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 रोमिला थापर : एक पाखंडी विद्वान

वैदिक प्रार्थनाएं भी सद्विचारों, सद्-उद्देश्यों को ही बार-बार दुहराती हैं।

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(डॉ.शंकर शरण/ डॉ विवेक आर्य/नसीब सैनी) भारतीय परंपरा में साधुओं के साथ-साथ शिक्षकों, विद्वानों को भी सहज सम्मान देने की प्रवृत्ति रही है, लेकिन जिस तरह रंगे कपड़े पहनकर नकली लोग भी कई बार “साधु” कहला लेते हैं, उसी तरह बड़े अकादमिक पद पर रहकर सामान्य लफ्फाज भी “विद्वान” कहलाते हैं। एक उदाहरण से इसे समझा जा सकता है।
गत 18 अगस्त को प्रेसिडेंसी कॉलेज, कोलकाता के दीक्षांत समारोह में इतिहासकार प्रो. रोमिला थापर ने फरमाया, ‘‘उपनिषदों और ब्राह्मण ग्रंथों में एक से अधिक बार यह कहा गया है कि सबसे सम्मानित ऋषि और विद्वान दासीपुत्र होते थे, यानी जिनकी माताएं निम्न कोटि की दासियां थीं।’’ अपनी आदत के मुताबिक, प्रो. थापर ने इसका कोई उल्लेख नहीं किया कि ऐसी अनोखी बात किस उपनिषद् या ब्राह्मण ग्रंथ में कही गई है? या तो उन्होंने किसी बात से नासमझी में मनमाना निष्कर्ष गढ़ लिया, या किसी ने उन्हें ऐसा निष्कर्ष थमा दिया। लेकिन बिना इसकी परीक्षा किए इसे आधार बनाकर प्रो. थापर ने अपना वर्ग-विभेदी व्याख्यान दे डाला। यह निस्संदेह विद्वान की नहीं, सामान्य राजनीतिक प्रचारक की प्रवृत्ति है, जो काम आने लायक किसी भी झूठ-सच को अपने प्रचार का आधार बना लेता है। उसकी परख नहीं करता। आखिर प्रो. थापर वेदों की अधिकारी विद्वान तो क्या, अध्येता तक नहीं रही हैं।
छांदोग्य उपनिषद् तथा विविध स्मृतियों, सूत्रों में यह भी कहा गया है कि वेदों को समझने के लिए किसी वेदज्ञ ब्राह्मण के निर्देशन में कम से कम 6 वर्ष तक अध्ययन करना अनिवार्य है। जबकि प्रो. थापर को संस्कृत भाषा तक नहीं आती। उनकी तमाम पुस्तकों से साफ दिखता है कि उनका संपूर्ण अध्ययन प्राय: देशी-विदेशी अंग्रेजी पुस्तकों, वह भी अधिकांश विशेष वैचारिक झुकाव वाली दोयम दर्जे की स्रोत-सामग्री पर आधारित है। उस सामग्री में प्रामाणिक वेदज्ञों का नाम तक नहीं मिलता, उन्हें पढ़ना-जानना तो दूर रहा। अत: प्रो. थापर किसी हाल में वेदों पर बोलने की अधिकारी नहीं हैं।
उनके इस वक्तव्य पर एक वैदिक विद्वान से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में कहीं भी जन्म आधारिक विद्वता का कोई उल्लेख नहीं है। किसी ऋषि या ज्ञानी का महत्व उसकी सत्यनिष्ठा तथा ज्ञान की गहराई पर निर्भर रहा है, इस पर नहीं कि उसका जन्म किस पेशे या जाति के परिवार में हुआ। किसी के पिता, माता या वंश का उल्लेख प्राय: परिचय के लिए होता रहा है।
वैदिक प्रार्थनाएं भी सद्विचारों, सद्-उद्देश्यों को ही बार-बार दुहराती हैं। उस संदर्भ में निम्न जाति या उच्च वंश की बात अनर्गल है। प्रो. थापर द्वारा ऐसा कहना और इस पर जोर देना उनके पुराने कम्युनिस्ट दुराग्रह का जोर है, जिसमें वर्ग को केंद्रीय महत्व दिया जाता है। तुम किस वर्ग के, वह किस वर्ग का? पहले यह देखकर तब सारी बात चलती या तय होती है। उसी मतवादी मानसिकता को प्रो. थापर कोलकाता में भोले-भाले युवाओं में वेदों के हवाले से घुसाने की कोशिश कर रही थीं।
यह विद्वता या ज्ञान की पहचान नहीं है। ज्ञान की पहली सीढ़ी है खोज, अन्वेषण। प्रो. थापर और उनकी मार्क्सवादी जमात के लिए यह चीज सिरे से महत्वहीन रही है। आरंभ से ही उनका संपूर्ण लेखन कुछ तयशुदा मार्क्सवादी, राजनीतिक अंधविश्वासों को जैसे-तैसे थोपने की परियोजना भर रहा है। उन्होंने किसी विषय-बिंदु पर तथ्यों का भंडार इकट्ठा कर फिर निष्कर्ष नहीं निकाले, बल्कि किसी बने-बनाए निष्कर्ष को जमाने के लिए जहां-तहां से आधे-अधूरे तथ्यों, अनुमानों, मनमानी व्याख्या और अपने ही जैसे दूसरे प्रचारकों को उद्धृत करके काम चलाया।
