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वे पन्द्रह दिन भाग 09/15

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09 अगस्त

 

सोडेपुर आश्रम… कलकत्ता के उत्तर में स्थित यह आश्रम वैसे तो शहर के बाहर ही है. यानी कलकत्ता से लगभग आठ-नौ मील की दूरी पर. अत्यंत रमणीय, वृक्षों, पौधों-लताओं से भरापूरा यह सोडेपुर आश्रम, गांधीजी का अत्यधिक पसंदीदा है. जब पिछली बार वे यहां आए थे, तब उन्होंने कहा भी था कि, “यह आश्रम मेरे अत्यंत पसंदीदा साबरमती आश्रम की बराबरी करता है….”

आज सुबह से ही इस आश्रम में बड़ी हलचल है. वैसे तो आश्रम के निवासी सुबह जल्दी ही सोकर उठते हैं. लेकिन आज गांधीजी आश्रम में निवास करने आ रहे हैं, इसलिए पिछले सप्ताह से ही इसकी तैयारी चल रही है. स्वच्छता, साफ़-सफाई तो प्रतिदिन नियमित होती ही हैं, परन्तु आज कुछ विशेष रूप से हो रही है. क्योंकि बापू यहां आने वाले हैं.

विशेषतः सतीश बाबू का उत्साह देखते ही बनता है. सतीशबाबू यानी सतीशचंद्र दासगुप्ता. सर आचार्य प्रफुल्ल चन्द्र राय द्वारा स्थापित की गई भारत की सबसे पहली केमिकल कम्पनी, अर्थात ‘बंगाल केमिकल वर्क्स’ में सतीशबाबू की अच्छी खासी नौकरी थी. वे यहां सुपरिन्टेन्डेंट के पद पर कार्यरत थे. चूंकि वे वैज्ञानिक थे, इसलिए कई प्रयोग भी करते थे. परन्तु उनकी पत्नी हेमप्रभा और वे स्वयं, एक बार गांधीजी के संपर्क में आए और उनका जीवन एकदम बदल ही गया. लगभग छब्बीस-सत्ताईस वर्ष पहले, यानी ठीक से कहा जाए तो सन १९२१ में सतीशबाबू ने अपनी अच्छी-खासी नौकरी छोड़ दी और कलकत्ता के बाहरी इलाके में स्थित यह सुन्दर सा आश्रम स्थापित किया. आजकल सतीशबाबू और हेमप्रभा दीदी आश्रम में ही रहते हैं.

हेमप्रभा दीदी पर गांधीजी का जबरदस्त प्रभाव है. इसीलिए उन्होंने एकदम शुरुआत में ही गांधीजी के आंदोलन को जारी रखने के लिए, उनके पास जितने भी सोने के गहने थे, गांधीजी को दान कर दिए. सतीशबाबू को भी इसमें कोई आपत्ति नहीं थी, बल्कि उन्हें तो अपनी पत्नी पर अभिमान था…!

सतीशबाबू ने इस आश्रम में बहुत सारे प्रयोग किए हैं. मूलतः वे वैज्ञानिक हैं. साथ ही गांधीजी के ‘स्वदेशी’ आंदोलन से बेहद प्रभावित भी हैं. उन्होंने अपने आश्रम में सस्ती और सरल ऑइल प्रेस बनाई है. साथ ही बांस के पल्प से कागज़ बनाने का एक छोटा सा कारखाना भी आश्रम में ही निर्मित किया है. इस कारखाने से उत्पादित होने वाला कागज़ थोड़ा खुरदुरा होता है, लेकिन उस पर आराम से लिखा जा सकता है और यह कागज़ अच्छा भी दिखता है. इस कागज़ से आश्रम का काम चल जाता है. आश्रम की सारी स्टेशनरी सतीश बाबू के बनाए इसी कागज़ पर छपी है. थोड़ा-बहुत कागज़ बाहर बेचा भी जाता है.

सतीशबाबू यह बात जानते हैं कि गांधीजी इस आश्रम से बहुत प्रेम करते हैं. वर्ष-डेढ़ वर्ष के अंतराल से वे यहां आकर एक-एक माह तक ठहरते हैं. फिर उनसे भेंट करने के लिए बड़े-बड़े नामचीन नेता आश्रम में आते हैं. इस सारी कवायद में, इन महान लोगों के आवागमन से, आश्रम का वातावरण पवित्र हो जाता है. सतीशबाबू को स्मरण है कि सात-आठ वर्ष पहले यानी लगभग १९३९ में उनकी सुभाष बाबू से भेंट यहीं पर हुई थी. गांधीजी, सुभाष बाबू और नेहरू, बस यही तीनों थे. गांधीजी की इच्छा के विरुद्ध सुभाषचंद्र बोस, त्रिपुरी (जबलपुर) काँग्रेस के अध्यक्ष चुने गए थे. परन्तु काँग्रेस के अन्य नेताओं ने उन्हें बहुत दुःख पहूंचाए. इसी समस्या का कोई हल निकालने के लिए यह बैठक आयोजित की थी. काँग्रेस का वह अधिवेशन समाप्त होते ही तत्काल.

इस बैठक में समस्या का कोई हल तो निकला नहीं, उलटे सुभाष बाबू ही काँग्रेस छोड़कर निकल गए. सतीशबाबू गांधीजी के कितने भी भक्त हों, परन्तु फिर भी उन्हें इस बात से बहुत दुःख पहुंचा था. बहरहाल… सतीशबाबू ने अपनी इन यादों को झटक दिया, क्योंकि गांधीजी के आने का समय हो चुका था. कलकत्ता में वैसे भी सूर्योदय जरा जल्दी ही होता है. इस कारण सुबह पौने पांच – पांच बजे के आसपास ही बाहर ठीकठाक उजाला हो गया था.

बस अब अगले एक घंटे में गांधीजी आश्रम में पधारने वाले थे….!

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उधर दूर दिल्ली में, मंदिर मार्ग स्थित हिन्दू महासभा भवन में सुबह से ही हलचल थी. महासभा के अध्यक्ष डॉक्टर ना. भा. खरे कल ही ग्वालियर से दिल्ली पहुंचे थे.

