Connect with us

लेख

वे पन्द्रह दिन भाग 08/15

Published

on

08  अगस्त

 

इस बार सावन का महीना ‘पुरषोत्तम (मल) मास’ हैं. इसकी आज छठी तिथि हैं, षष्ठी. गांधीजी की ट्रेन पटना के पास पहुंच रही है. सुबह के पौने छः बजने वाले हैं. सूर्योदय बस अभी हुआ ही है. गांधीजी खिड़की के पास बैठे हैं. उस खिड़की से हलके बादलों से आच्छादित आसमान में पसरी हुई गुलाबी छटा बेहद रमणीय दिखाई दे रही है. ट्रेन की खिड़की से प्रसन्न करने वाली ठण्डी हवा आ रही है. हालांकि उस हवा के साथ ही इंजन से निकलने वाले कोयले के कण भी अंदर आ रहे हैं, लेकिन कुल मिलाकर वातावरण आल्हाददायक है, उत्साहपूर्ण है.

परन्तु पता नहीं क्यों, गांधीजी अंदर से उत्साहित नहीं हैं. हालांकि कभी ऐसा होता नहीं. उनके सामने चाहे कितनी भी प्रतिकूल घटना घट जाए, उनके मन का उत्साह कायम रहता है. गांधीजी को याद आया कि ‘आज से ठीक पांच वर्ष पहले उन्हें और जवाहरलाल नेहरू को ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तार किया था’. क्रिप्स मिशन की असफलता के बाद गांधीजी ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक बड़ा आंदोलन खड़ा करने का निश्चय किया था. इस संबंध में अखिल भारतीय काँग्रेस कमेटी की बैठक मुम्बई में रखी गई थी. ८ अगस्त १९४२ की शाम को उस बैठक में गांधीजी ने आव्हान किया था… “अंग्रेजों, भारत छोड़ो”. और यह बैठक समाप्त होते ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था.

पांच वर्ष पहले का वह दिन और आज का दिन. ‘उस दिन देश की स्वतंत्रता किसी की दृष्टि में भी नहीं थी, लेकिन उत्साह बना हुआ था… और आज..? केवल एक सप्ताह बाद हमारा भारत स्वतन्त्र होने जा रहा है, फिर भी मन में उमंग-उत्साह क्यों नहीं हैं…!’

पिछले दो-तीन दिन ‘वाह’ के शरणार्थी शिविर और लाहौर में उन्होंने हिंदुओं की जो दुर्दशा देखी थी, उसके कारण वे बेचैन हो गए थे. उन्हें यह बात समझने में कठिनाई हो रही थी कि “हिन्दू अपने मकान-दुकान छोड़कर पलायन क्यों कर रहे हैं? मुसलमानों को पाकिस्तान चाहिए था, वह उन्हें मिल गया है. अब वे हिंदुओं का अहित क्यों करेंगे? हिंदुओं को वहां से भागने की कोई आवश्यकता नहीं है. मैंने लाहौर में जैसा कहा है, मैं उसी प्रकार अपनी बात पर कायम रहूंगा. मैं अपना बचा हुआ जीवन, नए बने पाकिस्तान में ही व्यतीत करूंगा…”.

इन विचारों के उभरने के बाद गांधीजी के मन को थोड़ी शान्ति मिली. गाड़ी पटना स्टेशन में प्रवेश कर रही थी. बड़ी संख्या में लोग गांधीजी के स्वागत में एकत्रित हुए थे. भीड़ उनका जयजयकार भी कर रही थी. परन्तु फिर भी इस बार गांधीजी को इन नारों में उत्स्फूर्तता और उत्साह प्रतीत नहीं हो रहा था, बड़े औपचारिक किस्म की जयजयकार लगी उन्हें…!

____ ____ ____ ____

जिस समय गांधीजी की ट्रेन पटना स्टेशन में प्रवेश कर रही थी, उस समय निजामशाही के हैदराबाद में सुबह के छः बजे थे. यहां भी बारिश नहीं होने के कारण गर्मी और उमस का वातावरण हैं. अम्बरपेठ स्थित इस विश्वविद्यालय के छात्रावासों में तनाव का माहौल है.

इस विश्वविद्यालय की स्थापना चालीस वर्ष पूर्व हुई थी. यदि एकदम सटीक कहा जाए तो सन १९१८ में मीर उस्मान अली नामक हैदराबाद के नवाब ने इसकी स्थापना की थी. इस कारण शुरुआत से ही इस विश्वविद्यालय में उर्दू और इस्लामिक संस्कृति का दबदबा था. पिछले कुछ दिनों से विश्वविद्यालय का वातावरण दूषित हो चला था. निज़ाम ने घोषित कर दिया था कि वह हैदराबाद रियासत को भारत्त में विलीन नहीं करेंगे. इसी बात से ‘प्रेरणा’ लेकर रजाकार और मुस्लिम गुण्डों ने विश्वविद्यालय के हिन्दू लड़कों को धमकाना शुरू कर दिया था. हिन्दू लड़कियां तो पहले से ही बहुत कम थीं. उन्होंने भी पिछले एक माह से विश्वविद्यालय आना बन्द कर दिया था. लेकिन छात्रावास में रहने वाले लड़कों की दिक्कत थी, कि वे कहां जाएं ?

इसी बीच होस्टल के लड़कों को गुप्त सूचना मिली कि मुस्लिम लड़कों ने होस्टल में लाठियां, तमंचे, बन्दूक इत्यादि हथियार लाकर रखे हैं. हिन्दू लड़कों को विश्वविद्यालय से खदेड़ने के लिये इन अस्त्र-शस्त्रों का उपयोग किया जाने वाला था. इसीलिए कल रात भर छात्रावास के हिन्दू लड़के ठीक से सो नहीं सके थे. उन्हें यह भय सता रहा था कि कहीं रात में ही उन पर हमला न हो जाए और रातोंरात अंधेरे में ही उन्हें विश्वविद्यालय परिसर छोड़कर भागना न पड़ जाय. खैर उनके सौभाग्य से कल की रात कुछ नहीं हुआ.

परन्तु आज ८ अगस्त को हिन्दू लड़के उस्मानिया विश्वविद्यालय में रुकने की मनःस्थिति में बिलकुल नहीं हैं. इसीलिए सभी ने एकमत होकर यह निर्णय लिया कि आज सुबह छः बजे के आसपास सुनसान और शांत वातावरण में यहां से भाग निकलना ही उचित होगा. इसी योजना के अनुसार विश्वविद्यालय के छात्रावासों में रहने वाले लगभग तीन सौ हिन्दू लड़के छिपते-छुपाते परिसर से बाहर भाग रहे हैं.