एक प्रकार से यह धोखाधड़ी भी थी कि जिस बात का स्वयं प्रामाणिक परीक्षण न किया हो, न उस पर किसी प्रामाणिक विद्वान से अनुशंसा ली हो, उसे सत्य की तरह प्रचारित करना। प्रो. थापर जैसों में यह प्रवृत्ति आज तक नहीं बदली है! इसीलिए कहना पड़ता है कि उनकी गणना पाखंडी विद्वानों में होनी चाहिए। इनसे भी समाज को गंभीर हानि होती है, यह ध्यान रखना चाहिए। प्रो. थापर और उनके संप्रदाय के ‘विद्वानों’ ने पिछले चार-पांच दशक में हमारे देश को भारी क्षति पहुंचाई है। उदाहरण के लिए, हाल में प्रतिष्ठित पुरातत्ववेत्ता तथा आर्कियोलॉजिकल सर्वे आॅफ इंडिया के निदेशक रहे श्री के.के. मुहम्मद की आत्मकथा आई है। इसमें उन्होंने लिखा है कि 1976-77 में ही अयोध्या के राम-जन्मभूमि-बाबरी ढांचे वाले स्थल की खुदाई में मंदिर के अनेक प्रमाण मिले थे। तब कोई आंदोलन शुरू नहीं हुआ था। जब आंदोलन उठा तब मुहम्मद ने वहां मंदिर रहे होने की बात प्रकाशित कराई थी, किन्तु प्रो. थापर समेत कई मार्क्सवादी इतिहासकारों ने समवेत् ताकत लगाकर प्रचार किया कि वहां कभी कोई मंदिर नहीं था, सारा आंदोलन हिन्दू संगठनों की करतूत है।
आज संपूर्ण साक्ष्यों के सामने अपने पर अंतत: न्यायालयों ने भी माना कि वहां मंदिर रहा था। तब प्रो. थापर द्वारा झूठा प्रचार किस प्रकार का काम था? इस प्रसंग पर श्री मुहम्मद ने जो टिप्पणी की है वह विचारणीय है। वे कहते हैं कि “जब तक मार्क्सवादी इतिहासकार अयोध्या मामले में नहीं कूदे थे, तब तक मुस्लिम उसके शान्तिपूर्ण समाधान के लिए तैयार थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उसकी तैयारी भी कर ली थी। यह इसलिए संभव था कि तथ्यों पर हिन्दू और मुस्लिम पक्ष में मतभेद नहीं था। दोनों जानते थे कि अयोध्या में राम-जन्मभूमि मंदिर स्थल पर ही बाबर ने ढांचा खड़ा किया था। विवाद मात्र समाधान के स्वरूप और जमीनी लेन-देन का था। लेकिन प्रो. थापर और उनके मार्क्सवादी संप्रदाय के इतिहासकारों ने अपने दबदबे का प्रयोग कर मुस्लिमों को यह कहकर समाधान से विमुख किया कि हिन्दू संगठनों का दावा फर्जी है, उनसे समझौता करना गलत होगा।”
इसके लिए 1989 में प्रो. थापर के नेतृत्व में जे.एन.यू. के 25 इतिहास प्रोफेसरों ने समवेत् रूप से एक पुस्तिका प्रकाशित की थी- ‘पोलिटिकल एब्यूज आॅफ हिस्ट्री’ (इतिहास का राजनीतिक दुरुपयोग)। इसमें उन्होंने दावा किया कि ‘‘अब तक ऐसा कोई प्रमाण नहीं जिससे सिद्ध हो कि बाबरी मस्जिद वहीं बनाई गई जहां पहले मंदिर था।’’ इस तरह, जो आरोप हिन्दुओं पर कभी किसी ने नहीं लगाया, न मुसलमानों ने, न अंग्रेजों ने, वह प्रो. थापर ने जड़ दिया था! यह आरोप कि हिन्दू लोग झूठ-मूठ वहां राम-जन्मभूमि होने का नाम ले रहे हैं!!
चूंकि यह झूठा प्रचार बड़े पैमाने पर मीडिया के माध्यम से देश-विदेश में फैला, इसलिए शह पाकर मुस्लिम नेता अड़ गए! श्री मुहम्मद के अनुसार, ‘‘मार्क्सवादी इतिहासकारों और कुछ बड़े अखबारों के घातक संयोजन ने मुस्लिम समुदाय को बिल्कुल गलत जानकारी दी। यदि वह न हुआ होता तो मुस्लिम शान्तिपूर्ण समाधान स्वीकार कर लेते। यदि यह हो गया होता, तो आज अनेक दूसरे मुद्दे जो देश झेल रहा है, सुलझ गए होते।’’ इस बात पर विचार करें, तभी उस गंभीर राष्ट्रीय हानि का अंदाजा होगा, जो अयोध्या पर प्रो. थापर जैसे मार्क्सवादियों के हस्तक्षेप से हुई थी। नोट करने की बात यह है कि थापर या अन्य मार्क्सवादी इतिहासकारों ने आज तक अपने उस कुकृत्य पर पश्चाताप नहीं किया है। यह उनके पाखंडी कार्यों का एक उदारण मात्र है।
