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लेख

कलियुग में भगवानों का जुलुस

आप सभी पाठकों में से कौन कौन चतुर है, कौन कौन दर्शक है और कौन कौन जुलुस में शामिल है आप स्वयं निर्णय कीजिये।

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(डॉ विवेक आर्य/नसीब सैनी)
कलियुग में एक बार सभी भगवानों का जुलुस निकला। भगवानों के जुलुस में उनके साथ उनके श्रदालु, सेवक अपने अपने इष्ट देव के गुण गान करते हुए निकल रहे थे। दर्शकगण बड़े उत्साह से जुलुस देखने निकले। सबसे आगे परम पिता परमात्मा परमेश्वर थे जिनके साथ बमुश्किल 1-2 श्रद्धालु थे। एक दर्शक ने पूछा भाई आप के साथ इतने कम लोग क्यों है। एक चतुर पास खड़ा था। वह बोला की मैं बताऊ? सभी के हाँ कहने पर बोला की आज कलियुग है। पहले आप की बहुत प्रतिष्ठा थी या यह कहे की इनका एकछत्र राज्य था। सम्पूर्ण संसार एक सर्वव्यापक निराकार ईश्वर की उपासना करता था। अब समय बदल गया है। 1 -2 व्यक्तियों को छोड़कर सभी साकार अवतारों की, गुरुओं की पूजा करने लग गए है। अब न लोग परमेश्वर के गुण, कर्म और स्वाभाव से परिचित है और न ही उन्हें जानने का प्रयास करते है।
परमेश्वर के पीछे श्री राम जी का जुलुस निकला। भीड़ कुछ कुछ थी परन्तु विशेष उत्साह नहीं दिखा। एक दर्शक ने पूछा भाई आप के साथ इतने कम लोग क्यों है। चतुर से फिर उत्तर मिला आप की सतयुग में बड़ी प्रतिष्ठा थी। लोग आपको आदर्श एवं मर्यादावान मानते थे। कालांतर में आप के चरित्र के स्थान पर चित्र की पूजा होने लगी। फिर आप के नाम से विशेष मंदिर और मूर्तियां बनने लग गई। पहले आपके जीवन चरित्र रामायण की अमर गाथा में आये संदेशों का पालन कर लोग अपने आपको मोक्षपथ का पथिक बनाते थे फिर इनके जीवन चरित्र रामायण की अमर गाथा को सुनने भर से मोक्ष प्राप्ति मानने लग गए है। अब तो बस आपका प्रभाव रामनवमी और दशहरा-दिवाली तक ही सीमित है। इन दिनों में लोग यदा-कदा आप का स्मरण करते है। इसलिए विशेष उत्साह नहीं दीखता है।
श्री राम जी के पीछे श्री कृष्ण जी का जुलुस निकला। कुछ लोग उछलते-कूदते नज़र आये। मगर विशेष उत्साह अभी भी नहीं दिखा। एक दर्शक ने पूछा भाई आप के साथ इतने कम लोग क्यों है। चतुर से उत्तर मिला आप की द्वापर युग में बड़ी प्रतिष्ठा थी। लोग आपको नीतिनिपुण एवं योगिराज मानते थे। आप के नाम से भी विशेष मंदिर और मूर्तियां बनने लग गई। कालांतर में आप के चरित्र के साथ ऐसा खिलवाड़ हुआ की आप के असली चरित्र को ही लोग भूल गए। पहले आप की एक ही पत्नी रुक्मणी थी जिनके साथ आप ने 12 वर्ष तक विवाह के पश्चात ब्रह्मचर्य आश्रम का पालन किया था बाद में आप की प्रेमिका राधा बना दी गई, एक नहीं दो नहीं 16000 गोपियों के साथ आप का सम्बन्ध बना दिया गया। कोई रणछोड़ कहने लगा, कोई माखनचोर कहने लगा, कोई राधावल्लभ कहने लगा तो कोई रसिया कहने लगा । कुल मिलाकर आप की इज्जत का फलूदा आप ही के भक्तों ने बना डाला। अब लोग लड़कियां छेड़ने के लिए बहाने बनाने में आप का नाम लेते है और अपने अनैतिक कर्मों को रासलीला कहते है। अब तो बस आप का प्रभाव जन्माष्ठमी तक सीमित हैं। इन दिनों में लोग यदा-कदा इन्हें स्मरण करते है। इसलिए विशेष उत्साह नहीं दीखता है।
श्री कृष्ण जी के पीछे हनुमान जी का जुलुस निकला। आप के साथ भी कुछ भगत थे। । एक दर्शक ने पूछा भाई आप के साथ इतने कम लोग क्यों है। चतुर से उत्तर मिला आप की पहले बड़ी प्रतिष्ठा थी। लोग आपको बल,शक्ति और ब्रह्मचर्य मानते थे। आप के नाम से भी विशेष मंदिर और मूर्तियां बनने लग गई। हनुमान जी चारों वेदों के ज्ञाता, महाविद्वान एवं परमबलशाली थे। कालांतर में आपको बन्दर के रूप में चित्रित कर दिया गया। अब लोग भीख मांगने के लिए आपके जैसा वेश धारण करते हैं। आप के चरित्र और गुणों से कोई शायद ही प्रेरणा लेता हैं। अब तो बस आप का प्रभाव मंगलवार तक सीमित हैं। इसलिए विशेष उत्साह नहीं दीखता है।
हनुमान जी के पीछे महात्मा बुद्ध का जुलुस निकला। आप के जुलुस के साथ भी नाम लेवा लोग थे। एक दर्शक ने पूछा भाई आपके साथ इतने कम लोग क्यों है। उत्तर मिला आपकी पहले बड़ी प्रतिष्ठा थी। आप महान समाज सुधारक थे। आपने यज्ञों में पशुबलि एवं छुआछूत के विरुद्ध जीवनभर प्रयास किया एवं महान सफलता पाई। कालांतर में आपके बहुत से भगत हुए। मगर दया, संयम, क्षमा, दम, अस्तेय के आपके सन्देश के स्थान पर माँसाहार, तांत्रिक पूजा, उन्मुक्त सम्बन्ध, हिंसा आदि आपके नाम से स्थापित विहारों में ज्यादा प्रचलित रहा। कुछ छदम भगत जो अपने आपको नव-बुद्ध मानते है आपकी समता की शिक्षाओं का प्रयोग जातिवाद एवं राजनैतिक रोटियां सेकने के लिए करते हैं मगर आपका सच्चा भगत तो कोई विरला ही मिलता है। अब तो आपका प्रभाव बुद्ध पूर्णिमा तक सीमित है। उस दिन लोग यदा-कदा इन्हें स्मरण करते है। इसलिए विशेष उत्साह नहीं दीखता है।
