Connect with us

Top News

वे पन्द्रह दिन

जब मैं कलकत्ता आया, उसी दिन मैंने चटगांव में आई हुई बाढ़ का समाचार पढ़ा था

Published

on

आज सोमवार होने के बावजूद कलकत्ता शहर से थोड़ा बाहर स्थित सोडेपुर आश्रम में गांधीजी की सुबह वाली प्रार्थना में अच्छी खासी भीड़ हैं. पिछले दो-तीन दिनों से कलकत्ता शहर में शान्ति बनी हुई हैं. गांधीजी की प्रार्थना का प्रभाव यहां के हिन्दू नेताओं पर दिखाई दे रहा था. ठीक एक वर्ष पहले, मुस्लिम लीग ने कलकत्ता शहर में हिंदुओं का जैसा रक्तपात किया था, क्रूरता और नृशंसता का जैसा नंगा नाच दिखाया था, उसका बदला लेने के लिए हिन्दू नेता आतुर हैं. लेकिन गांधीजी के कलकत्ता में होने के कारण यह कठिन हैं. और इसीलिए अखंड बंगाल के ‘प्रधानमंत्री’ शहीद सुहरावर्दी की भी इच्छा हैं कि गांधीजी कलकत्ता में ही ठहरें.

इसका कारण भी साफ़ हैं. अब यह स्पष्ट हो चला हैं कि विभाजन के पश्चात कलकत्ता हिन्दुस्तान में रहेगा और ढाका पाकिस्तान में जाएगा. हिन्दुस्तान वाले बंगाल के नए मुख्यमंत्री भी तय हो चुके हैं. और अगले पांच दिनों में पश्चिम बंगाल में मुस्लिम लीग का शासन खत्म होने जा रहा हैं. इसीलिए, कलकत्ता के मुसलमानों की रक्षा हो सके, इसलिए सुहरावर्दी को गांधीजी कलकत्ता में ही चाहिए हैं.

आज सुबह की प्रार्थना में गांधीजी ने थोड़ा अलग ही विषय लिया. उन्होंने कहा, “आज मैं मेरे सामने उपस्थित किए गए प्रश्नों का उत्तर देने वाला हूं. इसमें से मुझ पर एक आरोप यह है कि ‘मेरी प्रार्थना सभाओं में महत्त्वपूर्ण, धनवान नेताओं को ही स्थान मिलता है, जबकि सामान्य व्यक्ति को आगे स्थान नहीं मिलता’. चूंकि कल रविवार था, इसलिए आश्रम में भारी भीड़ हो गई थी. संभवतः इसलिए ऐसा हुआ होगा. मैं उन सभी लोगों से हृदयपूर्वक बिनती करता हूं कि वे कृपया धैर्य रखें. मैंने अपने कार्यकर्ताओं से कह दिया है कि बिना किसी भेदभाव के सभी लोगों को अंदर आने दें.”

“जब मैं कलकत्ता आया, उसी दिन मैंने चटगांव में आई हुई बाढ़ का समाचार पढ़ा था. इस भीषण बाढ़ में न जाने कितने लोगों की मृत्यु हुई हैं. संपत्ति का कितना नुकसान हुआ यह अभी ठीक से पता नहीं चला है. परन्तु ऐसी विपत्ति के समय हमें पश्चिम या पूर्व, पाकिस्तान अथवा हिन्दुस्तान जैसी बातों का विचार न करते हुए, मदद के लिए तुरंत जाना चाहिए. चटगांव की बाढ़ यानी सम्पूर्ण बंगाल पर आई हुई आपदा है. ‘ऑल बंगाल रिलीफ कमेटी’ बनाकर उसमें सभी को मदद करनी चाहिए, ऐसा मैं आप सभी से अनुरोध करता हूं. मैं पूरे दिल से चटगांव के बाढ़ग्रस्त लोगों के साथ हूं.”

“अनेक पत्रकार मुझसे पूछ रहे हैं कि स्वतन्त्र भारत में गवर्नर, मंत्री एवं अन्य महत्वपूर्ण पदों पर मैं किसे नियुक्त करने जा रहा हूं? मानो मैं काँग्रेस वर्किंग कमेटी का सदस्य ही हूं और मैं उनके निर्णयों को प्रभावित कर सकता हूं…! मैं तो ऐसा मानता हूं कि मैं कांग्रेसियों के ह्रदय में बसता हूं. यदि मैंने अपनी मर्यादाओं का उल्लंघन किया तो मैं काँग्रेस कार्यकर्ताओं के मन से उतर जाऊंगा. इसलिए किसी भी नियुक्ति में कानूनन मेरा कोई अधिकार नहीं है, परन्तु नैतिकता की दृष्टि से अधिकार है.”

“क्या आप सभी इस बात से सहमत हैं कि दोनों ही तरफ के लोगों और नेताओं को पूर्व एवं पश्चिम बंगाल के विभिन्न इलाकों में जाकर शान्ति-सद्भाव का आव्हान करना चाहिए, क्योंकि अब झगड़ा समाप्त हो चुका है? मेरा उत्तर है, ‘हां’. यदि सभी नेतागण दिल से एकजुट हो जाएं तो सभी प्रश्न हल हो जाएंगे. और इसीलिए मैं कहता हूं कि मुसलमानों का प्रतिकार मत करो. ‘आँख के बदले आँख’ की नीति एक जंगली उपाय है. अहिंसा ही सभी प्रश्नों का उत्तर है…!”

____ ____ ____ ____

कराची स्थित ब्रिटिश शैली में निर्मीत भव्य असेम्बली भवन. एक राजमहल जैसी दिव्य दिखने वाली विशाल इमारत.

सोमवार, सुबह ठीक ९ बजकर ५५ मिनट पर नवनिर्मित पाकिस्तान के पितृपुरुष अर्थात कायदे-आज़म जिन्ना, एक सजाई हुई शाही बग्घी से इस इमारत के पोर्च में उतरे. उनके स्वागत हेतु, कड़क प्रेस किए हुए गणवेश में कुछ अधिकारी एवं लियाकत अली खान जैसे कुछ चुनिंदा लोग मौजूद हैं. ठीक दस बजे पाकिस्तान की संविधान सभा की पहली बैठक आरम्भ हुई और इस बैठक के अस्थायी अध्यक्ष है, जोगेन्द्र नाथ मण्डल.

जोगेंद्रनाथ मण्डल ने बैठक की शुरुआत की, “अध्यक्ष पद के चुनाव हेतु जो प्रस्ताव कल की बैठक में रखा गया था, उसके पैराग्राफ क्रमांक २ का पालन करते हुए मैं घोषणा करता हूं कि इस पद के लिए मुझे कुल सात नामांकन पत्र कायदे आज़म जिन्ना के समर्थन में प्राप्त हुए हैं. इन सम्माननीय सदस्यों के नाम इस प्रकार हैं —
1. गयासुद्दिन पठान
2. हमीदुल हक चौधरी
3. अब्दुल कासिम खान
4. मान्यवर लियाकत अली खान
5. ख्वाजा नझिमुद्दीन
6. मान्यवर एम. के. खुहरो
7. मौलाना शब्बीर अहमद उस्मानी

उपरोक्त सभी सातों मान्यवर सदस्यों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया है. अन्य किसी भी व्यक्ति का नामांकन प्राप्त नहीं हुआ है, इसलिए मैं मान्यवर कायदे आज़म जिन्ना को पाकिस्तान की संविधान सभा का अध्यक्ष घोषित करता हूं. अब मैं कायदे आज़म साहब से अनुरोध करता हूं कि वे कृपया अपना आसन ग्रहण करें.”