गत चार-पांच दशकों से उन्होंने ऐसे अनेक कार्य किए हैं। पिछले साल रोमिला थापर ने अपने लिए स्वयं यह नाम घोषित किया: ‘जेएनयू के डायनासोर’! यह उन्होंने जे.एन.यू. में मुहम्मद अफजल तथा 9 फरवरी की घटना के बाद एक भाषण देते हुए कहा। कुछ अर्थों में यह संज्ञा सटीक है। खासकर, नाम बड़े और दर्शन छोटे या कि “बुद्धि छोटी” वाले अर्थ में।
जे.एन.यू. में अफजल वाली घटना का उल्लेख करके भी प्रो. थापर ने ‘जेएनयू के टूटने’ की संभावना पर चिन्ता की, मगर ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशाअल्लाह, इंशाअल्लाह!’ पर कुछ नहीं कहा! इसका यही मतलब हुआ कि भारत टूटे तो टूटे, पर जेएनयू में वामपंथी, इस्लाम-परस्त प्रचार यथावत् चलता रहे, ऐसी बुद्धि यदि क्षुद्र और पाखंडी विद्वता का उदाहरण नहीं, तो और क्या है? वस्तुत: प्रो. थापर के उस भाषण की पूरी धार केवल संघ-भाजपा केंद्र सरकार के विरुद्ध थी। उसमें न राष्ट्र की चिंता थी, न राष्ट्रवाद की परिभाषा की। भारत को तोड़ने की उग्र नारेबाजी पर थापर की बेफिक्री यूं ही नहीं थी। अनेक पुराने मार्क्सवादियों की तरह वे भी भारत की एकता या विखंडन के प्रति बेपरवाह हैं। इसे दूसरे लोगों ने भी नोट किया है।
प्रो. थापर की भाभी राज थापर (प्रसिद्ध अंग्रेजी मासिक “सेमिनार” की संस्थापक, संपादक) की आत्मकथा ‘आॅल दीज ईयर्स’ में एक घटना का उल्लेख मिलता है।
यह बात 1980 की है। तब डॉ. कर्णसिंह केंद्रीय कैबिनेट में मंत्री थे। उन्होंने अपने मित्र रोमेश थापर से एक दिन शिकायत की कि उनकी बहन रोमिला ‘अपने इतिहास लेखन से भारत को नष्ट कर रही है।’ इस पर उनकी रोमेश से तकरार भी हो गई। राज थापर ने यह प्रत्यक्षदर्शी वर्णन लिखते हुए रोमिला का कोई बचाव नहीं किया। उलटे अपने पति रोमेश को ही झड़प में कमजोर पाया जो ‘केवल भाई’ के रूप में कर्ण सिंह से उलझ पड़े थे।
दुर्भाग्यवश, यह सब देखने, इसके गंभीर निहितार्थ समझने, और इसकी काट या उपाय करने पर जैसा ध्यान दिया जाना चाहिए था, वह किसी ने नहीं दिया। अन्यथा तो जो चीज डॉ. कर्णसिंह को दिखाई पड़ी, वह राष्ट्रवादी राजनीति को भी दिखनी चाहिए थी। पर स्वतंत्र भारत में हिन्दू-द्वेषी प्रचार के दुष्प्रभाव को गंभीरता से नहीं लिया गया। अयोध्या प्रसंग पर उनकी घातक भूमिका इसीलिए सफल हुई।
इस उपेक्षा का ही दुष्परिणाम है कि भारत में समाज ज्ञान और साहित्य का अध्ययन-अध्यापन हर तरह की हिन्दू-द्वेषी और देश-विरोधी राजनीति का अड्डा बन गया। दुनियाभर में कम्युनिस्ट राजनीति के पतन के बावजूद यहां ‘जेएनयू के डायनासोर’ अभी भी उसी तरह बेफिक्र, बल्कि घमंड के साथ वैदिक ज्ञान का उपहास उड़ाने तथा देशद्रोहियों के प्रति एकजुटता दिखाने में लगे हुए हैं। दशकों के प्रयत्नों से अब उनके चेले-चेलियां असंख्य अकादामिक पदों, मीडिया और अधिकारी वर्ग में भी हैं। उन्हें भी भारत के टूटने की नहीं, बल्कि समाज ज्ञान शिक्षण को यथावत् भारत-विरोधी प्रचार के रूप में बचाने की चिंता है।
इसीलिए संसद पर हमला करने वाला अफजल या आतंकी सूत्रधार याकूब मेमन, इशरत जहां आदि हर तरह के घाती यदि जेएनयू में हीरो बनाये जाते हैं, तो यह सब संयोग नहीं। आखिर ये लोग भारत को नष्ट ही तो करना चाहते थे! यानी, ठीक वह चीज जो बकौल डॉ. कर्ण सिंह, रोमिला थापर का लेखन चार दशक पहले से करता रहा है।
निस्संदेह, स्वतंत्र भारत में मार्क्सवादी प्रचारकों ने विद्वत पदों को हथियाकर शिक्षा को दूषित करने में भारी सफलता पाई है। उन्होंने भारतीय परंपरा में शिक्षकों-लेखकों को मिलने वाले सहज आदर का भारी दुरुपयोग किया है। नतीजतन पूरी सामाजिक और साहित्यिक शिक्षा का बंटाढार हो जाने पर भी ऐसे पाखंडी विद्वानों की पूछ बनी हुई है। जो लोग नकली साधुओं पर दुखी या कुपित होते हैं, उन्हें कभी पाखंडी प्रोफेसरों पर भी नजर फेरनी चाहिए, क्योंकि इनके द्वारा पहुंचाई जा रही हानि दूरगामी और अधिक घातक रही है।
डॉ.शंकर शरण/ डॉ विवेक आर्य/नसीब सैनी

