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लेख

वे पंद्रह दिन भाग 5/15

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05 अगस्त

 

आज अगस्त महीने की पांच तारीख… आकाश में बादल छाये हुये थे, लेकिन फिर भी थोड़ी ठण्ड महसूस हो रही थी. जम्मू से लाहौर जाते समय रावलपिन्डी का रास्ता अच्छा था, इसीलिए गांधीजी का काफिला पिण्डी मार्ग से लाहौर की तरफ जा रहा था.

रास्ते में ‘वाह’ नामक एक शरणार्थी शिविर लगता था. गांधीजी के मन में इच्छा थी कि इस शिविर में जाकर देखा जाए. लेकिन उनके साथ जो कार्यकर्ता थे, वे चाहते थे कि गांधीजी वहां न जा सकें. क्योंकि ‘वाह’ के उस शरणार्थी शिविर में दंगों से बचे हुए हिन्दू-सिखों का तात्कालिक बसेरा था. इन हिन्दुओं और सिखों की दर्दनाक आपबीती हृदयद्रावक थीं. ये सभी शरणार्थी, जो कल लखपति थे, आज अपना घरबार छोड़कर इस शिविर में शरण लेने आए थे. इनमें से अनेकों के परिजन मुस्लिम गुंडों के हाथों मारे गए थे. अनेकों की बहनों, बेटियों, पत्नियों के साथ उनकी आंखों के सामने ही बलात्कार किया गया था, जो उन्होंने खून के घूंट पीकर सहन किया. इसीलिए स्वाभाविक ही था कि कांग्रेस और गांधीजी के प्रति इन परिवारों का क्रोध इस शरणार्थी शिविर में साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा था.

कांग्रेस के कार्यकर्ता सोचते थे कि गांधीजी को इस शिविर में ले जाना उनकी सुरक्षा के लिए ठीक नहीं होगा. परन्तु गांधीजी का निश्चय अटल था कि “मैं ‘वाह’ के शरणार्थी शिविर जरूर जाऊंगा और उन परिवारों से भेंट करूंगा”. अंततः यह निश्चित हुआ कि गांधीजी वहां जायेंगे. दोपहर होते-होते गांधीजी का काफिला इस शरणार्थी शिविर में पहुंचा.

‘वाह’ का यह शरणार्थी शिविर एक तरह से रक्तरंजित इतिहास का जीवंत उदाहरण था. पिछले माह तक इस शिविर में शरणार्थियों की संख्या पंद्रह हजार तक पहुंच चुकी थी. लेकिन जैसे-जैसे १५ अगस्त का दिन नजदीक आ रहा था, वैसे-वैसे इस शिविर के शरणार्थियों की संख्या कम होती जा रही थी. क्योंकि यह पता चल चुका था कि यह क्षेत्र पाकिस्तान के कब्जे में जाने वाला हैं. हिन्दू और सिख परिवारों ने यह समझ लिया था कि अब वे पाकिस्तान में सुरक्षित नहीं रहेंगे. इसलिए सभी निर्वासित लोग, जैसे भी संभव हो रहा था, पूर्वी पंजाब की तरफ भागते चले जा रहे थे. गांधीजी जब पहुंचे तब शिविर में नौ हजार लोग थे. इनमें अधिकांशतः पुरुष ही थे, कुछ प्रौढ़ और बुजुर्ग महिलाएं भी थीं. लेकिन एक भी जवान लड़की इस पूरे शिविर में नहीं थी, क्योंकि शिविर में पहुंचने से पहले ही मुस्लिम नेशनल गार्ड के कार्यकर्ताओं ने या तो उनका अपहरण करके बलात्कार किया था, अथवा हत्या कर दी थी. यह शरणार्थी शिविर नहीं, बल्कि ‘यातना शिविर’ जैसा प्रतीत हो रहा था. बारिश हो चुकी थी, चारों तरफ कीचड़ जमा था. अनेक टेंट टपक रहे थे, स्थान-स्थान पर राशन-पानी लेने के लिए लम्बी-लम्बी कतारें लगी हुई थीं.

गांधीजी के पहुंचने के बाद कुछ शिविरार्थियों को, जिस स्थान पर कम से कम कीचड़ था, वहां एकत्र किया गया. नौ हजार में से लगभग एक-डेढ़ हजार शरणार्थी गांधीजी को सुनने के लिए जमा हो ही गए. कीचड़ और गंदे पानी के बेहद बदबूदार माहौल में, गांधीजी ने पहले अपनी प्रार्थना की और उसके पश्चात शिविरार्थियों के साथ संवाद आरम्भ किया. भीड़ में से दो सिख खड़े हुए, उनका कहना था कि “यह शिविर तत्काल ही पूर्वी पंजाब में स्थानांतरित किया जाए, क्योंकि १५ अगस्त के बाद यहां पाकिस्तान का शासन हो जाएगा… पाकिस्तान का शासन यानी मुस्लिम लीग का शासन. जब ब्रिटिशों के शासन में ही मुसलमानों ने हिन्दुओं और सिखों के इतने सारे क़त्ल-बलात्कार किए हैं तो जब उनका शासन आ जाएगा तब हमारा क्या होगा, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती”.

इस पर गांधीजी थोड़ा मुस्कुराए और अपनी धीमी आवाज में बोलने लगे कि, “आप लोगों को पंद्रह अगस्त के बाद दंगों का भय सता रहा है, लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता. मुसलमानों को पाकिस्तान चाहिए था, वह उन्हें मिल चुका है. इसलिए अब वे दंगा करेंगे ऐसा मुझे तो कतई नहीं लगता. इसके अलावा स्वयं जिन्ना साहब और मुस्लिम लीग के कई नेताओं ने मुझे शान्ति और सौहार्द का भरोसा दिलाया है. उन्होंने मुझे आश्वस्त किया है कि पाकिस्तान में हिन्दू और सिख सुरक्षित रहेंगे. इसलिए हमें उनके आश्वासन का आदर करना चाहिए. यह शरणार्थी शिविर पूर्वी पंजाब में ले जाने का कोई कारण मुझे समझ नहीं आता. आप लोग यहां पर सुरक्षित रहेंगे. अपने मन में से दंगों का भय निकाल दें. यदि मैंने पहले से ही नोआखाली जाने की स्वीकृति नहीं दी होती, तो पंद्रह अगस्त को मैं आपके साथ यहीं पर रहता…. इसलिए आप लोग चिंता न करें. (Mahatma Volume 8, Life of Mohandas K. Gandhi – D. G. Tendulkar).