डॉक्टर खरे एक जबरदस्त व्यक्तित्व थे. खरे साहब वैसे तो मूलतः काँग्रेस के थे. १९३७ में, मध्य भारत प्रांत के वे पहले काँग्रेसी मुख्यमंत्री थे. लेकिन डॉक्टर खरे, लोकमान्य तिलक की परंपरा से तैयार हुए ‘गरम दल’ गुट के थे. उन्हें काँग्रेस द्वारा सतत मुस्लिम लीग का तुष्टिकरण करना पसंद नहीं था. इसीलिए जब वे इस सन्दर्भ में सार्वजनिक रूप से अपने विचार रखते थे तो नेहरू और गांधीजी को यह कतई पसंद नहीं आता था. ऐसे में गांधीजी ने डॉक्टर खरे को सेवाग्राम के आश्रम में बुलाया और मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने का आदेश दिया.

यह सुनकर डॉक्टर खरे ने एकदम सहज रूप से गांधीजी से कहा कि, “मेरी वर्तमान मनःस्थिति ठीक नहीं है, इसलिए इस्तीफे का मसौदा आप ही लिख दीजिए”. डॉक्टर खरे इतनी सरलता से त्यागपत्र देने को राजी हो गए, यह सुनकर गांधीजी आनंदित हो गए और तत्काल उन्होंने एक कागज़ पर अपने हाथों से, अपनी हस्तलिपि, में डॉक्टर खरे का इस्तीफ़ा लिख दिया. वह कागज़ लेकर डॉक्टर खरे शान्ति से उठे, उस पर हस्ताक्षर नहीं किए… और अपनी कार से नागपुर जाने के लिए निकल पड़े. यह देखकर गांधीजी चौंक गए और उनके पीछे से चिल्लाने लगे, “अरे, ये क्या करता है…? कहां जाता है..?”

डॉक्टर खरे वह पत्र लेकर नागपुर आए. गांधीजी के हाथों से लिखा हुआ वह त्यागपत्र उन्होंने नागपुर के सभी अखबारों में प्रकाशित करवा दिया और जनता के सामने यह स्पष्ट कर दिया कि ‘स्वयं गांधीजी किस प्रकार एक मुख्यमंत्री पर दबाव डालकर मुझसे इस्तीफ़ा ले रहे हैं’.

तो, ऐसे चतुर डॉक्टर ना. भा. खरे, आजकल हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. उनकी सहायता करने के लिए पंडित मौलीचंद्र शर्मा जैसा जबरदस्त व्यक्तित्व भी है. पंडित शर्मा की पृष्ठभूमि भी काँग्रेसी ही है. १९३० और १९३१ में लन्दन की गोलमेज कांफ्रेंस में उन्होंने काँग्रेस का प्रतिनिधित्व किया था. परन्तु वे भी काँग्रेस द्वारा मुस्लिम तुष्टिकरण किए जाने के कारण हिन्दू महासभा के निकट आए. आज तो साक्षात तात्याराव सावरकर हिन्दू महासभा भवन में उपस्थित होने जा रहे थे, इसलिए आज सभी के चेहरे प्रसन्नता से एकदम खिले हुए थे.

सुबह नाश्ता करके ठीक नौ बजे हिन्दू महासभा के केन्द्रीय समिति की बैठक आरम्भ हुई. बैठक में हिन्दू महासभा द्वारा घोषित मुद्दों पर चर्चा शुरू की गई. ‘खंडित हिन्दुस्तान में सभी नागरिकों को पूर्ण अधिकार प्राप्त होंगे, लेकिन प्रस्तावित पाकिस्तान में हिंदुओं की जो और जैसी स्थिति रहेगी, ठीक वैसी ही स्थिति खंडित हिन्दुस्तान में बचे हुए मुसलमानों की रहे’, यह मांग उठाने का तय हुआ. हिन्दी भाषी प्रान्तों में देवनागरी लिपि में हिंदी भाषा में समस्त प्रशासनिक कार्यवाही होगी. अन्य प्रान्तों में भले ही पढ़ाई का माध्यम स्थानीय भाषाओं और लिपी में हो, परन्तु फिर भी राष्ट्रभाषा हिन्दी को ही प्रशासनिक एवं न्यायिक व्यवस्था में मान्य किया जाए. इसके अलावा ‘अनिवार्य रूप से सभी नागरिकों के लिए सैन्य प्रशिक्षण’ सहित अनेक मांगें हिन्दू महासभा की इस बैठक में रखी गईं.

कम से कम खंडित हिन्दुस्तान में तो हिन्दू अपने पूर्ण अभिमान और गर्व के साथ सिर ऊंचा करके रह सके, इसी उद्देश्य से ये सारे नेता भिन्न-भिन्न दिशाओं से प्रयास कर रहे थे.

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जुम्मे के दूसरे दिन सुबह… यानी आज शनिवार ९ अगस्त की सुबह.

बैरिस्टर मोहम्मद अली जिन्ना के लिए, यह उनके प्रिय पाकिस्तान में दूसरी सुबह थी. कराची का वह विशाल बंगला, जिन्ना का अस्थायी निवास था. जिन्ना के दिमाग में इस समय असंख्य बातें एक साथ चल रही थीं. नए पाकिस्तान का स्वरूप कैसा होगा, यहां की न्याय-व्यवस्था कैसी होगी, पाकिस्तान का राष्ट्रध्वज कौन सा रहेगा, पाकिस्तान का राष्ट्रगीत क्या होगा…? इस अंतिम प्रश्न पर आकर जिन्ना एकदम ठहर गए. वास्तव में अन्य सभी बातों पर तो उन्होंने गहराई से विचार किया था, लेकिन पाकिस्तान के राष्ट्रगीत अर्थात ‘कौमी तराना’ पर खास चर्चा नहीं हुई है. अब आधिकारिक रूप से नया पाकिस्तान निर्माण होने में केवल पांच दिन ही बचे हैं.

जब जिन्ना, दिल्ली में थे उसी समय उन्होंने कुछ कवियों की रचनाओं पर निशान लगा रखे थे. वह रचनाएं कल अचानक उन्हें याद आईं. उन्हीं कवियों में से एक नाम था – ‘जगन्नाथ आजाद’ का. ये मूलतः लाहौर के पंजाबी हिन्दू हैं, लेकिन उर्दू भाषा पर इनका जबरदस्त प्रभुत्व हैं. जिन्ना ने सोचा कि, आज़ाद हालांकि काफिर हैं, लेकिन उससे मुझे क्या? अगर कोई बढ़िया गीत उर्दू में लिखकर दे दें, तो मुझे और क्या चाहिए? उन्होंने निश्चित किया कि पाकिस्तान का कौमी तराना लिखने के लिए, इस आज़ाद नाम के कवि को ही बुलाया जाए. कल दोपहर में ही उन्होंने लाहौर से आजाद को बुलवाने का निमंत्रण दिया है. अभी तक तो उन्हें आ जाना चाहिए था.