लियाकत अली खान और सरदार अब्दुल रब खान निश्तार, दोनों कायदे आज़म जिन्ना को अध्यक्ष के आसन तक ले गए. तालियों की गडगडाहट के बीच मोहम्मद अली जिन्ना ने अपना आसन ग्रहण किया.

पूर्वी बंगाल के लियाकत अली खान ने अध्यक्ष पद पर आसीन जिन्ना का गौरवगान करते हुए पहला भाषण दिया. उन्होंने जिन्ना की मुक्त कंठ से प्रशंसा की और उनके साथ पिछले ग्यारह वर्षों से किए गए कामों का उल्लेख भी किया. उन्होंने कहा कि, “यह एक ऐतिहासिक आश्चर्य ही है कि बिना किसी रक्तपात के, बिना किसी रक्तरंजित क्रांति के, आपके नेतृत्व में हमने अपना पाकिस्तान हासिल कर लिया है.”

लियाकत अली के बाद पूर्वी बंगाल की काँग्रेस पार्टी के किरण शंकर रॉय ने भी काँग्रेस पार्टी की ओर से जिन्ना का अभिनन्दन किया. उन्होंने पंजाब और बंगाल के विभाजन संबंधी अपनी आपत्तियां और नापसंद खुलकर ज़ाहिर कर दीं. साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि चूंकि यह निर्णय काँग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों की सहमति से हुआ है, इसलिए हमारी पूर्ण निष्ठा इस देश के प्रति समर्पित हैं.

रॉय के बाद सिंध प्रांत से आए एम. ए. खुहरो का भाषण हुआ. फिर जोगेंद्रनाथ मण्डल बोले. पूर्वी बंगाल के अब्दुल कासिम खान, और पश्चिमी पंजाब की बेगम जहांआरा शाहनवाज के बोलने के पश्चात सबसे अंत में कायदे आज़म जिन्ना बोलने के लिए खड़े हुए. इस समय तक दोपहर के बारह बज चुके थे. जिन्ना अत्यंत सपाट, भावरहित चेहरे के साथ बोल रहे थे, मानो वो किसी अदालत में सधी, सरल बहस कर रहे हो…!

उन्होंने कहा, “इस असेम्बली में उपस्थित सभी स्त्री-पुरुषों… आपने मुझे जो जिम्मेदारी दी है मैं उसके लिए आपका आभार व्यक्त करता हूं. जिस पद्धति से हमने पाकिस्तान का निर्माण कर लिया है, इतिहास में ऐसा कोई भी दूसरा उदाहरण नहीं है. इस कॉन्स्टीट्युएंट असेम्बली के दो प्रमुख उद्देश्य हैं. पहला, यह कि हमें इसके माध्यम से अपने पाकिस्तान का सार्वभौम संविधान तैयार करना है. और दूसरा यह कि हमें एक सार्वभौम, सम्पूर्ण राष्ट्र के रूप में अपने पैरों पर खड़े होना है. हमारा पहला उद्देश्य क़ानून और व्यवस्था कायम करना है. रिश्वतखोरी और कालाबाजारी को पूरी तरह से बन्द करना होगा. मुझे जानकारी है कि सीमा के दोनों तरफ, पंजाब और बंगाल का विभाजन स्वीकार ना करने वाले अनेक लोग होंगे. परन्तु कम से कम मुझे तो इसके अलावा कोई दूसरा विकल्प समझ में नहीं आता. अब चूंकि यह निर्णय हो ही चुका है, तो हम इसे पूरी व्यवस्था और समझदारी के साथ लागू करें.”

“आप चाहे किसी भी धर्म के हों, पाकिस्तान में आप अपने श्रद्धा स्थानों और पूजास्थलों में जाने के लिए मुक्त हैं. आप मंदिर जाएं, अथवा मस्जिद जाएं, आपके ऊपर कोई बंधन नहीं होगा. पाकिस्तान में सर्वधर्म समभाव है और रहेगा. हिन्दू, मुस्लिम, रोमन कैथोलिक, पारसी ये सभी लोग पाकिस्तान में पूर्ण सदभाव के साथ, आपस में मिलजुलकर रहेंगे. धर्म को लेकर किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा.”

सभागृह में बैठे हुए मुस्लिम लीग के सदस्य मन ही मन यह विचार कर रहे थे कि, ‘यदि वास्तव में ऐसा ही है, तो फिर हमने पाकिस्तान का निर्माण क्यों और किसके लिए किया हैं….?’

____ ____ ____ ____

सुबह के ग्यारह बजे हैं. आज सूर्य बहुत आग उगल रहा है. बारिश के कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं. आकाश एकदम स्वच्छ है. सप्ताह भर पहले अच्छी बारिश हुई थी, इसलिए आसपास का वातावरण हरा-भरा है.

कलात…. बलूचिस्तान के प्रमुख शहरों में से एक. क्वेटा से केवल नब्बे मील दूरी पर स्थित सघन जनसंख्या वाला यह शहर है. मजबूत दीवारों के भीतर बसे हुए इस शहर का इतिहास दो-ढाई हजार वर्ष पुराना है. कुजदर, गंदावा, नुश्की, क्वेटा जैसे शहरों में जाना हो तो कलात शहर को पार करके ही जाना पड़ता था. इसीलिए इस शहर का एक विशिष्ट सामरिक महत्त्व भी था. बड़ी-बड़ी दीवारों के अंदर बसे इस शहर के मध्यभाग में एक बड़ी सी हवेली है. इस हवेली के, (गढी के) जो खान हैं, उनका ‘राजभवन’ यह बलूचिस्तान की राजनीति का प्रमुख केन्द्र है. इस राजभवन में मुस्लिम लीग, ब्रिटिश सरकार के रेजिडेंट और कलात के मीर अहमद यार खान की एक बैठक चल रही है. इनके बीच एक संधि पर हस्ताक्षर होने वाले हैं, जिसके माध्यम से आज दिनांक से, अर्थात ११ अगस्त १९४७ से, कलात एक स्वतन्त्र देश के रूप में काम करने लगेगा.

ब्रिटिश राज्य व्यवस्था में बलूचिस्तान के कलात का एक विशेष स्थान पहले से ही है. सारी ५६० रियासतों और रजवाड़ों को अंग्रेजों ‘अ’ श्रेणी में रखा है, जबकि सिक्किम, भूटान, और कलात को उन्होंने ‘ब’ श्रेणी की रियासत का दर्जा दिया हुआ है. अंततः दोपहर एक बजे संधिपत्र पर तीनों के हस्ताक्षर हो गए. इस संधि के द्वारा यह घोषित किया गया कि कलात अब भारत का राज्य नहीं रहा, बल्कि यह एक स्वतन्त्र राष्ट्र है. मीर अहमद यार खान इस देश के पहले राष्ट्रप्रमुख हैं.