जब गांधीजी शिविर में यह सब बोल रहे थे, उस समय सामने खडी भीड़ के चेहरों पर क्रोध, चिढ़ और हताशा साफ़ दिखाई दे रही थी. लेकिन फिर भी ‘इन शरणार्थियों के मन में मुसलमानों के प्रति इतना भय और क्रोध क्यों है’, यह गांधीजी की समझ में नहीं आ रहा था. हालांकि बाद में गांधीजी ने अपने प्रतिनिधि के रूप में डॉक्टर सुशीला नायर को इसी शरणार्थी कैम्प में ठहरने का आदेश दिया.

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उधर लाहौर की दोपहर…

‘लाहौर’, यानी प्रभु रामचंद्र के पुत्र ‘लव’ के नाम पर स्थापित शहर. पंजाबी संस्कृति का मायका, शालीमार उद्यान का शहर, नूरजहाँ और जहाँगीर के मकबरे वाला शहर, महाराजा रंजीतसिंह का शहर, अनेक मंदिरों, मस्जिदों और गुरुद्वारों का शहर… कामिनी कौशल का शहर…. पंजाबी रंग-ढंग में रचा-बसा, उत्साह से लबालब भरा लाहौर शहर.

परन्तु आज ५ अगस्त १९४७ की यह दोपहर बड़ी सुस्त सी थी. लगभग उदासी भरी दोपहर. क्योंकि आज लाहौर शहर के सभी हिन्दू और सिख व्यापारियों ने ‘शहर बंद’ का आयोजन किया था. इन समुदायों पर लगातार होने वाले हमले और अत्याचारों के विरोध में इन्होंने आज का बंद आयोजित किया था. इससे पहले हिन्दू-सिख प्रतिनिधिमंडल ने विभिन्न स्तरों पर अपनी बात मजबूती से रखी थी. आज से तीन – साढ़े तीन महीने पहले ही, अर्थात अप्रैल में ही, लाहौर, रावलपिन्डी सहित आसपास के इलाकों में मुसलमानों द्वारा किए गए आक्रमणों के ज़ख्म हरे ही थे, और आगे भी इन हमलों की तेजी में कोई कमी होने के चिन्ह नजर नहीं आ रहे थे.

मुस्लिम नेशनल गार्ड की आक्रामकता बढ़ती ही जा रही थी. उनकी धमकियां और प्रतिदिन के उत्पात बढ़ रहे थे. कहने के लिए तो ‘नेशनल मुस्लिम गार्ड’ का मुस्लिम लीग से कोई सम्बन्ध नहीं था, परन्तु यह केवल दिखावा भर था. मुस्लिम नेशनल गार्ड, मुस्लिम लीग का ही झंडा उपयोग कर रहा था. वास्तविकता यह थी कि मुस्लिम नेशनल गार्ड तो मुस्लिम लीग का ही छिपा हुआ एक आक्रामक संगठन था. हिन्दू एवं सिख व्यापारियों को पाकिस्तान से खदेड़ना और उनकी जवान बहन-बेटियां उठा ले जाना, यही इनका मुख्य काम-धंधा बन चुका था.

लेकिन मंगलवार, पांच अगस्त की इस उदास दोपहर में लाहौर के गवर्नर हाउस में कतई सुस्ती नहीं थी. गवर्नर सर इवान जेन्किन्स बड़ी बेचैनी के साथ अपने दफ्तर में काम कर रहे थे. जेन्किन्स अब पूरी तरह से पंजाबी संस्कृति में ढल चुके ब्रिटिश नौकरशाह थे. पंजाब के बारे में उनकी जानकारी एकदम परिपूर्ण एवं अचूक थी. इसीलिए वह मन ही मन चाहते थे कि विभाजन ना हो. आज दिन भर में लाहौर की घटनाओं पर उनकी विशेष निगरानी बनी हुई थी. सिखों द्वारा व्यापार की हड़ताल के कारण कहीं दंगे और न भड़क जाएं, इसकी चिंता उन्हें सता रही थी. मुस्लिम नेशनल गार्ड की तरफ से दंगे भड़काने का पूरा प्रयास किया जा रहा है, इस बात की ख़ुफ़िया खबर उनके पास पहले ही पहुंच चुकी थी. इसी अफरातफरी में ‘कल गांधीजी लाहौर की संक्षिप्त यात्रा पर आने वाले हैं’ यह सूचना भी उनके पास थी… इसलिए उनकी चिंता और अधिक बढ़ रही थी.

लाहौर के गोमती बाजार, किशन नगर, संत नगर, राम गली, राजगढ़ जैसे हिन्दू बहुल भागों में व्यापार हड़ताल एकदम सफल थी. यहां तक कि रास्तों पर भी इक्का-दुक्का लोग ही दिख रहे थे. ये सारा इलाका हिन्दू-सिख बहुल था. इस इलाके में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं का जबरदस्त नेटवर्क बना हुआ था. प्रतिदिन शाम को विभिन्न मैदानों में लगने वाली प्रत्येक शाखा में कम से कम दो सौ से तीन सौ हिन्दू और सिख जवान हाजिर रहते थे. मार्च से पहले लाहौर में संघ की शाखाओं की संख्या ढाई सौ पार कर गयी थी. मार्च-अप्रैल के दंगों के बाद अनेक हिन्दू विस्थापित हो चुके थे, और अब उन इलाकों की शाखाएं बंद हो गयी थीं. लाहौर के तीन लाख हिन्दू-सिखों में से लगभग एक लाख से अधिक हिन्दू-सिख पिछले तीन माह में लाहौर छोड़कर पूर्वी पंजाब (यानी भारत) में जा चुके थे.

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कराची.