महात्मा बुद्ध के पीछे शंकराचार्य का जुलुस निकला। आप के जुलुस के साथ भी नाम लेवा लोग थे। एक दर्शक ने पूछा भाई आपके साथ इतने कम लोग क्यों है। चतुर से उत्तर मिला इनकी पहले बड़ी प्रतिष्ठा थी। आप महान समाज सुधारक थे। आपने नास्तिक मतों के विरुद्ध संघर्ष किया एवं लोप हो रहे वेद विद्या के ज्ञान का पुनरुद्धार किया। आपके महान तप से वेदों को खोई हुई प्रतिष्ठा मिली। आपने भारत देश की चारों दिशाओं में धर्म रक्षा के लिए मठों की स्थापना करी और संस्कृत एवं विद्या की रक्षा के लिए अखाड़ों को स्थापित किया। जहाँ पर शस्त्र एवं शास्त्र दोनों का सम्मान था। आपको पहले शिव का अवतार एवं तत्पश्चात ईश्वर ही कहा जाने लगा। आपने अपनी पुस्तक परापूजा में मूर्ति पूजा का विरोध लिखा उसके विपरीत आप ही की मूर्तियां बनाकर उन्हें पूजा जाने लगा। आपके बनाये मठों में धन-संपत्ति पर बैठकर उनके संचालक निश्चेतना की प्रगाढ़ निंद्रा में सो गए है और अखाड़ें में बैठे नागा साधु नशे की निंद्रा में सो गए है। अब तो बस आपका प्रभाव मठों और अखाड़ों तक ही सीमित है। इसलिए विशेष उत्साह नहीं दीखता है।
इस प्रकार से अनेक देवी देवताओं का जुलुस निकला उनका भी यही हाल था। उनके पीछे अनेक गुरुओं का भी जुलुस निकला। चतुर ने बताया की सभी गुरुओं के चेले अपने अपने गुरु को भगवान बता रहे थे। गुरु की सेवा, गुरु के नाम स्मरण, गुरु की कृपा से मोक्ष प्राप्ति बता रहे थे। उनके लिए इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता था की उनके गुरु चाहे बलात्कार के आरोप में जेल में बंद हो, चाहे अनेक रोगों से पीड़ित होकर रोग शैया पर पड़े हो, चाहे वृद्धावस्था के कारण देखने, सुनने और चलने में अशक्त हो। उनके लिए तो जीवन के सभी दुखों से, सभी असफलताओं से, सभी समस्यायों से बचाने की अगर कोई शक्ति रखता था तो वो केवल और केवल गुरु था क्यूंकि गुरु के बिना कलियुग में कोई भी ईश्वर की प्राप्ति नहीं करा सकता, कोई मोक्ष नहीं दिला सकता था। गुरुओं के ठाठ देख कर यही लगा की इनके चेले अंधे है और अंधे ही रहेंगे। सभी गुरुओं के पीछे कुछ भीड़ थी मगर दर्शकों को लगा की ये सभी मानसिक गुलाम हैं न की सत्य अन्वेषक है। इस प्रकार से विभिन्न गुरुओं के जुलुस भी निकल गए।
दर्शकों को अभी भारी भीड़ वाले जुलुस की प्रतीक्षा थी और भारी भरकम भीड़ वाले जुलुस की प्रतीक्षा समाप्त हुई। चारों और नरमुंड ही नरमुंड। पाँव रखने तक का स्थान नहीं था। दर्शकों को यह उत्सुकता हुई की यह किसका जुलुस था। मगर कोई व्यक्ति नहीं दिखा। चतुर ने बताया की देखों मध्य में कोई पत्थर लिए जा रहे हैं। और पता करने पर पता चला की यह अजमेर वाले ख्वाजा ग़रीब नवाज़ की कब्र थी। ये सभी चेले अपने आपको सेक्युलर मानते है और हिन्दू-मुस्लिम एकता की स्थापना के लिए मुसलमानों की कब्रों पर सर पटकने को अपना धर्म मानते है। चतुर से पूछा गया की हिन्दुओं का ग़रीब नवाज़ से क्या सम्बन्ध है। तो वह बोला की हमारे देश के अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान को हराने वाले मुहम्मद गौरी का गरीब नवाज मार्गदर्शक था। उसने सबसे पहले इस्लामिक तलवार की काफिर हिन्दू राजा पर विजय की दुआ करी थी। उसने पुष्कर धर्मनगरी के पवित्र घाटों पर मांस पकाकर खाया था एवं पृथ्वीराज के सेना की गुप्त खबरे गौरी तक पहुंचाई थी। सुनकर दर्शकों के मुंह खुले के खुले रह गए। उन्हें यह समझ में नहीं आया की ये लाखों लोगों की भीड़ गरीब नवाज का अनुसरण क्यों कर रही है।
गरीब नवाज ने हिन्दू समाज का कैसा अहित किया है उसके बारे में जानने के पश्चात तो कोई मुर्ख हिन्दू उसके जुलुस में शामिल होगा। चतुर ने एक जुलुस में शामिल बन्दे को गरीब नवाज की हकीकत बताई तो वह बोला की भगत तो अँधा होता है। हमें यह नहीं देखना चाहिए की हम किसकी भक्ति कर रहे है। बस भक्ति करनी चाहिए। चतुर और अन्य दर्शक सर खुजला कर रह गए मगर अक्ल के अंधे आँख के अंधों से भी ज्यादा अंधे निकले। 
अंत में आखिरी जुलुस दिखने लगा। ऐसे भीड़ किसी भी भगवान के जुलुस में अभी तक देखी नहीं गई। दर्शकों की उत्सुकता यह जानने के लिए बढ़ गई की यह कौन सा भगवान है जिसके साथ सबसे अधिक भीड़ है। पास आने पर स्पष्ट हुआ की यह शिरडी के साईं बाबा है। सबसे अधिक चेले, भगत अगर आज किसी के है तो वह शिरडी के साईं के है।सबसे अधिक भीड़ देखकर सभी दर्शक आपस में वार्तालाप करने लगे की इससे तो यही सिद्ध हुआ की कलियुग में सबसे बड़े भगवान अगर कोई है तो शिरडी के साई बाबा है। चतुर पास ही खड़ा सुन रहा था वह बोला क्या आप जानते है की वह शिरडी के साईं बाबा कौन थे ? दर्शकों की उत्सुकता जानने की हुई और वे बोले जी अवश्य जानना चाहेंगे।