____ ____ ____ ____

मुम्बई के दादर स्थित ‘सावरकर सदन’ में भी थोड़ी व्यस्तता चल रही है. तात्याराव यानी वीर सावरकर अगले कुछ दिनों के लिए दिल्ली जाने वाले हैं, और वह भी हवाई जहाज से. सावरकर जी की यह पहली ही विमान यात्रा हैं. लेकिन उन्हें इसकी कोई उत्सुकता नहीं हैं उनका मन कुछ खिन्न अवस्था में हैं. ‘खंडित हिन्दुस्तान’ की कल्पना भी उन्हें सहन नहीं हो रही है. अंग्रेजों को भारत से भगाने के लिए उन्होंने अपने जीवन को होम कर दिया, अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया, वह अखंड हिन्दुस्तान के लिए…! लेकिन काँग्रेस के दीन-हीन, कमज़ोर और लाचार नेतृत्व ने विभाजन स्वीकार कर लिया. इस बात का तात्याराव को बहुत कष्ट हो रहा है. इस सबके बीच पश्चिमी और पूर्वी भारत के क्षेत्रों से हिंदुओं और सिखों के नरसंहार के समाचार, लाखों की संख्या में हिंदुओं का विस्थापन, यह सब उनके लिए बहुत ही भयानक है.

इसीलिए इन सारी बातों पर चर्चा और विचार करने के लिए हिन्दू महासभा की एक आवश्यक राष्ट्रीय बैठक कल से दिल्ली में आयोजित है. देश के सभी प्रमुख हिन्दू नेता इस बैठक के लिए दिल्ली में एकत्रित होने जा रहे हैं. सावरकर जी को अपेक्षा है कि इस बैठक से निश्चित ही कुछ अच्छा निर्णय निकलकर आएगा. उनका हवाई जहाज सुबह ग्यारह बजे निकलने वाला है. दादर से जुहू कोई खास दूरी पर नहीं हैं, इसलिए उन्हें रवाना होने में अभी थोड़ा समय बाकी हैं.

____ ____ ____ ____

अकोला…

निजामशाही की सीमा से लगा हुआ विदर्भ का बड़ा शहर. कपास के बड़े-बड़े गोदाम, और कपास के जबरदस्त उत्पादन से समृद्ध हुए जमींदारों का शहर. कल से ही अकोला शहर में अफरातफरी मची हुई है. भारत की स्वतंत्रता अब दहलीज पर आन खड़ी हुई है. एक सप्ताह के भीतर देश स्वतन्त्र हो जाएगा. परन्तु इस देश में मराठी भाषिकों का क्या और कैसा स्थान रहेगा…? मराठी भाषियों के प्रदेश अथवा प्रांत की रचना कैसी होगी, इस पर चर्चा करने एवं कोई ठोस निर्णय लेने के लिए पश्चिम महाराष्ट्र एवं विदर्भ के बड़े-बड़े नेता इकठ्ठा होने वाले हैं. मराठी भाषियों के इस झगड़े में धनंजयराव गाडगील द्वारा सुझाए गए फार्मूले पर कल से ही चर्चा जारी है.

पंजाबराव देशमुख, बृजलाल बियानी, शेषराव वानखेड़े, बापूजी अणे तो स्थानीय नेता हैं ही. इनके अलावा शंकरराव देव, पंढरीनाथ पाटिल, पूनमचंद रांका, श्रीमन्नारायण अग्रवाल, रामराव देशमुख, दा. वि. गोखले, धनंजय राव गाडगीळ, गोपालराव खेडकर, द. वा. पोतदार, प्रमिलाताई ओक, ग. त्र्यं. माडखोलकर, जी. आर. कुलकर्णी जैसे नेता भी इस बैठक में शामिल हुए हैं. इस प्रकार कुल सोलह नेता मराठीभाषियों का भविष्य तय करने के लिए अकोला में एकत्रित हुए हैं. कल काफी चर्चा हो चुकी है. विदर्भ के नेताओं को ‘पृथक विदर्भ राज्य’ चाहिए है, जबकि पश्चिम महाराष्ट्र के नेतागण एक संयुक्त महाराष्ट्र का सपना देख रहे हैं. इन विभिन्न विचारों के बीच से ही कोई सर्वमान्य हल निकालना है… और ऐसी संभावना है कि शाम तक कोई न कोई निर्णय ले ही लिया जाएगा.

____ ____ ____ ____

इस सारी आपाधापी के बीच एक छोटी सी लेकिन महत्त्वपूर्ण घटना भी घट रही है. महाराष्ट्र के कोंकण इलाके में स्थित रत्नागिरी जिले के संगमेश्वर में एक छोटे से गांव ‘तेरये’ में एक मराठी स्कूल शुरू हो रहा है. सुबह ठीक ११ बजे, माता सरस्वती की तस्वीर पर माल्यार्पण करके ग्रामवासियों ने इस मराठी शाला का आरम्भ किया.

____ ____ ____ ____

इधर दिल्ली में दोपहर के बारह बज रहे हैं. सूर्य अपने पूरे शबाब पर आग उगल रहा है. अगस्त माह होने के बावजूद बारिश कुछ खास नहीं हुई है. वाइसरॉय हाउस के सामने स्थित एक विशाल पोर्च में जोधपुर स्टेट की काले रंग की आलीशान गाड़ी आकर रुकती है. मजबूत पगड़ियां बांधे हुए कद्दावर दरबान गाड़ी का दरवाजा धीरे से खोलते हैं. उस गाड़ी में से उतरते हैं, ‘कदंबी शेषाचारी वेंकटाचारी’. महाराजा जोधपुर रियासत के दीवान, अथवा यदि जोधपुर की दरबारी भाषा में कहें तो, जोधपुर के ‘प्रधानमंत्री’.

सी. एस. वेंकटाचार के नाम से पहचाने जाने वाले ये सज्जन बंगलौर के कन्नड़ भाषी हैं. इन्होंने इन्डियन सिविल सर्वेंट परीक्षा उत्तीर्ण की हुई है. अत्यंत बुद्धिमान हैं. आजकल जोधपुर रियासत के सभी प्रमुख निर्णय इनकी सलाह से ही लिए जाते हैं. इसीलिए वाइसरॉय लॉर्ड माउंटबेटन ने चार सौ एकड़ में फैले उस विराट राजप्रासाद परिसर में वेंकटाचार को भोजन के लिए आमंत्रित किया हुआ है. भोजन बड़े ही राजशाही शिष्टाचार के बीच जारी है.

जोधपुर जैसा विशाल एवं संपन्न रजवाड़ा हमेशा से ब्रिटिशों का समर्थक और सहायक रहा है. इसीलिए उस रियासत के प्रतिनिधि के रूप में वेंकटाचार को यह सम्मान मिल रहा है. इन्हें भोजन हेतु आमंत्रित करने के पीछे माउंटबेटन का उद्देश्य स्पष्ट है. उन्हें जल्दी से जल्दी जोधपुर रियासत का भारत में विलीनीकरण चाहिए. भारत पर अपना नियंत्रण छोड़ने से पहले उन्हें यह छोटे-छोटे विवाद टालने हैं. भोजन के पश्चात कुछ राजनैतिक शिष्टाचार की बातें हुईं और इसी में वेंकटाचार ने यह स्पष्ट कर दिया कि जोधपुर रियासत भारत में विलीनीकरण के लिए तैयार है.

