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पराधीन भारत में अंग्रेजों की आर्यसमाजियों पर क्रूर दृष्टि के कुछ उदाहरण

गरीब हिन्दुओं को वाग्युद्ध में सदा पछाड़ने के अभ्यासी पादरियों को जब आर्यसमाज में पले बालकों तक से पटकनी पर पटकनी मिलने लगी तब वे ओछी करतूतों पर उतर आये और उन्होंने सरकारी अधिकारियों को यह विश्वास दिलाना आरम्भ कर दिया कि आर्यसमाज से क्रिश्चियन मत को तो कम भय है अधिक भय गवर्नमेन्ट को है।

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पराधीन भारत में अंग्रेजों की आर्यसमाजियों पर क्रूर दृष्टि के कुछ उदाहरण

पराधीन भारत में अंग्रेज पादरियों और अधिकारियों की आर्यसमाज के अनुयायियों पर कू्रर दण्डात्मक दृष्टि थी। इसके लगभग 24 उदाहरण आर्यसमाज के विद्वान आचार्य पं. सत्यप्रिय शास्त्री, प्राचार्य, दयानन्द ब्राह्म महाविद्यालय, हिसार ने अपनी पुस्तक ‘भारतीय स्वातन्त्र्य संगाम में आर्यसमाज का योगदान’ में दिये हैं। वह पुस्तक के छठे अध्याय में लिखते हैं कि आर्यसमाज सामान्यतः अपने जन्मकाल से ही विशेषकर श्यामजी कृष्ण वर्मा तथा लाला लाजपतराय के समय से ब्रिटिश सरकार के प्रबल सन्देह का विषय बन गया था। आर्यसमाज के भयंकर राजद्रोही होने का विचार विदेशी सरकार तक कैसे पहुंचा? यह हम आर्यसमाज के लौहपुरुष अमर शहीद स्वामी श्रद्धानन्द जी महाराज के शब्दों में ही यहां पर उद्धृत कर रहे हैं–