दंगों, आगज़नी, लूटपाट, बलात्कार के इस अशांत वातावरण के बीच लाहौर से पौने आठ सौ मील दूर, सिंध प्रांत के कराची में एक अलग प्रकार की हड़बड़ी दिखाई दे रही थी. सामान्यतः बेहद कम भीड़भाड़ वाले कराची हवाई अड्डे पर आज चारों तरफ भारी भीड़ थी. ठीक दोपहर १२.५५ पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री गोलवलकर गुरूजी, टाटा एयर सर्विसेस के विमान से मुम्बई से कराची आने वाले थे. मुम्बई के जुहू हवाई अड्डे से यह विमान ठीक आठ बजे निकल चुका था. बीच रास्ते में इसे अहमदाबाद में एक संक्षिप्त विराम लेना था और अब यह कराची पहुंचने ही वाला था. इस विमान में गुरूजी के साथ डॉक्टर आबाजी थत्ते भी थे.

नए बनने वाले पाकिस्तान के इस बेहद अशांत माहौल में, गुरूजी की सुरक्षा की पूरी व्यवस्था स्वयंसेवकों ने अपने हाथ में ले रखी थी. बड़े पैमाने पर स्वयंसेवक कराची हवाई अड्डे पर उपस्थित थे. कराची महानगर के कार्यवाह लालकृष्ण आडवाणी भी इन स्वयंसेवकों में शामिल थे. गुरूजी की कार के साथ-साथ मोटरसायकल पर चलने वाले स्वयंसेवकों का एक अलग गट मौजूद था. कराची हवाई अड्डा कुछ ख़ास बड़ा नहीं था, इसलिए सैकड़ों स्वयंसेवकों की भीड़ बहुत भारी भीड़ लग रही थी. ठीक एक बजे गुरूजी और आबाजी विमान से उतरे. हवाई अड्डे पर खड़े स्वयंसेवकों के बीच किसी प्रकार की जल्दबाजी, आपाधापी अथवा भ्रम नहीं था. सारे स्वयंसेवक अनुशासित पद्धति से अपना काम कर रहे थे. तीन स्वयंसेवक बुरका पहनकर आए थे और उसकी जाली में से अपनी चौकस निगाहों द्वारा पूरे हवाई अड्डा परिसर की निगरानी भी कर रहे थे. आबाजी के साथ ही गुरूजी हवाई अड्डे की मुख्य इमारत में पहुंचे और अचानक एक जोरदार गर्जना हुई… “भारत माता की जय”. गुरूजी को लेकर संघ कार्यकर्ताओं का एक बड़ा सा काफिला कराची शहर की तरफ बढ़ चला. आज शाम को ही संघ का पूर्ण गणवेश में एक विशाल पथ संचलन निकलने वाला था और कराची के प्रमुख चौराहे पर गुरूजी की आमसभा निश्चित की गयी थी.

अब केवल नौ या दस दिनों के भीतर जो भाग पाकिस्तान में शामिल होने जा रहा हो, तथा वर्तमान में जिस कराची शहर को पाकिस्तान की अस्थायी राजधानी कहा जा रहा हो, ऐसे शहर में हिन्दुओं द्वारा पथ संचलन निकालना और गुरूजी की आमसभा आयोजित करना एक अत्यधिक साहसी कदम था. दंगाई मुसलमानों को एक कठोर सन्देश देने तथा हिन्दु-सिखों के मन में आत्मविश्वास निर्माण करने के लिए ही संघ ने यह पुरुषार्थ प्रदर्शित करने का फैसला किया था.

शाम को ठीक पांच बजे संचलन निकला, इस संचलन की सुरक्षा के लिए स्वयंसेवकों ने विशेष व्यवस्था की थी. दस हजार स्वयंसेवकों का यह शानदार संचलन इतना जबरदस्त और प्रभावशाली था कि किसी भी मुसलमान की हिम्मत नहीं हुई कि वह इस पर हमला कर दे.

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भारत की पूर्वी और पश्चिमी सीमाओं पर हो रहे हिन्दू-मुस्लिम दंगों एवं अशांति से दूर, तथा शरणार्थी शिविरों के दुःख, पीड़ा एवं क्रोध से परे, दिल्ली के १७, यॉर्क रोड अर्थात स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निवास पर, उनके नए मंत्रिमंडल के गठन एवं नई सरकार के कामकाज के सम्बन्ध में मंत्रणाओं का दौर जारी था. मंगलवार, पांच अगस्त की दोपहर अब शाम में ढलने जा रही थी, और नेहरू उन्हें आई हुई चिठ्ठियों के जवाब डिक्टेट करने में लगे हुए थे.

नेहरू के सामने एक अगस्त को लॉर्ड माउंटबेटन द्वारा भेजा गया पत्र था. जिसमें उन्होंने पूछा था कि ‘भारत सरकार के वर्तमान ऑडिटर जनरल सर बर्टी स्टेग को स्वतंत्र भारत में भी इसी पद पर कार्य करने के लिए सेवा अवधि में बढ़ोतरी होगी या नहीं’. इसमें उन्होंने लिखा था कि ‘यदि उनकी कार्यावधि बढाई जाती है, तो सर बर्टी स्टेग स्वयं भारत में अपना कामकाज आगे जारी रखने में रूचि रखते हैं’.

इस पत्र को सामने रखकर नेहरू अपने सचिव को इसका उत्तर लिखवाने लगे कि ‘सर बर्टी स्टेग फिलहाल वित्त मंत्रालय के आर्थिक सलाहकार हैं और भारत के ऑडिटर जनरल भी हैं. आपको तो यह जानकारी होगी ही कि हमारी नीति यह है कि जिन अंग्रेज अधिकारियों को स्वतंत्र भारत में अपना काम जारी रखने की इच्छा है, उन सभी अधिकारियों को हम सेवावृद्धि देंगे. परन्तु जिन पदों पर योग्य भारतीय मिल जाएंगे वहां हम भारतीय अधिकारियों की ही नियुक्ति करेंगे. फिलहाल तो यह नीति कायम है कि जिन अधिकारियों को यहां काम करने की इच्छा है, वे अपने पद पर बने रहें. ज़ाहिर है कि सर बर्टी स्टेग स्वतंत्र भारत के ऑडिटर जनरल के रूप में काम जारी रखें, हमें कोई आपत्ति नहीं है.’