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जेएनयू में फीस वृद्धि के नाम पर राजनीति

—यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं

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सुरेश हिन्दुस्थानी

देश के उच्च शिक्षा केन्द्र जब राजनीति के अड्डे बनने की ओर कदम बढ़ाने लगें, तब वहां की शिक्षा की दिशा-दशा क्या होगी, यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। फीस बढ़ोतरी के खिलाफ किया जाने वाला दिल्ली का छात्र आंदोलन कुछ इसी प्रकार का भाव प्रदर्शित कर रहा है, जहां केवल और केवल राजनीति ही की जा रही है। किसी भी आंदोलन की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके पीछे जनहित का कितना भाव है। दिल्ली का यह आंदोलन जनसरोकार से कोसों दूर दिखाई दे रहा है।

हालांकि इसके पीछे बहुत से अन्य कारण भी होंगे। सबसे बड़ा कारण तो यही है कि आज जेएनयू की जो छवि जनता के बीच बनी है, वह जनता को खुद ही दूर कर रही है। जिस विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारों की ध्वनि गूंजित होती है, वह कभी जन आंदोलन का हिस्सा नहीं बन सकते हैं।दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के जिन छात्रों ने कभी भारत के टुकड़े करने के नारे लगाए थे, आज वे ही छात्र फीस बढ़ोतरी के छोटे से मामले को राजनीतिक रुप देने का प्रयास करते दिखाई दे रहे हैं। इस छात्र आंदोलन का राजनीतिक स्वरुप इसलिए भी दिखाई दे रहा है, क्योंकि इसमें राष्ट्रीय मानबिन्दुओं और केन्द्र सरकार को सीधे निशाने पर लिया जा रहा है। जेएनयू वामपंथी विचारधारा का एक बड़ा केन्द्र रहा है।

वामपंथी धारा के कार्यकर्ता देश के महानायकों के बारे में क्या सोच रखते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। पिछले घटनाक्रमों को देखें तो पाएंगे कि जेएनयू में देश के विरोध में वातावरण बनाने का काम किया जाता रहा है। वहां आतंकवादी बुरहान वानी के समर्थन में कार्यक्रम किए जाते हैं। सवाल यह कि जेएनयू में शिक्षा के नाम पर आखिर क्या हो रहा है। जहां तक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में फीस बढ़ोतरी की बात है तो यह कहना तर्कसंगत ही होगा कि विगत 19 वर्ष से विश्वविद्यालय के छात्रावास के कमरों और भोजन का शुल्क नहीं बढ़ाया गया, जबकि पिछले 19 सालों में महंगाई का ग्राफ बहुत ऊपर गया है। इस सबका भार पूरी तरह से विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के कंधों पर ही आया। देश के अन्य विश्वविद्यालयों में भी शिक्षा महंगी हो रही है, जो जेएनयू के मुकाबले बहुत अधिक है। ऐसे में विश्वविद्यालय द्वारा कुछ हद तक फीस बढ़ाना न्यायोचित कदम ही है। जिसे वहां के कई छात्र भी सही मानते हैं। लेकिन यह आंदोलन इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि इसमें परदे के पीछे राजनीतिक कार्यकर्ता भूमिका निभा रहे हैं। यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं।