जिन्ना ने अपने सचिव को आवाज़ दी, और पूछा कि, ‘लाहौर से कोई जगन्नाथ आजाद आए हैं क्या?’ सेक्रेटरी ने बताया कि ‘वे तो सुबह ही आ गए हैं’. जिन्ना ने कहा कि, ‘उन्हें अंदर भेजो’.

जगन्नाथ आजाद, बमुश्किल तीस वर्ष का युवक था. जिन्ना ने ऐसी कल्पना की थी कि उर्दू में ऐसी गंभीर एवं प्रगल्भ शायरी करने वाला व्यक्ति कोई पचास वर्ष का अधेड़ होगा. जिन्ना ने जगन्नाथ आजाद से बैठने को कहा. उनके हालचाल पूछे, और उनसे पूछा कि क्या उनके पास पाकिस्तान का ‘कौमी तराना’ बन सकने लायक कोई बढ़िया गीत है? जगन्नाथ आजाद के पास उस समय तत्काल कोई गीत तैयार नहीं था, परन्तु अपनी कल्पना के अनुसार उन्होंने एक रचना की थी, वही जिन्ना को सुनाने लगे….

ऐ सरजमीं– ए – पाक
जर्रे तेरे हैं आज
सितारों से ताबनाक,
रोशन हैं कहकशां से
कही आज तेरी खाक
तुन्दी– ए –हसदां पे
ग़ालिब हैं तेरा सवाक,
दामन वो सिल गया हैं
जो था मुद्दतों से चाक
ऐ सर जमिनें– ए – पाक..!

‘बस…. बस…. यही… यही चाहिए था मुझे..’. जिन्ना को यह तराना बेहद पसंद आया. और इस प्रकार एक काफिर द्वारा लिखा गया एक गीत, वतन-ए-पाकिस्तान का ‘कौमी तराना’ बनेगा, यह निश्चित हो गया…!

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शनिवार. ९ अगस्त….

अमृतसर के लिए आज का दिन बेहद तनाव भरा है. अमृतसर शहर और पूरे जिले में मुसलमानों की संख्या अधिक है. सीमावर्ती गांवों से दंगों की ख़बरें लगातार आ रही हैं. इस कारण सिख, हिन्दू और मुसलमान सभी क्रोधित हैं. सिखों ने अपने प्रमुख गुरुद्वारे, स्वर्ण मंदिर में, कट्टर और बहादुर निहंगों का पहरा लगा रखा है. सिख नहीं चाहते कि गुरूद्वारे का पवित्र सरोवर दंगाई मुसलमानों के कारण अपवित्र हो जाए.

सुबह लगभग साढ़े ग्यारह – बारह बजे के आसपास अमृतसर रेलवे स्टेशन के तांगा स्टैण्ड को सादे कपड़ों में छिपे दर्जनों पुलिस वालों ने घेर रखा है. उन्हें यह सूचना मिली है कि मुस्लिम लीग का कट्टर पठान कार्यकर्ता, ‘मोहम्मद सईद’, आज अमृतसर आने वाला है. यह हत्यारा बड़े-बड़े हत्याकांड रचने में उस्ताद हैं. पुलिस ने उसे पकड़ लिया. उसके पास से अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र, उर्दू में लिखे हुए कुछ पत्र और देसी बम बरामद हुए. अमृतसर में संभावित किसी बड़े हत्याकांड को मूर्तरूप देने आए मोहम्मद सईद की गिरफ्तारी से एक बड़ी घटना टल गई.

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उधर दिल्ली में, सर सिरील रेडक्लिफ साहब के बंगले में कोई खास चहलपहल नहीं हैं. बंगले के तीन – चार कमरों में जो असंख्य कागज़ पसरे पड़े थे, उन्हें विभिन्न संदूकों में भरने का काम चल रहा हैं. सर रेडक्लिफ का अधिकांश कार्य समाप्त हो चुका हैं. भारत और पाकिस्तान की विभाजन रेखा खींची जा चुकी हैं. इस काम में उन्होंने न्याय किया अथवा अन्याय, यह उन्हें समझ में नहीं आ रहा हैं. एक पक्ष कहता था कि न्याय हुआ है, जबकि दूसरे पक्ष को वह सरासर अन्याय लग रहा हैं. अलबत्ता सारे आरोपों को झेलते हुए भी अब विभाजन की रेखा तैयार हैं.

वाइसरॉय साहब से आज सुबह ही रेडक्लिफ की चर्चा हुई थी. इस विस्फोटक वातावरण में विभाजन की स्पष्ट रेखा को सार्वजनिक करना एक तरह से आग में घी डालने जैसा ही हैं. ऐसा करने पर दंगे और भी भडकने के आसार हैं, और ज्यादा खूनखराबा होगा. फिलहाल इसे यहीं रोकना आवश्यक हैं. इस कारण यह तय किया गया कि स्वतंत्रता दिवस के एक – दो दिन बाद ही, विस्तार से विभाजन का सम्पूर्ण खाका सार्वजनिक किया जाएगा. इसका अर्थ यह हुआ कि अभी कम से कम आठ – दस दिन रेडक्लिफ साहब का ब्लडप्रेशर स्थिर नहीं रहेगा.

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दक्षिण के हैदराबाद में अपने विशाल महल में, हैदराबाद रियासत के निज़ाम उस्मान अली, अपने दीवान के साथ गंभीर चर्चा में व्यस्त हैं. उन्हें अभी तत्काल एक पत्र जिन्ना को भिजवाना हैं. हैदराबाद रियासत को स्वतन्त्र रखने के लिए उन्हें नए बनने वाले पाकिस्तान की मदद चाहिए. उनके दीवान द्वारा तैयार किए गए पत्र पर निज़ाम साहब ने बड़ी ही लफ्फेबाज उर्दू में अपने हस्ताक्षर किए और अपना एक खास दूत कराची के लिए रवाना किया.

अगले एक सप्ताह के भीतर स्वतन्त्र होने जा रहे, खंडित भारत के बिलकुल बीचोंबीच, इटली जैसे देश के बराबर क्षेत्रफल वाली एक मुस्लिम रियासत, स्वतन्त्र और स्वायत्त रहने के लिए अपने पूरे प्रयास कर रही हैं.