नेहरू के सामने दूसरा पत्र भी लॉर्ड माउंटबेटन का ही था, लेकिन थोड़ा पिछली दिनांक, यानी १४ जुलाई का. इस पत्र में लॉर्ड माउंटबेटन ने दो बातें लिखी थीं. पहली तो जानकारी चाही थी कि ‘उनके स्टाफ का आगे क्या भविष्य है, उन्हें क्या करना है’, और दूसरी बात यह कि ‘नई सरकार चाहे तो स्वतन्त्र भारत में वे अपना विशाल वाइसरॉय हाउस छोड़कर किसी छोटे बंगले में जाना पसंद करेंगे, आगे जैसा भी निर्णय हो’.

इस पत्र का उत्तर देने से पहले नेहरू कुछ देर विचारमग्न रहे और फिर धीरे से अपने सचिव को उन्होंने इस पत्र का उत्तर डिक्टेट किया..

“प्रिय लॉर्ड माउंटबेटन,
आपके १४ जुलाई वाले पत्र में आपने प्रमुखता से दो मुद्दों का उल्लेख किया है, आपके स्टाफ और आपके आगामी रिहायशी बंगले के बारे में. इसमें से पहले मुद्दे के बारे में आपको ही निर्णय लेना है. आपकी आवश्यकताओं के अनुरूप जो भी सेवक वर्ग आपको चाहिए, स्वतंत्र भारत की तरफ से वह आपके साथ ही रहेगा. मुझे यह जानकर प्रसन्नता है कि लॉर्ड इस्में भी आपके साथ ही रहेंगे. आपके पद की तुलना में छोटे बंगले में स्थानान्तरण संबंधी आपका विचार स्तुत्य है. परन्तु वर्तमान में आपके पद की गरिमा के अनुकूल ऐसा कोई बंगला खोजना कठिन है. वैसे भी उस ‘वाइसरॉय हाउस’ का तत्काल हमें, यानी स्वतन्त्र भारत सरकार के लिए, कोई उपयोग नहीं है. इसीलिए फिलहाल आप दोनों पति-पत्नी अभी वाइसरॉय हाउस में ही निवास करें, यह गुजारिश है…”.

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कराची के प्रमुख चौराहे के पास स्थित खाली मैदान में सरसंघचालक जी की आमसभा की तैयारियां हो चुकी थीं. एक छोटा सा मंच, और उस पर तीन कुर्सियां. सामने एक छोटा सा टेबल, जिस पर पानी पीने के लिए लोटा-गिलास रखा हुआ था. मंच पर केवल एक माईक की व्यवस्था थी. मंच के सामने सारे स्वयंसेवक अनुशासित पद्धति से बैठे हुए थे. नागरिकों के लिए दोनों तरफ बैठने की व्यवस्था थी. दायीं तरफ आज की इस आमसभा के अध्यक्ष साधु टी. एल. वासवानी जी बैठे थे. साधु वासवानी, सिंधी समाज के गुरु थे. सिंधियों में उनका बड़ा मान-सम्मान था. गुरूजी की बाईं तरफ सिंध प्रांत के संघचालक बैठे थे. गुरूजी को सुनने के लिए श्रोताओं की विशाल भीड़ जमा हो चुकी थी. सबसे पहले साधु वासवानी ने प्रस्तावना रखते हुए अपना भाषण दिया. उन्होंने कहा कि, “इतिहास में इस घड़ी, इस समय का विशेष महत्त्व रहेगा, जब हम सिंधी हिंदुओं के समर्थन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक मजबूत पहाड़ की तरह डटा हुआ है”.

इसके पश्चात गुरूजी गोलवलकर का मुख्य भाषण शुरू हुआ. धीमी किन्तु धीर-गंभीर, दमदार आवाज़, स्पष्ट उच्चारण और मन में सिंध प्रांत के तमाम हिंदुओं के प्रति उनकी प्यार भरी बेचैनी… उन्होंने कहा, “..हमारी मातृभूमि पर एक बड़ी विपत्ति आन पड़ी है. मातृभूमि का विभाजन अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ नीति का ही परिणाम है. मुस्लिम लीग ने जो पाकिस्तान हासिल किया है, वह हिंसात्मक पद्धति से, अत्याचार का तांडव मचाते हुए हासिल किया है. हमारा दुर्भाग्य है कि काँग्रेस ने मुस्लिम लीग के सामने घुटने टेक दिए. मुसलमानों और उनके नेताओं को गलत दिशा में मोड़ा गया है. ऐसा कहा जा रहा है कि वे इस्लाम पंथ का पालन करते हैं, इसलिए उन्हें अलग राष्ट्र चाहिए. जबकि देखा जाए तो उनके रीति-रिवाज, उनकी संस्कृति पूर्णतः भारतीय है… अरबी मूल की नहीं…. यह कल्पना करना भी कठिन है कि हमारी खंडित मातृभूमि, सिंधु नदी के बिना हमें मिलेगी. यह प्रदेश सप्त सिंधु का प्रदेश है. राजा दाहिर के तेजस्वी शौर्य का यह प्रदेश है. हिंगलाज देवी के अस्तित्त्व से पावन हुआ, यह सिंध प्रदेश हमें छोड़ना पड़ रहा है. इस दुर्भाग्यशाली और संकट की घड़ी में सभी हिंदुओं को आपस में मिल-जुल कर, एक-दूसरे का ध्यान रखना चाहिए. संकट के यह दिन भी खत्म हो जाएंगे ऐसा मुझे विश्वास है…” गुरूजी के इस ऐतिहासिक भाषण से सभी सुनने वालों के शरीर पर रोमांच उठे. हिंदुओं में एक नए जोश का संचार हो उठा.

भाषण के पश्चात कराची शहर के कुछ प्रमुख नागरिकों के साथ गुरूजी का चायपान का कार्यक्रम रखा गया था. इस में अनेक हिन्दू नेता तो गुरूजी के परिचय वाले ही थे, क्योंकि प्रतिवर्ष अपने प्रवास के दौरान गुरूजी इनसे भेंट करते ही रहते थे. इनमें रंगनाथानंद, डॉक्टर चोईथराम, प्रोफ़ेसर घनश्याम, प्रोफेसर मलकानी, लालजी मेहरोत्रा, शिवरतन मोहता, भाई प्रताप राय, निश्चल दास वजीरानी, डॉक्टर हेमनदास वाधवानी, मुखी गोविन्दम इत्यादि अनेक गणमान्य लोग इस चायपान बैठक में उपस्थित थे.