यह अंग्रेजों और भारत दोनों के लिए बहुत ही अच्छी खबर हैं. पिछले कुछ दिनों से जिन्ना लगातार जोधपुर रियासत को पाकिस्तान में शामिल होने के लिए विभिन्न तरह के ललचाने वाले प्रस्ताव दे रहे थे. भोपाल का नवाब और उनका सलाहकार ज़फरुल्ला खान, यह दोनों ही जोधपुर, कच्छ, उदयपुर और बड़ौदा रियासतों के महाराजाओं से मिलकर उन्हें पाकिस्तान में शामिल होने के फायदों के बारे में बता रहे थे. जिन्ना ने भोपाल के नवाब के माध्यम से जोधपुर रियासत के महाराज से कहा कि ‘यदि वे १५ अगस्त से पहले अपनी केवल रियासत को ‘स्वतन्त्र’ भी घोषित कर दें तब भी उन्हें निम्नलिखित सुविधाएं दी जाएंगी –

– कराची बंदरगाह की सभी सुविधाओं पर जोधपुर रियासत का अधिकार होगा.
– जोधपुर रियासत को पाकिस्तान से शस्त्रात्र की आपूर्ति की जाएगी.
– जोधपुर-हैदराबाद (सिंध) रेलमार्ग पर केवल जोधपुर रियासत का अधिकार होगा.
– जोधपुर रियासत में अकाल पड़ने की स्थिति में पाकिस्तान के द्वारा अन्न की आपूर्ति की जाएगी.

ज़ाहिर है कि जोधपुर रियासत के बुद्धिमान दीवान वेंकटाचार को इन सारे वादों का खोखलापन साफ़ दिखाई दे रहा था. इसीलिए उन्होंने स्वयं, भारत में विलीन होने के हेतु जोधपुर महाराज का मन परिवर्तित किया और एक बेहद गंभीर मसला हल हो गया.

____ ____ ____ ____

दख्खन का हैदराबाद…

निजामशाही की राजधानी हैदराबाद. आज सुबह से ही शहर का वातावरण जरा तनावग्रस्त है. सुबह-सुबह ही उस्मानिया विश्वविद्यालय के छात्रावासों से ३०० हिन्दू लड़के अपने प्राण बचाकर भाग चुके हैं, इस बात से रजाकार बेहद क्रोधित हैं. इसका बदला लेने के लिए शहर में स्थित विभिन्न हिन्दू व्यापारियों पर उन्होंने हमले शुरू कर दिए. उधर वारंगल से आने वाली ख़बरें और भी चिंताजनक थीं. समूचे वारंगल जिले में हिन्दू नेताओं के मकानों पर मुस्लिम गुंडों द्वारा पथराव किया जा रहा है. हिंदुओं की दुकानें-मकान लूटे और जलाए जा रहे हैं. इसी को देखते हुए दोपहर में हैदराबाद के एक बड़े व्यापारी के घर शहर के कई हिन्दू व्यापारी एकत्रित हुए हैं. उन्होंने वाइसरॉय लॉर्ड माउंटबेटन और जवाहरलाल नेहरू को भेजने के लिए एक लंबा-चौड़ा टेलीग्राम तैयार किया… —
For more than a month, Muslim goondas, military and police reign of terror, loot, incendiarism there and murder are prevailing. There is no protection to non Muslims life, property and honour. Non Muslims are forcibly deprived of and penalised even for the most elementary self-defence preparations, whereas Muslims are openly allowed and even supplied with arms. The police act as spectators when and where Muslims are strong, but become active and shoot mercilessly when Hindus gather for self-defence.”
सन्दर्भ :- (Indian Daily Mail / Singapore / 9th August, 1947)

भारत देश के बीचोंबीच स्थित निजामशाही के इस हैदराबाद रियासत में हिन्दू सुरक्षित नहीं हैं. ऐसा लगता ही मानो उनका कोई माई-बाप नहीं है.

____ ____ ____ ____

तात्याराव सावरकर की यह पहली विमान यात्रा हैं. उनके साथ हिन्दू महासभा के चार कार्यकर्ता भी हैं. उनका विमान दिल्ली के विलिंगटन हवाई अड्डे पर दोपहर ढाई बजे उतरा. हवाईअड्डे के बाहर हिन्दू महासभा के असंख्य कार्यकर्ता एकत्रित थे.

‘वीर सावरकर अमर रहें’, ‘वंदेमातरम’ के जोशीले नारों ने हवाईअड्डे के पूरे परिसर को गुंजायमान कर दिया. कार्यकर्ताओं से पुष्पहार स्वीकार करते-करते तात्याराव बाहर निकले. उनके लिए नियत कार में बैठे और अन्य कारों तथा मोटरसाइकिलों के काफिले के साथ वे मंदिर मार्ग स्थित ‘हिन्दू महासभा भवन’ की तरफ निकल पड़े.

____ ____ ____

इधर भारत में दोपहर के तीन बज रहे हैं और उधर लन्दन में सुबह के साढ़े दस बजे हैं. लन्दन के मध्यवर्ती इलाके में शेफर्ड बुश गुरूद्वारे में सिख नेता इकठ्ठे होने लगे हैं. इंग्लैण्ड में रहने वाला सिख समुदाय, भारत की हिंसक घटनाओं से बेहद चिंतित है. पश्चिम पंजाब में रहने वाले किसी रिश्तेदार की बहन को मुस्लिम गुंडों ने उठा लिया है. तो किसी रिश्तेदार को बीच सड़क पर दिनदहाड़े काट दिया गया है. इसके अलावा अभी भी विभाजन की रेखा स्पष्ट नहीं, कौन किस तरफ जाएगा पता नहीं. पंजाब के इस विभाजन का दुःख इंग्लैण्ड के सिखों के मनोमस्तिष्क पर छाया हुआ है.

इसके लिए सम्पूर्ण पंजाब को ही भारत में विलीन किया जाए, तथा सिख-मुस्लिम जनसंख्या की अदलाबदली करना ही एकमात्र उपाय है, यह उनकी समझ में आ रहा था. परन्तु गांधीजी और नेहरू ये दोनों ही जनसंख्या की अदलाबदली के सम्बन्ध में अपनी जिद पर अड़े हुए हैं. नेहरू ने तो सिख समुदाय से अपील की है कि वे ‘बॉर्डर कमीशन’ पर विश्वास रखें. इन दोनों की बातों पर इंग्लैण्ड के सिखों में अत्यधिक क्रोध है. इसीलिए आज सिखों के तमाम नेता लन्दन के इस गुरूद्वारे में एकत्रित होकर १०, डाउनिंग स्ट्रीट स्थित प्रधानमंत्री एटली को एक ज्ञापन प्रस्तुत करने जा रहे हैं कि ‘विभाजन किए बिना, समूचे पंजाब प्रांत का भारत में विलीनीकरण किया जाए.’

