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क्राइम

अन्य कारणों से विषम होते हालात

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6,अगस्त। 

एक ऐसे समय जब असम में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर यानी एनआरसी के दूसरे और अंतिम मसौदे के प्रकाशन को लेकर गुवाहाटी से लेकर दिल्ली तक हंगामा मचा है तब इस राज्य के साथ-साथ देश के अन्य प्रांतों के जन सांख्यिकीय स्वरूप में हो रहे बदलाव पर एक निगाह डालना आवश्यक है। यह इसलिए आवश्यक है, क्योंकि अगर हम चेते नहीं तो जैसी स्थिति असम की बनी वैसी ही अन्य राज्यों की भी बन सकती है। ध्यान रहे कि आजादी के पहले 1901 में असम में मुस्लिम जनसंख्या 12.40 प्रतिशत थी जो 1941 में 25.72 प्रतिशत हो गई। एक तरह से 40 वर्ष में मुस्लिम जनसंख्या का प्रतिशत 12 से 25 प्रतिशत हो गया। यह सिलसिला आजादी के बाद भी कायम रहा। 1971 में बांग्लादेश बनने के बाद भी इस सिलसिले में और तेजी आई। बांग्लादेशी घुसपैठियों के असम कानागरिक बनने के सिलसिले के कारण ही असम छात्र संगठन ने 1980 में घुसपैठियों को बाहर निकालने का आंदोलन छेड़ा गया, फिर भी बांग्लादेश से अवैध तरीके से आने वाले लोगों की आमद थमी नहीं। एक आकलन असम में 1971 से 2011 के बीच मुस्लिम जनसंख्या 24.56 प्रतिशत से बढ़कर 34.22 प्रतिशत हो गई। असम के विपरीत दूसरे राज्यों में विदेशी घुसपैठ के कारण नहीं, बल्कि ‘अन्य’ कारण से हालात बदल रहे हैं। 2011 की जनगणना में देश की आबादी 1210854977 थी जिसमें ‘अन्य’ की संख्या 7937734 और ‘उल्लेख नही’ की संख्या 2867303 थी। इस तरह कुल 10805037 लोगों ने जनगणना में भरे जाने वाले पंथों वाले कॉलम से अपने को अलग रखा। जिन लोगों ने अपने को ‘अन्य’ में लिखवाया उसमें जनजातियों/आदिवासियों की संख्या 7095408 है। ‘अन्य’ में मात्र एक राज्य झारखंड की हिस्सेदारी 4235786 यानी 53.36 प्रतिशत है। अगर देशव्यापी स्तर पर ‘अन्य’ में 89.38 प्रतिशत हिससेदारी आदिवासियों की है तो अकेले झारखंड के कुल ‘अन्य’ में 94.73 प्रतिशत हिस्सेदारी आदिवासियों की है। ये ‘अन्य’ कौन हैं और क्यों वे अपना धर्म/पंथ ‘अन्य’ लिखवाते हैं, इसकी पृष्ठभूमि में जाना आवश्यक है। 11857 के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन से अंग्रेज भयभीत हो गए थे। पूरा देश उन्हें विदेशी मान कर उनके खिलाफ संगठित होकर खड़ा होता दिखाई पड़ा। इस पर अंग्रेजो ने फूट डालो और राज करो नीति अपनाते हुए कई तरह के षड़यंत्र रचे। इसी में से एक था आदिवासी-गैर आदिवासियों के बीच विभेद। विडंबना यह है कि अभी भी विदेशी प्रभाव और सहायता वाले कुछ संगठन-समूह आदिवासियों के बीच जाकर यह कहते हैं, ‘‘तुम्हारी एक अलग पहचान है और वह पहचान ही तुम्हें इस देश के मूल निवासी होने की गारंटी देती है। चूंकि हंिदूूवादी ताकतें विविधता में एकता की बात करके तुम्हारी पहचान मिटाना चाहती हैं इसलिए तुम अपनी पहचान बचाने हेतु अपने को हंिदूू कहना छोड़ो।’’ झारखंड के कुछ आदिवासी जनगणना के समय अपना धर्म/पंथ ‘आदि’ या ‘सरना’ लिखवाते हैं। यही काम पूवरेत्तर के आदिवासी भी करते हैं। चूंकि ‘आदि’ या ‘सरना’ करके कोई कॉलम होता नहीं अत: जनगणना करने वाले कर्मचारी उनका नाम ‘अन्य’ के खाते में डाल देते हैं। कुछ वर्षो बाद वही समूह-संगठन आदिवासियों से कहते हैं, ‘‘देखो तुम्हारे धर्म/पंथ को भारत सरकार मान्यता ही नहीं देती। इससे बेहतर है कि तुम ईसाई बन जाओ। ’’1आजादी के बाद से लेकर अभी तक यह षड़यंत्र चल रहा है। यह किसी से छिपा नहीं कि पूवरेत्तर के राज्यों में आज का ‘अन्य’ कल का ईसाई होता गया। यह इससे समझा जा सकता है कि 1971 में अरुणाचल की कुल आबादी 467511 थी जिसमें ईसाई जनसंख्या 0.78 प्रतिशत और ‘अन्य’ की 63.45 प्रतिशत थी। 2011 की जनगणना के तहत अरुणाचल की आबादी 1383727 है जिसमें ‘अन्य’ की आबादी कुल आबादी का 26.20 प्रतिशत है। यहां ‘अन्य’ 63.45 प्रतिशत से घटकर 26.20 पर आ गया परंतु ईसाई 0.78 प्रतिशत से बढ़कर 30.26 प्रतिशत हो गया। आने वाले दिनों में इसके आसार अधिक हैं कि इस सीमांत प्रांत के अधिसंख्य ‘अन्य’ भविष्य में ईसाई बन जाएंगे। ऐसा हुआ तो अरुणाचल भी जल्द ईसाई बहुल हो सकता है। नगालैंड तो ईसाई बहुल बहुत पहले ही हो गया था। 1951 में यहां की आबादी में ईसाई 46.04 प्रतिशत और अन्य 49.50 प्रतिशत थे। 2011 की जनगणना के हिसाब से नगालैंड की आबादी में ‘अन्य’ की जनसंख्या मात्र 0.16 प्रतिशत है पर ईसाई आबादी 87.92 प्रतिशत हो गई। यहां भी ‘अन्य’ घटा तो ईसाई बढ़ा। पूवरेतर का मणिपुर वैष्णव पंथ के अनुयायियों के कारण अपनी एक अलग ही पहचान रखता है, लेकिन आज यह प्रांत अशांति से घिरा है। अगर आने वाले दिनों में यहां भी अगर ‘अन्य’ ईसाई बन जाएं तो हैरत नहीं। अगर ऐसा हुआ तो यह प्रांत भी ईसाई बहुल हो जाएगा। 12011 की जनगणना के तहत झारखंड, पश्चिम बंगाल,ओडिसा छतीसगढ़ और मध्यप्रदेश -इन पांच राज्यों में ही ‘अन्य’ की संख्या करीब 67 लाख है। इसमें 63 लाख आदिवासी हैं। झारखड के ‘अन्य’ में विभिन्न जनजातियों की संख्या देखें तो सबसे ज्यादा उरांव मिलेंगे, फिर संथाल, मुंडा आदि। इन्होंने खुद को हंिदूू के बजाय ‘सरना’ के रूप में दर्ज कराया है। झारखंड में कुल अनुसूचित जनजातियों की संख्या 86 लाख है जिसमें संथाल़, उरांव और मुंडा 76.68 प्रतिशत हैं। साफ है कि आदिवासी जातियां खुद को हंिदूू कहलाने से बच रही हैं। केवल आदिवासी बहळ्ल प्रांतो में ही ‘अन्य’ की संख्या में वृद्धि नहीं हो रही। उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक एवं तमिलनाडु में ‘उल्लेख नहीं’ वालों की संख्या में वृद्धि हो रही है और यह चिंता का कारण है। देश के कुल ‘उल्लेख नहीं’ वाले लोगों की संख्या 2867303 है। इनमें इन राज्यों की हिस्सेदारी 2108079 है। मात्र 10 वर्ष में ‘उल्लेख नही’ वाले उत्तर प्रदेश में 69 हजार से बढ़कर 58 हजार, बिहार में 37 हजार से बढ़कर ढाई लाख, पश्चिम बंगाल में 54 हजार से बढ़कर सवा दो लाख हो गए। यही स्थिति अन्य राज्यों में भी देखी जा सकती है। इस सिलसिले में यह ध्यान रहे कि 1987 में बिशप निर्मल मिंज के नेतृत्व में छतीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल और असम के आदिवासी प्रभाव वाले जिलों को काटकर एक अलग प्रांत उदयांचल की मांग की गई थी। चूकि इन्हीं राज्यों के आदिवासी ‘अन्य’ में अपना नाम लिखवा रहे हैं इसलिए भारत सरकार को ‘अन्य’ की संख्या में हो रहे वृद्धि को गंभीरता से लेना होगा और आगामी जनगणना को ध्यान में रखकर कोई नया दिशानिर्देश जारी करना होगा वरना देश की एकता और अखंडता खतरे में पड़ सकती है। चौथा खंभा न्यूज़ .com / हरेंद्र प्रताप