‘सिंध ऑब्जर्वर’ नामक दैनिक के संपादक और कराची के एक मान्यवर व्यक्तित्त्व, के. पुनैया भी इस बैठक में उपस्थित थे. उन्होंने गुरूजी से प्रश्न किया, कि “क्या हम यदि खुशी-खुशी विभाजन को स्वीकार कर लें, तो इसमें दिक्कत क्या है? मनुष्य का एक पैर सड़ जाए तो उसे काट देने में क्या समस्या है? कम से कम मनुष्य जीवित तो रहेगा ना?” गुरूजी ने तत्काल उत्तर दिया कि, “हां… सही कहा, मनुष्य की नाक कटने पर भी तो वह जीवित रहता ही है ना?”

सिंध प्रांत के हिंदू बंधुओं के पास बताने लायक अनेक बातें थीं, दुःख-दर्द थे. अपने अंधकारमय भविष्य को सामने देख रहे ये हिन्दू, अत्यंत पीड़ित अवस्था में लगभग हताश हो चले थे. इन्हें गुरूजी के साथ बहुत सी बातें साझा करनी थी. परन्तु समय बहुत कम था, अनेक काम और भी करने थे. गुरूजी को उस प्रान्त के प्रचारकों एवं कार्यवाहों की बैठक भी संचालित करनी थी. अन्य तमाम व्यवस्थाएं भी जुटानी थीं.

पांच अगस्त की रात को, जब उधर भारत की राजधानी दिल्ली शांत सोई हुई थी, उस समय पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और बंगाल में भीषण दंगों का दौर चल ही रहा था. और इधर कराची में बैठा यह तपस्वी, विभाजन का यह विनाशकारी चित्र देखकर, हिंदुओं की आगामी व्यवस्था के बारे में विचारमग्न था….!

लेख

जेएनयू में फीस वृद्धि के नाम पर राजनीति

—यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं

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सुरेश हिन्दुस्थानी

देश के उच्च शिक्षा केन्द्र जब राजनीति के अड्डे बनने की ओर कदम बढ़ाने लगें, तब वहां की शिक्षा की दिशा-दशा क्या होगी, यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। फीस बढ़ोतरी के खिलाफ किया जाने वाला दिल्ली का छात्र आंदोलन कुछ इसी प्रकार का भाव प्रदर्शित कर रहा है, जहां केवल और केवल राजनीति ही की जा रही है। किसी भी आंदोलन की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके पीछे जनहित का कितना भाव है। दिल्ली का यह आंदोलन जनसरोकार से कोसों दूर दिखाई दे रहा है।

हालांकि इसके पीछे बहुत से अन्य कारण भी होंगे। सबसे बड़ा कारण तो यही है कि आज जेएनयू की जो छवि जनता के बीच बनी है, वह जनता को खुद ही दूर कर रही है। जिस विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारों की ध्वनि गूंजित होती है, वह कभी जन आंदोलन का हिस्सा नहीं बन सकते हैं।दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के जिन छात्रों ने कभी भारत के टुकड़े करने के नारे लगाए थे, आज वे ही छात्र फीस बढ़ोतरी के छोटे से मामले को राजनीतिक रुप देने का प्रयास करते दिखाई दे रहे हैं। इस छात्र आंदोलन का राजनीतिक स्वरुप इसलिए भी दिखाई दे रहा है, क्योंकि इसमें राष्ट्रीय मानबिन्दुओं और केन्द्र सरकार को सीधे निशाने पर लिया जा रहा है। जेएनयू वामपंथी विचारधारा का एक बड़ा केन्द्र रहा है।

वामपंथी धारा के कार्यकर्ता देश के महानायकों के बारे में क्या सोच रखते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। पिछले घटनाक्रमों को देखें तो पाएंगे कि जेएनयू में देश के विरोध में वातावरण बनाने का काम किया जाता रहा है। वहां आतंकवादी बुरहान वानी के समर्थन में कार्यक्रम किए जाते हैं। सवाल यह कि जेएनयू में शिक्षा के नाम पर आखिर क्या हो रहा है। जहां तक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में फीस बढ़ोतरी की बात है तो यह कहना तर्कसंगत ही होगा कि विगत 19 वर्ष से विश्वविद्यालय के छात्रावास के कमरों और भोजन का शुल्क नहीं बढ़ाया गया, जबकि पिछले 19 सालों में महंगाई का ग्राफ बहुत ऊपर गया है। इस सबका भार पूरी तरह से विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के कंधों पर ही आया। देश के अन्य विश्वविद्यालयों में भी शिक्षा महंगी हो रही है, जो जेएनयू के मुकाबले बहुत अधिक है। ऐसे में विश्वविद्यालय द्वारा कुछ हद तक फीस बढ़ाना न्यायोचित कदम ही है। जिसे वहां के कई छात्र भी सही मानते हैं। लेकिन यह आंदोलन इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि इसमें परदे के पीछे राजनीतिक कार्यकर्ता भूमिका निभा रहे हैं। यह भी सुनने में आ रहा है कि आंदोलन में शामिल होने वाले व्यक्तियों में कई लोग राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं।

खैर… यह जांच का विषय हो सकता है।देश के प्रसिद्ध अधिवक्ता सांसद डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने इस छात्र आंदोलन के बारे में बहुत ही गहरी बात कही है। उनका मानना है कि जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय को कुछ समय के लिए बंद कर दिया जाए। उनके इस कथन के गहरे निहितार्थ निकल रहे हैं। स्वामी के संकेत को विस्तार से समझना हो तो एक बार जेएनयू की गतिविधियों का अध्ययन करना चाहिए। फिर वह सब सामने आ जाएगा जो वहां होता है। कहा जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जमकर राजनीति की जाती रही है। देश के जो शिक्षा केन्द्र राजनीति के केन्द्र बनते जा रहे हैं, उन पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है।