लन्दन में भी खासी गर्मी का मौसम चल रहा है. ठीक साढ़े ग्यारह बजे सिख नेताओं का एक प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री एटली से मिलने डाउनिंग स्ट्रीट की तरफ कूच कर गया हैं.

____ ____ ____

पंजाब के दक्षिण-पूर्व क्षेत्र में अगस्त की दोपहर अपनी पूरी तीव्रता पर है. पुरषोत्तम मास का सावन महीना होने के बावाजूद बारिश के आसार नहीं दिखाई दे रहे. कुछ दिनों पहले ही हल्की बूंदाबांदी हुई थी, लेकिन बस उतनी ही.

फिरोजपुर, फरीदकोट, मुक्तसर, भटिंडा, मोगा… इन क्षेत्रों की जमीन में दरारें पड़ चुकी हैं और कुओं का पानी सूख चुका है. पेड़-पौधे सूखने लगे हैं, पशु-पक्षी प्यास के कारण अपने प्राण त्याग रहे हैं. इस कष्ट को और बढ़ाने के लिए उत्तरी-पश्चिमी पंजाब से शरणार्थी के रूप में हिंदु-सिखों के जत्थे के जत्थे लगातार प्रतिदिन चले आ रहे हैं. अपना सब कुछ गंवाकर, अपने प्रियजनों को खोकर, अपनी इज्जत लुटवा कर आने वाले ढेरों लोग.

किसकी गलती से हो रहा है, यह सब….?

____ ____ ____ ____

वीर सावरकर के मुम्बई से दिल्ली निकले हुए हवाई जहाज के आसमान में विचरण करते समय… निजाम के हैदराबाद और वारंगल में रजाकारों का अत्याचार जारी रहने के दौरान….

दिल्ली के वाइसरॉय हाउस में जोधपुर के दीवान और लॉर्ड माउंटबेटेन के बीच चर्चा और भोजन समाप्त होते-होते…. इधर पटना यूनिवर्सिटी के सभागृह में गांधीजी का विद्यार्थियों से संवाद चल रहा है. विद्यार्थी आक्रामक मूड में हैं, बेहद चिढे हुए हैं. काँग्रेस के कुछ स्थानीय नेता विद्यार्थियों के बीच जाकर उन्हें शांत करने का प्रयास कर रहे हैं.

आज सुबह अपनी प्रार्थना में गांधीजी ने जो बात बताई थी, वही बात एक बार पुनः अपने धीमे स्वरों में वे विद्यार्थियों से कह रहे हैं, कि “१५ अगस्त, यानी स्वतंत्रता दिवस के अवसर को उपवास रखकर मनाएं. उस दिन चरखे पर सूत कताई करें, कॉलेज के परिसर में स्वच्छता रखें… दक्षिण अफ्रीका के गोरे शासक उन्मत्त हो चुके हैं. वे वहां के भारतीयों के साथ घृणास्पद व्यवहार कर रहे हैं. अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उनका विरोध किया जाना चाहिए..”

विद्यार्थी इस आशा के साथ एकत्रित हुए थे कि गांधीजी उन्हें भारत-पाकिस्तान विभाजन के सम्बन्ध में, अपने देश के बारे में कुछ प्रवचन देंगे. परन्तु उन्हें निराशा ही हाथ लगी.

____ ____ ____ ____

कलकत्ता में भीषण दंगे शुरू हो चुके हैं.

हालांकि इसे दंगा कहना भी एक गलती ही है, क्योंकि यह दंगा नहीं बल्कि नरंसहार है. क्योंकि हमले केवल एक ही पक्ष की तरफ से हो रहे हैं. उनका प्रतिकार करने वाले तो हैं ही नहीं. हिंदुओं की बस्तियों पर मुसलमान गुण्डे बड़ी ही आक्रामकता के साथ हमले कर रहे हैं. कलकत्ता के हिंदुओं को आज से लगभग एक वर्ष पहले, १४ अगस्त १९४६ को ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ की काली यादें सता रही हैं, जिस दिन मुस्लिम लीग के गुंडों ने कलकत्ता के रास्तों पर सरेआम हिंदुओं का खून बहाया था.

अब एक वर्ष बाद फिर से वही परिस्थिति निर्माण होती दिखाई दे रही है. पुराने कलकत्ता के इलाकों में हिन्दू दुकानदारों को लूटने और मारने के लिए आए हुए मुस्लिम समुदाय को रोकने के लिए पुलिस अधिकारियों ने एक रक्षात्मक दीवार बनाई है. लेकिन इन पुलिस अधिकारियों पर भी देसी बम फेंके जा रहे हैं. डिप्टी पुलिस कमिश्नर एस. एच. घोष, चौधरी और एफ. एम. जर्मन जैसे तीन वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी गंभीर रूप से घायल हुए हैं, उनके प्राण बाल-बाल ही बचे हैं. पुराने कलकत्ता में दोपहर में ही छः हिन्दू मृत एवं साठ गंभीर रूप से घायल हुए हैं.

बंगाल के प्रमुख सुहरावर्दी के शासन में मुस्लिम दंगाईयों को गिरफ्तार करना तो दूर, उनका सम्मान किया जाएगा, ऐसे चिन्ह दिखाई दे रहे हैं. नवनियुक्त गवर्नर, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी भी कलकत्ता की इस गंभीर परिस्थिति एवं हिंदुओं के नरसंहार की तरफ कुछ ध्यान देंगे या कार्यवाही कर पाएंगे, इसमें भी शंका ही है…!

____ ____ ____ ____

आठ अगस्त का दिन ढलने के करीब हैं. कलकत्ता अभी भी धधक रहा है. हैदराबाद, वारंगल और निजामशाही के अन्य गांवों में हिंदुओं के मकानों और दुकानों पर मुस्लिम गुंडों के हमले जारी हैं. उधर दिल्ली के हिन्दू महासभा भवन में देश भर के नेता स्वातंत्र्यवीर सावरकर के साथ सलाह-मशविरा कर रहे हैं. अभी-अभी तात्याराव और पंडित मदनमोहन मालवीय की एक लंबी बैठक समाप्त हुई है.