“गरीब हिन्दुओं को वाग्युद्ध में सदा पछाड़ने के अभ्यासी पादरियों को जब आर्यसमाज में पले बालकों तक से पटकनी पर पटकनी मिलने लगी तब वे ओछी करतूतों पर उतर आये और उन्होंने सरकारी अधिकारियों को यह विश्वास दिलाना आरम्भ कर दिया कि आर्यसमाज से क्रिश्चियन मत को तो कम भय है अधिक भय गवर्नमेन्ट को है।” (कल्याण मार्ग का पथिक पृ. 146)
इस विश्वास के कारण (जो किसी भी इतिहासकार की दृष्टि में अनुचित नहीं कहा जा सकता है) अंग्रेजी सरकार ने आर्यसमाज को कुचलने तथा दबाने का पूर्ण निश्चय कर लिया था। स्थान-स्थान पर आर्यसमाजियों तथा आर्यसमाज से सम्बन्धित पुरुषों को उत्पीड़ित किया जाने लगा था, उस समय की सरकारी नौकरियों में विद्यमान आर्यसमाजियों पर तो मानों विपत्तियों का पहाड़ ही टूट पड़ा था क्योंकि सरकारी नौकरी में होने के कारण उनको पीड़ित, दुःखी तथा त्रस्त करना सरकार के लिए बहुत ही सरल काम हो गया था। उस समय के आर्यसमाजियों पर क्या बीती, इसका दिग्दर्शन कराने के लिए कुछ घटनाओं का संक्षिप्त संगंह यहां प्रस्तुत किया जाता है। इससे पाठकों को यह भी ज्ञात हो जायेगा कि विपदा और आंधी के उस तूफानी दौर तथा काल में आर्यसमाजियों ने किस प्रकार अपनी बहादुरी का परिचय दिया। वे टूट तो गये परन्तु झुके नहीं और किस प्रकार अपनी लौकिक अनित्य सम्पदाओं के सर्वस्व की बाजी लगाकर भी उन्होंने अपने सिद्धान्तों, मान्यताओं तथा आर्यत्व की रक्षा करके उस विपत्ति की घड़ी में खरे उतरे, यह एक गौरव का विषय है।
आर्यसमाजियों से दुर्व्यवहार की कुछ घटनायें
1- मैं सायंकाल सड़क पर घूम रहा था, सामने से घोड़े पर सवार नाभा के वृद्ध राजा हरि सिंह आ रहे थे। वह अक्सर लाहौर आते थे और मैं उन्हें पहचालता था। मैंने हाथ जोड़कर उनका उचित सत्कार किया। उन्होंने पूछा कि पढ़ते हो? मेरे उत्तर देने पर पूछा कि कहां? मैंने कहा कि दयानन्द कालेज में। ‘कहने लगे कि हंसराज से कह देना कि अंग्रेजों के साथ उलझना ठीक नहीं, जितने आर्यसमाजी तुम हो, उनके लिए तो मेरी फौज ही काफी है। राजा नाभा ने अपना सन्देश पहुंचाने के लिए अच्छा दूत चुना। उनके कथन से इतना तो पता लगता है कि उस समय का राजनैतिक वायुमण्डल कैसा था?’ (आर्यसमाज के त्या0 तप0 सं0 पृ0 32)
2- गुलाबचन्द एक सिख रेजिमेण्ट में लेखक था। वह कर्तव्य परायण तथा सत्यप्रिय और परिश्रमी था। परन्तु साथ ही अध्किरियों को उत्तर देने में निर्भीक था। पहले तो उसकी इस बात की प्रशंसा होती थी किन्तु अब उसका वही गुण कांटे की तरह खटकने लगा और उसे इसलिए पृथक् कर दिया कि वह आर्यसमाजी है। इस प्रकार हम देखते हैं कि आर्यसमाजी का अर्थ हुआ उद्दण्ड अर्थात् निर्भीक एवं सत्यवादी।
3- जिला करनाल के तीन जेलदारों में से एक आर्यसमाजी था। उसकी डायरी में लिख दिया गया कि वह जेलदार तो अच्छा है परन्तु इसका निरीक्षण किया जाना चाहिये क्यांकि वह आर्यसमाजी है।
4- एक डिप्टी कमिश्नर ने एक नगर के प्रमुख पुरुषों को बुलाकर कहा कि यदि तुम्हारे यहां कोई आर्यसमाजी रहता है तो उसे निकाल दो। स्वयं उन प्रमुख पुरुषों में ही दो आर्यसमाजी थे। उन्होंने पूछा कि आर्यसमाजियों के विरुद्ध क्या किया जाये? डिप्टी कमिश्नर ने कहा कि कुछ करो, तुम्हारे विरुद्ध कोई भी कार्रवाई न होगी। वे बोले कि आप स्पष्ट निर्देश करें, तो उनका पालन किया जा सकता है और आप स्पष्ट कार्रवाई करने से डरते हैं तो फिर हममें यह साहस कहां है?
5- एक रेजिमेण्ट के सिपाही आर्यसमाजी थे। उन्हें यज्ञोपवीत उतार देने की आज्ञा दी गई। उन्होंने जाटसभा के द्वारा एक निवेदन पत्र भिजनवाया जिसे आपत्तिजनक समझा गया।
6- एक मुसलमान जमादार ने एक यूरोपियन लैफ्टिनेण्ट को विवाद में हरा दिया। इसकी शिकायत हुई और मुसलमान को डांटकर कहा गया कि तुम आर्यसमाजी हो। उसने उत्तर दिया कि मैं तो मुसलमान हूं। अधिकारी ने उसे और डांटा और कहा कि तुम मुसलमान आर्यसमाजी हो।