वर्तमान में जिस प्रकार से जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय का आंदोलन चल रहा है, उसे छात्र आंदोलन कहना न्याय संगत नहीं होगा। क्योंकि, यह विशुद्ध राजनीतिक आंदोलन है। फीस बढ़ोतरी का विरोध तो मात्र बहाना है। इस आंदोलन के समर्थन में देश की संसद में कांग्रेस और वामपंथी दलों की ओर से आवाज उठाई गई। इससे यही संदेश जाता है कि इस विश्वविद्यालय में जो देश विरोधी नारे लगाए गए, उनके प्रति इन राजनीतिक दलों के समर्थन का ही भाव रहा होगा। इतना ही नहीं, जब भारत तेरे टुकड़े होंगे और हमें चाहिए आजादी जैसे नारे लगाए गए थे, तब भी कांग्रेस और वाम दलों ने खुलेआम समर्थन किया था। ऐसे में सवाल यह उठता है कि कहीं यही दोनों दल छात्रों को आंदोलन करने के लिए तो नहीं उकसा रहे? अगर यह सही है तो फिर केन्द्र सरकार को दोष देना सही नहीं कहा जा सकता।

जब से देश में राजनीतिक सत्ता का परिवर्तन हुआ है, तब से ही देश में उन संस्थानों की सक्रियता दिखाई देने लगी है, जो भारत के बारे में भ्रम का वातावरण बनाने में सहायक हो सकते हैं। चाहे वह शहरी नक्सलवाद को प्रायोजित करने वाले कथित बुद्धिजीवियों की संस्था हो या फिर उनके विचार को अंगीकार करने वाली ही संस्थाएं क्यों न हों। सभी केन्द्र सरकार का विरोध करने के लिए आगे आ रहे हैं। इस विश्वविद्यालय में पढ़ाई करने वाले छात्र कभी भारतीय सेना द्वारा की जाने वाली आतंकियों के विरोध में कार्यवाही पर सवाल उठाते दिखाई देते हैं तो कभी अनुच्छेद 370 को हटाने का विरोध करते हैं। चार वर्ष पूर्व जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में छात्र संघ की उपाध्यक्ष रहीं शेहला राशिद ने भारतीय सेना के विरोध में जमकर भड़ास निकाली थी, जबकि सेना की ओर से स्पष्ट कहा गया था कि ऐसा कुछ भी नहीं है। इससे समझ में आ सकता है कि इस विश्वविद्यालय में कौन-सा पाठ पढ़ाया जाता है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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—गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है

Published

मनोज ज्वाला

एक मीडिया संस्थान के सर्वेक्षण के अनुसार हमारे देश के पढ़े-लिखे और शहरी नौजवानों में से आधे से अधिक ऐसे हैं, जो अपने देश को पसंद नहीं करते। वे विदेशों में जाकर बस जाना चाहते हैं। लगभग दो साल पहले के उक्त सर्वेक्षण के मुताबिक उनमें से 75 फीसदी युवाओं का कहना था कि वे बे-मन और मजबूरीवश भारत में रह रहे हैं। 62.08 फीसदी युवतियों और 66.01 फीसदी युवाओं का मानना था कि भारत  में उनका भविष्य सुरक्षित नहीं है। क्योंकि, यहां अच्छे दिन आने की संभावना कम है। उनमें से 50 फीसदी का मानना था कि भारत में किसी महापुरुष का अवतरण होगा, तभी हालात सुधर सकते हैं, अन्यथा नहीं।

40 फीसदी युवाओं का मानना था कि उन्हें अगर इस देश का प्रधानमंत्री बना दिया जाए, तो वे पांच साल में इस देश का कायापलट कर देंगे।अखबार का वह सर्वेक्षण आज भी बिल्कुल सही लगता है। अगर व्यापक स्तर पर सर्वेक्षण किया जाता, तो देश छोड़ने को तैयार युवाओं का प्रतिशत और अधिक दिखता। वह सर्वेक्षण तो सिर्फ शहरों तक सीमित था। अपने देश में गांवों पर भी तेजी से शहर छाते जा रहे हैं। गांव के लोगों की सोच भी शहरी सोच से प्रभावित हो रही है। खासकर गांव के युवाओं में शहरियों के अनुकरण और शहर को पलायन की प्रवृति लगातार बढ़ रही है। गौर कीजिए कि देश छोड़ने को तैयार वे युवा पढ़े-लिखे हैं और शहरों में पले-बढ़े हैं। वे किस पद्धति से किस तरह के विद्यालयों में क्या पढ़े-लिखे हैं और किस रीति-रिवाज से कैसे परिवारों में किस तरह से पले-बढ़े हैं, यह ज्यादा गौरतलब है।

विद्यालय सरकारी हों या गैर सरकारी, सभी में शिक्षा की पद्धति एक है और वह है मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा पद्धति। भारतीयता विरोधी इसी शिक्षा पद्धति को सरकारी मान्यता प्राप्त है। सरकार का पूरा तंत्र इसी तरह की शिक्षा के विस्तार में लगा हुआ है। वैसे अंग्रेजी माध्यम वाले विद्यालय सबसे अच्छे माने जाते हैं और गैर-सरकारी निजी क्षेत्र के अधिकतर विद्यालय अंग्रेजी माध्यम के ही हैं। शहरों में ऐसे ही विद्यालयों की भरमार है और जिन युवाओं के बीच उक्त मीडिया संस्थान ने उपरोक्त सर्वेक्षण किया उनमें से सर्वाधिक युवा ऐसे ही तथाकथित ‘उत्कृष्ट’ विद्यालयों से पढ़े-लिखे हुए हैं। अब रही बात यह कि इन विद्यालयों में आखिर शिक्षा क्या और कैसी दी जाती है, तो यह इन युवाओं की उपरोक्त सोच से ही स्पष्ट है।

जाहिर है, उन्हें शिक्षा के नाम पर ऐसी-ऐसी डिग्रियां दी जाती हैं, जिनके कारण वे महात्वाकांक्षी, स्वार्थी बनकर असंतोष, अहंकार, खीझ, पलायन एवं हीनता-बोध से ग्रसित हो जाते हैं और कमाने-खाने भर थोड़े-बहुत हुनर हासिल कर स्वभाषा व स्वदेश के प्रति ‘नकार’ भाव से पीड़ित होकर विदेश चले जाते हैं।थॉमस विलिंग्टन मैकाले कोई शिक्षा-शास्त्री नहीं था। वह एक षड्यंत्रकारी था, जिसने भारत पर ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जड़ें जमाने की नीयत से भारतीय शिक्षा-पद्धति की जड़ें उखाड़कर मौजूदा शिक्षा-पद्धति को प्रक्षेपित किया था। जो आज भी उसी रूप में कायम है। 20 अक्टूबर 1931 को लंदन के रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ फौरन अफेयर्स के मंच से महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘अंग्रेजी शासन से पहले भारत की शिक्षा-व्यवस्था इंग्लैण्ड से भी अच्छी थी।’ उस पूरी व्यवस्था को सुनियोजित तरीके से समूल नष्ट कर देने के पश्चात ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जरूरतों के मुताबिक उसके रणनीतिकारों ने लम्बे समय तक बहस-विमर्श कर के मैकाले की योजनानुसार यह शिक्षा-पद्धति लागू की थी।