उधर सुदूर पूर्वी महाराष्ट्र के अकोला शहर में विदर्भ और पश्चिम महाराष्ट्र के नेताओं में ‘अकोला संधि’ हो गई है. इस संधि के अनूसार संयुक्त महाराष्ट्र के दो उप-प्रांत रहेंगे, ‘पश्चिम महाराष्ट्र’ और ‘महाविदर्भ’. इन दोनों ही उप-प्रान्तों के लिए अलग स्वतन्त्र विधानसभा, मंत्रिमंडल और उच्च न्यायालय रहेंगे. परन्तु इस सम्पूर्ण प्रांत के लिए एक ही गवर्नर एवं एक ही लोकसेवा आयोग रहेगा, ऐसा तय किया गया है. इसी कारण जैसे-जैसे रात गहराती जा रही है, अकोला में मराठी नेतृत्व की मेजबानी अपने पूरे रंग में है.

उधर कराची के अपने अस्थायी निवास में बैरिस्टर मोहम्मद अली जिन्ना आगामी ११ अगस्त को पाकिस्तान की संसद में दिए जाने वाले अपने भाषण की तैयारी करके उठे ही हैं… अब उनके सोने का वक्त हो चला है. गांधीजी कलकत्ता जाने वाली गाड़ी में बैठ चुके हैं. बाहर हल्की बारिश हो रही है. गांधीजी का डिब्बा एक-दो स्थानों से टपक रहा है. ट्रेन की खिड़की से आने वाली हवा ठण्डी लग रही है, इसलिए मनु ने खिड़की बन्द कर दी है.

दिल्ली के वाइसरॉय हाउस की लायब्रेरी में अभी भी लाईट जल रही है. लॉर्ड माउंटबेटन अपनी विशाल महोगनी टेबल पर आज दिन भर की रिपोर्ट, लन्दन में भारत के सचिव के लिए लिखकर रख रहे हैं. हमेशा तो वे डिक्टेशन देते हैं, परन्तु आज उनके पास इसके लिए समय ही नहीं. अब कल उनका सेक्रटरी इस रिपोर्ट को टाईप करके लन्दन भेजेगा.

आठ अगस्त शुक्रवार का दिन अब समाप्त होने को है. इस अखंड भारत की एक विशाल जनसंख्या अभी भी जाग ही रही है. सिंध, पेशावर का पर्वतीय इलाका, पंजाब, बंगाल, तथा निजामशाही के एक बड़े भूभाग में लाखों हिंदुओं की आंखों से नींद कोसों दूर है.

ठीक अगले शुक्रवार को इस अखंड भारत के तीन टुकड़े होने जा रहे हैं और दो देश आकार ग्रहण करने वाले हैं….!

 चौथा खंभा न्यूज़ .com

लेख

जेएनयू में फीस वृद्धि के नाम पर राजनीति

—यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं

Published

सुरेश हिन्दुस्थानी

देश के उच्च शिक्षा केन्द्र जब राजनीति के अड्डे बनने की ओर कदम बढ़ाने लगें, तब वहां की शिक्षा की दिशा-दशा क्या होगी, यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। फीस बढ़ोतरी के खिलाफ किया जाने वाला दिल्ली का छात्र आंदोलन कुछ इसी प्रकार का भाव प्रदर्शित कर रहा है, जहां केवल और केवल राजनीति ही की जा रही है। किसी भी आंदोलन की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके पीछे जनहित का कितना भाव है। दिल्ली का यह आंदोलन जनसरोकार से कोसों दूर दिखाई दे रहा है।

हालांकि इसके पीछे बहुत से अन्य कारण भी होंगे। सबसे बड़ा कारण तो यही है कि आज जेएनयू की जो छवि जनता के बीच बनी है, वह जनता को खुद ही दूर कर रही है। जिस विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारों की ध्वनि गूंजित होती है, वह कभी जन आंदोलन का हिस्सा नहीं बन सकते हैं।दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के जिन छात्रों ने कभी भारत के टुकड़े करने के नारे लगाए थे, आज वे ही छात्र फीस बढ़ोतरी के छोटे से मामले को राजनीतिक रुप देने का प्रयास करते दिखाई दे रहे हैं। इस छात्र आंदोलन का राजनीतिक स्वरुप इसलिए भी दिखाई दे रहा है, क्योंकि इसमें राष्ट्रीय मानबिन्दुओं और केन्द्र सरकार को सीधे निशाने पर लिया जा रहा है। जेएनयू वामपंथी विचारधारा का एक बड़ा केन्द्र रहा है।

वामपंथी धारा के कार्यकर्ता देश के महानायकों के बारे में क्या सोच रखते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। पिछले घटनाक्रमों को देखें तो पाएंगे कि जेएनयू में देश के विरोध में वातावरण बनाने का काम किया जाता रहा है। वहां आतंकवादी बुरहान वानी के समर्थन में कार्यक्रम किए जाते हैं। सवाल यह कि जेएनयू में शिक्षा के नाम पर आखिर क्या हो रहा है। जहां तक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में फीस बढ़ोतरी की बात है तो यह कहना तर्कसंगत ही होगा कि विगत 19 वर्ष से विश्वविद्यालय के छात्रावास के कमरों और भोजन का शुल्क नहीं बढ़ाया गया, जबकि पिछले 19 सालों में महंगाई का ग्राफ बहुत ऊपर गया है। इस सबका भार पूरी तरह से विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के कंधों पर ही आया। देश के अन्य विश्वविद्यालयों में भी शिक्षा महंगी हो रही है, जो जेएनयू के मुकाबले बहुत अधिक है। ऐसे में विश्वविद्यालय द्वारा कुछ हद तक फीस बढ़ाना न्यायोचित कदम ही है। जिसे वहां के कई छात्र भी सही मानते हैं। लेकिन यह आंदोलन इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि इसमें परदे के पीछे राजनीतिक कार्यकर्ता भूमिका निभा रहे हैं। यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं।

खैर… यह जांच का विषय हो सकता है।देश के प्रसिद्ध अधिवक्ता सांसद डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने इस छात्र आंदोलन के बारे में बहुत ही गहरी बात कही है। उनका मानना है कि जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय को कुछ समय के लिए बंद कर दिया जाए। उनके इस कथन के गहरे निहितार्थ निकल रहे हैं। स्वामी के संकेत को विस्तार से समझना हो तो एक बार जेएनयू की गतिविधियों का अध्ययन करना चाहिए। फिर वह सब सामने आ जाएगा जो वहां होता है। कहा जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जमकर राजनीति की जाती रही है। देश के जो शिक्षा केन्द्र राजनीति के केन्द्र बनते जा रहे हैं, उन पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है।

वर्तमान में जिस प्रकार से जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय का आंदोलन चल रहा है, उसे छात्र आंदोलन कहना न्याय संगत नहीं होगा। क्योंकि, यह विशुद्ध राजनीतिक आंदोलन है। फीस बढ़ोतरी का विरोध तो मात्र बहाना है। इस आंदोलन के समर्थन में देश की संसद में कांग्रेस और वामपंथी दलों की ओर से आवाज उठाई गई। इससे यही संदेश जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जो देश विरोधी नारे लगाए गए, उनके प्रति इन राजनीतिक दलों के समर्थन का ही भाव रहा होगा। इतना ही नहीं, जब भारत तेरे टुकड़े होंगे और हमें चाहिए आजादी जैसे नारे लगाए गए थे, तब भी कांग्रेस और वाम दलों ने खुलेआम समर्थन किया था। ऐसे में सवाल यह उठता है कि कहीं यही दोनों दल छात्रों को आंदोलन करने के लिए तो नहीं उकसा रहे? अगर यह सही है तो फिर केन्द्र सरकार को दोष देना सही नहीं कहा जा सकता।