7- आर्यसमाज के प्रचारक पं0 दौलतराम झांसी गये। वहां उन्होंने सिपाहियों को भी उपदेश दिया और उनसे अनाथालय के लिए चन्दा लाये। पण्डित जी पर अभियोग चलाया और दण्ड यह दिया गया कि या तो झांसी या उसके पांच मील के अन्दर रहने वाले तथा सरकार को 1000 से 2000 की आय पर कर देने वाले दो सज्जनों की जमानतें दिलाओ या एक वर्ष के कठोर कारावास का कठोर दण्ड भुगतो। यों तो दालतराम जी आगरे के खाते पीते घर के थे परन्तु झांसी में अजनबी थे। इसलिये झांसी में कारावास भुगतना पड़ा।
8- जोधपुर में वायसराय पधारे थे। उनके मार्ग में आर्यसमाज मन्दिर पड़ता था। पुलिस ने समाज वालों से कहा कि अपना फट्टा तथा झण्डा उतार लो। उनके इन्कार करने पर पुलिस ने ये दोनों चिन्ह उतार दिये।
9- पंजाब की एक ब्रिगेड में आज्ञा दी गई कि सिपाही आर्यसमाज अथवा किसी अन्य राजनैतिक सभा में न जाया करें।
10- 10वीं जाट रेजीमेण्ट जो कि सन् 1898 में बनारस में थी, तब उसमें धार्मिक दृष्टि से आर्यसमाज का प्रभाव था। जब सन् 1899 में यह सिलचर पहुंची तो उसके (अंग्रेज) सेनापति को हिन्दी में बहुत ऐसे पत्र मिले जिन पर हिन्दी में ओ३म् लिखा था जिसे कुछ अधिकारियों ने सन्देह की नजरों से देखा। जब 1904 में यह रेजीमेण्ट कानपुर पहुंची तो उसके सैनिक आर्यसमाज के सत्संगों में जाने लगे तथा आर्यसमाज से अपना सम्पर्क बढ़ाने लगे। जब अधिकारियों को यह बात विद्रोह सा जान पड़ी तब उन्होंने उनके आर्यसमाज के सत्संगों, सभाओं में जाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया। साथ ही आर्यसमाजी साहित्य छावनी में लाने पर भी कठोर प्रतिबन्ध लगा दिया। सितम्बर 1905 में सुरजनसिंह नामक एक सिपाही इसी अपराध में दण्डित किया गया था कि उसने स्वदेश प्रचार के बारे में बुलाई गई आर्यसमाज की एक सभा में भाग लिया था।
पुस्तक में 24 घटनाओं में से हमने आरम्भ की 10 घटनायें ही इस लेख में प्रस्तुत की हैं। अन्य घटनायें भी यही कहानी कहती हैं कि आर्यसमाजियों को सरकारी नौकरी से हटाया गया व उन्हें प्रताड़ित किया गया। ऐसी विपरीत परिस्थितियों में आर्यसमाज में शीर्ष नेता स्वामी श्रद्धानन्द ने आर्यों को सन्देश देते हुए अपने पत्र सद्धर्म प्रचारक में कहा था कि आर्य पुरुषो! क्या तुमको परमात्मा पर सच्चा विश्वास नहीं है? यदि है तो फिर दो हाथवालों की खातिर सहस्रबाहु का क्यों अनादर करते हो? दो भुजावाला जिस रोजी को छीन सकता है क्या सहस्रबाहु उससे बढ़कर रोजी तुम्हें दे नहीं सकता? इसलिये संसार को धर्म पर न्यौछावर करना ही आर्यत्व है। वैदिक धर्म की सेवा के लिए कायरों के उद्यत होने का क्या काम?
आचार्य सत्यप्रिय शास्त्री जी लिखते हैं कि स्वामी श्रद्धानन्द जी के चेतावनी भरे इन ओजस्वी शब्दों ने बिजली का सा असर किया। इसके परिणामस्वरूप् अनेक असह्य कष्ट आने पर भी आर्यसमाजी अपने निश्चित तथा स्वीकृत मार्ग से विचलित होने का विचार तक मन में भी नहीं कर सके। यह उस महान् सर्वस्व त्यागी तथा अवसर की नाड़ी को पहचानने वाले दूरदर्शी नेता के नेतृत्व की महान् सफलता थी जिसने मझधार में डूबने को तैयार आर्यसमाज की नौका को कुशल मल्लाह बनकर पार लगाने का साहसपूर्ण कार्य तथा वीरतायुक्त ऐतिहासिक कार्य किया। अन्धकार में भटक रहा आज का आर्यसमाज ऐसे निःस्पृह, दूरदर्शी नेतृत्व की आशा में है। परमात्मा आज के आर्यसमाज के नेतृत्व में श्रद्धानन्द का महान् साहस भरने की कृपा करें जिसकी आज के आर्यसमाज को सबसे बड़ी आवश्यकता है।
उपर्युक्त पंक्तियों में देश को आजाद कराने के लिए आर्यों के त्याग व बलिदान की एक झांकी प्रस्तुत की गई है। महर्षि दयानन्द ने देश को आजाद कराने की न केवल प्रेरणा ही की थी अपितु देश को आजाद कराने के लिए स्वामी श्रद्धानन्द, लाला लाजपतराय, भाई परमानन्द सहित पं. राम प्रसाद बिस्मिल, शहीद भगत सिंह आदि आजादी के अनेक दीवाने भी दिए थे। यह दुःख की बात है कि देश के आजाद होने पर राजनीतिज्ञों ने अपने स्वार्थ के लिए आर्यसमाज की विचारधारा व उसके योगदान की उपेक्षा की। इस लेख को यहीं पर विराम देते हैं। ओ३म् शम्।
द्वारा : मनमोहन कुमार आर्य/ डॉ विवेक आर्य/नसीब सैनी