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उधर बहुत दूर, पूर्व दिशा में स्थित सिंगापूर में, शासकीय कर्मचारियों की छुट्टी हो चुकी हैं. वैसे भी शनिवार को सिंगापुर में शासकीय कार्यालय पूरे दिन के लिए काम नहीं करते. सिंगापूर के ‘मरीना बे’ क्षेत्र में कार्यरत कर्मचारी यूनियन के एक छोटे से कार्यालय में बहुत से शासकीय कर्मचारी एकत्रित हुए हैं. ये सभी कर्मचारी भारतीय हैं.

ये कर्मचारी सिंगापुर सरकार के मुख्य सचिव को देने के लिए एक पत्र तैयार कर रहे हैं. १५ अगस्त को शुक्रवार हैं. ज़ाहिर है कि शासकीय एवं अन्य कार्यालयों में अवकाश नहीं हैं. १५ अगस्त को इन सभी भारतीय कर्मचारियों का प्रिय देश स्वतन्त्र होने जा रहा हैं. इस अवसर पर ये सभी भारतीय, उस खास दिन को एक उत्सव के रूप में मनाना चाहते हैं. और इसीलिए इन सभी को १५ अगस्त के दिन छुट्टी चाहिए हैं. इसी अवकाश को प्राप्त करने के लिए एक पत्र तैयार हो रहा हैं, जो सिंगापुर सरकार को दिया जाएगा.

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अमृतसर शहर और समूचे जिले में जबरदस्त तनाव का वातावरण हैं, क्योंकि यह खबर चारों तरफ फ़ैल चुकी हैं कि पुलिस ने मोहम्मद सईद को गिरफ्तार कर लिया है.

इस घटनाक्रम से मुसलमान बेहद चिढ़ गए और दोपहर से ही उन्होंने सिखों एवं हिंदुओं की दुकानों-मकानों पर पत्थरबाजी शुरू कर दी थी. शाम होते-होते ही यह दंगा सम्पूर्ण जिले में फ़ैल गया हैं. मुस्लिम लीग के नेशनल गार्ड, दंगा और खूनखराबा करने में सबसे आगे हैं. अमृतसर के पास स्थित जबलफाद गांव में उन्होंने १०० से अधिक हिंदुओं और सिखों का नरसंहार किया. लगभग साठ-सत्तर जवान लड़कियों को वे उठा ले गए. धापाई गांव पर तो लगभग एक हजार मुसलमानों ने इकठ्ठे होकर हमला किया. हालांकि सिखों की तरफ से इसका प्रतिकार भी हुआ, गाजीपुर गांव में १४ मुसलमान भी मारे गए.

दंगों की भीषणता और क्रूरता को देखते हुए, मेजर जनरल टी. डब्ल्यू. रीस के नेतृत्व में जो सैनिक तैनात किये गए थे, उनसे भी मुस्लिम नेशनल गार्ड के सैनिक भिड़ गए. शाम के उस धुंधलके भरे वातावरण में लगभग एक घंटे तक मुस्लिम लीग के नेशनल गार्ड और सेना के बीच युद्ध जैसे हालात थे. उधर कुछ ही मील दूरी पर स्थित पंजाब की राजधानी लाहौर में यह खबर टेलीग्राम के माध्यम से पहुंचाई गई. पंजाब के गवर्नर सर ईवौन मेरेडिथ जेनकिंस ने यह टेलीग्राम बड़े ध्यान से पढ़ा और तत्काल उन्होंने अपने सचिव को बुलाया तथा सम्पूर्ण पंजाब प्रांत में ‘प्रेस सेंसरशिप’ का आदेश जारी कर दिया.

इसका अर्थ यह था कि, शनिवार ९ अगस्त को, अमृतसर और इसके आसपास हुए भीषण रक्तपात की ख़बरें अगले दिन पंजाब के किसी भी समाचारपत्र में नहीं दिखने वाली थीं.

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उधर पूर्व दिशा में कलकत्ता के पास स्थित सोडेपुर आश्रम में गांधीजी की सायं प्रार्थना की तैयारी चल रही हैं. प्रार्थना से पहले डॉक्टर सुनील बसु ने गांधीजी के स्वास्थ्य का पूर्ण परीक्षण किया. सन १९३९ में जब गांधीजी सोडेपुर आश्रम में एक माह तक ठहरे थे, तब डॉक्टर सुनील बाबू ने ही गांधीजी का स्वास्थ्य चेक-अप किया था.

स्वास्थ्य परीक्षण होने के बाद सुनील बाबू ने कहा कि पिछले आठ वर्षों में गांधीजी का स्वास्थ्य एकदम स्थिर बना हुआ है. उसमे कोई खास फर्क नहीं पड़ा है. १९३९ के एक माह के प्रवास के दौरान उनका वजन ११२ से ११४ पाउंड के बीच था, और आज भी वे ११३ पाउंड के ही हैं. उनका ह्रदय और फेफड़े एकदम व्यवस्थित काम कर रहे हैं. उनकी नाड़ी की गति ६८ है. संक्षेप में कहा जाए तो उनका स्वास्थ्य अच्छा है.

आज शाम को गांधीजी की प्रार्थना, कलकत्ता की परिस्थिति पर केंद्रित थी. उन्होंने कहा कि ‘हिन्दू और मुसलमान दोनों ही पागलों जैसा व्यवहार कर रहे हैं’. उन्होंने आगे कहा कि “मुस्लिम लीग मंत्रिमंडल ने क्या किया अथवा क्यों किया, इसकी व्याख्या में मैं नहीं जाना चाहता. परन्तु १५ अगस्त से खंडित बंगाल का कामकाज संभालने वाले काँग्रेस के मुख्यमंत्री, डॉक्टर प्रफुल्ल चन्द्र घोष अपना काम कैसे करते हैं, इस पर मेरा पूरा ध्यान रहेगा. मैं यह सुनिश्चित करूंगा और ध्यान रखूंगा कि काँग्रेस के शासन में मुसलमानों पर अत्याचार नहीं होना चाहिए. मैं नोआखाली भी जाऊंगा, परन्तु कलकत्ता में शान्ति स्थापित होने के बाद..!”