जब से देश में राजनीतिक सत्ता का परिवर्तन हुआ है, तब से ही देश में उन संस्थानों की सक्रियता दिखाई देने लगी है, जो भारत के बारे में भ्रम का वातावरण बनाने में सहायक हो सकते हैं। चाहे वह शहरी नक्सलवाद को प्रायोजित करने वाले कथित बुद्धिजीवियों की संस्था हो या फिर उनके विचार को अंगीकार करने वाली ही संस्थाएं क्यों न हों। सभी केन्द्र सरकार का विरोध करने के लिए आगे आ रहे हैं। इस विश्वविद्यालय में पढ़ाई करने वाले छात्र कभी भारतीय सेना द्वारा की जाने वाली आतंकियों के विरोध में कार्यवाही पर सवाल उठाते दिखाई देते हैं तो कभी अनुच्छेद 370 को हटाने का विरोध करते हैं। चार वर्ष पूर्व जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में छात्र संघ की उपाध्यक्ष रहीं शेहला राशिद ने भारतीय सेना के विरोध में जमकर भड़ास निकाली थी, जबकि सेना की ओर से स्पष्ट कहा गया था कि ऐसा कुछ भी नहीं है। इससे समझ में आ सकता है कि इस विश्वविद्यालय में कौन-सा पाठ पढ़ाया जाता है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Continue Reading

Top News

देश की युवा पीढ़ी में विदेशों के प्रति रुचि बढ़ी

—गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है

Published

मनोज ज्वाला

एक मीडिया संस्थान के सर्वेक्षण के अनुसार हमारे देश के पढ़े-लिखे और शहरी नौजवानों में से आधे से अधिक ऐसे हैं, जो अपने देश को पसंद नहीं करते। वे विदेशों में जाकर बस जाना चाहते हैं। लगभग दो साल पहले के उक्त सर्वेक्षण के मुताबिक उनमें से 75 फीसदी युवाओं का कहना था कि वे बे-मन और मजबूरीवश भारत में रह रहे हैं। 62.08 फीसदी युवतियों और 66.01 फीसदी युवाओं का मानना था कि भारत  में उनका भविष्य सुरक्षित नहीं है। क्योंकि, यहां अच्छे दिन आने की संभावना कम है। उनमें से 50 फीसदी का मानना था कि भारत में किसी महापुरुष का अवतरण होगा, तभी हालात सुधर सकते हैं, अन्यथा नहीं।

40 फीसदी युवाओं का मानना था कि उन्हें अगर इस देश का प्रधानमंत्री बना दिया जाए, तो वे पांच साल में इस देश का कायापलट कर देंगे।अखबार का वह सर्वेक्षण आज भी बिल्कुल सही लगता है। अगर व्यापक स्तर पर सर्वेक्षण किया जाता, तो देश छोड़ने को तैयार युवाओं का प्रतिशत और अधिक दिखता। वह सर्वेक्षण तो सिर्फ शहरों तक सीमित था। अपने देश में गांवों पर भी तेजी से शहर छाते जा रहे हैं। गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है। गौर कीजिए कि देश छोड़ने को तैयार वे युवा पढ़े-लिखे हैं और शहरों में पले-बढ़े हैं। वे किस पद्धति से किस तरह के विद्यालयों में क्या पढ़े-लिखे हैं और किस रीति-रिवाज से कैसे परिवारों में किस तरह से पले-बढ़े हैं, यह ज्यादा गौरतलब है।

विद्यालय सरकारी हों या गैर सरकारी, सभी में शिक्षा की पद्धति एक है और वह है मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा पद्धति। भारतीयता विरोधी इसी शिक्षा पद्धति को सरकारी मान्यता प्राप्त है। सरकार का पूरा तंत्र इसी तरह की शिक्षा के विस्तार में लगा हुआ है। वैसे अंग्रेजी माध्यम वाले विद्यालय सबसे अच्छे माने जाते हैं और गैर-सरकारी निजी क्षेत्र के अधिकतर विद्यालय अंग्रेजी माध्यम के ही हैं। शहरों में ऐसे ही विद्यालयों की भरमार है और जिन युवाओं के बीच उक्त मीडिया संस्थान ने उपरोक्त सर्वेक्षण किया उनमें से सर्वाधिक युवा ऐसे ही तथाकथित ‘उत्कृष्ट’ विद्यालयों से पढ़े-लिखे हुए हैं। अब रही बात यह कि इन विद्यालयों में आखिर शिक्षा क्या और कैसी दी जाती है, तो यह इन युवाओं की उपरोक्त सोच से ही स्पष्ट है।

जाहिर है, उन्हें शिक्षा के नाम पर ऐसी-ऐसी डिग्रियां दी जाती हैं, जिनके कारण वे महात्वाकांक्षी, स्वार्थी बनकर असंतोष, अहंकार, खीझ, पलायन एवं हीनता-बोध से ग्रसित हो जाते हैं और कमाने-खाने भर थोड़े-बहुत हुनर हासिल कर स्वभाषा व स्वदेश के प्रति ‘नकार’ भाव से पीड़ित होकर विदेश चले जाते हैं।थॉमस विलिंग्टन मैकाले कोई शिक्षा-शास्त्री नहीं था। वह एक षड्यंत्रकारी था, जिसने भारत पर ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जड़ें जमाने की नीयत से भारतीय शिक्षा-पद्धति की जड़ें उखाड़कर मौजूदा शिक्षा-पद्धति को प्रक्षेपित किया था। जो आज भी उसी रूप में कायम है। 20 अक्टूबर 1931 को लंदन के रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ फौरन अफेयर्स के मंच से महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘अंग्रेजी शासन से पहले भारत की शिक्षा-व्यवस्था इंग्लैण्ड से भी अच्छी थी।’ उस पूरी व्यवस्था को सुनियोजित तरीके से समूल नष्ट कर देने के पश्चात ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जरूरतों के मुताबिक उसके रणनीतिकारों ने लम्बे समय तक बहस-विमर्श कर के मैकाले की योजनानुसार यह शिक्षा-पद्धति लागू की थी।