मैकाले ने ब्रिटिश पार्लियामेंट की शिक्षा समिति के समक्ष कहा था ‘हमें भारत में ऐसा शिक्षित वर्ग तैयार करना चाहिए, जो हमारे और उन करोड़ों भारतवासियों के बीच जिन पर हम शासन करते हैं, उन्हें समझाने-बुझाने का काम कर सके। जो केवल खून और रंग की दृष्टि से भारतीय हों, किन्तु रुचि, भाषा व भावों की दृष्टि से अंग्रेज हों।’ विदेशों में बस जाने को उतावले भारतीय युवाओं ने पूरी मेहनत व तबीयत से मैकाले शिक्षा-पद्धति को आत्मसात किया है, ऐसा समझा जा सकता है। यहां प्रसंगवश मैकाले के बहनोई चार्ल्स ट्रेवेलियन द्वारा ब्रिटिश पार्लियामेंट की एक समिति के समक्ष ‘भारत में भिन्न-भिन्न शिक्षा-पद्धतियों के भिन्न-भिन्न परिणाम’ शीर्षक से प्रस्तुत किये गए एक लेख का यह अंश भी उल्लेखनीय है कि ‘मैकाले शिक्षा-पद्धति का प्रभाव अंग्रेजी राज के लिए हितकर हुए बिना नहीं रह सकता। हमारे पास उपाय केवल यही है कि हम भारतवासियों को यूरोपियन ढंग की उन्नति में लगा दें। इससे हमारे लिए भारत पर अपना साम्राज्य कायम रखना बहुत आसान और असंदिग्ध हो जाएगा।’ ऐसा ही हुआ। बल्कि, मैकाले की योजना तो लक्ष्य से ज्यादा ही सफल रही।

हमारे देश के मैकालेवादी राजनेताओं ने अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासन की समाप्ति के बाद भी उनकी अंग्रेजी-मैकाले शिक्षा-पद्धति को न केवल यथावत कायम रखा, बल्कि उसे और ज्यादा अभारतीय रंग-ढंग में ढाल दिया। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष लक्षित प्राचीन भारतीय शिक्षा-पद्धति को अतीत के गर्त में डालकर शिक्षा को उत्पादन-विपणन-मुनाफा-उपभोग-केन्द्रित बना देने और उसे नैतिक सांस्कृतिक मूल्यों से विहीन कर देने तथा राष्ट्रीयता के प्रति उदासीन बना देने का ही परिणाम है कि हमारी यह युवा पीढ़ी महज निजी सुख-स्वार्थ के लिए अपने देश से विमुख हो जाना पसंद कर रही है। उसे विदेशों में ही अपना भविष्य दीख रहा है।

माना कि हमारे देश में तरह-तरह की समस्याएं हैं, किन्तु इनसे जूझने और इन्हें दूर करने की बजाय पलायन कर जाने अथवा कोरा लफ्फाजी करने कि हमें प्रधानमंत्री बना दिया जाए तो हम देश को सुंदर बना देंगे, अति महात्वाकांक्षा-युक्त मानसिक असंतुलन का ही द्योत्तक है। लेकिन आधे से अधिक ये शहरी युवा मानसिक रुप से असंतुलित नहीं हैं, बल्कि असल में वे पश्चिम के प्रति आकर्षित हैं। इसके लिए हमारे देश की चालू शिक्षा-पद्धति का पोषण करने वाले हमारे राजनेता ही जिम्मेवार हैं। यह ‘यूरोपियन ढंग की उन्नति’ के प्रति बढ़ते अनावश्यक आकर्षण का परिणाम है। इस मानसिक पलायन को रोकने के लिए जरूरी है कि हम अपने बच्चों को हमारे राष्ट्र की जड़ों से जोड़ने वाली और संतुलित समग्र मानसिक विकास करने वालीप्राचीन भारतीय पद्धति से भारतीय भाषाओं में समस्त ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा देने की सम्पूर्ण व्यवस्था कायम करें।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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भाई-बहन में प्रेम भाव बढ़ाता है भैया दूज

–बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था

Published

योगेश कुमार गोयल

(भैया दूज, 29 अक्टूबर पर विशेष)

भाई-बहन के दिलों में पावन संबंधों की मजबूती और प्रेमभाव स्थापित करने वाला पर्व है भैया दूज। इस दिन बहनें अपने भाईयों को तिलक लगाकर ईश्वर से उनकी दीर्घायु की कामना करती हैं। कहा जाता है कि इससे भाई यमराज के प्रकोप से बचे रहते हैं। दीपावली के दो दिन बाद अर्थात कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाए जाने वाले इस पर्व को ‘यम द्वितीया’ व ‘भ्रातृ द्वितीया’ के नाम से भी जाना जाता है। बहुत से भाई-बहन सौभाग्य तथा आयुष्य की प्राप्ति के लिए इस दिन यमुना अथवा अन्य पवित्र नदियों में साथ-साथ स्नान भी करते हैं। भैया दूज मनाने के संबंध में कई किवंदतियां प्रचलित हैं। एक कथा यमराज और उनकी बहन यमुना देवी से संबंधित है। बताया जाता है कि भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था। यमुना अपने भाई यमराज से बहुत स्नेह करती थीं और अक्सर उनसे अनुरोध करती रहती थीं कि वे अपने इष्ट-मित्रों सहित उसके घर भोजन के लिए पधारें लेकिन यमराज हर बार उसके निमंत्रण को किसी न किसी बहाने से टाल जाते। कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमुना ने यमराज को एक बार फिर भोजन के लिए आमंत्रित किया।