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इधर दिल्ली में शाम होते ही रामलीला मैदान पर जबरदस्त भीड़ एकत्रित हुई हैं. ‘स्वतंत्रता सप्ताह’ आज से आरम्भ होने जा रहा हैं. आज शनिवार है और अब अगले शुक्रवार को हम एक स्वतन्त्र राष्ट्र बनने जा रहे हैं. काँग्रेस के बड़े—बड़े नेताओं के आज होनेवाले भाषण, यह एक बड़ा आकर्षण हैं. इस सभा में नेहरू, पटेल जैसे बड़े नेता बोलने वाले हैं. यह कार्यक्रम दिल्ली प्रदेश काँग्रेस कमेटी ने आयोजित किया हैं. इस कारण शुरुआत में दिल्ली प्रांत के स्थानीय नेताओं ने बोलना शुरू किया. परन्तु जैसे ही सभास्थल पर नेहरू और पटेल का आगमन हुआ, भीड़ का माहौल एकदम बदल गया. सभी में उत्साह का संचार हो गया. लोग जोरशोर से स्वतःस्फूर्त नारे लगाने लगे.

जब सरदार पटेल बोल रहे थे, तब सम्पूर्ण रामलीला मैदान शान्ति से उन्हें सुन रहा था. पटेल ने विभाजन की विवशता लोगों को समझाने का प्रयास किया. परन्तु जनता को उनके तर्क ना तो पसंद आ रहे थे और ना ही गले उतर रहे थे. इसलिए पटेल के भाषण को अधिक उत्साही प्रतिक्रिया नहीं मिली. लगभग ऐसा ही नेहरू के भाषण के बाद भी हुआ. भीड़ निरुत्साहित सी लगने लगी.

दिल्ली इस समय विस्थापितों की राजधानी बन चुकी हैं. बड़े पैमाने पर घरबार, मकान-दुकान, संपत्ति खोकर लुटे-पिटे हिन्दू शरणार्थी दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं. वे नेहरू-पटेल के मुंह से कोई ठोस बात सुनना चाहते थे. परन्तु वैसा नहीं हुआ. नेहरू अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति पर बोलते रहे. उन्होंने गर्जना की, कि ‘अब सम्पूर्ण एशिया से विदेशी शक्तियों को पूरी तरह खदेड़ दिया जाएगा’. परन्तु मैदान में एकत्रित जनता पर इसका कोई असर नहीं हुआ.

स्वतंत्रता सप्ताह के पहले ही दिन, सभा की शुरुआत में जैसा उत्साह और प्रसन्नता दिखाई दे रही थी, वैसी सभा के अंत होते-होते दिखाई नहीं दी…!
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देश के मध्य में स्थित नागपुर के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के महाल कार्यालय में शनिवार की रात को संघ के वरिष्ठ प्रचारक और पदाधिकारी बैठे हैं. उनके सामने अखंड भारत का नक्शा रखा हुआ हैं. इस विभाजन की एकदम सटीक रेखा कौन सी हो सकती है, तथा उस विभाजन रेखा के उस पार, बचे हुए हिन्दू-सिखों को कैसे बचाया जा सकता है, इस पर गहन मंथन चल रहा हैं…!

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जेएनयू में फीस वृद्धि के नाम पर राजनीति

—यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं

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सुरेश हिन्दुस्थानी

देश के उच्च शिक्षा केन्द्र जब राजनीति के अड्डे बनने की ओर कदम बढ़ाने लगें, तब वहां की शिक्षा की दिशा-दशा क्या होगी, यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। फीस बढ़ोतरी के खिलाफ किया जाने वाला दिल्ली का छात्र आंदोलन कुछ इसी प्रकार का भाव प्रदर्शित कर रहा है, जहां केवल और केवल राजनीति ही की जा रही है। किसी भी आंदोलन की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके पीछे जनहित का कितना भाव है। दिल्ली का यह आंदोलन जनसरोकार से कोसों दूर दिखाई दे रहा है।

हालांकि इसके पीछे बहुत से अन्य कारण भी होंगे। सबसे बड़ा कारण तो यही है कि आज जेएनयू की जो छवि जनता के बीच बनी है, वह जनता को खुद ही दूर कर रही है। जिस विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारों की ध्वनि गूंजित होती है, वह कभी जन आंदोलन का हिस्सा नहीं बन सकते हैं।दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के जिन छात्रों ने कभी भारत के टुकड़े करने के नारे लगाए थे, आज वे ही छात्र फीस बढ़ोतरी के छोटे से मामले को राजनीतिक रुप देने का प्रयास करते दिखाई दे रहे हैं। इस छात्र आंदोलन का राजनीतिक स्वरुप इसलिए भी दिखाई दे रहा है, क्योंकि इसमें राष्ट्रीय मानबिन्दुओं और केन्द्र सरकार को सीधे निशाने पर लिया जा रहा है। जेएनयू वामपंथी विचारधारा का एक बड़ा केन्द्र रहा है।

वामपंथी धारा के कार्यकर्ता देश के महानायकों के बारे में क्या सोच रखते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। पिछले घटनाक्रमों को देखें तो पाएंगे कि जेएनयू में देश के विरोध में वातावरण बनाने का काम किया जाता रहा है। वहां आतंकवादी बुरहान वानी के समर्थन में कार्यक्रम किए जाते हैं। सवाल यह कि जेएनयू में शिक्षा के नाम पर आखिर क्या हो रहा है। जहां तक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में फीस बढ़ोतरी की बात है तो यह कहना तर्कसंगत ही होगा कि विगत 19 वर्ष से विश्वविद्यालय के छात्रावास के कमरों और भोजन का शुल्क नहीं बढ़ाया गया, जबकि पिछले 19 सालों में महंगाई का ग्राफ बहुत ऊपर गया है। इस सबका भार पूरी तरह से विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के कंधों पर ही आया। देश के अन्य विश्वविद्यालयों में भी शिक्षा महंगी हो रही है, जो जेएनयू के मुकाबले बहुत अधिक है। ऐसे में विश्वविद्यालय द्वारा कुछ हद तक फीस बढ़ाना न्यायोचित कदम ही है। जिसे वहां के कई छात्र भी सही मानते हैं। लेकिन यह आंदोलन इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि इसमें परदे के पीछे राजनीतिक कार्यकर्ता भूमिका निभा रहे हैं। यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं।

खैर… यह जांच का विषय हो सकता है।देश के प्रसिद्ध अधिवक्ता सांसद डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने इस छात्र आंदोलन के बारे में बहुत ही गहरी बात कही है। उनका मानना है कि जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय को कुछ समय के लिए बंद कर दिया जाए। उनके इस कथन के गहरे निहितार्थ निकल रहे हैं। स्वामी के संकेत को विस्तार से समझना हो तो एक बार जेएनयू की गतिविधियों का अध्ययन करना चाहिए। फिर वह सब सामने आ जाएगा जो वहां होता है। कहा जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जमकर राजनीति की जाती रही है। देश के जो शिक्षा केन्द्र राजनीति के केन्द्र बनते जा रहे हैं, उन पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है।