कलात के साथ ही मीर अहमद यार खान साहब का पूर्ण वर्चस्व इस इलाके के पड़ोस में स्थित लास बेला, मकरान और खारान क्षेत्रों पर भी हैं. इसलिए भारत और पाकिस्तान का निर्माण होने से पहले ही, इन सभी भागों को मिलाकर, मीर अहमद यार खान के नेतृत्व में बलूचिस्तान राष्ट्र का निर्माण हो गया हैं…!

____ ____ ____ ____

‘ऑल इण्डिया रेडियो’, दिल्ली का मुख्यालय… ए. आई. आर, की प्रेस नोट सभी अखबारों को भेजी जा चुकी है. ए. आई. आर. के मुख्यालय में अच्छी खासी व्यस्तता है. चौदह और पंद्रह अगस्त की तैयारियां जोरशोर से चल रही हैं. चौदह तारीख की रात का आंखों देखा हाल, ऑल इण्डिया रेडियो को ही करना है. उसका पूरा कार्यक्रम तैयार हो चुका है.

१४ अगस्त

रात को ८.१० से लेकर ८.४५ तक : इण्डिया गेट पर राष्ट्रध्वज फहराया जाएगा. उसका आंखों देखा हाल अंग्रेजी में प्रसारित किया जाएगा.

रात को १०.३० से ११.०० तक : श्रीमती सरोजिनी नायडू का सन्देश अंग्रेजी में प्रसारित किया जाएगा. उसके बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू का सन्देश अंग्रेजी में प्रसारित होगा. फिर इन दोनों संदेशों का अनुवाद हिन्दी में प्रसारित किया जाएगा. यह प्रसारण 17.84 MHz और 21.51 MHz बैंड पर किया जाएगा.

रात्री ११.०० से १२.३० तक संविधान सभा भवन में चलने वाले सत्ता हस्तांतरण का आंखों देखा हाल भी प्रसारित किया जाएगा. यह प्रसारण 17.76 MHz और 21.51 MHz बैंड पर किया जाएगा.

____ ____ ____ ____

दिल्ली में स्थित एक बड़ा सा बंगला. गौहत्या विरोधी परिषद् का सम्मेलन यहां पर जारी है. इसकी अध्यक्षता कर रहे हैं, जिन्ना का बंगला खरीदने वाले, सेठ रामकृष्ण डालमिया. इस बैठक में यह प्रस्ताव पारित किया गया है कि स्वतन्त्र भारत की पहली सरकार से यह अनुरोध किया जाएगा, कि ‘गौवंश की रक्षा करना, गौवंश की उत्तम देखरेख करना यह भारतीयों का मूलभूत अधिकार होना चाहिए. प्रतिवर्ष करोड़ों की संख्या में गायों का क़त्ल हो रहा है, वह पूर्णरूप से बंद होना चाहिए. देश के विकास में गौवंश की बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका है.’

रामकृष्ण डालमिया जी का विचार है कि औरंगजेब रोड पर स्थित जिन्ना के इस बंगले को ही गौहत्या विरोधी आन्दोलन का मुख्य केंद्रबिंदु बनाया जाए, इसका प्रतीकात्मक सन्देश भी अच्छा रहेगा.

____ ____ ____ ____

कराची.

भोजन के पश्चात अगले सत्र में, पाकिस्तान की संविधान सभा बैठक में कुछ ख़ास काम नहीं हुआ. केवल पकिस्तान के राष्ट्रध्वज के बारे में निर्णय लिया गया. इसके अनुसार पाकिस्तान के राष्ट्रध्वज में एक चौथाई सफ़ेद और तीन चौथाई रंग हरा होगा, तथा इसमें चाँद-तारे की डिजाइन बनी हुई होगी. यह प्रस्ताव संविधान सभा के सामने रखा गया और एकमत से पारित भी हो गया.

____ ____ ____ ____

मद्रास.

यहां पर जस्टिस पार्टी की बैठक जारी है. यह पार्टी ३१ वर्ष पुरानी है, लेकिन आज भी यह ब्राह्मणवाद विरोधी राजनीति ही करती है. इसके अध्यक्ष पी. टी. राजन ने इस बैठक में भारत की स्वतंत्रता का स्वागत करने संबंधी प्रस्ताव रखा, जो बहुमत से पारित किया गया. यह भी निश्चित किया गया कि, पन्द्रह अगस्त के दिन मद्रास राज्य में स्वतंत्रता दिवस उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाएगा.

इसके साथ ही यह प्रस्ताव भी पारित किया गया कि भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद तत्काल ही भाषावार प्रान्तों की रचना करने की मांग रखी जाएगी.

____ ____ ____ ____

लॉर्ड माउंटबेटन का आज का दिन बेहद व्यस्तता भरा रहा. सुबह सवेरे उठते ही उन्होंने अपने शयनकक्ष में लगे बड़े से कैलेण्डर की तरफ हसरत भरी निगाहों से देखा. केवल चार दिन… ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन रहे भारत से अपना बोरिया-बिस्तर समेटने का समय अब केवल चार दिन के लिए ही बचा है…!

सुबह लॉर्ड साहब की, डॉक्टर कुंवर सिंह और सरदार पणिक्कर के साथ एक बैठक हुई. यह बैठक बहुत महत्त्वपूर्ण थी. क्योंकि इससे पहले भोपाल के नवाब की बातों में आकर बीकानेर के महाराज ने भी उनकी रियासत को भारत में विलीन करने की दिशा में अनिच्छा ज़ाहिर की थी. लेकिन माउंटबेटन को ऐसी छोटी-छोटी स्वतन्त्र रियासतें नहीं चाहिए थीं. क्योंकि जितने ज्यादा स्वतन्त्र राज्य रहते, ब्रिटिश सत्ता का सिरदर्द उतना ही बढ़ जाता. इसीलिए इस बैठक का बहुत महत्त्व था.

इस बैठक के बाद माउंटबेटन ने डॉक्टर कुंवर सिंह और सरदार पणिक्कर को ठीक से पूरी स्थिति समझाई कि ‘यदि बीकानेर रियासत पाकिस्तान के साथ विलीन की गयी, तो किस प्रकार की अनिश्चितता और अशांति निर्माण हो सकती है’. इस मुलाक़ात के बाद माउंटबेटन को विश्वास हो गया कि संभवतः अब बीकानेर रियासत के विलीनीकरण का प्रश्न समाप्त हो ही जाएगा.

दोपहर को ही माउंटबेटन ने दख्खन के हैदराबाद रियासत के नवाब को पत्र लिख दिया कि ‘हैदराबाद स्टेट के भारत में शामिल होने संबंधी ऑफर’ अभी दो महीने और बढ़ाई जा रही है.