उस समय यमराज ने विचार किया कि मैं तो अपने कर्त्तव्य से बंधा सदैव प्राणियों के प्राण ही हरता हूं। इसलिए इस चराचर जगत में कोई भी मुझे अपने घर नहीं बुलाना चाहता। लेकिन बहन यमुना तो मुझे बार-बार अपने घर आमंत्रित कर रही है। इसलिए अब तो उसका निमंत्रण स्वीकार करना ही चाहिए।यमराज को अपने घर आया देख यमुना की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने भाई का खूब आदर-सत्कार करते हुए उनके समक्ष नाना प्रकार के व्यंजन परोसे। बहन के आतिथ्य से यमराज बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे कोई वर मांगने को कहा। इस पर यमुना ने उनसे अनुरोध किया कि आप प्रतिवर्ष इसी दिन मेरे घर आकर भोजन करें और मेरी तरह जो भी बहन इस दिन अपने भाई का आदर-सत्कार करे, उसे तुम्हारा भय न रहे। यमराज ने बहन यमुना को उसका इच्छित वरदान दे दिया। ऐसी मान्यता है कि उसी दिन से ‘भैया दूज’ का पर्व मनाया जाने लगा। भैया दूज के संबंध में और भी कई कथाएं प्रचलित हैं। ऐसी ही एक कथा के अनुसार, एक ब्राह्मण की दो संतानें थी।

एक पुत्र एवं एक पुत्री। पुत्री बहुत समझदार एवं गुणवती थी। वह अपने भाई से जी-जान से प्यार करती थी। एक दिन उसका भाई उससे मिलने उसकी ससुराल पहुंचा। उस समय वह सूत कातने में व्यस्त थी। अतः उसे भाई के आने का पता ही न चल सका। भाई भी बिना कुछ बोले चुपचाप एक ओर बैठा रहा। जब थोड़ी देर बाद बहन की नजर उस पर पड़ी तो भाई को अपने घर आया देख उसे बेहद खुशी हुई। उसने भाई का भरपूर आदर-सत्कार किया। अगले दिन भाई को वापस लौटना था। अतः रास्ते के लिए वह आटे के पकवान बनाने के उद्देश्य से चक्की में आटा पीसने लगी। अनजाने में चक्की में बैठा सांप भी आटे के साथ पिस गया। उसी आटे के पकवान एक पोटली में बांधकर उसने भाई को रास्ते में खाने के लिए देकर विदा किया। भाई के घर से जाने के बाद जब उसे यह मालूम हुआ कि आटे में सांप पिस गया है तो अपने पुत्र को पालने में ही सोता छोड़कर वह अपने भाई के प्राणों की रक्षा के लिए दौड़ी। कुछ दूर जाने पर उसे एक पेड़ की छांव में अपना भाई सोता दिखाई दिया। तब तक उसने पोटली में से कुछ भी नहीं खाया था। उसने भगवान का शुक्रिया अदा किया और पोटली उठाकर दूर फेंक दी तथा भाई के साथ मायके की ओर चल दी।

रास्ते में उसने देखा कि भारी-भारी शिलाएं आकाश में उड़ रही हैं। उसने एक राहगीर से इस रहस्य के बारे में जानना चाहा तो उसने बताया कि जो बहन अपने भाई पर कभी नाराज न होती हो और उसे दिलो-जान से चाहती हो, उस भाई की शादी के समय ये शिलाएं उसकी छाती पर रखी जाएंगी। थोड़ी दूर चलने पर उसे नाग-नागिन दिखाई दिए। नाग ने बताया कि ये शिलाएं जिस व्यक्ति की छाती पर रखी जाएंगी, हम उसे डंस लेंगे। जब बहन ने इस विपत्ति से बचने का उपाय पूछा तो नाग-नागिन ने बताया कि अगर भाई के विवाह के समय उसके सभी कार्य बहन स्वयं करे, तभी भाई की जान बच सकती है।जब उसके भाई के विवाह के लग्न का शुभ मुहूर्त आया तो वह भाई को पीछे धकेलती हुई स्वयं ही लग्न चढ़वाने के लिए आगे हो गई और घोड़ी पर भी स्वयं चढ़ गई। परिवारजन और संबंधी उसके इस विचित्र व्यवहार से हैरान तथा क्रोधित थे। उसके घोड़ी पर चढ़ते ही शिलाएं उड़ती-उड़ती आई लेकिन घोड़ी पर किसी पुरूष की जगह एक महिला को बैठी देख वापस मुड़ गई। जब सुहागरात का समय आया तो वह भाई को पीछे कर खुद भाभी के साथ सोने उसके कमरे में चली गई।

परिवार के सभी सदस्य तथा सभी रिश्तेदार उसके इस अजीबोगरीब व्यवहार से बेहद आश्चर्यचकित और खफा थे। उन्हें उस पर गुस्सा तो बहुत आ रहा था लेकिन उसके जिद के समक्ष सभी विवश थे। सुहागरात पर नियत समय पर नाग-नागिन उसके भाई को डंसने कमरे में पहुंच गए लेकिन उसने नाग-नागिन को मारने की सारी तैयारी पहले ही कर रखी थी। आखिरकार उसने नाग-नागिन का काम तमाम कर दिया। उसके बाद वह निश्चिंत होकर सो गई। सुबह होने पर सभी मेहमानों को विदा करने के बाद परिवार वालों ने सोचा कि अब इस बला को भी कुछ बचा-खुचा देकर यहां से चलता कर दिया जाए लेकिन नींद से जागने पर जब उसने पूरी घटना के बारे में सब को विस्तार से बताया कि किस प्रकार वह अपने बच्चे को पालने में ही सोता छोड़कर दौड़ी-दौड़ी भाई के प्राण बचाने के लिए उसके पीछे चली आई और सभी को नाग-नागिन के मृत शरीर दिखाए तो सभी की आंखों में आंसू आ गए।

भाई के प्रति उसका असीम प्यार तथा समर्पण भाव देखकर उसके प्रति सभी का हृदय श्रद्धा से भर गया।भाई-भाभी तथा माता-पिता ने उसे ढेर सारे उपहारों से लादकर बड़े मान-सम्मान के साथ खुशी-खुशी ससुराल से विदा किया। भाई-बहन के बीच इसी प्रकार के पावन संबंध, प्रेमभाव तथा उनके दिलों में आपसी संबंधों को मजबूत बनाने के लिए ही ‘भैया दूज’ पर्व मनाया जाता है।

(लेखक स्तंभकार हैं।)

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