वर्तमान में जिस प्रकार से जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय का आंदोलन चल रहा है, उसे छात्र आंदोलन कहना न्याय संगत नहीं होगा। क्योंकि, यह विशुद्ध राजनीतिक आंदोलन है। फीस बढ़ोतरी का विरोध तो मात्र बहाना है। इस आंदोलन के समर्थन में देश की संसद में कांग्रेस और वामपंथी दलों की ओर से आवाज उठाई गई। इससे यही संदेश जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जो देश विरोधी नारे लगाए गए, उनके प्रति इन राजनीतिक दलों के समर्थन का ही भाव रहा होगा। इतना ही नहीं, जब भारत तेरे टुकड़े होंगे और हमें चाहिए आजादी जैसे नारे लगाए गए थे, तब भी कांग्रेस और वाम दलों ने खुलेआम समर्थन किया था। ऐसे में सवाल यह उठता है कि कहीं यही दोनों दल छात्रों को आंदोलन करने के लिए तो नहीं उकसा रहे? अगर यह सही है तो फिर केन्द्र सरकार को दोष देना सही नहीं कहा जा सकता।

जब से देश में राजनीतिक सत्ता का परिवर्तन हुआ है, तब से ही देश में उन संस्थानों की सक्रियता दिखाई देने लगी है, जो भारत के बारे में भ्रम का वातावरण बनाने में सहायक हो सकते हैं। चाहे वह शहरी नक्सलवाद को प्रायोजित करने वाले कथित बुद्धिजीवियों की संस्था हो या फिर उनके विचार को अंगीकार करने वाली ही संस्थाएं क्यों न हों। सभी केन्द्र सरकार का विरोध करने के लिए आगे आ रहे हैं। इस विश्वविद्यालय में पढ़ाई करने वाले छात्र कभी भारतीय सेना द्वारा की जाने वाली आतंकियों के विरोध में कार्यवाही पर सवाल उठाते दिखाई देते हैं तो कभी अनुच्छेद 370 को हटाने का विरोध करते हैं। चार वर्ष पूर्व जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में छात्र संघ की उपाध्यक्ष रहीं शेहला राशिद ने भारतीय सेना के विरोध में जमकर भड़ास निकाली थी, जबकि सेना की ओर से स्पष्ट कहा गया था कि ऐसा कुछ भी नहीं है। इससे समझ में आ सकता है कि इस विश्वविद्यालय में कौन-सा पाठ पढ़ाया जाता है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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देश की युवा पीढ़ी में विदेशों के प्रति रुचि बढ़ी

—गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है

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मनोज ज्वाला

एक मीडिया संस्थान के सर्वेक्षण के अनुसार हमारे देश के पढ़े-लिखे और शहरी नौजवानों में से आधे से अधिक ऐसे हैं, जो अपने देश को पसंद नहीं करते। वे विदेशों में जाकर बस जाना चाहते हैं। लगभग दो साल पहले के उक्त सर्वेक्षण के मुताबिक उनमें से 75 फीसदी युवाओं का कहना था कि वे बे-मन और मजबूरीवश भारत में रह रहे हैं। 62.08 फीसदी युवतियों और 66.01 फीसदी युवाओं का मानना था कि भारत  में उनका भविष्य सुरक्षित नहीं है। क्योंकि, यहां अच्छे दिन आने की संभावना कम है। उनमें से 50 फीसदी का मानना था कि भारत में किसी महापुरुष का अवतरण होगा, तभी हालात सुधर सकते हैं, अन्यथा नहीं।

40 फीसदी युवाओं का मानना था कि उन्हें अगर इस देश का प्रधानमंत्री बना दिया जाए, तो वे पांच साल में इस देश का कायापलट कर देंगे।अखबार का वह सर्वेक्षण आज भी बिल्कुल सही लगता है। अगर व्यापक स्तर पर सर्वेक्षण किया जाता, तो देश छोड़ने को तैयार युवाओं का प्रतिशत और अधिक दिखता। वह सर्वेक्षण तो सिर्फ शहरों तक सीमित था। अपने देश में गांवों पर भी तेजी से शहर छाते जा रहे हैं। गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है। गौर कीजिए कि देश छोड़ने को तैयार वे युवा पढ़े-लिखे हैं और शहरों में पले-बढ़े हैं। वे किस पद्धति से किस तरह के विद्यालयों में क्या पढ़े-लिखे हैं और किस रीति-रिवाज से कैसे परिवारों में किस तरह से पले-बढ़े हैं, यह ज्यादा गौरतलब है।

विद्यालय सरकारी हों या गैर सरकारी, सभी में शिक्षा की पद्धति एक है और वह है मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा पद्धति। भारतीयता विरोधी इसी शिक्षा पद्धति को सरकारी मान्यता प्राप्त है। सरकार का पूरा तंत्र इसी तरह की शिक्षा के विस्तार में लगा हुआ है। वैसे अंग्रेजी माध्यम वाले विद्यालय सबसे अच्छे माने जाते हैं और गैर-सरकारी निजी क्षेत्र के अधिकतर विद्यालय अंग्रेजी माध्यम के ही हैं। शहरों में ऐसे ही विद्यालयों की भरमार है और जिन युवाओं के बीच उक्त मीडिया संस्थान ने उपरोक्त सर्वेक्षण किया उनमें से सर्वाधिक युवा ऐसे ही तथाकथित ‘उत्कृष्ट’ विद्यालयों से पढ़े-लिखे हुए हैं। अब रही बात यह कि इन विद्यालयों में आखिर शिक्षा क्या और कैसी दी जाती है, तो यह इन युवाओं की उपरोक्त सोच से ही स्पष्ट है।