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जेएनयू में फीस वृद्धि के नाम पर राजनीति

—यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं

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सुरेश हिन्दुस्थानी

देश के उच्च शिक्षा केन्द्र जब राजनीति के अड्डे बनने की ओर कदम बढ़ाने लगें, तब वहां की शिक्षा की दिशा-दशा क्या होगी, यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। फीस बढ़ोतरी के खिलाफ किया जाने वाला दिल्ली का छात्र आंदोलन कुछ इसी प्रकार का भाव प्रदर्शित कर रहा है, जहां केवल और केवल राजनीति ही की जा रही है। किसी भी आंदोलन की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके पीछे जनहित का कितना भाव है। दिल्ली का यह आंदोलन जनसरोकार से कोसों दूर दिखाई दे रहा है।

हालांकि इसके पीछे बहुत से अन्य कारण भी होंगे। सबसे बड़ा कारण तो यही है कि आज जेएनयू की जो छवि जनता के बीच बनी है, वह जनता को खुद ही दूर कर रही है। जिस विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारों की ध्वनि गूंजित होती है, वह कभी जन आंदोलन का हिस्सा नहीं बन सकते हैं।दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के जिन छात्रों ने कभी भारत के टुकड़े करने के नारे लगाए थे, आज वे ही छात्र फीस बढ़ोतरी के छोटे से मामले को राजनीतिक रुप देने का प्रयास करते दिखाई दे रहे हैं। इस छात्र आंदोलन का राजनीतिक स्वरुप इसलिए भी दिखाई दे रहा है, क्योंकि इसमें राष्ट्रीय मानबिन्दुओं और केन्द्र सरकार को सीधे निशाने पर लिया जा रहा है। जेएनयू वामपंथी विचारधारा का एक बड़ा केन्द्र रहा है।

वामपंथी धारा के कार्यकर्ता देश के महानायकों के बारे में क्या सोच रखते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। पिछले घटनाक्रमों को देखें तो पाएंगे कि जेएनयू में देश के विरोध में वातावरण बनाने का काम किया जाता रहा है। वहां आतंकवादी बुरहान वानी के समर्थन में कार्यक्रम किए जाते हैं। सवाल यह कि जेएनयू में शिक्षा के नाम पर आखिर क्या हो रहा है। जहां तक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में फीस बढ़ोतरी की बात है तो यह कहना तर्कसंगत ही होगा कि विगत 19 वर्ष से विश्वविद्यालय के छात्रावास के कमरों और भोजन का शुल्क नहीं बढ़ाया गया, जबकि पिछले 19 सालों में महंगाई का ग्राफ बहुत ऊपर गया है। इस सबका भार पूरी तरह से विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के कंधों पर ही आया। देश के अन्य विश्वविद्यालयों में भी शिक्षा महंगी हो रही है, जो जेएनयू के मुकाबले बहुत अधिक है। ऐसे में विश्वविद्यालय द्वारा कुछ हद तक फीस बढ़ाना न्यायोचित कदम ही है। जिसे वहां के कई छात्र भी सही मानते हैं। लेकिन यह आंदोलन इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि इसमें परदे के पीछे राजनीतिक कार्यकर्ता भूमिका निभा रहे हैं। यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं।

खैर… यह जांच का विषय हो सकता है।देश के प्रसिद्ध अधिवक्ता सांसद डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने इस छात्र आंदोलन के बारे में बहुत ही गहरी बात कही है। उनका मानना है कि जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय को कुछ समय के लिए बंद कर दिया जाए। उनके इस कथन के गहरे निहितार्थ निकल रहे हैं। स्वामी के संकेत को विस्तार से समझना हो तो एक बार जेएनयू की गतिविधियों का अध्ययन करना चाहिए। फिर वह सब सामने आ जाएगा जो वहां होता है। कहा जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जमकर राजनीति की जाती रही है। देश के जो शिक्षा केन्द्र राजनीति के केन्द्र बनते जा रहे हैं, उन पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है।

वर्तमान में जिस प्रकार से जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय का आंदोलन चल रहा है, उसे छात्र आंदोलन कहना न्याय संगत नहीं होगा। क्योंकि, यह विशुद्ध राजनीतिक आंदोलन है। फीस बढ़ोतरी का विरोध तो मात्र बहाना है। इस आंदोलन के समर्थन में देश की संसद में कांग्रेस और वामपंथी दलों की ओर से आवाज उठाई गई। इससे यही संदेश जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जो देश विरोधी नारे लगाए गए, उनके प्रति इन राजनीतिक दलों के समर्थन का ही भाव रहा होगा। इतना ही नहीं, जब भारत तेरे टुकड़े होंगे और हमें चाहिए आजादी जैसे नारे लगाए गए थे, तब भी कांग्रेस और वाम दलों ने खुलेआम समर्थन किया था। ऐसे में सवाल यह उठता है कि कहीं यही दोनों दल छात्रों को आंदोलन करने के लिए तो नहीं उकसा रहे? अगर यह सही है तो फिर केन्द्र सरकार को दोष देना सही नहीं कहा जा सकता।