खैर… यह जांच का विषय हो सकता है।देश के प्रसिद्ध अधिवक्ता सांसद डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने इस छात्र आंदोलन के बारे में बहुत ही गहरी बात कही है। उनका मानना है कि जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय को कुछ समय के लिए बंद कर दिया जाए। उनके इस कथन के गहरे निहितार्थ निकल रहे हैं। स्वामी के संकेत को विस्तार से समझना हो तो एक बार जेएनयू की गतिविधियों का अध्ययन करना चाहिए। फिर वह सब सामने आ जाएगा जो वहां होता है। कहा जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जमकर राजनीति की जाती रही है। देश के जो शिक्षा केन्द्र राजनीति के केन्द्र बनते जा रहे हैं, उन पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है।

वर्तमान में जिस प्रकार से जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय का आंदोलन चल रहा है, उसे छात्र आंदोलन कहना न्याय संगत नहीं होगा। क्योंकि, यह विशुद्ध राजनीतिक आंदोलन है। फीस बढ़ोतरी का विरोध तो मात्र बहाना है। इस आंदोलन के समर्थन में देश की संसद में कांग्रेस और वामपंथी दलों की ओर से आवाज उठाई गई। इससे यही संदेश जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जो देश विरोधी नारे लगाए गए, उनके प्रति इन राजनीतिक दलों के समर्थन का ही भाव रहा होगा। इतना ही नहीं, जब भारत तेरे टुकड़े होंगे और हमें चाहिए आजादी जैसे नारे लगाए गए थे, तब भी कांग्रेस और वाम दलों ने खुलेआम समर्थन किया था। ऐसे में सवाल यह उठता है कि कहीं यही दोनों दल छात्रों को आंदोलन करने के लिए तो नहीं उकसा रहे? अगर यह सही है तो फिर केन्द्र सरकार को दोष देना सही नहीं कहा जा सकता।

जब से देश में राजनीतिक सत्ता का परिवर्तन हुआ है, तब से ही देश में उन संस्थानों की सक्रियता दिखाई देने लगी है, जो भारत के बारे में भ्रम का वातावरण बनाने में सहायक हो सकते हैं। चाहे वह शहरी नक्सलवाद को प्रायोजित करने वाले कथित बुद्धिजीवियों की संस्था हो या फिर उनके विचार को अंगीकार करने वाली ही संस्थाएं क्यों न हों। सभी केन्द्र सरकार का विरोध करने के लिए आगे आ रहे हैं। इस विश्वविद्यालय में पढ़ाई करने वाले छात्र कभी भारतीय सेना द्वारा की जाने वाली आतंकियों के विरोध में कार्यवाही पर सवाल उठाते दिखाई देते हैं तो कभी अनुच्छेद 370 को हटाने का विरोध करते हैं। चार वर्ष पूर्व जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में छात्र संघ की उपाध्यक्ष रहीं शेहला राशिद ने भारतीय सेना के विरोध में जमकर भड़ास निकाली थी, जबकि सेना की ओर से स्पष्ट कहा गया था कि ऐसा कुछ भी नहीं है। इससे समझ में आ सकता है कि इस विश्वविद्यालय में कौन-सा पाठ पढ़ाया जाता है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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देश की युवा पीढ़ी में विदेशों के प्रति रुचि बढ़ी

—गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है

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मनोज ज्वाला

एक मीडिया संस्थान के सर्वेक्षण के अनुसार हमारे देश के पढ़े-लिखे और शहरी नौजवानों में से आधे से अधिक ऐसे हैं, जो अपने देश को पसंद नहीं करते। वे विदेशों में जाकर बस जाना चाहते हैं। लगभग दो साल पहले के उक्त सर्वेक्षण के मुताबिक उनमें से 75 फीसदी युवाओं का कहना था कि वे बे-मन और मजबूरीवश भारत में रह रहे हैं। 62.08 फीसदी युवतियों और 66.01 फीसदी युवाओं का मानना था कि भारत  में उनका भविष्य सुरक्षित नहीं है। क्योंकि, यहां अच्छे दिन आने की संभावना कम है। उनमें से 50 फीसदी का मानना था कि भारत में किसी महापुरुष का अवतरण होगा, तभी हालात सुधर सकते हैं, अन्यथा नहीं।

40 फीसदी युवाओं का मानना था कि उन्हें अगर इस देश का प्रधानमंत्री बना दिया जाए, तो वे पांच साल में इस देश का कायापलट कर देंगे।अखबार का वह सर्वेक्षण आज भी बिल्कुल सही लगता है। अगर व्यापक स्तर पर सर्वेक्षण किया जाता, तो देश छोड़ने को तैयार युवाओं का प्रतिशत और अधिक दिखता। वह सर्वेक्षण तो सिर्फ शहरों तक सीमित था। अपने देश में गांवों पर भी तेजी से शहर छाते जा रहे हैं। गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है। गौर कीजिए कि देश छोड़ने को तैयार वे युवा पढ़े-लिखे हैं और शहरों में पले-बढ़े हैं। वे किस पद्धति से किस तरह के विद्यालयों में क्या पढ़े-लिखे हैं और किस रीति-रिवाज से कैसे परिवारों में किस तरह से पले-बढ़े हैं, यह ज्यादा गौरतलब है।