____ ____ ____ ____

बंगाल के पूर्व में स्थित जेस्सोर, खुलना, राजशाही, दीनाजपुर, रंगपुर, फरीदपुर, बारीसाल, नदिया जैसे गांवों में शाम के साढ़े पांच बजे दिया बत्ती का और रोशनी करने का समय हो चुका हैं. अंधियारी शाम का यह उदास वातावरण, हल्की बारिश और संभावित दंगों का भय… इनके कारण समूचे वातावरण में एक मलिनता सी छाई हुई हैं. ये सभी गांव हिन्दू बहुल थे, परन्तु पिछले वर्ष ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के बाद से ही यहां मुस्लिम लीग के गुंडे बेहद आक्रामक हो चले हैं. इन्होंने हिन्दू डॉक्टरों, प्राध्यापकों और जमींदारों को पश्चिम बंगाल भाग जाने का आदेश दिया हुआ हैं.

बारिसाल… साठ-सत्तर हजार जनसंख्या वाला छोटा सा शहर. इसे पूर्व का वेनिस भी कहा जाता हैं. ‘कीर्तनखोला’ नदी के किनारे पर बसा हुआ यह शहर, पूरी तरह से हिन्दू संस्कृति में रचा-बसा हैं. बारिसाल पर तो बंगाल के नवाब का शासन भी संभव नहीं हुआ था. अंग्रेजों द्वारा बंगाल को अधीन करने से पहले यहां के अंतिम राजा थे, राजा रामरंजन चक्रवर्ती. मुकुंद दास नामक कविराज द्वारा निर्मित भव्य काली मंदिर और हिन्दू राजाओं द्वारा निर्माण किया गया विशाल दुर्गा सरोवर… बारिसाल की विशिष्टता हैं. ऐसे हिन्दू चेहरे-मोहरे-संस्कृति वाले बारिसाल से हिन्दुओं को मुसलमान, जबरन बाहर निकाल रहे हैं.

पता नहीं बारिसाल और समूचे पूर्वी बंगाल के हिन्दुओं ने कौन से पाप किए हैं..?

____ ____ ____ ____

दोपहर के साढ़े चार बज रहे हैं. धूप अब उतरने लगी है. सोडेपुर आश्रम में थोड़ी व्यस्तता है, क्योंकि अभी गांधीजी कलकत्ता के दंगाग्रस्त भागों का दौरा करने वाले हैं. खंडित पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री डॉक्टर प्रफुल्ल चन्द्र घोष, कलकत्ता के मेयर एस. सी. रॉय चौधरी और पूर्व मेयर एस. एम्. उस्मान भी आश्रम में पहुंच चुके हैं. इन सभी को साथ लेकर ही गांधीजी यह दौरा करने वाले हैं.

अगले पांच मिनट में ही कलकत्ता के पुलिस कमिश्नर, एस. एन. चटर्जी भी पहुंच गए और यह दौरा आरम्भ हुआ. पांच-छः कारें… आगे-पीछे पुलिस की गाड़ियां… इस प्रकार यह काफिला कलकत्ता के दंगाग्रस्त इलाके की परिस्थिति देखने निकला. पाइकपारा, चिट्पोर, बेलगाछी, मानिकतोला, बेलियाघाट, नर्केल, एन्टेली, तंगरा और राजा बाजार…. दंगों में पूरी तरह ध्वस्त हो चुके मकान, जल कर ख़ाक हो चुके मंदिर और दुकानें….!

चितपुर में हिन्दुओं के जले हुए मकानों के भग्नावशेष देखते हुए गांधीजी कुछ देर वहां खड़े रहे. बहुत से मकानों में, जिन्हें दंगाईयों ने नष्ट कर दिया था, अब कोई भी नहीं रहता हैं. शाम के धुंधलके में ऐसे सुनसान और भयानक दृश्य को गांधीजी देखतेही रह गए.

बेलियाघाट परिसर में कुछ हजार लोग इकठ्ठे हैं. उन्होंने ‘महात्मा गांधी की जय’ के नारे जरूर लगाए, लेकिन अन्य किसी भी स्थान पर इस काफिले को देखकर लोगों ने कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दिखाई. अपना सब कुछ गंवा चुके ये हिन्दू, एकदम शुष्क और निर्विकार चेहरे के साथ गांधीजी की तरफ देख रहे हैं.

पचास मिनट का यह दौरा निपटाकर जब गांधीजी सोडेपुर आश्रम पहुंचे, तब तक उनका मन एकदम विषण्ण और खिन्न हो चुका था….!

Top News

ऑपरेशन ब्लू स्टार: विनाशकारी प्रभाव के साथ एक गैर-कल्पना ऑपरेशन

– (जयबंस सिंह एक भू-रणनीतिक विश्लेषक, स्तंभकार और लेखक हैं)

– (जयबंस सिंह एक भू-रणनीतिक विश्लेषक, स्तंभकार और लेखक हैं)

भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा ऑपरेशन ब्लू स्टार नामक एक सैन्य हमले को पवित्रतम सिख मंदिर, हरमंदिर साहिब पर सात दिनों से अधिक, 1 जून से 7 जून, 1984 तक किया गया। इसे सिखों द्वारा तीज के रूप में संदर्भित किया जाता है। घल्लूघरा (सिखों का तीसरा नरसंहार / प्रलय), पहले दो क्रमशः 1746 और 1762 में हुए, जब अफगानों ने सिखों को महिलाओं और बच्चों सहित घेर लिया, और फिर बिना पछतावे के नरसंहार किया।
कथित तौर पर, धार्मिक नेता संत जरनैल सिंह भिंडरावाले के नेतृत्व में सिख आतंकवादियों के मंदिर को खाली कराने के लिए हमला किया गया था, जिन्होंने वहां शरण ली थी। यह कहा गया कि उनकी गिरफ्तारी की मांग को लेकर संसद के दोनों सदनों के सदस्यों के साथ राजनीतिक दबाव को देखते हुए यह हमला लाजमी था
अब यह तर्क दिया जा रहा है कि किसी भी अदालत में संत भिंडरावाले के खिलाफ कोई मामला नहीं था और न ही उनके खिलाफ कोई चार्जशीट दायर की गई थी, इसलिए, इस तरह की कठोर कार्रवाई और उन्हें गिरफ्तार करने के लिए अभूतपूर्व हिंसा अतिरिक्त-संवैधानिक, गैरकानूनी और गैर-कानूनी थी।
दुर्भाग्यपूर्ण हमले में दो अतिरिक्त कारक बाहर खड़े हैं। पहला, भारतीय सेना का यह गलत विश्वास कि यह संत भिंडरावाले और उनके अनुयायियों को थोड़े समय के भीतर नगण्य हताहतों के साथ निकालने में सक्षम होगा। दूसरा, संत भिंडरावाले की यह धारणा कि भारत सरकार पवित्र हरमंदिर साहिब पर हमले का आदेश देने की हिम्मत नहीं करेगी। दोनों दल अपने आकलन में भयानक गलत थे और परिणाम एकदम विनाश और तबाही था
संत भिंडरावाले और उनके अनुयायियों को मंदिर के अंदर मार दिया गया था, क्योंकि कई निर्दोष नागरिक थे जो मंदिर में पूजा करने के लिए गए थे और कार्रवाई शुरू होने पर वहां फंस गए।
पवित्र प्रवृत्ति के निकट विनाश और कई हताहतों ने सिखों के मानस पर गहरा नकारात्मक प्रभाव छोड़ा, जिन्होंने पहले से ही सरकार के खिलाफ महान अविश्वास और संदेह का सामना किया।
समस्या को हल करने के बजाय, हमले ने एक बड़ा मुद्दा बनाया। पांच महीने के भीतर, 31 अक्टूबर, 1984 को, उनके सिख अंगरक्षकों, सतवंत सिंह और बेअंत सिंह द्वारा और उसके बाद हुए देश भर में हुए सिख विरोधी दंगों के द्वारा प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की भीषण हत्या हुई। पंजाब में मिलिटेंसी कई सालों तक जारी रही और हजारों युवा सिख लड़कों, सुरक्षा बल के जवानों और निर्दोष नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया।
यह बिना कारण नहीं है कि हमले को सिखों द्वारा एक प्रलय के रूप में संदर्भित किया जाता है, घटना के 36 साल बाद भी कुल मिलाप उन्हें बाहर निकालना जारी रखता है।
हरमंदिर साहिब पर हमला, खालिस्तान आंदोलन, सिख राष्ट्रवादी पहल का एक उप-उत्पाद था जो सिख लोगों के लिए एक स्वतंत्र राज्य बनाने की आकांक्षा रखता था। ऑपरेशन से कुछ साल पहले, खालिस्तान आंदोलन के एक हिस्से के रूप में उग्रवाद ने पंजाब में मजबूत जड़ें जमा ली थीं और संत भिंडरावाले इसका सबसे प्रमुख चेहरा थे, जिसका मुख्य कारण उनके विनीत बयानों और अतिवादी विचारों के कारण था। प्रारंभ में, उन्होंने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पारित करने का एक एजेंडा तय किया, लेकिन, यहां उन्होंने एक सड़क ब्लॉक के साथ मुलाकात की, क्योंकि इंदिरा गांधी सरकार ने इसे एक अलगाववादी दस्तावेज माना था। राजनीतिक मिशन में असफल होने के बाद, संत भिंडरावाले ने सभी सिखों की प्राथमिक आकांक्षा के रूप में आवश्यक होने पर बल के उपयोग से खालिस्तान के निर्माण की घोषणा की।
24 अप्रैल, 1980 को निरंकारी संप्रदाय के प्रमुख बाबा गुरबचन सिंह की हत्या कर दी गई थी। उनका संप्रदाय, लंबे समय से, संत भिंडरावाले की अध्यक्षता वाली दमदमी टकसाल के साथ लॉगरहेड्स में था। 9 सितंबर 1981 को, अखबार केसरी के संस्थापक संपादक लाला जगत नारायण की हत्या कर दी गई थी। उन्हें निरंकारी संप्रदाय के समर्थक के रूप में देखा गया था और उन्होंने कई संपादकीय लिखे थे, जिन्होंने भिंडरावाले के कृत्यों की निंदा की थी।
जबकि संत भिंडरावाले हरमंदिर साहिब के भीतर थे, पंजाब में हिंसक गतिविधियां बेरोकटोक जारी थीं। 23 अप्रैल, अप्रैल, 1983 को, पंजाब पुलिस के उप महानिरीक्षक ए.एस. अटवाल की भिंडरावाले समूह के एक बंदूकधारी ने गोली मारकर हत्या कर दी थी क्योंकि उन्होंने हरमंदिर साहिब कंपाउंड छोड़ दिया था। 12 मई, 1984 को, लाला जगत नारायण के बेटे रमेश चंदर और हिंद समचार मीडिया समूह के संपादक, भिंडरावाले के आतंकवादियों ने हत्या कर दी थी
सरकार संत भिंडरावाले को गिरफ्तार करने और आवश्यक आदेशों को देखने के लिए उत्सुक थी, जिनकी पवित्रता पर सवाल उठाए जाते हैं, 19 जुलाई, 1982 को पारित किए गए। भाई अमरीक सिंह, दमदम टकसाल से ऑल इंडिया सिख स्टूडेंट्स फेडरेशन के अध्यक्ष और एक और सहयोगी थे उसके साथ गिरफ्तार भी किया जाए। इन आदेशों के कारण, उपायुक्त, अमृतसर के निवास के बाहर कई सिखों ने एक धरना (विरोध) किया।
हरचंद सिंह लोंगोवाल जैसे अकाली नेताओं की गिरफ्तारी से बचने के लिए, संत भिंडरावाले ने हरमंदिर साहिब परिसर में आकर अपने लगभग 200 सशस्त्र अनुयायियों के साथ गुरु नानक निवास में निवास किया। हर दिन 51 सिखों का एक समूह सरकारी कार्यालयों और अदालत में गिरफ्तारी के लिए जाता है। 4 अगस्त, 1982 तक, अकाली दल भी इस आंदोलन में शामिल हो गया था और इसे "धार्मिक युद्ध" का रूप मिला। समूह ने 19, जुलाई, 1982 से 01, जून, 1984 तक कई पहलुओं को बदल दिया
जब पवित्र मंदिर पर हमला हुआ। हरचंद सिंह लोंगोवाल जैसे कुछ सिख नेताओं ने संत भिंडरावाले की गिरफ्तारी के लिए बातचीत करने का प्रयास किया, लेकिन दोनों पक्षों द्वारा लिए गए अनम्य पदों के कारण वे सफल नहीं हुए।
सरकार ने मंदिर परिसर से संत भिंडरावाले का अपहरण करने और एक वरिष्ठ राजनेता, पीवी नरसिम्हा राव को संत की गिरफ्तारी के लिए वार्ताकार के रूप में भेजने के लिए एक संभावित गुप्त अभियान सहित कई विकल्पों को देखा। प्रयासों का कोई फल नहीं हुआ। 26 मई, 1984 को, वरिष्ठ अकाली नेता गुरुचरण सिंह टोहरा ने सरकार को सूचित किया कि वह शांतिपूर्ण समाधान के लिए भिंडरावाले को सहमत करने में विफल रहे हैं।
सरकार के इस तरह के कठोर निर्णय लेने का एक और बड़ा कारण यह था कि पाकिस्तान लगातार सैन्य और मनोवैज्ञानिक क्षेत्र में राज्य में अपनी भागीदारी बढ़ा रहा था। खुफिया रिपोर्टों ने सुझाव दिया कि पाकिस्तान न केवल हथियारों और गोला-बारूद के प्रावधान में मदद करने के लिए तैयार था, बल्कि स्वतंत्रता सेनानियों की आड़ में तस्करी भी करता था।
यह व्यापक रूप से माना जाता है कि उक्त कारक संचयी रूप से संत भिंडरावाले और उनके अनुयायियों को बाहर निकालने के लिए मंदिर पर हमला करने की योजना का ट्रिगर बन गए। बेशक, थोड़े से समय के साथ थोड़े समय के अंतराल में "दगाबाज़" को बाहर निकालने की सेना द्वारा दिए गए विश्वास ने प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी को हरी झंडी दिखाने में एक प्रमुख भूमिका निभाई।