जब से देश में राजनीतिक सत्ता का परिवर्तन हुआ है, तब से ही देश में उन संस्थानों की सक्रियता दिखाई देने लगी है, जो भारत के बारे में भ्रम का वातावरण बनाने में सहायक हो सकते हैं। चाहे वह शहरी नक्सलवाद को प्रायोजित करने वाले कथित बुद्धिजीवियों की संस्था हो या फिर उनके विचार को अंगीकार करने वाली ही संस्थाएं क्यों न हों। सभी केन्द्र सरकार का विरोध करने के लिए आगे आ रहे हैं। इस विश्वविद्यालय में पढ़ाई करने वाले छात्र कभी भारतीय सेना द्वारा की जाने वाली आतंकियों के विरोध में कार्यवाही पर सवाल उठाते दिखाई देते हैं तो कभी अनुच्छेद 370 को हटाने का विरोध करते हैं। चार वर्ष पूर्व जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में छात्र संघ की उपाध्यक्ष रहीं शेहला राशिद ने भारतीय सेना के विरोध में जमकर भड़ास निकाली थी, जबकि सेना की ओर से स्पष्ट कहा गया था कि ऐसा कुछ भी नहीं है। इससे समझ में आ सकता है कि इस विश्वविद्यालय में कौन-सा पाठ पढ़ाया जाता है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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देश की युवा पीढ़ी में विदेशों के प्रति रुचि बढ़ी

—गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है

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मनोज ज्वाला

एक मीडिया संस्थान के सर्वेक्षण के अनुसार हमारे देश के पढ़े-लिखे और शहरी नौजवानों में से आधे से अधिक ऐसे हैं, जो अपने देश को पसंद नहीं करते। वे विदेशों में जाकर बस जाना चाहते हैं। लगभग दो साल पहले के उक्त सर्वेक्षण के मुताबिक उनमें से 75 फीसदी युवाओं का कहना था कि वे बे-मन और मजबूरीवश भारत में रह रहे हैं। 62.08 फीसदी युवतियों और 66.01 फीसदी युवाओं का मानना था कि भारत  में उनका भविष्य सुरक्षित नहीं है। क्योंकि, यहां अच्छे दिन आने की संभावना कम है। उनमें से 50 फीसदी का मानना था कि भारत में किसी महापुरुष का अवतरण होगा, तभी हालात सुधर सकते हैं, अन्यथा नहीं।

40 फीसदी युवाओं का मानना था कि उन्हें अगर इस देश का प्रधानमंत्री बना दिया जाए, तो वे पांच साल में इस देश का कायापलट कर देंगे।अखबार का वह सर्वेक्षण आज भी बिल्कुल सही लगता है। अगर व्यापक स्तर पर सर्वेक्षण किया जाता, तो देश छोड़ने को तैयार युवाओं का प्रतिशत और अधिक दिखता। वह सर्वेक्षण तो सिर्फ शहरों तक सीमित था। अपने देश में गांवों पर भी तेजी से शहर छाते जा रहे हैं। गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है। गौर कीजिए कि देश छोड़ने को तैयार वे युवा पढ़े-लिखे हैं और शहरों में पले-बढ़े हैं। वे किस पद्धति से किस तरह के विद्यालयों में क्या पढ़े-लिखे हैं और किस रीति-रिवाज से कैसे परिवारों में किस तरह से पले-बढ़े हैं, यह ज्यादा गौरतलब है।

विद्यालय सरकारी हों या गैर सरकारी, सभी में शिक्षा की पद्धति एक है और वह है मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा पद्धति। भारतीयता विरोधी इसी शिक्षा पद्धति को सरकारी मान्यता प्राप्त है। सरकार का पूरा तंत्र इसी तरह की शिक्षा के विस्तार में लगा हुआ है। वैसे अंग्रेजी माध्यम वाले विद्यालय सबसे अच्छे माने जाते हैं और गैर-सरकारी निजी क्षेत्र के अधिकतर विद्यालय अंग्रेजी माध्यम के ही हैं। शहरों में ऐसे ही विद्यालयों की भरमार है और जिन युवाओं के बीच उक्त मीडिया संस्थान ने उपरोक्त सर्वेक्षण किया उनमें से सर्वाधिक युवा ऐसे ही तथाकथित ‘उत्कृष्ट’ विद्यालयों से पढ़े-लिखे हुए हैं। अब रही बात यह कि इन विद्यालयों में आखिर शिक्षा क्या और कैसी दी जाती है, तो यह इन युवाओं की उपरोक्त सोच से ही स्पष्ट है।