विद्यालय सरकारी हों या गैर सरकारी, सभी में शिक्षा की पद्धति एक है और वह है मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा पद्धति। भारतीयता विरोधी इसी शिक्षा पद्धति को सरकारी मान्यता प्राप्त है। सरकार का पूरा तंत्र इसी तरह की शिक्षा के विस्तार में लगा हुआ है। वैसे अंग्रेजी माध्यम वाले विद्यालय सबसे अच्छे माने जाते हैं और गैर-सरकारी निजी क्षेत्र के अधिकतर विद्यालय अंग्रेजी माध्यम के ही हैं। शहरों में ऐसे ही विद्यालयों की भरमार है और जिन युवाओं के बीच उक्त मीडिया संस्थान ने उपरोक्त सर्वेक्षण किया उनमें से सर्वाधिक युवा ऐसे ही तथाकथित ‘उत्कृष्ट’ विद्यालयों से पढ़े-लिखे हुए हैं। अब रही बात यह कि इन विद्यालयों में आखिर शिक्षा क्या और कैसी दी जाती है, तो यह इन युवाओं की उपरोक्त सोच से ही स्पष्ट है।

जाहिर है, उन्हें शिक्षा के नाम पर ऐसी-ऐसी डिग्रियां दी जाती हैं, जिनके कारण वे महात्वाकांक्षी, स्वार्थी बनकर असंतोष, अहंकार, खीझ, पलायन एवं हीनता-बोध से ग्रसित हो जाते हैं और कमाने-खाने भर थोड़े-बहुत हुनर हासिल कर स्वभाषा व स्वदेश के प्रति ‘नकार’ भाव से पीड़ित होकर विदेश चले जाते हैं।थॉमस विलिंग्टन मैकाले कोई शिक्षा-शास्त्री नहीं था। वह एक षड्यंत्रकारी था, जिसने भारत पर ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जड़ें जमाने की नीयत से भारतीय शिक्षा-पद्धति की जड़ें उखाड़कर मौजूदा शिक्षा-पद्धति को प्रक्षेपित किया था। जो आज भी उसी रूप में कायम है। 20 अक्टूबर 1931 को लंदन के रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ फौरन अफेयर्स के मंच से महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘अंग्रेजी शासन से पहले भारत की शिक्षा-व्यवस्था इंग्लैण्ड से भी अच्छी थी।’ उस पूरी व्यवस्था को सुनियोजित तरीके से समूल नष्ट कर देने के पश्चात ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जरूरतों के मुताबिक उसके रणनीतिकारों ने लम्बे समय तक बहस-विमर्श कर के मैकाले की योजनानुसार यह शिक्षा-पद्धति लागू की थी।

मैकाले ने ब्रिटिश पार्लियामेंट की शिक्षा समिति के समक्ष कहा था ‘हमें भारत में ऐसा शिक्षित वर्ग तैयार करना चाहिए, जो हमारे और उन करोड़ों भारतवासियों के बीच जिन पर हम शासन करते हैं, उन्हें समझाने-बुझाने का काम कर सके। जो केवल खून और रंग की दृष्टि से भारतीय हों, किन्तु रुचि, भाषा व भावों की दृष्टि से अंग्रेज हों।’ विदेशों में बस जाने को उतावले भारतीय युवाओं ने पूरी मेहनत व तबीयत से मैकाले शिक्षा-पद्धति को आत्मसात किया है, ऐसा समझा जा सकता है। यहां प्रसंगवश मैकाले के बहनोई चार्ल्स ट्रेवेलियन द्वारा ब्रिटिश पार्लियामेंट की एक समिति के समक्ष ‘भारत में भिन्न-भिन्न शिक्षा-पद्धतियों के भिन्न-भिन्न परिणाम’ शीर्षक से प्रस्तुत किये गए एक लेख का यह अंश भी उल्लेखनीय है कि ‘मैकाले शिक्षा-पद्धति का प्रभाव अंग्रेजी राज के लिए हितकर हुए बिना नहीं रह सकता। हमारे पास उपाय केवल यही है कि हम भारतवासियों को यूरोपियन ढंग की उन्नति में लगा दें। इससे हमारे लिए भारत पर अपना साम्राज्य कायम रखना बहुत आसान और असंदिग्ध हो जाएगा।’ ऐसा ही हुआ। बल्कि, मैकाले की योजना तो लक्ष्य से ज्यादा ही सफल रही।

हमारे देश के मैकालेवादी राजनेताओं ने अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासन की समाप्ति के बाद भी उनकी अंग्रेजी-मैकाले शिक्षा-पद्धति को न केवल यथावत कायम रखा, बल्कि उसे और ज्यादा अभारतीय रंग-ढंग में ढाल दिया। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष लक्षित प्राचीन भारतीय शिक्षा-पद्धति को अतीत के गर्त में डालकर शिक्षा को उत्पादन-विपणन-मुनाफा-उपभोग-केन्द्रित बना देने और उसे नैतिक सांस्कृतिक मूल्यों से विहीन कर देने तथा राष्ट्रीयता के प्रति उदासीन बना देने का ही परिणाम है कि हमारी यह युवा पीढ़ी महज निजी सुख-स्वार्थ के लिए अपने देश से विमुख हो जाना पसंद कर रही है। उसे विदेशों में ही अपना भविष्य दीख रहा है।

