने से टाल जाते। कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमुना ने यमराज को एक बार फिर भोजन के लिए आमंत्रित किया।

उस समय यमराज ने विचार किया कि मैं तो अपने कर्त्तव्य से बंधा सदैव प्राणियों के प्राण ही हरता हूं। इसलिए इस चराचर जगत में कोई भी मुझे अपने घर नहीं बुलाना चाहता। लेकिन बहन यमुना तो मुझे बार-बार अपने घर आमंत्रित कर रही है। इसलिए अब तो उसका निमंत्रण स्वीकार करना ही चाहिए।यमराज को अपने घर आया देख यमुना की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने भाई का खूब आदर-सत्कार करते हुए उनके समक्ष नाना प्रकार के व्यंजन परोसे। बहन के आतिथ्य से यमराज बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे कोई वर मांगने को कहा। इस पर यमुना ने उनसे अनुरोध किया कि आप प्रतिवर्ष इसी दिन मेरे घर आकर भोजन करें और मेरी तरह जो भी बहन इस दिन अपने भाई का आदर-सत्कार करे, उसे तुम्हारा भय न रहे। यमराज ने बहन यमुना को उसका इच्छित वरदान दे दिया। ऐसी मान्यता है कि उसी दिन से ‘भैया दूज’ का पर्व मनाया जाने लगा। भैया दूज के संबंध में और भी कई कथाएं प्रचलित हैं। ऐसी ही एक कथा के अनुसार, एक ब्राह्मण की दो संतानें थी।

एक पुत्र एवं एक पुत्री। पुत्री बहुत समझदार एवं गुणवती थी। वह अपने भाई से जी-जान से प्यार करती थी। एक दिन उसका भाई उससे मिलने उसकी ससुराल पहुंचा। उस समय वह सूत कातने में व्यस्त थी। अतः उसे भाई के आने का पता ही न चल सका। भाई भी बिना कुछ बोले चुपचाप एक ओर बैठा रहा। जब थोड़ी देर बाद बहन की नजर उस पर पड़ी तो भाई को अपने घर आया देख उसे बेहद खुशी हुई। उसने भाई का भरपूर आदर-सत्कार किया। अगले दिन भाई को वापस लौटना था। अतः रास्ते के लिए वह आटे के पकवान बनाने के उद्देश्य से चक्की में आटा पीसने लगी। अनजाने में चक्की में बैठा सांप भी आटे के साथ पिस गया। उसी आटे के पकवान एक पोटली में बांधकर उसने भाई को रास्ते में खाने के लिए देकर विदा किया। भाई के घर से जाने के बाद जब उसे यह मालूम हुआ कि आटे में सांप पिस गया है तो अपने पुत्र को पालने में ही सोता छोड़कर वह अपने भाई के प्राणों की रक्षा के लिए दौड़ी। कुछ दूर जाने पर उसे एक पेड़ की छांव में अपना भाई सोता दिखाई दिया। तब तक उसने पोटली में से कुछ भी नहीं खाया था। उसने भगवान का शुक्रिया अदा किया और पोटली उठाकर दूर फेंक दी तथा भाई के साथ मायके की ओर चल दी।

रास्ते में उसने देखा कि भारी-भारी शिलाएं आकाश में उड़ रही हैं। उसने एक राहगीर से इस रहस्य के बारे में जानना चाहा तो उसने बताया कि जो बहन अपने भाई पर कभी नाराज न होती हो और उसे दिलो-जान से चाहती हो, उस भाई की शादी के समय ये शिलाएं उसकी छाती पर रखी जाएंगी। थोड़ी दूर चलने पर उसे नाग-नागिन दिखाई दिए। नाग ने बताया कि ये शिलाएं जिस व्यक्ति की छाती पर रखी जाएंगी, हम उसे डंस लेंगे। जब बहन ने इस विपत्ति से बचने का उपाय पूछा तो नाग-नागिन ने बताया कि अगर भाई के विवाह के समय उसके सभी कार्य बहन स्वयं करे, तभी भाई की जान बच सकती है।जब उसके भाई के विवाह के लग्न का शुभ मुहूर्त आया तो वह भाई को पीछे धकेलती हुई स्वयं ही लग्न चढ़वाने के लिए आगे हो गई और घोड़ी पर भी स्वयं चढ़ गई। परिवारजन और संबंधी उसके इस विचित्र व्यवहार से हैरान तथा क्रोधित थे। उसके घोड़ी पर चढ़ते ही शिलाएं उड़ती-उड़ती आई लेकिन घोड़ी पर किसी पुरूष की जगह एक महिला को बैठी देख वापस मुड़ गई। जब सुहागरात का समय आया तो वह भाई को पीछे कर खुद भाभी के साथ सोने उसके कमरे में चली गई।

परिवार के सभी सदस्य तथा सभी रिश्तेदार उसके इस अजीबोगरीब व्यवहार से बेहद आश्चर्यचकित और खफा थे। उन्हें उस पर गुस्सा तो बहुत आ रहा था लेकिन उसके जिद के समक्ष सभी विवश थे। सुहागरात पर नियत समय पर नाग-नागिन उसके भाई को डंसने कमरे में पहुंच गए लेकिन उसने नाग-नागिन को मारने की सारी तैयारी पहले ही कर रखी थी। आखिरकार उसने नाग-नागिन का काम तमाम कर दिया। उसके बाद वह निश्चिंत होकर सो गई। सुबह होने पर सभी मेहमानों को विदा करने के बाद परिवार वालों ने सोचा कि अब इस बला को भी कुछ बचा-खुचा देकर यहां से चलता कर दिया जाए लेकिन नींद से जागने पर जब उसने पूरी घटना के बारे में सब को विस्तार से बताया कि किस प्रकार वह अपने बच्चे को पालने में ही सोता छोड़कर दौड़ी-दौड़ी भाई के प्राण बचाने के लिए उसके पीछे चली आई और सभी को नाग-नागिन के मृत शरीर दिखाए तो सभी की आंखों में आंसू आ गए।

भाई के प्रति उसका असीम प्यार तथा समर्पण भाव देखकर उसके प्रति सभी का हृदय श्रद्धा से भर गया।भाई-भाभी तथा माता-पिता ने उसे ढेर सारे उपहारों से लादकर बड़े मान-सम्मान के साथ खुशी-खुशी ससुराल से विदा किया। भाई-बहन के बीच इसी प्रकार के पावन संबंध, प्रेमभाव तथा उनके दिलों में आपसी संबंधों को मजबूत बनाने के लिए ही ‘भैया दूज’ पर्व मनाया जाता है।

(लेखक स्तंभकार हैं।)

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