जाहिर है, उन्हें शिक्षा के नाम पर ऐसी-ऐसी डिग्रियां दी जाती हैं, जिनके कारण वे महात्वाकांक्षी, स्वार्थी बनकर असंतोष, अहंकार, खीझ, पलायन एवं हीनता-बोध से ग्रसित हो जाते हैं और कमाने-खाने भर थोड़े-बहुत हुनर हासिल कर स्वभाषा व स्वदेश के प्रति ‘नकार’ भाव से पीड़ित होकर विदेश चले जाते हैं।थॉमस विलिंग्टन मैकाले कोई शिक्षा-शास्त्री नहीं था। वह एक षड्यंत्रकारी था, जिसने भारत पर ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जड़ें जमाने की नीयत से भारतीय शिक्षा-पद्धति की जड़ें उखाड़कर मौजूदा शिक्षा-पद्धति को प्रक्षेपित किया था। जो आज भी उसी रूप में कायम है। 20 अक्टूबर 1931 को लंदन के रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ फौरन अफेयर्स के मंच से महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘अंग्रेजी शासन से पहले भारत की शिक्षा-व्यवस्था इंग्लैण्ड से भी अच्छी थी।’ उस पूरी व्यवस्था को सुनियोजित तरीके से समूल नष्ट कर देने के पश्चात ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जरूरतों के मुताबिक उसके रणनीतिकारों ने लम्बे समय तक बहस-विमर्श कर के मैकाले की योजनानुसार यह शिक्षा-पद्धति लागू की थी।

मैकाले ने ब्रिटिश पार्लियामेंट की शिक्षा समिति के समक्ष कहा था ‘हमें भारत में ऐसा शिक्षित वर्ग तैयार करना चाहिए, जो हमारे और उन करोड़ों भारतवासियों के बीच जिन पर हम शासन करते हैं, उन्हें समझाने-बुझाने का काम कर सके। जो केवल खून और रंग की दृष्टि से भारतीय हों, किन्तु रुचि, भाषा व भावों की दृष्टि से अंग्रेज हों।’ विदेशों में बस जाने को उतावले भारतीय युवाओं ने पूरी मेहनत व तबीयत से मैकाले शिक्षा-पद्धति को आत्मसात किया है, ऐसा समझा जा सकता है। यहां प्रसंगवश मैकाले के बहनोई चार्ल्स ट्रेवेलियन द्वारा ब्रिटिश पार्लियामेंट की एक समिति के समक्ष ‘भारत में भिन्न-भिन्न शिक्षा-पद्धतियों के भिन्न-भिन्न परिणाम’ शीर्षक से प्रस्तुत किये गए एक लेख का यह अंश भी उल्लेखनीय है कि ‘मैकाले शिक्षा-पद्धति का प्रभाव अंग्रेजी राज के लिए हितकर हुए बिना नहीं रह सकता। हमारे पास उपाय केवल यही है कि हम भारतवासियों को यूरोपियन ढंग की उन्नति में लगा दें। इससे हमारे लिए भारत पर अपना साम्राज्य कायम रखना बहुत आसान और असंदिग्ध हो जाएगा।’ ऐसा ही हुआ। बल्कि, मैकाले की योजना तो लक्ष्य से ज्यादा ही सफल रही।

हमारे देश के मैकालेवादी राजनेताओं ने अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासन की समाप्ति के बाद भी उनकी अंग्रेजी-मैकाले शिक्षा-पद्धति को न केवल यथावत कायम रखा, बल्कि उसे और ज्यादा अभारतीय रंग-ढंग में ढाल दिया। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष लक्षित प्राचीन भारतीय शिक्षा-पद्धति को अतीत के गर्त में डालकर शिक्षा को उत्पादन-विपणन-मुनाफा-उपभोग-केन्द्रित बना देने और उसे नैतिक सांस्कृतिक मूल्यों से विहीन कर देने तथा राष्ट्रीयता के प्रति उदासीन बना देने का ही परिणाम है कि हमारी यह युवा पीढ़ी महज निजी सुख-स्वार्थ के लिए अपने देश से विमुख हो जाना पसंद कर रही है। उसे विदेशों में ही अपना भविष्य दीख रहा है।