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रॉबर्ट वाड्रा की गिरफ्तारी पर 5 फरवरी तक जारी रहेगी रोक

—हाईकोर्ट जस्टिस मनोज कुमार गर्ग की कोर्ट ने अधिवक्ता भंवरसिंह मेड़तिया के निधन के बाद कोर्ट में 3.45 बजे रेफरेंस के आयोजन का हवाला देते हुए सुनवाई आगामी 5 फरवरी को नियत करने का आदेश दिया

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जोधपुर,(नसीब सैनी)।

रॉबर्ट वाड्रा के बीकानेर के कोलायत फायरिंग रेंज में 275 बीघा जमीन खरीद-फरोख्त और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े हाई प्रोफाइल मामले में स्काइलाइट प्राइवेट हॉस्पिटलिटी और बिचौलिये महेश नागर की ओर से दायर याचिका पर हाईकोर्ट में सुनवाई समयाभाव के चलते टल गई। अब इस मामले में आगामी 5 फरवरी को फिर सुनवाई होगी। तब तक वाड्रा की गिरफ्तारी पर रोक जारी रहेगी।

रॉबर्ट वाड्रा व मौरीन वाड्रा से जुड़े मामले में स्काईलाइट प्राइवेट हॉस्पिटलिटी व महेश नागर की याचिका पर बुधवार को हाईकोर्ट में जस्टिस मनोज कुमार गर्ग की कोर्ट में सुनवाई होनी थी लेकिन समयाभाव के चलते मामले में सुनवाई टल गई। ईडी की ओर से पक्ष रखते हुए एएसजी राज दीपक रस्तोगी ने कोर्ट से आग्रह किया कि इस मामले में आज अंतिम बहस शुरू कर दी जाए।

हाईकोर्ट जस्टिस मनोज कुमार गर्ग की कोर्ट ने अधिवक्ता भंवरसिंह मेड़तिया के निधन के बाद कोर्ट में 3.45 बजे रेफरेंस के आयोजन का हवाला देते हुए सुनवाई आगामी 5 फरवरी को नियत करने का आदेश दिया। एएसजी राज दीपक रस्तोगी ने कोर्ट को बताया कि इस मामले में विगत 20 पेशियों से आगे तारीख दी जा रही है और वह आशा करते हैं कि आगामी 5 फरवरी को इस मामले में अंतिम बहस शुरू कर दी जाएगी। साथ ही कोर्ट के संज्ञान में लाया गया कि पूर्व में महेश नागर के मामले में रॉबर्ट वाड्रा व मौरीन वाड्रा के खिलाफ नो-कोर्सिव एक्शन का आदेश जारी हो चुका है, जिसके खिलाफ उनकी ओर से एक अर्जी पेश की गई है। उसका निस्तारण भी होना बाकी है। अब इस मामले में आगामी 5 फरवरी को फिर सुनवाई होगी। बुधवार को सुनवाई के दौरान रॉबर्ट वाड्रा व मौरीन वाड्रा की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता केटीएस तुलसी कोर्ट में मौजूद रहे। 