चतुर ने बताया की आपका असली नाम चाँद मुहम्मद था, आप मस्जिद में रहते थे, पांच टाइम के नमाज़ी थे, मांस मिश्रित बिरयानी का शोक रखते थे और सबका मालिक एक कहते थे। आपका समाज पर उपकार का विश्लेषण करे तो आपके बारे में केवल यही प्रसिद्द हैं की आप कुछ चमत्कार करने की काबिलियत रखते थे और वे सभी चमत्कार और आपकी ख्याति महाराष्ट्र के एक छोटे से गाँव तक ही सीमित रही थी। यद्यपि जिस काल में आप इस देश में रहे उस काल में देश में अंग्रेजों का क्रूर राज्य रहा, भूकम्प, प्लेग, बाढ़ और अकाल से लाखों मौतें हुई पर आपने कोई चमत्कार न दिखाया जिससे देश और उसके निर्धन निवासियों का कुछ भला होता। आपकी ख्याति 100 साल तक केवल एक गाँव तक सीमित क्यों रही इसका कारण भी मालूम नहीं चलता। पर अब तक आपके चेलों ने आपके गुड़ की शक्कर ही बना दी है। आपको न केवल सबसे बड़ा भगवान बना दिया है अपितु आपको देश के 90 % मंदिरों में स्थान दे दिया है। और स्थान भी कोई ऐसा वैसा नहीं बल्कि सबसे बड़ी मूर्ति, सबसे भव्य मूर्ति, सबसे मध्य में आपकी बनाई गई है जिसके आगे बाकि सभी भगवानों की मूर्तियां बौनी लगे।
विडंबना यह है की हिन्दू समाज को यह भी नहीं मालूम की साईं बाबा की पूजा वे लोग क्यों कर रहे है। धनी इसलिए कर रहे है क्यूंकि वे समझते है की उनका धन कहीं चला न जाये और निर्धन इसलिए कर रहे है की उनके पास धन आ जाये। सभी चमत्कार में विश्वास रखते है। धर्म शास्त्र जैसे वेद, गीता आदि में वर्णित कर्म-फल का सिद्धांत उन्हें देर से परिणाम देने वाला और अप्राप्य प्रतीत होता है और चमत्कार अधिक प्रभावशाली एवं शीघ्रता से परिणाम देने वाला प्रतीत होता है । जबकि वह यह नहीं जानते की प्रतिष्ठता, स्वार्थ आदि की पूर्ति के लिए मनुष्यों की अविद्या, अज्ञानता एवं असमर्थता का लाभ उठाने के प्रपंच का नाम चमत्कार है।चमत्कार अन्धविश्वास के अतिरिक्त कुछ भी नहीं हैं और मुर्ख लोग ही इसमें विश्वास करते है।
चतुर की बात सुनकर दर्शक सोच विचार में लग गए और उनसे पूछने लगे की भाई जी यह तो बताये की ईश्वर की सत्य परिभाषा क्या है एवं ईश्वर क्या कर्म करते हैं। इस पर चतुर ने उत्तर दिया की ईश्वर सच्चिदानंदस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनंत, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वांतर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है और उसी की उपासना करने योग्य है। समाज में जितने भी भगवान अवतार के नाम पर प्रचलित है जिनके नाम पर अनेक मंदिर, अनेक मूर्तियां बनाई गई है सभी मनुष्य की कल्पना है। श्री राम और कृष्ण जी महाराज हमारे महान पूर्वज थे जिनके जीवन से मर्यादा और चरित्र का पवित्र सन्देश हमें प्रेरणा देता है परन्तु वे भी उसी वैदिक ईश्वर के ही उपासक थे। आज समाज में सभी प्रकार के अन्धविश्वास एक ही क्षण में समाप्त हो सकते है अगर सर्वव्यापक और निराकार ईश्वर की सत्ता को हर व्यक्ति स्वीकार करने लगे। वैदिक ईश्वर को जानने वाला व्यक्ति कभी पाप कर्म नहीं और आत्मिक उन्नति करता हुआ परम सुख मोक्ष को धारण करता है। और जो लोग इस सुख की प्राप्ति करने के लिए विभिन्न प्रकार के प्रपंचों का सहारा लेते है वे अज्ञानता के सागर में डूबकर जन्म-जन्मान्तर तक ऐसे ही भटकते रहते है। इसलिए भ्रम से बाहर निकलिये और यथार्थ को स्वीकार करते हुए वेद पथ के गामी बनिए।
आप सभी पाठकों में से कौन कौन चतुर है, कौन कौन दर्शक है और कौन कौन जुलुस में शामिल है आप स्वयं निर्णय कीजिये।
[नोट-आसाराम जी के अनुयाई महाशयों से विनम्र निवेदन है कि आसाराम जी से मोहभंग कर लीजिए । माना कि बहुत अच्छा काम भी किया है परन्तु घृणित कृत्य ने सब अच्छाइयों पर पानी फेर दिया है । आसाराम जी उन्हीं पाखंडियों के श्रैणी से आते हैं जिन्होंने युग पुरुष योगेश्वर कृष्ण के नाम पर भागवत पुराणानुसार रास रचाते हैं । ऐसे कृत्य करने वालों मे साधुता कहां रह पायेगी । रास रचाने वाले कैसे जितेन्द्रिय हो सकते हैं ? मन बड़ा चंचल होता है ऐसे रासलीला में संयमित नहीं रह सकता । कोई गलती होना मन विचलित होना स्वाभाविक है । अतः इसे फंसाया जाना कहना बंद करें । सत्य सनातन वैदिक धर्म की ओर बढ़े इसी से देश की धर्म संस्कृति अक्षुण्ण बनी रहेगी ।]
डॉ विवेक आर्य/नसीब सैनी