माना कि हमारे देश में तरह-तरह की समस्याएं हैं, किन्तु इनसे जूझने और इन्हें दूर करने की बजाय पलायन कर जाने अथवा कोरा लफ्फाजी करने कि हमें प्रधानमंत्री बना दिया जाए तो हम देश को सुंदर बना देंगे, अति महात्वाकांक्षा-युक्त मानसिक असंतुलन का ही द्योत्तक है। लेकिन आधे से अधिक ये शहरी युवा मानसिक रुप से असंतुलित नहीं हैं, बल्कि असल में वे पश्चिम के प्रति आकर्षित हैं। इसके लिए हमारे देश की चालू शिक्षा-पद्धति का पोषण करने वाले हमारे राजनेता ही जिम्मेवार हैं। यह ‘यूरोपियन ढंग की उन्नति’ के प्रति बढ़ते अनावश्यक आकर्षण का परिणाम है। इस मानसिक पलायन को रोकने के लिए जरूरी है कि हम अपने बच्चों को हमारे राष्ट्र की जड़ों से जोड़ने वाली और संतुलित समग्र मानसिक विकास करने वालीप्राचीन भारतीय पद्धति से भारतीय भाषाओं में समस्त ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा देने की सम्पूर्ण व्यवस्था कायम करें।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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भाई-बहन में प्रेम भाव बढ़ाता है भैया दूज

–बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था

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योगेश कुमार गोयल

(भैया दूज, 29 अक्टूबर पर विशेष)

भाई-बहन के दिलों में पावन संबंधों की मजबूती और प्रेमभाव स्थापित करने वाला पर्व है भैया दूज। इस दिन बहनें अपने भाईयों को तिलक लगाकर ईश्वर से उनकी दीर्घायु की कामना करती हैं। कहा जाता है कि इससे भाई यमराज के प्रकोप से बचे रहते हैं। दीपावली के दो दिन बाद अर्थात कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाए जाने वाले इस पर्व को ‘यम द्वितीया’ व ‘भ्रातृ द्वितीया’ के नाम से भी जाना जाता है। बहुत से भाई-बहन सौभाग्य तथा आयुष्य की प्राप्ति के लिए इस दिन यमुना अथवा अन्य पवित्र नदियों में साथ-साथ स्नान भी करते हैं। भैया दूज मनाने के संबंध में कई किवंदतियां प्रचलित हैं। एक कथा यमराज और उनकी बहन यमुना देवी से संबंधित है। बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था। यमुना अपने भाई यमराज से बहुत स्नेह करती थीं और अक्सर उनसे अनुरोध करती रहती थीं कि वे अपने इष्ट-मित्रों सहित उसके घर भोजन के लिए पधारें लेकिन यमराज हर बार उसके निमंत्रण को किसी न किसी बहाने से टाल जाते। कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमुना ने यमराज को एक बार फिर भोजन के लिए आमंत्रित किया।

उस समय यमराज ने विचार किया कि मैं तो अपने कर्त्तव्य से बंधा सदैव प्राणियों के प्राण ही हरता हूं। इसलिए इस चराचर जगत में कोई भी मुझे अपने घर नहीं बुलाना चाहता। लेकिन बहन यमुना तो मुझे बार-बार अपने घर आमंत्रित कर रही है। इसलिए अब तो उसका निमंत्रण स्वीकार करना ही चाहिए।यमराज को अपने घर आया देख यमुना की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने भाई का खूब आदर-सत्कार करते हुए उनके समक्ष नाना प्रकार के व्यंजन परोसे। बहन के आतिथ्य से यमराज बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे कोई वर मांगने को कहा। इस पर यमुना ने उनसे अनुरोध किया कि आप प्रतिवर्ष इसी दिन मेरे घर आकर भोजन करें और मेरी तरह जो भी बहन इस दिन अपने भाई का आदर-सत्कार करे, उसे तुम्हारा भय न रहे। यमराज ने बहन यमुना को उसका इच्छित वरदान दे दिया। ऐसी मान्यता है कि उसी दिन से ‘भैया दूज’ का पर्व मनाया जाने लगा। भैया दूज के संबंध में और भी कई कथाएं प्रचलित हैं। ऐसी ही एक कथा के अनुसार, एक ब्राह्मण की दो संतानें थी।