जाहिर है, उन्हें शिक्षा के नाम पर ऐसी-ऐसी डिग्रियां दी जाती हैं, जिनके कारण वे महात्वाकांक्षी, स्वार्थी बनकर असंतोष, अहंकार, खीझ, पलायन एवं हीनता-बोध से ग्रसित हो जाते हैं और कमाने-खाने भर थोड़े-बहुत हुनर हासिल कर स्वभाषा व स्वदेश के प्रति ‘नकार’ भाव से पीड़ित होकर विदेश चले जाते हैं।थॉमस विलिंग्टन मैकाले कोई शिक्षा-शास्त्री नहीं था। वह एक षड्यंत्रकारी था, जिसने भारत पर ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जड़ें जमाने की नीयत से भारतीय शिक्षा-पद्धति की जड़ें उखाड़कर मौजूदा शिक्षा-पद्धति को प्रक्षेपित किया था। जो आज भी उसी रूप में कायम है। 20 अक्टूबर 1931 को लंदन के रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ फौरन अफेयर्स के मंच से महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘अंग्रेजी शासन से पहले भारत की शिक्षा-व्यवस्था इंग्लैण्ड से भी अच्छी थी।’ उस पूरी व्यवस्था को सुनियोजित तरीके से समूल नष्ट कर देने के पश्चात ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जरूरतों के मुताबिक उसके रणनीतिकारों ने लम्बे समय तक बहस-विमर्श कर के मैकाले की योजनानुसार यह शिक्षा-पद्धति लागू की थी।

मैकाले ने ब्रिटिश पार्लियामेंट की शिक्षा समिति के समक्ष कहा था ‘हमें भारत में ऐसा शिक्षित वर्ग तैयार करना चाहिए, जो हमारे और उन करोड़ों भारतवासियों के बीच जिन पर हम शासन करते हैं, उन्हें समझाने-बुझाने का काम कर सके। जो केवल खून और रंग की दृष्टि से भारतीय हों, किन्तु रुचि, भाषा व भावों की दृष्टि से अंग्रेज हों।’ विदेशों में बस जाने को उतावले भारतीय युवाओं ने पूरी मेहनत व तबीयत से मैकाले शिक्षा-पद्धति को आत्मसात किया है, ऐसा समझा जा सकता है। यहां प्रसंगवश मैकाले के बहनोई चार्ल्स ट्रेवेलियन द्वारा ब्रिटिश पार्लियामेंट की एक समिति के समक्ष ‘भारत में भिन्न-भिन्न शिक्षा-पद्धतियों के भिन्न-भिन्न परिणाम’ शीर्षक से प्रस्तुत किये गए एक लेख का यह अंश भी उल्लेखनीय है कि ‘मैकाले शिक्षा-पद्धति का प्रभाव अंग्रेजी राज के लिए हितकर हुए बिना नहीं रह सकता। हमारे पास उपाय केवल यही है कि हम भारतवासियों को यूरोपियन ढंग की उन्नति में लगा दें। इससे हमारे लिए भारत पर अपना साम्राज्य कायम रखना बहुत आसान और असंदिग्ध हो जाएगा।’ ऐसा ही हुआ। बल्कि, मैकाले की योजना तो लक्ष्य से ज्यादा ही सफल रही।

हमारे देश के मैकालेवादी राजनेताओं ने अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासन की समाप्ति के बाद भी उनकी अंग्रेजी-मैकाले शिक्षा-पद्धति को न केवल यथावत कायम रखा, बल्कि उसे और ज्यादा अभारतीय रंग-ढंग में ढाल दिया। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष लक्षित प्राचीन भारतीय शिक्षा-पद्धति को अतीत के गर्त में डालकर शिक्षा को उत्पादन-विपणन-मुनाफा-उपभोग-केन्द्रित बना देने और उसे नैतिक सांस्कृतिक मूल्यों से विहीन कर देने तथा राष्ट्रीयता के प्रति उदासीन बना देने का ही परिणाम है कि हमारी यह युवा पीढ़ी महज निजी सुख-स्वार्थ के लिए अपने देश से विमुख हो जाना पसंद कर रही है। उसे विदेशों में ही अपना भविष्य दीख रहा है।

माना कि हमारे देश में तरह-तरह की समस्याएं हैं, किन्तु इनसे जूझने और इन्हें दूर करने की बजाय पलायन कर जाने अथवा कोरा लफ्फाजी करने कि हमें प्रधानमंत्री बना दिया जाए तो हम देश को सुंदर बना देंगे, अति महात्वाकांक्षा-युक्त मानसिक असंतुलन का ही द्योत्तक है। लेकिन आधे से अधिक ये शहरी युवा मानसिक रुप से असंतुलित नहीं हैं, बल्कि असल में वे पश्चिम के प्रति आकर्षित हैं। इसके लिए हमारे देश की चालू शिक्षा-पद्धति का पोषण करने वाले हमारे राजनेता ही जिम्मेवार हैं। यह ‘यूरोपियन ढंग की उन्नति’ के प्रति बढ़ते अनावश्यक आकर्षण का परिणाम है। इस मानसिक पलायन को रोकने के लिए जरूरी है कि हम अपने बच्चों को हमारे राष्ट्र की जड़ों से जोड़ने वाली और संतुलित समग्र मानसिक विकास करने वालीप्राचीन भारतीय पद्धति से भारतीय भाषाओं में समस्त ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा देने की सम्पूर्ण व्यवस्था कायम करें।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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भाई-बहन में प्रेम भाव बढ़ाता है भैया दूज

–बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था

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योगेश कुमार गोयल

(भैया दूज, 29 अक्टूबर पर विशेष)

भाई-बहन के दिलों में पावन संबंधों की मजबूती और प्रेमभाव स्थापित करने वाला पर्व है भैया दूज। इस दिन बहनें अपने भाईयों को तिलक लगाकर ईश्वर से उनकी दीर्घायु की कामना करती हैं। कहा जाता है कि इससे भाई यमराज के प्रकोप से बचे रहते हैं। दीपावली के दो दिन बाद अर्थात कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाए जाने वाले इस पर्व को ‘यम द्वितीया’ व ‘भ्रातृ द्वितीया’ के नाम से भी जाना जाता है। बहुत से भाई-बहन सौभाग्य तथा आयुष्य की प्राप्ति के लिए इस दिन यमुना अथवा अन्य पवित्र नदियों में साथ-साथ स्नान भी करते हैं। भैया दूज मनाने के संबंध में कई किवंदतियां प्रचलित हैं। एक कथा यमराज और उनकी बहन यमुना देवी से संबंधित है। बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था। यमुना अपने भाई यमराज से बहुत स्नेह करती थीं और अक्सर उनसे अनुरोध करती रहती थीं कि वे अपने इष्ट-मित्रों सहित उसके घर भोजन के लिए पधारें लेकिन यमराज हर बार उसके निमंत्रण को किसी न किसी बहाने से टाल जाते। कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमुना ने यमराज को एक बार फिर भोजन के लिए आमंत्रित किया।