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जेएनयू में फीस वृद्धि के नाम पर राजनीति

—यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं

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सुरेश हिन्दुस्थानी

देश के उच्च शिक्षा केन्द्र जब राजनीति के अड्डे बनने की ओर कदम बढ़ाने लगें, तब वहां की शिक्षा की दिशा-दशा क्या होगी, यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। फीस बढ़ोतरी के खिलाफ किया जाने वाला दिल्ली का छात्र आंदोलन कुछ इसी प्रकार का भाव प्रदर्शित कर रहा है, जहां केवल और केवल राजनीति ही की जा रही है। किसी भी आंदोलन की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके पीछे जनहित का कितना भाव है। दिल्ली का यह आंदोलन जनसरोकार से कोसों दूर दिखाई दे रहा है।

हालांकि इसके पीछे बहुत से अन्य कारण भी होंगे। सबसे बड़ा कारण तो यही है कि आज जेएनयू की जो छवि जनता के बीच बनी है, वह जनता को खुद ही दूर कर रही है। जिस विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारों की ध्वनि गूंजित होती है, वह कभी जन आंदोलन का हिस्सा नहीं बन सकते हैं।दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के जिन छात्रों ने कभी भारत के टुकड़े करने के नारे लगाए थे, आज वे ही छात्र फीस बढ़ोतरी के छोटे से मामले को राजनीतिक रुप देने का प्रयास करते दिखाई दे रहे हैं। इस छात्र आंदोलन का राजनीतिक स्वरुप इसलिए भी दिखाई दे रहा है, क्योंकि इसमें राष्ट्रीय मानबिन्दुओं और केन्द्र सरकार को सीधे निशाने पर लिया जा रहा है। जेएनयू वामपंथी विचारधारा का एक बड़ा केन्द्र रहा है।