एक पुत्र एवं एक पुत्री। पुत्री बहुत समझदार एवं गुणवती थी। वह अपने भाई से जी-जान से प्यार करती थी। एक दिन उसका भाई उससे मिलने उसकी ससुराल पहुंचा। उस समय वह सूत कातने में व्यस्त थी। अतः उसे भाई के आने का पता ही न चल सका। भाई भी बिना कुछ बोले चुपचाप एक ओर बैठा रहा। जब थोड़ी देर बाद बहन की नजर उस पर पड़ी तो भाई को अपने घर आया देख उसे बेहद खुशी हुई। उसने भाई का भरपूर आदर-सत्कार किया। अगले दिन भाई को वापस लौटना था। अतः रास्ते के लिए वह आटे के पकवान बनाने के उद्देश्य से चक्की में आटा पीसने लगी। अनजाने में चक्की में बैठा सांप भी आटे के साथ पिस गया। उसी आटे के पकवान एक पोटली में बांधकर उसने भाई को रास्ते में खाने के लिए देकर विदा किया। भाई के घर से जाने के बाद जब उसे यह मालूम हुआ कि आटे में सांप पिस गया है तो अपने पुत्र को पालने में ही सोता छोड़कर वह अपने भाई के प्राणों की रक्षा के लिए दौड़ी। कुछ दूर जाने पर उसे एक पेड़ की छांव में अपना भाई सोता दिखाई दिया। तब तक उसने पोटली में से कुछ भी नहीं खाया था। उसने भगवान का शुक्रिया अदा किया और पोटली उठाकर दूर फेंक दी तथा भाई के साथ मायके की ओर चल दी।

रास्ते में उसने देखा कि भारी-भारी शिलाएं आकाश में उड़ रही हैं। उसने एक राहगीर से इस रहस्य के बारे में जानना चाहा तो उसने बताया कि जो बहन अपने भाई पर कभी नाराज न होती हो और उसे दिलो-जान से चाहती हो, उस भाई की शादी के समय ये शिलाएं उसकी छाती पर रखी जाएंगी। थोड़ी दूर चलने पर उसे नाग-नागिन दिखाई दिए। नाग ने बताया कि ये शिलाएं जिस व्यक्ति की छाती पर रखी जाएंगी, हम उसे डंस लेंगे। जब बहन ने इस विपत्ति से बचने का उपाय पूछा तो नाग-नागिन ने बताया कि अगर भाई के विवाह के समय उसके सभी कार्य बहन स्वयं करे, तभी भाई की जान बच सकती है।जब उसके भाई के विवाह के लग्न का शुभ मुहूर्त आया तो वह भाई को पीछे धकेलती हुई स्वयं ही लग्न चढ़वाने के लिए आगे हो गई और घोड़ी पर भी स्वयं चढ़ गई। परिवारजन और संबंधी उसके इस विचित्र व्यवहार से हैरान तथा क्रोधित थे। उसके घोड़ी पर चढ़ते ही शिलाएं उड़ती-उड़ती आई लेकिन घोड़ी पर किसी पुरूष की जगह एक महिला को बैठी देख वापस मुड़ गई। जब सुहागरात का समय आया तो वह भाई को पीछे कर खुद भाभी के साथ सोने उसके कमरे में चली गई।

परिवार के सभी सदस्य तथा सभी रिश्तेदार उसके इस अजीबोगरीब व्यवहार से बेहद आश्चर्यचकित और खफा थे। उन्हें उस पर गुस्सा तो बहुत आ रहा था लेकिन उसके जिद के समक्ष सभी विवश थे। सुहागरात पर नियत समय पर नाग-नागिन उसके भाई को डंसने कमरे में पहुंच गए लेकिन उसने नाग-नागिन को मारने की सारी तैयारी पहले ही कर रखी थी। आखिरकार उसने नाग-नागिन का काम तमाम कर दिया। उसके बाद वह निश्चिंत होकर सो गई। सुबह होने पर सभी मेहमानों को विदा करने के बाद परिवार वालों ने सोचा कि अब इस बला को भी कुछ बचा-खुचा देकर यहां से चलता कर दिया जाए लेकिन नींद से जागने पर जब उसने पूरी घटना के बारे में सब को विस्तार से बताया कि किस प्रकार वह अपने बच्चे को पालने में ही सोता छोड़कर दौड़ी-दौड़ी भाई के प्राण बचाने के लिए उसके पीछे चली आई और सभी को नाग-नागिन के मृत शरीर दिखाए तो सभी की आंखों में आंसू आ गए।

भाई के प्रति उसका असीम प्यार तथा समर्पण भाव देखकर उसके प्रति सभी का हृदय श्रद्धा से भर गया।भाई-भाभी तथा माता-पिता ने उसे ढेर सारे उपहारों से लादकर बड़े मान-सम्मान के साथ खुशी-खुशी ससुराल से विदा किया। भाई-बहन के बीच इसी प्रकार के पावन संबंध, प्रेमभाव तथा उनके दिलों में आपसी संबंधों को मजबूत बनाने के लिए ही ‘भैया दूज’ पर्व मनाया जाता है।

(लेखक स्तंभकार हैं।)

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