जिस तरह से वातावरण विकसित हो रहा था, उससे मंदिर परिसर में छिपे उग्रवादियों के लिए यह स्पष्ट हो गया था कि उन्हें कम से कम उस समय तक अपनी रक्षा करने की आवश्यकता होगी, जब तक कि देश भर के सिख विद्रोह में नहीं उठते हैं और एक समझौता वार्ता की जा सकती है। । इसलिए मंदिर परिसर को एक आधुनिक आधुनिक किले में बदल दिया गया। नौकरी मुख्य रूप से भारतीय सेना के एक सिख जनरल मेजर जनरल शबेग सिंह द्वारा की गई थी, जिन्हें सेवा से कैश किया गया था। उन्हें बांग्लादेशी क्रांतिकारियों (मुक्ति बाहिनी) के प्रशिक्षण के पीछे सैन्य मास्टरमाइंड के रूप में जाना जाता था। जिन वरिष्ठ सैन्य कमांडरों ने हमले की योजना बनाई थी, उन्हें बहुत महत्वपूर्ण कारक को ध्यान में रखना चाहिए, दुख की बात है कि उन्होंने नहीं किया। टैंक-विरोधी हथियार सहित आवश्यक हथियार, पाकिस्तान से खरीदे गए और समय के साथ जटिल रूप से तस्करी किए गए। संत और उनके अनुयायी, जैसे, भारतीय सेना उन पर क्या फेंकती है, इसके लिए बिल्कुल तैयार थे।घटनाओं के अनुक्रम के कई संस्करण हैं जो ऑपरेशन ब्लू स्टार के लॉन्च के बाद हुए। ओपन मीडिया डोमेन में एक संस्करण यहां दिया गया है। यह पूरी तरह से प्रामाणिक हो सकता है या नहीं भी लेकिन काफी स्वीकार्य है।
समग्र ऑपरेशन को तीन भागों में विभाजित किया गया था: -
• ऑपरेशन मेटल: स्वर्ण मंदिर परिसर से भिंडरावाले सहित आतंकवादियों को बाहर निकालना।
• ऑपरेशन शॉप: पूरे पंजाब राज्य में चरमपंथी ठिकाने पर छापा मारने और देश में शेष बचे आतंकवादियों को मोप करने के लिए।
• ऑपरेशन वुड्रोस: पाकिस्तान के साथ सीमा को सील करने और उग्रवादी तत्वों के पंजाब में अन्य गुरुद्वारा को खाली करने के लिए।
प्रारंभिक चरण में, सेना के लगभग सात विभाग पंजाब में ही ऑपरेशन में शामिल थे। इनमें सीमा पर पहले से ही रक्षात्मक मुद्रा में सैनिक शामिल थे और आतंकवादियों के समर्थन में एक पाकिस्तानी दुस्साहसियों के खिलाफ सीलिंग के लिए आवश्यक वृद्धि। LOC के साथ ही सीलिंग भी की गई और पाकिस्तान के साथ सीमा भी
मेजर जनरल केएस बरार (जिसे बुलबुल बरार के नाम से जाना जाता है) की कमान में मेरठ स्थित 9 डिवीजन को वास्तविक हमले (ऑपरेशन मेटल) के लिए शाब्दिक रूप से चलाया गया था। लेफ्टिनेंट जनरल के सुंदरजी आर्मी कमांडर पश्चिमी कमान और ऑपरेशन ब्लू स्टार के समग्र कमांड में थे। थल सेनाध्यक्ष जनरल वैद्य थे।
ऑपरेशन पूर्ण मीडिया ब्लैकआउट, स्थानीय कर्फ्यू और स्थानीय परिवहन के निलंबन के तहत किया गया था। पंजाब में रेल, सड़क और हवाई सेवा निलंबित कर दी गई। विदेशियों और अनिवासी भारतीयों को प्रवेश से वंचित कर दिया गया। पिछले कुछ दिनों में बिजली और पानी भी कट गए।
गोल्डन टेंपल के अंदर Das गुरु राम दास लंगर ’इमारत पर हमले के साथ जून 1, 1984 में ऑपरेशन शुरू हुआ। हैरानी की बात है कि हमले के लिए तैयार होने के बावजूद, पांचवें सिख गुरु, गुरु अर्जन देव जी के शहादत दिवस को मनाने के लिए नागरिकों को जून, 3 को मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति दी गई थी। शाम को उन्हें छोड़ने के लिए कहा गया था। यह व्यापक रूप से माना जाता है कि अवकाश आदेश दिए जाने पर सभी नागरिक मंदिर परिसर को नहीं छोड़ सकते थे; संभवतः उन्हें आतंकवादियों द्वारा मानव ढाल के रूप में बाद में इस्तेमाल करने के लिए हिरासत में लिया गया था। इसके बजाय जो छोड़ गए वे सिख अपराधी और कम्युनिस्ट थे, जो पहले नष्ट हो गए थे, लेकिन तब लड़ाई के लिए पेट नहीं था।
अंतिम हमला दो दिनों से जून, 5 से 7 जून तक हुआ, जब परिसर को आतंकवादियों से मुक्त घोषित किया गया और संत जरनैल सिंह भिंडरावाले की हत्या की घोषणा की गई
"रब्बल" के खिलाफ पेशेवर इन्फैंट्री सैनिकों द्वारा हमला किया जाना चाहिए था, अंततः टैंक, आर्टिलरी और कमांडो को भी तैनात किया गया था। आतंकवादियों में होली से वापसी की आग एंटी-टैंक रॉकेट से ग्रेनेड को लेकर आई थी। अकाल तख्त जहां संत भिंडरावाले स्थित था, को सचमुच टैंक की आग से जमीन तक उठाया गया था। टेंक मंदिर परिसर के द्वार पर बंद रेंज में था।
दुर्भावनापूर्ण हमले में 493 मारे गए और 236 घायल हो गए। सेना को 83 मारे गए (4 अधिकारी और 79 सैनिक) मारे गए। यह व्यापक रूप से महसूस किया जाता है कि मरने वालों की संख्या घोषित की गई तुलना में बहुत अधिक थी। इतना ही नहीं, एक बार जब मंदिर परिसर को आतंकवादियों से मुक्त घोषित किया गया था, राष्ट्रपति ज़ैल सिंह एक यात्रा के लिए आए थे और परिसर के भीतर छिपे एक आतंकवादी द्वारा गोली मार दी गई थी। गोली चली और सेना कर्नल जो उसके साथ था।
ऑपरेशन ने कई देशों द्वारा निंदा की। दुनिया भर में आलोचना और मानवाधिकार संगठनों द्वारा कई शिकायतें। दुनिया भर में सिख तबाह हो गए। यह ऑपरेशन बहुत ही मार्मिक काल के दौरान किया गया था, जब सिख अपने पांचवें गुरु की शहादत की याद कर रहे थे, उनके लिए और भी अधिक वीरता थी। कई सिख सैनिकों ने अपनी इकाइयाँ और प्रख्यात सिख हस्तियों को पुरस्कार लौटा दिए, जो उन्हें राज्य से मिले थे।
पांच साल बाद, मंदिर परिसर को एक बार फिर आतंकवादियों द्वारा "नाकाबंदी दृष्टिकोण" के रूप में मंजूरी दे दी गई, जैसा कि पंजाब पुलिस के तत्कालीन महानिदेशक केपीएस गिल ने कल्पना की थी। ऑपरेशन की सफलता, ऑपरेशन ब्लैक थंडर नाम के कोड ने साबित किया कि सेना द्वारा किए गए एकमुश्त हमले के विकल्प थे। ऑपरेशन पर कई किताबें और वृत्तचित्र बनाए गए हैं। एक महत्वपूर्ण सबक हमारे अपने लोगों के खिलाफ बल का उपयोग करने से पहले सभी संभावित विकल्पों की कोशिश करना है और, जब आवश्यक हो, इसे न्यूनतम सीमा तक सीमित करें। स्नातक की प्रतिक्रिया पर काम करते समय धैर्य के साथ बेहतर राजनीतिक और सैन्य निर्णय हमेशा बेहतर लाभांश का भुगतान करेगा। उन्मत्त निर्णय लेने से जटिल बल का एक वृद्धिशील उपयोग एक महान और परिपक्व राष्ट्र का संकेत नहीं है
Continue Reading