वामपंथी धारा के कार्यकर्ता देश के महानायकों के बारे में क्या सोच रखते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। पिछले घटनाक्रमों को देखें तो पाएंगे कि जेएनयू में देश के विरोध में वातावरण बनाने का काम किया जाता रहा है। वहां आतंकवादी बुरहान वानी के समर्थन में कार्यक्रम किए जाते हैं। सवाल यह कि जेएनयू में शिक्षा के नाम पर आखिर क्या हो रहा है। जहां तक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में फीस बढ़ोतरी की बात है तो यह कहना तर्कसंगत ही होगा कि विगत 19 वर्ष से विश्वविद्यालय के छात्रावास के कमरों और भोजन का शुल्क नहीं बढ़ाया गया, जबकि पिछले 19 सालों में महंगाई का ग्राफ बहुत ऊपर गया है। इस सबका भार पूरी तरह से विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के कंधों पर ही आया। देश के अन्य विश्वविद्यालयों में भी शिक्षा महंगी हो रही है, जो जेएनयू के मुकाबले बहुत अधिक है। ऐसे में विश्वविद्यालय द्वारा कुछ हद तक फीस बढ़ाना न्यायोचित कदम ही है। जिसे वहां के कई छात्र भी सही मानते हैं। लेकिन यह आंदोलन इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि इसमें परदे के पीछे राजनीतिक कार्यकर्ता भूमिका निभा रहे हैं। यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं।

खैर… यह जांच का विषय हो सकता है।देश के प्रसिद्ध अधिवक्ता सांसद डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने इस छात्र आंदोलन के बारे में बहुत ही गहरी बात कही है। उनका मानना है कि जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय को कुछ समय के लिए बंद कर दिया जाए। उनके इस कथन के गहरे निहितार्थ निकल रहे हैं। स्वामी के संकेत को विस्तार से समझना हो तो एक बार जेएनयू की गतिविधियों का अध्ययन करना चाहिए। फिर वह सब सामने आ जाएगा जो वहां होता है। कहा जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जमकर राजनीति की जाती रही है। देश के जो शिक्षा केन्द्र राजनीति के केन्द्र बनते जा रहे हैं, उन पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है।

वर्तमान में जिस प्रकार से जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय का आंदोलन चल रहा है, उसे छात्र आंदोलन कहना न्याय संगत नहीं होगा। क्योंकि, यह विशुद्ध राजनीतिक आंदोलन है। फीस बढ़ोतरी का विरोध तो मात्र बहाना है। इस आंदोलन के समर्थन में देश की संसद में कांग्रेस और वामपंथी दलों की ओर से आवाज उठाई गई। इससे यही संदेश जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जो देश विरोधी नारे लगाए गए, उनके प्रति इन राजनीतिक दलों के समर्थन का ही भाव रहा होगा। इतना ही नहीं, जब भारत तेरे टुकड़े होंगे और हमें चाहिए आजादी जैसे नारे लगाए गए थे, तब भी कांग्रेस और वाम दलों ने खुलेआम समर्थन किया था। ऐसे में सवाल यह उठता है कि कहीं यही दोनों दल छात्रों को आंदोलन करने के लिए तो नहीं उकसा रहे? अगर यह सही है तो फिर केन्द्र सरकार को दोष देना सही नहीं कहा जा सकता।

जब से देश में राजनीतिक सत्ता का परिवर्तन हुआ है, तब से ही देश में उन संस्थानों की सक्रियता दिखाई देने लगी है, जो भारत के बारे में भ्रम का वातावरण बनाने में सहायक हो सकते हैं। चाहे वह शहरी नक्सलवाद को प्रायोजित करने वाले कथित बुद्धिजीवियों की संस्था हो या फिर उनके विचार को अंगीकार करने वाली ही संस्थाएं क्यों न हों। सभी केन्द्र सरकार का विरोध करने के लिए आगे आ रहे हैं। इस विश्वविद्यालय में पढ़ाई करने वाले छात्र कभी भारतीय सेना द्वारा की जाने वाली आतंकियों के विरोध में कार्यवाही पर सवाल उठाते दिखाई देते हैं तो कभी अनुच्छेद 370 को हटाने का विरोध करते हैं। चार वर्ष पूर्व जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में छात्र संघ की उपाध्यक्ष रहीं शेहला राशिद ने भारतीय सेना के विरोध में जमकर भड़ास निकाली थी, जबकि सेना की ओर से स्पष्ट कहा गया था कि ऐसा कुछ भी नहीं है। इससे समझ में आ सकता है कि इस विश्वविद्यालय में कौन-सा पाठ पढ़ाया जाता है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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देश की युवा पीढ़ी में विदेशों के प्रति रुचि बढ़ी

—गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है

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मनोज ज्वाला

एक मीडिया संस्थान के सर्वेक्षण के अनुसार हमारे देश के पढ़े-लिखे और शहरी नौजवानों में से आधे से अधिक ऐसे हैं, जो अपने देश को पसंद नहीं करते। वे विदेशों में जाकर बस जाना चाहते हैं। लगभग दो साल पहले के उक्त सर्वेक्षण के मुताबिक उनमें से 75 फीसदी युवाओं का कहना था कि वे बे-मन और मजबूरीवश भारत में रह रहे हैं। 62.08 फीसदी युवतियों और 66.01 फीसदी युवाओं का मानना था कि भारत  में उनका भविष्य सुरक्षित नहीं है। क्योंकि, यहां अच्छे दिन आने की संभावना कम है। उनमें से 50 फीसदी का मानना था कि भारत में किसी महापुरुष का अवतरण होगा, तभी हालात सुधर सकते हैं, अन्यथा नहीं।