मैकाले ने ब्रिटिश पार्लियामेंट की शिक्षा समिति के समक्ष कहा था ‘हमें भारत में ऐसा शिक्षित वर्ग तैयार करना चाहिए, जो हमारे और उन करोड़ों भारतवासियों के बीच जिन पर हम शासन करते हैं, उन्हें समझाने-बुझाने का काम कर सके। जो केवल खून और रंग की दृष्टि से भारतीय हों, किन्तु रुचि, भाषा व भावों की दृष्टि से अंग्रेज हों।’ विदेशों में बस जाने को उतावले भारतीय युवाओं ने पूरी मेहनत व तबीयत से मैकाले शिक्षा-पद्धति को आत्मसात किया है, ऐसा समझा जा सकता है। यहां प्रसंगवश मैकाले के बहनोई चार्ल्स ट्रेवेलियन द्वारा ब्रिटिश पार्लियामेंट की एक समिति के समक्ष ‘भारत में भिन्न-भिन्न शिक्षा-पद्धतियों के भिन्न-भिन्न परिणाम’ शीर्षक से प्रस्तुत किये गए एक लेख का यह अंश भी उल्लेखनीय है कि ‘मैकाले शिक्षा-पद्धति का प्रभाव अंग्रेजी राज के लिए हितकर हुए बिना नहीं रह सकता। हमारे पास उपाय केवल यही है कि हम भारतवासियों को यूरोपियन ढंग की उन्नति में लगा दें। इससे हमारे लिए भारत पर अपना साम्राज्य कायम रखना बहुत आसान और असंदिग्ध हो जाएगा।’ ऐसा ही हुआ। बल्कि, मैकाले की योजना तो लक्ष्य से ज्यादा ही सफल रही।

हमारे देश के मैकालेवादी राजनेताओं ने अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासन की समाप्ति के बाद भी उनकी अंग्रेजी-मैकाले शिक्षा-पद्धति को न केवल यथावत कायम रखा, बल्कि उसे और ज्यादा अभारतीय रंग-ढंग में ढाल दिया। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष लक्षित प्राचीन भारतीय शिक्षा-पद्धति को अतीत के गर्त में डालकर शिक्षा को उत्पादन-विपणन-मुनाफा-उपभोग-केन्द्रित बना देने और उसे नैतिक सांस्कृतिक मूल्यों से विहीन कर देने तथा राष्ट्रीयता के प्रति उदासीन बना देने का ही परिणाम है कि हमारी यह युवा पीढ़ी महज निजी सुख-स्वार्थ के लिए अपने देश से विमुख हो जाना पसंद कर रही है। उसे विदेशों में ही अपना भविष्य दीख रहा है।

माना कि हमारे देश में तरह-तरह की समस्याएं हैं, किन्तु इनसे जूझने और इन्हें दूर करने की बजाय पलायन कर जाने अथवा कोरा लफ्फाजी करने कि हमें प्रधानमंत्री बना दिया जाए तो हम देश को सुंदर बना देंगे, अति महात्वाकांक्षा-युक्त मानसिक असंतुलन का ही द्योत्तक है। लेकिन आधे से अधिक ये शहरी युवा मानसिक रुप से असंतुलित नहीं हैं, बल्कि असल में वे पश्चिम के प्रति आकर्षित हैं। इसके लिए हमारे देश की चालू शिक्षा-पद्धति का पोषण करने वाले हमारे राजनेता ही जिम्मेवार हैं। यह ‘यूरोपियन ढंग की उन्नति’ के प्रति बढ़ते अनावश्यक आकर्षण का परिणाम है। इस मानसिक पलायन को रोकने के लिए जरूरी है कि हम अपने बच्चों को हमारे राष्ट्र की जड़ों से जोड़ने वाली और संतुलित समग्र मानसिक विकास करने वालीप्राचीन भारतीय पद्धति से भारतीय भाषाओं में समस्त ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा देने की सम्पूर्ण व्यवस्था कायम करें।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Continue Reading

Top News

भाई-बहन में प्रेम भाव बढ़ाता है भैया दूज

–बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था

Published

योगेश कुमार गोयल

(भैया दूज, 29 अक्टूबर पर विशेष)

भाई-बहन के दिलों में पावन संबंधों की मजबूती और प्रेमभाव स्थापित करने वाला पर्व है भैया दूज। इस दिन बहनें अपने भाईयों को तिलक लगाकर ईश्वर से उनकी दीर्घायु की कामना करती हैं। कहा जाता है कि इससे भाई यमराज के प्रकोप से बचे रहते हैं। दीपावली के दो दिन बाद अर्थात कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाए जाने वाले इस पर्व को ‘यम द्वितीया’ व ‘भ्रातृ द्वितीया’ के नाम से भी जाना जाता है। बहुत से भाई-बहन सौभाग्य तथा आयुष्य की प्राप्ति के लिए इस दिन यमुना अथवा अन्य पवित्र नदियों में साथ-साथ स्नान भी करते हैं। भैया दूज मनाने के संबंध में कई किवंदतियां प्रचलित हैं। एक कथा यमराज और उनकी बहन यमुना देवी से संबंधित है। बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था। यमुना अपने भाई यमराज से बहुत स्नेह करती थीं और अक्सर उनसे अनुरोध करती रहती थीं कि वे अपने इष्ट-मित्रों सहित उसके घर भोजन के लिए पधारें लेकिन यमराज हर बार उसके निमंत्रण को किसी न किसी बहाने से टाल जाते। कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमुना ने यमराज को एक बार फिर भोजन के लिए आमंत्रित किया।

उस समय यमराज ने विचार किया कि मैं तो अपने कर्त्तव्य से बंधा सदैव प्राणियों के प्राण ही हरता हूं। इसलिए इस चराचर जगत में कोई भी मुझे अपने घर नहीं बुलाना चाहता। लेकिन बहन यमुना तो मुझे बार-बार अपने घर आमंत्रित कर रही है। इसलिए अब तो उसका निमंत्रण स्वीकार करना ही चाहिए।यमराज को अपने घर आया देख यमुना की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने भाई का खूब आदर-सत्कार करते हुए उनके समक्ष नाना प्रकार के व्यंजन परोसे। बहन के आतिथ्य से यमराज बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे कोई वर मांगने को कहा। इस पर यमुना ने उनसे अनुरोध किया कि आप प्रतिवर्ष इसी दिन मेरे घर आकर भोजन करें और मेरी तरह जो भी बहन इस दिन अपने भाई का आदर-सत्कार करे, उसे तुम्हारा भय न रहे। यमराज ने बहन यमुना को उसका इच्छित वरदान दे दिया। ऐसी मान्यता है कि उसी दिन से ‘भैया दूज’ का पर्व मनाया जाने लगा। भैया दूज के संबंध में और भी कई कथाएं प्रचलित हैं। ऐसी ही एक कथा के अनुसार, एक ब्राह्मण की दो संतानें थी।