माना कि हमारे देश में तरह-तरह की समस्याएं हैं, किन्तु इनसे जूझने और इन्हें दूर करने की बजाय पलायन कर जाने अथवा कोरा लफ्फाजी करने कि हमें प्रधानमंत्री बना दिया जाए तो हम देश को सुंदर बना देंगे, अति महात्वाकांक्षा-युक्त मानसिक असंतुलन का ही द्योत्तक है। लेकिन आधे से अधिक ये शहरी युवा मानसिक रुप से असंतुलित नहीं हैं, बल्कि असल में वे पश्चिम के प्रति आकर्षित हैं। इसके लिए हमारे देश की चालू शिक्षा-पद्धति का पोषण करने वाले हमारे राजनेता ही जिम्मेवार हैं। यह ‘यूरोपियन ढंग की उन्नति’ के प्रति बढ़ते अनावश्यक आकर्षण का परिणाम है। इस मानसिक पलायन को रोकने के लिए जरूरी है कि हम अपने बच्चों को हमारे राष्ट्र की जड़ों से जोड़ने वाली और संतुलित समग्र मानसिक विकास करने वालीप्राचीन भारतीय पद्धति से भारतीय भाषाओं में समस्त ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा देने की सम्पूर्ण व्यवस्था कायम करें।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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भाई-बहन में प्रेम भाव बढ़ाता है भैया दूज

–बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था

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योगेश कुमार गोयल

(भैया दूज, 29 अक्टूबर पर विशेष)

भाई-बहन के दिलों में पावन संबंधों की मजबूती और प्रेमभाव स्थापित करने वाला पर्व है भैया दूज। इस दिन बहनें अपने भाईयों को तिलक लगाकर ईश्वर से उनकी दीर्घायु की कामना करती हैं। कहा जाता है कि इससे भाई यमराज के प्रकोप से बचे रहते हैं। दीपावली के दो दिन बाद अर्थात कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाए जाने वाले इस पर्व को ‘यम द्वितीया’ व ‘भ्रातृ द्वितीया’ के नाम से भी जाना जाता है। बहुत से भाई-बहन सौभाग्य तथा आयुष्य की प्राप्ति के लिए इस दिन यमुना अथवा अन्य पवित्र नदियों में साथ-साथ स्नान भी करते हैं। भैया दूज मनाने के संबंध में कई किवंदतियां प्रचलित हैं। एक कथा यमराज और उनकी बहन यमुना देवी से संबंधित है। बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था। यमुना अपने भाई यमराज से बहुत स्नेह करती थीं और अक्सर उनसे अनुरोध करती रहती थीं कि वे अपने इष्ट-मित्रों सहित उसके घर भोजन के लिए पधारें लेकिन यमराज हर बार उसके निमंत्रण को किसी न किसी बहाने से टाल जाते। कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमुना ने यमराज को एक बार फिर भोजन के लिए आमंत्रित किया।

उस समय यमराज ने विचार किया कि मैं तो अपने कर्त्तव्य से बंधा सदैव प्राणियों के प्राण ही हरता हूं। इसलिए इस चराचर जगत में कोई भी मुझे अपने घर नहीं बुलाना चाहता। लेकिन बहन यमुना तो मुझे बार-बार अपने घर आमंत्रित कर रही है। इसलिए अब तो उसका निमंत्रण स्वीकार करना ही चाहिए।यमराज को अपने घर आया देख यमुना की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने भाई का खूब आदर-सत्कार करते हुए उनके समक्ष नाना प्रकार के व्यंजन परोसे। बहन के आतिथ्य से यमराज बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे कोई वर मांगने को कहा। इस पर यमुना ने उनसे अनुरोध किया कि आप प्रतिवर्ष इसी दिन मेरे घर आकर भोजन करें और मेरी तरह जो भी बहन इस दिन अपने भाई का आदर-सत्कार करे, उसे तुम्हारा भय न रहे। यमराज ने बहन यमुना को उसका इच्छित वरदान दे दिया। ऐसी मान्यता है कि उसी दिन से ‘भैया दूज’ का पर्व मनाया जाने लगा। भैया दूज के संबंध में और भी कई कथाएं प्रचलित हैं। ऐसी ही एक कथा के अनुसार, एक ब्राह्मण की दो संतानें थी।