Top News

मोदी सरकार पिता के साए जैसी : ‘विजय भवभारत’

भवभारत’ विदेश से लाए युवक ने कहा है कि ऐसी व्यवस्था तो उसने जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों में भी नहीं देखी है। शख्स बता रहा है कि सरकार ने करीब 70 किलोमीटर दूर सभी पैसेंजर को कोरोन्टाइन किया है

विदेश से लाए युवक ने कहा है कि ऐसी व्यवस्था तो उसने जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों में भी नहीं देखी है। शख्स बता रहा है कि सरकार ने करीब 70 किलोमीटर दूर सभी पैसेंजर को कोरोन्टाइन किया है । बिल्डिंग को लगातार सैनेटाइज किया जा रहाहै। उन्हें 24 घंटे की देख रेख में रखा है, जहॉं बेहतरीन सुविधाएँ हैं। भवभारत’ विदेश से लाए युवक ने कहा है कि ऐसी व्यवस्था तो उसने जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों में भी नहीं देखी है। शख्स बता रहा है कि सरकार ने करीब 70 किलोमीटर दूर सभी पैसेंजर को कोरोन्टाइन किया है। बिल्डिंग को लगातार सैनेटाइज किया जा रहा है। उन्हें 24 घंटे की देख रेख में रखा है , जहॉं बेहतरीन सुविधाएँ हैं ।

विजय भव भारत का फेसबुक पेज, 24,000 से अधिक फौलोवेर्स.

जहाँ एक और पूरी दुनिया कोरोना (महामारी) से लडर ही है, हर देश इसकी रोकथाम में लगा हुआ है अपने नागरिकों के बचाव में हर कोशिश कर रहा है, वहीं भारत की कोशिशों की विश्वपटल सरहाना हो रही है। कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी भले इस वैश्विक महामारी को मोदी सरकार पर हमले के मौके की तरह तलाश कर रहे हैं, लेकिन सोशल मीडिया में सरकार की तारीफ करते हुए कुछ लोगों ने जो आपबीती शेयर की है जो बेहद मार्मिक है। हालफिलाहल इटली से लाई गई एक युवती के पिता ने अपनी भावना साझा कि, वो सालों से सरकार की आलोचना कर रहे थे। लेकिन, अब उन्हें एहसास हो रहा है कि मोदी सरकार पिता के साए (fatherly figure) जैसी है। विदेश से लाए गए एक युवक ने कहा है कि ऐसी व्यवस्था तो उसने जर्मनी जैसे यूरोपीय मुल्कों में भी नहीं देखी है।टाइम्स ऑफ इंडिया के पत्रकार रोहन दुआ ने इटली से लौटी युवती के पिता का पत्र शेयर किया है। इस पत्र में उन्होंने इंडियन एंबेसी, भारत सरकार और विशेषत: नरेंद्र मोदी को धन्यवाद दिया है। पिता के मुताबिक उनकी बेटी मास्टर की पढ़ाई करने इटली के मिलान गई थी। वहॉं हालात बिगड़ने पर उसे वापस लौटने को कहा। जब वह लौटने लगी तो उससे भारत वापस जाने का सर्टिफिकेट माँगा गया। न्होंने खुद इंडियन एंबेसी को संपर्क करने की कोशिश की। मगर मिलान में एंबेसी का कार्यालय बंद होने के कारण ऐसा नहीं हो पाया। उन्होंने इंडियन एंबेसी के अन्य लोगों को मेल के जरिए संपर्क किया और रात के 10:30 बजे उनकी बेटी ने फोन पर बताया कि उसकी बात दूतावास में हो गई है और वह अगली फ्लाइट से भारत लौट रही है।

पिता के मुताबिक, वे सालों से भारतीय सरकार को कोस रहे थे। लेकिन मोदी सरकार में पिता का चेहरा है। उन्होंने बताया कि उनकी बेटी 15 मार्च को भारत आई और आईटीबीपी अस्पताल में उसकी स्वास्थ्य संबंधी, खान-पान संबंधी सभी जरूरतों का ख्याल रखा गया। गौरतलब है कि इटली उन देशों में शामिल है जो कोरोना संक्रमण से सर्वाधिक प्रभावित हैं।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार कोरोना वायरस के संक्रमण से निबटने के लिए सरकार ने 400 बेड का कोरोन्टाइन वार्ड तैयार करवाया है। यहाँ विदेश से लौटने वालों को सीधे दिल्ली एयरपोर्ट से लेकर जाया जाएगा। यहाँ इन सभी लोगों की 14 तक की निगरानी होगी और अगर इनमें कोरोना के लक्षण मिलते हैं तो इन्हें आइसोलेट कर छोड़ा जाएगा। ये कोरोन्टाइन वार्ड नोयडा के सेक्टर 39 में स्थित जिला अस्पताल की नई बिल्डिंग में बना है। यहाँ पर्याप्त संख्या में पैरामेडिकल स्टॉफ तैनात हैं।

Continue Reading

Top News

इन टीमों के जरिये समझिये समाज की सच्चाई को: ‘विजय भवभारत’

समाज की सच्चाई को दिखाने का बीड़ा उठाने वालों में से एक नाम ‘विजय भव भारत’ का भी है

21वीं सदी के दो दशक बीतते तक मीडिया को किस तरह से टुकड़े टुकड़े गैंग ने बर्बाद कर दिया और मीडिया ने किस तरह से समाज को बर्बाद किया, यह हम सभी जानते हैं और टुकड़े टुकड़े गैंग व् मीडिया में बैठे उनके नेटवर्क को भी हम समझ चुके हैं. उस नेटवर्क को तोड़ने और मीडिया में जमे इस कचरे की सफाई का जिम्मा जिनसोशल मीडिया के पोर्टलों ने ली है, उनकी श्रृंखला में एक और नाम की चर्चा इस लेख में हम करेंगे. इस बार चर्चा है फेसबुक कैलेंडर पेज –‘विजय भव भारत’ की

विजय भव भारत का फेसबुक पेज, 24,000 से अधिक फौलोवेर्स.