उस समय यमराज ने विचार किया कि मैं तो अपने कर्त्तव्य से बंधा सदैव प्राणियों के प्राण ही हरता हूं। इसलिए इस चराचर जगत में कोई भी मुझे अपने घर नहीं बुलाना चाहता। लेकिन बहन यमुना तो मुझे बार-बार अपने घर आमंत्रित कर रही है। इसलिए अब तो उसका निमंत्रण स्वीकार करना ही चाहिए।यमराज को अपने घर आया देख यमुना की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने भाई का खूब आदर-सत्कार करते हुए उनके समक्ष नाना प्रकार के व्यंजन परोसे। बहन के आतिथ्य से यमराज बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे कोई वर मांगने को कहा। इस पर यमुना ने उनसे अनुरोध किया कि आप प्रतिवर्ष इसी दिन मेरे घर आकर भोजन करें और मेरी तरह जो भी बहन इस दिन अपने भाई का आदर-सत्कार करे, उसे तुम्हारा भय न रहे। यमराज ने बहन यमुना को उसका इच्छित वरदान दे दिया। ऐसी मान्यता है कि उसी दिन से ‘भैया दूज’ का पर्व मनाया जाने लगा। भैया दूज के संबंध में और भी कई कथाएं प्रचलित हैं। ऐसी ही एक कथा के अनुसार, एक ब्राह्मण की दो संतानें थी।

एक पुत्र एवं एक पुत्री। पुत्री बहुत समझदार एवं गुणवती थी। वह अपने भाई से जी-जान से प्यार करती थी। एक दिन उसका भाई उससे मिलने उसकी ससुराल पहुंचा। उस समय वह सूत कातने में व्यस्त थी। अतः उसे भाई के आने का पता ही न चल सका। भाई भी बिना कुछ बोले चुपचाप एक ओर बैठा रहा। जब थोड़ी देर बाद बहन की नजर उस पर पड़ी तो भाई को अपने घर आया देख उसे बेहद खुशी हुई। उसने भाई का भरपूर आदर-सत्कार किया। अगले दिन भाई को वापस लौटना था। अतः रास्ते के लिए वह आटे के पकवान बनाने के उद्देश्य से चक्की में आटा पीसने लगी। अनजाने में चक्की में बैठा सांप भी आटे के साथ पिस गया। उसी आटे के पकवान एक पोटली में बांधकर उसने भाई को रास्ते में खाने के लिए देकर विदा किया। भाई के घर से जाने के बाद जब उसे यह मालूम हुआ कि आटे में सांप पिस गया है तो अपने पुत्र को पालने में ही सोता छोड़कर वह अपने भाई के प्राणों की रक्षा के लिए दौड़ी। कुछ दूर जाने पर उसे एक पेड़ की छांव में अपना भाई सोता दिखाई दिया। तब तक उसने पोटली में से कुछ भी नहीं खाया था। उसने भगवान का शुक्रिया अदा किया और पोटली उठाकर दूर फेंक दी तथा भाई के साथ मायके की ओर चल दी।

रास्ते में उसने देखा कि भारी-भारी शिलाएं आकाश में उड़ रही हैं। उसने एक राहगीर से इस रहस्य के बारे में जानना चाहा तो उसने बताया कि जो बहन अपने भाई पर कभी नाराज न होती हो और उसे दिलो-जान से चाहती हो, उस भाई की शादी के समय ये शिलाएं उसकी छाती पर रखी जाएंगी। थोड़ी दूर चलने पर उसे नाग-नागिन दिखाई दिए। नाग ने बताया कि ये शिलाएं जिस व्यक्ति की छाती पर रखी जाएंगी, हम उसे डंस लेंगे। जब बहन ने इस विपत्ति से बचने का उपाय पूछा तो नाग-नागिन ने बताया कि अगर भाई के विवाह के समय उसके सभी कार्य बहन स्वयं करे, तभी भाई की जान बच सकती है।जब उसके भाई के विवाह के लग्न का शुभ मुहूर्त आया तो वह भाई को पीछे धकेलती हुई स्वयं ही लग्न चढ़वाने के लिए आगे हो गई और घोड़ी पर भी स्वयं चढ़ गई। परिवारजन और संबंधी उसके इस विचित्र व्यवहार से हैरान तथा क्रोधित थे। उसके घोड़ी पर चढ़ते ही शिलाएं उड़ती-उड़ती आई लेकिन घोड़ी पर किसी पुरूष की जगह एक महिला को बैठी देख वापस मुड़ गई। जब सुहागरात का समय आया तो वह भाई को पीछे कर खुद भाभी के साथ सोने उसके कमरे में चली गई।

परिवार के सभी सदस्य तथा सभी रिश्तेदार उसके इस अजीबोगरीब व्यवहार से बेहद आश्चर्यचकित और खफा थे। उन्हें उस पर गुस्सा तो बहुत आ रहा था लेकिन उसके जिद के समक्ष सभी विवश थे। सुहागरात पर नियत समय पर नाग-नागिन उसके भाई को डंसने कमरे में पहुंच गए लेकिन उसने नाग-नागिन को मारने की सारी तैयारी पहले ही कर रखी थी। आखिरकार उसने नाग-नागिन का काम तमाम कर दिया। उसके बाद वह निश्चिंत होकर सो गई। सुबह होने पर सभी मेहमानों को विदा करने के बाद परिवार वालों ने सोचा कि अब इस बला को भी कुछ बचा-खुचा देकर यहां से चलता कर दिया जाए लेकिन नींद से जागने पर जब उसने पूरी घटना के बारे में सब को विस्तार से बताया कि किस प्रकार वह अपने बच्चे को पालने में ही सोता छोड़कर दौड़ी-दौड़ी भाई के प्राण बचाने के लिए उसके पीछे चली आई और सभी को नाग-नागिन के मृत शरीर दिखाए तो सभी की आंखों में आंसू आ गए।

भाई के प्रति उसका असीम प्यार तथा समर्पण भाव देखकर उसके प्रति सभी का हृदय श्रद्धा से भर गया।भाई-भाभी तथा माता-पिता ने उसे ढेर सारे उपहारों से लादकर बड़े मान-सम्मान के साथ खुशी-खुशी ससुराल से विदा किया। भाई-बहन के बीच इसी प्रकार के पावन संबंध, प्रेमभाव तथा उनके दिलों में आपसी संबंधों को मजबूत बनाने के लिए ही ‘भैया दूज’ पर्व मनाया जाता है।

(लेखक स्तंभकार हैं।)

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