40 फीसदी युवाओं का मानना था कि उन्हें अगर इस देश का प्रधानमंत्री बना दिया जाए, तो वे पांच साल में इस देश का कायापलट कर देंगे।अखबार का वह सर्वेक्षण आज भी बिल्कुल सही लगता है। अगर व्यापक स्तर पर सर्वेक्षण किया जाता, तो देश छोड़ने को तैयार युवाओं का प्रतिशत और अधिक दिखता। वह सर्वेक्षण तो सिर्फ शहरों तक सीमित था। अपने देश में गांवों पर भी तेजी से शहर छाते जा रहे हैं। गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है। गौर कीजिए कि देश छोड़ने को तैयार वे युवा पढ़े-लिखे हैं और शहरों में पले-बढ़े हैं। वे किस पद्धति से किस तरह के विद्यालयों में क्या पढ़े-लिखे हैं और किस रीति-रिवाज से कैसे परिवारों में किस तरह से पले-बढ़े हैं, यह ज्यादा गौरतलब है।

विद्यालय सरकारी हों या गैर सरकारी, सभी में शिक्षा की पद्धति एक है और वह है मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा पद्धति। भारतीयता विरोधी इसी शिक्षा पद्धति को सरकारी मान्यता प्राप्त है। सरकार का पूरा तंत्र इसी तरह की शिक्षा के विस्तार में लगा हुआ है। वैसे अंग्रेजी माध्यम वाले विद्यालय सबसे अच्छे माने जाते हैं और गैर-सरकारी निजी क्षेत्र के अधिकतर विद्यालय अंग्रेजी माध्यम के ही हैं। शहरों में ऐसे ही विद्यालयों की भरमार है और जिन युवाओं के बीच उक्त मीडिया संस्थान ने उपरोक्त सर्वेक्षण किया उनमें से सर्वाधिक युवा ऐसे ही तथाकथित ‘उत्कृष्ट’ विद्यालयों से पढ़े-लिखे हुए हैं। अब रही बात यह कि इन विद्यालयों में आखिर शिक्षा क्या और कैसी दी जाती है, तो यह इन युवाओं की उपरोक्त सोच से ही स्पष्ट है।

जाहिर है, उन्हें शिक्षा के नाम पर ऐसी-ऐसी डिग्रियां दी जाती हैं, जिनके कारण वे महात्वाकांक्षी, स्वार्थी बनकर असंतोष, अहंकार, खीझ, पलायन एवं हीनता-बोध से ग्रसित हो जाते हैं और कमाने-खाने भर थोड़े-बहुत हुनर हासिल कर स्वभाषा व स्वदेश के प्रति ‘नकार’ भाव से पीड़ित होकर विदेश चले जाते हैं।थॉमस विलिंग्टन मैकाले कोई शिक्षा-शास्त्री नहीं था। वह एक षड्यंत्रकारी था, जिसने भारत पर ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जड़ें जमाने की नीयत से भारतीय शिक्षा-पद्धति की जड़ें उखाड़कर मौजूदा शिक्षा-पद्धति को प्रक्षेपित किया था। जो आज भी उसी रूप में कायम है। 20 अक्टूबर 1931 को लंदन के रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ फौरन अफेयर्स के मंच से महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘अंग्रेजी शासन से पहले भारत की शिक्षा-व्यवस्था इंग्लैण्ड से भी अच्छी थी।’ उस पूरी व्यवस्था को सुनियोजित तरीके से समूल नष्ट कर देने के पश्चात ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जरूरतों के मुताबिक उसके रणनीतिकारों ने लम्बे समय तक बहस-विमर्श कर के मैकाले की योजनानुसार यह शिक्षा-पद्धति लागू की थी।

मैकाले ने ब्रिटिश पार्लियामेंट की शिक्षा समिति के समक्ष कहा था ‘हमें भारत में ऐसा शिक्षित वर्ग तैयार करना चाहिए, जो हमारे और उन करोड़ों भारतवासियों के बीच जिन पर हम शासन करते हैं, उन्हें समझाने-बुझाने का काम कर सके। जो केवल खून और रंग की दृष्टि से भारतीय हों, किन्तु रुचि, भाषा व भावों की दृष्टि से अंग्रेज हों।’ विदेशों में बस जाने को उतावले भारतीय युवाओं ने पूरी मेहनत व तबीयत से मैकाले शिक्षा-पद्धति को आत्मसात किया है, ऐसा समझा जा सकता है। यहां प्रसंगवश मैकाले के बहनोई चार्ल्स ट्रेवेलियन द्वारा ब्रिटिश पार्लियामेंट की एक समिति के समक्ष ‘भारत में भिन्न-भिन्न शिक्षा-पद्धतियों के भिन्न-भिन्न परिणाम’ शीर्षक से प्रस्तुत किये गए एक लेख का यह अंश भी उल्लेखनीय है कि ‘मैकाले शिक्षा-पद्धति का प्रभाव अंग्रेजी राज के लिए हितकर हुए बिना नहीं रह सकता। हमारे पास उपाय केवल यही है कि हम भारतवासियों को यूरोपियन ढंग की उन्नति में लगा दें। इससे हमारे लिए भारत पर अपना साम्राज्य कायम रखना बहुत आसान और असंदिग्ध हो जाएगा।’ ऐसा ही हुआ। बल्कि, मैकाले की योजना तो लक्ष्य से ज्यादा ही सफल रही।