यूँ तो साहित्य समाज का दर्पण कहा जाता था और बाद में मीडिया ने इसकी जगह ले ली, मगर समाज की सच्चाई को समाज का यह दर्पण दिखा नहीं पाया और ख़बरों को व् समाज की सच्चाई को तोड़ मरोड़ कर पेश करने का आरोप मीडिया पर लगने लगा. ऐसे में समाज की सच्चाई को दिखाने का बीड़ा उठाने वालों में से एक नाम ‘विजय भव भारत’ का भी है.

विजय भव भारत

‘विजय भव भारत’ पेज का संचालन फेसबुक पर होता है, जहाँइसे फॉलो करने वाले 24,000 से भी अधिक लोग हैं. यह पेज जाना जाता है समाज में चलने वाले सकारात्मक कामों के प्रचार प्रसार के लिए, जो आम मीडिया कीनज़रों से दूर हैं. इसके साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों पर भी यह पेज नज़र रखता है, और उनसे जुडी तकरीबन हर जानकारी अपने दर्शकों तक पहुँचाता है. विजय भव भारत पेज का एक और काम 365दिनों के विशेष घटनाओं को अपने पेज से जनता तक पहुँचाना भी है. इसका एक नाम ‘कैलेंडर विशेष’ भी है. इनके अतिरिक्त समसामयिक घटनाओं पर पोस्ट व् विडियो डालना भी इस पेज का काम है.

सकारात्मक कामों का प्रचार प्रसार:

विजय भव भारत जिस काम में लगा है, शायद वह काम मीडिया का कोई भी तंत्र नहीं कर पायेगा क्योंकि इस काम में मीडिया को मसाला नहीं मिलेगा बल्कि मेहनत करनी पड़ेगी. मीडिया का एक तंत्र जहाँ केवल टीआरपी बढाने और ख़बर बेचने में लगा है, वहीँ सोशल मीडिया पर विजय भव भारत- दुनिया व् भारत की कुछ बेहतरीन सकारात्मक ख़बरें खोज कर ला रहा है और अपने पेज के माध्यम से साझा कर रहा है. सोशल मीडिया से नकारात्मकता हटाने का यह कदम सराहनीय है. समाज की यह सच्चाई जो छिपी हुई है, उसे खोज निकलने का यह काम विजय भव भारत कर रहा है.

कोरोना से बचाव के लिए दुनिया ने अपनाई भारतीय संस्कृति

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों पर नज़र:                            दुनिया का सबसे बड़ा गैर सरकारी संगठन है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और समाज निर्माण के काम में इसके योगदान को नकारना मुर्खता होगी. महात्मा गाँधी जी से लेकर अन्य कई महापुरुष संघ के बारे में सकारात्मक विचार रख चुके हैं, ऐसे में इस संगठन के कामकाज पर भी नज़र रखे हुए है. इससे पहले कि मीडिया संघ के कामकाज को तोड़ मरोड़ का या अपने अनुरूप पेश करे, विजय भव भारत संघ के विशिष्ट स्त्रोतों से संघसे जुडी प्रमाणिक ख़बरें लेकर आता है और समाज से उसका क्या लेना देना है, यह भी स्पष्ट करता है.

विश्व के सबसे बड़े गैर सरकारी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों पर नज़र.

कैलेंडरविशेष दिन:

विजय भव भारत जिन महत्वपूर्ण सकारात्मक कामों में लगा हुआ है, उनमे से एक कैलेंडर विशेष दिन भी है. साल में 365 दिन होते हैं, और तकरीबन हर दिन महत्वपूर्ण होता है. उन सभी दिनों की विशेषता और महत्त्व बताने का काम भी विजय भव भारत करता है. चाहे किसी महापुरुष का जन्मदिन या पुण्यतिथि हो या कोई स्मरणीय घटना की बात हो, उनके महत्त्व को समझाने का काम भी विजय भव भारत करता है.

16 सितम्बर 1947, गाँधीजी द्वारा छूआछूत की समाप्ति पर राष्ट्रीयस्वयंसेवक संघ के काम पर चर्चा.

समसामयिक घटनाओं पर नज़र:

जब समाज में सकारात्मकता भरने का काम और समाज से नकारात्मकता हटाने का काम विजय भव भारत कर रहा है तो यह तो असंभव है कि ऐसे में समकालीन घटनाओं को न जोड़ा जाये. वर्तमान में घटने वाली हर घटना पर समाज की प्रतिक्रिया, सही ख़बर, तथ्य परक, और प्रमाणिक ख़बरें विडियो और पोस्टर के माध्यम से अपने फौलोवर्स तक विजय भव भारत पहुँचाता है.

राम मंदिर पर शिया वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिज़वी का स्पष्ट बयान. 10 लाख से ज्यादा लोगों द्वारा देखा गया, 50 हज़ार से ज्यादा लोगों द्वारा साझा किया गया.

अपने इस प्रयास के माध्यम से विजय भव भारत ने सोशल मीडिया पर एक ऐसा विमर्श खडा किया है जो सकारात्मक है, प्रमाणिक है और नकारात्मकता को तोड़ने वाला है. जिन ख़बरों में मीडिया की दिलचस्पी नहीं होती मगर समाज के लिए आवश्यक है – उन्हें खोज कर लाने का काम यह पेज कर रहा है.

Continue Reading

Featured Post

Top News1 वर्ष पूर्व

रॉबर्ट वाड्रा की गिरफ्तारी पर 5 फरवरी तक जारी रहेगी रोक

---हाईकोर्ट जस्टिस मनोज कुमार गर्ग की कोर्ट ने अधिवक्ता भंवरसिंह मेड़तिया के निधन के बाद कोर्ट में 3.45 बजे रेफरेंस...

Top News1 वर्ष पूर्व

बिजनौर कोर्ट शूटकांड : हाईकोर्ट ने डीजीपी और अपर मुख्य सचिव (गृह) को किया तलब

---दरअसल, बिजनौर में 28 मई को नजीबाबाद में हुई बसपा नेता हाजी अहसान व उनके भांजे शादाब की हत्या के...

Top News1 वर्ष पूर्व

निर्भया केस: दोषी अक्षय की पुनर्विचार याचिका खारिज, फांसी की सजा बरकरार

---सुप्रीम कोर्ट ने कहा-पुनर्विचार याचिका में कोई नए तथ्य नहीं, इसलिए ख़ारिज होने योग्य

Top News1 वर्ष पूर्व

कतर टी-10 लीग पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की आईसीसी ने शुरु की जांच

--उल्लेखनीय है कि कतर टी-10 लीग का आयोजन सात से 16 दिसम्बर तक कतर क्रिकेट संघ ने किया था

Top News1 वर्ष पूर्व

बिजनौर कोर्ट रूम में हुई हत्या मामले में चौकी प्रभारी समेत 18 पुलिसकर्मी सस्पेंड

---एसपी ने बताया कि कोर्ट में दिनदहाड़े कुख्यात बदमाश शाहनवाज की हत्या के बाद जजी परिसर में सुरक्षा की पोल...

Recent Post

Trending

Copyright © 2018 Chautha Khambha News.

Web Design BangladeshBangladesh online Market