एक पुत्र एवं एक पुत्री। पुत्री बहुत समझदार एवं गुणवती थी। वह अपने भाई से जी-जान से प्यार करती थी। एक दिन उसका भाई उससे मिलने उसकी ससुराल पहुंचा। उस समय वह सूत कातने में व्यस्त थी। अतः उसे भाई के आने का पता ही न चल सका। भाई भी बिना कुछ बोले चुपचाप एक ओर बैठा रहा। जब थोड़ी देर बाद बहन की नजर उस पर पड़ी तो भाई को अपने घर आया देख उसे बेहद खुशी हुई। उसने भाई का भरपूर आदर-सत्कार किया। अगले दिन भाई को वापस लौटना था। अतः रास्ते के लिए वह आटे के पकवान बनाने के उद्देश्य से चक्की में आटा पीसने लगी। अनजाने में चक्की में बैठा सांप भी आटे के साथ पिस गया। उसी आटे के पकवान एक पोटली में बांधकर उसने भाई को रास्ते में खाने के लिए देकर विदा किया। भाई के घर से जाने के बाद जब उसे यह मालूम हुआ कि आटे में सांप पिस गया है तो अपने पुत्र को पालने में ही सोता छोड़कर वह अपने भाई के प्राणों की रक्षा के लिए दौड़ी। कुछ दूर जाने पर उसे एक पेड़ की छांव में अपना भाई सोता दिखाई दिया। तब तक उसने पोटली में से कुछ भी नहीं खाया था। उसने भगवान का शुक्रिया अदा किया और पोटली उठाकर दूर फेंक दी तथा भाई के साथ मायके की ओर चल दी।

रास्ते में उसने देखा कि भारी-भारी शिलाएं आकाश में उड़ रही हैं। उसने एक राहगीर से इस रहस्य के बारे में जानना चाहा तो उसने बताया कि जो बहन अपने भाई पर कभी नाराज न होती हो और उसे दिलो-जान से चाहती हो, उस भाई की शादी के समय ये शिलाएं उसकी छाती पर रखी जाएंगी। थोड़ी दूर चलने पर उसे नाग-नागिन दिखाई दिए। नाग ने बताया कि ये शिलाएं जिस व्यक्ति की छाती पर रखी जाएंगी, हम उसे डंस लेंगे। जब बहन ने इस विपत्ति से बचने का उपाय पूछा तो नाग-नागिन ने बताया कि अगर भाई के विवाह के समय उसके सभी कार्य बहन स्वयं करे, तभी भाई की जान बच सकती है।जब उसके भाई के विवाह के लग्न का शुभ मुहूर्त आया तो वह भाई को पीछे धकेलती हुई स्वयं ही लग्न चढ़वाने के लिए आगे हो गई और घोड़ी पर भी स्वयं चढ़ गई। परिवारजन और संबंधी उसके इस विचित्र व्यवहार से हैरान तथा क्रोधित थे। उसके घोड़ी पर चढ़ते ही शिलाएं उड़ती-उड़ती आई लेकिन घोड़ी पर किसी पुरूष की जगह एक महिला को बैठी देख वापस मुड़ गई। जब सुहागरात का समय आया तो वह भाई को पीछे कर खुद भाभी के साथ सोने उसके कमरे में चली गई।

परिवार के सभी सदस्य तथा सभी रिश्तेदार उसके इस अजीबोगरीब व्यवहार से बेहद आश्चर्यचकित और खफा थे। उन्हें उस पर गुस्सा तो बहुत आ रहा था लेकिन उसके जिद के समक्ष सभी विवश थे। सुहागरात पर नियत समय पर नाग-नागिन उसके भाई को डंसने कमरे में पहुंच गए लेकिन उसने नाग-नागिन को मारने की सारी तैयारी पहले ही कर रखी थी। आखिरकार उसने नाग-नागिन का काम तमाम कर दिया। उसके बाद वह निश्चिंत होकर सो गई। सुबह होने पर सभी मेहमानों को विदा करने के बाद परिवार वालों ने सोचा कि अब इस बला को भी कुछ बचा-खुचा देकर यहां से चलता कर दिया जाए लेकिन नींद से जागने पर जब उसने पूरी घटना के बारे में सब को विस्तार से बताया कि किस प्रकार वह अपने बच्चे को पालने में ही सोता छोड़कर दौड़ी-दौड़ी भाई के प्राण बचाने के लिए उसके पीछे चली आई और सभी को नाग-नागिन के मृत शरीर दिखाए तो सभी की आंखों में आंसू आ गए।

भाई के प्रति उसका असीम प्यार तथा समर्पण भाव देखकर उसके प्रति सभी का हृदय श्रद्धा से भर गया।भाई-भाभी तथा माता-पिता ने उसे ढेर सारे उपहारों से लादकर बड़े मान-सम्मान के साथ खुशी-खुशी ससुराल से विदा किया। भाई-बहन के बीच इसी प्रकार के पावन संबंध, प्रेमभाव तथा उनके दिलों में आपसी संबंधों को मजबूत बनाने के लिए ही ‘भैया दूज’ पर्व मनाया जाता है।

(लेखक स्तंभकार हैं।)

Continue Reading

Featured Post

Top News2 वर्ष पूर्व

रॉबर्ट वाड्रा की गिरफ्तारी पर 5 फरवरी तक जारी रहेगी रोक

---हाईकोर्ट जस्टिस मनोज कुमार गर्ग की कोर्ट ने अधिवक्ता भंवरसिंह मेड़तिया के निधन के बाद कोर्ट में 3.45 बजे रेफरेंस...

Top News2 वर्ष पूर्व

बिजनौर कोर्ट शूटकांड : हाईकोर्ट ने डीजीपी और अपर मुख्य सचिव (गृह) को किया तलब

---दरअसल, बिजनौर में 28 मई को नजीबाबाद में हुई बसपा नेता हाजी अहसान व उनके भांजे शादाब की हत्या के...

Top News2 वर्ष पूर्व

निर्भया केस: दोषी अक्षय की पुनर्विचार याचिका खारिज, फांसी की सजा बरकरार

---सुप्रीम कोर्ट ने कहा-पुनर्विचार याचिका में कोई नए तथ्य नहीं, इसलिए ख़ारिज होने योग्य

Top News2 वर्ष पूर्व

कतर टी-10 लीग पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की आईसीसी ने शुरु की जांच

--उल्लेखनीय है कि कतर टी-10 लीग का आयोजन सात से 16 दिसम्बर तक कतर क्रिकेट संघ ने किया था

Top News2 वर्ष पूर्व

बिजनौर कोर्ट रूम में हुई हत्या मामले में चौकी प्रभारी समेत 18 पुलिसकर्मी सस्पेंड

---एसपी ने बताया कि कोर्ट में दिनदहाड़े कुख्यात बदमाश शाहनवाज की हत्या के बाद जजी परिसर में सुरक्षा की पोल...

Recent Post

Trending

Copyright © 2018 Chautha Khambha News.

Web Design BangladeshBangladesh online Market