हमारे देश के मैकालेवादी राजनेताओं ने अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासन की समाप्ति के बाद भी उनकी अंग्रेजी-मैकाले शिक्षा-पद्धति को न केवल यथावत कायम रखा, बल्कि उसे और ज्यादा अभारतीय रंग-ढंग में ढाल दिया। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष लक्षित प्राचीन भारतीय शिक्षा-पद्धति को अतीत के गर्त में डालकर शिक्षा को उत्पादन-विपणन-मुनाफा-उपभोग-केन्द्रित बना देने और उसे नैतिक सांस्कृतिक मूल्यों से विहीन कर देने तथा राष्ट्रीयता के प्रति उदासीन बना देने का ही परिणाम है कि हमारी यह युवा पीढ़ी महज निजी सुख-स्वार्थ के लिए अपने देश से विमुख हो जाना पसंद कर रही है। उसे विदेशों में ही अपना भविष्य दीख रहा है।

माना कि हमारे देश में तरह-तरह की समस्याएं हैं, किन्तु इनसे जूझने और इन्हें दूर करने की बजाय पलायन कर जाने अथवा कोरा लफ्फाजी करने कि हमें प्रधानमंत्री बना दिया जाए तो हम देश को सुंदर बना देंगे, अति महात्वाकांक्षा-युक्त मानसिक असंतुलन का ही द्योत्तक है। लेकिन आधे से अधिक ये शहरी युवा मानसिक रुप से असंतुलित नहीं हैं, बल्कि असल में वे पश्चिम के प्रति आकर्षित हैं। इसके लिए हमारे देश की चालू शिक्षा-पद्धति का पोषण करने वाले हमारे राजनेता ही जिम्मेवार हैं। यह ‘यूरोपियन ढंग की उन्नति’ के प्रति बढ़ते अनावश्यक आकर्षण का परिणाम है। इस मानसिक पलायन को रोकने के लिए जरूरी है कि हम अपने बच्चों को हमारे राष्ट्र की जड़ों से जोड़ने वाली और संतुलित समग्र मानसिक विकास करने वालीप्राचीन भारतीय पद्धति से भारतीय भाषाओं में समस्त ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा देने की सम्पूर्ण व्यवस्था कायम करें।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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भाई-बहन में प्रेम भाव बढ़ाता है भैया दूज

–बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था

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योगेश कुमार गोयल

(भैया दूज, 29 अक्टूबर पर विशेष)

भाई-बहन के दिलों में पावन संबंधों की मजबूती और प्रेमभाव स्थापित करने वाला पर्व है भैया दूज। इस दिन बहनें अपने भाईयों को तिलक लगाकर ईश्वर से उनकी दीर्घायु की कामना करती हैं। कहा जाता है कि इससे भाई यमराज के प्रकोप से बचे रहते हैं। दीपावली के दो दिन बाद अर्थात कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाए जाने वाले इस पर्व को ‘यम द्वितीया’ व ‘भ्रातृ द्वितीया’ के नाम से भी जाना जाता है। बहुत से भाई-बहन सौभाग्य तथा आयुष्य की प्राप्ति के लिए इस दिन यमुना अथवा अन्य पवित्र नदियों में साथ-साथ स्नान भी करते हैं। भैया दूज मनाने के संबंध में कई किवंदतियां प्रचलित हैं। एक कथा यमराज और उनकी बहन यमुना देवी से संबंधित है। बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था। यमुना अपने भाई यमराज से बहुत स्नेह करती थीं और अक्सर उनसे अनुरोध करती रहती थीं कि वे अपने इष्ट-मित्रों सहित उसके घर भोजन के लिए पधारें लेकिन यमराज हर बार उसके निमंत्रण को किसी न किसी बहाने से टाल जाते। कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमुना ने यमराज को एक बार फिर भोजन के लिए आमंत्रित किया।

उस समय यमराज ने विचार किया कि मैं तो अपने कर्त्तव्य से बंधा सदैव प्राणियों के प्राण ही हरता हूं। इसलिए इस चराचर जगत में कोई भी मुझे अपने घर नहीं बुलाना चाहता। लेकिन बहन यमुना तो मुझे बार-बार अपने घर आमंत्रित कर रही है। इसलिए अब तो उसका निमंत्रण स्वीकार करना ही चाहिए।यमराज को अपने घर आया देख यमुना की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने भाई का खूब आदर-सत्कार करते हुए उनके समक्ष नाना प्रकार के व्यंजन परोसे। बहन के आतिथ्य से यमराज बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे कोई वर मांगने को कहा। इस पर यमुना ने उनसे अनुरोध किया कि आप प्रतिवर्ष इसी दिन मेरे घर आकर भोजन करें और मेरी तरह जो भी बहन इस दिन अपने भाई का आदर-सत्कार करे, उसे तुम्हारा भय न रहे। यमराज ने बहन यमुना को उसका इच्छित वरदान दे दिया। ऐसी मान्यता है कि उसी दिन से ‘भैया दूज’ का पर्व मनाया जाने लगा। भैया दूज के संबंध में और भी कई कथाएं प्रचलित हैं। ऐसी ही एक कथा के अनुसार, एक ब्राह्मण की दो संतानें थी।