एक पुत्र एवं एक पुत्री। पुत्री बहुत समझदार एवं गुणवती थी। वह अपने भाई से जी-जान से प्यार करती थी। एक दिन उसका भाई उससे मिलने उसकी ससुराल पहुंचा। उस समय वह सूत कातने में व्यस्त थी। अतः उसे भाई के आने का पता ही न चल सका। भाई भी बिना कुछ बोले चुपचाप एक ओर बैठा रहा। जब थोड़ी देर बाद बहन की नजर उस पर पड़ी तो भाई को अपने घर आया देख उसे बेहद खुशी हुई। उसने भाई का भरपूर आदर-सत्कार किया। अगले दिन भाई को वापस लौटना था। अतः रास्ते के लिए वह आटे के पकवान बनाने के उद्देश्य से चक्की में आटा पीसने लगी। अनजाने में चक्की में बैठा सांप भी आटे के साथ पिस गया। उसी आटे के पकवान एक पोटली में बांधकर उसने भाई को रास्ते में खाने के लिए देकर विदा किया। भाई के घर से जाने के बाद जब उसे यह मालूम हुआ कि आटे में सांप पिस गया है तो अपने पुत्र को पालने में ही सोता छोड़कर वह अपने भाई के प्राणों की रक्षा के लिए दौड़ी। कुछ दूर जाने पर उसे एक पेड़ की छांव में अपना भाई सोता दिखाई दिया। तब तक उसने पोटली में से कुछ भी नहीं खाया था। उसने भगवान का शुक्रिया अदा किया और पोटली उठाकर दूर फेंक दी तथा भाई के साथ मायके की ओर चल दी।

रास्ते में उसने देखा कि भारी-भारी शिलाएं आकाश में उड़ रही हैं। उसने एक राहगीर से इस रहस्य के बारे में जानना चाहा तो उसने बताया कि जो बहन अपने भाई पर कभी नाराज न होती हो और उसे दिलो-जान से चाहती हो, उस भाई की शादी के समय ये शिलाएं उसकी छाती पर रखी जाएंगी। थोड़ी दूर चलने पर उसे नाग-नागिन दिखाई दिए। नाग ने बताया कि ये शिलाएं जिस व्यक्ति की छाती पर रखी जाएंगी, हम उसे डंस लेंगे। जब बहन ने इस विपत्ति से बचने का उपाय पूछा तो नाग-नागिन ने बताया कि अगर भाई के विवाह के समय उसके सभी कार्य बहन स्वयं करे, तभी भाई की जान बच सकती है।जब उसके भाई के विवाह के लग्न का शुभ मुहूर्त आया तो वह भाई को पीछे धकेलती हुई स्वयं ही लग्न चढ़वाने के लिए आगे हो गई और घोड़ी पर भी स्वयं चढ़ गई। परिवारजन और संबंधी उसके इस विचित्र व्यवहार से हैरान तथा क्रोधित थे। उसके घोड़ी पर चढ़ते ही शिलाएं उड़ती-उड़ती आई लेकिन घोड़ी पर किसी पुरूष की जगह एक महिला को बैठी देख वापस मुड़ गई। जब सुहागरात का समय आया तो वह भाई को पीछे कर खुद भाभी के साथ सोने उसके कमरे में चली गई।

परिवार के सभी सदस्य तथा सभी रिश्तेदार उसके इस अजीबोगरीब व्यवहार से बेहद आश्चर्यचकित और खफा थे। उन्हें उस पर गुस्सा तो बहुत आ रहा था लेकिन उसके जिद के समक्ष सभी विवश थे। सुहागरात पर नियत समय पर नाग-नागिन उसके भाई को डंसने कमरे में पहुंच गए लेकिन उसने नाग-नागिन को मारने की सारी तैयारी पहले ही कर रखी थी। आखिरकार उसने नाग-नागिन का काम तमाम कर दिया। उसके बाद वह निश्चिंत होकर सो गई। सुबह होने पर सभी मेहमानों को विदा करने के बाद परिवार वालों ने सोचा कि अब इस बला को भी कुछ बचा-खुचा देकर यहां से चलता कर दिया जाए लेकिन नींद से जागने पर जब उसने पूरी घटना के बारे में सब को विस्तार से बताया कि किस प्रकार वह अपने बच्चे को पालने में ही सोता छोड़कर दौड़ी-दौड़ी भाई के प्राण बचाने के लिए उसके पीछे चली आई और सभी को नाग-नागिन के मृत शरीर दिखाए तो सभी की आंखों में आंसू आ गए।

भाई के प्रति उसका असीम प्यार तथा समर्पण भाव देखकर उसके प्रति सभी का हृदय श्रद्धा से भर गया।भाई-भाभी तथा माता-पिता ने उसे ढेर सारे उपहारों से लादकर बड़े मान-सम्मान के साथ खुशी-खुशी ससुराल से विदा किया। भाई-बहन के बीच इसी प्रकार के पावन संबंध, प्रेमभाव तथा उनके दिलों में आपसी संबंधों को मजबूत बनाने के लिए ही ‘भैया दूज’ पर्व मनाया जाता है।

(लेखक स्तंभकार हैं।)

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