गौरतलब है कि यह मामला बीकानेर के कोलायत क्षेत्र में 275 बीघा जमीन की खरीद फरोख्त से जुड़ा है। इस सौदे की ईडी जांच चल रही है। इस मामले में रॉबर्ट वाड्रा ने अपने पार्टनर मौरीन वाड्रा को एक चेक दिया था। इस चेक द्वारा बिचौलिये महेश नागर ने अपने ड्राइवर के नाम जमीन खरीदकर इस पूरे घोटाले को अंजाम दिया है, जो जांच का विषय है। इस पर पूर्व में  कोर्ट ने राबर्ट वाड्रा को जांच में सहयोग करने के लिए ईडी के सामने पेश होने एवं गिरफ्तारी पर रोक के अंतरिम आदेश दिए थे। वाड्रा की गिरफ्तारी पर रोक आगामी 5 फरवरी तक जारी रहेगी।

नसीब सैनी

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बिजनौर कोर्ट शूटकांड : हाईकोर्ट ने डीजीपी और अपर मुख्य सचिव (गृह) को किया तलब

—दरअसल, बिजनौर में 28 मई को नजीबाबाद में हुई बसपा नेता हाजी अहसान व उनके भांजे शादाब की हत्या के मुख्य अभियुक्त कुख्यात बदमाश शाहनवाज और उसके साथी जब्बार को पेशी के लिए मंगलवार को दिल्ली पुलिस सीजेएम कोर्ट लायी थी

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प्रयागराज,(नसीब सैनी)।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार को बिजनौर सीजीएम कोर्ट में हुए हत्याकांड को संज्ञान में लिया है। हाईकोर्ट ने इस मामले में पुलिस महानिदेशक और प्रमुख सचिव (गृह) को 20 दिसम्बर को तलब किया है। कोर्ट ने कहा है कि जब वह आयें तो सरकार की ओर से न्यायालय की सुरक्षा को लेकर क्या इंतजाम किया गया है, इसके बारे में कोर्ट को बताएं।  जस्टिस सुधीर अग्रवाल व जस्टिस सुनीत कुमार की विशेष खंडपीठ ने इस मामले में सुनवाई करते हुए पूछा है कि इस घटना के बाद अब आने वाले दिनों में न्यायालय परिसर की सुरक्षा के लिए उनके पास क्या इंतजाम हैं। कोर्ट ने यह भी कहा है कि अगर उनके स्तर पर न्यायालय में पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था नहीं दी जा सकती तो इसके लिए केंद्र सरकार से बात की जाए।  

दरअसल, बिजनौर में 28 मई को नजीबाबाद में हुई बसपा नेता हाजी अहसान व उनके भांजे शादाब की हत्या के मुख्य अभियुक्त कुख्यात बदमाश शाहनवाज और उसके साथी जब्बार को पेशी के लिए मंगलवार को दिल्ली पुलिस सीजेएम कोर्ट लायी थी। पेशी के दौरान परिसर में मौजूद मृतक हाजी अहसान की दूसरी पत्नी के पुत्र शाहिल खान ने अपने दो साथियों के संग सीजेएम कोर्ट के अंदर पिस्टलों से गोलियां बरसाकर मुख्य अभियुक्त शाहनवाज की हत्या कर दी। इसमें दो पुलिसकर्मी भी घायल हुए थे।

प्रत्यक्षदिर्शियों के मुताबिक सीजेएम योगेश कुमार ने मेज के पीछे छिपकर जान बचाई। शाहनवाज का साथी जब्बार कोर्ट से फरार हो गया। इस घटना से कोर्ट परिसर में हड़कम्प मच गया था। पुलिस की सतर्कता से तीनों आरोपितों को दबोच लिया गया था। इस मामले में एसपी संजीव त्यागी ने लापरवाही बरतने वाले चौकी प्रभारी समेत 18 पुलिस कर्मियों को निलंबित कर दिया है। 

नसीब सैनी

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निर्भया केस: दोषी अक्षय की पुनर्विचार याचिका खारिज, फांसी की सजा बरकरार

—सुप्रीम कोर्ट ने कहा-पुनर्विचार याचिका में कोई नए तथ्य नहीं, इसलिए ख़ारिज होने योग्य

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नई दिल्ली,(नसीब सैनी)।

सुप्रीम कोर्ट ने निर्भया गैंगरेप और हत्या के एक दोषी अक्षय की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस आर. भानुमति की अध्यक्षता वाली बेंच ने अक्षय के लिए तय की गई फांसी की सजा पर मुहर लगा दी है। कोर्ट ने कहा कि याचिका में वही दलीलें दी गईं हैं जो हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर अपील में दी गईं थीं।