एक पुत्र एवं एक पुत्री। पुत्री बहुत समझदार एवं गुणवती थी। वह अपने भाई से जी-जान से प्यार करती थी। एक दिन उसका भाई उससे मिलने उसकी ससुराल पहुंचा। उस समय वह सूत कातने में व्यस्त थी। अतः उसे भाई के आने का पता ही न चल सका। भाई भी बिना कुछ बोले चुपचाप एक ओर बैठा रहा। जब थोड़ी देर बाद बहन की नजर उस पर पड़ी तो भाई को अपने घर आया देख उसे बेहद खुशी हुई। उसने भाई का भरपूर आदर-सत्कार किया। अगले दिन भाई को वापस लौटना था। अतः रास्ते के लिए वह आटे के पकवान बनाने के उद्देश्य से चक्की में आटा पीसने लगी। अनजाने में चक्की में बैठा सांप भी आटे के साथ पिस गया। उसी आटे के पकवान एक पोटली में बांधकर उसने भाई को रास्ते में खाने के लिए देकर विदा किया। भाई के घर से जाने के बाद जब उसे यह मालूम हुआ कि आटे में सांप पिस गया है तो अपने पुत्र को पालने में ही सोता छोड़कर वह अपने भाई के प्राणों की रक्षा के लिए दौड़ी। कुछ दूर जाने पर उसे एक पेड़ की छांव में अपना भाई सोता दिखाई दिया। तब तक उसने पोटली में से कुछ भी नहीं खाया था। उसने भगवान का शुक्रिया अदा किया और पोटली उठाकर दूर फेंक दी तथा भाई के साथ मायके की ओर चल दी।

रास्ते में उसने देखा कि भारी-भारी शिलाएं आकाश में उड़ रही हैं। उसने एक राहगीर से इस रहस्य के बारे में जानना चाहा तो उसने बताया कि जो बहन अपने भाई पर कभी नाराज न होती हो और उसे दिलो-जान से चाहती हो, उस भाई की शादी के समय ये शिलाएं उसकी छाती पर रखी जाएंगी। थोड़ी दूर चलने पर उसे नाग-नागिन दिखाई दिए। नाग ने बताया कि ये शिलाएं जिस व्यक्ति की छाती पर रखी जाएंगी, हम उसे डंस लेंगे। जब बहन ने इस विपत्ति से बचने का उपाय पूछा तो नाग-नागिन ने बताया कि अगर भाई के विवाह के समय उसके सभी कार्य बहन स्वयं करे, तभी भाई की जान बच सकती है।जब उसके भाई के विवाह के लग्न का शुभ मुहूर्त आया तो वह भाई को पीछे धकेलती हुई स्वयं ही लग्न चढ़वाने के लिए आगे हो गई और घोड़ी पर भी स्वयं चढ़ गई। परिवारजन और संबंधी उसके इस विचित्र व्यवहार से हैरान तथा क्रोधित थे। उसके घोड़ी पर चढ़ते ही शिलाएं उड़ती-उड़ती आई लेकिन घोड़ी पर किसी पुरूष की जगह एक महिला को बैठी देख वापस मुड़ गई। जब सुहागरात का समय आया तो वह भाई को पीछे कर खुद भाभी के साथ सोने उसके कमरे में चली गई।

परिवार के सभी सदस्य तथा सभी रिश्तेदार उसके इस अजीबोगरीब व्यवहार से बेहद आश्चर्यचकित और खफा थे। उन्हें उस पर गुस्सा तो बहुत आ रहा था लेकिन उसके जिद के समक्ष सभी विवश थे। सुहागरात पर नियत समय पर नाग-नागिन उसके भाई को डंसने कमरे में पहुंच गए लेकिन उसने नाग-नागिन को मारने की सारी तैयारी पहले ही कर रखी थी। आखिरकार उसने नाग-नागिन का काम तमाम कर दिया। उसके बाद वह निश्चिंत होकर सो गई। सुबह होने पर सभी मेहमानों को विदा करने के बाद परिवार वालों ने सोचा कि अब इस बला को भी कुछ बचा-खुचा देकर यहां से चलता कर दिया जाए लेकिन नींद से जागने पर जब उसने पूरी घटना के बारे में सब को विस्तार से बताया कि किस प्रकार वह अपने बच्चे को पालने में ही सोता छोड़कर दौड़ी-दौड़ी भाई के प्राण बचाने के लिए उसके पीछे चली आई और सभी को नाग-नागिन के मृत शरीर दिखाए तो सभी की आंखों में आंसू आ गए।

भाई के प्रति उसका असीम प्यार तथा समर्पण भाव देखकर उसके प्रति सभी का हृदय श्रद्धा से भर गया।भाई-भाभी तथा माता-पिता ने उसे ढेर सारे उपहारों से लादकर बड़े मान-सम्मान के साथ खुशी-खुशी ससुराल से विदा किया। भाई-बहन के बीच इसी प्रकार के पावन संबंध, प्रेमभाव तथा उनके दिलों में आपसी संबंधों को मजबूत बनाने के लिए ही ‘भैया दूज’ पर्व मनाया जाता है।

(लेखक स्तंभकार हैं।)

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