आज सुनवाई के दौरान अक्षय की ओर से वकील एपी सिंह ने कहा कि पीड़ित युवती का दोस्त पैसे लेकर मीडिया को इंटरव्यू दे रहा था, इसलिए उसकी गवाही विश्वसनीय नहीं है। तब जस्टिस भूषण ने कहा कि इसका इस मामले से क्या संबंध है। तब एपी सिंह ने रेयान इंटरनेशनल केस में स्कूल छात्र की हत्या का उदाहरण देते हुए कहा कि इस मामले में बेकसूर को फंसा दिया गया था। अगर सीबीआई की तफ्तीश नहीं होती तो सच सामने नहीं आता। इसलिए हमने इस केस में भी सीबीआई जैसी एजेंसी से जांच की मांग की थी। एपी सिंह ने तिहाड़ के पूर्व जेल अधिकारी सुनील गुप्ता की किताब का जिक्र किया जिसमें इस बात की संभावना व्यक्त की गई है कि राम सिंह की जेल में हत्या की गई थी। उन्होंने कहा कि यह नए तथ्य हैं, जिन पर कोर्ट को फिर से विचार करना चाहिए। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम लेखक की बातों पर नहीं जाना चाहते हैं। ये एक खतरनाक ट्रेंड होगा कि अगर लोगों ने ट्रायल के बाद किताबें लिखना शुरू कर दिया तो ये सही नहीं होगा। अगर कोर्ट ऐसी बातों पर ध्यान देने लगेगी तो इस बहस का कोई अंत न होगा ।

एपी सिंह ने अक्षय की ओर से  बहस करते हुए कहा कि कलयुग में लोग केवल 60 साल तक जीते हैं जबकि दूसरे युग में और ज़्यादा जीते थे। दिल्ली में वायु प्रदूषण और पानी की गुणवक्ता बेहद खराब है, ऐसे में फांसी की सजा क्यों। एपी सिंह ने कहा कि पीड़ित युवती लगातार मॉर्फिन के नशे में थी तो उसका आखिरी बयान कैसे संभव हुआ। उससे समय-समय पर 3 बयान लिए गए जिनमें विरोधाभास है। इस पर कोर्ट ने कहा कि आप हमें ठोस बात बताएं कि हमारे फैसले में कमी क्या है? तब एपी सिंह ने कहा कि महात्मा गांधी ने भी कहा था कि मौत की सजा उचित समाधान नहीं है। अपराधियों को पुनर्वास का मौका मिलना चाहिए। गरीब लोग अपने लिए सही से कानूनी उपाय नहीं कर पाते, इसलिए उन्हें मौत की सजा दी जाती है। मौत की सजा मानवाधिकारों का उल्लंघन है और ये भारत विरोधी संस्कृति का लक्षण है। इस पर जस्टिस भानुमति ने कहा कि आप ठोस व कानूनी तथ्य रखें और बताएं कि हमारे फैसले में क्या कमी थी और क्यों हमें पुनर्विचार करना चाहिए।

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने सभी दलीलों और सबूतों को परखने के बाद फांसी की सजा सुनाई है जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी सही माना। यह अपराध इतना गंभीर है जिसे भगवान भी माफ़ नहीं कर सकता, इसके लिए सिर्फ़ फांसी की ही सजा हो सकती है। मेहता ने कहा कि ऐसे राक्षसों को पैदा कर ईश्वर भी शर्मसार होता होगा, इनसे कोई रहम नहीं होनी चाहिए।

उल्लेखनीय है कि निर्भया गैंगरेप के चारों दोषियों मुकेश, अक्षय, पवन और विनय को साकेत की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई थी, जिस पर 14 मार्च  2014 को दिल्ली हाईकोर्ट ने भी मुहर लगा दी थी। हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ दोषियों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी जिस पर सुनवाई करते हुए फांसी की सजा पर रोक लगाई थी।9 जुलाई 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने मुकेश, पवन और विनय के रिव्यू पिटीशन को खारिज करते हुए उनकी फांसी की सजा पर मुहर लगाई थी।

नसीब सैनी

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